शनिवार, नवंबर 10, 2007

वाई वी रेड्डी की मुश्किलें...

रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई वी रेड्डी द्वारा घोषित मध्यावधि मौद्रिक नीति उम्मीदों के मुताबिक ही है। इस नीति में उन्होंने सुरसा की तरह धीरे-धीरे अपना बदन फैलाती मुद्रास्फीति से निपटने और अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों के अनुसार कम ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की व्यवस्था के परस्पर विरोधी दबावों के बीच एक बार फिर संतुलन बैठाने की कोशिश की है। हालांकि यह कोई आसान चुनौती नहीं है लेकिन वे अब तक इस संतुलन को बनाए रखने में कामयाब रहे हैं।

पर आने वाले महीनों में रेड्डी के लिए इस संतुलन को बनाए रखना आसान नहीं होगा। इसे वे खुद भी जानते है। अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे संकेतों से यह साफ है कि उनकी मुश्किले बढ़ने वाली हैं। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती मुद्रास्फीति की बढ़ती हुई दर को काबू में रखना है। हालांकि वित्त मंत्रालय के दबाव में उन्होंने खुलकर तो नहीं लेकिन दबी जुबान में यह स्वीकार किया है कि मुद्रास्फीति को 5 से  5.50 प्रतिशत के बीच रख पाना मुश्किल होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि मुद्रास्फीति की बढ़ती हुई दर राजनीतिक रूप से एक अत्यंत संवेदनशील मसला है और यूपीए सरकार किसी भी कीमत पर इसे 5 से 5.50 फीसदी के बीच रखना चाहती है।

लेकिन मुद्रास्फीति को काबू में करने के मामले में मौद्रिक नीति की सीमाएं है और रेड्डी इसे अच्छी तरह से जानते हैं। उन्होंने मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए एक बार फिर रिवर्स रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का ऐलान किया है। इसी तरह रेपो रेट में भी  0.25 फीसदी की वृद्धि की गई है। इस कारण ब्याज दरों खासकर आवास और कार ऋण की ब्याज दरों में वृद्धि होना तय है। लेकिन इस कदम से मुद्रास्फीति की बढ़ती दर पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ने की उम्मीद नहीं है।

इसकी वजह यह है कि मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी का होना है। तेल की बढ़ती कीमतों का असर तमाम औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ रहा है। दूसरी ओर दुनिया भर में खासकर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज की दरों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अलावा डालर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट का असर आयात के महंगे होते जाने के रूप में सामने आ रहा है। इन सब कारणों से रिजर्व बैंक के लिए न सिर्फ मुद्रास्फीति की बढ़ती दर को काबू में रख पाना मुश्किल होता जा रहा है बल्कि ब्याज दरों में भी वृद्धि को रोक पाना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है।

लेकिन रेड्डी की मुश्किलें यहीं पर खत्म नहीं होती। बढ़ता व्यापार और चालू खाते का घाटा उनके लिए नया सिरदर्द बनता जा रहा है। चालू वित्तीय वर्ष में अप्रैल से जून के बीच चालू खाते का घाटा 6.2 अरब डालर तक पहुंच चुका है जो कि जीडीपी का 3 प्रतिशत बनता है। पिछले वर्ष इसी अवधि में चालू खाते में  3.3 अरब डालर का अधिशेष था। इस बीच अप्रैल से अगस्त'05 के बीच पांच महीनों में व्यापार घाटा पिछले वर्ष के 9.7 अरब डालर की तुलना में लगभग दुगुना बढ़कर 17.4 अरब डालर तक पहुंच गया है। इसकी वजह यह है कि इन पांच महीनों में आयात में वृद्धि की दर डालर में 37 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है जबकि निर्यात की वृद्धि दर 23 फीसदी ही रही है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि सितंबर में निर्यात वृद्धि की दर गिरकर मात्र  7.5 फीसदी रह गई है।

बढ़ते व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे का सीधा असर रुपये की कीमतों पर पड़ रहा है। पिछले कुछ महीनों में डालर की तुलना में रुपये की कीमतों में काफी गिरावट दर्ज की गई है। रुपये की कीमत में गिरावट का असर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) पर पड़ा है और उन्होंने जवाब में शेयर बाजार में बिकवाली शुरू कर दी है। अक्तूबर महीने में शेयर बाजार में गिरावट का रुख इस तथ्य की पुष्टि करता है। एफआईआई शेयर बेचकर मुनाफे को जल्दी से जल्दी डालर में बदलना चाहते हैं। लेकिन अगर इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा तो इसका सीधा दबाव विदेशी मुद्रा भंडार पर पडेग़ा और उस स्थिति में रिजर्व बैंक के लिए इस आवारा पूंजी के पलायन से पैदा होने वाली चुनौती से निपटना किसी परीक्षा से कम नहीं होगा।

लेकिन यह सब बहुत कुछ अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू अर्थव्यवस्था में होने वाली उठा-पटक पर निर्भर करता है। लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिन रिजर्व बैंक और वाई वी रेड्डी की मौद्रिक नीति के लिए परीक्षा के होंगे। जैसे इतना ही काफी नहीं था, रेड्डी के सामने बैंकिग व्यवस्था के प्रबंधन के मामले में भी कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। इस लिहाज से उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बैंको द्वारा आंख मूंद कर दिए जा रहे आवास ऋणों के कारण रीयल इस्टेट/प्रॉपर्टी बाजार में पैदा हुए बुलबुले से निपटना है। उन्होंने इस सिलसिले में बैंको को चेताया है और उनसे संयम बरतने को कहा है। लेकिन इतना काफी नहीं है। रिजर्व बैंक को रीयल इस्टेट बाजार को संयमित करने के लिए ठोस कदम उठाने पडेग़ें अन्यथा जिस तरह की स्थितियां बन रही हैं, उससे न सिर्फ बैंकिग व्यवस्था के लिए बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए संकट खड़ा हो सकता है।
इसी तरह रेड्डी को बैंको के इस रवैये के खिलाफ भी सख्त कदम उठाना पडेग़ा कि वे आपसी गलाकट होड़ के कारण कारपोरेट सेक्टर को तो पीएलआर से भी कम दरों पर कर्ज दे रहे है लेकिन प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे कृषि और लघु उद्योगों को न सिर्फ ऊंची दर पर कर्ज दे रहे हैं बल्कि अभी भी कर्ज देने में खासी आनाकानी कर रहे हैं। यह स्थिति न तो बैंकिंग क्षेत्र की सेहत के लिए अच्छी है और न ही अर्थव्यवस्था के लिए। दरअसल, वित्तीय  उदारीकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में जिस तरह से एक किस्म की सट्टेबाजी में शामिल होता जा रहा है, उसका सीधा खामियाजा अर्थव्यवस्था और आम लोगों को उठाना पड़ रहा है।
 
यूपीए गठबंधन के सरकार में आने के बाद यह अपेक्षा की जा रही थी कि बैंकिंग क्षेत्र की प्राथमिकताएं एक बार फिर से बदलेंगी लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मौद्रिक नीति में इसके संकेत उतने स्पष्ट और ठोस रूप में नहीं दिखाई देते है। हालांकि रेड्डी ने कुछ ''राजनीतिक रूप से सही`` बाते की हैं लेकिन व्यवहार में बैंक उन्हें कितनी तरजीह देंगे, यह कहना मुश्किल है। जैसे रेड्डी के इस निर्देश को ही लीजिए जिसमें उन्होंने बैंको से कहा है कि वे खाता खोलने के लिए न्यूनतम बैलेंस की सीमा न रखें। सवाल है कि जिस देश में आधी से अधिक आबादी के पास बैंको में कोई खाता नहीं है, क्या वहां बैंक रेड्डी के इस निर्देश को मानकर ''आम आदमी`` को बैंक में अपना एक खाता खोलने की इजाजत देंगे?

1 टिप्पणी:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बैंकिंग के साथ-साथ और भी जितने मुद्दों के बारे में आपने चर्चा की, सारे प्रासंगिक हैं.....

देश में आने वाले समय में बैंकिंग के विकास लिए बहुत सारे क्षेत्रों में सुधार के बारे में कुछ लिखिए...रूरल बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण इलाकों में असेट्स की लीगल स्टेटस वगैरह के बारे में सुधार की जरूरतों की चर्चा करें, जिससे रूरल असेट्स को सिक्यूरिटी के तौर पर रखकर बैंकिंग को बढावा दिया जा सके....