शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012

जादू की छड़ी नहीं है डायरेक्ट कैश ट्रांसफर

असली 'गेम चेंजर' योजना खाद्य सुरक्षा कानून को होना था लेकिन वह कहाँ हैं?

भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों से घिरी और आसमान छूती महंगाई को काबू करने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार को आगामी चुनावों का डर सताने लगा है. इसलिए वह भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों को बदलने की हताशापूर्ण कोशिश कर रही है. इसी कोशिश के तहत उसने खूब जोर-शोर से सब्सिडी के नगद हस्तांतरण योजना (कैश ट्रांसफर) की घोषणा की है जो अगले साल जनवरी से देश के ५१ जिलों में लागू की जाएगी.

अगले साल के आखिर तक इसे देश के सभी ६४० जिलों में लागू करने की घोषणा की गई है. इस योजना के तहत शुरुआत में केन्द्र सरकार की २९ विभिन्न योजनाओं के तहत मिलनेवाली पेंशन और स्कालरशिप जैसी राशि सीधे लाभार्थी के बैंक एकाउंट में जाएगी.
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का दावा है कि यह एक ‘खेल बदलनेवाली’ (गेम चेंजर) योजना है. इससे सरकारी सब्सिडी को गरीबों तक पहुंचाने में होनेवाले भ्रष्टाचार, लूट, अनियमितताओं और लालफीताशाही पर रोक लगेगी और लाभार्थियों को सीधा फायदा होगा. यह सुनिश्चित करने के लिए आधार कार्ड की मदद ली जाएगी और जिन लाभार्थियों के पास आधार कार्ड होगा, उन्हें ही कैश ट्रांसफर का फायदा मिलेगा.

यू.पी.ए सरकार को उम्मीद है कि इससे इन योजनाओं में फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी, लालफीताशाही कम होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा, वहीँ दूसरी ओर लाभार्थियों को भी बिना सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाये और सरकारी बाबुओं को घूस खिलाये सीधे पैसा मिलने लगेगा. यह भी कहा जा रहा है कि इस योजना के कारण सभी लाभार्थियों के बैंक खाते खुलेंगे जिससे करोड़ों लोगों को बैंकिंग सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा.

हालाँकि वित्त मंत्री ने इस योजना से अभी पी.डी.एस राशन, खाद और किरोसीन-रसोई गैस सब्सिडी को बाहर रखने की बात कही है लेकिन यह संकेत दिया है कि आगे चलकर इन्हें भी कैश ट्रांसफर के तहत लाने पर विचार किया जाएगा.
साफ़ है कि देर-सवेर सरकार पी.डी.एस राशन, उर्वरक और किरोसीन सब्सिडी को भी कैश ट्रांसफर के दायरे में ले आएगी. असल में, यू.पी.ए सरकार का असली मकसद पी.डी.एस राशन, उर्वरक और किरोसीन सब्सिडी को कैश ट्रांसफर के तहत लाना है और इसके लिए बाकी योजनाओं की आड़ ली जा रही है.

तथ्य यह है कि अभी जिन २९ योजनाओं को कैश ट्रांसफर के तहत लाने की घोषणा की गई है, उनमें नया कुछ भी नहीं है. ये सभी योजनाएं पहले से ही कैश ट्रांसफर यानी लाभार्थी को सीधे नगदी मुहैया कराने की योजनाएं हैं. इसमें लाभार्थियों को पहले से ही कैश उनके बैंक खाते में पहुँचता रहा है.

यही नहीं, इन योजनाओं में भ्रष्टाचार और लूट की उतनी शिकायतें नहीं रही हैं, जितनी पी.डी.एस राशन और किरोसीन में रही हैं. इस मायने में यह किसी भी तरह से ‘गेम चेंजर’ योजना नहीं है. सच पूछिए तो यह अत्यंत विवादास्पद आधार पहचानपत्र योजना को बचाने और नया जीवन देने की योजना है. कैश ट्रांसफर को आधार के साथ जोड़कर उसे प्रासंगिक बनाने की कोशिश की गई है.

असल में, ‘गेम चेंजर’ योजना तो खाद्य सुरक्षा कानून हो सकती थी जिसे यू.पी.ए सरकार ने २००९ के आम चुनावों में वायदे के बावजूद न सिर्फ पिछले साढ़े तीन साल लटका रखा है बल्कि उसे सीमित, हल्का, आधा-अधूरा और कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है.
उल्लेखनीय है कि कुछ महीनों पहले तक सरकारी हलकों में खाद्य सुरक्षा विधेयक को ‘गेम चेंजर’ बताया जा रहा था और दावे किये जा रहे थे कि यह कानून मनरेगा और कर्ज माफ़ी जैसी योजनाओं को भी पीछे छोड़ देगा. लेकिन जिस तरह से कैश ट्रांसफर योजना का शोर मचाया जा रहा है, उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है कि यू.पी.ए सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने के वायदे से पीछे हटने या उसे और टालने का बहाना खोज रही है.
सवाल यह है कि क्या कैश ट्रांसफर योजना सचमुच में, हर मर्ज की दवा यानी ‘गेम चेंजर’ है? असल में, कैश ट्रांसफर योजना कोई ऐसी नई या नायाब योजना नहीं है और न ही देश में पहली बार लागू होने जा रही है. वृद्धावस्था, विधवा पेंशन, आंगनवाडी कर्मियों का मानदेय और छात्रवृत्ति आदि लाभार्थियों को पहले से ही बैंक में नगद या चेक के जरिये मिलती रही हैं.

इन सभी योजनाओं में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से ज्यादा बड़ा और असल मुद्दा यह रहा है कि उनका लाभ अभी भी सीमित लोगों को मिलता है और उसके तहत मिलनेवाली राशि बुनियादी जरूरतों की तुलना में बहुत ही ज्यादा कम है. उदाहरण के लिए, वृद्धावस्था पेंशन के तहत ३०० रूपये प्रति माह और विधवा पेंशन के तहत ३०० रूपये प्रति माह मिलते हैं.

साफ़ है कि कैश ट्रांसफर योजना को ‘गेम चेंजर’ बनाने के लिए यह जरूरी है कि न सिर्फ उसका दायरा बढ़ाया जाए यानी उसे सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों तक सीमित न किया जाए और दूसरे, उसके तहत दी जानेवाली राशि को कम से कम ५००० रूपये प्रति माह किया जाए. लेकिन साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है क्योंकि वह तो सब्सिडी कम करने पर तुली हुई है.
इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि यू.पी.ए सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए हाल में एक रोडमैप जारी किया है जिसमें दावा किया गया है कि राजकोषीय घाटे को चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) में जी.डी.पी के ५.३ फीसदी, अगले वर्ष १३-१४ में जी.डी.पी के ४.८ फीसदी, वर्ष १४-१५ में जी.डी.पी के ४.२ फीसदी, वर्ष १५-१६ में जी.डी.पी के ३.६ फीसदी और वर्ष १६-१७ में जी.डी.पी के ३ फीसदी तक कर दिया जाएगा.
सवाल है कि यह कैसे होगा क्योंकि पिछले वित्तीय वर्ष (११-१२) में राजकोषीय घाटा ५.९ फीसदी रहा था और इस साल इसके जी.डी.पी के ६.१ फीसदी रहने का अनुमान जाहिर किया जा रहा था? इसका उत्तर वित्त मंत्रालय द्वारा गठित केलकर समिति की उस रिपोर्ट में मिलता है जिसे पी. चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय संभालने के तुरंत बाद राजकोषीय घाटे को काबू में करने के लिए सुझाव देने के वास्ते बनाया था.
इस समिति ने सुझाव दिया है कि राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकार को सब्सिडी खासकर पेट्रोलियम, उर्वरक और खाद्य सब्सिडी में कटौती करना अनिवार्य है. समिति ने इसके लिए डीजल, किरोसीन, रसोई गैस, उर्वरकों और राशन से मिलनेवाले गेहूं-चावल आदि की कीमतों में बढ़ोत्तरी की सिफारिश की है और इस तरह इन सब्सिडी को जी.डी.पी के मौजूदा २.२ फीसदी से घटाकर चालू वित्तीय वर्ष १२-१३ में जी.डी.पी का २ फीसदी, १३-१४ में जी.डी.पी का १.७ और १४-१५ में १.५ फीसदी करने को कहा है.

कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार ने इन सिफारिशों को मान लिया है और इसका सबूत यह है कि सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की है. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा विधेयक को किनारे कर दिया है. इसके अलावा खुद वित्त मंत्री ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इन सिफारिशों को स्वीकार करने का एलान किया है.
साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार का असली इरादा सब्सिडी के ‘बोझ’ (वह इसे बोझ ही मानती है) को कम करने का है. कैश ट्रांसफर योजना इसी मकसद के साथ लाई गई है. असल में, इस साल मार्च में बजट से पहले पेश आर्थिक सर्वेक्षण में सब्सिडी के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए कैश ट्रांसफर योजना को आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई थी. यही नहीं, सर्वेक्षण में भी इसे ‘गेम चेंजर’ योजना बताया गया था.
यह भी किसी से छुपा नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकार पिछले कई सालों से सब्सिडी में कटौती के उपाय के बतौर कैश ट्रांसफर योजना की जोरशोर से पैरवी करते रहे हैं. इसकी प्रेरणा उन्हें विश्व बैंक से मिली है जो वर्षों से न सिर्फ राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए भारत पर दबाव डालता रहा है बल्कि इसके लिए विनिवेश से लेकर सब्सिडी के बोझ को न्यूनतम करने पर जोर देता रहा है.

इसके लिए विश्व बैंक की ओर से दिए अनेक सुझावों में एक सुझाव कैश ट्रांसफर का भी रहा है. लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य न तो सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बढ़ाना और उसे प्रतीकात्मक के बजाय वास्तविक बनाना रहा है और न ही सब्सिडी वितरण में भ्रष्टाचार-धांधली खत्म करना और उसे वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचाना है.

इसके उलट इसका असली मकसद सब्सिडी में कटौती है. उदाहरण के लिए कैश ट्रांसफर योजना को ही लीजिए जिसे हर मर्ज की दवा की तरह पेश किया जा रहा है. आखिर इससे क्या बदलनेवाला है? कैश ट्रांसफर के साथ आधार कार्ड को जोड़ देने से क्या बदल जाएगा?
असल में, आधार कार्ड सिर्फ एक पहचानपत्र भर है जो किसी भी व्यक्ति की पहचान बताता है. लेकिन अधिकांश सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के साथ असल समस्या यह है कि वे लक्षित समूहों खासकर गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों तक सीमित हैं. लेकिन असली मुद्दा और विवाद तो इस गरीब रेखा की परिभाषा और गरीबों की पहचान का है. पिछले साल योजना आयोग की ओर से दी गई गरीब और गरीबी की परिभाषा एक त्रासद मजाक से ज्यादा नहीं थी.
मुश्किल यह है कि योजना आयोग की उस गरीबी रेखा के आधार पर ही विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान की जा रही है. साफ़ है कि आधार कार्ड गरीबों की पहचान नहीं करेगा क्योंकि गरीबों की पहचान तो राज्य सरकारें करेंगी और उनके लिए योजना आयोग ने हर राज्य में एक कृत्रिम सीमा बाँध दी है.

इस कारण आधार कार्ड कोई जादू की छड़ी नहीं बनने जा रही है जिससे गरीबों की सही-सही पहचान हो जाए. राज्य सरकार और जिला प्रशासन जिसे गरीब घोषित करेगा, उसे उसकी आधार कार्ड की पहचान के आधार पर इन योजनाओं का सीमित लाभ मिलेगा.

यही नहीं, आगे चलकर सरकार का इरादा राशन और उर्वरक सब्सिडी को भी इसके तहत लाने का है जिसका मतलब होगा कि पी.डी.एस की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करके सरकार अनाज के बजाय सीधे लोगों को उतना पैसा दे देगी जिससे वे खुले बाजार से अपनी पसंद का अनाज खरीद लें. कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा हुआ तो एक ओर सरकार को किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने से मुक्ति मिल जाएगी क्योंकि जब पी.डी.एस राशन नहीं तो अनाज खरीदने की क्या जरूरत है?
दूसरी ओर, गरीबों को खुले बाजार की दया पर छोड़ दिया जाएगा क्योंकि राशन के बदले जितना नगद देगी, उससे खुले बाजार में उन्हें पी.डी.एस से मिलनेवाले अनाज का दस प्रतिशत अनाज भी नहीं मिल पायेगा.
यही स्थिति उर्वरकों के मामले में भी होगी. साफ़ है कि इससे किसानों और गरीबों दोनों को नुकसान होगा. निश्चय ही, इससे अनाज के कारोबार में लगी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, देशी कंपनियों और बड़े व्यापारियों को फायदा होगा. आश्चर्य नहीं कि कैश ट्रांसफर योजना का समर्थन सबसे ज्यादा वे ही कर रही हैं.

('समकालीन जनमत' के दिसंबर अंक के लिए लिखी टिप्पणी)

सोमवार, दिसंबर 24, 2012

नौजवानों के इस आन्दोलन में बहुत संभावनाएं हैं

 लोगों में वर्षों से जमा गुस्सा फूट पड़ा है और यह सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ 'नो कान्फिडेंस' है 

दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भड़के गुस्से और नौजवानों-महिलाओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को समझने में नाकाम रहे सत्ता प्रतिष्ठान ने वही किया जो लोगों का विश्वास और उनसे कनेक्ट खो चुकी सरकारें करती हैं. ‘आम आदमी’ की सरकार का अहंकार उसके सिर चढ़कर बोल रहा है. रविवार की शाम दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शन में शामिल युवा छात्रों, छात्राओं, महिलाओं और आम नागरिकों पर जिस तरह से बर्बरता से लाठीचार्ज किया, आंसूगैस के गोले दागे और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, उसे जनतंत्र में किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है. आखिर इंडिया गेट पर मौजूद उन महिलाओं, छात्राओं और आम नागरिकों का कसूर क्या था? क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन अपराध है?

शर्म की बात यह है कि इस लाठीचार्ज-आंसूगैस को यह कहकर जायज ठहराया जा रहा है कि लोग हिंसक हो गए थे, पत्थर फेंक रहे थे और आगजनी कर रहे थे. लेकिन यह सिर्फ बहाना है. उसने वही किया, जो वह सबसे शर्मनाक और बर्बर तरीके से करती रही है. असल में, पुलिस इस कार्रवाई का पूर्वाभ्यास पहले से कर रही थी. सबसे पहले उसने १९ दिसंबर को मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के घर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे आइसा, आर.वाई.ए और एपवा जैसे वाम छात्र-युवा-महिला संगठनों पर लाठीचार्ज किया, वाटर कैनन का इस्तेमाल किया; फिर २२ दिसंबर को विजय चौक पर युवा छात्र-छात्राओं पर कई बार लाठीचार्ज किया गया और आंसू गैस-वाटर कैनन छोड़ा गया.

रविवार की शाम तो जैसे सबक सिखाने के इरादे से पुलिस और सी.आर.पी.एफ आदि युवा छात्र-छात्राओं पर टूट पड़े. उन्हें बुरी तरह से पीटा गया. न्यूज चैनलों पर पूरे देश ने देखा कि पुलिस की लाठियों से युवा लड़कियां और महिलाएं भी नहीं बच सकीं. पत्रकारों को भी पीटा गया, उनके कैमरे तोड़े गए और उनपर निशाना बनाकर वाटर कैनन चलाया गया. यहाँ तक कि अभिभावकों को भी नहीं छोड़ा गया. अगर प्रदर्शनकारियों में शामिल चुनिन्दा शरारती तत्वों ने गडबडी करने की कोशिश की भी तो पुलिस ने गुस्सा शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों-युवाओं पर निकाला.
ठीक है कि पुलिस जन आन्दोलनों के साथ इससे भी बर्बर बर्ताव करती है. आज ही मणिपुर में बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर फायरिंग में एक पत्रकार की मौत की खबर है. ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिसमें कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व तक और देश के हर राज्य में कभी अपने अधिकारों, कभी मानवाधिकार मुद्दों और कभी शांतिपूर्ण विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग में निर्दोष लोग मारे गए हैं. असल में, उसकी ट्रेनिंग यही है. उसे जनता को दबा कर रखने के लिए आतंक का पर्याय बनाया गया है. उसका यही जनविरोधी चेहरा है जिसके कारण आम लोग खासकर महिलाएं हिंसा की शिकायतें लेकर थानों में जाने से डरती हैं.

सच पूछिए तो देश भर में फूटा नौजवानों यह गुस्सा इस पुलिस के खिलाफ है जो लोगों की रक्षक के बजाय अपराधियों का गिरोह बनती जा रही है. जहाँ किसी आम नागरिक की सुनवाई नहीं होती, जहाँ अपराधियों, दलालों, पैसे और सत्ता के रसूख की चलती है, जो हर तरह के अवैध और गैर-कानूनी कामों का मुख्य केन्द्र बन गया है. यह गुस्सा उस नागरिक प्रशासन के खिलाफ भी है जो निहायत असंवेदनशील और भ्रष्ट है जो लोगों के नौकर के बजाय उनका मालिक बन बैठा है, जिस तक आम लोगों का पहुंचना संभव नहीं है और जो पुलिस की तरह अंदर से सड़ चुका है.

लेकिन यह गुस्सा सबसे अधिक उस राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ है जिसकी साख पाताल छू रही है, जिसका आम आदमी की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है और जिसके आश्वासनों पर भरोसा खत्म हो गया है. नतीजा, लोगों के सब्र का बाँध टूट रहा है. दिल्ली गैंग रेप के साथ लोगों खासकर युवाओं को लग रहा है कि अब बस, बहुत हो चुका. लेकिन भ्रम में मत रहिये, यह सिर्फ दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भडका गुस्सा नहीं है बल्कि इसके पीछे वर्षों से जमा होती लाचारी, अपमान, पीड़ा, क्षोभ और चिढ़ है.
इस गुस्से में गूंजती इन्साफ की मांग में एक साथ कई आवाजें हैं: न जाने कब से हर दिन, सुबह-शाम कभी घर में, कभी सड़क पर, कभी मुहल्ले में, कभी बस-ट्रेन में, कभी बाजार में अपमानित होती स्त्री की पीड़ा है. इसमें खाप पंचायतों के हत्यारों के खिलाफ गुस्सा है. इसमें वैलेंटाइन डे और पब में जाने पर लड़कियों के कपड़े फाड़ने और उनके साथ मारपीट करनेवाले श्रीराम सेनाओं और बजरंगियों को चुनौती है. इसमें स्त्रियों के “चाल-चलन” को नियंत्रित करने के लिए बर्बरता की हद तक पहुँच जानेवाले धार्मिक ठेकेदारों और ‘संस्कृति पुलिस’ के खिलाफ खुला विद्रोह है.

इसमें कभी दहेज, कभी लड़की पैदा करने, कभी छेड़खानी का विरोध करने और कभी जाति बाहर विवाह करने की जुर्रत करनेवाली स्त्रियों को जिन्दा जलाने, हत्या करने, उनपर तेज़ाब फेंकने और बलात्कार से उनका मनोबल तोड़ने की अंतहीन और बर्बर कोशिशों के खिलाफ खुला प्रतिकार है.

इस गुस्से और इन्साफ की मांग के साथ खड़े और लड़ते नौजवान ही उस पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था और उसके दमनात्मक औजारों जैसे पुलिस को बदल सकते हैं. इससे ही संसद बदलेगी, कानून बदलेंगे, पुलिस-कोर्ट बदलेंगे और सबसे बढ़कर यह पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था बदलेगी जिसने स्त्रियों को अब तक गुलाम और उपभोग की एक वस्तु भर बना रखा है.

यही कारण है कि इस आंदोलन में बहुत संभावनाएं हैं. इससे क्रांति नहीं होने जा रही है. यह क्रांति के लिए नहीं बल्कि इस सड़ती व्यवस्था के खिलाफ भडका गुस्सा और उसमें सुधार का आंदोलन है. याद रखिये, चुनावों में सरकारें बदलती हैं लेकिन इसके उलट आन्दोलनों में समाज बदलता और बनता है. सिर्फ चुनावों से सरकारें बदलनेवाले लोकतंत्र धीरे-धीरे प्राणहीन और लोगों से कटते जाते हैं. विरोध और आंदोलन इसीलिए लोकतंत्र की प्राणशक्ति हैं क्योंकि वे यथास्थिति को चुनौती देते हैं, लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में लोगों को भागीदार बनाते हैं, लोगों का राजनीतिक प्रशिक्षण करते हैं, उनकी चेतना के स्तर को उन्नत करते हैं और उन्हें अपने हकों के लिए लड़ना सिखाते हैं.   
सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता और बहुतेरे संपादक-पत्रकार जो यह सवाल कर रहे हैं कि आंदोलनकारियों की सभी मांगे मान ली गई हैं, फिर भी वे आंदोलन क्यों कर रहे हैं, वे असल में, युवाओं के गुस्से को समझ नहीं पा रहे हैं. यह सिर्फ दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भडका गुस्सा नहीं है. यह गुस्सा बहुत गहरा है और राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बढ़ते अविश्वास से निकला है. आश्चर्य नहीं कि इस गुस्से की लपटें पूरे देश में दिखाई दे रही हैं. इसे आश्वासनों से टाला नहीं जा सकता है और न ही इसे लाठीचार्ज और दमन से दबाया या भटकाया जा सकता है.                       

शनिवार, दिसंबर 22, 2012

इस गुस्से में है कई आवाजें

खाप पंचायतों से लेकर राष्ट्रवादी संस्कृति पुलिस तक के खिलाफ भी है यह गुस्सा

गैंग-रेप के खिलाफ दिल्ली के राजपथ से लेकर पूरे देश भर में उमड़े गुस्से को आंसूगैस, लाठी और गोली से नहीं दबाया जा सकता है और न दबाने दिया जाना चाहिए. यह गुस्सा और विरोध ही भारतीय लोकतंत्र की जान है. इससे ही इन्साफ मिलेगा. इससे ही समाज-देश बदलेगा और बेहतर राजनीति निकलेगी.  

क्योंकि इस गुस्से में गूंजती इन्साफ की मांग में एक साथ कई आवाजें हैं: न जाने कब से हर दिन, सुबह-शाम कभी घर में, कभी सड़क पर, कभी मुहल्ले में, कभी बस-ट्रेन में, कभी बाजार में अपमानित होती स्त्री की पीड़ा है. इसमें खाप पंचायतों के हत्यारों के खिलाफ गुस्सा है. इसमें वैलेंटाइन डे और पब में जाने पर लड़कियों के कपड़े फाड़ने और उनके साथ मारपीट करनेवाले श्रीराम सेनाओं और बजरंगियों को चुनौती है. इसमें स्त्रियों के “चाल-चलन” को नियंत्रित करने के लिए बर्बरता की हद तक पहुँच जानेवाले धार्मिक ठेकेदारों और ‘संस्कृति पुलिस’ के खिलाफ खुला विद्रोह है.

इसमें कभी दहेज, कभी लड़की पैदा करने, कभी छेड़खानी का विरोध करने और कभी जाति बाहर विवाह करने की जुर्रत करनेवाली स्त्रियों को जिन्दा जलाने, हत्या करने, उनपर तेज़ाब फेंकने और बलात्कार से उनका मनोबल तोड़ने की अंतहीन और बर्बर कोशिशों के खिलाफ खुला प्रतिकार है.
इस गुस्से और इन्साफ की मांग के साथ खड़े और लड़ते नौजवान ही उस पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था और उसके दमनात्मक औजारों जैसे पुलिस को बदल सकते हैं. इससे ही संसद बदलेगी, कानून बदलेंगे, पुलिस-कोर्ट बदलेंगे और सबसे बढ़कर यह पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था बदलेगी जिसने स्त्रियों को अब तक गुलाम बना रखा है. आइये, इस आवाज़ में आवाज़ मिलाकर इन्साफ की मांग और उसकी गूंज को और तेज करें.

क्योंकि चुप रहने का विकल्प नहीं है...         

गुरुवार, दिसंबर 06, 2012

कसाब की फांसी का 'जश्न'

अखबारों/चैनलों का वश चलता तो वे सार्वजनिक तौर पर किसी चौराहे पर कसाब को फांसी पर लटका देते

मुंबई पर २६/११ के आतंकवादी हमले के दोषी अजमल कसाब को आखिरकार फांसी पर चढ़ा दिया गया. निश्चय ही, यह एक बड़ी खबर थी और उसकी विस्तृत कवरेज की उम्मीद थी. लेकिन न्यूज चैनलों और अखबारों ने उसे सिर्फ खबर भर नहीं रहने दिया और न ही उसे एक बड़ी खबर की तरह तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और संतुलित तरीके से कवर किया.
इसके उलट कसाब को फांसी की जैसी अतिरेकपूर्ण और भावनात्मक विस्फोट से भरी कवरेज की गई, उससे ऐसा लगा कि जैसे देश ने कोई युद्ध जीत लिया हो. कसाब को फांसी चैनलों/अखबारों पर राष्ट्रीय जश्न और देशभक्ति के खुले इजहार के मौके में बदल गया.
लेकिन कसाब की फांसी के कवरेज में भावनाओं के उद्वेग और उन्माद में तथ्य और तर्क के साथ-साथ संतुलन और अनुपात बोध भी किनारे कर दिए गए. यू.पी.ए सरकार के फैसले पर कई जरूरी सवाल नहीं पूछे गए, कई तथ्यों को अनदेखा कर दिया गया और उसकी जगह उन्मादपूर्ण जश्न ने ले ली.

हालाँकि न्यूज चैनल तो ऐसे भावुक और अतार्किक कवरेज के लिए पहले से बदनाम रहे हैं लेकिन इसबार अखबार भी देशभक्ति के प्रदर्शन में होड़ करते नजर आए. किसी फांसी पर समाचार माध्यमों में ऐसा सार्वजनिक जश्न हैरान करनेवाला था.

देश के सबसे बड़े समाचार समूह के संपादक पर देशभक्ति का ऐसा दौरा पड़ा कि उन्होंने पहले पृष्ठ पर ‘२१/११ वंदे मातरम’ शीर्षक से जोशीला, शौर्यपूर्ण और लगभग युद्धगान करता संपादकीय लिख डाला.

ऐसा लगा जैसे अखबारों/चैनलों का वश चलता तो वे सार्वजनिक तौर पर किसी चौराहे पर कसाब को फांसी पर लटका देते. उन्हें फांसी की लाइव कवरेज न दिखा पाना जरूर खल रहा होगा. यही नहीं, अगर मौका मिलता तो कुछ देशभक्त संपादक/रिपोर्टर कसाब के फांसी के फंदे को खींचने के लिए भी तैयार हो जाते.
असल में, अखबारों/चैनलों के इस अतिरेक और उन्मादपूर्ण कवरेज की पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार थी. यह किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कई सालों से कसाब और संसद पर हमले में दोषी करार दिए गए अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने की सार्वजनिक मुहिम चल रही थी.
खासकर हिन्दुत्ववादी संगठनों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ था. अखबारों और चैनलों में उनकी हाँ में हाँ मिलाती हुई ऐसी सुर्खियाँ अक्सर दिख जाती थीं जिनमें कसाब पर हो रहे करोड़ों रूपये के खर्च और उसे बिरयानी खिलाने की ‘खबरें’ होती थीं और जिनमें उसे जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाने की व्यग्रता और न्याय प्रक्रिया की लेट-लतीफी पर तंज साफ़ दिखाई देता था.

हैरानी की बात नहीं है कि अखबारों/चैनलों पर कसाब की फांसी के बाद अब संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को जल्दी से जल्दी फांसी पर चढ़ाने की मुहिम शुरू हो गई है. लेकिन इस मुहिम में छिपे बारीक सांप्रदायिक हिन्दुत्ववादी रुझान को देखना मुश्किल नहीं है.   

आखिर अखबार/चैनल खून के इतने प्यासे क्यों हो रहे हैं? लेखक सैमुएल जानसन ने बहुत पहले लिखा था कि देशभक्ति लफंगों (और भ्रष्टों) की आखिरी शरणस्थली होती है. क्या अखबारों/चैनलों की इस अंध-देशभक्ति और उन्माद के पीछे भी एक कारण यह है कि उनके भ्रष्ट और आपराधिक अंडरवर्ल्ड का पर्दाफाश होना शुरू हो गया है?
कहीं देशभक्ति के झंडे से वे अपने धतकरमों पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि यह देशभक्ति कहीं हिंदी अखबारों के डी.एन.ए में पहले से मौजूद सांप्रदायिक हिन्दुत्ववादी रुझान से तो नहीं उमड़ रही है?
आखिर हालिया इतिहास इस बात का गवाह है कि रामजन्मभूमि और आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सारे हिंदी अखबार सवर्ण-हिंदू अखबार हो गए थे और कुछ उसके मुखपत्र तक बन गए थे.

उसने भारतीय समाज और राजनीति को जितना गहरा नुकसान पहुँचाया, लगता है अखबारों/चैनलों ने उससे कुछ नहीं सीखा है.


('तहलका' के 15 दिसंबर के अंक में प्रकाशित 'तमाशा मेरे आगे' स्तम्भ: http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/1517.html)  

बुधवार, दिसंबर 05, 2012

अर्थव्यवस्था का लंबा खींचता संकट

अर्थव्यवस्था की बीमारी का इलाज उस दवा से नहीं होगा जो इस बीमारी की जड़  है   

भारतीय अर्थव्यवस्था से बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है. ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, चालू वित्तीय वर्ष १२-१३ की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितम्बर) में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी) की वृद्धि दर पिछले साल के ६.७ प्रतिशत की तुलना में गिरकर मात्र ५.३ प्रतिशत रह गई.
यह पिछले दस साल में अर्थव्यवस्था का सबसे बदतर प्रदर्शन है. यह इस साल की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की वृद्धि दर ५.५ फीसदी की तुलना में भी कम है. इस तरह चालू वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मात्र ५.४ फीसदी रही जोकि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में ७.४ फीसदी थी.
साफ़ है कि अर्थव्यवस्था की फिसलन जारी है. इस कारण चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी की वृद्धि दर के बारे में सरकार के सभी अनुमान गड़बड़ाते दिखाई दे रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इस साल के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जी.डी.पी की वृद्धि दर ७.६ फीसदी रहने का अनुमान लगाया था जिसे बाद में रिजर्व बैंक ने घटाकर ५.८ फीसदी कर दिया था.

यही नहीं, अर्थव्यवस्था के लगातार खराब प्रदर्शन के बाद नए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने इसे और घटाकर ५.५ फीसदी से ६ फीसदी रहने की उम्मीद जाहिर की थी लेकिन पहली छमाही के नतीजों को देखते हुए इस साल जी.डी.पी की ५.५ फीसदी की वृद्धि दर हासिल करना भी आसान नहीं दिख रहा है, ५.८ से लेकर ६ फीसदी की वृद्धि दर की तो बात ही दूर है.

इस साल आर्थिक वृद्धि दर को ५.५ फीसदी से नीचे न आने देने के लिए अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था को कम से कम ५.६ फीसदी की रफ़्तार से बढ़ना होगा जबकि ५.८ फीसदी या ६ फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने के लिए अर्थव्यवस्था को कम से कम ६.२ फीसदी या फिर ६.६ फीसदी की अपेक्षाकृत तेज रफ़्तार पकड़नी होगी.
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों खासकर औद्योगिक क्षेत्र की मौजूदा गिरावट को देखते हुए यह उम्मीद खुशफहमी ही दिखती है. उल्लेखनीय है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर इस साल दूसरी तिमाही में मात्र ०.८ प्रतिशत और पहली छमाही में एक फीसदी से कम रही है जिससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्था का संकट किस हद तक गहराता जा रहा है.
चिंता की बात यह भी है कि एक ओर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर लगातार गिर रही है, मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर गिरकर नगण्य हो गई है, गिरते निर्यात के साथ व्यापार और चालू खाते का घाटा बढ़ता जा रहा है लेकिन दूसरी ओर, मुद्रास्फीति की दर बेकाबू बनी हुई है.

अक्टूबर में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर ७.४५ फीसदी की ऊँचाई पर बनी हुई थी जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई की दर तो ९.७५ फीसदी के साथ आसमान छू रही थी.

खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव मानते हैं कि मुद्रास्फीति की दर अभी भी काफी ऊँचाई पर बनी हुई है. यही कारण है कि उन्होंने वित्त मंत्री से लेकर उद्योग जगत के दबाव के बावजूद ब्याज दर में कटौती करने से इनकार कर दिया.

कहने की जरूरत नहीं है कि अर्थव्यवस्था के इस संकट का सीधा असर आम आदमी पर पड़ने लगा है. पिछले तीन साल से आसमान छूती महंगाई की मार झेल रहे लोगों को अब अर्थव्यवस्था के संकट की मार भी झेलनी पड़ रही है.
यह कई रूपों में सामने आ रही है. अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ़्तार के कारण न सिर्फ नई नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं बल्कि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में छंटनी-ले आफ, तालाबंदी से लेकर वेतनवृद्धि पर रोक और कटौती की खबरें भी आ रही हैं.
दूसरी ओर, यू.पी.ए सरकार संकट में फंसी अर्थव्यवस्था को उससे बाहर निकालने के नामपर आमलोगों पर नए-नए बोझ डालती जा रही है. इससे लोगों में बेचैनी बढ़ रही है.    
लेकिन सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि अँधेरी सुरंग में फंसती जा रही अर्थव्यवस्था के लिए न तो सुरंग का आखिरी मुहाना दिख रहा है और न ही उम्मीद की कोई साफ़ किरण नजर आ रही है.

हालाँकि यू.पी.ए सरकार के प्रमुख आर्थिक मैनेजरों में से एक और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब इससे नीचे नहीं गिरेगी और यह उसकी गिरावट का चरम था क्योंकि वह गड्ढे के तल तक पहुँच चुकी है, जहाँ से आगे उसमें सुधार ही होना है. ऐसा माननेवाले अहलुवालिया अकेले नहीं हैं. सरकार के अधिकांश आर्थिक मैनेजरों से लेकर निजी क्षेत्र के विश्लेषक भी ऐसी ही उम्मीद जता रहे हैं.

इसके लिए वे इन्फ्रास्ट्रक्चर के आठ बुनियादी क्षेत्रों में अक्टूबर महीने में ६.५ फीसदी की वृद्धि दर और शेयर बाजार के १९ हजार अंकों से ऊपर चढ़ जाने को शुरूआती संकेत की तरह पेश कर रहे हैं. लेकिन यह खुशफहमी से अधिक कुछ भी नहीं है.
सच यह है कि आठ बुनियादी क्षेत्रों के किसी एक माह के आंकड़ों के आधार पर औद्योगिक विकास में सुधार की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी. दूसरे, शेयर बाजार में मौजूदा उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) की सट्टेबाजी है. एफ.आई.आई ने इस साल शेयर बाजार में अब तक १९.०८ अरब डालर (लगभग एक लाख करोड़ रूपये) का निवेश किया है जोकि उनके द्वारा किसी भी एक वर्ष में किये गए निवेश का रिकार्ड है.
लेकिन इसका कोई ठिकाना नहीं है. यह आवारा पूंजी है और इसके भरोसे अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीद पालना सबसे बड़ी बेवकूफी होगी.
यह ठीक है कि यू.पी.ए सरकार ने पिछले कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था की गिरावट को रोकने के लिए खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) की इजाजत देने से लेकर पेंशन और बीमा में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने जैसे नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले कई बड़े नीतिगत और प्रशासनिक फैसले किये हैं.
मनमोहन सिंह सरकार की रणनीति यह है कि निजी पूंजी और बाजार की ‘पशु प्रवृत्ति’ (एनिमल इंस्टिंक्ट) को प्रोत्साहित करके अर्थव्यवस्था में निवेश को प्रोत्साहित किया जाए. इसके लिए राजनीतिक विरोधों की परवाह किये बिना वह बाजार और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए हर कदम उठा रही है.

यहाँ तक कि विदेशी पूंजी का विश्वास जीतने के लिए वह अलोकप्रियता का खतरा उठाकर भी पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी कम करने जैसे फैसले करने में संकोच नहीं कर रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जायेगी?
इसके आसार अभी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं. उल्टे अर्थव्यवस्था की मौजूदा कमजोरी के लंबा खींचने की आशंका बढ़ती जा रही है. इस आशंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था आनेवाले महीनों में न सिर्फ और नीचे गिर सकती है बल्कि उसके मुद्रास्फीति-जनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) में भी फंसने का खतरा है.
यही नहीं, बाजार और निजी पूंजी को खुश करने के उपायों से अर्थव्यवस्था में थोड़ी हलचल हुई और उछाल आया भी तो उसके स्थाई होने को लेकर कई सवाल हैं. इसकी वजह यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था जिन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के कारण संकट में फंसी है, उन्हीं में उसका समाधान खोजने की कोशिश की जा रही है.

इससे अर्थव्यवस्था में तात्कालिक तौर पर एक कृत्रिम उछाल आ भी जाए तो उसके टिके रहने की उम्मीद बहुत कम है. यही नहीं, वैश्विक आर्थिक संकट खासकर यूरोपीय आर्थिक संकट को हल करने में इन नीतियों की नाकामी सामने आ चुकी है. इसके बावजूद यू.पी.ए सरकार कोई सबक लेने को तैयार नहीं है.

आश्चर्य नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट न सिर्फ गहराता जा रहा है बल्कि उसमें सुधार की उम्मीदें भी कमजोर पड़ती जा रही हैं. ऐसे में, इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट न सिर्फ लंबा खींच जाए बल्कि और पीड़ादायक होता जाए.

उस स्थिति में अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया तीव्र (वी आकार) तो छोडिये, धीमी (यू आकार) होने के बजाय धीमी-लंबी और सपाट (एल आकार) राह पकडती दिख रही है. अर्थव्यवस्था के लिए यह सबसे बड़ा और वास्तविक खतरा है.

('राष्ट्रीय सहारा' के सम्पादकीय पृष्ठ पर 4 दिसंबर को प्रकाशित टिप्पणी) 

रविवार, दिसंबर 02, 2012

गौरी भोंसले नहीं, संपादक जी कहाँ हैं?

ऐसे ही चलता रहा तो ब्रेकिंग न्यूज, ब्रोकरिंग न्यूज बन जायेगी    


ए.बी.पी न्यूज इन दिनों लन्दन की एन.आर.आई लड़की गौरी भोंसले को खोजने में जुटा हुआ है. चैनल के मुताबिक, लन्दन से भारत के कोल्हापुर के लिए निकली गौरी भोंसले बीच में कहीं गुम हो गई.
चैनल पर गौरी की गुमशुदगी के बारे में लगातार ‘ब्रेकिंग न्यूज’ और स्क्रोल भी चल रहा है जिसमें लन्दन पुलिस के एक अफसर के बयान से लेकर उसके बारे में कुछ जानकारियां भी शामिल हैं. दर्शकों से अपील की जा रही है कि अगर गौरी भोंसले दिखाई दे तो एक खास नंबर पर फोन करें.
ए.बी.पी न्यूज पर कई दिनों से चल रही इस सनसनीखेज ‘खबर’ के बीच ही अंग्रेजी के तीन बड़े अखबारों में यह ‘खबर’ छपी कि लन्दन से गुम हुई गौरी भोंसले को सहारनपुर पुलिस ने देवबंद के पास एक गांव से बरामद कर लिया है.

लेकिन इसके पहले कि यह ‘एक्सक्लूसिव खबर’ सभी चैनलों और अखबारों की सुर्ख़ियों में छा जाती, यह पता चला कि देवबंद से बरामद लड़की न तो एन.आर.आई है और न ही गौरी भोंसले. वह गौरी भोंसले हो भी नहीं सकती थी क्योंकि सच यह है कि गौरी भोंसले नाम की कोई एन.आर.आई लड़की गुम नहीं हुई है.
दरअसल, गौरी भोंसले एक काल्पनिक चरित्र है जो मनोरंजन चैनल ‘स्टार प्लस’ पर १२ नवम्बर से शुरू होनेवाले धारावाहिक की मुख्य नायिका है. ‘स्टार प्लस’ का दावा है कि उसने इस धारावाहिक के प्रचार के लिए ए.बी.पी न्यूज और बाद में कई और चैनलों पर चलनेवाले उस खबरनुमा विज्ञापन अभियान का सहारा लिया और दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश की.
यह और बात है कि इस विज्ञापन अभियान से जिससे बहुतेरे दर्शक और यहाँ तक कि अखबार भी धोखा खा बैठे और गौरी भोंसले की गुमशुदगी की कहानी को सच्ची मान बैठे, वह कभी विज्ञापन की तरह नहीं दिखा.
तथ्य यह है कि ए.बी.पी न्यूज पर उसे खबर की तरह गढा, पढ़ा और पेश किया गया. चैनल के एंकर ने उसे उसी शैली में पढ़ा और पेश किया जिस शैली में बाकी ब्रेकिंग न्यूज पेश की जाती है.

साफ़ तौर पर यह विज्ञापन नहीं बल्कि पेड न्यूज था और चैनल ने विज्ञापन को ‘खबर’ की तरह दिखाकर अपने दर्शकों के साथ धोखा किया है. उनके विश्वास को तोडा है. उन्हें बेवकूफ बनाया है. कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे प्रकरणों से दर्शकों का चैनलों और उनकी ब्रेकिंग न्यूज में भरोसा कम होगा. ऐसे ही चला तो ब्रेकिंग न्यूज जल्दी ही ‘ब्रोकरिंग न्यूज’ (खबर दलाली) बन जाएगी.

सच पूछिए तो इस प्रकरण ने गौरी भोंसले से ज्यादा चैनलों में संपादक की गुमशुदगी और मार्केटिंग/सेल्स मैनेजरों के बढ़ते दबदबे को उजागर किया है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि खबर में विज्ञापन की सीधी घुसपैठ ने संपादक नाम की संस्था को बेमानी बना दिया है.
इससे यह भी पता चलता है कि खबर और विज्ञापन के बीच राज्य और चर्च की तरह की स्पष्ट और मजबूत विभाजक दीवार मुनाफे के दबाव में ढह चुकी है और इस प्रक्रिया में संपादकों को न सिर्फ मूकदर्शक बल्कि भागीदार भी बना दिया गया है. आखिर गौरी भोंसले की गुमशुदगी का ‘पेड न्यूज’ चैनल के एंकर ही पढ़ते नजर आते हैं.
यह इस मायने में खतरनाक संकेत है कि पेड न्यूज के कारोबारियों ने न्यूज चैनल के साथ-साथ उनके संपादकों की बची-खुची साख और विश्वसनीयता को भी दांव पर लगाना शुरू कर दिया है. अगर संपादक अब भी न चेते तो गौरी भोंसले के उलट सचमुच में गुम हो जाएंगे.

('तहलका' वेबसाईट पर 'तमाशा मेरे आगे' स्तम्भ के तहत प्रकाशित टिप्पणी: http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/1514.html )   

शनिवार, नवंबर 24, 2012

शोकाकुल चैनलों पर बाल ठाकरे का महिमामंडन

यह शिव सैनिकों का डर था या टी आर पी का लालच लेकिन चैनलों ने संतुलन और अनुपात बोध को ताखे पर रख दिया

पहली क़िस्त

न्यूज चैनलों खासकर हिंदी न्यूज चैनलों में बहुत शुरू से संतुलन और उससे ज्यादा अनुपात बोध का अभाव रहा है. अक्सर उनकी कवरेज को देखकर यह आशंका होती रही है कि जैसे चैनलों ने ये शब्द कभी सुने नहीं हैं या कहें कि उनके सम्पादकीय शब्दकोष से संतुलन और अनुपात बोध जैसे दो महत्वपूर्ण संपादकीय मूल्यों और विचारों को पूरी तरह से विदाई दे दी गई है.
इसकी जगह न्यूज चैनलों में अतार्किकता, भावुकता और अतिरेक का बोलबाला रहा है. उस समय चैनलों के संपादकों का दावा हुआ करता था कि चैनल अभी अपने बाल्य-काल में हैं और जैसे-जैसे समय गुजरेगा, वे परिपक्व होंगे और उनमें एक स्थिरता, संतुलन और अनुपात बोध भी बढ़ेगा.
लेकिन लगता है कि चैनलों की उम्र बढ़ने के साथ उनका संतुलन और अनुपात बोध और बिगड़ता जा रहा है. इसका सबसे ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में शिव सेना नेता बाल ठाकरे की बीमारी और मौत के समय दिखा, जब सभी चैनल भावुकता की बाढ़ में ऐसे डूबने-उतराने लगे कि संतुलन और अनुपात बोध के साथ-साथ तथ्य और तर्क भी उसमें डूब गए.  

बाल ठाकरे की मौत से शोकाकुल चैनलों का संतुलन इस कदर बिगड़ा कि उन्हें ठाकरे में ऐसे-ऐसे गुण नजर आने लगे, जिसके बारे में शायद ही पहले किसी ने सुना हो. विचित्र स्थिति यह हो गई कि जिन कारणों से ठाकरे की जीवन भर आलोचना हुई, वे सभी उनके ‘गुण’ बन गए और चैनलों में उनके यशगान की होड़ सी चलती रही.

यह सचमुच हैरान करनेवाला दृश्य था जब न्यूज चैनल एक साथ सामूहिक स्मृति भ्रंश के शिकार नजर आए. वे भूल गए कि ये वही बाल ठाकरे थे जिन्होंने जीवन भर क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, भाषाई और जातीय आधारों पर घृणा, विभाजन, गुंडागर्दी और आतंक की संकीर्ण और जहरीली राजनीति की, मराठी मानुष के नामपर देश के विभिन्न हिस्सों से मुंबई आए आप्रवासी मजदूरों से लेकर धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया और लोकतंत्र को गाली देने से लेकर हिटलर की खुलेआम प्रशंसा करने में कोई शर्म महसूस नहीं की.
यही नहीं, चैनल यह भी भूल गए कि ये वही बाल ठाकरे थे और उनकी शिव सेना थी जिसने अनेकों बार अखबारों/चैनलों के दफ्तरों पर हमला किया, तोड़फोड़ और पत्रकारों के साथ मारपीट की.
लेकिन मजा देखिये कि न्यूज चैनल इन्हीं कारणों से ठाकरे की प्रशंसा करने में जुटे रहे कि वे बहुत ‘साहसी, बेलाग, खरी-खरी बात करनेवाले और अपनी बातों पर डटे रहनेवाले नेता’ थे. लेकिन यह कहते हुए बहुत कम चैनलों ने बताया कि ठाकरे के कथित साहसिक बयान क्या थे और उनके मायने क्या थे? उल्टे ठाकरे को ‘एक था टाइगर’ जैसी उपमाओं से याद किया जाता रहा.

ठाकरे की शवयात्रा और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ ने तो चैनलों को ऐसा विह्वल कर दिया कि वे सभी ठाकरे के ‘करिश्मे’ से ‘शॉक एंड आव्’ की स्थिति में पहुँच गए और शवयात्रा के साथ चैनलों पर कमेंट्री कर रहे एंकर-रिपोर्टर पत्रकार कम और कथाकार ज्यादा लग रहे थे. वस्तुनिष्ठता, तथ्यात्मकता और संतुलन को ताखे पर रख दिया गया था.   

नतीजा, बाल ठाकरे की बीमारी और खासकर मृत्यु और शवयात्रा को चैनलों ने जिस तरह से 24x7 कवरेज दिया, उसने ठाकरे को रातों-रात ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और क्षेत्रीय (खासकर मुंबई-ठाणे) नेता से राष्ट्रीय नेता बना दिया. चैनलों के बीच बाल ठाकरे को वीरोचित विशेषणों से नवाजने की होड़ लगी हुई थी और साथ में आदरपूर्ण शोकधुन भी बज रही थी.
यही नहीं, चैनल और उनके एंकरों-रिपोर्टरों के साथ-साथ बाल ठाकरे की परिघटना को समझाने के लिए स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ भी भावनाओं में बहे जा रहे थे. कई मौकों पर कुछ एंकरों-रिपोर्टरों के अंदर बैठा शिव सैनिक बाहर निकल आया और कई बार उनकी आवाज़ भी रूंधने लगती थी.
कहना मुश्किल है कि चैनल और उनके एंकर-रिपोर्टर और विशेषज्ञ बाल ठाकरे के प्रति किसी वास्तविक श्रद्धा, आदर और आस्था के कारण भावनाओं में बहे जा रहे थे या बाल ठाकरे के शिव सैनिकों का ज्ञात-अज्ञात डर था जिसके कारण मुंबई के फिल्म सितारों-उद्योगपतियों-नेताओं-खिलाडियों की भीड़ ठाकरे के बंगले मातोश्री पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने में होड़ कर रही थी?

इन दो के अलावा चैनलों के कवरेज की कोई और व्याख्या नहीं हो सकती है क्योंकि यह सिर्फ सामान्य लोकाचार का मामला नहीं था जिसके कारण किसी मृत व्यक्ति की आलोचना नहीं की जाती है. सच पूछिए तो यह तो सिर्फ बहाना था क्योंकि अगर यह सिर्फ सामान्य लोकाचार होता तो चैनलों के कवरेज में संतुलन और अनुपात बोध दिखता जोकि सिरे से गायब था.

यहाँ तक कि ठाकरे की राजनीति और विचारों के आलोचक संपादकों/पत्रकारों की भाषा भी बदली-बदली सी थी और वे जिस सावधानी से शब्द चुन रहे थे, उनकी भाषा और लहजे में जिस तरह का असमंजस दिख रहा था, उसमें इस अज्ञात डर को महसूस किया जा सकता था.
ऐसे में, वे असुविधाजनक सवाल पूछने की न तो गुंजाइश थी और न ही ऐसा करने का जोखिम उठाने का साहस अधिकांश चैनलों में दिखाई पड़ा. यह जरूर है कि कई चैनलों पर कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों ने धारा के विपरीत तैरने और तथ्यों को रखने की कोशिश की लेकिन उनकी तार्किक बातें भी चैनलों पर ठाकरे के लिए उमड़ रही भावुकता के कोलाहल और शोकधुन में गुम हो गईं.
सवाल यह है कि चैनलों की इस कवरेज की व्याख्या कैसे की जाए? पहली बात तो यह है कि इस भावुकता भरे कवरेज में लोकाचार से अधिक एक बिजनेस सेन्स था.

असल में, मुंबई न सिर्फ देश की आर्थिक और वित्तीय राजधानी है बल्कि वह चैनलों के कारोबार के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है. मुंबई और महाराष्ट्र में न सिर्फ सर्वाधिक टी.आर.पी मीटर लगे हुए हैं बल्कि देश के सबसे समृद्ध राज्य और शहर होने के नाते विज्ञापनदाताओं की स्वाभाविक तौर पर उनमें सबसे अधिक दिलचस्पी भी होती है.
इसके कारण चैनलों में मुंबई और महाराष्ट्र के प्रति एक अतिरिक्त झुकाव दिखता रहा है. मुंबई के खाते-पीते मध्यवर्गीय दर्शकों का ध्यान खींचने की अंग्रेजी और हिंदी चैनलों में हमेशा होड़ रहती है.

कहते हैं कि चैनलों की दुनिया मुंबई से दिल्ली तक और कुछ हद तक पश्चिमी भारत तक सीमित है. यही कारण है कि मुंबई की अपेक्षाकृत सामान्य खबरें भी चैनलों पर तुरंत छा जाती हैं जबकि देश के अन्य हिस्से खासकर पूर्वी भारत और उनकी बड़ी घटनाएं, समस्याएं और मुद्दे अनदेखे चले जाते हैं. ठाकरे की बीमारी और मृत्यु/अंतिम संस्कार भी इसके अपवाद नहीं थे.
सच यह है कि अगर ठाकरे मुंबई में न हुए होते तो उनकी बीमारी और मृत्यु की खबर चैनलों पर इतने विस्तार से नहीं चलती. बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है, पिछले साल नवंबर में असम के मशहूर गायक/कलाकार भूपेन हजारिका की मौत हुई थी और उनकी शवयात्रा और अंतिम संस्कार में गुवाहाटी जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहर में ५ लाख से ज्यादा लोग जुटे थे लेकिन कितने चैनलों पर भूपेन हजारिका को ठाकरे की तरह कवरेज मिली.
साफ़ है कि ठाकरे को इतनी अधिक और महिमापूर्ण कवरेज मिलने की एक बड़ी वजह उनका टी.आर.पी राजधानी मुंबई से होना था. चैनलों की टी.आर.पी आधारित ‘न्यूज वैल्यू’ पर स्वाभाविक तौर पर यह ‘बड़ी खबर’ थी. यहाँ तक भी गनीमत थी लेकिन मुंबई के ठाकरे भक्त ‘मराठी मानुष’ दर्शकों का दिल जीतने की चैनलों में ऐसी होड़ मची कि उन्हें ठाकरेमय होने में देर नहीं लगी.

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हालाँकि यह भी चैनलों की कोई नई बीमारी नहीं है. वे हमेशा से ‘पापुलर मूड’ के  साथ तैरने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं है कि वे ‘पापुलर मूड’ के साथ बहने के खतरे नहीं जानते हैं लेकिन इसके बावजूद वे इसलिए भी करते हैं क्योंकि इससे उनके कारोबारी के साथ-साथ वैचारिक हित भी जुड़े हुए हैं.

आश्चर्य नहीं कि वे ऐसे मौकों पर ‘पापुलर मूड’ बनाने की कोशिश भी करते हैं. ठाकरे प्रकरण इसका एक और ताजा प्रमाण है. चैनलों ने जिस तरह से कोई एक सप्ताह तक घंटों ठाकरे की बीमारी की कवरेज की और ठाकरे का महिमामंडन शुरू किया, उसके साथ ही यह तय हो गया था कि हवा का रुख क्या है?
उसी की तार्किक परिणति मृत्यु से लेकर अंतिम संस्कार तक की कवरेज में भी दिखी. असल में, चैनल और उनके विशेषज्ञ मुंबई में ठाकरे की शवयात्रा और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ को लोकप्रियता और पापुलर मूड के उदाहरण के बतौर पेश कर रहे हैं, वह काफी हद तक खुद चैनलों की अतिरेकपूर्ण 24X7 कवरेज का नतीजा थी.
एक तो चैनलों ने ऐसा माहौल बनाया जिसमें शुरू से लाखों की भीड़ जुटने के अनुमान-चर्चाओं और बाद में टी.वी कैमरों के कमाल ने एक बैंड-वैगन प्रभाव पैदा कर दिया और जिसके कारण बहुतेरे लोग देखा-देखी और इस डर के साथ उस भीड़ का हिस्सा बनते गए कि कहीं पीछे न छूट जाए. एक तरह की ‘सामूहिक उन्माद’ (मॉस हिस्टीरिया) की स्थिति पैदा हो गई थी.

कहते हैं कि भीड़ का अपने एक खास मनोविज्ञान होता है. मुंबई जैसे महानगर में जहाँ असुरक्षा बोध बहुत ज्यादा है, वहां एक विशाल ‘मराठी मानुष’ भीड़ का हिस्सा बनकर खुद को सुरक्षित और शक्तिशाली महसूस करने के मनोविज्ञान को नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है...

जारी ...... 

('कथादेश' के दिसंबर अंक में प्रकाशित हो रही टिप्पणी की पहली क़िस्त...विस्तार से पत्रिका में पढ़ें या 5 दिसंबर तक इंतजार करें। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।)