Tuesday, July 7, 2009
यह बजट किस आम आदमी का है?
आनंद प्रधान
फरवरी में अंतरिम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि मौजूदा असामान्य आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों से निपटने के लिए असामान्य उपायों की जरूरत हैं। लेकिन उस समय वित्त मंत्री ने संवैधानिक परम्पराओं और बाध्यताओं का उल्लेख करते हुए यह जिम्मेदारी अगली सरकार पर डाल दी थी। यूपीए सरकार की दूसरी पारी की शुरूआत कर रहे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से यह अपेक्षा थी कि वे मौजूदा आर्थिक संकट की गंभीरता को महसूस करते हुए उससे निपटने के लिए अपने कहे मुताबिक एक साहसिक बजट पेश करेंगे। उनसे यह भी अपेक्षा थी कि यूपीए खासकर कांग्रेस उस आम आदमी को जिसके कारण उसकी चुनावी जीत संभव हो पायी, उसे महंगाई, बेरोजगारी से मुक्त कराने और उसकी दूसरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बजट में ठोस उपाय करेगी।
लेकिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट गए। नतीजा सबके सामने है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी के पहले बजट में कोई बड़ी सोच नहीं दिखाई पड़ती है। इसमें निरंतरता अधिक है और परिवर्तन न के बराबर। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि उसमें मौजूदा आर्थिक और वित्तीय संकट से निपटने के लिए कोई बड़ी पहल की गई है। अलबत्ता वित्त मंत्री ने कोई बड़ी और साहसिक पहल की कमी को आंकड़ों की उलट फेर के जरिए भरने की कोशिश की है। उन्होंने इसके लिए एक बहुत आसान रास्ता यह चुना है कि चालू वित्तीय वर्ष के बजट में सारे प्रावधान पिछले वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों से तुलना करते हुए पेश किए हैं। इससे एकबारगी ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री ने पूरी उदारता के साथ विभिन्न मदों और क्षेत्रों के लिए प्रावधान किया है।
लेकिन, यह सच नहीं है। उदाहरण के लिए खुद प्रणब मुखर्जी ने अंतरिम बजट पेश करते हुए कहा था कि मौजूदा आर्थिक मंदी से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार योजना व्यय में जीडीपी की कम से कम आधे से लेकर एक फीसदी रकम और खर्च करे। अपना नया बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने दावा किया है कि चालू वित्तीय वर्ष के बजट में उन्होंने योजना व्यय में 34 फीसदी की वृद्धि की है। लेकिन यह अधूरा सच है। यह ठीक है कि पिछले वित्तीय वर्ष (2008-09) के बजट अनुमान की तुलना में चालू वित्तीय वर्ष (2009-10) योजना व्यय में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन पूरा सच यह है कि योजना व्यय में पिछले वर्ष के संशोधित बजट अनुमान 282957 करोड़ रूपये की तुलना में सिर्फ पन्द्रह फीसदी की बढ़ोत्तरी के साथ 325149 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।
दरअसल, वित्त मंत्री ने इस मामले में चतुराई दिखाते हुए पूरे बजट भाषण में आंकड़ों की बाजीगरी की है। उन्होंने चालू वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान पेश करते हुए पिछले वर्ष के बजट अनुमान को आधार बनाया है। इस कारण विभिन्न मदों और क्षेत्रों में किए गए बजटीय प्रावधान काफी भारी-भरकम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन उनके नए बजट में किए गए प्रावधानों को पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमानों के आधार पर तौला जाए तो साफ है कि अधिकांश मदों में बहुत कम या न के बराबर वृद्धि हुई है।
उदाहरण के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के बजट को लीजिए। वित्त मंत्री ने बजट भाषण में दावा किया है कि ग्रामीण रोजगार योजना के लिए पिछले वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान की तुलना में 144 फीसदी वृद्धि करते हुए 39100 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। लेकिन सच यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना पर 30 हजार करोड़ रूपये और संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना पर 6750 करोड़ रूपये यानि कुल 36750 करोड़ रूपये खर्च किए गए। चालू वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों में संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना को समाप्त करके राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में समाहित कर दिया गया है। इस तरह चालू वित्तीय वर्ष में ग्रामीण रोजगार योजना पर पिछले वर्ष के संशोधित बजट अनुमानों की तुलना में सिर्फ 2350 करोड़ रूपये यानि 6.39 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की गई है।
हैरत की बात है कि वित्त मंत्री ने उस योजना के लिए ऐसी कंजूसी दिखाई है जिसे यूपीए खासकर कांग्रेस की जीत का श्रेय दिया जा रहा है। इससे सरकार की प्राथमिकताओं का भी पता चलता है। कहां तो यह अपेक्षा थी कि यूपीए सरकार ग्रामीण गरीबों और बेरोजगारों के राजनीतिक समर्थन के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करने और उन्हें सचमुच राहत पहुंचाने के लिए इस कानून के तहत 100 दिन के बजाय कम से कम 150 से 200 दिनों के रोजगार और न्यूनतम 150 रूपये प्रति दिन मजदूरी की व्यवस्था करेगी, वहां चालू वित्तीय वर्ष के बजट प्रावधान से ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के प्रति ईमानदार नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं है कि अगर वह रोजगार गारंटी को लागू करने और ग्रामीण गरीबों को न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने के प्रति सचमुच ईमानदार है तो उसे बजट में कम से कम 50 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान करना चाहिए था। यह इसलिए भी जरूरी था कि इस साल मानसून मंे विलम्ब और बारिश कम होने की आशंकाओं के बीच कृषि क्षेत्र के प्रभावित होने के कारण ग्रामीण मजदूरों को काम कम मिलने की उम्मीद है। ऐसे ग्रामीण मजदूरों के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ही उम्मीद की आखिरी किरण हैं। तीसरे, मानसून में गड़बड़ी और कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट के मद्देनजर भी यह जरूरी था कि ग्रामीण रोजगार योजना को और प्रभावी बनाने के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किया जाए।
बजट में यूपीए सरकार की ऐसी ही वायदा खिलाफी प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून और शिक्षा के अधिकार कानून के प्रति भी दिखायी पड़ती है। सरकार ने 100 दिन के एजेंडे में यह वायदा किया है कि रोजगार गारंटी कानून की तर्ज पर लोगों के भोजन के अधिकार यानि खाद्य सुरक्षा और बहुत लम्बे अरसे से लटके शिक्षा के अधिकार के कानून को अमली जामा पहनाया जाएगा। इस वायदे का उल्लेख राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी था। लेकिन वित्त मंत्री ने बजट में इन दोनों अधिकारों को लागू करने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया है। उन्होंने बजट भाषण में खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लेख तो किया है लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह कानून और कितने दिनों में लागू होगा। इसके बजाय उन्होंने कहा है कि सरकार प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक का मसौदा सार्वजनिक बहस और विचार-विमर्श के लिए जल्दी ही पेश करेगी।
कहने की जरूरत नहीं है कि भूखमरी के शिकार लोगों के साथ इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता है। ऐसे ही रवैये की खिल्ली उड़ाते हुए मशहूर शायर दुष्यंत कुमार ने बहुत पहले लिखा था कि ‘‘भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ/आजकल दिल्ली में है जेरे-बहस ये मुद्दआ।’’ सवाल यह है कि भूखे लोगों को रोटी उपलब्ध कराने के लिए और कितने दिन बहस चलेगी? यह सवाल इसलिए भी और महत्वपूर्ण और दुखी करनेवाला है कि आज भारत में दुनिया के सबसे अधिक भूखे लोग रहते हैं जिन्हें दो जून का भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता है। इससे अधिक और शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि तेज विकास दर के बावजूद देश में कुपोषण और भूखमरी की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। ताजा आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि 1998-99 में तीन वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार थे और अगले सात वर्षों में तीव्र विकास दर के बावजूद 2005-06 में भी ऐसे बच्चों की संख्या 46 फीसदी पर बनी हुई थी।
वित्त मंत्री ने कुछ ऐसा ही रवैया शिक्षा के अधिकार के कानून के प्रति भी दिखाया है। उन्हांेने बजट भाषण में शिक्षा के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने के बावजूद शिक्षा के अधिकार के कानून का न तो कोई जिक्र किया और न ही उसके लिए कोई बजटीय प्रावधान किया। उल्टे बजट में प्राथमिक शिक्षा के मद में पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमान 19488 करोड़ रूपये की तुलना में चालू वित्तीय वर्ष में सिर्फ 194 करोड़ रूपये यानि एक फीसदी की बढ़ोत्तरी की है। दोहराने की जरूरत नहीं है कि शिक्षा के अधिकार के कानून को ईमानदारी से लागू करने के लिए कम से कम 55 हजार से लेकर एक लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता पड़ेगी। लेकिन न तो पिछली यूपीए सरकार और न अब नई यूपीए सरकार इतनी बड़ी रकम खर्च करने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि शिक्षा के अधिकार का विधेयक पिछले कई वर्षों से लटका पड़ा है। वित्त मंत्री के रवैये को देखकर लगता नहीं है कि सरकार शिक्षा के अधिकार के कानून को लागू करने को लेकर कहीं से भी उत्साहित है।
निश्चय ही, वित्त मंत्री सामाजिक क्षेत्र की इन महत्वपूर्ण योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने के मामले में अपनी कंजूसी का बचाव यह कहकर कर सकते हैं कि सीमित संसाधनों के बीच इससे अधिक कर पाना संभव नहीं है। वे यह भी कह सकते हैं कि मौजूदा आर्थिक मंदी के दौर में राजस्व वसूली में गिरावट के कारण उनके हाथ बंधे हुए थे। लेकि न यह भी अधूरा सच है। यह ठीक है कि आर्थिक मंदी के कारण सरकार के राजस्व में उस रफ्तार से वृद्धि होने की उम्मीद नहीं है जितनी पिछले कुछ वर्षों में रही है। लेकिन अगर यह सच है तो वे अमीर और उच्च मध्यवर्ग को करों में छूट देने के मामले में इतने उदार क्यों हो गए? उन्होंने काॅरपोरेट क्षेत्र को खुश करने के लिए फ्रिंज बैनिफिट टैक्स खत्म कर दिया है। लेकिन 2007-08 में फ्रिंज बैनिफिट टैक्स से सरकारी खजाने को 6533 करोड़ रूपये की आय हुई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि वित्त मंत्री ने एक झटके में काॅरपोरेट क्षेत्र को लगभग 7 हजार करोड़ रूपये का तोहफा दे दिया।
इसी तरह उन्होंने निजी आयकर पर दस प्रतिशत के सरचार्ज को समाप्त कर दिया है। इसका फायदा दस लाख रूपये से अधिक की आय वाले अमीर वर्गों को होगा। उन्होंने मध्यवर्ग को भी खुश करने के लिए टैक्स के स्लैब में मामूली फेर-बदल किया है। यही नहीं, उन्होंने जिंसों के कारोबार में सक्रिय सटोरियों को काबू में रखने के लिए उन पर लगने वाले कमोडिटी ट्रांजैक्शन टैक्स को भी समाप्त कर दिया है। उल्लेखनीय है कि जिंसों के वायदा कारोबार का कुल टर्न ओवर 2008 में लगभग 50 लाख करोड़ रूपये तक पहुंच गया और यह माना जाता है कि कई जिंसों और खाद्यान्नों की कीमतों में असामान्य वृद्धि की एक बड़ी वजह उनका वायदा कारोबार भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि कमोडिटी ट्रांजक्शन टैक्स समाप्त कर वित्त मंत्री ने किसकी मदद की है?
इससे स्पष्ट है कि वित्त मंत्री नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से हटने के लिए तैयार नहीं है। यह बजट भी उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की निरंतरता का एक और सबूत है जो गरीबों के बजाय कारपोरेट समूहों, अमीरों और उच्च मध्यवर्गों के हितों का अधिक ध्यान रखता है। अलबत्ता पहले की तुलना में एक रणनीतिक फर्क सिर्फ यह आया है कि यूपीए सरकार यह सब गरीबों और आम आदमी का नाम लेकर कर रही है। जाहिर है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के स्थायित्व और भविष्य के लिए यह जरूरी हो गया है कि गरीबों और आम आदमी का राग जोर-शोर से गाया जाए। यह बजट भी इसी रणनीति का एक और उदाहरण है।
Saturday, June 20, 2009
भविष्य के पत्रकारों का सामान्य (अ)ज्ञान
क्या आपको मालूम है कि बांग्लादेश की सम्मानित प्रधानमंत्री शेख हसीना का अंडरवर्ल्ड से ताल्लुक है। वे अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहीम की छोटी बहन हैं ? या ये कि वे पाकिस्तान की बड़ी नेता हैं और अपने नाम के मुताबिक वाकई हसीन हैं? या फिर यह कि वे विश्व सुंदरी हैं। और यह भी कि वे श्रीलंका की राष्ट्रपति हैं? ..... आपका सर चकरा दनेवाली ये जानकारियां किसी बेहूदा मजाक या चुटकुले का हिस्सा नहीं हैं। ये वे कुछ उत्तर है जो देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में पी जी डिप्लोमा की प्रवेश परीक्षा में शेख हसीना और उन जैसी ही कई और चर्चित हस्तियों के बारे में दो-तीन वाक्यों में लिखने के जवाब में आए।
लेकिन यह तो सिर्फ एक छोटा सा नमूना भर है। ऐसा जवाब देनवाले प्रवेशार्थियों की संख्या काफी थी जिन्हें महिंदा राजपक्से, रामबरन यादव, अरविंद अडिगा,हैरोल्ड पिंटर आदि के बारे में पता नहीं था। सबसे अधिक अफसोस और चिंता की बात यह थी कि इन छात्रों को जो पत्रकार बनना चाहते हैं, प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस जी एन रे और दक्षिण एशियाई पत्रकारों के संगठन साफमा के बारे में कुछ भी पता नहीं था। ऐसे छात्रों की संख्या उंगलियों पर गिनी जाने भर थी जिन्होने जस्टिस जी एन रे और साफमा के बारे में सही उत्तर दिया। हिंदी पत्रकारिता में प्रवेश के इच्छुक अधिकांश छात्रों ने लगता है कि नई दुनिया के संपादक और जाने-माने पत्रकार आलोक मेहता का नाम कभी नहीं सुना था।
नतीजा यह कि प्रवेशार्थियों ने अपने काल्पनिक और सृजनात्मक ष्सामान्य (अ) ज्ञानष् से इन प्रश्नों के ऐसे-ऐसे उत्तर दिए हैं कि उन्हें पढ़कर हंसी से अधिक पीड़ा और चिंता होती है। हैरत होती है कि इन छात्रों ने ग्रेजुएशन की परीक्षा कैसे पास की होगी? यह सचमुच अत्यधिक चिंता की बात है कि पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा में बैठनेवाले छात्रों का न सिर्फ सामान्य ज्ञान बहुत कमजोर है बल्कि उनकी भाषा और अभिव्यक्ति क्षमता का हाल तो और भी दयनीय है। वर्तनी, लिंग और वाक्य संरचना संबंधी अशुद्धियों के बारे में तो कहना ही क्या? इन छात्रों की भाषा पर पकड़ इतनी कमजोर है कि वे अपने विचारों को भी सही तरह से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं।
यह ठीक है कि इनमें से बहुतेरे छात्रों की भाषा, अभिव्यक्ति क्षमता, तर्कशक्ति और सामान्य ज्ञान का स्तर बाकी की तुलना में बहुत बेहतर और संतोषजनक था। इससे संभव है कि संस्थान को छान और छांटकर जरूरी छात्र मिल जाएं लेकिन बाकी छात्र कहां जाएंगे ? जाहिर है कि बचे हुए छात्रों की बड़ी संख्या दूसरे विश्वविद्यालयों और निजी पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में दाखिला पा जाएगी। उनमें से काफी बड़ी संख्या में छात्र डिग्रियां लेकर पत्रकार बनने के पात्र भी बान जाएंगे। संभव है कि पत्रकारिता पाठ्क्रम में प्रशिक्षण के दौरान उनमें संधार हो लेकिन आज अधिकांष विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों में प्रशिक्षण और अध्यापन का जो हाल है, उसे देखकर बहुत उम्मीद नहीं जगती है।
निश्चय ही, समाचार माध्यमों के लिए अच्छी खबर नहीं है। अधिकांश समाचार माध्यमों और मीडिया उद्योग के लिए यह चिंता की बात है। वे पहले से ही प्रतिभाशाली मीडियाकर्मियों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके कारण समाचार मीडिया उद्योग का न सिर्फ विस्तार और विकास प्रभावित हो रहा है बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में समाचार मीडिया उद्योग का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, उसके अनुसार उपयुक्त प्रतिभाओं के न मिलने के कारण समाचारपत्रों और चैनलों के बीच वेतनमानों से लेकर सेवा शर्तों तक में बहुत विसंगतियां पैदा हो गयी हैं।
ऐसे में, समाचार मीडिया उद्योग के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है कि बेहतर प्रतिभाएं मीडिया प्रोफेशन में आएं। लेकिन इसके लिए समाचार मीडिया उद्योग के साथ-साथ देश के प्रमुख मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों को मिलकर कोशिश करनी होगी। समाचार मीडिया उद्योग को मीडियाकर्मियों की भर्ती की प्रक्रिया को तार्किक, पारदर्शी, व्यवस्थित और आकर्षक बनाना होगा और दूसरी ओर, प्रशिक्षण संस्थानों को बेहतर छात्रों को आकर्षित करने और उन्हें श्रेष्ठ प्रशिक्षण देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने के बारे में तुरंत सोचना होगा। यह एक चुनौती है जिसे अब और टालना समाचार मीडिया उद्योग के साथ-साथ पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों के लिए बहुत घातक हो सकता है।
Tuesday, June 9, 2009
शिक्षा का या घृणा का कारोबार ?
आस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा हासिल करने गए भारतीय छात्रों को वहां की सरकार द्वारा पूरी सुरक्षा देने का वायदों के बावजूद उनपर नस्ली और आपराधिक जानलेवा हमले रूक नहीं रहे हैं। पिछले कुछ सप्ताहों में एक दर्जन से ज्यादा भारतीय छात्र इन हमलों का निशाना बने हैं। सिर्फ छात्र ही नहीं, जिस तरह से एक भारतीय टैक्सी ड्राइवर पर भी हमला हुआ है, उससे साफ है कि इन नस्ली और आपराधिक हमलों से भारतीय कामगार और प्रोफेशनल्स भी सुरक्षित नहीं हैं। इससे एक गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के सुरक्षित केंद्र के बतौर आस्ट्रेलिया की छवि को गहरा धक्का लगा है।
ऐसा नहीं है कि आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों या प्रोफेशनल्स पर पहली बार इस तरह के हमले हुए हैं। तथ्य यह है कि पिछले तीन सालों में भारतीय छात्रों या प्रोफेशनल्स को सैकड़ों छोटे-बड़े नस्ली और आपराधिक हमलों का निशाना बनाया गया है। लेकिन पिछले एक महीने में ऐसे हमलों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। आस्ट्रेलियाई पुलिस के अनुसार इस एक महीने में भारतीय छात्रों पर हमले और मारपीट-गाली गलौज की 500 से ज्यादा रिपोर्ट दर्ज की गयी हैं। इनमें से ज्यादातर घटनाएं मेलबोर्न, सिडनी और एडीलेड में घटी हैं। इन घटनाओं के बाद भारतीय छात्र गहरे सदमे, दहशत और गुस्से में हैं।
साफ है कि पानी सिर के उपर से बहने लगा है। आस्ट्रेलियाई सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेने और शुरूआत में ही सख्ती बरतने में देर कर दी है। इससे उन गोरे नस्लवादी हमलावरों और अपराधियों की हिम्मत बहुत बढ़ गयी है। अगर आस्ट्रेलियाई सरकार ने शुरू में ही इन हमलों और अपमानजनक व्यवहार को नोटिस लेकर कार्रवाई की होती तो स्थिति इस हद तक नहीं बिगड़ती। अब आस्टेªलियाई सरकार को अपनी पुलिस और प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि भारतीय या अन्य किसी भी विदेशी छात्र या प्रोफेशनल्स के खिलाफ नस्लवादी हमलों के प्रति ष्जीरो टालरेंसष् का रवैया होना चाहिए। आस्ट्रेलियाई सरकार को ऐसे नस्ली हमलों पर रोक के लिए हेट क्राइम रोकथाम कानून बनाने से भी हिचकिचाना नहीं चाहिए।
असल में, यह इसलिए भी जरूरी है कि इन नस्ली हमलों के बाद भारतीय छात्रों का यह विश्वास टूटा है कि आस्ट्रेलिया ष्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने का एक सुरक्षित, उदार और आकर्षक केंद्रष् है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान आस्ट्रेलिया को ही होगा। आस्ट्रेलिया ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय छात्रों को अपने विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने आने के लिए आकर्षित करने की खूब कोशिश की है। इसके लिए विज्ञापन और मार्केटिंग अभियान से लेकर एजूकेशन फेयर और रोड शो तक हर तौर-तरीका अपनाया गया है। लेकिन आस्ट्रेलिया ने भारतीय छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए आकर्षित करने की यह कोशिश किसी उदारता या दयानतदारी या ज्ञान की रोशनी बांटने के उच्च आदर्शों के तहत नहीं की है।
इसके पीछे मकसद साफ तौर पर आस्ट्रेलिया में शिक्षा के कारोबार को आगे बढ़ाने का था। ध्यान रहे कि भारत उच्च शिक्षा के बड़े कारोबारियों के लिए एक बहुत बड़े ग्राहक के रूप में उभरा है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और फैलते हुए मध्यवर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं जिस तेजी से बढ़ी हैं, उसे पूरा करने में भारतीय उच्च शिक्षा का ढांचा नाकाम साबित हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले एक-डेढ़ दशक में भारत से बाहर जाकर उच्च शिक्षा हासिल करनेवाले छात्रों की तादाद तेजी से बढ़ी है। इसका एक सबूत यह है कि अकेले आस्ट्रेलिया में इस समय लगभग 97 हजार भारतीय छात्र उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे हैं जिससे आस्ट्रेलिया को करोड़ों डालर की आमदनी हो रही है।
आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के लिए यह कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिक्षा का कारोबार उसका तीसरा सबसे बड़ा निर्यात उद्योग है। इससे आस्ट्रेलिया को पिछले साल 15.5 अरब डालर (लगभग 700 अरब रूपए) की कमाई हुई। यह कमाई आस्ट्रेलिया में पढ़ने आए कुल 4 लाख 30 हजार छात्रों से हुई जिसमें लगभग 22 प्रतिशत यानी 96739 छात्र भारतीय थे। तथ्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया, अमेरिका के बाद भारतीय छात्रों की दूसरी सबसे प्रमुख पसंद बन गया है। यही कारण है कि 2007 की तुलना में 2008 में आस्ट्रेलिया जानेवाले भारतीय छात्रों की संख्या में 54 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।
जाहिर है कि आस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था इन छात्रों को गंवाने और इस तरह अपने शिक्षा कारोबार को चैपट होने देने का जोखिम नहीं उठा सकती है। खासकर तब जब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था भी मंदी की मार से निढाल है। शिक्षा को मंदी से अप्रभावित कारोबार माना जाता है। ऐसे मंे, यह पूरी तरह से आस्ट्रेलिया के खुद के हित में है कि वह भारतीय छात्रों का विश्वास बनाए रखे। यह इसलिए भी जरूरी है कि भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लवादी आपराधिक हमलों से अन्य देशों से आए छात्रों में भी दहशत है और गलत संदेश गया है। उन्हें लग रहा है कि भारतीय छात्रों की तरह कल को उन्हें भी इन हमलों का निशाना बनाया जा सकता है।
यही नहीं, आस्ट्रेलियाई सरकार भारतीय छात्रों को गंवाने का जोखिम और कई कारणों से नहीं उठा सकती है। पहली बात तो यह है कि भारतीय छात्रों ने अपनी प्रतिभा, मेधा और परिश्रम से पूरी दुनिया में एक अलग पहचान बनायी है। किसी भी विश्वविद्यालय या पाठ्यक्रम में भारतीय छात्रों की उपस्थिति से उसका शैक्षणिक स्तर और मान उंचा हो जाता है। इससे उन विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों की न सिर्फ प्रतिष्ठा बढ़ती है बल्कि वे इससे अन्य देशी-विदेशी छात्रों को आकर्षित कर पाते हैं। भारतीय छात्रों का एक बड़ा वर्ग आस्ट्रेलिया में अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए पार्ट टाइम काम भी करता है। इससे आस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था को सस्ते, कुशल और परिश्रमी कामगार भी मिल रहे हैं जिससे उसकी उत्पादकता और प्रतियोगी क्षमता बढ़ रही है।
यही कारण है कि आस्ट्रेलियाई सरकार देर से ही सही हरकत में आई है और भारतीयों पर नस्लवादी और आपराधिक हमलों से पैदा हुई स्थिति से निपटने और डैमेज कंट्रोल में जुट गयी है। कहने की जरूरत नहीं है कि पहले चिंता जाहिर करनेवाले बयान और आस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त को अपनी चिंता से अवगत कराके अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान चुकी मनमोहन सिंह सरकार इससे और निश्चिंत हो गयी है। उसे लग रहा है कि भारतीय छात्रों की सुरक्षा और उनका उचित ध्यान रखना आस्ट्रेलिया की आर्थिक मजबूरी है। लेकिन मुद्दा सिर्फ आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की सुरक्षा का नहीं है बल्कि उससे कहीं बड़ा और बुनियादी है।
असली मुद्दा यह है कि इतनी बड़ी संख्या में हर साल भारतीय छात्र विदेशों का रूख क्यों कर रहे हैं? क्या यह भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं है कि भारतीय छात्र भारतीय शैक्षणिक संस्थानों की तुलना में आस्ट्रेलिया यहां तक कि न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे देशों को पसंद कर रहे हैं? यह सिर्फ हर साल भारत से अरबों डालर विदेशी मुद्रा विदेशी शैक्षणिक संस्थानों को जाने का ही मसला नहीं है बल्कि प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) का भी सवाल है। यही नहीं, मुद्दा यह भी है कि भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था विस्तार के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने में विफल क्यों हुई है? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि 90 के दशक में उच्च शिक्षा को जिस तरह से बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया, उससे भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है?
अफसोस और चिंता की बात यह है कि खुद यूपीए सरकार की ओर से इसका समाधान विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश का दरवाजा खोलने के रूप में पेश किया जा रहा है। यह न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बचने का एक और उदाहरण है बल्कि एक और बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण है।
Saturday, May 30, 2009
मीडिया में इतिहास और अनुपात बोध का एनीमिया
आनंद प्रधान
क्या समाचार मीडिया को इतिहास और अनुपात बोध का एनीमिया (रक्ताल्पता) हो गया है? क्या वह, विवेक और तर्क के बजाय भावनाओं से अधिक काम लेने लगा है? खासकर टी वी समाचार चैनलों में इतिहास और अनुपात बोध की अनुपस्थिति कुछ ज्यादा ही संक्रामक रोग की तरह फैलती जा रही है। समाचार चैनल इस कदर क्षणजीवी होते जा रहे हैं कि लगता ही नहीं है कि उस क्षण से पीछे और आगे भी कुछ था और है। समाचार चैनलों की स्मृति दोष की यह बीमारी अखबारों को भी लग चुकी है।
आम चुनाव 2009 और उसके नतीजों को ही लीजिए। पहली बात यह है कि बिना किसी अपवाद अधिकांश समाचार चैनलों और अखबारों के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, एक्जिट पोल, चुनावी भविष्यवाणियां और पूर्वानुमान एक बार फिर मतदाता के मन को भांपने मे नाकामयाब रहें। लेकिन इसके लिए खेद जाहिर करने और नतीजों की तार्किक व्याख्या करने के बजाय चुनाव नतीजों को एक चमत्कार की तरह पेश किया गया। ऐसा लगा जैसे कांग्रेस को अकेले दम पर बहुमत मिल गया हो और भाजपा से लेकर वामपंथी पार्टियों और क्षेत्रीय दलों का पूरी तरह से सफाया हो गया हो।
सच है कि सफलता से ज्यादा सफल कुछ नही होता है और सफलता के अनेकों साथी होते है। चैनलों और अखबारों के पत्रकारों और विश्लेषकों पर ये दोनों बातें सबसे अधिक लागू होती है। चुनाव नतीजों का बारीकी से विश्लेषण करने के बजाय कांग्रेस की जीत और भाजपा और तीसरे मोर्चे के हार के लिए ज्यादातर अति-सरलीकृत कारण गिनाये गए जिनमें सामान्य इतिहास और अनुपात बोध का स्पष्ट अभाव था। इस इतिहास बोध के अभाव के कारण चुनावी नतीजों का विश्लेषण और जनादेश की व्याख्या इतनी भावुक, आत्मगत, पक्षपातपूर्ण, पूर्वाग्रहग्रस्त और एकतरफा थी कि जिसे इतिहास का ज्ञान नही होगा, उसे लगेगा जैसे कोई क्रांति हो गयी हो।
जाहिर है कि समाचार मीडिया कांग्रेस की जीत के उन्माद और आनंदोत्सव में ऐसे डूबा हुआ है कि किसी विश्लेषक को कांग्रेस की चुनाव रणनीति और अभियान मे कोई कमी नही दिख रही है। उसके मुताबिक, कांग्रेस इस जीत के साथ एक ऐसी पार्टी बन चुुकी है जिसमें कोई कमी नही है। यही नहीं, कांग्रेस अचानक ऐसा पारस पत्थर बन गयी जिसे छूकर ममता बैनर्जी से लेकर करूणानिधि तक मामूली पत्थर से सोना बन गए हैं। राहुल राग का तो खैर कहना ही क्या?
दूसरी ओर, समाचार मीडिया को एनडीए खासकर भाजपा और तीसरे मोर्चे मे माकपा की चुनावी रणनीति और अभियान में ऐसा कुछ नही दिखा जो सही था। यह साबित करने की कोशिश की गयी कि अब क्षेत्रीय दलों का जमाना गया, वामपंथी दल इतिहास बन जाएंगे और तीसरे-चैथे मोर्चे के सत्तालोलुप नेताओ को कूडेदान मे फेक दिया है। इसके अलावा भी बहुत कुछ और कहा गया जो विश्लेषण कम और भावोद्वेग अधिक था।
यहां इतिहास को याद करना बहुत जरूरी है। कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारों का एक इतिहास रहा है और एक वर्तमान भी है। बहुत दूर न भी जाएं तो 1984 में मिस्टर क्लीन राजीव गांधी आज से कही ज्यादा भारी बहुमत और उससे भी अधिक उम्मीदों के साथ सत्ता में पहुंचे थे। उसके बाद क्या हुआ,वह बहुत पुराना इतिहास नही है। यही नही, कांग्रेस को इसबार लालू-मुलायम-मायावती और जयललिता जैसों की बैसाखी से भले मुक्ति मिल गयी हो लेकिन खुद कांग्रेसी इनसे कम नहीं हैं।
कांग्रेस खुद एक गठबंधन है जिसमे सत्ता के त्यागी, संत और सेवक कम और सत्ता के आराधक ज्यादा हैं। कांग्रेस मे सत्ता की मलाई में अपने-अपने हिस्से के लिए खींचतान कोई नई बात नही है। इसे देश ने पहले भी देखा है और आगे भी देखेगा। अगर रातों-रात ममता बैनर्जी और करूणानिधि बदल न गये हों तो देश उनके नखरे, रूठने और मनाने के नाटक आगे भी देखेगा।
याद रखिए, कांग्रेस का एक चरित्र है, एक संस्कृति है और एक इतिहास भी है। इसी तरह, सत्ता का भी अपना एक चरित्र, इतिहास और संस्कृति है। आमतौर पर इसमें रातो-रात बदलाव नही आता। लेकिन मीडिया इसे जानबूझकर अनदेखा कर रहा है। इसके कारण धीरे-धीरे यह स्मृति दोष की बीमारी बनती जा रही है। इस बीमारी ने उसे न सिर्फ दूर तक देख पाने में अक्षम बना दिया है बल्कि उसे निकट दृष्टि दोष की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है।
Friday, May 22, 2009
कारपोरेट भ्रष्टाचार और बिजनेस पत्रकारिता
बिजनेस पत्रकारिता फिर सवालों के घेरे में है। शेयर बाजार की नियामक संस्था-सेबी ने मनोरंजन उद्योग की एक जानी-मानी कंपनी पिरामिड साइमिरा के शेयरों की कीमतों में तोड़मरोड़ (मैनिपुलेषन) करने के आरोप में कंपनी के एक एनआर आई प्रोमोटर, सीईओ और बाजार के कई और आपरेटरों के साथ देश के सबसे बड़े मीडिया समूह- बेनेट कोलमैन के गुलाबी बिजनेस दैनिक के एक वरिश्ठ पत्रकार राजेष उन्नीकृश्णन को शेयर बाजार में कारोबार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। सेबी ने इन सभी को जालसाजी में शामिल पाया है।
इन जालसाजों ने सेबी के एक फर्जी पत्र के जरिए बाजार में अफवाह फैलाकर हजारों निवेषकों को लाखों रूपए का चूना लगा दिया। इस घोटाले के मुख्य जालसाज और पिरामिड के प्रोमोटर ने पिछले साल 22 दिसम्बर को पत्रकार उन्नीकृश्णन और पी आर मैनेजर राकेश शर्मा की मिलीभगत से सिर्फ कुछ घंटो में 20 लाख रूपए से अधिक कमा लिए थे।
कहने की जरूरत नहीं है कि पिरामिड साइमिरा प्रकरण ने शेयर बाजार से लेकर कारपोरेट जगत में पर्दे के पीछे चल रहे घोटालों, जालसाजियों, अनियमिताओं और भ्रश्टाचार के मामलों में बिजनेस पत्रकारों की प्रत्यक्ष और परोक्ष मिलीभगत, मौन सहमति या उसे जानबूझकर अनदेखा करने की तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
बिजनेस पत्रकारिता के लिए यह चिंता और शर्म की बात है। शेयर बाजार की जालसाजी के मामले में देश के सबसे बड़े गुलाबी अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार का शामिल होना कोई पहली घटना नहीं है। कुछ सालों पहले भी इसी अखबार के एक और पत्रकार को ऐसी ही एक जालसाजी में शामिल पाया गया था। आश्चर्य की बात यह है कि जालसाजी के इन मामलों में छोटे अखबारों और चैनलों के बिजनेस पत्रकार नहीं बल्कि बड़े अखबारों और चर्चित बिजनेस चैनलों के स्टार बिजनेस पत्रकार शामिल पाए गए हैं जो मोटी तनख्वाहें पाते हैं।
यह चिंता की बात इसलिए भी है कि बिजनेस पत्रकारिता के कामकाज और तौर-तरीकों को लेकर काफी समय से सवाल उठ रहे हैं। पिछले साल सत्यम घोटाले के पर्दाफाश के बाद भी यह सवाल उठा था कि बिजनेस पत्रकारों को इतने बड़े घोटाले की भनक क्यों नहीं लगी?
इसमेें कोई दो राय नहीं है कि अगर सत्यम घोटाले में उसके मालिक रामलिंग राजू की जालसाजियों को समय रहते पकड़ने में सेबी, आॅडिटर्स,स्वतंत्र निदेषक, कंपनी लॉ बोर्ड से लेकर तमाम एजेंसियां नाकाम रहीं तो खुद को स्मार्ट बतानेवाली बिजनेस पत्रकारिता भी उसे सूंघने और समय रहते अपने पाठकों और दर्शकों को सचेत करने में विफल रही। सत्यम प्रकरण बिजनेस पत्रकारिता की विफलता का अकेला उदाहरण नहीं है।
इससे पहले भी शेयर बाजार में जितनी बार घोटाले हुए, बिजनेस पत्रकार और मीडिया न सिर्फ सोते हुए पाए गए बल्कि उनमें से अधिकांष घोटालेबाजों को महिमामंडित करने में जुटे हुए देखे गए। याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि चाहे वह बिग बुल कहे जानेवाला हर्शद मेहता रहा हो या केतन पारीख-बिजनेस मीडिया उनका आखिर-आखिर तक दीवाना बना रहा।
सच तो यह है कि शेयर बाजार में हर बड़े उछाल (बुल रन) में बिजनेस मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका रही है। बिजनेस मीडिया के बड़े स्टार पत्रकारों और जानकारों ने हमेशा बिना कोई सवाल उठाए शेयर बाजार की कृत्रिम उछाल को वास्तविक और फंडामेंटल्स के अनुकूल बताने के लिए सच्चे-झूठे तर्क खोजने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी।
सचमुच, यह सोचने का समय आ गया है कि बिजनेस पत्रकारिता के साथ बुनियादी रूप से कहां गड़बड़ी है? इस सवाल का जवाब खोजना इसलिए जरूरी हो गया है कि बिजनेस मीडिया के बारे में यह आम धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि वह पूरी तरह से कारपोरेट जगत और बाजार का पेड चाकर बन गया है और वह वॉचडाग की भूमिका को छोड़कर पी आर पत्रकारिता का पर्याय बन गया है।
अगर इस धारणा को समाप्त करने के लिए तत्काल गंभीर उपाय और बिजनेस पत्रकारों के लिए आचार संहिता को कड़ाई से लागू करने के प्रयास नहीं किए गए तो देश में तेजी से फल-फूल रहा बिजनेस मीडिया अपनी साख गंवा देगा। खतरे की घंटी बज चुकी है।



