सोमवार, जून 16, 2008

तेल के खेल में सट्टेबाजों की लीला

सुरसा की तरह बदन बढ़ाती महंगाई की आठ प्रतिशत से अधिक की दर के असहनीय बोझ और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में एक झटके में दस प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी की मार से पीठ सहला रहे लोगों के लिए बुरी खबर है. अनाजों की बढ़ती कीमतों के अलावा महंगाई के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में हर दिन एक नया रिकार्ड बना रही है.

पिछले सप्ताह सिर्फ एक दिन में न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज- नाइमेक्स- में कच्चे तेल की कीमत में 11 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की रिकार्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमत एक झटके में आठ प्रतिशत की उछाल के साथ 128 डॉलर से बढ़कर 139 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई.

लेकिन जैसे इतना ही काफी नहीं हो, जाने-माने निवेशक बैंक मॉर्गन स्टैनली ने भविष्यवाणी की है कि चार जुलाई तक कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगी. इससे पहले, एक और बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनी गोल्डमान सैक्स कह चुकी है कि अगले छह से चौबीस महीनों में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल से उपर पहुंच जाएगी. इन दोनों बयानों से साफ है कि दुनिया को कच्चे तेल की लगातार चढ़ती कीमतों से आने वाले महीनों में भी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है.

ये दोनों बयान सामान्य बयान नहीं हैं. जब दुनिया की दो सबसे ताकतवर वित्तीय संस्थाएं- मॉर्गन स्टैनली और गोल्डमान सैक्स कोई बात कह रही हों तो उन्हें दुनिया भर के शेयर बाजारों और जिंस बाजारों के छोटे-बड़े खिलाड़ी बड़े गौर से सुनते हैं. हैरत की बात नहीं है कि इन दोनों बयानों ने कच्चे तेल के बाजार में पहले से लगी आग में घी डालने का काम किया है. इससे कच्चे तेल की कीमतें और भड़क उठी हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि मॉर्गन स्टैनली और गोल्डमान सैक्स के बयानों ने तेल के वायदा कारोबार में सक्रिय सट्टेबाजों, खासकर तेजड़ियों को कच्चे तेल की कीमतों को मनमाने तरीके से उपर चढ़ाने का अच्छा बहाना दे दिया है. अगर ये कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि इन दोनों बहुराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने जान-बूझकर ऐसा बयान दिया ताकि कच्चे तेल की कीमतों में असामान्य और कृत्रिम तेजी बनी रहे और इसका लाभ तेल कंपनियों से लेकर उनके कारोबार में भारी मुनाफा बना रहे सट्टेबाजों को मिलता रहे.

दरअसल, कच्चे तेल के बाजार में डेढ़-दो वर्षों, खासकर पिछले कुछ महीनों से जारी तेजी के पीछे बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों, बड़ी वित्तीय-निवेश संस्थाओं और सट्टेबाजों की सबसे बड़ी भूमिका रही है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के बड़े विश्लेषकों सहित ये वित्तीय कंपनियां इसे स्वीकार नहीं करती हैं कि कच्चे तेल के बाजार में सट्टेबाजी की कोई भूमिका है. उनका कहना है कि तेल की बढ़ती मांग के अनुरूप उत्पादन में बढ़ोतरी न होने के कारण तेल की कीमतों पर भारी दबाव है जो तेल के प्रमुख उत्पादक मध्य-पूर्व के देशों में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से और बेकाबू हो गई है.

लेकिन तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं. तथ्यों से साफ है कि कच्चे तेल की कीमतों में असामान्य तेजी के पीछे मांग में बढ़ोतरी और आपूर्ति में कमी के बजाय सट्टेबाजी की सबसे अहम भूमिका है. खुद दुनिया के एक बड़े और प्रभाववशाली सट्टेबाज जार्ज सोरोस ने कबूल किया है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे सट्टेबाजी की सबसे बड़ी भूमिका है. सोरोस ने अमरीकी सीनेट की वाणिज्य समिति के सामने कहा है कि सट्टेबाजी ने तेल के बाजार में एक बुलबुला बना दिया है जो कभी भी फूट सकता है जिसका असर शेयर बाजार को भी डुबो देगा.

असल में, तेल के जिंस बाजार खासकर न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज, शिकागो एक्सचेंज और लंदन आईसीई बाजार में जबर्दस्त सट्टेबाजी चल रही है. इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बाजार में सक्रिय इंडेक्स फंड्स का निवेश पिछले पांच वर्षों में 13 अरब डॉलर से बढ़कर 260 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. तेल बाजार के जाने-माने विश्लेषक एफ विलियम इंगडाल के मुताबिक कच्चे तेल की मौजूदा कीमत में लगभग 60 फीसदी योगदान सट्टेबाजी का है.

इसकी वजह यह है कि अमरीका में जिंस वायदा कारोबार आयोग -सीएफटीसी- किसी भी निवेशक को यह इजाजत देता है कि वह नाइमैक्स में कच्चे तेल के वायदा सौदे की कुल कीमत का सिर्फ छह फीसदी अदा कर कारोबार कर सकता है. इसका अर्थ यह हुआ कि कोई भी वायदा कारोबारी मौजूदा कीमतों यानी 139 डॉलर प्रति बैरल में सिर्फ 8.34 डॉलर का भुगतान करके सौदा पक्का कर सकता है. इस नरम और ढीले-ढ़ाले नियम के कारण सट्टेबाजों की चांदी हो गई है.

तेल बाजार में सक्रिय सट्टेबाजों को इस बात का भी फायदा मिला है कि अमरीका सहित दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में ब्याज दरें काफी गिर गई हैं और वास्तविक ब्याज दर नकारात्मक हो गई है. इस कारण बाजार में पैसा इफरात में उपलब्ध है. सट्टेबाज इसी पैसे का इस्तेमाल तेल के वायदा कारोबार में कर रहे हैं.  इसके अलावा, इंडेक्स और पेंशन फंड्स भी इस चढ़ते बाजार में माल काटने में जुटे हैं.

उधर, सब-प्राइम संकट में काफी पैसा डुबा चुके बड़े बैंक और वित्तीय संस्थाएं भी कच्चे तेल के वायदा कारोबार में सट्टेबाजी के जरिए अपने नुकसान की भरपाई और नई कमाई में जुटे हैं. विश्लेषक और इस बाजार के अंदरूनी जानकार इस खेल में गोल्डमान सैक्स, मॉर्गन स्टैनली, ब्रिटिश पेट्रोलियम, फ्रेंच बैंक सोसायते जेनरल, बैंक ऑफ अमरीका और स्विस बैंक मरक्यूरिया की भूमिका पर उंगली उठा रहे हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि दुनिया भर में तेल की बढ़ती कीमतों पर मचे कोहराम के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों और सरकारी बैठकों में सट्टेबाजों की भूमिका पर अंकुश लगाना तो दूर, कोई चर्चा तक नहीं हो रही है. वह चाहे इस मुद्दे पर जापान में हुई जी-8 देशों की बैठक हो या फिर पांच प्रमुख तेल उपभोक्ता देशों की बैठक, हर जगह गरीब और विकासशील देशों में पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जा रही कथित सब्सिडी का मुद्दा ही विकसित देशों के निशाने पर बना रहा.

अफसोस की बात यह है कि भारत और चीन जैसे विकासशील देशों ने भी कच्चे तेल के बाजार में जारी सट्टेबाजी और कीमतों में तोड़-मरोड़ पर अंकुश लगाने के सवाल को उठाना जरूरी नहीं समझा. यही नहीं, इन मंचों और बैठकों में जिस तरह से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के लिए मांग की तुलना में उसकी आपूर्ति में असंतुलन को प्रमुख कारण बताया गया, उससे उन सट्टेबाजों के ही हाथ मजबूत हुए जो इसकी आड़ में तेल की कीमतें कृत्रिम रूप से चढ़ाने में लगे हुए हैं.

दरअसल, 2003 के इराक युद्ध के बाद से ही बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियां, बड़ी वित्तीय संस्थाएं और तेल के कारोबारी तेल के बाजार में 'पीक ऑयल` का एक हौवा खड़ा किए हुए हैं जिसके मुताबिक दुनिया में कच्चे तेल का भंडार सीमित है और इसका उत्पादन अपने चरम पर पहुंचने ही वाला है. इसके बाद उसमें कमी आने लगेगी. दूसरी ओर, विकाशील देशों खासकर चीन और भारत में तेल की खपत तेजी से बढ़ रही है. इससे मांग और आपूर्ति के बीच अचानक असंतुलन काफी बढ़ गया है जिसके कारण कीमतें चढ़ती जा रही हैं.

लेकिन इससे बड़ा अर्द्धसत्य और कुछ नहीं हो सकता है कि तेल की मांग में आपूर्ति की तुलना में अचानक कोई भारी बढ़ोतरी हो गई है. यह सिर्फ घबराहट और अफरा-तफरी का माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है. तथ्य यह है कि 2004 के बाद से तेल की वैश्विक खपत में लगातार कमी आ रही है. यही नहीं, दुनिया के विकसित देशों में तो तेल की खपत में पिछले दो वर्षों से गिरावट दर्ज की जा रही है. विकासशील और गरीब देशों में भी तेल की खपत में वृद्धि की दर गिर रही है.

यही नहीं 'पीक ऑयल` की धारणा भी विवादास्पद और भ्रामक है. इस धारणा को लेकर भूगर्भ वैज्ञानिकों और विश्लेषकों में मतभेद है. साथ ही, अधिकांश विश्लेषक इसे पूरी तरह से नकारते हैं कि दुनिया अभी 'पीक ऑयल` की स्थिति में पहुंच गई है. सच यह है कि पिछले कुछ वर्षों में तेल के नए भंडार मिले हैं और तेल के उत्पादन में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है.

दरअसल, समस्या यह नहीं है कि तेल के नए भंडार नहीं मिल रहे हैं या उसके उत्पादन में गिरावट आ रही है बल्कि मुद्दा यह है कि बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियां जान-बूझकर तेल के भंडारों पर कब्जा जमाए बैठी हैं ताकि कच्चे तेल की मौजूदा मनमानी कीमतों को बनाए रखा जा सके. सच यह है कि तेल के बाजार में जरा भी पारदर्शिता और कड़े नियम-कानून होते तो इस समय अमेरिकी मंदी और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं की सुस्ती के कारण कीमतों में बढ़ोतरी के बजाय गिरावट का रुख होता.

लेकिन तेल के बाजार को पूरी तरह से सट्टेबाजों के हवाले कर दिया गया है. इस खेल में बड़ी तेल कंपनियों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के साथ-साथ तेल के कारोबारी भी शामिल हैं. इसे अमेरिकी सरकार के साथ-साथ ओपेक का भी आशीर्वाद मिला हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की बड़ी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों से सांठ-गांठ किसी से छिपी नहीं है. अमेरिकी उपभोक्ताओं को भले ही पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ी हुई कीमतों की मार झेलनी पड़ रही हो लेकिन बुश प्रशासन तेल कंपनियों, बैंकों- वित्तीय संस्थाओं और सट्टेबाजी पर रोक लगाने के बजाय भारत और चीन जैसे देशों को तेल पर सब्सिडी खत्म करने की हिदायत देने में जुटा हुआ है.

लेकिन तेल पर सब्सिडी कम या खत्म करना इस समस्या का हल नहीं है. मुद्दा यह है कि तेल के बाजार में जारी सट्टेबाजी और मुनाफाखोरी पर रोक कैसे लगाई जाए? इसके बिना तेल की कीमतों में लगी आग को बुझा पाना मुश्किल है. इसके लिए भारत को चीन के साथ मिलकर विकासशील और गरीब देशों को एकजुट करते हुए अमेरिकी सरकार और यूरोपीय संघ पर दबाव बनाना होगा कि वे तेल के वायदा कारोबार को सख्ती से विनियमित करें और सट्टेबाजी पर रोक लगाएं. भारत और अन्य विकासशील देशों को ओपेक से भी सीधी बात करनी चाहिए कि वे न सिर्फ तेल की आपूर्ति में स्थिरता लाएं बल्कि तेल कंपनियों की अवांछनीय और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाएं.

अफसोस की बात यह है कि मनमोहन सिंह सरकार यह जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं है. इसकी सिर्फ एक वजह हो सकती है कि उसे अमेरिकी नाराजगी का डर सता रहा हो. इसी अमेरिकी नाराजगी के डर के कारण यूपीए सरकार ने ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन को ठंडे बस्ते में डाल दिया। अगर पिछले चार वर्षों में सरकार ने इस पाइपलाइन पर पूरी सक्रियता और ईमानदारी से काम किया होता तो आज देश तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार के सट्टेबाजों के रहमोकरम पर निर्भर नहीं होता.

यही नहीं, यूपीए सरकार ने अगर अमेरिकी दादागिरी और उसकी तेल की राजनीति को स्वीकार करने के बजाय ईरान, वेनेजुएला, रूस और चीन के साथ एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय तेल व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की होती तो खुद के साथ दुनिया को तेल की आग में झुलसने से बचाया जा सकता था. पूर्व पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस दिशा में सीमित पहल की थी लेकिन उन्हें अमेरिकी दबाव में पद से हटा दिया गया. समय आ गया है जब प्रधानमंत्री देश को बताएं कि अय्यर को क्यों हटाया गया था? और सरकार ने ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन के साथ-साथ तेल के एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को खड़ा करने की पहल क्यों नहीं की? सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका से सट्टेबाजी पर रोक लगाने की मांग क्यों नहीं कर रही है? देश पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ी कीमतें चुकाने को तैयार है बशर्ते यूपीए सरकार इन सवालों का जवाब दे। क्या प्रधानमंत्री फिर राष्ट्र के नाम संदेश-सफाई देने के लिए टीवी पर आएंगे?
 
 
जनसत्ता से साभार

मंगलवार, जून 10, 2008

सरकार को मंजूर नहीं थे दूसरे विकल्प...

यह तर्क गले नहीं उतरता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया था. असल में, यूपीए सरकार कीमतों में भारी बढ़ोतरी के अलावा किसी और विकल्प पर विचार के उत्सुक ही नहीं थी.

 

 

 

 

आम आदमी के हितों का ख्याल रखने के वायदे के साथ सत्ता में आई यूपीए सरकार ने एक बार फिर जब चुनने का मौका आया तो महंगाई की मार से त्रस्त आम आदमी के बजाय तेल कंपनियों के मुनाफे को प्राथमिकता दी. पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में एक झटके में इतनी बढ़ोतरी के पीछे न तो कोई आर्थिक तर्क है और न ही राजनीतिक बुद्धिमता. लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के प्रति अपनी अंधभक्ति में आर्थिक तर्क और राजनीतिक बुद्धिमता दोनों को ताक पर रख दिया है.

 

पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा सहित प्रधानमंत्री और यूपीए सरकार का यह तर्क गले से नहीं उतरता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह गया था. यह सच नहीं है. असल में, यूपीए सरकार कीमतों में भारी बढ़ोतरी के अलावा किसी और विकल्प पर विचार के उत्सुक ही नहीं थी. यही कारण है कि पिछले एक महीने खासकर कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद से मनमोहन सिंह सरकार और गुलाबी मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया, जैसे कीमतें तत्काल नहीं बढ़ीं तो सरकारी तेल कंपनियों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था भी दिवालिया हो जाएंगी.

 

खुद प्रधानमंत्री ने एसोचैम के सम्मेलन में हाथ खड़े करते हुए कहा कि अब सरकार पेट्रोलियम सब्सिडी का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है और लोगों को इसका कुछ भार उठाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. गुलाबी अखबारों के जरिए यह सूचना देते हुए एक भयावह तस्वीर खींचने और कीमतों में बढ़ोतरी के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिश की गई कि अगर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी नहीं हुई तो तेल कंपनियों को इस साल 2.46 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है. इस तरह की खबरें जान-बूझकर 'लीक' की गईं कि कीमतों में पेट्रोल पर 15 रुपए प्रति लीटर, डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर और एलपीजी पर 250 रुपए प्रति सिलेंडर की वृद्धि जरूरी हो गई है.

 

ऐसा बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया गया ताकि जब आज कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा की गई तो आम लोगों को यह लगे कि वे सस्ते में छूट गए. इसके साथ ही, यूपीए और कांग्रेस लगा फाड़कर खुद को 'आम आदमी' का हितैषी साबित करने में जुट गए हैं कि देखो सरकार ने लोगों पर कितना कम बोझ डाला है ? लेकिन सच यह है कि मनमोहन सिंह सरकार ने जान-बूझकर ऐसा डरावना माहौल बनाया ताकि पेट्रोलियम उत्पादों में बढ़ोतरी को 'मजबूरी में उठाया कदम' और उचित ठहराया जा सके. इसके लिए न सिर्फ उसने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया बल्कि लोगों की आंख में धूल झोंकने की कोशिश की है.

 

सच यह है कि तेल कंपनियों को 2.46 लाख करोड़ रुपए के घाटे का अनुमान इस गणित पर आधारित है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 135 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है. लेकिन ऐसा नहीं है कि देशी तेल कंपनियां हर दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल खरीदती हैं और भारतीय बाजार में बेचती हैं. अधिकांश सौदे महीनों पहले और आज की तुलना में कम कीमत पर हुए हैं. यही नहीं, किसी एक दिन बाजार में कच्चे तेल की कीमत 135 डॉलर प्रति बैरल पहुंच जाए, इसका अर्थ यह नहीं है कि आने वाले सप्ताहों और महीनों में भी यही कीमत बनी रहेगी. जैसे फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरकर 124 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है. यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के आधार पर घरेलू तेल उत्पादक और शोधन कंपनियों को तेल बेचने की इजाजत देने का भी कोई तुक नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि इस स्थिति का लाभ उठाकर ओएनजीसी से लेकर रिलायंस तक जबर्दस्त मुनाफा कमा रहे हैं. आखिर सरकार गेहूं उत्पादक किसानों को भी यह अधिकार क्यों नहीं देती है कि वे अपना उत्पाद अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर बेचें, भले उनकी उत्पादन लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों से काफी कम क्यों नहीं हो ?

 

सवाल यह भी है कि पेट्रोलियम उत्पादों पर इतना अधिक टैक्स क्यों है ? क्या यह सच नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने पेट्रोलियम उत्पादों को दुधारू गाय की तरह टैक्स उगाहने का आसान माध्यम बना दिया है ? उदाहरण के लिए दिल्ली में पेट्रोल की वास्तविक कीमत 21.93 रुपए प्रति लीटर और डीजल की 22.45 रुपए प्रति लीटर है, जबकि उनकी खुदरा कीमत 45.52 रुपए और 31.76 रुपए प्रति लीटर है. तथ्य यह है कि पेट्रोल की खुदरा कीमत का 49 प्रतिशत यानी लगभग आधा और डीजल की खुदरा कीमत का 26 प्रतिशत केंद्रीय उत्पाद कर और वैट के बतौर जाता है. कोई भी वित्तमंत्री पेट्रोलियम उत्पादों से होने वाली राजस्व आय छोड़ना नहीं चाहता है. यही कारण है कि पेट्रोलियम उत्पादों पर करों के जरिए केंद्र और राज्य सरकारों ने जहां 2003-04 में 1,04,375 करोड़ रुपए का राजस्व कमाया, वह यूपीए सरकार के तीसरे वर्ष में उछलकर 1,64,000 करोड़ तक पहुंच गई है. इसके अलावा, केंद्र सरकार तेल उत्पादक कंपनियों पर सेस के जरिए 7,500 करोड़ रुपए कमा रही है. जाहिर है, यह पैसा आम आदमी की जेब से ही जा रहा है.

 

यह ठीक है कि काफी दबाव और हो-हंगामे के कारण यूपीए सरकार खासकर वित्तमंत्री ने पेट्रोलियम उत्पादों पर आयात शुल्क और अन्य करों में टोकन कटौती का ऐलान किया है. लेकिन यह कटौती कीमतों में हुई बढ़ोतरी की तुलना में काफी कम है. यही नहीं, इस कटौती का फायदा भी तेल कंपनियों को होगा. कहने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला करते हुए तेल कंपनियों के मुनाफे का ध्यान ज्यादा रखा है.

 

यह फैसला आर्थिक और राजनीतिक रूप से सरकार पर बहुत भारी पड़ेगा. जाहिर है, इसका सीधा असर महंगाई की आग पर पड़ेगा जो और भभक उठेगी. मुद्रास्फीति की दर बढ़ने से आर्थिक विकास को धक्का लगना तय है. इस तरह सरकार को न माया मिलेगी और न राम. महंगाई की बेकाबू सुरसा यूपीए सरकार को जरूर लील जाएगी लेकिन इसके लिए कांग्रेस किसी और को नहीं, खुद को ही कटघरे में पाएगी.

गुरुवार, अप्रैल 10, 2008

दाम बांधो, तनख्वाह बांधो...

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आने के बाद से एक ओर जहां महंगाई बेकाबू हो गई है वहीं सरकारी कर्मचारियों और खासकर अफसरों ने वेतन में बढ़ोत्तरी की ऐसी-ऐसी मांगें शुरू कर दी है जैसे कुबेर का खजाना खुल गया हो.
 
सब में होड़ लगी है. मीडिया भी पूरी उदारता से इन मांगों को उछाल रहा है. सेना के जवानों खासकर मुखर अफसरों की शिकायत है कि उनकी देशसेवा की अनदेखी की जा रही है. उन्हें आईएएस अफसरों के बराबर तनख्वाह क्यों नहीं दी जा रही है. आईपीएस अफसरों का कहना है कि कानून व्यवस्था वो संभालते हैं लेकिन मजा आईएएस अफसर लूट रहे हैं.
 
ऐसे ही सरकार में काम करने वाले बाकी अफसर भी आयोग की सिफारिशों को धोखा बता रहे हैं. कह रहे हैं कि उन्हें वास्तव में कुछ नहीं मिला है. केवल मीडिया में हल्ला उड़ गया कि बाबुओं की तनख्वाह दोगुना और तिगुना बढ़ गया है.
 
विश्वविद्यालय के शिक्षक यूजीसी के वेतन पैनल का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं लेकिन उनका दावा है कि देश का भविष्य वही बना रहे हैं इसलिए उनकी तनख्वाह को इतना आकर्षक बनाना चाहिए कि प्रतिभाशाली लोग शिक्षक बनने में शर्माए नहीं.
 
देखा-देखी माननीय सांसदों को भी अपनी तनख्वाह की चिंता होने लगी है. ... और प्राइवेट सेक्टर का तो कहना ही क्या..? वहां तो जैसे लक्ष्मी दोनों हाथों से धनवर्षा कर रही हैं. प्राइवेट सेक्टर में मिलने वाली तनख्वाहें आजकल सबके लिए मानदंड बन गई हैं. सरकारी बाबुओं, अफसरों से लेकर सेना के अफसरों और अध्यापकों तक, सभी प्राइवेट सेक्टर के बराबर तनख्वाह की मांग कर रहे हैं.
 
जाहिर है कि प्राइवेट सेक्टर के बराबर तनख्वाह मांगने का मतलब उन लाखों छोटी और मध्यम दर्जे की कंपनियों में काम करने वाले करोड़ों श्रमिकों और कर्मचारियों के बराबर की तनख्वाह मांगना नहीं है बल्कि इसका आशय है कि उनकी तनख्वाहें बहुराष्ट्रीय और बड़ी कंपनियों के टॉप मैनेजरों के बराबर की जाए. सब कॉरपोरेट सेक्टर की चुनिंदा नौकरियों और तनख्वाहों से बराबरी चाहते हैं.
 
जबकि सच यह है कि प्राइवेट सेक्टर में अधिकांश कंपनियों, यहां तक कि बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और टॉप कॉरपोरेट कंपनियों में निचले दर्जे के कर्मचारियों और श्रमिकों का जितना शोषण होता है और जितनी कम तनख्वाह मिलती है, उसकी कोई मिसाल नहीं है. दूर क्या जाना, कुछ बड़े अखबारों और टीवी चैनल की बात छोड़ दीजिए तो बाकी जगहों पर क्या तनख्वाह मिल रही है, वो बताने में भी शर्म आती है.
 
लेकिन बड़ी-बड़ी तनख्वाहों की मांग के इस शोर-शराबे के बीच सवाल यह है कि कितनी तनख्वाह काफी है ? और उसका कोई पैमाना होना चाहिए या नहीं ? प्राइवेट सेक्टर में सीईओ की सैलरी और सुविधाएं को लेकर इन दिनों दुनिया भर में बहस चल रही है. सवाल उट रहा है कि तनख्वाह तय करते हुए किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए.
 
मुझे लगता है कि समय आ गया है जब प्राइवेट सेक्टर के सीईओ और मैनेजरों से लेकर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की तनख्वाहों को इस सीमा में बांधा जाए. इसके बिना देश में बराबरी नहीं, गैर-बराबरी बढ़ रही है.
 
इसका एक तरीका ये हो सकता है कि एक आम भारतीय की मासिक आमदनी और सीईओ से लेकर कैबिनेट सचिव की तनख्वाह के बीच 1:20 या 1:30 या अधिक से अधिक 1:40 का अनुपात तय कर दिया जाए. हालांकि मेरी खुद की राय 1:15 के पक्ष में है. लेकिन अगर ये अव्यावहारिक लगे तो और फॉर्मूलों पर सोचा जा सकता है.
 
खैर, अब अगर एक मजदूर की रोज की न्यूनतम मजदूरी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत 80 रुपए प्रतिदिन यानी मासिक 2,400 रुपए है तो किसी भी सीईओ या सचिव की तनख्वाह 48,000 से लेकर 96,000 तक ही होनी चाहिए.
 
बाकी सब कर्मचारियों और अफसरों की तनख्वाह इसी अनुपात में घटाते हुए इसके नीचे ही होनी चाहिए. जाहिर है कि करोड़ों के पैकेज में खेलने वाले लोगों को ये सुझाव अच्छा नहीं लगेगा.
 
ऐसे में एक रास्ता ये है कि दिहाड़ी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी इतनी बढ़ाई जाए कि आपकी अधिक सैलरी की मांग उचित लग सके. लेकिन जब तक फार्मूले पर कोई सहमति नहीं होती है तब तक महंगाई यानी दाम बांधने के साथ-साथ तनख्वाह बांधने की मांग करना जरूरी हो गया है. इसके अलावा सीईओ और मैनेजरों के साथ बड़े अफसरों के वेतन पर रोक लगाए बगैर दाम बांधना मुमकिन नहीं है.

मंगलवार, अप्रैल 08, 2008

मंत्रिमंडल में गिल, नींव गई हिल...

मनोहर सिंह गिल को केंद्रीय मंत्री बनाने के यूपीए सरकार के फैसले पर आश्चर्य से अधिक चिंता और अफसोस हो रहा है. ये ऐसा फैसला है जिससे ना सिर्फ गलत नजीर पड़ी है बल्कि संवैधानिक पदों के राजनीतिकरण की एक अस्वस्थ परंपरा की नींव पड़ गई है.
 
दरअसल, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट, सीएजी, राज्यपाल, राष्ट्रपति, टीआरएआई जैसे रेगुलेटर के पदों पर बैठे लोगों से ना सिर्फ निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है बल्कि निष्पक्षता दिखाने की भी उम्मीद की जाती है.
 
लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे गिल का कांग्रेस कोटे से पहले राज्यसभा पहुंचना और अब मंत्री बनना इस कसौटी पर कहीं से भी खरा नहीं उतरता है. ये साफ तौर पर हितों के टकराव यानी "कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" का मामला है.
 
ये सवाल जरूर उठेगा कि गिल को क्या ये इनाम चुनाव आयोग में कांग्रेस के हितों का ख्याल रखने के बदले में मिला है ?
 
हालांकि गिल ऐसे पहले उदाहरण नहीं हैं. उनसे पहले भी कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में जगन्नाथ मिश्रा को राहत देने वाले जज बहरूल इस्लाम को असम से पार्टी टिकट पर सांसद बनाया है. इन दिनों उत्तराखंड में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज विजय बहुगुणा बड़े नेता हैं.
 
ऐसे ही परेशान करने वाले कई उदाहरण हैं. कांग्रेस ऐसे फैसलों के जरिए ही भाजपा को संविधान के साथ खेलने और मनमानी करने की छूट मिल जाती है.

मंगलवार, अप्रैल 01, 2008

कहीं खुशी, कहीं गम: कॉरपोरेट राह पर सरकारी क्षेत्र...

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों से देश में और बढ़ेगी आर्थिक गैर बराबरी...

 

शुरुआती उत्साह और उम्मीदों के बीच छठे वेतन आयोग की सिफारिशों ने केंद्र सरकार के चालीस लाख से अधिक कर्मचारियों को मायूस ही किया है. इन सिफारिशों से अफसरों के एक छोटे से वर्ग को छोड़ दिया जाए तो कर्मचारियों के बड़े वर्ग को न सिर्फ गहरी निराशा हुई है बल्कि विरोध के सुर भी उठने लगे हैं.

 

40 से 45 फीसदी वेतन वृद्धि की चर्चाओं और सुर्खियों के विपरीत वेतन आयोग की सिफारिशों से कर्मचारियों के बड़े वर्ग को सिर्फ 15 से लेकर 28 फीसदी के बीच ही वेतन वृद्धि का फायदा मिलेगा. खुद वेतन आयोग का यह मानना है कि नए वेतनमानों के तहत केंद्र सरकार के आला अफसरों और सबसे छोटे कर्मचारी के बीच वेतन का अनुपात 1:12 का हो जाएगा.

 

सवाल यह है कि क्या यह अनुपात समतामूलक और न्यायपूर्ण है? यही सवाल सेना के वे जवान भी पूछ रहे हैं जिन्हें वेतन आयोग ने कठिन परिस्थितयों में काम करने के बदले प्रति माह एक हजार रूपए अतिरिक्त वेतन देने का ऐलान किया है. उनका सवाल है कि उन्हें एक हजार और उन्हीं परिस्थितियों में काम करने वाले सेना के अफसरों को प्रति माह छह हजार रूपए देने के पीछे क्या तर्क है? जाहिर है कि इससे फौज में बहुत बेचैनी है और इस कारण सेना प्रमुखों को रक्षा मंत्री से मिलकर इसमें परिवर्तन की मांग करनी पड़ी है.

 

कहने की जरूरत नहीं है कि वेतन आयोग की सिफारिशों में इस तरह की कई और विसंगतियां भी हैं. लेकिन ये विसंगतियां किसी संयोग के कारण नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत सोची समझी योजना है.

 

दरअसल, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें सरकारी महकमों के कॉरपोरेटीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाली और उसी खांचे में ढली हैं. इसकी शुरूआत पांचवें वेतन आयोग से ही हो गई थी. जैसे एक निजी कॉरपोरेट कंपनी के ढांचे में सीईओ की तनख्वाह बहुत अधिक होती है और उसकी तुलना में निचले स्तर के कर्मचारियों की तनख्वाहें बहुत कम होती हैं. ठीक उसी तरह से सरकारी विभागों में भी कैबिनेट सचिव और सचिवों की तनख्वाहें तो सीईओ की तरह कर दी गई हैं लेकिन निचली श्रेणी के कर्मचारियों की तनख्वाहों में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई है.

 

सरकारी महकमों की कॉरपोरेटीकरण की इसी प्रक्रिया को बढ़ाते हुए वेतन आयोग ने न सिर्फ चतुर्थ श्रेणी-ग्रुप डी-के पदों को तृतीय श्रेणी-ग्रुप सी-में समाहित करने के नाम पर पूरी तरह से खत्म कर दिया है बल्कि चतुर्थ श्रेणी में स्थायी कर्मचारियों के बजाय ठेके और अस्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया है. इस तरह वेतन आयोग पिछले दरवाजे से केंद्र सरकार में कर्मचारियों की कमी यानी डाउनसाइजिंग की जगह बनाता हुआ भी दिखता है.

 

यही कारण है कि खुद वेतन आयोग ने कहा है कि उसकी सिफारिशों को लागू करने पर वर्ष 2008-09 में सरकार पर कुल 12,561 करोड़ रूपए का बोझ पड़ेगा. लेकिन वेतन आयोग द्वारा सुझाए गए विभिन्न प्रस्तावों को लागू करने से सरकार को लगभग 4,586 करोड़ रूपए की बचत भी होगी. जाहिर है कि यह बचत कर्मचारियों की संख्या में कटौती आदि के जरिए ही संभव होगी. शायद यही कारण है कि कॉरपोरेट जगत ने भी वेतन आयोग की सिफारिशों का खुलकर स्वागत किया है.

 

कॉरपोरेटीकरण की इसी प्रक्रिया का एक और संकेत कर्मचारियों के प्रदर्शन के आधार पर वार्षिक वेतन बढ़ोत्तरी में फर्क करने के ऐलान में भी देखा जा सकता है. सरकारी विभागों के मौजूदा ढांचे में प्रदर्शन को आधार बनाकर अधिक वेतन वृद्धि का प्रस्ताव वास्तव में कार्यक्षमता बढ़ाने की बजाय चमचागिरी की संस्कृति और परस्पर विद्वेष को बढ़ावा दे सकता है. इसकी वजह यह है कि किसी कर्मचारी के बेहतर प्रदर्शन का कोई वैज्ञानिक और न्यायपूर्ण फॉर्मूला तैयार नहीं किया गया है.

 

यह ठीक है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन में 15 से लेकर 40 फीसदी तक की वृद्धि निजी कॉरपोरेट क्षेत्र की तुलना में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं दिखती है लेकिन इन दोनों की तुलना असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ श्रमिकों से की जानी चाहिए जो इस देश की कुल श्रमशक्ति का लगभग 90 फीसदी हैं.

 

खुद यूपीए सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति का जायजा लेने के लिए गठित नीतिश सेनगुप्ता कमेटी की रिर्पोट के मुताबिक लगभग 31.6 करोड़ मजदूरों को 20 रूपए प्रतिदिन से भी कम की आय पर गुजर बसर करना पड़ रहा है.

 

जाहिर है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद केंद्र सरकार के सबसे निचले स्तर के कर्मचारी की मासिक तनख्वाह और असंगठित क्षेत्र के एक श्रमिक की मासिक आय के बीच का अंतर दस गुने से भी अधिक बढ़ जाएगा.

 

यही नहीं, इस समय देश में प्रति व्यक्ति सालाना आय लगभग 29,382 रुपए है जिसका अर्थ यह हुआ कि प्रति व्यक्ति औसत मासिक आय लगभग ढाई हजार रूपए है. स्पष्ट है कि सबसे निचले स्तर के एक सरकारी कर्मचारी को भी एक आम भारतीय की मासिक आय से ढाई गुना अधिक तनख्वाह मिलेगी.

 

यह विसंगति और गैर बराबरी तब और अधिक चुभने लगती है जब हम देखते हैं कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद एक आम भारतीय की सालाना औसत आय और सरकार के सबसे उंचे ओहदे पर बैठे नौकरशाह की सालाना तनख्वाह के बीच का अंतर बढ़कर 1:32 का हो जाएगा. और अगर इसकी तुलना असंगठित क्षेत्र के उन 31 करोड़ श्रमिकों की मासिक मजदूरी से की जाए तो यह अनुपात सभी रिकार्ड तोड़ता हुआ 1:1800 तक पहुंच जाता है.

 

ये सब कहने का उद्देश्य केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों की खुशी में खलल डालना नहीं है लेकिन यह सोचना भी बहुत जरूरी है कि आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? उदारीकरण और निजीकरण के पिछले पंद्रह वर्षों में निजी और सरकारी क्षेत्रों में तनख्वाहों में भारी वृद्धि हुई है. कुछ मामलों में यह वृद्धि तर्क से परे दिखती है. यहां तक कि पिछले वर्ष खुद प्रधानमंत्री को एक बड़े औद्योगिक संगठन के सम्मेलन में तनख्वाहों और गैर जरूरी उपभोग (कनसीपीकुअस कंजम्पशन) पर रोक लगाने का आग्रह करना पड़ा था.

 

इसके बावजूद तनख्वाहों में अनाप-शनाप वृद्धियों का दौर जारी है. इस कारण देश में आर्थिक गैर बराबरी तेजी से बढ़ रही है. पिछले महीने मुद्रा कोष (आईएमएफ) की एक रिपोर्ट में भी यह स्वीकार किया गया है कि उदारीकरण के इन वर्षों में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है.

 

दरअसल, इन दो दशकों में एक ताकतवर मध्यम वर्ग का उदय और विस्तार हुआ है. चिंता और अफसोस की बात यह है कि नवउदारवादी अर्थनीतियों के कारण हो रहे तेज विकास का सारा लाभ यही वर्ग उठा रहा है. कुछ दिनों पहले पेश हुए बजट में वित्तमंत्री पी चिंदबरम ने आयकर दाताओं को करों में छूट के जरिए 4,000 से लेकर 44,000 रुपए तक का उपहार दिया. और अब वेतन आयोग ने भी सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाहों में 15 से लेकर 30 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी के जरिए दूसरा उपहार दिया है.

 

इन सबके बीच उस आम आदमी को भुला दिया गया है जिसकी चुनावों के समय सबसे अधिक दुहाई दी जाती है. चुनावी उपहारों और खैरातों की इस बरसात के बीच यह सवाल उठता है कि आखिर उसे क्या मिला है?

 

निश्चय ही, वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए यूपीए सरकार को गांधी जी की उस जंत्री को याद करना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था कि "कोई भी फैसला करने से पहले सबसे कमजोर और गरीब भारतीय के चेहरे को याद करें और सोचें कि इस फैसले से उसे क्या मिलने जा रहा है?" वेतन आयोग की सिफारिशों ने देश को यह सोचने का अवसर दिया है. इसे हरगिज नहीं गंवाना चाहिए.

शुक्रवार, मार्च 28, 2008

गरीबों पर टैक्स है महंगाई...

महंगाई की सुरसा के आगे कलयुगी हनुमान का समर्पण

 

ऐसा लगता है कि महंगाई की सुरसा ने नए रिकॉर्ड बनाने का फैसला कर लिया है. आज थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 6.68 प्रतिशत की बेचैन करनेवाली ऊंचाई पर पहुंच गई. हालांकि मुद्रास्फीति की ये दर महंगाई की वास्तविक तस्वीर नहीं बताती और हमेशा बदलती रहती है इसलिए सच्चाई से दूर रहती है.

 

सच ये है कि ग्रामीण मजदूरों और गरीबों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति दर फरवरी में ही 6.5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी थी. इसलिए जो लोग अब चौंककर 6.68 प्रतिशत की दर को हैरत से देख रहे हैं, कहना पड़ेगा कि उनका वास्तविकता से नाता टूट चुका है.

 

वास्तव में खाद्यान्नों और जरूरी वस्तुओं की महंगाई तो पहले ही कमर तोड़ रही है. सच ही है, "जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई". महंगाई को केवल आंकड़ा समझने वाले लोग कभी भी ये नहीं समझ पाएंगे कि महंगाई की चुभन क्या होती है?

 

कड़वी सच्चाई यह है कि महंगाई गरीबों पर टैक्स है. कल्पना कीजिए उन गरीबों के बारे में जिनके बारे में नीतीश सेनगुप्ता समिति ने कहा है कि तीन चौथाई आबादी 20 रुपए रोज से भी कम आय पर गुजारा करती है. उसके लिए महंगाई का मतलब एक जून भूखे पेट सोना है. महंगाई को आंकड़ें में देखने वाले उस पीड़ा को कभी नहीं समझ पाएंगे.

 

यूपीए सरकार का व्यवहार ऐसे ही आंकड़ेंबाजों की तरह है. वो तब तक आराम से सोती रही जब तक कि महंगाई की दर 5.92 तक नहीं पहुंच गई. इसके बाद आनन-फानन में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कई ऐलान कर दिए. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. महंगाई का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका था.

 

इसके बाद जैसे-जैसे वित्तमंत्री हनुमान की तरह महंगाई को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, महंगाई की सुरसा अपना बदन उससे ज्यादा तेजी से बढ़ाती जा रही है. अभी पिछले सप्ताह मुद्रास्फीति की दर 5.92 प्रतिशत पहुंच गई थी और चुनावी चिंता में डूबे चिदंबरम ने फटाफट महंगाई रोकने के लिए आयात शुल्क में कमी से लेकर कई वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था. लेकिन महंगाई यूपीए सरकार के आर्थिक प्रबंधकों से काबू से बाहर निकल गई लगती है.

 

महंगाई इसलिए बढ़ी है क्योंकि यूपीए सरकार ने सब्सिडी खत्म करने के नाम पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करके खाद्यान प्रबंधन को बड़ी कंपनियों के हवाले कर दिया है. इसकी बड़ी वजह खुद सरकार की नीतियां हैं. दूसरे, सरकार ने मुनाफाखोरों, जमाखोंरों और कालाबाजारियों के आगे घुटने टेक दिए हैं.

 

अन्यथा वो मौजूदा स्थितियों का फायदा उठाने और मुनाफे के लिए महंगाई बढ़ाने और गरीबों का खून चूसने में जुटे मुनाफाखोर बड़ी कंपनियों पर लगाम कसने की कोशिश जरूर करती.

 

इसकी बजाय वो लाचार नजर आ रही है. जाहिर है कि कलयुग के हनुमान ने महंगाई की सुरसा के आगे समर्पण कर दिया है.

गुरुवार, मार्च 27, 2008

यूपीए की प्राथमिकताएं- दूसरी किस्त...

 
 
लेकिन इस छुपी हुई सब्सिडी पर कोई शोर नहीं मचाता है. इसे स्वाभाविक और अमीरों का जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया गया है. लेकिन डेढ़ दशक में एक बार कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की 60 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी पर आसमान सिर पर उठाने वाले इस तथ्य को छुपा जाते हैं कि हर साल कॉरपोरेट टैक्स, आयकर, आयात शुल्क और उत्पाद शुल्क करों में छूट और रियायतों के कारण केंद्रीय खजाने को वर्ष 2006-07 में 2,39,712 करोड़ रुपए और 2007-08 में 2,78,644 करोड़ रुपए का राजस्व गंवाना पड़ा है. ये आंकड़ें खुद वित्तमंत्री ने बजट पेश करते हुए 'परित्यक्त राजस्व का विवरण' शीर्षक वाली 37 पृष्ठों की रिपोर्ट में पेश किया है.
 
ये आंकड़ें चौंकाने वाले हैं. विभिन्न करों में छूटों और रियायतों के कारण वर्ष 2006-07 में गंवाया गया 2,39,712 करोड़ रुपए का राजस्व उस वर्ष सकल कर संग्रहण का लगभग 51 फीसदी था. इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र सरकार ने उस साल कुल जितना राजस्व इकट्ठा किया, उसके आधे से अधिक का राजस्व गंवा दिया. इसी तरह चालू वित्तीय वर्ष में भी लगभग 2,78,644 करोड़ रुपए का राजस्व कर छूटों और रियायतों में चले जाने का अनुमान है जो कुल कर संग्रह का लगभग 48 फीसदी बैठता है. ध्यान रहे कि राजस्व गंवाने का यह सिलसिला साल दर साल चला आ रहा है.
 
लेकिन अगर पिछले दो साल के गंवाए गए राजस्व को ही जोड़ दिया जाए तो यह रकम 5,18,356 करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है. यह रकम किसानों की कर्ज माफी की रकम की नौ गुना, खाद्य सब्सिडी की 16 गुना, खाद सब्सिडी की 17 गुना और कुल सब्सिडियों की आठ गुना रकम है.
 
कर छूटों और रियायतों का हाल यह है कि कॉरपोरेट क्षेत्र पर नियमानुसार टैक्स, ,सरचार्ज और सेस को मिलाकर 33.3 फीसदी की दर से कॉरपोरेट टैक्स लगना चाहिए लेकिन छूटों और रियायतों के कारण प्रभावी दर मात्र 20.60 प्रतिशत बैठती है. इसके बावजूद हर बजट से पहले सीआईआई, फिक्की, एसोचैम जैसे कॉरपोरेट क्षेत्र के लॉबी संगठन कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और छूट के लिए सरकार पर दबाव बनाने लगते हैं.
 
इतना ही नहीं, अगर सरकार कॉरपोरेट क्षेत्र, अमीर आयकरदाताओं, आयातकों, सेवा प्रदाताओं और कंपनियों से बकाया टैक्स वसूल ले तो कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए दोगुने-तिगुने से अधिक बजट आवंटन बढ़ाया जा सकता है. उदाहरण के लिए 65,524 करोड़ रुपए के विभिन्न कर विवादों में फंसे हुए हैं जबकि 33,768 करोड़ रुपए के कर विवाद न होने के बावजूद सरकार वसूल नहीं पा रही है. इस तरह कुल 99,293 करोड़ रुपए का टैक्स फंसा हुआ है जो वसूल लिया जाए तो कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश को कोई कमी नहीं रह जाएगी.
 
स्पष्ट है कि सरकार के पास संसाधनों की उतनी कमी नहीं है जितना की उसका रोना रोया जाता है. अबलत्ता, इच्छाशक्ति और प्राथमिकता का अभाव बजट में जरूर दिखाई पड़ता है. इसी का नतीजा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्रामीण विकास और ढांचागत क्षेत्र के विकास के लिए पैसे की कमी का रोना रोने वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में रक्षा बजट 2003-04 के 60,060 करोड़ रुपए से उछलता हुआ पांचवें बजट में 1,05,600 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. इस तरह पिछले चार वर्षों में रक्षा बजट में 45,548 करोड़ रुपए यानी कोई 76 फीसदी की रेकार्डतोड़ वृद्धि की गई है.
 
इससे यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं का पता चलता है. उदाहरण के लिए इस बजट में रक्षा के लिए आवंटित कुल 1,05,600 करोड़ रुपए में से लगभग 46 फीसदी रकम यानी 48 हजार करोड़ रुपए हथियारों और अन्य रक्षा साजो-सामान की खरीद के लिए रखे गए हैं. चालू वित्तीय वर्ष 2007-08 में इस मद में चिदंबरम ने 41,922 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. हालांकि संशोधित बजट में यह घटकर 37,705 करोड़ रुपए हो गया.
 
गौरतलब है कि पिछले चार वर्षों में हर रक्षा बजट में हथियारों की खरीद के लिए भारी रकम आवंटित की गई है. वर्ष 2004-05 से 2008-09 के बीच रक्षा बजट में अकेले हथियारों आदि की खरीद के लिए कुल 1,88,027 करोड़ रुपए की भारी राशि खर्च की गई है. इसकी तुलना में इसी अवधि में कृषि पर कुल 34,851 करोड़ रुपए, स्वास्थ्य पर 56,813 करोड़ रुपए और शिक्षा पर 1,11,143 करोड़ रुपए का योजना व्यय किया गया है.
 
इस तरह यूपीए सरकार ने इन पांच बजटों में अकेले हथियारों पर कृषि के योजना बजट का छह गुना, स्वाश्थ्य का चार गुना और शिक्षा बजट का डेढ़ गुने से अधिक खर्ज किया है. इस अवधि में शिक्षा और स्वास्थ्य का कुल आयोजना बजट 1,67,956 करोड़ रुपए रहा जो कि हथियारों पर खर्च की गई राशि से भी 20,071 करोड़ रुपए कम है.
 
साफ है कि यूपीए सरकार के लिए कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा की तुलना में हथियारों की खरीद ज्यादा महत्वपूर्ण प्राथमिकता रही. क्या हथियारों के प्रति यह उत्साह रक्षा सौदों में मिलने वाली दलाली के कारण था या मनमोहन सिंह सरकार खुद को वाजपेयी सरकार की तुलना में ज्यादा देशभक्त साबित करना चाहती थी ? कारण चाहे जो भी हों लेकिन यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं में हथियारों के प्रति अतिरिक्त अनुराग की कीमत कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य को चुकानी पड़ी है.
 
साफ है कि यूपीए सरकार ने 2004 में मिले जनादेश के मुताबिक अर्थनीति और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को बदलने का ऐतिहासिक मौका नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के प्रति पूर्ण समर्पण, कॉरपोरेट समूहों और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के प्रति अतिरिक्त प्रेम और हथियारों के प्रति अति उत्साह के कारण गंवा दिया.
 
जाहिर है कि इसकी भरपाई आखिरी समय में गरीब किसानों का 60 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ करके गंगा नहाने से नहीं हो पाएगी.

मंगलवार, मार्च 25, 2008

वेतन आयोग की सिफारिशों में गुम आम आदमी...

जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाले वेतन आयोग की सिफारिशें बदलते हुए आर्थिक परिदृश्य और नवउदारवादी अर्थनीतियों के अनुकूल ही है. इस वेतन आयोग के जरिए सरकारी महकमों के कॉरपोरेटीकरण की प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाया जा रहा है.
 
हालांकि वेतनमानों में बड़े कॉरपोरेट समूहों की तरह वृद्धि नहीं की गई है लेकिन उसकी दिशा और दर्शन उसी कॉरपोरेटीकरण के विचार से प्रभावित है.
 
आयोग का कहना है कि इन सिफारिशों को लागू करने से केंद्र सरकार पर वित्तीय वर्ष 2008-09 में लगभग 7,975 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा और वर्ष 2006 से बकाए के भुगतान में कोई 18,060 करोड़ रुपए का व्यय होगा.
 
केंद्र सरकार के चालीस लाख कर्मचारियों के वेतनमानों में बढ़ोत्तरी के लिहाज से यह कोई बड़ा बोझ नहीं है लेकिन जिस तरह से गुलाबी अखबारों ने इसको लेकर हाय-तौबा मचाया है, वह कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता.
 
छठे वेतन आयोग ने वेतनमान तय करते हुए इस बात का ध्यान रखा है कि सरकारी कर्मचारियों की संख्या में कटौती और विभिन्न वेतनमानों को एक-दूसरे में मिलाकर उनकी संख्या कम करने के जरिए सरकारी महकमों की "अतिरिक्त चर्बी" घटाई जाए. इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वेतन आयोग की सिफारिशों का कॉरपोरेट जगत ने खुलकर स्वागत किया है.
 
रिपोर्ट सौंपने के बाद जस्टिस श्रीकृष्ण ने कहा कि ये सिफारिशें पूरे देश के हित में हैं. संभव है कि ये सिफारिशें देश के हित में हों लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि देश के कुल श्रमिकों में से संगठित क्षेत्र के लगभग 8 फीसदी कर्मचारियों में आने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को इस आयोग से भले खुशी होगी लेकिन असंगठित क्षेत्र के करीब चालीस करोड़ कर्मचारियों में से 31.6 करोड़ मजदूर 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम की आय पर गुजर-बसर कर रहे हैं.
 
साफ है कि एक ओर निजी कॉरपोरेट क्षेत्र और दूसरी ओर कॉरपोरेट रंग में रंगते सरकारी क्षेत्र को मिल रहे तोहफे मुठ्ठी भर कर्मचारियों और अफसरों तक सीमित रह जाएंगे. समय आ गया है कि यूपीए सरकार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बारे में राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों पर भी अमल शुरू करे. अन्यथा यही माना जाएगा कि यूपीए सरकार के तोहफे उन्हीं संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों और अधिकारियों को मिल रहे हैं जिन्हें पहले से ही काफी लाभ दिया जाता रहा है.
 
यह सचमुच में बहुत अफसोस की बात है कि इस देश में प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय जहां लगभग तीस हजार रुपए के आसपास है वहीं केंद्र सरकार के सबसे निचले कर्मचारी की आमदनी एक आम आदमी के औसत आय के तिगुने से भी अधिक होगी. भारत सरकार के सचिव की सालाना आय एक आम भारतीय की औसत आय से 32 गुना होगी. यानी एक आम भारतीय की सालाना औसत आय और सरकार के सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे व्यक्ति के बीच 1:32  का फर्क होगा. क्या इसी तरह देश एक समतामूलक समाज की तरफ बढ़ेगा?
 
यह सब कहने का मकसद केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अफसरों की खुशी में विघ्न डालना नहीं है बल्कि उस विसंगति की ओर ध्यान खींचना है जो एक समतामूलक समाज की स्थापना और गांधी जी के इस मंत्र के विपरीत है कि "जब भी सरकार में बैठे आला अधिकार और मंत्री कोई फैसला करें तो वह सबसे कमजोर और गरीब भारतीय के चेहरे को याद करें और सोचें कि उनके इस फैसले से उसे क्या मिलने जा रहा है."
 
कहने की जरूरत नहीं है कि इस फैसले से केंद्र सरकार के कर्मचारियों को बकाए के भुगतान और तनख्वाहों के जरिए जो भारी-भरकम रकम मिलने जा रही है, वह परोक्ष रूप से डगडमगाती अर्थव्यवस्था और लड़खड़ाते औद्योगिक विकास के लिए वित्तीय उद्दीपन साबित होगी. संभवतः यही कारण है कि बात-बात में नाक-भौं सिकोड़ने वाले और वित्तीय घाटे की दुहाई देने वाले कॉरपोरेट जगत को भी सरकारी कर्मचारियों के वेतनमानों में वृद्धि से कोई शिकायत नहीं है.
 
आम आदमी का नारा देकर सत्ता में आई कांग्रेस और यूपीए सरकार की सबसे ज्यादा मेहरबानी समाज के सबसे ताकतवर वर्गों पर बनी हुई है. वेतन आयोग की सिफारिशें उसका ताजा नमूना है. इससे पहले बजट में वित्तमंत्री पी चिदंबरम करदाताओं को चार हजार से चौवालीस हजार के बीच की छूट दे चुके हैं. इन सबके बीच आम आदमी को क्या मिला, यह सवाल चुनावों की तैयारी कर रही यूपीए और कांग्रेस से जरूर पूछा जाएगा.
 
 
यूपीए की प्राथमिकताएं...दूसरी और आखिरी किस्त बुधवार को

रविवार, मार्च 23, 2008

यूपीए की प्राथमिकताएं: पहली किस्त...

कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने का सवाल उठाते ही वित्त मंत्रालय समेत आर्थिक सुधारों के तमम पक्षधर पैसे की कमी का रोना शुरू कर देते हैं. सिर्फ कृषि ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में संरचनागत ढांचे के विकास का मुद्दा हो या सामाजिक सेवाओं जैसे बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति, सफाई उपलब्ध कराने का मुद्दा या फिर गरीबी उन्मूलन और रोजगार गारंटी जैसे कार्यक्रमों के लिए जरूरी धन के आवंटक का प्रश्न, वित्तमंत्री वित्तीय घाटे को काबू में रखने की कानूनी बाध्यता और पैसे का टोटा बताकर कन्नी काटने लगते हैं.
 
उल्टे चिदंबरम का यह दावा है कि उपलब्ध संसाधनों  के बीच वे कृषि, ग्रामीण विकास, सामाजिक क्षेत्र और गरीबी उन्मूलन तथा रोजगार गारंटी जैसे कार्यक्रमों के लिए भारी रकम दे रहे हैं. यूपीए सरकार ने पिछले चार वर्षों में इन सभी के लिए बजट आवंटन में भारी वृद्धि की है.
 
वित्तमंत्री के दावे में कुछ हद तक सच्चाई है. लेकिन यूपीए सरकार इसी जनादेश और वायदे के साथ सत्ता में आई थी कि वह पिछले सवा दशक में कृषि, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों की जैसी उपेक्षा और अनदेखी हुई है, उसे वह न सिर्फ खत्म करेगी बल्कि इन सवालों को अर्थनीति और बजट के केंद्र में लाएगी.
 
यह सच है कि इन क्षेत्रों के लिए आवंटन बढ़ा है लेकिन खुद न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किए गए वायदों और जीडीपी के अनुपात में देखा जाए तो स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है. यूपीए सरकार से जैसी साहसिक और महत्वाकांक्षी पहल की उम्मीद थी, उस पर वह कतई खरा नहीं उतर सकी.
 
उदाहरण के लिए यूपीए के सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में से एक ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लीजिए. अगली एक अप्रैल से यह योजना देश के सभी जिलों में लागू होगी. लेकिन वित्तमंत्री ने इस योजना के लिए चालू वित्तीय वर्ष के 12 हजार रुपए की तुलना में वर्ष 2008-09 में 16 हजार करोड़ रुपए उपलब्ध कराए हैं. यह जीडीपी का महज 0.3 फीसदी है.
 
कहने की जरूरत नहीं है कि यह योजना जैसे-जैसे लोकप्रिय हो रही है, रोजगार मांगने वालों की संख्या बढ़ रही है. उसे देखते हुए 16 हजार करोड़ रुपए की रकम न सिर्फ नाकाफी है बल्कि बताती है कि यूपीए सरकार इस योजना को लेकर कितना अगंभीर है.
 
यही नहीं, इस 16 हजार करोड़ रुपए के प्रावधान में एक ट्रिक है. चिदंबरम ने संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना को समाप्त कर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में शामिल कर दिया है. इस तरह उसका चालू वित्तीय वर्ष का 3,420 करोड़ रुपए रोजगार गारंटी के 12 हजार करोड़ में जोड़ दिया गया है. साफ है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी के लिए वास्तविक अर्थों में सिर्फ 600 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई है.
 
दरअसल, चिदंबरम और मनमोहन सिंह सरकार नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी और उसके वित्तीय कठमुल्लावाद से बाहर आने को तैयार नहीं है. उल्लेखनीय है कि चिदंबरम ने यूपीए सरकार के सत्ता में आते ही पहले बजट से ठीक तीन दिन पहले एनडीए सरकार द्वारा पारित राजकोषीय घाटा और बजट प्रबंधन कानून को लागू करने का फैसला किया था.
 
यह कानून विश्व बैंक- मुद्रा कोष की दबाव और प्रेरणा से बना था जिसका उद्देश्य वित्तीय और राजस्व घाटे को जीडीपी की एक निश्चित सीमा के भीतर रखना है. यह कानून सरकार का हाथ बांधने वाला है. वित्तमंत्री इस कानून की दुहाई देकर कृषि से लेकर सामाजिक क्षेत्रों के लिए पर्याप्त बजट आवंटन करने से इनकार करते रहे हैं. चिदंबरम से सभी पांच बजट भाषणों में हर बार इस कानून के अनुसार वित्तीय घाटे और राजस्व घाटे को पूर्व निर्धारित सीमा में रखने के लिए अपनी पीठ ठोंकी गई है.
 
लेकिन विश्व बैंक और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए वित्तमंत्री ने राजकोषीय घाटा और बजट प्रबंधन कानून के प्रति जितनी प्रतिबद्धता दिखाई, वैसी श्रद्धा और उत्साह न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किए गए वायदों को पूरा करने में नहीं दिखाया है. इसता नतीजा सबके सामने है. कहने की जरूरत नहीं है कि अगर इस साल चुनाव न होते तो चिदंबरम ने जो थोड़ी दरियादिली दिखाई है, वह हरगिज नहीं दिखाते.
 
उस पर तुर्रा देखिए कि गुलाबी अखबारों और आर्थिक सुधारों के पैरोकारों सहित कॉरपोरेट जगत का एक बड़ा हिस्सा खुलकर किसानों की कर्ज माफी को लोकलुभावन बताकर उसकी आलोचना कर रहा है. उनका सुर कुछ ऐसा है जैसे 60 हजार करोड़ रुपए गटर में फेंक दिए गए हों. कहा जा रहा है कि इससे न सिर्फ सरकारी घाटे और बैंकों का हिसाब-किताब बिगड़ जाएगा बल्कि किसानों को कर्ज माफी की आदत लग जाएगी.
 
इसे कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे. जब बड़े कॉरपोरेट समूहों और औद्योगिक घरानों का बकाया कर्ज नॉन पफार्मिंग एसेट (एनपीए) बताकर माफ किया जाता है तो उसकी आलोचना में किसी की जुबान नहीं खुलती. याद रहे सरकारी बैंकों के कॉरपोरेट सेक्टर को दिए कोई 90 हजार करोड़ रुपए के कर्जे अब तक डूब चुके हैं.
 
इतना ही नहीं, अगर कॉरपोरेट क्षेत्र को करों में रियायतें और छूट दी जाए तो वह 'सही अर्थशास्त्र' है लेकिन रोजगार गारंटी जैसी कोई योजना, किसानों की कर्ज माफी और खाद्य सब्सिडी जैसे उपाय 'बुरे अर्थशास्त्र' में आते हैं. लेकिन क्या यह सच नहीं है कि कॉरपोरेट क्षेत्र, आयकरदाताओं, निर्यातकों, उपभोक्ताओं को दी जाने वाली कर रियायतें, छूटें और कटौतियां भी एक तरह की सब्सिडी ही है?
 
 
 
आगे दूसरी किस्त में....

शुक्रवार, मार्च 21, 2008

चिदंबरम की खेतीबारीः आखिरी किस्त...

 
 
यही नहीं, चिदंबरम ने बजट में राधाकृष्णा समिति की एक और महत्वपूर्ण सिफारिश को अनदेखा कर दिया है. समिति ने किसानों को कर्ज जाल में फंसने से बचाने के लिए कृषि उत्पादों की कीमतों में असामयिक और भारी गिरावट से बचाव हेतु मूल्य स्थिरीकरण और जोखिम उपशमन विधि स्थापित करने की सिफारिश की थी.
 
इससे उन किसानों को, जिन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण अक्सर नुकसान उठाना और ऋण जाल में फंसने के लिए मजबूर होना पड़ता है, काफी राहत मिल सकती थी. लेकिन वित्तमंत्री ने समिति के बजाय अपने अफसरों द्वारा तैयार आर्थिक समीक्षा की बात सुनी जिसने यह कहते हुए इस सिफारिश को खारिज कर दिया था कि निधि का अंतरराष्ट्रीय अनुभव सामान्यतः निराशाजनक रहा है.
 
यह तर्क हैरान करने वाला है. बिना आजमाए एक सिफारिश को इसलिए खारिज कर देना कि उसका अनुभव सामान्यतः निराशाजनक रहा है, मौके को चूक जाना है. इससे किसान बाजार की निर्मम शक्तियों की हाथ की कठपुतली बने रहेंगे. दरअसल, इस बजट की सबसे पड़ी कमी यही है. उसमें दूरदृष्टि नहीं है. वह कृषि संकट की जड़ पर प्रहार नहीं करता बल्कि तात्कालिक राहत देने की कोशिश करता है. वह कृषि संकट के गहरे मर्ज का इलाज करने के बजाय लक्षणों का इलाज करता दिखता है.
 
कृषि संकट के कारण किसान कर्ज में डूबा है, न कि किसान के कर्ज में डूबने के कारण कृषि संकट है. कर्ज माफ कर देने भर से कृषि क्षेत्र का वह व्यापक संकट दूर नहीं होगा जो आर्थिक समीक्षा के मुताबिक कृषि क्षेत्र की गतिशीलता खत्म होने के कारण पैदा हुई है.
 
यह गतिशीलता इसलिए खत्म हुई है क्योंकि कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश खासकर सार्वजनिक पूंजी निवेश उदारीकरण के पिछले 18 सालों में लगातार कम होता चला गया है. इस कारण सिंचाई सुविधाओं के अभाव से लेकर भूमि की बढ़ती अनुर्वरता, घटती उत्पादकता, नए बीजों-खाद-कीटनाशकों के अभाव जैसी स्थिति पैदा हो गई है. इसके साथ भूमि सुधार को कब का आधा-अधूरा छोड़ दिया गया.
 
हालांकि वित्तमंत्री ने बजट भाषण में दावा किया है कि यूपीए के कार्यकाल में कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश 2003-04 के सकल घरेलू उत्पाद के 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 2006-07 में 12.5 प्रतिशत हो गया है लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना में इसे बढ़ाकर 16 प्रतिशत करने की जरूरत है.
 
तथ्य यह है कि कृषि में पूंजी निवेश में जो मामूली वृद्धि दिखाई पड़ रही है, वह वास्तविकता कम और जीडीपी में धीमी वृद्धि का नतीजा ज्यादा है. यही नहीं, कड़वी सच्चाई यह है कि कुल पूंजी निवेश के अनुपात में कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश में एनडीए के शासनकाल के 8 फीसदी की औसत दर की तुलना में यूपीए के कार्यकाल में गिरकर यह 6 प्रतिशत रह गया है.
 
अफसोस की बात यह है कि पांचवें बजट में भी चिदंबरम ने कृषि क्षेत्र में योजना व्यय को बढ़ाने के मामले में कोई महत्वाकांक्षी पहल नहीं की है. कृषि मंत्रालय का योजना व्यय कुल केंद्रीय योजना व्यय का महज 3 फीसदी है. यह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं है.
 
हैरत की बात यह है कि सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण का योजना व्यय चालू वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान 507 करोड़ रुपए से घटाकर 411 करोड़ रुपया कर दिया गया है. असल में, नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय में कृषि क्षेत्र के साथ जिस तरह का उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया गया है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है.
 
आर्थिक सुधारों के पैरोकारों ने मान लिया था कि कृषि के बिना भी जीडीपी की ऊंची वृद्धि दर हासिल की जा सकती है. इसलिए उन्होंने अर्थव्यवस्था की तेज दौड़ रही गाड़ी को गांवों-खेतों को उबड़-खाबड़ रास्तों से निकालने के बजाय कृषि क्षेत्र को बाइपास करके निकल जाने की रणनीति को आगे बढ़ाया.
 
दोहराने की जरूरत नहीं है कि कर्ज माफी के धूमधड़ाके के बावजूद यह बजट भी इस प्रवृत्ति का अपवाद नहीं है. दरअसल, लोकलुभावन राजनीति और अर्थनीति की यही सीमा होती है. वह मूल समस्या को कभी नहीं छूती है लेकिन जाहिर यह करती है जैसे उसने समस्या हल कर दी हो.
 
सच यह है कि कृषि संकट गहराता जा रहा है. ताजा आर्थिक समीक्षा के मुताबिक देश में खाद्यान्नों के उत्पादन की बढ़ोत्तरी दर 1990-2007 के बीच गिरकर 1.2 प्रतिशत रह गई है जो जनसंख्या की 1.9 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोत्तरी दर से कम है.
 
वह दिन दूर नहीं जब यह संकट देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन जाएगा. इसके संकेत खाद्यान्नों और अन्य कृषि जिंसों की तेजी से बढ़ती कीमत से मिलने लगे हैं. साफ है कि कृषि और किसानों की उपेक्षा का अर्थ रोटी पर संकट को दावत है.

गुरुवार, मार्च 20, 2008

चिदंबरम की खेतीबारीः दूसरी किस्त....

 
वित्तमंत्री चिदंबरम शायद यह भूल गए कि आत्महत्या करने वाले और सबसे अधिक परेशान किसानों में पड़ी संख्या उन किसानों की है जिन्होंने सूदखोरों से असामान्य रूप से ऊंची दरों पर कर्ज ले रखा है. वित्तमंत्री मानें या न मानें लेकिन तथ्य यह है कि इन किसानों को बैंकों के बजाय सूदखोरों की शरण में इसलिए जाना पड़ा कि बैंकों से समय पर और बिना घूस दिए कर्ज लेना लगभग नामुमकिन है.
 
यह संस्थागत वित्तीय व्यवस्था की शर्मनाक विफलता है कि आजादी के 61 सालों बाद भी किसानों को उनका खून चूसनेवाले सूदखोरों से मुक्ति नहीं मिली है. चिदंबरम को इस विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए सूदखोरों के कर्जों से दबे किसानों को राहत देने के लिए भी रास्ता जरूर खोजना चाहिए.
 
ऐसा नहीं है कि इसका विकल्प नहीं है. कृषि मंत्री शरद पवार का यह कहना बिल्कुल जायज है कि किसानों को सूदखोंरो को पैसा लौटा देने से मना कर देना चाहिए. लेकिन क्या पवार को इसका नतीजा मालूम है? क्या वे और राज्य की पुलिस उन किसानों की मदद में आगे आएंगे जिन्हें सूदखोरों और उनके गुंडों का कोप झेलना पड़ेगा. रेहन में रखे कीमती समान गंवाने पड़ेंगे और भविष्य में आकस्मिक जरूरत पर पैसा नहीं मिल पाएगा?
 
दरअसल, सूदखोरों के कर्जों से राहत देने का एक रास्ता यह हो सकता है कि ऐसे सभी किसानों को बैंकों से मामूली लगभग 4 प्रतिशत की दर पर तत्काल कर्ज उपलब्ध कराया जाए जिससे वे सूदखोरों का पैसा वापस कर सकें. इसमें सरकार को 10 से 20 हजार करोड़ रुपया ब्याज सब्सिडी के रूप में देना होगा जो कि बहुत बड़ी रकम नहीं है.
 
चिदंमरम को यह फैसला करने में इसलिए भी हिचकिचाना नहीं चाहिए क्योंकि उन्होंने कर्ज माफी के लिए बजट से बाहर और अगले तीन वर्षों में बैंकों को पैसा लौटाने की बात कही है. 60 हजार करोड़ में 10 से 20 हजार करोड़ रुपया और जुड़ जाएगा तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा.
 
मुद्दा सिर्फ यह है कि सूदखोरों के कर्ज से दबे किसानों को भी राहत मिलनी चाहिए, उसका तरीका चाहे जो हो और पैसा चाहे जितना लगे. वित्तमंत्री इससे आंख नहीं चुरा सकते हैं. अगर वह सिद्धांततः इस तर्क से सहमत हैं कि इन किसानों को भी राहत मिलनी चाहिए तो व्यावहारिक और प्रक्रियागत कठिनाइयों को दूर करना मुश्किल नहीं है. सूदखोरों के आगे चिदंबरम की लाचारी चुभती है. क्या यह लाचारी इसलिए भी है कि सूदखोरों में कई कांग्रेसी नेताओं के भी नाम आए हैं?
 
लेकिन कर्ज माफी का यह फैसला कई और कारणों से भी आधा-अधूरा है. वित्तमंत्री ने किसानों की ऋणग्रस्तता पर गठित राधाकृष्णा समिति की दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया है. समिति की पहली सिफारिश यह थी कि सरकार को छोटे और गरीब किसानों के वित्तीय समावेशीकरण (फाइनांसियल इन्कलूजन) यानी उनकी बैंकों और दूसरी संस्थागत वित्तीय संस्थाओं तक पहुंच को सरल, सुगम और सुनिश्चित करना चाहिए.
 
लेकिन कृषि ऋण को दोगुना करने के दावों के बीच यह लक्ष्य अभी तक दिवास्वप्न बना हुआ है. वित्तीय उदारीकरण की हवा में मोटा मुनाफा कमा रहे बैंक ग्रामीण क्षेत्रों से दूर और गरीब किसानों और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं. दूसरी ओर, छोटे और गरीब किसानों को वक्त पर कर्ज देने में कोताही और भ्रष्टाचार के कारण सूदखोंरो की चांदी है.
 
तथ्य यह है कि वित्तमंत्री का कृषि ऋण को दोगुना करने का दावा हकीकत से परे और वित्तीय ट्रिक का नमूना है. हाल ही में, शोधकर्ता आर रामकुमार ने "इकॉनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 29 दिसंबर, 2007" में और सामाजिक कार्यकर्ता सुनील ने "जनसत्ता" में यह खुलासा किया कि कृषि ऋण के दोगुना होने में सबसे बड़ी भूमिका कृषि को दिए जाने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्तीय ऋणों की परिभाषा बदलने ने निभाई है. इससे वास्तव में छोटे, सीमांत और गरीब किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है. उनकी कीमत पर इसका फायदा धनी किसान, एग्री बिजनेस कंपनियां, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां आदि उठा रही हैं.
 
 
 
 
तीसरी और आखिरी किस्त अगले दिन...

बुधवार, मार्च 19, 2008

चिदंबरम और खेतीबारीः पहली किस्त...

यूपीए सरकार के पांचवें बजट को लोकलुभावन और चुनावी माना जा रहा है. इसमें कोई बुराई नहीं है. हर बजट राजनीतिक होता है और होना चाहिए. बजट से यह पता चलता है कि उस सरकार की राजनीति क्या है? सवाल यह है कि यूपीए सरकार के आखिरी बजट की राजनीति क्या है?
 
अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि यह बजट राजनीतिक अवसरवाद का एक और उदाहरण है. चिदंबरम के पिछले चार बजटों और इस बजट में कुछ समानताओं को छोड़कर सबसे बड़ा फर्क यह है कि जहां पिछले सभी बजट नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी और वित्तीय कठमुल्लावाद की राजनीति में पगे थे, वहीं पांचवां बजट आगामी आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए आम आदमी खासकर किसानों को कुछ राहत और मध्यवर्ग को रियायतें देने की कोशिश करता है.
 
कहने की जरूरत नहीं है कि पी. चिदबरम ने दिल पर पत्थर रखकर चुनाव वर्ष होने के कारण अपवाद के बतौर इस साल थोड़ी दयानतदारी दिखाने की कोशिश की है. यह अवसरवाद है. उनकी मंशा पर शक इसलिए हो रहा है कि उन्हें आम आदमी खासकर किसानों की याद पिछले चार वर्षों में क्यों नहीं आई और अचानक इस साल ऐसा क्या हो गया कि उनकी झोली खुल गई?
 
जाहिर है कि इस साल चुनाव हैं और यूपीए किसानों, गरीबों, दलितों और मुसलमानों के सबसे बड़े हमदर्द के रूप में चुनाव में जाना चाहती है. वित्तमंत्री की यही मजबूरी है कि देश में कर पांच साल में चुनाव होते हैं और चुनाव में आम आदमी का वोट निर्णायक बना हुआ है. इस कारण सरकारों को पांच सला में कम से कम एक बार उसे याद करना पड़ता है.
 
लेकिन उसमें ईमानदारी कम और चालाकी अधिक होती है. उदाहरण के लिए इस बजट के सबसे चर्चित छोटे और सीमांत किसानों की पूरी और अन्य किसानों की एक चौथाई कर्ज माफी के प्रावधान को ले लीजिए. इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह बेहद जरूरी और पिछले कई वर्षों से लंबित फैसला था जिसका खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए.
 
अफसोस की बात सिर्फ यह है कि मनमोहन सिंह सरकार को यह फैसला लेने में चार साल लग गए. इस बीच, हजारों किसानों को कर्ज के बोझ तले आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अगर चिदंमरम ने चार पहले जनादेश और 'कृषि क्षेत्र को नई डील' के वायदे के मुताबिक यह फैसला ले लिया होता तो न सिर्फ हजारों किसानों की जान बच जाती बल्कि उनकी ईमानदारी और सदाशयता पर कोई ऊंगली नहीं उठती कि चुनाव वर्ष में उन्हें किसानों की सुध आई है.
 
यहीं नहीं चार साल बाद किसानों की सुध आई भी तो वह आधी-अधूरी और एक सीमा से बाहर नहीं निकल पाई. हैरत की बात है कि जब यूपीए सरकार ने किसानों पर बैंकों के बकाया कर्ज को माफ करने का 'साहसिक' फैसला कर लिया तो उसी साहस के साथ एक कदम आगे बढ़कर गैर संस्थागत स्रोतों जैसे सूदखोंरो से लिए गए कर्ज को माफ करने में हिचकिचाहट क्यों हो गई?
 
वित्तमंत्री का यह कहना सही है कि ऐसा करने में कई व्यावहारिक समस्याएं हैं क्योंकि यह पता करना मुश्किल है कि गैर संस्थागत स्रोतों से किसने, किससे और कितना कर्ज ले रखा है? लेकिन क्या यह इतनी पड़ी समस्या है कि सूदखोंरो के शोषण से त्रस्त किसानों को कोई राहत ही नहीं दे सके?
 
 
 
 
दूसरी किस्त अगले दिन....

शनिवार, मार्च 01, 2008

78 फीसदी लोगों के लिए क्या है बजट में ?

कर्ज माफी का फैसला चार साल पहले क्यों नहीं...

 

लोकलुभावन बजट से चुनाव जीता जा सकता है...!!!

 

जैसी कि उम्मीद थी वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अगले आम चुनावों को ध्यान में रखकर एक लोकलुभावन बजट पेश किया है. इस बजट को 'पोलिटिकली करेक्ट' बनाने की पूरी कोशिश की गई है. बजट का सीधा उद्देश्य यूपीए के राजनीतिक आधार को खुश करना है. इसमें किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक और दलितों अल्पसंख्यक वर्गों को लुभाने का हरसंभव प्रयास किया गया है.

 

हालांकि लोकलुभावन बजट से चुनाव जीता जा सकता है, ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है. लेकिन लगता है कि यूपीए के कर्ता-धर्ता इस खुशफहमी में हैं कि अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में तोहफे बांटकर वे सत्ता की वैतरणी पार कर सकेंगे.

 

सच यह है कि यूपीए का आम आदमी बहुत समझदार और चतुर प्राणी है. उसे अच्छी तरह पता है कि चुनावों को देखकर वित्तमंत्री की यह दयानतदारी बिखरी है. अन्यथा चार साल तक विश्व बैंक और मुद्राकोष के दबाव में डूबे किसानों का ख्याल कैसे आया ? यह सवाल उठना बहुत जायज है कि किसानों की कर्ज माफी का फैसला इतना देर से क्यों आया ?  यह मुद्दा पिछले कई वर्षों से पहले एनडीए और बाद में यूपीए सरकार के सामने मुंह बाए खड़ा था.

 

सच यह है कि यूपीए सरकार किसानों की हालत सुधारने के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. उसमें खुद प्रधानमंत्री के शब्दों में 'कृषि क्षेत्र के लिए एक नई डील' का वायदा किया गया था. कहने की जरूरत नहीं है कि इस डील में किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा सबसे अहम था. लेकिन यूपीए को फैसला लेने में चार साल लग गए. इस बीच हजारों किसानों ने कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर ली. क्या यह फैसला पहले करके इन कीमती जानों को बचाया नहीं जा सकता था...?

 

यही नहीं, कर्ज माफी का यह फैसला आधा-अधूरा है. छोटे और सीमांत किसानों के बड़े हिस्से ने बैंकों के बजाय साहुकारों से कर्ज ले रखा है. इस कर्ज माफी से उन्हें कोई लाभ नहीं होने वाला है. इसके अलावा कर्ज माफी अपने आप में व्यापक कृषि संकट को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है. दरअसल, किसानों का कर्ज में डूबना कृषि संकट का मर्ज नहीं बल्कि उसका लक्षण है.

 

कृषि संकट कहीं ज्यादा गहरा और व्यापक है. खुद सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक कृषि क्षेत्र अपनी गतिशीलता खो चुका है. इसका बुनियादी कारण भूमि सुधार की विफलता से लेकर कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में भारी गिरावट है. इतना ही नहीं, एक तो करैला, दूजे नीम चढ़ा की तर्ज पर कृषि क्षेत्र को डब्लयूटीओ के तहत अंतरराष्ट्रीय बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है.

 

लेकिन कृषि की इन बुनियादी समस्याओं को हल करने के बजाय वित्तमंत्री ने किसानों की कर्ज माफी के जरिए एक तरह से फायर-फाइटिंग की कोशिश की है. अफसोस यह है कि इस बीच आग काफी फैल चुकी है. कर्ज माफी के छींटों से यह आग बुझने वाली नहीं है. कड़वी सच्चाई यह है कि यूपीए सरकार ने कृषि संकट को दूर करने के बेहतरीन मौके को गंवा दिया है. इन पांच सालों में बहुत कुछ हो सकता था लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने यह मान लिया था कि संकट इतना गहरा है कि उसे हल करना उसके वश की बात नहीं है.

 

कहने की जरूरत नहीं है कि यूपीए को मौका गंवाने की कीमत चुकानी पड़ेगी. बल्कि सच यह है कि कई विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और यूपीए के अन्य घटक दलों की हार से यही संकेत मिल रहा है. इसके बावजूद वित्तमंत्री ने बजट में विभिन्न वर्गों को लुभाने के लिए यूपीए सरकार की कई योजनाओं को भारी-भरकम रकम आवंटित करने का दावा किया है.

 

लेकिन सच इसके उलट है. यूपीए की सबसे महत्वाकांक्षी योजना- ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कानून के प्रति वित्तमंत्री की उपेक्षा इस बजट में भी साफ देखी जा सकती है. अगली 1 अप्रैल से यह योजना देश के सभी जिलों में लागू होनी है लेकिन इसके लिए वित्तमंत्री ने चालू वित्तीय वर्ष के 12 हजार करोड़ रुपए की तुलना में इस बजट में 16 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है.

 

साफ है कि योजना के प्रति चिदंबरम की कंजूसी इस बजट में भी बनी रही. इसी तरह सर्व शिक्षा अभियान के लिए बजट आवंटन में भी पिछले साल की तुलना में कोई खास फर्क नहीं है. खुद आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में शिक्षा पर जीडीपी का सिर्फ 2.84 प्रतिशत खर्ज किया जा रहा है जबकि न्यूनतम साझा कार्यक्रम में वायदा किया गया था कि शिक्षा पर जीडीपी का कम से कम छह प्रतिशत खर्च किया जाएगा.

 

स्वास्थ्य क्षेत्र को भी आवंटन में ऐसी ही कंजूसी दिखाई पड़ती है. हालांकि बजट भाषण में वित्तमंत्री ने ऐसा साबित करने की कोशिश की, गोया सरकार इन क्षेत्रों पर पूरी तरह से मेहरबान हो गई है.

 

कुछ इसी अंदाज में वित्तमंत्री ने आम आदमी के नाम पर आयकर देने वाले मध्यवर्ग को खुश करने के लिए कर योग्य आय की सीमा बढ़ाने का ऐलान किया है. इससे निश्चय ही मध्यवर्ग को थोड़ी राहत मिलेगी. लेकिन बढ़ती हुई महंगाई इस राहत को लीलती हुई दिख रही है.

 

मध्य वर्ग को करों में छूट देने के पीछे चिदंबरम का एक उद्देश्य यह भी है कि इससे होने बचत से बाजार में मांग बढ़ेगी जिसका लाभ उद्योगों को होगा. छठे वेतन आयोग को लागू करने के पीछे भी यही दोहरी मंशा काम कर रही है. इससे बाजार में मांग भी बढ़ेगी और दूसरे यूपीए वेतनभोगी सरकारी कर्मचारियों के वोटों की भी उम्मीद कर सकता है.

 

लेकिन आम आदमी के नाम पर मध्यवर्ग को खुश करते हुए चिदंबरम यह भूल गए कि असली आम आदमी कौन है ? खुद यूपीए सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह चौंकाने सच्चाई उजागर की थी कि इस देश के 78 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 20 रुपए से भी कम आय में गुजर-बसर करते हैं. इस बजट में उन 78 फीसदी लोगों के लिए क्या है..? क्या चिदंबरम को याद दिलाने की जरूरत है कि सरकारें बनाने और बिगाड़ने का काम यही 78 फीसदी आम आदमी करते हैं.

 

यह बजट इस मायने में निराश करता है कि एक बार फिर दरिद्रनारायण की घोर उपेक्षा हुई है. देश की आबादी का यह 78 प्रतिशत आम आदमी रोटी, रोजगार और शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए रोज जूझ रहा है.

 

महंगाई खासकर खाद्यान्नों की ऊंची कीमतों का इस वर्ग पर ऐसा असर पड़ा है कि जाने-माने अर्थशास्त्री मार्टिन रेवेलियन के मुताबिक गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों की तादाद 28 फीसदी से बढ़कर 31 फीसदी पहुंच गई है.

 

यानी 'समावेशी विकास' के मंत्र जाप के बावजूद तेज विकास दर का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा है. गरीबी कम होना दूर, उल्टे महंगाई के कारण गरीबों की तादाद बढ़ रही है.

आर्थिक सर्वेक्षण का राजनीतिक अर्थशास्त्र...

चुनावों से पहले कांग्रेस वामपंथियों से पीछा छुड़ाने की तैयारी में..?

 

ताजा आर्थिक सर्वेक्षण की मानें तो अर्थव्यवस्था के साथ सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है. उसके मुताबिक अर्थव्यवस्था की तस्वीर न सिर्फ गुलाबी है बल्कि उसका दावा है कि वह उच्च विकास दर के स्थायी दौर में पहुंच गई है.

चुनाव वर्ष होने के कारण यह स्वाभाविक भी है कि मनमोहन सिंह सरकार अर्थव्यवस्था की ऊंची विकास दर का श्रेय लेने की कोशिश करें. हालांकि सर्वेक्षण में यह तथ्य दबी जुबान से स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले वर्ष की तुलना में लुढ़ककर 8.7 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है.

 

यही नहीं, सर्वेक्षण में यह भी स्वीकार किया गया है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार नहीं हो रहा है. चालू वित्तीय वर्ष में कृषि विकास दर पिछले वर्ष के 3.8 प्रतिशत से गिरकर मात्र 2.6 फीसदी रह जाने का अनुमान है.

 

कृषि क्षेत्र की लगातार बद से बदतर होती स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-2007 के दौरान जब अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत की औसत दर से कुलांचे भर रही थी तो कृषि मात्र ढाई फीसदी की कछुए की विकास दर से घिसट रही थी.

 

स्थिति यह हो गई है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 2001-02 के 24 फीसदी से लुढ़कता हुआ चालू वित्तीय वर्ष में मात्र 17.5 फीसदी रह गया है. जिस कृषि क्षेत्र पर देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका निर्भर करती है, उसके हिस्से जीडीपी का मात्र 1/6 से भी कम आता है.

 

इसी तरह सर्वेक्षण मजबूरी में यह भी स्वीकार करता है कि उद्योग क्षेत्र के प्रदर्शन में भी गिरावट आई है. दूसरी ओर, वह बढ़ती महंगाई का भी जिक्र करता है. लेकिन अर्थव्यवस्था की इन सभी कमजोर पहलुओं के उल्लेख के बावजूद सर्वेक्षण का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है. उसका कहना है कि यह स्थिति बदल सकती है, बशर्ते सरकार व्यापक आर्थिक सुधारों का रास्ता साफ करे. कहने की जरूरत नहीं है कि यह कहते हुए ताजा आर्थिक सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था की रफ्तार में आई गिरावट को बहाना बनाकर सुधारों की अगली खेप लोगों के गले उतारना चाहता है.

 

यूपीए सरकार के पिछले चार सर्वेक्षणों की तुलना में ताजा सर्वेक्षण बहुत आगे बढ़कर व्यापक आर्थिक सुधारों की वकालत करता है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि फैक्ट्री कानून में संशोधन करके काम के घंटों को प्रति सप्ताह 48 घंटे से बढ़ाकर 60 घंटे कर दिया जाए. जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाकर 72 घंटे भी करने की सिफारिश की गई है बशर्ते प्रतिदिन दो अतिरिक्त घंटों के लिए ओवरटाईम दिया जाए.

 

यही नही वामपंथी दलों को चिढ़ाने वाले अंदाज में सर्वेक्षण में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 49 फीसदी तक बढ़ाने और चीनी, उर्वरक और दवा क्षेत्र को विनियंत्रित करने के साथ ही कोयला खनन क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है. इसके साथ ही पिछले दरवाजे से विनिवेश और निजीकरण की भी कोशिश की गई है. सर्वेक्षण का कहना है कि मुनाफे में चल रही सभी गैर-नवरत्न कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के लिए पांच से दस प्रतिशत शेयर बेचे जाने चाहिए.

 

यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि यूपीए सरकार का पांचवां आर्थिक सर्वेक्षण न्यूनतम साझा कार्यक्रम के दायरे को लांघते हुए ऐसी सिफारिशें करता है जो वामपंथियों के साथ-साथ उसके कई घटक दलों को भी मंजूर नहीं है. आखिर सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा होने के साथ-साथ सरकार की आर्थिक सोच और दर्शन की भी झलक देता है.

 

ऐसे में, सवाल यह है कि क्या यूपीए खासकर कांग्रेस चुनावों से पहले वामपंथियों से नाता तोड़ने की तैयारी में है. आज चिदंबरम के बजट से यह साफ हो जाएगा कि वामपंथी दलों और यूपीए की दोस्ती कितने दिन चलेगी....?

आर्थिक सर्वेक्षण: आर्थिक सुधारों के भारी डोज की सिफारिश...

क्या यूपीए वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने की तैयारी कर रही है?

 

ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने का मन बना लिया है. पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण में अमेरिका के साथ परमाणु करार समझौते की कामयाबी की उम्मीद जाहिर करके वामपंथी दलों को उकसाने का कोशिश की गई. और अब अपने पांचवें आर्थिक सर्वेक्षण में व्यापक आर्थिक सुधारों की वकालत के जरिए मनमोहन सिंह सरकार ने वामपंथी दलों को चिढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण में सिफरिश की गई है कि फैक्ट्री कानून में संशोधन करके मौजूदा प्रति सप्ताह 48 घंटे काम को बढ़ाकर प्रति सप्ताह 60 घंटे कर दिया जाए. इसका अर्थ यह हुआ कि यूपीए सरकार मौजूदा प्रतिदिन आठ घंटे काम के समय को बढ़ाकर दस घंटे करना चाहती है. यही नहीं, इसके साथ ही वह यह भी चाहती है कि मौसमी मांग को पूरा करने के लिए इसे प्रतिदिन बढ़ाकर बारह घंटे करने की इजाजत भी दी जाए. इन अतिरिक्त दो घंटों के लिए ओवरटाईम दिया जा सकता है.

 

कहने की जरूरत नहीं है कि वामपंथी पार्टियां इसे कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती हैं. यह सीधे-सीधे वामपंथी दलों को चुनौती देने की तरह है. लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण यहीं नहीं रुकता है. पिछले वर्षों से अलग इस साल वह आर्थिक सुधारों के पक्ष में न सिर्फ बहुत मुखर है बल्कि आक्रामक तरीके से उन्हें आगे बढ़ाने की सिफारिश करता है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण यह भी सिफारिश करता है कि बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया जाना चाहिए. उसका यह भी कहना है कि चीनी, उर्वरक और दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कर दिया जाना चाहिए. इसके साथ ही कोयला खनन के क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति दी जानी चाहिए.

 

सर्वेक्षण एक कदम आगे बढ़कर मुनाफा दे रही सार्वजनिक क्षेत्र की गैर-नवरत्न कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट करने के लिए पांच से लेकर दस फीसदी शेयर बेचने की सिफारि करता है. कहने की जरूरत नहीं है कि यह पिछले दरवाजे से विनिवेश और निजीकरण की वकालत है.

 

आश्चर्य की बात तो यह है कि वित्तमंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश आर्थिक सर्वेक्षण यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम की हदों को पार करते हुए व्यापक आर्थिक सुधारों की सिफारिश करता है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण सिर्फ  अर्थव्यवस्था के साल भर के कामकाज का लेखा-जोखा भर नहीं होता है. उसे किसी भी सरकार की आर्थिक सोच और दर्शन का प्रतिबिंब माना जाता है. ऐसे में, यह सचमुच हैरत की बात है कि ताजा आर्थिक सर्वेक्षण न्यूनतम कार्यक्रम को पूरी तरह से ठेंगा दिखाता नजर आता है.

 

सवाल यह है कि ताजा सर्वेक्षण के जरिए वित्त मंत्रालय क्या संदेश देना चाहता है ? यह माना जाता है कि बजट से ठीक पहले आर्थिक सर्वेक्षण आम बजट के लिए मंच तैयार करता है. परंपरा के अनुसार सर्वेक्षण में उठाए गए मुद्दों और सिफारिशों के अनुसार वित्तमंत्री को बजट तैयार करना चाहिए. लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि आज जब वित्तमंत्री आम बजट पेश करेंगे तो उस पर सर्वेक्षण का असर दिखाई देगा ?

 

क्या वह इसी धमाकेदार अंदाज में आर्थिक सुधारों के पैकेज को आगे बढ़ाएगा ? मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह संभव नहीं दिखाई देता. मनमोहन सिंह सरकार वामपंथी दलों से समर्थन पर टिकी है. उन्हें नाराज करके न तो सरकार चल सकती है और न ही बजट पास हो सकता है.

ऐसे में, इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि वित्तमंत्री के बजट में मौखिक रूप से आर्थिक सुधारों को बढ़ाने की बातें भले हों लेकिन व्यवहार में पिछले वर्षों की तरह ही सर्वेक्षण और बजट के बीच का फासला बना रहे.

 

उल्लेखनीय है कि पिछले चार आर्थिक सर्वेक्षणों में आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की सिफारिशों के बावजूद वित्तमंत्री ने बजट में इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाने से परहेज किया है. असल में, पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका आर्थिक सुधारों और उदारीकरण के पक्ष में माहौल बनाने का हो गया है. ताजा सर्वेक्षण भी इसका अपवाद नहीं है.

 

अर्थव्यवस्था को लेकर सर्वेक्षण पिछले वर्षों की तरह इस साल भी बमबम है. यूपीए सरकार ने अर्थव्यवस्था के मामले में एक बार फिर अपनी पीठ ठोंकी है. उसका दावा है कि इस बात में अब किसी को कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था उच्च वृद्धि दर के नए दौर में पहुंच गई है. 2003-04 के बाद जीडीपी की विकास दर सालाना औसतन आठ फीसदी से ऊपर पहुंच गई है. सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष 2007-08 में अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले वर्ष के 9.6 प्रतिशत की तुलना में गिरकर 8.7 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है.

लेकिन सर्वेक्षण के मुताबिक इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार को नौ फीसदी से ऊपर ले जाने के लिए सर्वेक्षण द्वारा सुझाए गए आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू किया जाए.

 

इस तरह सर्वेक्षण बहुत चालाकी के साथ अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार को तेज करने के बहाने आर्थिक सुधारों के पक्ष में राय बनाने की कोशिश करता है. यह सचमुच में बहुत हैरान करने वाला तर्क है कि अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार का श्रेय आर्थिक सुधारों को दिया जाता है. लेकिन वृद्धि दर में गिरावट का दोष सुधारों को आगे न बढ़ाने के मत्थे मढ़ दिया जाता है.

यहां कृषि क्षेत्र का उल्लेख करना जरूरी है. कृषि क्षेत्र आर्थिक सुधारों की मार झेल रहा है. सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.6 फीसदी रहने का अनुमान है. पिछले वित्तीय वर्ष 2006-07 में कृषि की विकास दर 3.8 फीसदी थी. यही नहीं, कृषि क्षेत्र की विकास दर में लगातार गिरावट के कारण सकल घरेलू उत्पाद
(जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान 2001-02 के 24 फीसदी से घटकर मात्र 17.5 फीसदी रह गया है.

 

इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी खराब है. उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि तमाम घोषणाओं और कार्यक्रमों के बावजूद सुधार तो दूर, स्थिति लगातार बद से बदतर होती जा रही है.

 

लेकिन सर्वेक्षणों में कृषि क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ पिटी-पिटाई बातों को दोहराने के अलावा कुछ नहीं है. इसी तरह चालू वित्तीय वर्ष में उद्योंग क्षेत्र की वृद्धि दर में गिरावट भी दर्ज की गई है. सर्वेक्षण के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में विनिर्माण-मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले वित्तीय वर्ष के 12 फीसदी की तुलना में घटकर 9.4 फीसदी रह गई है. लेकिन सर्वेक्षण में इसकी दवा भी आर्थिक सुधारों को ही बताया गया है.

 

तथ्य यह है कि उद्योग क्षेत्र, ढांचागत क्षेत्र के पर्याप्त विकास न होने, घरेलू मांग में गिरावट के साथ-साथ अमेरिकी मंदी से जूझ रहा है. अर्थव्यवस्था ही नहीं यूपीए सरकार के सामने भी सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती यह है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है.

 

बढ़ती महंगाई मनमोहन सिंह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से बहुत भारी पड़ सकती है. लेकिन सर्वेक्षण इसके लिए मौसमी, ढांचागत बदलाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों की कीमतों में वृद्धि को जिम्मेदार ठहराकर और उसका प्रबंधन रिजर्व बैंक के जिम्मे डालकर अपनी जवाबदेही से बच निकलता है.

 

अब देखना यह होगा कि आज बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री पी चिदंबरम कृषि की बदतर होती स्थिति को सुधारने और उद्योग क्षेत्र की मुश्किलों को हल करने के साथ महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय करते हैं  ? यही नहीं, उनके सामने चुनौती यह भी है कि वे अपने आर्थिक सलाहकारों द्वारा तैयार आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाए गए रास्ते पर चलने की हिम्मत कहां तक कर पाते हैं  ? अगर वह इस चुनौती पर खरे नहीं उतरते हैं तो यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि कथनी और करनी में इतना अंतर क्यों है ? उनके बजट से यह भी साफ हो जाएगा कि क्या सचमुच, यूपीए सरकार वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने का मन बना चुकी है....?