मंगलवार, जून 17, 2014

आर अनुराधा एक मुस्कुराती जिजीविषा का नाम था

अलविदा मित्र!
आर अनुराधा चलीं गईं. कैंसर से १७ साल लड़ीं और लड़ते-लड़ते ही गईं. उनसे एक मई को मिलकर आया था. बीमारी की उस हालत में भी जब शायद उनसे बहुत बैठा नहीं जा रहा था,वे अपने कमरे से चलकर आईं, थोड़ी देर कुर्सी पर बैठीं और हालचाल पूछा. चेहरे पर वही हल्की, स्मित और अनुराधा मुस्कान थी. 

मैं उन्हें उसी मुस्कुराहट से जानता था. कोई २० साल पहले जब उनसे पहली बार मिला था और अब इस आख़िरी मुलाक़ात तक उनकी उस मुस्कान में कोई अंतर नहीं आया था.

हाँ, इस बार चेहरे पर दर्द की लकीरें ज़रूर थीं. लेकिन उनपर डर या हताशा के चिन्ह नहीं थे. कैंसर के आख़िरी स्टेज में होते हुए भी उनके चेहरे पर अपनी कविताओं की नई किताब को लेकर संतोष का एक भाव था. 
 
हालाँकि ख़ुद मैं उनसे बात करते हुए आँखें नहीं मिला पा रहा था, गले में कुछ अटकता हुआ सा महसूस हो रहा था और एक
असहायता को बोध छाता जा रहा था.
 
लेकिन अनुराधा जी की जीजिविषा में कोई कमी नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि हम नहीं, वे हमें ढाँढस बँधा रही हैं. उनकी कविताओं की तारीफ़ की जिसपर उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट दौड़ गई. मेरा जैसे दिल डूबा जा रहा था.
 
जानता हूँ कि खुद गहरी पीड़ा में होने के बावजूद उन्होंने दिलीप जी को कहकर मुझे घर पर क्यों बुलाया था. मैं खुद उस दिन हाल की घटनाओं के कारण बहुत परेशान और तनाव में था. अकेला महसूस कर रहा था. अनुराधा स्वस्थ होतीं तो शायद खुद घर आतीं लेकिन अपनी बीमारी के उस हाल में भी दिलीप जी मैसेज करवा के मुझे बुलाया। कहा कुछ नहीं लेकिन मैं उनके व्यवहार में वह ढाँढस महसूस कर सकता था.
 
हालाँकि उनसे मेरी कोई गहरी दोस्ती नहीं थी. अलबत्ता कैंसर से उनकी अनथक लड़ाई, उनके उन अनुभवों की किताब, उनके लेखन-संपादन और सक्रियताओं के कारण अनेकों लोगों की तरह मैं भी उनका चुप्पा फ़ैन बन चुका था. हालाँकि उनसे मुलाक़ात या बातचीत बहुत कम ही हो पाती थी. लेकिन मन ही मन उनके हौसले और सक्रियता और दिलीप जी के धैर्य, दृढ़ता, निष्ठा और समर्पण का कायल था.
 
महीनों में कभी कहीं किसी सभा-सेमिनार या कार्यक्रम में मुलाक़ात हो जाती थी. इन बीस सालों में मैं तीन-चार बार उनके घर
गया और एक बार वे दिलीप जी के साथ मेरे यहाँ खाने पर आईं. उस दिन वे एक पेंटिंग भी दे गईं जो मेरे कमरे में हमेशा उनकी याद दिलाती है. कभी-कभार फ़ोन पर भी बात हो जाती थी. 
 
इसके बावजूद वे जब भी मिलीं, उसी अनुराधा मुस्कान के साथ मिलीं. वे एक मिसाल हैं जिनसे जीवन जीने का सलीक़ा सीखा जा सकता है.

वे अपने जीवन के हर मिनट की क़ीमत जानती थीं और उसे भरपूर जी कर गईं. वे पी.एचडी करना चाहती थीं, लेकिन कैंसर ने उन्हें वह मौक़ा नहीं दिया. उसे उन्हें यह मौक़ा देना चाहिए था. 
 
वे चली गईं लेकिन अपने लेखन, कामों, इरादों और जिजीविषा के साथ वे हमारे साथ हैं. वे हम में से हर उस औरत या मर्द में जीवित रहेंगीं जो जीवन को अपनी शर्तों पर और मुस्कुराहट के साथ जीता है और जो कैंसर के पार भी इंद्रधनुष देखता है.

अलविदा मित्र आर अनुराधा! 

शुक्रवार, जून 06, 2014

अटकलकारिता और फील गुड पत्रकारिता का युग

लेकिन ख़बरों के इर्द-गिर्द है आयरन कर्टेन और लुटियन पत्रकारिता मुश्किल में   

दिल्ली में मोदी सरकार आने के साथ न्यूज मीडिया खासकर चैनलों की ‘पत्रकारिता’ में कई बदलाव दिखने लगे हैं. इसका पहला सुबूत यह है कि राजधानी के धाकड़ रिपोर्टरों, सत्ता के गलियारों में दूर तक पहुंच रखनेवाले संवाददाताओं और सर्वज्ञानी संपादकों को मोदी मंत्रिमंडल के संभावित मंत्रियों और उनके विभागों के बारे में तथ्यपूर्ण सूचनाएं नहीं थीं.
इसकी भरपाई वे परस्पर विरोधी सूचनाओं और अटकलों से करने की कोशिश कर रहे थे. यहाँ तक कि ‘अच्छे दिन लौटने’ की उम्मीद कर रहे भाजपा बीट के रिपोर्टरों के पास भी अटकलों के अलावा कुछ नहीं था.
नतीजा यह कि चैनल-दर-चैनल और अख़बारों तक में सिर्फ अटकलें थीं. चैनलों पर घंटों नहीं बल्कि कई दिनों तक एंकरों, रिपोर्टरों और चर्चाकारों में संभावित मंत्रिमंडल और मंत्रियों के विभागों को लेकर जिस तरह की अटकलबाजी चलती रही, क्या वह न्यूज मीडिया में पत्रकारिता की बजाय ‘अटकलकारिता’ युग के आगमन का संकेत है?

ऐसा लगता है कि सत्ता में बदलाव के साथ न सिर्फ सूचनाओं के स्रोत बदल गए हैं बल्कि खुद भाजपा और मोदी सरकार के अंदर सूचनाओं खासकर नकारात्मक सूचनाओं के बाहर आने पर पर सख्त नियंत्रण का युग शुरू हो चुका है.

इस लिहाज से मंत्रिमंडल का गठन और विभागों का वितरण सूचनाओं के नियंत्रण और प्रबंधन के लिए खड़े किये जा रहे इस नए ‘लौह दीवार’ (आयरन कर्टेन) की पहली परीक्षा थी जिसमें वह न सिर्फ कामयाब रही बल्कि उसने लुटियन दिल्ली के उन धाकड़ पत्रकारों को ‘अटकलकारिता’ करने पर मजबूर कर दिया जो कल तक मंत्रिमंडल बनवाने के दावे किया करते थे.
यह उन धाकड़ पत्रकारों/संपादकों के लिए एक चुनौती है जिनकी ‘पत्रकारिता’ लुटियन दिल्ली के भवनों और बंगलों की गणेश परिक्रमा में फल-फूल रही थी. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे इस नए ‘आयरन कर्टेन’ से कैसे निपटें?
अफसोस यह कि इसका नतीजा सिर्फ अटकलकारिता में ही नहीं बल्कि ‘फील गुड पत्रकारिता’ के पुनरागमन में भी दिख रहा है. आश्चर्य नहीं कि इन दिनों चैनलों और अखबारों में नई सरकार के बारे में या तो गुडी-गुडी ‘खबरें’ चल रही हैं या उसे बिन मांगी सलाहें दी जा रही हैं या फिर सरकार के लिए कारपोरेट समर्थित एजेंडा तय किया जा रहा है.

लेकिन यह सिर्फ चैनलों और अखबारों और मोदी सरकार के बीच शुरूआती हनीमून का नतीजा भर नहीं है बल्कि सूचनाओं खासकर नकारात्मक सूचनाओं/ख़बरों के बाहर निकलने पर आयद आयरन कर्टेन और सूचनाओं के अनुकूल प्रबंधन की सुविचारित रणनीति का भी नतीजा है.

यह नए प्रधानमंत्री की कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा रहा है. आश्चर्य नहीं कि यह सरकार जहाँ एक ओर महत्वपूर्ण खासकर नकारात्मक सूचनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, वहीँ दूसरी ओर मीडिया को उदारतापूर्वक ‘खबरें’ और ‘विजुअल्स’ दी जा रही हैं.
ये वे फीलगुड ‘खबरें’ और ‘विजुअल्स’ हैं जिनमें वास्तविक और जनहित से जुड़ी जानकारी कम और पी.आर ज्यादा है.
असल में, सरकार के मीडिया मैनेजरों को अच्छी तरह से मालूम है कि 24X7 न्यूज चैनलों के दौर में चैनलों के पर्दे को भरना और उन्हें चर्चा के लिए विषय देना बहुत जरूरी है.
इसलिए सूचना के प्रवाह को रोकने के बजाय उसे नियंत्रित और प्रबंधित करने पर ज्यादा जोर है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों के कैमरों को प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मंत्रिमंडल की बैठकों तक पहुँच दी गई है और आधिकारिक तौर पर हर दिन चर्चा के लिए अनुकूल विषय भी दिए जा रहे हैं.

मजे की बात यह है कि चैनल बिना किसी जांच-पड़ताल और छानबीन के उसे लपककर अपनी अटकलकारिता और फील गुड पत्रकारिता से खुश हैं. सचमुच, अच्छे दिन आ गए हैं.             

('तहलका' के 15 जून के अंक में प्रकाशित टिप्पणी का असंपादित अंश)

बुधवार, जून 04, 2014

सड़कों पर बहता निर्दोषों का लहू

सड़क सुरक्षा पर 'चलता है/क्या फर्क पड़ता है' के रवैए के कारण हर साल लाखों लोगों की जान जा रही है   
 
ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में हुई असामयिक मृत्यु ने सड़क सुरक्षा और हर साल सड़क दुर्घटनाओं में हो रही लाखों निर्दोष लोगों की मौत के मुद्दे को फिर से बहस में ला दिया है.
देश में सड़क सुरक्षा के हाल का अंदाज़ा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि एक केन्द्रीय मंत्री की मृत्यु देश की राजधानी में हुई है जहाँ सड़क सुरक्षा के इंतजाम देश के अन्य हिस्सों की तुलना में कहीं बेहतर हैं.
इसके बावजूद इस साल राजधानी दिल्ली में सड़क हादसों में श्री मुंडे से पहले तक ६६७ लोगों की मौत हो चुकी है. वे ६६८वें व्यक्ति हैं जिन्हें दिल्ली की सड़क पर इस तरह से अपनी जान गंवानी पड़ी. इन ६६८ लोगों में से अधिकांश को हम नहीं जानते हैं.
लेकिन वे सिर्फ संख्या या सड़क दुर्घटना से संबंधित आंकड़े भर नहीं हैं. वे भी हम सभी की तरह जीते-जागते इंसान थे. जीवन से भरपूर वे भी किसी के पिता-भाई-बहन-माँ-बेटा-बेटी और सगे-संबंधी थे. उनके घरों और मुहल्लों में भी उनके जाने के बाद कई दिनों तक चूल्हे नहीं जलते हैं. अनेकों घरों में महीनों-सालों तक सिसकियाँ सुनाई पड़ती हैं. कई घर इन दुर्घटनाओं की मार से कभी नहीं उबर पाते हैं.
इसके बावजूद हम सब जानते हैं कि सड़क दुर्घटना के शिकार हुए मुंडे आखिरी इंसान नहीं हैं. हम-आप सभी यह जानते हैं कि अगर सड़क सुरक्षा और लोगों की सोच में रातों-रात क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया और मौजूदा हालत को बदलने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए तो मुंडे के बाद भी दिल्ली की सड़कों पर लोग ऐसे ही जान गंवाते रहेंगे. सड़क दुर्घटना में मारे जानेवाले लोगों की संख्या इसी तरह बढ़ती रहेगी.

इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जब आप यह टिप्पणी पढ़ रहे होंगे, उन १५ मिनटों में देश के किसी कोने में सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी होगी. सचमुच, देश की सड़कों पर आदमी की जान से सस्ती कोई चीज नहीं है.
लेकिन जब तक हम सड़क दुर्घटनाओं को नियति मानकर स्वीकार करते रहेंगे और ‘चलता है/क्या फर्क पड़ता है’ की मानसिकता से इन्हें देखते रहेंगे, कुछ नहीं बदलनेवाला है.  
यह सचमुच बहुत शर्मनाक और त्रासद है कि देश में हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं या अपाहिज हो जा रहे हैं लेकिन बड़े-लंबे-चौड़े-चमकते फोर और सिक्स लेन हाईवे के सपनों में डूबे देश में इन मौतों से कोई खलल नहीं पड़ रही है.

देश में जितनी बातें हाईवे और कारों/गाड़ियों के नए माडलों पर होती है, उसकी एक फीसद चर्चा भी सड़क सुरक्षा और लोगों को एक बेहतर, संवेदनशील और जागरूक ड्राइवर बनाने पर नहीं होती है.

निश्चय ही, सड़कों पर होनेवाली ज्यादातर दुर्घटनाएं इसलिए होती हैं कि हममें से अधिकांश लोगों को सड़क सुरक्षा के नियमों की कोई परवाह नहीं है, हमें अपनी और उससे ज्यादा दूसरों के जान की कोई चिंता नहीं है और ट्रैफिक पुलिस को नियमों और सड़क सुरक्षा से ज्यादा पैसे बनाने की फ़िक्र होती है.
लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि सड़कों के डिजाइन से लेकर गड्ढों और उनकी दयनीय हालत तक और सड़क सुरक्षा के ढीले-ढाले नियमों से लेकर सड़क दुर्घटना के घायलों को बेहतर और तत्काल चिकित्सा न मुहैया करा पाने तक ढांचागत-सांस्थानिक कारण भी हैं जिनके कारण भारतीय सड़कें खूनी बनी हुई हैं.

नतीजा हम सबके सामने है. सड़कों पर बेगुनाह इंसानों का खून बह रहा है और देश सड़कों पर होनेवाली मौतों में नए रिकार्ड बना रहा है.

साफ़ है कि हम इन दुर्घटनाओं और इसमें होनेवाली जन-धन के नुकसान से चेतने को तैयार नहीं है क्योंकि हम सब इसके शिकार नहीं हुए हैं. इसलिए हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन यही हाल रहा तो हमारा भी नंबर कभी न कभी आएगा.            

शुक्रवार, मई 30, 2014

अखिलेश सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है

उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए रास्ता साफ़ कर रही है समाजवादी पार्टी की सरकार
 
उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने लगता है कि हाल के लोकसभा चुनावों में करारी हार से कोई सबक़ नहीं सीखा है. ऐसा लगता है कि सबक़ तो दूर उसने प्रदेश के लोगों को सबक़ सिखाने का फ़ैसला कर लिया है.

प्रदेश से जिस तरह की चिंताजनक और दहला देनेवाली ख़बरें आ रही हैं, उससे लगता है कि अखिलेश यादव की न सिर्फ सरकार पर से पकड़ ख़त्म हो रही है बल्कि उसमें शासन करने की इच्छाशक्ति भी नहीं रह गई है. आश्चर्य नहीं कि वह लगातार ढलान पर फिसलती जा रही है. 

मुहावरे में जिसे कहते हैं कि पानी सिर पर से गुज़रने लगा है, वही उत्तर प्रदेश में हो रहा है. बदायूँ में दो दलित लड़कियों को जिस तरह से बलात्कार के बाद नृशंस तरीक़े से पेड़ पर लटका दिया गया, वह न सिर्फ शर्मनाक और दहलानेवाला है बल्कि ख़ुद मुख्यमंत्री ने जिस असंवेदनशील तरीक़े से एक महिला पत्रकार को जवाब दिया, वह बताता है कि ये घटनाएँ क्यों हो रही हैं?

याद कीजिए, चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद मुलायम सिंह ने बलात्कार क़ानून में बदलाव की यह कहते हुए वकालत की थी कि बच्चों से ग़लतियाँ हो जातीं हैं. 

साफ़ है कि सपा की राजनीति और सोच में वह समस्या है जिससे जातिवादी दबंगों-अपराधियों का हौसला बढ़ता है, पुलिस लाचार हो जाती है और जाति और क्षेत्र देखकर व्यवहार करती है और सरकार आँख बंदकर सोई रहती है.

बदायूँ में दलित लड़कियों के साथ जिस तरह का नृशंस और मध्ययुगीन व्यवहार हुआ है, वह अपवाद नहीं है
और न ही कुछ दबंगों का अपराध या ग़लती है बल्कि दलितों के साथ होनेवाले सामंती ज़ुल्मों के अंतहीन दुखांत का हिस्सा है.

नई बात सिर्फ यह है कि कल तक दलितों पर सामंती ज़ुल्म और बलात्कार की अगुवाई सवर्ण दबंग/गुंडे कर रहे थे, आज सत्ता मिलने के बाद इस क़तार में मध्यवर्ती जातियों के दबंग और लफ़ंगे भी शामिल हो गए हैं. 

मुलायम सिंह के कभी-कभी ग़लती करनेवाले बच्चे यही हैं. अफ़सोस यह है कि यह सरकार ख़ुद को लोहिया, जयप्रकाश और नरेंद्रदेव के समाजवादी राजनीति की वारिस बताती है. अफ़सोस अखिलेश यादव के लिए होता है जिनसे लोगों को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन वे उम्मीदें दो साल के अंदर ही धूसरित होती दिख रही हैं. लेकिन इसके लिए कोई और नहीं बल्कि वे ख़ुद, उनका परिवार और पार्टीगण ज़िम्मेदार हैं. 

कहने की ज़रूरत नहीं है कि अखिलेश यादव सरकार की नाकामियां और ग़लतियाँ राज्य में भाजपा की पुनर्वापसी के लिए ज़मीन और रास्ता तैयार कर रही हैं.

एक सेक्युलर सरकार सांप्रदायिक ताक़तों के लिए कैसे जगह बनाती है, इसका एक और उदाहरण उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है.

अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कोई सरकार सिर्फ चुनाव में हार से बौखलाकर प्रदेश की जनता को सबक़ सिखाने और घंटों बिजली कटौती का फ़ैसला करती? 

लेकिन कोई क्या करे जब सरकार अपने पैर पर इसलिए कुल्हाड़ी मारने पर उतारू हो कि इससे उन लोगों को भी दर्द होगा जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया.

अफसोस दूसरे के दुख में मज़ा लेने की यह राजनीति अखिलेश यादव और सपा को बहुत दूर तक नहीं ले जा पाएगी. वह सिर्फ सैफ़ई और मैनपुरी तक सीमित रह जाएगी, जैसाकि इन चुनावों में हुआ.

अखिलेश सरकार के रंग-ढंग जल्दी नहीं बदले तो उसके लिए कार्यकाल पूरा करना भी मुश्किल हो जाएगा। उनका समय तेजी से खत्म हो रहा है लेकिन सपा नेतृत्व इस मुगालते में है कि अभी उसके तीन साल बचे हुए हैं।

उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि जिस राजनीतिक ढलान पर वे तेजी से फिसल रहे हैं, वहां से उन्हें रसातल में पहुँचने में
देर नहीं लगेगी। वैसे अभी भी मौका है लेकिन सरकार के तौर-तरीकों से लगता नहीं है कि वह इसका इस्तेमाल कर पाएगी।

उसने लगता है कि उत्तर प्रदेश तश्तरी में रखकर भाजपा को देने का फैसला कर लिया है. प्रदेश में भारी जीत से उत्साहित भाजपा अखिलेश सरकार की छोटी-बड़ी गलतियों को मुद्दा बनाकर सड़क पर उतर रही है. वह सरकार को चैन से नहीं रहने देगी। केंद्र की सरकार भी सपा सरकार को घेरने और उसे परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी।

दूसरी ओर, नौकरशाही भी हवा का रुख भांपकर हाथ खड़े करने लगेगी और उससे काम करना मुश्किल होता जाएगा। वह सरकार को मुश्किल में डालने के लिए ख़बरें भी लीक करेगी। ऐसी हालत में अखिलेश सरकार एक 'लैम-डक' सरकार बन जाने की आशंका दिन पर दिन बढ़ती जा रही है.     

क्या यही हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ है?

हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ में पत्रकारों की घुटन बढ़ी है

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष

क्या १८८ साल की भरी-पूरी उम्र में कई उतार-चढाव देख चुकी हिंदी पत्रकारिता का यह ‘स्वर्ण युग’ है? जानेमाने संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने बहुत पहले ८०-९० के दशक में ही यह एलान कर दिया था कि यह हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्ण युग’ है. बहुतेरे और भी संपादक और विश्लेषक इससे सहमत हैं.
उनका तर्क है कि आज की हिंदी पत्रकारिता हिंदी न्यूज मीडिया उद्योग के विकास और विस्तार के साथ पहले से ज्यादा समृद्ध हुई है. उसके प्रभाव में वृद्धि हुई है. वह ज्यादा प्रोफेशनल हुई है, पत्रकारों के विषय और तकनीकी ज्ञान में वृद्धि हुई है, विशेषज्ञता के साथ उनके वेतन और सेवाशर्तों में उल्लेखनीय सुधार आया है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है.
हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ के पक्षधरों के मुताबिक, न्यूज चैनलों की लोकप्रियता, विस्तार और प्रभाव ने बची-खुची कसर भी पूरी कर दी है क्योंकि वहां हिंदी न्यूज चैनलों का ही बोलबाला है. हिंदी न्यूज चैनलों और कुछ बड़े हिंदी अखबारों के संपादक/एंकर आज मीडिया जगत के बड़े स्टार हैं. उनकी लाखों-करोड़ों में सैलरी है.

इसके अलावा हिंदी न्यूज चैनलों के आने से पत्रकारों के वेतन बेहतर हुए हैं. उनका यह भी कहना है कि दीन-हीन और खासकर आज़ादी के बाद सत्ता की चाटुकारिता करनेवाली हिंदी पत्रकारिता के तेवर और धार में भी तेजी आई है. आज वह ज्यादा बेलाग और सत्ता को आईना दिखानेवाली पत्रकारिता है.

इसमें कोई शक नहीं है कि इनमें से कई दावे और तथ्य सही हैं लेकिन उन्हें एक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की जरूरत है. इनमें से कई दावे और तथ्य १९७७ से पहले की हिंदी पत्रकारिता की तुलना में बेहतर दिखते हैं लेकिन वे तुलनात्मक हैं.
दूसरे, इनमें से अधिकतर दावे और तथ्य हिंदी मीडिया उद्योग के ‘स्वर्णकाल’ की पुष्टि करते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि वे हिंदी पत्रकारिता के बारे में भी उतने ही सच हों. क्या हिंदी अखबारों का रंगीन होना, ग्लासी पेपर, बेहतर छपाई और उनका बढ़ता सर्कुलेशन या हिंदी चैनलों के प्रभाव और ग्लैमर को हिंदी पत्रकारिता के बेहतर होने का प्रमाण माना जा सकता है?
हिंदी पत्रकारिता को पहचान देनेवाले बाबूराव विष्णुराव पराडकर के आज़ादी के पहले दिए गए ‘आछे दिन, पाछे गए’ वाले मशहूर भाषण को याद कीजिए जिसमें उन्होंने आज से कोई ७५ साल पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि भविष्य के अखबार ज्यादा रंगीन, बेहतर कागज और छपाई वाले होंगे लेकिन उनमें आत्मा नहीं होगी.

सवाल यह है कि जिसे पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ बताया जाता है, उसके कई उल्लेखनीय और सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करने के बावजूद क्या यह सही नहीं है कि उसमें आत्मा नहीं है? 

अंग्रेजी के मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने कभी एक अच्छे अखबार की परिभाषा करते हुए कहा था कि, ‘अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता है.’ सवाल यह है कि क्या हमारे आकर्षक-रंगीन-प्रोफेशनल अखबारों और न्यूज चैनलों में देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है?
क्या आज की हिंदी पत्रकारिता में पूरा देश, उसकी चिंताएं, उसके सरोकार, उसके मुद्दे और विचार दिखाई या सुनाई देते हैं? कितने हिंदी के अखबार/चैनल या उनके पत्रकार पूर्वोत्तर भारत, कश्मीर, उडीसा, दक्षिण भारत और पश्चिम भारत से रिपोर्टिंग कर रहे हैं? उसमें देश की सांस्कृतिक, एथनिक, भाषाई, जाति-वर्ग, धार्मिक विविधता और विचारों, मुद्दों, सरोकारों की बहुलता किस हद तक दिखती है?
मुख्यधारा की यह हिंदी पत्रकारिता कितनी समावेशी और लोकतांत्रिक है? तात्पर्य यह कि उसमें भारतीय समाज के विभिन्न हिस्सों खासकर दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की कितनी भागीदारी है?

क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का एलान करते हुए यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि हिंदी क्षेत्र के कितने जिला मुख्यालयों पर पूर्णकालिक महिला पत्रकार काम कर रही हैं? कितने हिंदी अखबारों और चैनलों की संपादक महिला या फिर दलित या अल्पसंख्यक हैं? क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का मतलब सिर्फ पुरुष और वह भी समाज के अगड़े वर्गों से आनेवाले पत्रकार हैं?

यही नहीं, हिंदी अखबारों और चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों के वेतन और सेवाशर्तों में सुधार का ‘स्वर्णयुग’ सिर्फ चुनिंदा अखबारों/चैनलों और उनके मुठी भर पत्रकारों तक सीमित है. कड़वी सच्चाई यह है कि छोटे-मंझोले से लेकर देश के सबसे ज्यादा पढ़े/देखे जानेवाले अखबारों/चैनलों के हजारों स्ट्रिंगरों के वेतन और सेवाशर्तों में कोई सुधार नहीं आया है. वह अभी भी अन्धकार युग में हैं जहाँ बिना नियुक्त पत्र, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के वे काम करने को मजबूर हैं.
उन्हें सांस्थानिक तौर पर भ्रष्ट होने और दलाली करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. उनकी बदहाल हालत देखकर आप कह नहीं सकते हैं कि हिंदी अखबारों और चैनलों में बड़ी कारपोरेट पूंजी आई है, वे शेयर बाजार में लिस्टेड कम्पनियाँ हैं, उनके मुनाफे में हर साल वृद्धि हो रही है और वे ‘स्वर्णयुग’ में पहुँच गए हैं.
उदाहरण के लिए हिंदी के बड़े अखबारों की मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में आनाकानी को ही लीजिए. उनका तर्क है कि इस वेतन आयोग के मुताबिक तनख्वाहें दी गईं तो अखबार चलाना मुश्किल हो जाएगा. अखबार बंद हो जाएंगे. सवाल यह है कि अखबार या चैनल स्ट्रिंगरों की छोडिये, अपने अधिकांश पूर्णकालिक पत्रकारों को भी बेहतर और सम्मानजनक वेतन देने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?

क्या यह एक बड़ा कारण नहीं है कि हिंदी अखबारों/चैनलों में बेहतरीन युवा प्रतिभाएं आने के लिए तैयार नहीं हैं? आप मानें या न मानें लेकिन यह सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता के कथित ‘स्वर्णयुग’ के बावजूद हिंदी क्षेत्र के कालेजों/विश्वविद्यालयों के सबसे प्रतिभाशाली और टापर छात्र-छात्राएं इसमें आने के लिए तैयार नहीं हैं या उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं है.

दूसरी ओर, हिंदी अखबारों और चैनलों में बेहतर और सरोकारी पत्रकारिता करने की जगह भी दिन पर दिन संकुचित और सीमित होती जा रही है. आश्चर्य नहीं कि आज हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा संकट उसके पत्रकारों की वह प्रोफेशल असंतुष्टि है जो उन्हें सृजनात्मक और सरोकारी पत्रकारिता करने का मौका न मिलने या सत्ता और कारपोरेट के सामने धार और तेवर के साथ खड़े न होने की वजह से पैदा हुई है.
हैरानी की बात नहीं है कि हिंदी पत्रकारिता के इस ‘स्वर्णयुग’ में पत्रकारों की घुटन बढ़ी है, उनपर कारपोरेट दबाव बढ़े हैं और पेड न्यूज जैसे सांस्थानिक भ्रष्ट तरीकों के कारण ईमानदार रहने के विकल्प में घटे हैं.
यही नहीं, हिंदी पत्रकारिता की अपनी मूल पहचान भी खतरे में है. वह न सिर्फ अंग्रेजी के अंधानुकरण में लगी हुई है बल्कि उसकी दिलचस्पी केवल अपमार्केट उपभोक्ताओं में है. उसे उस विशाल हिंदी समाज की चिंताओं की कोई परवाह नहीं है जो गरीब हैं, हाशिए पर हैं, बेहतर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहते हैं. लेकिन मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता को उसकी कोई चिंता नहीं है.

क्या यही हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ है?

(समाचार4मीडिया वेबसाइट पर प्रकाशित यह टिप्पणी यहाँ भी पढ़ सकते हैं: http://www.samachar4media.com/Is-this-the-golden-era-of-hindi-journalism )