आनंद प्रधान
ऐसा लगता है कि जाने-माने बुद्धिजीवियों और सूचना के अधिकार के आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं की अपील को नज़रंदाज़ करते हुए यू पी ए सरकार ने सूचना के अधिकार कानून'2005 में संशोधन का मन बना लिया है. सरकार इस संशोधन के जरिये सूचना के अधिकार कानून से "फाइल नोटिंग" दिखाने का हक वापस लेने के अलावा जन सूचना अधिकारियों को "फालतू और तंग करनेवाले" सवालों को खारिज करने का अधिकार देना चाहती है. हालांकि इस फैसले का विरोध कर रहे बुद्धिजीवियों और नागरिक संगठनो के एक प्रतिनिधिमंडल से केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के सचिव ने वायदा किया है कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करने से पहले सरकार सबसे बात करेगी और सबकी आपत्तियों को सुनेगी लेकिन सरकार के रवैये से नहीं लगता है कि वह वास्तव में किसी को खासकर विरोधी स्वरों को सुनने के मूड में है. उसने मन बना लिया है और अब केवल दिखावे की मजबूरी में संशोधन की प्रक्रिया को पारदर्शी दिखाने का कोरम पूरा करना चाहती है.
ऐसा मानने के पीछे ठोस वजहें हैं. असल में, जब से सूचना के अधिकार का कानून बना है, सत्तानशीं नेता और नौकरशाही उसके साथ सहज नहीं रहे हैं. इस कानून के बनने से पहले तक गोपनीयता के माहौल में काम करने के आदी अफसरों और नेताओं को शुरू से यह बहुत "परेशान और तंग" करनेवाला कानून लगता रहा है. कहने की जरूरत नहीं है कि इसके पीछे वही औपनिवेशिक गोपनीयता की संस्कृति और मानसिकता जिम्मेदार रही है जो आज़ादी के 62 सालों बाद भी तनिक भी नहीं बदली है. यह मानसिकता सूचना का अधिकार कानून बनने के बावजूद यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि अब एक आम आदमी भी उनसे न सिर्फ उनके कामकाज का ब्यौरा और हिसाब मांग सकता है बल्कि परदे के पीछे और चुपचाप फैसला करने का जमाना गया. उनसे उस फैसले तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया यानि फाइल नोटिंग दिखाने के लिए कहा जा सकता है जिसके जरिये एक-एक अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जा सकती है.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि नेता-नौकरशाही सूचना के अधिकार कानून और खासकर इस प्रावधान को अपने विशेषाधिकारों और अभी तक हासिल असीमित शक्तियों में कटौती के रूप में देखते रहे हैं. यही कारण है कि जन दबावों के बाद और खुद को प्रगतिशील दिखाने के लिए यू पी ए सरकार ने यह कानून तो बना दिया लेकिन कानून को ईमानदारी और उसकी सच्ची भावना के साथ लागू करने के बजाय उसकी राह में रोड़े अटकाने में लगी रही है. यहां तक कि कानून के लागू होने के दो सालों के अन्दर ही सरकार ने उसके दायरे से फाइल नोटिंग दिखाने के अधिकार को वापस लेने के लिए कानून में संशोधन करने की कोशिश की थी लेकिन जन संगठनो और बुद्धिजीवियों के भारी विरोध के बाद उसे अपने कदम वापस खीचने पड़े थे. इस मायने में, इस कानून में संशोधन के नए प्रयास को पिछले प्रयासों की निरंतरता में ही देखना चाहिए.
सवाल यह है कि केंद्र सरकार को सूचना के अधिकार कानून से क्या शिकायतें हैं? जिस कानून को लागू हुए अभी सिर्फ चार साल हुए हैं, उससे सरकार को ऐसी क्या दिक्कत हो रही है कि वह इस कानून के रचनाकारों और समर्थकों के विरोधों को अनदेखा करते हुए उसमे संशोधन के लिए उतारू है? दरअसल, नौकरशाही को घोषित तौर पर इस कानून से दो शिकायतें हैं. पहला, इस कानून का "दुरुपयोग" किया जा रहा है. कुछ निहित स्वार्थी तत्त्व इस कानून का सहारा लेकर फालतू, परेशान और तंग करनेवाले सवाल पूछ रहे हैं जिससे अधिकारियों को काम करने में बहुत दिक्कत हो रही है, उनका काफी समय ऐसे फालतू और बेकार सवालों का जवाब बनने में चला जा रहा है. यही नहीं, इसे विभागीय राजनीति में किसी अधिकारी के साथ हिसाब-किताब चुकता करने या बदला लेने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है.
दूसरी शिकायत यह है कि फाइल नोटिंग दिखाने का अधिकार देने से अधिकारियों को ईमानदारी से और बिना किसी भय के निर्णय लेने में मुश्किल हो रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके द्वारा फाइल पर की गई नोटिंग सार्वजनिक होने पर उन्हें निहित स्वार्थी तत्वों और बेईमानों का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि ये दोनों शिकायतें बहुत कमजोर, तथ्यहीन, एक तरह की बहानेबाजी और गोपनीयता की संस्कृति को बनाये रखने की मांग हैं. जैसेकि खुद सूचना के अधिकार के लिए लड़नेवाली अरुणा रॉय और दूसरे बुद्धिजीवियों-कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में भी स्पष्ट किया है कि इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं हैं कि इस कानून का इस्तेमाल जानबूझकर "फालतू और तंग" करनेवाले सवाल पूछने के लिए किया जा रहा है और न ही इस बात के कोई प्रमाण हैं कि फाइल नोटिंग दिखाने के अधिकार के कारण ईमानदार और निर्भीक अफसरों को काम करने में दिक्कत हो रही है.
उल्टे सच्चाई यह है कि इस अधिकार के कारण ईमानदार और निर्भीक अफसरों को बिना किसी अवांछित दबाव और भय के फैसला करने में सहूलियत हो रही है. वे उन नेताओं-मंत्रियों-अफसरों को इस कानून और खासकर इस प्रावधान का हवाला देकर उनकी इच्छा के अनुसार नोटिंग करने के दबाव से इंकार कर पा रहे हैं. यह प्रावधान ईमानदार और निर्भीक अफसरों के लिए बडी सुरक्षा साबित हो रहा है जबकि इसके कारण बेईमान और मनमानी करनेवाले अफसरों-नेताओं को मनमाने फैसले करने में जरूर परेशानी हो रही है क्योंकि अब कोई भी फाइल नोटिंग सार्वजनिक करके मनमाने-अवैधानिक-अनुचित फैसलों की जवाबदेही तय करवा सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि इस प्रावधान से नौकरशाही को जिम्मेदार और जवाबदेह बनने के साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सकता है.
रही बात "फालतू और तंग" करनेवाले सवालों को खारिज का अधिकार देने की तो इतना कहना ही काफी है कि अगर इस संशोधन को स्वीकार कर लिया गया तो इस कानून की मूल आत्मा की हत्या हो जायेगी क्योंकि इस प्रावधान का सहारा लेकर कोई भी जन सूचना अधिकारी किसी भी सवाल को "फालतू और तंग" करनेवाले बताकर खारिज कर सकता है. आखिर यह कौन, कैसे और किस आधार पर तय करेगा कि कौन सा सवाल "फालतू और तंग" करनेवाला है? जाहिर है कि इस कानून के तहत पूछे जानेवाले सवालों से अपने भ्रष्टाचार, मनमानेपन, निक्कमेपन और गडबडियों की पोल खुलने के डर से घबराई नौकरशाही ऐसे हर सवाल को "फालतू और तंग" करनेवाला बताकर खारिज करने से नहीं चूकेगी, जिससे उसकी पोल खुलती हो. इसके बाद सूचना के अधिकार कानून में क्या बचेगा? क्या यू पी ए सरकार प्रस्तावित संशोधनों के जरिये इस कानून को ख़त्म करना और एक शोपीस भर बनाना चाहती है?
Friday, November 20, 2009
Wednesday, November 18, 2009
वाम मोर्चा की राह कठिन
आनंद प्रधान
हाल में संपन्न हुए उपचुनावों के नतीजों से एक बार फिर यह साफ हो गया है कि माकपा के नेतृत्व वाले सरकारी वामपंथ की राजनीतिक ढलान न सिर्फ जारी है बल्कि उसकी रफ्तार और तेज होती जा रही है। इस कारण अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने यह भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है कि जिस तरह से केरल और खासकर पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों विशेषकर माकपा के जनाधार में छीजन और बिखराव की प्रक्रिया तेज होती जा रही है, उसे देखते हुए माकपा के लिए अपने इन राजनीतिक किलों को बचा पाना मुश्किल होगा. हालांकि केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2011 में होने हैं और राजनीति में डेढ़ साल का वक्त काफी लम्बा होता है लेकिन केरल और पश्चिम बंगाल में एक के बाद दूसरी चुनावी हारों और गंभीर राजनीतिक, सांगठनिक और वैचारिक समस्याओं और विचलनों के कारण वाम मोर्चा और खासकर उसकी नेता माकपा एक ऐसी वैचारिक और राजनीतिक लकवे की स्थिति में पहुँच गई है कि वह मुकाबले से बाहर होती दिख रही है.
माकपा की मौजूदा लकवाग्रस्त स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह जो कुछ भी कर रही है, उसका दांव उल्टा पड़ रहा है. उदाहरण के लिए माकपा ने इन उपचुनावों के दौरान बाजी हाथ से निकलते देख अपने रिटायर और वयोवृद्ध नेता ज्योति बसु को को आगे करके कांग्रेसी वोटरों के नाम एक अपील जारी करवाई कि राज्य में शांति, विकास और सुरक्षा के लिए वे वाम मोर्चे को वोट करें. लेकिन माकपा का यह 'ट्रंप कार्ड' भी नहीं चला, ज्योति बसु की फजीहत हुई सो अलग. कहने की जरुरत नहीं है कि यह अपील माकपा के बढ़ते राजनीतिक दिवालियेपन का ही एक और नमूना थी. साथ ही, इससे यह भी पता चलता है कि राज्य में वाम मोर्चा खासकर माकपा सत्ता हाथ से निकालता देख किस हद तक बदहवास हो गई है कि ज्योति बसु को भी कांग्रेसी वोटरों से वोट की भीख मांगने के लिए मैदान में उतार दिया।
दरअसल, माकपा की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की सत्ता ही उसके गले का फांस बन गई है. ऐसा लगता है कि वह इन तीनो राज्यों की सत्ता खासकर पश्चिम बंगाल की सरकार के बिना नहीं रह सकती है. इसकी वजह यह है कि केरल में हर पांच साल में सरकार बदलती रहती है और त्रिपुरा राजनीतिक रूप से महत्वहीन है लेकिन पश्चिम बंगाल की बात ही अलग है जहाँ पिछले 32 वर्षों से वाम मोर्चा सत्ता में बना हुआ है. माकपा में पश्चिम बंगाल की सत्ता को लेकर इस कदर मोह है कि उसकी पूरी राजनीति इस बात से तय होती रही है कि राज्य में इस सत्ता को किस तरह से सुरक्षित रखा जाए. इसके लिए वह हर तरह के समझौते के लिए यहां तक कि अपने राजनीतिक-वैचारिक मुद्दों को भी कुर्बान करती रही है.
सत्ता के प्रति इस व्यामोह और समझौते की राजनीति का ही नतीजा है कि माकपा जिन आर्थिक नीतियों खासकर उदारीकरण-भूमंडलीकरण-निजीकरण का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध करती रही है, उन्हीं नीतियों को पश्चिम बंगाल समेत अन्य वाम मोर्चा शासित राज्यों में जोरशोर से लागू करने में उसे कोई शर्म नहीं महसूस होती है। इसका परिणाम सबके सामने है. सिंगुर से लेकर नंदीग्राम तक और अब लालगढ़ में माकपा की राजनीति का यही दोहरापन खुलकर सामने आया है. माकपा का यह वैचारिक-राजनीतिक स्खलन बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुँच गया कि पार्टी कांग्रेस को बुर्जुआ-सामंती पार्टी मानते हुए भी केंद्र में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर कांग्रेस को यू पी ए गठबंधन की सरकार साढ़े चार साल तक चलाने में न सिर्फ मदद करती रही बल्कि गठबंधन सरकार की संकटमोचक की भूमिका निभाती रही.
असल में, माकपा की राजनीति की सबसे बड़ी सीमा यही सत्ता की राजनीति बन गई है। सत्ता के साथ अनिवार्य रूप से जो बुराइयां आती हैं, वह माकपा में भी सहज ही देखी जा सकती हैं. यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में 32 सालों तक सत्ता में रहने के बाद माकपा का जो राजनीतिक-वैचारिक रूपांतरण हुआ है, उसमे वह वास्तव में एक कम्युनिस्ट पार्टी तो दूर, एक सच्ची वामपंथी पार्टी भी नहीं रह गई है. आश्चर्य नहीं कि माकपा चाहे पश्चिम बंगाल हो या केरल- हर जगह किसी भी बुर्जुआ पार्टी की तरह ही तमाम राजनीतिक स्खलनों जैसे भ्रष्टाचार, सार्वजनिक धन की लूट, भाई-भतीजावाद, गुंडागर्दी, ठेकेदारी आदि में आकंठ डूबी हुई दिखाई पड़ती है. इससे बचने का एक ही तरीका हो सकता था और वह यह कि पार्टी अपनी राज्य सरकारों की परवाह किये बगैर जनता खासकर हाशिये पर पड़े गरीबों-मजदूरों-दलितों-आदिवासियों के हक-हुकूक की लडाई को आगे बढाती.
इससे माकपा और वाम मोर्चा खुद को संसदीय राजनीति की सीमाओं में बांधने और उसके स्खलनों में फिसलने से बचा सकते थे। जनांदोलनों से न सिर्फ राज्य सरकारों को पूरी तरह से नौकरशाही के हाथ में जाने से रोका जा सकता था बल्कि उसे वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता था. यही नहीं, जनान्दोलनों के जरिये उन अवसरवादी-भ्रष्ट और ठेकेदार-गुंडा तत्वों को भी पार्टी से दूर रखा जा सकता था, जो आज पार्टी की पहचान बन गए हैं. माकपा इस सच्चाई से मुंह कैसे चुरा सकती है कि पार्टी आज पश्चिम बंगाल में सत्ता इसलिए गंवाने जा रही है कि क्योंकि उसका अपने मूल जनाधार ग्रामीण गरीबों-खेतिहर मजदूरों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों से सम्बन्ध टूट चुका है. क्योंकि राज्य में विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है, यहां तक कि नरेगा जैसी योजनाओं को लागू करने के मामले में लापरवाही और सुस्ती दिखाई गई. पी डी एस राशन भी के लिए भी राज्य में दंगे हुए.
लेकिन माकपा पर सत्ता का मोह और उसका नशा इस कदर चढ़ा हुआ है कि वह लोकसभा चुनावों और उसके बाद अब नगरपालिकाओं और विधानसभा उपचुनावों की हार से कोई सबक सिखाने के लिए तैयार नहीं है. हालांकि वह पार्टी में "शुद्धिकरण अभियान" चलाने की बात कर रही है लेकिन मुश्किल यह है कि सत्ता से चिपके रहने की ऐसी लत लग गई है कि न सिर्फ इस अभियान की सफलता पर संदेह है बल्कि पार्टी जल्दबाजी में एक बार फिर उन्हीं बुर्जुआ पार्टियों के साथ जोड़तोड़ करके राजनीति में खड़े होने का ख्वाब देख रही है. यहां तक कि वह पश्चिम बंगाल में तृणमूल-कांग्रेस के गठबंधन में दरार डालने और कांग्रेस से गलबहियां करने की हास्यास्पद कोशिश कर रही है. दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के नाम पर एक बार फिर वह सपा,बसपा,टीडीपी और अन्ना द्रमुक के पीछे लटकने की तैयारी कर रही है. जाहिर है कि इन आजमाए हुए फ्लॉप टोटकों से माकपा की मुश्किलें खत्म होनेवाली नहीं हैं.
हाल में संपन्न हुए उपचुनावों के नतीजों से एक बार फिर यह साफ हो गया है कि माकपा के नेतृत्व वाले सरकारी वामपंथ की राजनीतिक ढलान न सिर्फ जारी है बल्कि उसकी रफ्तार और तेज होती जा रही है। इस कारण अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने यह भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है कि जिस तरह से केरल और खासकर पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों विशेषकर माकपा के जनाधार में छीजन और बिखराव की प्रक्रिया तेज होती जा रही है, उसे देखते हुए माकपा के लिए अपने इन राजनीतिक किलों को बचा पाना मुश्किल होगा. हालांकि केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2011 में होने हैं और राजनीति में डेढ़ साल का वक्त काफी लम्बा होता है लेकिन केरल और पश्चिम बंगाल में एक के बाद दूसरी चुनावी हारों और गंभीर राजनीतिक, सांगठनिक और वैचारिक समस्याओं और विचलनों के कारण वाम मोर्चा और खासकर उसकी नेता माकपा एक ऐसी वैचारिक और राजनीतिक लकवे की स्थिति में पहुँच गई है कि वह मुकाबले से बाहर होती दिख रही है.
माकपा की मौजूदा लकवाग्रस्त स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह जो कुछ भी कर रही है, उसका दांव उल्टा पड़ रहा है. उदाहरण के लिए माकपा ने इन उपचुनावों के दौरान बाजी हाथ से निकलते देख अपने रिटायर और वयोवृद्ध नेता ज्योति बसु को को आगे करके कांग्रेसी वोटरों के नाम एक अपील जारी करवाई कि राज्य में शांति, विकास और सुरक्षा के लिए वे वाम मोर्चे को वोट करें. लेकिन माकपा का यह 'ट्रंप कार्ड' भी नहीं चला, ज्योति बसु की फजीहत हुई सो अलग. कहने की जरुरत नहीं है कि यह अपील माकपा के बढ़ते राजनीतिक दिवालियेपन का ही एक और नमूना थी. साथ ही, इससे यह भी पता चलता है कि राज्य में वाम मोर्चा खासकर माकपा सत्ता हाथ से निकालता देख किस हद तक बदहवास हो गई है कि ज्योति बसु को भी कांग्रेसी वोटरों से वोट की भीख मांगने के लिए मैदान में उतार दिया।
दरअसल, माकपा की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की सत्ता ही उसके गले का फांस बन गई है. ऐसा लगता है कि वह इन तीनो राज्यों की सत्ता खासकर पश्चिम बंगाल की सरकार के बिना नहीं रह सकती है. इसकी वजह यह है कि केरल में हर पांच साल में सरकार बदलती रहती है और त्रिपुरा राजनीतिक रूप से महत्वहीन है लेकिन पश्चिम बंगाल की बात ही अलग है जहाँ पिछले 32 वर्षों से वाम मोर्चा सत्ता में बना हुआ है. माकपा में पश्चिम बंगाल की सत्ता को लेकर इस कदर मोह है कि उसकी पूरी राजनीति इस बात से तय होती रही है कि राज्य में इस सत्ता को किस तरह से सुरक्षित रखा जाए. इसके लिए वह हर तरह के समझौते के लिए यहां तक कि अपने राजनीतिक-वैचारिक मुद्दों को भी कुर्बान करती रही है.
सत्ता के प्रति इस व्यामोह और समझौते की राजनीति का ही नतीजा है कि माकपा जिन आर्थिक नीतियों खासकर उदारीकरण-भूमंडलीकरण-निजीकरण का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध करती रही है, उन्हीं नीतियों को पश्चिम बंगाल समेत अन्य वाम मोर्चा शासित राज्यों में जोरशोर से लागू करने में उसे कोई शर्म नहीं महसूस होती है। इसका परिणाम सबके सामने है. सिंगुर से लेकर नंदीग्राम तक और अब लालगढ़ में माकपा की राजनीति का यही दोहरापन खुलकर सामने आया है. माकपा का यह वैचारिक-राजनीतिक स्खलन बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुँच गया कि पार्टी कांग्रेस को बुर्जुआ-सामंती पार्टी मानते हुए भी केंद्र में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर कांग्रेस को यू पी ए गठबंधन की सरकार साढ़े चार साल तक चलाने में न सिर्फ मदद करती रही बल्कि गठबंधन सरकार की संकटमोचक की भूमिका निभाती रही.
असल में, माकपा की राजनीति की सबसे बड़ी सीमा यही सत्ता की राजनीति बन गई है। सत्ता के साथ अनिवार्य रूप से जो बुराइयां आती हैं, वह माकपा में भी सहज ही देखी जा सकती हैं. यही कारण है कि पश्चिम बंगाल में 32 सालों तक सत्ता में रहने के बाद माकपा का जो राजनीतिक-वैचारिक रूपांतरण हुआ है, उसमे वह वास्तव में एक कम्युनिस्ट पार्टी तो दूर, एक सच्ची वामपंथी पार्टी भी नहीं रह गई है. आश्चर्य नहीं कि माकपा चाहे पश्चिम बंगाल हो या केरल- हर जगह किसी भी बुर्जुआ पार्टी की तरह ही तमाम राजनीतिक स्खलनों जैसे भ्रष्टाचार, सार्वजनिक धन की लूट, भाई-भतीजावाद, गुंडागर्दी, ठेकेदारी आदि में आकंठ डूबी हुई दिखाई पड़ती है. इससे बचने का एक ही तरीका हो सकता था और वह यह कि पार्टी अपनी राज्य सरकारों की परवाह किये बगैर जनता खासकर हाशिये पर पड़े गरीबों-मजदूरों-दलितों-आदिवासियों के हक-हुकूक की लडाई को आगे बढाती.
इससे माकपा और वाम मोर्चा खुद को संसदीय राजनीति की सीमाओं में बांधने और उसके स्खलनों में फिसलने से बचा सकते थे। जनांदोलनों से न सिर्फ राज्य सरकारों को पूरी तरह से नौकरशाही के हाथ में जाने से रोका जा सकता था बल्कि उसे वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता था. यही नहीं, जनान्दोलनों के जरिये उन अवसरवादी-भ्रष्ट और ठेकेदार-गुंडा तत्वों को भी पार्टी से दूर रखा जा सकता था, जो आज पार्टी की पहचान बन गए हैं. माकपा इस सच्चाई से मुंह कैसे चुरा सकती है कि पार्टी आज पश्चिम बंगाल में सत्ता इसलिए गंवाने जा रही है कि क्योंकि उसका अपने मूल जनाधार ग्रामीण गरीबों-खेतिहर मजदूरों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों से सम्बन्ध टूट चुका है. क्योंकि राज्य में विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है, यहां तक कि नरेगा जैसी योजनाओं को लागू करने के मामले में लापरवाही और सुस्ती दिखाई गई. पी डी एस राशन भी के लिए भी राज्य में दंगे हुए.
लेकिन माकपा पर सत्ता का मोह और उसका नशा इस कदर चढ़ा हुआ है कि वह लोकसभा चुनावों और उसके बाद अब नगरपालिकाओं और विधानसभा उपचुनावों की हार से कोई सबक सिखाने के लिए तैयार नहीं है. हालांकि वह पार्टी में "शुद्धिकरण अभियान" चलाने की बात कर रही है लेकिन मुश्किल यह है कि सत्ता से चिपके रहने की ऐसी लत लग गई है कि न सिर्फ इस अभियान की सफलता पर संदेह है बल्कि पार्टी जल्दबाजी में एक बार फिर उन्हीं बुर्जुआ पार्टियों के साथ जोड़तोड़ करके राजनीति में खड़े होने का ख्वाब देख रही है. यहां तक कि वह पश्चिम बंगाल में तृणमूल-कांग्रेस के गठबंधन में दरार डालने और कांग्रेस से गलबहियां करने की हास्यास्पद कोशिश कर रही है. दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के नाम पर एक बार फिर वह सपा,बसपा,टीडीपी और अन्ना द्रमुक के पीछे लटकने की तैयारी कर रही है. जाहिर है कि इन आजमाए हुए फ्लॉप टोटकों से माकपा की मुश्किलें खत्म होनेवाली नहीं हैं.
Monday, November 16, 2009
क्यों टूट रहा है मुलायम सिंह का जादू ?
आनंद प्रधान
कहते हैं कि किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती है. संस्कृत की भी एक कहावत है- अति सर्वत्र वर्जयेत. लेकिन लगता है कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को यह पता नहीं है, अन्यथा वह फिरोजाबाद में अपनी बहु और पार्टी सांसद अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने से पहले दस बार जरुर सोचते. माना कि परिवारवाद आज की भारतीय राजनीति की एक सर्वव्यापी सच्चाई बन चुका है और कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं बची है लेकिन परिवारवाद की भी एक हद है, यह मुलायम सिंह भूल गए. ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश खासकर फिरोजाबाद के मतदाताओं ने इस बार तय कर लिया था कि मुलायम सिंह यादव को यह हद बता दिया जाना चाहिए.
नतीजा सबके सामने है. समाजवादी पार्टी और उससे अधिक उसके नेता मुलायम सिंह अपने ही गढ़ में मत खा गए. फिरोजाबाद के मतदाताओं ने राजनीतिक रूप से लगभग असंभव को संभव कर दिखाते हुए मुलायम सिंह की बहु को नकार कर कांग्रेस के राज बब्बर को 85 हजार से अधिक वोटों से जीता दिया. यह कांग्रेस और राज बब्बर की जीत से अधिक मुलायम सिंह की हार है. यह मुलायम सिंह से ज्यादा मुलायम सिंह की परिवारवादी राजनीति की हार है. उन्होंने जिस तरह से समाजवाद के नाम पर पूरी बेशर्मी से पार्टी को अपने परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है, उसे फिरोजाबाद के मतदाताओं ने अब और बर्दाश्त करने से इंकार कर दिया. सचमुच, यह कितना सुंदर और जनतान्त्रिक न्याय है कि परिवारवाद की इस बेशर्म राजनीति को और किसी ने नहीं बल्कि मुलायम सिंह की राजनीति के गढ़ या कहिये घर के मतदाताओं ने ही नकार दिया.
यह ठीक है कि इस हार को पूरे उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों के नतीजों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है जहां समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बहुत ख़राब और निराशाजनक रहा है. इस मायने में, फिरोजाबाद की हार पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक ट्रेंड के अनुरूप ही है. यह भी ठीक है कि फिरोजाबाद में डिम्पल यादव की हार के और भी कई कारण हैं. लेकिन कम से कम डिम्पल की हार का कारण वह नहीं है जो कांग्रेस पार्टी और यहां तक कि समाजवादी पार्टी भी बताने की कोशिश कर रही है. निश्चय ही, डिम्पल केवल इस लिए नहीं हारीं कि राज बब्बर के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने प्रचार किया. कांग्रेस अगर यह दावा कर रही है तो यह बहुत स्वाभाविक है. कांग्रेस में चापलूसी की 'उच्च परंपरा' के अनुसार पार्टी की जीत का सेहरा हमेशा से नेता के सिर बंधता रहा है और नेता अगर नेहरू-गाँधी परिवार का और भविष्य का प्रधानमंत्री हो तो भला कांग्रेस में उसके अलावा किसी और को श्रेय देने का कुफ्र कौन कर सकता है?
लेकिन हैरानी की बात यह है कि समाजवादी पार्टी भी अपनी हार का श्रेय राहुल गाँधी को दे रही है. पार्टी महासचिव अमर सिंह और खुद अखिलेश यादव फिरोजाबाद में राहुल गाँधी के प्रचार करने पर नाराजगी जता चुके हैं. अखिलेश ने तो इसे बिलकुल व्यक्तिगत लडाई की तरह लेते हुए ऐलान किया है कि अब उत्तर प्रदेश में वह खुद युवराज का मुकाबला करेंगे. उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि फिरोजाबाद में राहुल गाँधी यह जानते हुए भी कि यहां से मुलायम सिंह की बहु उम्मीदवार है, चुनाव प्रचार के लिए क्यों आये? जबकि समाजवादी पार्टी ने नेहरु-गाँधी परिवार के प्रति अपना सम्मान जताते हुए सोनिया और राहुल गाँधी के खिलाफ रायबरेली और अमेठी में कोई उम्मीदवार खडा नहीं किया था. साफ है कि समाजवादी पार्टी इस शिकायत के जरिये यह कहने की कोशिश कर रही है कि एक-दूसरे के पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए यानि जहां एक के परिवार के लोग चुनाव मैदान में हों, वहां दूसरे के परिवार को दूर रहना चाहिए.
जाहिर है कि ऐसा कहकर सपा अपने हार के वास्तविक कारण- नग्न परिवारवाद पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. कहने की जरुरत नहीं है कि यह एक ऐसा तर्क है जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. यही नहीं, यह तर्क देकर समाजवादी पार्टी परिवारवाद की राजनीति का भी बचाव करने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि वह उस कड़वी सच्चाई से आंख चुराने की कोशिश कर रही है जो सीधे उनके घर फिरोजाबाद से आई है. फिरोजाबाद का सन्देश साफ है कि समाजवाद के नाम पर परिवारवाद की अति की राजनीति अब और नहीं चलेगी. मुलायम सिंह के लिए यह सोचने का समय आ गया है कि आखिर वह परिवारवाद को कहाँ तक ले जाना चाहते हैं? जिस तरह से पूरी पार्टी खुद उनके परिवार तक सिमटती जा रही है और बाकी जो बचा-खुचा है, वहां अमर सिंह का फ़िल्मी परिवार काबिज है, उसके बाद वहां बाकी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए और क्या बचता है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के टूटते राजनीतिक जादू की सबसे बड़ी वजह भी यही है. उन्होंने न सिर्फ पार्टी को पूरी तरह से अपने परिवार की संपत्ति बना दिया है बल्कि उसे जिस तरह से एक पारिवारिक निजी मालिकानेवाली पार्टी की तरह से चला रहे हैं, उसमें आज नहीं तो कल समाजवादी पार्टी का यही हश्र होना है. एक पार्टी जिसके अन्दर कोई लोकतंत्र नहीं है और प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह चलाई जा रही है, उसमे अमर सिंह जैसे मैनेजर और उनका राजनीतिक-आर्थिक कारोबार तो फलफूल सकता है लेकिन वह उत्तर प्रदेश जैसे जटिलता और विविधतापूर्ण राज्य की राजनीति और समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है. इस कारण सपा में साफ तौर पर एक "लोकतान्त्रिक घाटा" दिखाई पड़ रहा है.
इस "लोकतान्त्रिक घाटे" का ही नतीजा है कि पार्टी राज्य में न सिर्फ अपना सामाजिक जनाधार खोती जा रही है बल्कि उसे जमीनी सच्चाइयों का भी अंदाजा नहीं रह गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कारण है कि लोगों की नब्ज पर हाथ रखने का दावा करनेवाले मुलायम सिंह को भाजपा के पूर्व नेता और बाबरी मस्जिद गिराने के प्रमुख दोषी माने जानेवाले कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के नतीजों का अंदाजा नहीं हो पाया? आखिर यह मुलायम की कैसी समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा है कि उसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषी कल्याण के लिए भी जगह बन गई? दोहराने की जरुरत नहीं है कि पिछले लोकसभा चुनावों और अब उपचुनावों में सपा की अपमानजनक हार के पीछे एक बड़ी वजह अल्पसंख्यक मतदाताओं का सपा को छोड़ जाना है. इसके बाद अब यह राजनीतिक अवसरवाद की इन्तहा है कि बिना अपने किये की माफ़ी मांगे कल्याण सिंह से किनारा भी कर लिया.
यह सब निजी रिश्तों के नाम पर जायज ठहराया गया. लेकिन सवाल मुलायम सिंह और कल्याण सिंह के निजी रिश्तों का नहीं है. मुद्दा है एक ऐसे नेता और उसके राजनीतिक-वैचारिक अतीत के साथ राजनीतिक दोस्ती का जो सपा की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के साथ पूरी तरह से असंगत है. ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह को यह पता नहीं है लेकिन कल्याण सिंह या फिर अमर सिंह या अनिल अम्बानी और अमिताभ बच्चन के साथ निजी और राजनीतिक दोस्ती के फर्क को वही नेता भूल सकता है जिसके लिए अपनी राजनीति और वैचारिकी से पहले और ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तिगत रिश्ते हों. इन व्यक्तिगत रिश्तों को निभाने की ऐसी जिद वही राजनेता कर सकता है जो अपनी राजनीति को परिवार के दायरे से बाहर नहीं देख पाता हो.
जाहिर है कि परिवार तक सिमटी हुई राजनीति कभी भी समावेशी नहीं हो सकती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अब बिना समावेशी राजनीति के खड़े रह पाना मुश्किल है. 2007 के विधानसभा चुनावों के पहले से ही यह स्पष्ट होने लगा था और चुनावों के बाद उसकी पुष्टि भी हो गई कि उत्तर प्रदेश में संकीर्ण जातीय और धार्मिक गोलबंदी की राजनीति का तेल खत्म होने लगा है और जो भी पार्टी सामाजिक जनाधार को फैलाने और विस्तृत करने की ईमानदार कोशिश नहीं करेगी, वह बहुत दूर तक नहीं चल पायेगी. बसपा ने कई सीमाओं के साथ 2007 में अपनी "सामाजिक इंजीनियरिंग" से कुछ हद तक यह करिश्मा कर दिखाया लेकिन मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को साथ लेकर जिस व्यापक पिछड़ा गोलबंदी की कोशिश की, उसने अल्पसंख्यक मतदाताओं को नाराज और पार्टी से दूर कर दिया.
कहने की जरुरत नहीं है कि सपा और मुलायम को पहले लोकसभा और अब उपचुनावों के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम वोटरों के पार्टी से छिटकने के कारण हुआ है. सभी जानते हैं कि मुस्लिम और पिछडी जातियों में मुख्य रूप से यादव सपा के मूल आधार रहे हैं. लेकिन मुस्लिम वोटरों के खिसकने के साथ पार्टी के जनाधार में बिखराव और छीजन की एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो गई है कि उसके मूल आधार पिछडी किसान जातियों खासकर यादवों के एक हिस्से ने भी किनारा करना शुरू कर दिया है. इसका संकेत उपचुनावों के नतीजों में साफ देखा जा सकता है. सपा न सिर्फ फिरोजाबाद की "घरेलू" मानी जानेवाली लोकसभा सीट हार गई बल्कि मुलायम के गढ़ में पड़नेवाली भरथना और इटावा की विधानसभा सीटें भी हार गईं. यही नहीं, पार्टी 2007 के विधानसभा चुनावों में जीती अपनी पांचों सीटें- इसौली,हैंसर बाज़ार,पुवायां, भरथना और इटावा हार गईं.
सबसे शर्मनाक बात तो यह हुई कि पार्टी 11 विधानसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत पाई और कई सीटों पर तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंच गई. मुलायम सिंह के लिए यह खतरे की घंटी है. इसकी वजह यह है कि अगर सपा उत्तर प्रदेश में बसपा से सीधे मुकाबले से बाहर हुई तो उसके लिए अपने खिसकते जनाधार को संभाल पाना और मुश्किल हो जायेगा. कांग्रेस इसी मौके का इंतजार कर रही है. उसकी पूरी कोशिश यह है कि वह 2012 के विधानसभा चुनावों से पहले बसपा से सीधे मुकाबले में आ जाए. कहने की जरुरत नहीं है कि जो पार्टी बसपा से सीधे मुकाबले में होगी, उसे बसपा सरकार के खिलाफ बने विक्षोभ और नाराजगी का सीधा फायदा मिलेगा. हालांकि अभी कोई भी निष्कर्ष निकालना थोडी जल्दबाजी होगी लेकिन उपचुनावों के नतीजों से यह साफ है कि सपा की राजनीतिक जमीन खिसक रही है और वह बसपा से सीधे मुकाबले में बाहर हो रही है.
लेकिन इसके लिए और कोई नहीं बल्कि खुद मुलायम सिंह जिम्मेदार हैं जिन्होंने समाजवाद के नाम पर पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह की राजनीति को आगे बढाया है, वह अब बंद गली के आखिरी मुहाने पर पहुंच गई है. यहां से आगे का रास्ता बंद है और नए रास्ते खोलने के लिए उन्हें न सिर्फ परिवारवाद (और अमरवाद मार्का समाजवाद) से पीछा छुडाना पड़ेगा बल्कि समाजवादी राजनीति की जड़ों की ओर लौटना होगा. उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार को और समावेशी बनाने के लिए आम आदमी के मुद्दों पर जनसंघर्षों और ग्रामीण गरीबों, किसानो,बुनकरों,दलितों और अल्पसंख्यकों के हक़-हुकूक की लडाई में उतरना होगा.
जाहिर है कि विपक्ष की राजनीति पांच सितारा होटलों और सैरगाहों से नहीं चल सकती है. लेकिन जिस पार्टी के नेता अपने भाई-भतीजे-बेटे-बहू और अमर सिंह, संजय दत्त, जया बच्चन जैसे हों, उससे इसकी उम्मीद करना भी बेकार है. कहने की जरुरत नहीं है कि सपा की मौजूदा पारिवारिक-कारपोरेट राजनीति में अवसरवादी-दलाल-भ्रष्ट-ठेकेदार-गुंडा-माफिया तत्व ही फलफूल सकते हैं. लेकिन इस राजनीति की सीमाएं उजागर हो चुकी हैं. अब यह मुलायम को तय करना है कि वह किस रास्ते जायेंगे.
कहते हैं कि किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती है. संस्कृत की भी एक कहावत है- अति सर्वत्र वर्जयेत. लेकिन लगता है कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को यह पता नहीं है, अन्यथा वह फिरोजाबाद में अपनी बहु और पार्टी सांसद अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने से पहले दस बार जरुर सोचते. माना कि परिवारवाद आज की भारतीय राजनीति की एक सर्वव्यापी सच्चाई बन चुका है और कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं बची है लेकिन परिवारवाद की भी एक हद है, यह मुलायम सिंह भूल गए. ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश खासकर फिरोजाबाद के मतदाताओं ने इस बार तय कर लिया था कि मुलायम सिंह यादव को यह हद बता दिया जाना चाहिए.
नतीजा सबके सामने है. समाजवादी पार्टी और उससे अधिक उसके नेता मुलायम सिंह अपने ही गढ़ में मत खा गए. फिरोजाबाद के मतदाताओं ने राजनीतिक रूप से लगभग असंभव को संभव कर दिखाते हुए मुलायम सिंह की बहु को नकार कर कांग्रेस के राज बब्बर को 85 हजार से अधिक वोटों से जीता दिया. यह कांग्रेस और राज बब्बर की जीत से अधिक मुलायम सिंह की हार है. यह मुलायम सिंह से ज्यादा मुलायम सिंह की परिवारवादी राजनीति की हार है. उन्होंने जिस तरह से समाजवाद के नाम पर पूरी बेशर्मी से पार्टी को अपने परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है, उसे फिरोजाबाद के मतदाताओं ने अब और बर्दाश्त करने से इंकार कर दिया. सचमुच, यह कितना सुंदर और जनतान्त्रिक न्याय है कि परिवारवाद की इस बेशर्म राजनीति को और किसी ने नहीं बल्कि मुलायम सिंह की राजनीति के गढ़ या कहिये घर के मतदाताओं ने ही नकार दिया.
यह ठीक है कि इस हार को पूरे उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों के नतीजों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है जहां समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बहुत ख़राब और निराशाजनक रहा है. इस मायने में, फिरोजाबाद की हार पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक ट्रेंड के अनुरूप ही है. यह भी ठीक है कि फिरोजाबाद में डिम्पल यादव की हार के और भी कई कारण हैं. लेकिन कम से कम डिम्पल की हार का कारण वह नहीं है जो कांग्रेस पार्टी और यहां तक कि समाजवादी पार्टी भी बताने की कोशिश कर रही है. निश्चय ही, डिम्पल केवल इस लिए नहीं हारीं कि राज बब्बर के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने प्रचार किया. कांग्रेस अगर यह दावा कर रही है तो यह बहुत स्वाभाविक है. कांग्रेस में चापलूसी की 'उच्च परंपरा' के अनुसार पार्टी की जीत का सेहरा हमेशा से नेता के सिर बंधता रहा है और नेता अगर नेहरू-गाँधी परिवार का और भविष्य का प्रधानमंत्री हो तो भला कांग्रेस में उसके अलावा किसी और को श्रेय देने का कुफ्र कौन कर सकता है?
लेकिन हैरानी की बात यह है कि समाजवादी पार्टी भी अपनी हार का श्रेय राहुल गाँधी को दे रही है. पार्टी महासचिव अमर सिंह और खुद अखिलेश यादव फिरोजाबाद में राहुल गाँधी के प्रचार करने पर नाराजगी जता चुके हैं. अखिलेश ने तो इसे बिलकुल व्यक्तिगत लडाई की तरह लेते हुए ऐलान किया है कि अब उत्तर प्रदेश में वह खुद युवराज का मुकाबला करेंगे. उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि फिरोजाबाद में राहुल गाँधी यह जानते हुए भी कि यहां से मुलायम सिंह की बहु उम्मीदवार है, चुनाव प्रचार के लिए क्यों आये? जबकि समाजवादी पार्टी ने नेहरु-गाँधी परिवार के प्रति अपना सम्मान जताते हुए सोनिया और राहुल गाँधी के खिलाफ रायबरेली और अमेठी में कोई उम्मीदवार खडा नहीं किया था. साफ है कि समाजवादी पार्टी इस शिकायत के जरिये यह कहने की कोशिश कर रही है कि एक-दूसरे के पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए यानि जहां एक के परिवार के लोग चुनाव मैदान में हों, वहां दूसरे के परिवार को दूर रहना चाहिए.
जाहिर है कि ऐसा कहकर सपा अपने हार के वास्तविक कारण- नग्न परिवारवाद पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. कहने की जरुरत नहीं है कि यह एक ऐसा तर्क है जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. यही नहीं, यह तर्क देकर समाजवादी पार्टी परिवारवाद की राजनीति का भी बचाव करने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि वह उस कड़वी सच्चाई से आंख चुराने की कोशिश कर रही है जो सीधे उनके घर फिरोजाबाद से आई है. फिरोजाबाद का सन्देश साफ है कि समाजवाद के नाम पर परिवारवाद की अति की राजनीति अब और नहीं चलेगी. मुलायम सिंह के लिए यह सोचने का समय आ गया है कि आखिर वह परिवारवाद को कहाँ तक ले जाना चाहते हैं? जिस तरह से पूरी पार्टी खुद उनके परिवार तक सिमटती जा रही है और बाकी जो बचा-खुचा है, वहां अमर सिंह का फ़िल्मी परिवार काबिज है, उसके बाद वहां बाकी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए और क्या बचता है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के टूटते राजनीतिक जादू की सबसे बड़ी वजह भी यही है. उन्होंने न सिर्फ पार्टी को पूरी तरह से अपने परिवार की संपत्ति बना दिया है बल्कि उसे जिस तरह से एक पारिवारिक निजी मालिकानेवाली पार्टी की तरह से चला रहे हैं, उसमें आज नहीं तो कल समाजवादी पार्टी का यही हश्र होना है. एक पार्टी जिसके अन्दर कोई लोकतंत्र नहीं है और प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह चलाई जा रही है, उसमे अमर सिंह जैसे मैनेजर और उनका राजनीतिक-आर्थिक कारोबार तो फलफूल सकता है लेकिन वह उत्तर प्रदेश जैसे जटिलता और विविधतापूर्ण राज्य की राजनीति और समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है. इस कारण सपा में साफ तौर पर एक "लोकतान्त्रिक घाटा" दिखाई पड़ रहा है.
इस "लोकतान्त्रिक घाटे" का ही नतीजा है कि पार्टी राज्य में न सिर्फ अपना सामाजिक जनाधार खोती जा रही है बल्कि उसे जमीनी सच्चाइयों का भी अंदाजा नहीं रह गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कारण है कि लोगों की नब्ज पर हाथ रखने का दावा करनेवाले मुलायम सिंह को भाजपा के पूर्व नेता और बाबरी मस्जिद गिराने के प्रमुख दोषी माने जानेवाले कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के नतीजों का अंदाजा नहीं हो पाया? आखिर यह मुलायम की कैसी समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा है कि उसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषी कल्याण के लिए भी जगह बन गई? दोहराने की जरुरत नहीं है कि पिछले लोकसभा चुनावों और अब उपचुनावों में सपा की अपमानजनक हार के पीछे एक बड़ी वजह अल्पसंख्यक मतदाताओं का सपा को छोड़ जाना है. इसके बाद अब यह राजनीतिक अवसरवाद की इन्तहा है कि बिना अपने किये की माफ़ी मांगे कल्याण सिंह से किनारा भी कर लिया.
यह सब निजी रिश्तों के नाम पर जायज ठहराया गया. लेकिन सवाल मुलायम सिंह और कल्याण सिंह के निजी रिश्तों का नहीं है. मुद्दा है एक ऐसे नेता और उसके राजनीतिक-वैचारिक अतीत के साथ राजनीतिक दोस्ती का जो सपा की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के साथ पूरी तरह से असंगत है. ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह को यह पता नहीं है लेकिन कल्याण सिंह या फिर अमर सिंह या अनिल अम्बानी और अमिताभ बच्चन के साथ निजी और राजनीतिक दोस्ती के फर्क को वही नेता भूल सकता है जिसके लिए अपनी राजनीति और वैचारिकी से पहले और ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तिगत रिश्ते हों. इन व्यक्तिगत रिश्तों को निभाने की ऐसी जिद वही राजनेता कर सकता है जो अपनी राजनीति को परिवार के दायरे से बाहर नहीं देख पाता हो.
जाहिर है कि परिवार तक सिमटी हुई राजनीति कभी भी समावेशी नहीं हो सकती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अब बिना समावेशी राजनीति के खड़े रह पाना मुश्किल है. 2007 के विधानसभा चुनावों के पहले से ही यह स्पष्ट होने लगा था और चुनावों के बाद उसकी पुष्टि भी हो गई कि उत्तर प्रदेश में संकीर्ण जातीय और धार्मिक गोलबंदी की राजनीति का तेल खत्म होने लगा है और जो भी पार्टी सामाजिक जनाधार को फैलाने और विस्तृत करने की ईमानदार कोशिश नहीं करेगी, वह बहुत दूर तक नहीं चल पायेगी. बसपा ने कई सीमाओं के साथ 2007 में अपनी "सामाजिक इंजीनियरिंग" से कुछ हद तक यह करिश्मा कर दिखाया लेकिन मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को साथ लेकर जिस व्यापक पिछड़ा गोलबंदी की कोशिश की, उसने अल्पसंख्यक मतदाताओं को नाराज और पार्टी से दूर कर दिया.
कहने की जरुरत नहीं है कि सपा और मुलायम को पहले लोकसभा और अब उपचुनावों के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम वोटरों के पार्टी से छिटकने के कारण हुआ है. सभी जानते हैं कि मुस्लिम और पिछडी जातियों में मुख्य रूप से यादव सपा के मूल आधार रहे हैं. लेकिन मुस्लिम वोटरों के खिसकने के साथ पार्टी के जनाधार में बिखराव और छीजन की एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो गई है कि उसके मूल आधार पिछडी किसान जातियों खासकर यादवों के एक हिस्से ने भी किनारा करना शुरू कर दिया है. इसका संकेत उपचुनावों के नतीजों में साफ देखा जा सकता है. सपा न सिर्फ फिरोजाबाद की "घरेलू" मानी जानेवाली लोकसभा सीट हार गई बल्कि मुलायम के गढ़ में पड़नेवाली भरथना और इटावा की विधानसभा सीटें भी हार गईं. यही नहीं, पार्टी 2007 के विधानसभा चुनावों में जीती अपनी पांचों सीटें- इसौली,हैंसर बाज़ार,पुवायां, भरथना और इटावा हार गईं.
सबसे शर्मनाक बात तो यह हुई कि पार्टी 11 विधानसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत पाई और कई सीटों पर तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंच गई. मुलायम सिंह के लिए यह खतरे की घंटी है. इसकी वजह यह है कि अगर सपा उत्तर प्रदेश में बसपा से सीधे मुकाबले से बाहर हुई तो उसके लिए अपने खिसकते जनाधार को संभाल पाना और मुश्किल हो जायेगा. कांग्रेस इसी मौके का इंतजार कर रही है. उसकी पूरी कोशिश यह है कि वह 2012 के विधानसभा चुनावों से पहले बसपा से सीधे मुकाबले में आ जाए. कहने की जरुरत नहीं है कि जो पार्टी बसपा से सीधे मुकाबले में होगी, उसे बसपा सरकार के खिलाफ बने विक्षोभ और नाराजगी का सीधा फायदा मिलेगा. हालांकि अभी कोई भी निष्कर्ष निकालना थोडी जल्दबाजी होगी लेकिन उपचुनावों के नतीजों से यह साफ है कि सपा की राजनीतिक जमीन खिसक रही है और वह बसपा से सीधे मुकाबले में बाहर हो रही है.
लेकिन इसके लिए और कोई नहीं बल्कि खुद मुलायम सिंह जिम्मेदार हैं जिन्होंने समाजवाद के नाम पर पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह की राजनीति को आगे बढाया है, वह अब बंद गली के आखिरी मुहाने पर पहुंच गई है. यहां से आगे का रास्ता बंद है और नए रास्ते खोलने के लिए उन्हें न सिर्फ परिवारवाद (और अमरवाद मार्का समाजवाद) से पीछा छुडाना पड़ेगा बल्कि समाजवादी राजनीति की जड़ों की ओर लौटना होगा. उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार को और समावेशी बनाने के लिए आम आदमी के मुद्दों पर जनसंघर्षों और ग्रामीण गरीबों, किसानो,बुनकरों,दलितों और अल्पसंख्यकों के हक़-हुकूक की लडाई में उतरना होगा.
जाहिर है कि विपक्ष की राजनीति पांच सितारा होटलों और सैरगाहों से नहीं चल सकती है. लेकिन जिस पार्टी के नेता अपने भाई-भतीजे-बेटे-बहू और अमर सिंह, संजय दत्त, जया बच्चन जैसे हों, उससे इसकी उम्मीद करना भी बेकार है. कहने की जरुरत नहीं है कि सपा की मौजूदा पारिवारिक-कारपोरेट राजनीति में अवसरवादी-दलाल-भ्रष्ट-ठेकेदार-गुंडा-माफिया तत्व ही फलफूल सकते हैं. लेकिन इस राजनीति की सीमाएं उजागर हो चुकी हैं. अब यह मुलायम को तय करना है कि वह किस रास्ते जायेंगे.
Thursday, November 12, 2009
माओवाद को कितना जानता है समाचार मीडिया?
आनंद प्रधान
जब से यू पी ए सरकार ने माओवाद/नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई का ऐलान किया है, अंग्रेजी समाचार चैनलों पर रोज़ शाम को होनेवाली चर्चाओं में भी नक्सलवाद/माओवाद एक प्रिय विषय बन गया है। इसमे कोई बुराई नहीं है लेकिन सरकार की घोषणा के बाद चैनलों की इस अतिसक्रियता से यह तो पता चलता ही है कि उनका अजेंडा कौन तय कर रहा है. यही नहीं, लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन होनेवाली इन चर्चाओं में कुछ खास बातें गौर करनेवाली हैं. पहली बात तो ये कि बिना किसी अपवाद के सभी चैनलों पर एंकर सहित उन पत्रकारों/नेताओं/पुलिस अफसरों की भरमार होती है जो नक्सलवाद/माओवाद को न सिर्फ देश के लिए बड़ा खतरा मानते हैं बल्कि उससे निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई को ही एकमात्र विकल्प मानते और उसका समर्थन करते हैं.
हालांकि ऐसी सभी चर्चाएं आमतौर पर एकतरफा होती हैं लेकिन उनपर यह आरोप न लग जाए, इसलिए एकाध मानवाधिकारवादी या बुद्धिजीवी को भी कोरम पूरा करने के वास्ते बुला लिया जाता है। फिर उसपर सवालों की बौछार शुरू कर दी जाती है लेकिन उसे जवाब देने का मौका नहीं दिया जाता है. चूंकि सवाल पूछने का हक एंकर के पास होता है, इसलिए चर्चा का एजेंडा भी वही तय करता है. वह कुछ सवालों को ही घुमा-फिराकर बार-बार पूछता है जैसे मानवाधिकारवादी माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते या क्या पुलिस का मानवाधिकार नहीं है या माओवादी न संविधान मानते हैं न सरकार और न ही हथियार डालने के लिए तैयार हैं तो उनसे बातचीत कैसे हो सकती है या क्या माओवादियों के लिए बातचीत अपनी ताक़त बढाने का सिर्फ एक बहाना नहीं है?
यही नहीं, उन बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के "खलनायकीकरण" की हरसंभव कोशिश होती है जो माओवादियों के खिलाफ सैन्य अभियान का न सिर्फ विरोध करते हैं बल्कि सरकार के इरादों पर सवाल भी उठाने की कोशिश करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि खुद को स्वतंत्र बतानेवाले मीडिया ने एक बार भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के इन बयानों पर सवाल नहीं उठाया कि कैसे माओवाद "आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है?" क्या यह सच नहीं है कि टी वी चैनलों की न तो यह जानने में कोई दिलचस्पी है कि देश के इतने बड़े हिस्से में गरीब-आदिवासी और दलितों ने हथियार क्यों उठा लिया है और न ही दर्शकों को ये बताने की मंशा है कि सरकार झारखण्ड और छत्तीसगढ़ को माओवादियों से मुक्त कराने के लिए इतनी बेचैन क्यों है?
समाचार मीडिया की अगर इन सवालों और मुद्दों में इतनी ही दिलचस्पी होती तो क्या वे झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अपने पूर्णकालिक संवाददाता नहीं नियुक्त करते? विडम्बना यह है कि अगर कीमती खनिज न होते तो देश के इन सुदूर वन-प्रांतरों में सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं होती. इसी तरह कारपोरेट मीडिया की रांची या रायपुर में कोई रूचि नहीं है और न ही इन इलाकों की खबरें मीडिया में जगह बना पाती हैं. सच पूछिये तो पूरे पूर्वी भारत को मीडिया में कितनी जगह मिलती है? क्या ये सच नहीं है कि मुंह नोचने को तैयार एंकरों में से अधिकांश ने कभी भी इन इलाकों में घूमने की जहमत नहीं उठाई है? उनके "वी द पीपुल" या (फेस द) "नेशन" की सीमाएं दिल्ली और मुंबई जैसे टी आर पी महानगरों तक सीमित हैं और उनके "फ्रैंकली स्पीकिंग" की हद "बुश-चिदंबरम स्पीक" से तय होती है.
जब से यू पी ए सरकार ने माओवाद/नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सैन्य कार्रवाई का ऐलान किया है, अंग्रेजी समाचार चैनलों पर रोज़ शाम को होनेवाली चर्चाओं में भी नक्सलवाद/माओवाद एक प्रिय विषय बन गया है। इसमे कोई बुराई नहीं है लेकिन सरकार की घोषणा के बाद चैनलों की इस अतिसक्रियता से यह तो पता चलता ही है कि उनका अजेंडा कौन तय कर रहा है. यही नहीं, लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन होनेवाली इन चर्चाओं में कुछ खास बातें गौर करनेवाली हैं. पहली बात तो ये कि बिना किसी अपवाद के सभी चैनलों पर एंकर सहित उन पत्रकारों/नेताओं/पुलिस अफसरों की भरमार होती है जो नक्सलवाद/माओवाद को न सिर्फ देश के लिए बड़ा खतरा मानते हैं बल्कि उससे निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई को ही एकमात्र विकल्प मानते और उसका समर्थन करते हैं.
हालांकि ऐसी सभी चर्चाएं आमतौर पर एकतरफा होती हैं लेकिन उनपर यह आरोप न लग जाए, इसलिए एकाध मानवाधिकारवादी या बुद्धिजीवी को भी कोरम पूरा करने के वास्ते बुला लिया जाता है। फिर उसपर सवालों की बौछार शुरू कर दी जाती है लेकिन उसे जवाब देने का मौका नहीं दिया जाता है. चूंकि सवाल पूछने का हक एंकर के पास होता है, इसलिए चर्चा का एजेंडा भी वही तय करता है. वह कुछ सवालों को ही घुमा-फिराकर बार-बार पूछता है जैसे मानवाधिकारवादी माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते या क्या पुलिस का मानवाधिकार नहीं है या माओवादी न संविधान मानते हैं न सरकार और न ही हथियार डालने के लिए तैयार हैं तो उनसे बातचीत कैसे हो सकती है या क्या माओवादियों के लिए बातचीत अपनी ताक़त बढाने का सिर्फ एक बहाना नहीं है?
यही नहीं, उन बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के "खलनायकीकरण" की हरसंभव कोशिश होती है जो माओवादियों के खिलाफ सैन्य अभियान का न सिर्फ विरोध करते हैं बल्कि सरकार के इरादों पर सवाल भी उठाने की कोशिश करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि खुद को स्वतंत्र बतानेवाले मीडिया ने एक बार भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के इन बयानों पर सवाल नहीं उठाया कि कैसे माओवाद "आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है?" क्या यह सच नहीं है कि टी वी चैनलों की न तो यह जानने में कोई दिलचस्पी है कि देश के इतने बड़े हिस्से में गरीब-आदिवासी और दलितों ने हथियार क्यों उठा लिया है और न ही दर्शकों को ये बताने की मंशा है कि सरकार झारखण्ड और छत्तीसगढ़ को माओवादियों से मुक्त कराने के लिए इतनी बेचैन क्यों है?
समाचार मीडिया की अगर इन सवालों और मुद्दों में इतनी ही दिलचस्पी होती तो क्या वे झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अपने पूर्णकालिक संवाददाता नहीं नियुक्त करते? विडम्बना यह है कि अगर कीमती खनिज न होते तो देश के इन सुदूर वन-प्रांतरों में सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं होती. इसी तरह कारपोरेट मीडिया की रांची या रायपुर में कोई रूचि नहीं है और न ही इन इलाकों की खबरें मीडिया में जगह बना पाती हैं. सच पूछिये तो पूरे पूर्वी भारत को मीडिया में कितनी जगह मिलती है? क्या ये सच नहीं है कि मुंह नोचने को तैयार एंकरों में से अधिकांश ने कभी भी इन इलाकों में घूमने की जहमत नहीं उठाई है? उनके "वी द पीपुल" या (फेस द) "नेशन" की सीमाएं दिल्ली और मुंबई जैसे टी आर पी महानगरों तक सीमित हैं और उनके "फ्रैंकली स्पीकिंग" की हद "बुश-चिदंबरम स्पीक" से तय होती है.
Monday, November 9, 2009
सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैकिंग में पिछड़ने के मायने
आनंद प्रधान
पिछले सप्ताह जब से ’द टाइम्स-क्यूएस’ की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैकिंग जारी हुई है, देश में अपने विश्वविद्यालयों की दशा को लेकर हंगामा मचा हुआ है। वजह यह कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पहले 10 या 50 या 100 या फिर 150 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का कोई विश्वविद्यालय जगह नही बना पाया है। यही नहीं, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में 163वें स्थान पर आईआईटी,मुंबई और 181वें स्थान पर आईआईटी, दिल्ली को जगह मिल सकी है जबकि लोकप्रिय और वास्तविक अर्थो में आईआईटी को विश्वविद्यालय नही माना जाता है।
यह सचमुच चिंता और अफसोस की बात है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में दो आईआईटी को छोड़कर देश का कोई विश्वविद्यालय जगह बना पाने में कामयाब नही हुआ है। इससे देश में उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नही है। ऐसा नही है कि यह सच्चाई सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैकिंग जारी होने के बाद पहली बार सामने आई है। यह एक तथ्य है कि पिछले कई वर्षों से जारी हो रही इस वैश्विक रैकिंग में भारत के विश्वविद्यालय अपनी जगह बना पाने में लगातार नाकामयाब रहे हैं।
सवाल है कि इस वैश्विक रैकिंग को कितना महत्त्व दिया जाए? यह भी एक तथ्य है कि ’द टाइम्स-क्यूएस’ की विश्वविद्यालयों की सालाना वैश्विक रैकिंग रिपोर्ट और ऐसी अन्य कई रिपोर्टों की प्रविधि और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। इस रैकिंग में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों के प्रति झुकाव और आत्मगत मूल्यांकन की छाप को साफ देखा जा सकता है। लेकिन इस सबके बावजूद दुनिया भर के ‘शैक्षणिक समुदाय में ’ द टाइम्स-क्यूएस ’ की वैश्विक विश्वविद्यालय रैकिंग की मान्यता और स्वीकार्यता बढ़ती ही जा रही है। उसकी अपनी ही एक करेंसी हो गयी है।
दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा का एक जो वैश्विक बाजार बना है, उसके लिए विश्वविद्यालयों की इस तरह की रैकिंग एक अनिवार्य ‘शर्त है। यह रैकिंग वैश्विक शिक्षा बाजार के उन उपभोक्ताओं के लिए है जो बेहतर अवसरों के लिए विश्वविद्यालय चुनते हुए इस तरह की रैकिंग को ध्यान में रखते हैं। निश्चय ही, इस तरह की रैकिंग से सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को न सिर्फ संसाधन जुटाने में आसानी हो जाती है बल्कि वे दुनिया भर से बेहतर छात्रों और अध्यापकों को भी आक्रर्षित करने में कामयाब होते हैं।
इस अर्थ में, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईटी को छोड़कर एक भी भारतीय विश्वविद्यालय के न होने से साफ है कि भारत उच्च शिक्षा के वैश्विक बाजार में अभी भी आपूर्तिकर्ता नहीं बल्कि उपभोक्ता ही बना हुआ है। आश्चर्य नही कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद अभी भी देश से हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों का रूख कर रहे हैं। यही नहीं, ’ब्रेन ड्रेन’ रोकने और ’ब्रेन गेन’ के दावों के बीच अभी भी सैकड़ों प्रतिभाशाली शिक्षक और ‘शोधकर्ता विदेशों का रूख कर रहे हैं।
इस मायने में, वैश्विक विश्वविद्यालयों की यह रैकिंग उच्च शिक्षा के कर्ता-धर्ताओं को न सिर्फ वास्तविकता का सामना करने का एक मौका देती है बल्कि एक तरह से चेतावनी की घंटी है। वह इसलिए कि दोहा दौर की व्यापार वार्ताओं के तहत सेवा क्षेत्र को व्यापार के लिए खोलने की जो बातचीत चल रही है, उसमें भारत अपने उच्च शिक्षा क्षेत्र को खोलने के लिए तत्पर दिख रहा है। इस तत्परता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में बुलाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिख रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब भारत और उसके विश्वविद्यालय वैश्विक शिक्षा बाजार में कहीं नहीं हैं तो उच्च शिक्षा का घरेलू बाजार विदेशी शिक्षा सेवा प्रदाताओं या विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए खोलने के परिणामों के बारे में क्या यूपीए सरकार ने विचार कर लिया है? क्या ऐसे समय में, जब भारतीय विश्वविद्यालय विकास और गुणवत्ता के मामले में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों से काफी पीछे हैं, उस समय विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोलने का अर्थ उन्हें एक असमान प्रतियोगिता में ढकेलना नही होगा? क्या इससे देशी विश्वविद्यालयों के विकास पर असर नहीं पड़ेगा?
निश्चय ही, इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में बुनियादी सुधार और बेहतरी के लिए देशी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाने के वास्ते उन्हें जरूरी संसाधन और संरक्षण मुहैया कराने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का जिम्मा विदेशी विश्वविद्यालयों को सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है। हालांकि कपिल सिब्बल उच्च शिक्षा में सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यही है कि वे उच्च शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुधार के बजाय जहां-तहां पैबंद लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
हकीकत यह है कि यूपीए सरकार को उच्च शिक्षा में पैबंद लगाने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और निजी क्षेत्र को बढ़ाने जैसे पिटे-पिटाए फार्मूलों को फिर से आजमाने के बजाय उन बुनियादी सवालों और समस्याओं से निपटने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए जिनके कारण उच्च शिक्षा एक शैक्षणिक जड़ता से जूझ रही है। आज वास्तव में जरूरत यह है कि इस शैक्षणिक जड़ता को तोड़ने के लिए उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त माहौल बनाया जाए। इसके लिए विश्वविद्यालयों के व्यापक जनतांत्रिक पुनर्गठन के साथ-साथ उन्हें वास्तविक स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता उपलब्ध कराना जरूरी है। इसके बिना विश्वविद्यालयों का कायाकल्प मुश्किल है।
असल में, आज देश में उच्च शिक्षा के सामने तीन बुनियादी चुनौतियां हैं-उच्च शिक्षा के विस्तार की , उसमें देश के सभी वर्गों के समावेश और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सरकार उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन और वित्तीय मदद मुहैया कराए। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आर्थिक सुधारों की शुरूआत के बाद 90 के दशक में उच्च शिक्षा के बजट में लगातार कटौती हुई जिसका नतीजा यह हुआ कि अधिकांश विश्वविद्यालयों में न सिर्फ पठन-पाठन पर असर पड़ा बल्कि वे छोटी-छोटी शैक्षणिक जरूरतों और संसाधनों से भी महरूम हो गये।
एक अंतर्राष्ट्रीय ‘शोध रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के विकसित देशों की तो बात ही छोड़ दीजिए, ब्रिक (ब्राजील,रूस,भारत और चीन) देशों में उच्च शिक्षा में प्रति छात्र सबसे कम व्यय भारत में होता है। आश्चर्य नही कि वैश्विक विश्वविद्यालयों की रैकिंग में पहले 200 विश्वविद्यालयों की सूची में चीन के कई विश्वविद्यालयों के नाम हैं लेकिन भारत के विश्वविद्यालय उस सूची में जगह नही बना पाए। उपर से तुर्रा यह कि यूपीए सरकार अब विश्वविद्यालयों को अपने बजट का कम से कम 20 प्रतिशत खुद जु गाड़ने के लिए कह रही है।
यही नही, इस समय उच्च शिक्षा पर बजट बढ़ाने और 11 वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को सबसे अधिक महत्त्व देने के यूपीए सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद सच यह है कि सरकार उच्च शिक्षा पर जीडीपी का मात्र 0।39 प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। इसकी तुलना में, चीन उच्च शिक्षा पर इसके तीन गुने से भी अधिक खर्च कर रहा है।
असल में, वैश्विक रैकिंग में जगह न बना पाने से अधिक चिंता की बात यह है कि आजादी के 60 सालों बाद भी उच्च शिक्षा के विस्तार की हालत यह है कि देश में विश्वविद्यालय जाने की उम्र के सिर्फ दस फीसदी छात्र ही कालेज या विश्वविद्यालय तक पहुंच पाते हैं जबकि विकसित पश्चिमी देशों में 35 से 50 फीसदी छात्र विश्वविद्यालयों में पहुंचते हैं। आश्चर्य नही कि मानव विकास सूचकांक में भी भारत 183 देशों की सूची में 134वें स्थान पर है। आखिर मानव विकास में फीसड्डी होकर कोई देश सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैकिंग में जगह कैसे बना सकता है?
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