गुरुवार, अप्रैल 03, 2014

पत्रकारिता के नीरा राडिया काल में ‘निष्पक्षता’

नत्थी पत्रकारिता के खतरे   

न्यूज चैनल- ‘आज तक’ के एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल के बीच ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर न्यूज मीडिया और चैनलों पर सुर्ख़ियों में है.
अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं से लेकर कुछ न्यूज चैनल तक एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी पर पत्रकारिता की नैतिकता (एथिक्स) और मर्यादा लांघने का आरोप लगा रहे हैं. इस ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में वाजपेयी की केजरीवाल से अति-निकटता और सलाहकार जैसी भूमिका को निशाना बनाते हुए उनकी निष्पक्षता पर ऊँगली उठाई जा रही है.
आरोप लगाया जा रहा है कि वाजपेयी आम आदमी पार्टी की ओर झुके हुए हैं और चैनल के अंदर आप के प्रतिनिधि/प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि वाजपेयी भी आशुतोष जैसे कई पत्रकार-संपादकों की तरह हैं जो चैनल/अखबार में आम आदमी पार्टी के पक्ष में काम कर रहे हैं, खबरों के साथ तोडमरोड कर रहे हैं और पार्टी के अनुकूल जनमत बनाने के अभियान में शामिल हैं.

इस कारण केजरीवाल के साथ उनका इंटरव्यू ‘फिक्सड’ और पी-आर किस्म का है जिसका मकसद केजरीवाल की सकारात्मक छवि गढना है और जिसमें शहीद भगत सिंह तक को इस्तेमाल किया जा रहा है.

सवाल यह है कि क्या वाजपेयी और केजरीवाल की ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत सिर्फ एक स्वाभाविक
सौजन्यता/औपचारिकता या हद से हद तक एक तरह का बडबोलापन है या फिर इसे पत्रकारीय निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ समझौता माना जाए?
हालाँकि पत्रकारिता के नीरा राडिया और पेड न्यूज काल में पुण्य प्रसून और केजरीवाल की बातचीत काफी शाकाहारी लगती है लेकिन इसमें पत्रकारिता की नैतिकता, मानदंडों और प्रोफेशनलिज्म के लिहाज से असहज और बेचैन करनेवाले कई पहलू हैं. इस बातचीत में वाजपेयी किसी स्वतंत्र पत्रकार और नेता के बीच बरती जानेवाली अनिवार्य दूरी को लांघते हुए दिखाई पड़ते हैं.
दूसरे, पत्रकारिता और पी-आर में फर्क है और पत्रकार का काम किसी भी नेता (चाहे वह कितना भी लोकप्रिय और सर्वगुणसंपन्न हो) की अनुकूल ‘छवि’ गढना नहीं बल्कि उसकी सच्चाई को सामने लाना है.

असल में, किसी भी पत्रकारीय साक्षात्कार में पत्रकार-एंकर अपने दर्शकों का प्रतिनिधि होता है और इस नाते उससे अपेक्षा होती है कि वह साक्षात्कारदाता से वे सभी सवाल पूछेगा जो उसके दर्शकों को मौका मिलता तो उससे पूछते. याद रहे कि कोई भी पत्रकारीय इंटरव्यू पत्रकार और साक्षात्कारदाता खासकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय या पद पर बैठे नेता के बीच की निजी बातचीत नहीं है.

सच यह है कि जब कोई नेता अपने को इंटरव्यू के लिए पेश करता है तो इसके जरिये वह लोगों के बीच यह सन्देश देने की कोशिश करता है कि वह अपने विचारों/क्रियाकलापों में पूरी तरह पारदर्शी है, कुछ भी छुपाना नहीं चाहता है और हर तरह के सार्वजनिक सवाल-जवाब और जांच-पड़ताल के लिए तैयार है.
ऐसे में, पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह उस नेता से कड़े से कड़े और मुश्किल सवाल पूछे ताकि उसके विचारों/क्रियाकलापों से लेकर उसकी कथनी-करनी के बीच के फर्क और अंतर्विरोधों को उजागर किया जा सके. क्या पुण्य प्रसून वाजपेयी, केजरीवाल से इंटरव्यू करते हुए इस कसौटी पर खरे उतरते हैं?
इसका फैसला दर्शकों पर छोड़ते हुए भी जो बात खलती है, वह यह है कि ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में केजरीवाल कार्पोरेट्स और प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करने से बचने की दुहाई देते नजर आते हैं क्योंकि इससे मध्यवर्ग नाराज हो जाएगा.

लेकिन क्या यह वही अंतर्विरोध नहीं है जिसे इंटरव्यू में उजागर किया जाना चाहिए? यही नहीं, यह और भी ज्यादा चिंता की बात है कि वाजपेयी जैसा जनपक्षधर पत्रकार केजरीवाल को अपनी ‘क्रांतिकारी’ छवि गढ़ने के लिए भगत सिंह के इस्तेमाल का मौका दे.

कहने की जरूरत नहीं है कि यहीं से फिसलन की शुरुआत होती है जब कोई पत्रकार किसी नेता-पार्टी के साथ ‘नत्थी’ (एम्बेडेड) दिखने लगता है. 
('तहलका' के ३० मार्च के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)                                       

शनिवार, मार्च 22, 2014

क्यों पिछड़ा है बनारस और पूर्वांचल?

गुजरात के 'विकास' के लिए पूर्वांचल को सस्ते के बाड़े में बदल दिया गया है 
 
बनारस में गुजरात की तरह ‘विकास की गंगा’ बहाने के दावे और वायदे किये जा रहे हैं. बनारस के भाजपाईयों के साथ-साथ नव मोदी समर्थक भी शहर और पूर्वांचल को ‘विकास का स्वर्ग’ बनाने का सपना नशे की गोली की तरह बेच रहे हैं.

शहर में एक हवा बनाने की कोशिश की जा रही है कि अगर नरेन्द्र मोदी यहाँ से चुनाव जीतते हैं तो वे प्रधानमंत्री बनेंगे और इसके साथ ही, बनारस और पूर्वांचल का भाग्य बदल जाएगा क्योंकि बनारस वी.आई.पी संसदीय क्षेत्र होगा.

गोया प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होते ही बनारस और पूर्वांचल की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों और उन आर्थिक नीतियों में चमत्कारिक बदलाव आ जायेगा जिनके कारण यह क्षेत्र पिछले दो-ढाई सौ सालों से पिछड़ा, गरीब और बदहाल है.

नव मोदी समर्थक भले यह स्वीकार न करें लेकिन इस तथ्य पर वे कैसे पर्दा डाल सकते हैं कि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने या वी.आई.पी क्षेत्र होने मात्र से किसी क्षेत्र की बुनियादी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है?

अगर ऐसे ही बदलाव आना होता तो उत्तर प्रदेश की यह स्थिति क्यों होती, जहाँ से आठ प्रधानमंत्री बने? उन कथित वी.आई.पी संसदीय क्षेत्रों और उनके आसपास के इलाके इतने पिछड़े-गरीब और बदहाल क्यों होते?
पूर्व प्रधानमंत्रियों- जवाहरलाल नेहरु (फूलपुर, इलाहाबाद), इंदिरा गाँधी-राजीव गाँधी (रायबरेली), चरण सिंह (बागपत) वी.पी. सिंह (फतेहपुर), चंद्रशेखर (बलिया), अटल बिहारी वाजपेयी (लखनऊ) के चुनाव क्षेत्रों का हाल किसी से छुपा नहीं है.     
ऐसा क्यों है? उत्तर प्रदेश और खासकर पूर्वांचल और बनारस पिछड़े क्यों हैं? क्यों वहां इतनी गरीबी, बदहाली, गैर-बराबरी, बीमारी, बेकारी और बेचारी है? क्या यह किसी दैवीय कारण से है जो ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ की माला जपने और मोदी के दैवीय हस्तक्षेप से ही सुधर सकता है?
 
क्या यह सिर्फ मोदी के पहले के नेताओं की काहिली और अरुचि के कारण है जिसके कारण बनारस और पूर्वांचल का यह हाल है और जिसे मोदी का ‘निर्णायक नेतृत्व’ ही बदल सकता है?
सच यह है कि पूर्वांचल और बनारस का पिछड़ापन न तो दैवीय है, न नेतृत्व की कमी और उनके अंदर दृष्टि की कमी के कारण है. यह राजनेताओं की काहिली के कारण भी नहीं है. यह इस इलाके के लोगों की ‘कामचोरी’ और ‘राजनीति’ में अत्यधिक दिलचस्पी लेने के कारण भी नहीं है.

इसकी असली वजह वे पूंजीवादी नीतियां और सामंती ढांचा है जिनके कारण पूर्वांचल को जानबूझकर पिछड़ा-गरीब-लाचार बनाकर रखा गया है. लेकिन बनारस और पूर्वांचल को ‘विकास’ सपने बेच रहे नव मोदी समर्थक यह सच्चाई कभी नहीं बताएँगे. इसके बावजूद इसे समझना जरूरी है, अन्यथा बाद में सिर्फ निराशा और हताशा ही हाथ लगेगी.
असल में, पूंजीवादी आर्थिक ढांचे और अर्थनीति में औद्योगिक ‘विकास’ (बड़ी फैक्टरियां-कारखाने) यानी निजी पूंजी निवेश उन्हीं इलाकों में जाता है जो भौगोलिक-ऐतिहासिक-सामाजिक कारणों से पहले से ही विकसित हैं यानी जहाँ बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर है, बाजार है, कच्चा माल है और सस्ता और प्रशिक्षित श्रम उपलब्ध है.

इसके अलावा जहाँ कीमती खनिज-प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, वहां भी एक हद पूंजी निवेश हुआ है लेकिन ‘विकास’ कितना और कैसा हुआ है, यह वहां के लाभार्थी और ज्यादातर भुक्तभोगी ही बेहतर बता सकते हैं.
उदाहरण के लिए, गुजरात की समृद्धि या औद्योगिक विकास आज या पिछले दस-बारह सालों की नहीं है. गुजरात की भौगोलिक स्थिति (समुद्र तट और पश्चिम एशिया-यूरोप के साथ व्यापर के लिए जमीनी रास्ता) ऐतिहासिक रूप से व्यापार के लिए उपयुक्त रही है. अंग्रेजों ने इसे बढ़ावा दिया. इसके कारण ही, वहां व्यापार को फलने-फूलने मौका मिला, उससे पैदा अधिशेष उद्योग में निवेश का आधार बना और गुजरात के औद्योगिक विकास की नीव पड़ी.

आश्चर्य नहीं कि अंग्रेजों के औपनिवेशिक राज में देश के पश्चिमी हिस्से खासकर तटीय इलाकों और शहरों का औद्योगिक और व्यापारिक विकास हुआ. इसी तरह पूर्वी इलाके में भी कलकत्ता एक बड़े व्यापारिक और औद्योगिक केन्द्र के रूप में उभरा.
इस औपनिवेशिक पूंजीवादी आर्थिक माडल की दूसरी खास बात यह है कि उसने देश के अंदर कई इलाकों को ‘सस्ते श्रम के बाड़े’ के रूप में बदल दिया जहाँ से कलकत्ता के चटकालों से लेकर सूरत-मुंबई के सूती मिलों तक को सस्ते श्रम की निर्बाध आपूर्ति होती थी.
एक तरह से पूरी हिंदी पट्टी खासकर उत्तर प्रदेश-बिहार के अवध, पूर्वांचल से लेकर उत्तर और मध्य बिहार को सस्ते श्रम के बाड़े की तरह इस्तेमाल किया गया. इसका अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि अंग्रेज इन्हीं इलाकों से गिरमिटिया मजदूरों को मारीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना आदि उपनिवेशों में ले गए.

यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि इस इलाके के लोग ‘कामचोर’ नहीं है बल्कि बहुत मेहनती हैं. इन मेहनती सस्ते मजदूरों की सप्लाई बनी रहे, इसके लिए जानबूझकर इन इलाकों को पिछड़ा और गरीब बनाए रखा गया. यहाँ न तो भौतिक और न ही मानव (शिक्षा-स्वास्थ्य) इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश किया गया और न ही निजी पूंजी को प्रोत्साहित किया गया.

यही नहीं, अंग्रेजों ने इन इलाकों खासकर अवध, बुंदेलखंड, पूर्वांचल, पश्चिमी-उत्तरी बिहार को इसलिए भी पिछड़ा-गरीब बनाए रखा क्योंकि वे इस इलाके से १८५७ के पहले स्वतंत्रता संग्राम के कारण भी नाराज़ थे. वे इसे सजा देना चाहते थे और इसलिए इन इलाकों को नज़रंदाज़ किया. साफ़ है कि पूर्वांचल का पिछड़ापन, गरीबी, बीमारी, बेकारी और लाचारी किसी दैवीय कारण से नहीं बल्कि औपनिवेशिक राज और पूंजीवादी आर्थिक माडल का तार्किक नतीजा है.
अफ़सोस यह कि आज़ादी के बाद भी औपनिवेशिक विरासत में मिली पूंजीवादी आर्थिक विकास का माडल मिश्रित अर्थनीति और समाजवाद के नारों के बीच चलता रहा. इस कारण निजी पूंजी निवेश उन्हीं ‘विकसित’ इलाकों में गया जिन्हें अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक लूट की जरूरतों के लिए आगे बढ़ाया था.

नतीजा, औपनिवेशिक राज की तरह आज़ादी के बाद भी यह इलाका ‘सस्ते श्रम का बाड़ा’ बना रहा जहाँ से लाखों की संख्या में सस्ते श्रमिक बंगाल-गुजरात-महाराष्ट्र आदि के विकसित औद्योगिक इलाकों और बाद में पंजाब-हरियाणा के कृषि फार्मों की ओर पलायन करते रहे.
यह पूंजीवादी आर्थिक विकास के माडल की अनिवार्य परिणति है जहाँ देश के अन्दर एक बड़े इलाके को पिछड़ा-गरीब-लाचार रखकर कुछ सीमित इलाकों को औद्योगिक केंद्र के रूप में आगे बढ़ाया जाता है. हैरानी की बात नहीं है कि इस पूंजीवादी आर्थिक विकास माडल के नतीजे में पिछड़ेपन, विषमता, गरीबी और बीमारी-बेकारी के विशाल समुद्र में औद्योगिक समृद्धि के टापू दिखाई पड़ते हैं.

इसी का नतीजा है कि ‘विकसित’ गुजरात और महाराष्ट्र में भी पिछड़े-गरीब इलाके हैं. इस इलाकाई और क्षेत्रीय पिछड़ेपन की सिवाय इसके और कोई व्याख्या नहीं हो सकती है कि यह पूंजीवादी आर्थिक माडल का परिणाम है.
आश्चर्य नहीं कि सस्ते श्रम का बाड़ा बना दिए गए पूर्वांचल की अर्थव्यस्था मनीआर्डर से चलती रही है. कोढ़ में खाज की तरह १९९१ के नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के बाद तो स्थिति और बदतर हुई है क्योंकि अर्थव्यवस्था में सरकार/सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका लगभग खत्म हो गई है और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी ड्राइविंग सीट पर है.

स्वाभाविक तौर पर देशी-विदेशी पूंजी देश के पहले से विकसित क्षेत्रों- महाराष्ट्र-गुजरात-तमिलनाडु-दिल्ली आदि में जा रही है और इसके कारण देश के अन्दर इलाकों के बीच क्षेत्रीय विषमता और गैर बराबरी और तेजी से बढ़ रही है.  

यही नहीं, १९९१ से पहले सार्वजनिक क्षेत्र के कारण इक्का-दुक्का कारखाने-फैक्टरियां पिछड़े इलाकों और प्रधानमंत्रियों या वी.आई.पी संसदीय क्षेत्रों में लग भी जाती थीं लेकिन उत्तर उदारीकरण दौर में वह भी खत्म हो गया.

सवाल यह है कि इस पूंजीवादी आर्थिक विकास के माडल के तहत नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के घोर समर्थक मोदी के पास ऐसी कौन सी छड़ी है कि वे पूर्वांचल में चमत्कार कर देंगे और वहां रातों-रात देशी-विदेशी पूंजी निवेश के लिए दौड़ लगाने लगेगी?
क्या वे बनारस और पूर्वांचल के आर्थिक विकास के लिए पूंजीवादी आर्थिक विकास के माडल को पलट देंगे? या, उनके प्रभाव के कारण इस इलाके के विकास के लिए पूंजीवादी आर्थिक विकास के तर्क बेमानी हो जायेंगे? आखिर मोदी कैसे इस इलाके को सस्ते श्रम के बाड़े से औद्योगिक विकास के केंद्र में बदल देंगे?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि किसी नेता, चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो, उसके लिए निजी तौर पर इस दुष्चक्र को तोड़ना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए नीतियों में आमूल-चूल बदलाव जरूरी है.

उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की दो वी.आई.पी संसदीय क्षेत्रों- रायबरेली और अमेठी का हाल देखिये. क्या यू.पी.ए अध्यक्ष सोनिया गाँधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी अपने संसदीय क्षेत्रों में विकास नहीं चाहते हैं?

सच यह है कि उन दोनों ने कोशिशें कीं कि निजी पूंजी निवेश बढे लेकिन इक्का-दुक्का फैक्टरियों के अलावा कोई बड़ा उल्लेखनीय निवेश नहीं हुआ. यही नहीं, वे फैक्टरियां भी जल्दी ही बीमार हो गईं. क्यों? इसलिए कि बड़ा निजी देशी-विदेशी निवेश विकसित क्षेत्रों की ओर गया, यहाँ कोई बाजार नहीं था, विकसित इन्फ्रास्ट्रकचर नहीं था.
नतीजा, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनियों और सरकार की मदद से कारखाने-फैक्टरियां लगवाने की कोशिश करनी पड़ीं. रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री हो या मालविका स्टील को सेल के जरिये पुनर्जीवित करने का मसला हो, यह सार्वजनिक क्षेत्र या सरकार के सक्रिय पहल के कारण संभव हो पाया. लेकिन इससे ज्यादा और कुछ नहीं हो पाया.

नितीश कुमार को देख लीजिये. क्या नहीं किया उन्होंने निजी निवेश को लुभाने के लिए लेकिन निवेश सम्मेलनों और कथित गवर्नेंस-विकासोन्मुखी नीतियों के बावजूद वहां कोई बड़ा निजी निवेश नहीं आया. फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसा करेंगे कि निजी निवेशक गुजरात-महाराष्ट्र-तमिलनाडु-दिल्ली को छोड़कर पूर्वांचल और बनारस की ओर दौड़ने लगेंगे?
दोहराने की जरूरत नहीं है कि बनारस और पूर्वांचल के औद्योगिक विकास के लिए पूंजीवादी विकास के आर्थिक माडल को किनारे और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों से तौबा करना पड़ेगा? क्या मोदी इसके लिए तैयार हैं? क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की भी अधिकांश कंपनियों का पूर्ण या अर्द्ध निजीकरण हो चुका है और बाकी बची-खुची कंपनियों का निजीकरण मोदी के एजेंडे पर है.

इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन एन.डी.ए सरकार गोरखपुर के सार्वजनिक क्षेत्र के खाद कारखाने को बंद कर दिया था.

यह किसी से छुपा नहीं है कि मोदी उसी पूंजीवादी आर्थिक विकास के माडल और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पैरोकार हैं जिनके कारण बनारस और पूर्वांचल का यह हाल है और दिन पर दिन और बदतर होता जा रहा है. इन नीतियों के साथ बनारस और खासकर पूर्वांचल के भाग्य को बदलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.
इसके रहते बनारस और पूर्वांचल-बिहार सस्ते श्रम का बाड़ा बने रहने के लिए अभिशप्त हैं. मोदी के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है और न ही इतना राजनीतिक साहस कि वे इन नीतियों को पलट दें.

आखिर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स मोदी का समर्थन इन नीतियों को पलटने के लिए नहीं कर रहे हैं. लेकिन फिर भी मोदी के नव मोदी समर्थक बनारस के साथ-साथ पूर्वांचल और बिहार को विकास का दिवास्वप्न बेचने में लगे हैं और कई समझदार जागती आँखों से सपने देखने भी लगे हैं.

सभी तस्वीरें: बनारस की फोटो क्रेडिट: आनंद प्रधान  
       

शनिवार, मार्च 15, 2014

चैनलों के पर्दे पर उत्तर पूर्व

राष्ट्रीय मीडिया उत्तर पूर्व को एक खास “राष्ट्रवादी” वैचारिक खांचे में देखता है

अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की दिल्ली के पाश बाजार लाजपतनगर में नस्लीय हत्या और उसकी न्यूज मीडिया में कवरेज ने पिछले साल अक्टूबर में कोई पन्द्रह दिनों के लिए अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर की यात्रा की दिला दी. ईटानगर के पास रानो हिल्स स्थित राजीव गाँधी विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता पढ़ाने गया था.
वहीँ मीडिया खासकर न्यूज चैनलों पर चर्चा के दौरान एक छात्रा ने पूछा, ‘देश के बड़े और राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर उत्तर-पूर्व के राज्य और उनकी खबरें क्यों नहीं दिखाई पड़ती हैं?’ प्रश्न बहुत सीधा था और शायद उत्तर भी कि उत्तर-पूर्व नस्लीय भेदभाव का शिकार है.
हालाँकि उत्तर-पूर्व की रुटीन घटनाओं में राष्ट्रीय खबर बनने लायक न्यूज वैल्यू न होने से लेकर दिल्ली से दूरी जैसे तर्कों के जरिये विद्यार्थियों के सामने न्यूज चैनलों का पक्ष रखने की भी कोशिश की और खूब गरमागरम बहस भी हुई लेकिन सच यह है कि खुद इन कमजोर तर्कों से सहमत नहीं था.

ऐसा लग रहा था कि जैसे बहाने बना रहा हूँ और जिसका बचाव नहीं किया जा सकता है, उसका असफल बचाव करने की कोशिश कर रहा हूँ. सच यही है कि उत्तर-पूर्व दिल्ली के राष्ट्रीय न्यूज मीडिया में एक बारीक और कई बार बहुत नग्न और बर्बर किस्म की नस्लीय उपेक्षा और पूर्वाग्रहों का शिकार है.    

बात वहीँ खत्म नहीं हुई. उसके बाद से लगातार सोचता रहा कि आखिर हमारे राष्ट्रीय न्यूज चैनलों से उत्तर-पूर्व क्यों गायब है? क्या वह देश का हिस्सा नहीं है? क्या वहां की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक घटनाओं के बारे में देश के बाकी हिस्सों के लोगों को नहीं जानना चाहिए? वहां के लोग देश के बाकी हिस्सों से किसी मायने में कमतर हैं?

खुद उत्तर पूर्व के लोग राष्ट्रीय चैनलों में अपने इलाके और समाज को न देखकर क्या महसूस करते होंगे? बात-बात पर राष्ट्रभक्ति का राग अलापनेवाले चैनलों के लिए आखिर उत्तर-पूर्व के क्या मायने हैं और वह उनके न्यूज एजेंडा में कहाँ है?

तथ्य यह है कि जब कभी उत्तर-पूर्व चैनलों पर दिखता भी है तो वह किसी बड़े एथनिक नरसंहार या बम विस्फोट में बड़ी संख्या में मारे जाने या कन्फ्लिक्ट की किसी ऐसी बड़ी घटना के कारण दिखता है या फिर चीन की कथित घुसपैठ या अरुणाचल पर चीन के दावे या विभिन्न अलगाववादी आन्दोलनों और उनकी हिंसक कार्रवाइयों के कारण गाहे-बगाहे सुर्ख़ियों में दिख जाता है.

गोया उत्तर-पूर्व में एथनिक झगडों, अलगाववादी आन्दोलनों, तनावों, हत्याओं, नरसंहारों के अलावा और कुछ होता ही नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि इससे राष्ट्रीय मीडिया में उत्तर पूर्व की एक इकहरी छवि बन गई है जो नस्ली भेदभाव का ही विस्तार और उसे मजबूत करने में मदद करती है.   

इस अर्थ में दिल्ली में नीडो तानिया की नस्ली हत्या के लिए जमीन तैयार करने में न्यूज मीडिया की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. यह सच है कि नीडो की हत्या के मुद्दे को राष्ट्रीय न्यूज मीडिया में काफी जगह मिली. न्यूज मीडिया के एक बड़े हिस्से ने उत्तर पूर्व के लोगों के साथ राजधानी में नस्लीय भेदभाव को मुद्दा बनाया.
इससे सरकार, पुलिस-प्रशासन और राजनीतिक दलों पर दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में नस्लीय भेदभाव, छींटाकशी और हमलों के शिकार उत्तर पूर्व के लोगों खासकर विद्यार्थियों और युवा पेशेवरों को संरक्षण देने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का दबाव बढ़ा.
लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि नीडो तानिया की हत्या के मुद्दे को न्यूज मीडिया से पहले दिल्ली में रहनेवाले उत्तर पूर्व के युवाओं और सजग नागरिक समाज के एक हिस्से ने जोरशोर से उठाया. उनकी सक्रियता और लाजपतनगर थाने पर जोरदार प्रदर्शन के कारण न्यूज मीडिया खासकर चैनलों पर भी इसके कवरेज का दबाव बढ़ा.

इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले और प्रदर्शनकारियों के दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर केन्द्रीय मंत्रियों और नेताओं से मिलकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग ने नस्ली भेदभाव के मुद्दे को न सिर्फ जिन्दा रखा बल्कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को कार्रवाई और न्यूज मीडिया को कवरेज देने के लिए मजबूर किया.

अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर उत्तर पूर्व के युवाओं और दिल्ली के नागरिक समाज खासकर जे.एन.यू छात्रसंघ और आइसा सहित दूसरे वाम-जनवादी छात्र संगठनों ने राजधानी की सड़कों पर लगातार इस मुद्दे को उठाया नहीं होता और उत्तर पूर्व के लोगों के साथ वर्षों से जारी नस्ली भेदभाव, छींटाकशी और हमलों को मुद्दा नहीं बनाया होता तो क्या न्यूज मीडिया और चैनल इस मुद्दे को इतना कवरेज देते या नस्ली भेदभाव को मुद्दा बनाते?
अनुभव यही बताता है कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए राजधानी और देश के बाकी हिस्सों में उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव कोई मुद्दा नहीं रहा है. अगर रहा होता तो शायद नीडो की जान नहीं जाती.
असल में, दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव का मुद्दा एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिसे जानबूझकर अनदेखा किया जाता है या छुपाया-दबाया जाता है. यही नहीं, मीडिया और राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग के एक ‘राष्ट्रवादी’ हिस्से को लगता है कि उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव और छींटाकशी की सच्चाई को स्वीकार करने पर इसका फायदा उत्तर पूर्व के अलगाववादी समूह उठाएंगे.

इसलिए वह सच्चाई से अवगत होते हुए भी न सिर्फ उसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने से हिचकिचाता है बल्कि अक्सर उसे सख्ती से नकारने की कोशिश करता है. इसी तरह मीडिया और राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग के एक हिस्से को लगता है कि यह भेदभाव सिर्फ उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नहीं बल्कि दिल्ली में दक्षिण और मुंबई में बिहार-यू.पी आदि के लोगों के साथ भी होता है. इसी तर्क के आधार पर कुछ साल पहले तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव के आरोपों को नकारने की कोशिश की थी.

लेकिन नीडो तानिया की हत्या के बाद राजधानी में जिस बड़ी संख्या में उत्तर पूर्व के युवा सड़कों पर उतर आए और अपने गुस्से और पीड़ा का इजहार किया, उससे साफ़ है कि यह मामला सामान्य झगडे-मारपीट और हत्या का नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा गंभीर है. अगर यह एक सामान्य हत्या की घटना होती तो उत्तर पूर्व के हजारों युवा सड़कों पर नहीं उतर आते.
सच यह है कि नीडो तानिया की मौत एक ट्रिगर की तरह थी जिससे रोजमर्रा के जीवन में नस्ली भेदभाव, छींटाकशी और हमलों को झेलनेवाले उत्तर पूर्व को लोगों के दबे गुस्से और पीड़ा को फूटकर बाहर आने का मौका दिया.
कई स्वतंत्र संस्थाओं की रिपोर्ट्स इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करती है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेंटर फार नार्थ ईस्ट एंड पॉलिसी रिसर्च की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहनेवाले उत्तर पूर्व के ८१ प्रतिशत नागरिकों ने स्वीकार किया कि उन्हें कालेज, विश्वविद्यालय, बाजार और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर नस्लीय भेदभाव और छींटाकशी का शिकार होना पड़ता है.

इसके अलावा नार्थ ईस्ट सपोर्ट सेंटर और हेल्पलाइन की २००९ की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर पूर्व के ८६ फीसदी से ज्यादा लोगों को नस्ली भेदभाव और यौन उत्पीडन (सेक्सुअल हैरेसमेंट) का शिकार होना पड़ता है. इन रिपोर्टों से साफ़ है कि उत्तर पूर्व के लोगों को अपने ही देश और उसकी राजधानी में नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

इसके बावजूद न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों का एक हिस्सा इसबार भी नीडो तानिया की हत्या को नस्ली भेदभाव का मामला मानने से इनकार करते हुए इसे तात्कालिक उत्तेजना में हुए झगडे और मारपीट के मामले की तरह पेश करता रहा.
सबसे अफ़सोस की बात यह है कि शुरू में कई चैनलों और उनके रिपोर्टरों ने पुलिस के तोते की तरह नीडो की मौत को ‘मामूली मारपीट’ और ‘ड्रग्स के ओवरडोज’ जैसी स्टीरियोटाइप ‘स्टोरीज’ से दबाना-छुपाना चाहा.
लेकिन सलाम करना चाहिए उत्तर पूर्व के उन सैकड़ों छात्र-युवाओं और प्रगतिशील-रैडिकल छात्र संगठनों का जिन्होंने नीडो की नस्ली हत्या के बाद लाजपतनगर से लेकर जंतर-मंतर तक अपने गुस्से और विरोध का इतना जुझारू इजहार किया कि मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियों-नेताओं और सरकार-पुलिस-प्रशासन को उसे अनदेखा करना मुश्किल हो गया.  
अच्छी बात यह है कि न्यूज मीडिया और चैनलों के बड़े हिस्से ने इसे नस्ली भेदभाव के एक उदाहरण के रूप में पेश करते हुए मुद्दा बनाया. असल में, देश की राजधानी में उत्तर पूर्व के लोगों के साथ होनेवाला नस्ली भेदभाव एक ऐसा बर्बर और कड़वा सच है जिसे जानते सब हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के लिए कम ही तैयार होते हैं.

चाहे पुलिस-प्रशासन हो या मीडिया या फिर सिविल सोसायटी- सब अलग-अलग कारणों से उससे आँख चुराते हैं या बहुत दबी जुबान में चर्चा करते हैं. उन्हें इससे ‘देश की छवि’ से लेकर ‘उत्तर पूर्व में अलगाववादियों द्वारा भुनाने’ की चिंता सताने लगती है. लेकिन इससे समस्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है. 

विडम्बना देखिए कि दिल्ली और देश के अन्य राज्यों/शहरों में उत्तर पूर्व के लोगों को जिस तरह का नस्ली भेदभाव, उत्पीडन और अपमान झेलना पड़ता है, उसे मुद्दा बनाने और न्यूज मीडिया सहित नागरिक समाज की चेतना को झकझोरने के लिए अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया को अपनी जान देनी पड़ी.
हालाँकि नीडो नस्ली भेदभाव की कीमत चुकानेवाला पहला युवा नहीं है और स्थितियां नहीं बदलीं तो वह आखिरी भी नहीं है. हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि नीडो की हत्या का खून अभी सूखा भी नहीं था कि राजधानी के मुनिरका में मणिपुर की एक बच्ची के साथ बलात्कार और साकेत में एक युवा पर जानलेवा हमले का मामला सामने आ गया.
जैसे इतना ही काफी नहीं हो, इस घटना के बाद मुनिरका गांव की रेजिडेंट वेलफेयर एसोशियेसन ने बिलकुल खाप की तरह व्यवहार करते हुए उत्तर पूर्व के लोगों पर कई तरह की बेतुकी पाबंदियां आयद कर दीं. यही नहीं, मुनिरका के मकान-मालिकों ने उत्तर पूर्व के लोगों घरों से निकालने और उन्हें घर न देने का फैसला भी कर लिया.

हालाँकि इस फैसले पर हंगामे के बाद मुनिरका के स्थानीय मकान-मालिकों ने उत्तर पूर्व के लोगों के बारे में ऐसा कोई फैसला करने से इनकार करते दावा किया कि वे सिर्फ ‘नशा करने, हंगामा करने और रात को देर से घर लौटनेवालों’ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि उनके निशाने पर कौन है और क्यों?  

हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने बीच-बचाव की कोशिश की लेकिन मकान-मालिकों के फैसले के आगे अपनी विवशता भी जाहिर कर दी क्योंकि यह उनका ‘अधिकार’ है कि वे किसे किरायेदार रखें और किसे नहीं? सवाल यह है कि क्या यह नस्ली भेदभाव का एक और सुबूत नहीं है?
ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं लेकिन होता यह था कि या तो उन्हें दबा दिया जाता दिया जाता था या फिर उन्हें रुटीन अपराध के मामले मानकर निपटा दिया जाता था. नस्ली छींटाकशी और उपहास तो जैसे आम बात है. उत्तर पूर्व के लोगों के रहन-सहन और खान-पान से लेकर बात-व्यवहार के बारे में आम दिल्लीवालों में अनेकों भ्रामक धारणाएं, स्टीरियोटाइप्स और पूर्वाग्रह हैं.
यहाँ तक कि खुद पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का रवैय्या भी कम भेदभावपूर्ण नस्ली नहीं है. विभिन्न मामलों में दिल्ली पुलिस का व्यवहार भी उसी पूर्वाग्रह और स्टीरियोटाइप्स से संचालित होता रहा है. उदाहरण के लिए, दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्व के लोगों के बारे में स्थानीय लोगों को शिक्षित करने के बजाय उल्टे उत्तर पूर्व के लोगों के लिए दिल्ली में “क्या करें और क्या न करें” की लंबी सूची जारी की हुई है.

यही नहीं, जब चीन के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आ रहे थे तो दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्व के कई युवाओं को तिब्बती समझकर पकड़ लिया और थाने में बैठाए रहे. मामला सिर्फ दिल्लीवालों, दिल्ली पुलिस और प्रशासन तक सीमित नहीं है बल्कि सच यह है कि इस नस्ली भेदभाव की जड़ें काफी गहरी और व्यापक हैं और आम जनजीवन का कोई भी वर्ग और समूह इसके प्रभाव से बचा हुआ नहीं है.     

मीडिया भी इसका अपवाद नहीं है. राष्ट्रीय मीडिया खासकर न्यूज चैनल उत्तर पूर्व को एक खास “राष्ट्रवादी” वैचारिक खांचे में देखते हैं और उत्तर पूर्व के बारे में अपनी कवरेज में प्रचलित पूर्वाग्रहों और स्टीरियोटाइप्स को ही मजबूत करते हैं.
उदाहरण के लिए, अन्ना हजारे के अनशन को 24X7 कवरेज देनेवाले और उन्हें ‘महानायक’ बनानेवाले चैनलों ने मणिपुर में सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून के खिलाफ पिछले १४ साल से अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला की कितनी बार सुध ली?
यह सिर्फ एक उदाहरण है लेकिन उत्तर पूर्व में ऐसे अनेकों मामले/मुद्दे/घटनाएँ हैं जिन्हें राष्ट्रीय मीडिया ने या तो अनदेखा किया या फिर तोडमरोड कर पेश किया है.
लेकिन नीडो की मौत के बाद लगता है उत्तर-पूर्व के युवाओं का धैर्य जवाब देने लगा है. वे इसे और सहने के बजाय इससे लड़ने और चुनौती देने का मन बना चुके हैं. अच्छी बात यह है कि इससे चैनलों-अख़बारों से लेकर सिविल सोसायटी की अंतरात्मा भी जागी दिखती है. अगले कुछ महीनों में होनेवाले लोकसभा चुनावों के कारण नेताओं का दिल भी उत्तर पूर्व के लोगों के लिए फटा जा रहा है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्थिति बदलेगी या फिर कुछ दिनों बाद फिर किसी नीडो को जान देनी पड़ेगी? यह सवाल पूछना इसलिए जरूरी है क्योंकि उत्तर पूर्व के लोगों के साथ लंबे समय से जारी नस्ली भेदभाव के लिए एक खास सवर्ण हिंदू राष्ट्रवादी-मर्दवादी-नस्लवादी मानसिकता जिम्मेदार है जिसकी जड़ें पुलिस-प्रशासन से लेकर मीडिया तक में फैली हुईं है.

इसके शिकार सिर्फ उत्तर पूर्व के ही नहीं बल्कि सभी कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम-सिख और आदिवासी आदि हैं.

यह इतनी आसानी से खत्म होनेवाला नहीं है. इससे लड़ने के लिए न सिर्फ इस मानसिकता को चुनौती देने और एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है बल्कि नस्लभेद के उन सभी दबे-छिपे रूपों और स्टीरियोटाइप्स को खुलकर नकारना और सार्वजनिक स्थानों/मंचों को नस्ली रूप से ज्यादा से ज्यादा समावेशी बनाना होगा.
अपने न्यूज चैनलों को ही देख लीजिए, उनके कितने एंकर/रिपोर्टर उत्तर पूर्व के हैं? इन चैनलों पर उत्तर पूर्व की ख़बरों को कितनी जगह मिलती है? कितने चैनलों के उत्तर पूर्व में रिपोर्टर हैं? यही नहीं, मनोरंजन चैनलों पर कितने धारावाहिकों के पात्र या कथानक उत्तर पूर्व के हैं?
मनोरंजन से लेकर न्यूज चैनलों तक में उत्तर पूर्व के लोगों और इलाके के प्रतिनिधित्व और उनकी पूर्वाग्रहों से मुक्त प्रस्तुति का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि लोगों को शिक्षित करने और उनमें संवेदनशीलता पैदा करने में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है.

यह एक तथ्य है कि अधिकांश राष्ट्रीय चैनलों खासकर हिंदी न्यूज चैनलों के न्यूजरूम में उत्तर पूर्व के लोगों की संख्या नगण्य है, वे फैसले लेने की जगहों पर नहीं हैं और उत्तर पूर्व के राज्यों में उनके संवाददाता भी नहीं हैं.

यही नहीं, इन चैनलों के रिपोर्टर/संपादक शायद ही कभी उत्तर पूर्व के राज्यों की रिपोर्टिंग पर गए हों. आश्चर्य नहीं कि न्यूजरूम में ऐसे गेटकीपरों और रिपोर्टरों की संख्या बहुतायत में है जो कभी उत्तर पूर्व नहीं गए और वहां के बारे में सुनी-सुनाई बातों के आधार पर धारणाएं बना रखी हैं.

क्या नीडो की मौत के बाद न्यूज मीडिया अपने अंदर भी झांकेगा? क्या इस ‘पब्लिक स्फीयर’ में भी हम कुछ बदलाव की उम्मीद करें? 
('कथादेश' के मार्च'2014 अंक में प्रकाशित स्तम्भ)      

सोमवार, मार्च 10, 2014

आरोप-प्रत्यारोपों के लपेटे में चैनल

खेल में पार्टी बनते जा रहे चैनल आरोप-प्रत्यारोपों के उछलते कीचड़ से भला कब तक बचेंगे?

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और पार्टियों-नेताओं के लिए दांव ऊँचे होते जा रहे हैं, आपसी आरोप-प्रत्यारोप भी तीखे और व्यक्तिगत होने लगे हैं. न्यूज मीडिया हमेशा से ऐसे आरोप-प्रत्यारोपों का मंच और अखाड़ा बनता रहा है.
चुनावों के दौरान यह बहुत असामान्य बात नहीं है. न्यूज मीडिया खासकर चैनल इसमें खूब दिलचस्पी भी लेते रहे हैं. लेकिन इसबार पहली दफा खुद न्यूज मीडिया खासकर चैनल इन आरोप-प्रत्यारोपों के लपेटे में आ गए हैं. इससे चैनल बिलबिलाये हुए हैं.
हुआ यह है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी से लेकर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पूर्व सेनाध्यक्ष पलट नेता बने जनरल वी.के सिंह तक खुलेआम न्यूज मीडिया पर खुन्नस निकाल रहे हैं. यहाँ तक कि न्यूज के डार्लिंग समझे जानेवाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने तो न्यूज मीडिया खासकर चैनलों के खिलाफ पूरा मोर्चा ही खोल दिया है.

केजरीवाल का आरोप है कि कई मीडिया कंपनियों में मुकेश और अनिल अम्बानी का पैसा लगा हुआ है और इस कारण वे आम आदमी पार्टी और व्यक्तिगत तौर पर उनके खिलाफ अभियान झूठी ख़बरें दिखा और अभियान चला रही हैं.

दूसरी ओर, भाजपा नेताओं और मोदी समर्थकों का आरोप है कि अखबार और चैनल केजरीवाल का महिमामंडन कर रहे हैं क्योंकि उनके ज्यादातर पत्रकार वामपंथी, छद्म धर्मनिरपेक्ष और कांग्रेसी हैं. यही नहीं, भाजपा नेता सुब्रमणियम स्वामी और आर.एस.एस से जुड़े एस. गुरुमूर्ति ने एन.डी.टी.वी पर धन शोधन (मनी लांडरिंग) का आरोप लगाते हुए अभियान छेड रखा है.
खुद मोदी ने एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में एन.डी.टी.वी पर सरकारी पैसे से चलने और बाद में दिल्ली की एक रैली में इसी चैनल की एक पत्रकार पर नवाज़ शरीफ की मिठाई खाने का आरोप लगाया था.
जैसे इतना ही काफी नहीं हो, सोशल मीडिया- ट्विटर और फेसबुक पर भी चैनलों और उनके
संपादकों/एंकरों को मोदी और केजरीवाल समर्थक जमकर गरिया रहे हैं. इससे चैनलों और मीडिया के साथ पत्रकारों में भी बेचैनी है.

नतीजा, एडिटर्स गिल्ड को न्यूज मीडिया के बचाव में उतरना पड़ा. लेकिन इससे लगता नहीं है कि न्यूज मीडिया खासकर चैनलों पर हमले कम होंगे. इसकी वजह यह है कि इस बार चुनावों में न सिर्फ दांव बहुत ऊँचे हैं, केजरीवाल जैसे नए खिलाड़ी ‘नियमों को तोड़कर’ खेल रहे हैं बल्कि इसबार खेल में न्यूज मीडिया खासकर चैनल खुद खिलाड़ी बन गए हैं.

आप मानें या न मानें लेकिन यह तथ्य है कि २०१४ के चुनाव जितने जमीन पर लड़े जा रहे हैं, उतने ही चैनलों पर और उनके स्टूडियो में लड़े जा रहे हैं. शोशल मीडिया से ज्यादा यह न्यूज चैनलों का चुनाव है. केजरीवाल और मोदी की ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि गढ़ने में न्यूज मीडिया खासकर चैनलों की भूमिका किसी से छुपी नहीं है.
यह पहला आम चुनाव है जिसमें चैनल इतनी बड़ी और सीधी भूमिका निभा रहे हैं. इसका अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि हर रविवार को होनेवाली मोदी की रैलियां जिनका असली लक्ष्य चैनलों पर लाइव टेलीकास्ट के जरिये करोड़ों वोटरों तक पहुंचना है. आश्चर्य नहीं कि इन रैलियों की टाइमिंग से लेकर मंच की साज-सज्जा तक और कैमरों की पोजिशनिंग से लेकर भाषण के मुद्दों तक का चुनाव टी.वी दर्शकों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है.
चुनावी दंगल में इस बढ़ती और निर्णायक भूमिका के कारण ही चैनल नेताओं और पार्टियों के निशाने पर आ गए हैं. इसके जरिये चैनलों पर दबाव बनाने और उन्हें विरोधी पक्ष में झुकने से रोकने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इसके लिए काफी हद तक खुद चैनल भी जिम्मेदार हैं.

सच यह है कि चैनल खुद दूध के धोए नहीं हैं. यह किसी से छुपा नहीं है कि कई चैनल चुनावी दंगल की तथ्यपूर्ण और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग और व्याख्या के बजाये खेल में खुद पार्टी हो गए हैं. यह भी सही है कि उनमें से कई की डोर बड़े कार्पोरेट्स के हाथों में है और वे उन्हें अपनी मर्जी से नचा रहे हैं. कुछ बहती गंगा में हाथ धोने में लग गए हैं और कुछ बेगानी शादी में अब्दुल्ला की तरह झूम रहे हैं.

ऐसे में, हैरानी क्यों? जब चैनल खेल में पार्टी बनते जा रहे हैं तो आरोप-प्रत्यारोपों के उछलते कीचड़ से भला कब तक बचते?
                      
('तहलका' के १५ मार्च के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)

सोमवार, फ़रवरी 24, 2014

नीडो की कुर्बानी

उत्तर पूर्व के साथ भेदभाव में मीडिया भी शामिल है

देश की राजधानी में उत्तर पूर्व के लोगों के साथ होनेवाला नस्ली भेदभाव एक ऐसा बर्बर और कड़वा सच है जिसे जानते सब हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के लिए कम ही तैयार होते हैं. चाहे पुलिस-प्रशासन हो या मीडिया या फिर सिविल सोसायटी- सब अलग-अलग कारणों से उससे आँख चुराते हैं या बहुत दबी जुबान में चर्चा करते हैं.
अफ़सोस की बात यह है कि दिल्ली और देश के अन्य राज्यों/शहरों में उत्तर पूर्व के लोगों को जिस तरह का नस्ली भेदभाव, उत्पीडन और अपमान झेलना पड़ता है, उसे मुद्दा बनाने और न्यूज मीडिया सहित नागरिक समाज की चेतना को झकझोरने के लिए अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया को अपनी जान देनी पड़ी.
अफ़सोस यह भी कि शुरू में कई चैनलों और उनके रिपोर्टरों ने पुलिस के तोते की तरह नीडो की मौत को ‘मामूली मारपीट और ड्रग्स के ओवरडोज’ जैसी स्टीरियोटाइप ‘स्टोरीज’ से दबाना-छुपाना चाहा.

लेकिन सलाम करना चाहिए उत्तर पूर्व के उन सैकड़ों छात्र-युवाओं और प्रगतिशील-रैडिकल छात्र संगठनों का जिन्होंने नीडो की नस्ली हत्या के बाद लाजपतनगर से लेकर जंतर-मंतर तक अपने गुस्से और विरोध का इतना जुझारू इजहार किया कि मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियों-नेताओं और सरकार-पुलिस-प्रशासन को उसे नोटिस करना पड़ा. उन चैनलों/अखबारों का भी जिन्होंने पुलिस की प्लांटेड स्टोरीज को ख़ारिज करके इसे मुद्दा बनाया.

नतीजा, उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव का मुद्दा एक बार न्यूज मीडिया की सुर्ख़ियों में है. हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि नीडो की हत्या के खून अभी सूखे भी नहीं थे कि राजधानी में मणिपुर की एक बच्ची के साथ बलात्कार और एक युवा पर जानलेवा हमले का मामला सामने आ गया.
ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं लेकिन होता यह था कि या तो उन्हें दबा दिया जाता दिया जाता था या फिर उन्हें रुटीन अपराध के मामले मानकर निपटा दिया जाता था. नस्ली छींटाकशी और उपहास तो जैसे आम बात थी. 
लेकिन नीडो की मौत के बाद लगता है उत्तर-पूर्व के युवाओं का धैर्य जवाब देने लगा है. वे इसे और सहने के बजाय इससे लड़ने और चुनौती देने का मन बना चुके हैं. इससे चैनलों-अख़बारों से लेकर सिविल सोसायटी की अंतरात्मा भी जागी दिखती है. अगले लोकसभा चुनावों के कारण नेताओं का दिल भी फटा जा रहा है.

क्या स्थिति बदलेगी या फिर कुछ दिनों बाद फिर किसी नीडो को जान देनी पड़ेगी? यह सवाल पूछना इसलिए जरूरी है क्योंकि उत्तर पूर्व के लोगों के साथ लंबे समय से जारी नस्ली भेदभाव के लिए एक खास सवर्ण हिंदू राष्ट्रवादी-मर्दवादी-नस्लवादी मानसिकता जिम्मेदार है जिसकी जड़ें पुलिस-प्रशासन से लेकर मीडिया तक में फैली हुईं है. इसके शिकार सिर्फ उत्तर पूर्व के ही नहीं बल्कि सभी कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम-सिख और आदिवासी आदि हैं.

यह इतनी आसानी से खत्म होनेवाला नहीं है. इससे लड़ने के लिए न सिर्फ इस मानसिकता को चुनौती और एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है बल्कि नस्लभेद के उन सभी दबे-छिपे रूपों और स्टीरियोटाइप्स को खुलकर नकारना और सार्वजनिक मंचों को ज्यादा से ज्यादा समावेशी बनाना होगा.
अपने न्यूज चैनलों को ही देख लीजिए, उनके कितने एंकर/रिपोर्टर उत्तर पूर्व के हैं? इन चैनलों पर उत्तर पूर्व की ख़बरों को कितनी जगह मिलती है? कितने चैनलों के उत्तर पूर्व में रिपोर्टर हैं? मनोरंजन चैनलों पर कितने धारावाहिकों के पात्र उत्तर पूर्व के हैं? उत्तर पूर्व को लेकर उपेक्षा, भेदभाव और स्टीरियोटाइप्स की यह सूची बहुत लंबी है.
क्या नीडो की मौत के बाद न्यूज मीडिया अपने अंदर भी झांकेगा? क्या इस ‘पब्लिक स्फीयर’ में भी हम कुछ बदलाव की उम्मीद करें?

('तहलका' के 28 फ़रवरी के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)