मंगलवार, दिसंबर 16, 2014

एक नया ब्लॉग : चलते-चलते

एक नए सफ़र का ब्लॉग है 'चलते-चलते' 
मित्रों, एक नया ब्लॉग शुरू किया है: 'चलते-चलते (http://ghumakkadvadi.blogspot.in/ ) इस ब्लॉग का मकसद उन विषयों पर अलग से लिखना है, जो 'तीसरा रास्ता' के मिजाज के नहीं हैं.

जैसे अपनी यात्राओं की यादें या कभी फिल्मों या किताबों या किसी दोस्त-परिजन या साथियों पर लिखना हो तो 'तीसरा रास्ता' का मिजाज और तेवर आड़े आने लगता था. 

इसलिए यह नया ब्लॉग शुरू किया है. गाहे-बगाहे उसपर अपनी यात्राओं की खोज-खबर, उनके खट्टे-मिट्ठे अनुभव और हाँ, कैमरे और मोबाइल से ली गई तस्वीरें शेयर करूँगा.

आप 'तीसरा रास्ता' के सुधी साथी रहे/रही हैं. 'तीसरा रास्ता' पहले की तरह जारी रहेगा. उसे फुर्सत मिलते ही अपडेट करूँगा. हालाँकि इधर ज्यादा नहीं लिख पाया लेकिन जो कुछ लिखा है, उसे जल्दी ही ब्लॉग पर डालने की कोशिश करूँगा. 

लेकिन नए ब्लॉग 'चलते-चलते' पर भी आपकी मौजूदगी की दरख्वास्त है. पता है: http://ghumakkadvadi.blogspot.in/ 

और हाँ, इस बीच, एबीपी न्यूज की वेबसाईट के लिए भी साप्ताहिक ब्लॉग लिखना शुरू किया है. हर शुक्रवार को आप एबीपी-हिंदी की वेबसाईट पर यह पढ़ सकते हैं. 

अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा. शुभकामनाओं सहित. 

आपका,
आनंद  

शनिवार, जुलाई 26, 2014

हिंदी मीडिया भारतीय भाषाओँ के आंदोलन के साथ क्यों नहीं है?

हिंदी मीडिया का ‘अंग्रेजी लाओ’ आंदोलन

अगर कोई आंदोलन यानी धरना-प्रदर्शन-भूख हड़ताल दिल्ली में हो, उसमें हजारों युवा शामिल हों, उसमें शामिल होने के लिए सांसद-विधायक-नेता-लेखक-बुद्धिजीवी पहुँच रहे हों और आंदोलन के मुद्दे से देश भर में लाखों युवा प्रभावित हों तो पूरी सम्भावना है कि वह आंदोलन अखबारों/न्यूज चैनलों की सुर्खी बने.
यही नहीं, यह भी संभव है कि अखबार/चैनल खुलकर उस आंदोलन के समर्थन में खड़े हो जाएँ. लेकिन दिल्ली में संघ लोकसेवा आयोग (यू.पी.एस.सी) की परीक्षाओं में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व और हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओँ की उपेक्षा और बेदखली के खिलाफ चल रहा आंदोलन शायद इतना भाग्यशाली या कहिए कि टी.आर.पी बटोरू नहीं है कि वह अखबारों/चैनलों की सुर्खी बन सके.
नतीजा, यह आंदोलन न्यूज चैनलों की सुर्ख़ियों और प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों में नहीं है. यहाँ तक कि उनकी २४ घंटे-चौबीस रिपोर्टर या न्यूज बुलेट/न्यूज हंड्रेड में भी जिनमें जाने कैसी-कैसी ‘खबरें’ चलती रहती हैं, इस खबर को कुछेक चैनलों में एकाध बार जगह मिल पाई है.

हालाँकि दिल्ली के मुखर्जी नगर में अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठे छात्रों/युवाओं के आंदोलन को भारी जन-समर्थन मिल रहा है, सोशल मीडिया पर यह मुद्दा गर्म है और नेता उसके राजनीतिक महत्व को समझकर, दिखाने के लिए ही सही, वहां पहुँच रहे हैं लेकिन हजारों की भीड़ के साथ आमतौर पर मौजूद रहनेवाले न्यूज चैनलों के कैमरे, जिमि-जिम, ओ.बी वैन और 24x7 लाइव रिपोर्ट करते उत्साही रिपोर्टर वहां से नदारद हैं.

यह समझा जा सकता है कि यू.पी.एस.सी में अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन को अंग्रेजी न्यूज चैनलों/अखबारों में जगह न मिले या उसकी अनदेखी हो लेकिन हिंदी के अखबारों और न्यूज चैनलों में भी इस खबर की उपेक्षा को समझना थोड़ा मुश्किल है.
हिंदी के अखबारों/चैनलों के लिए यह एक बड़ी ‘खबर’ क्यों नहीं है? ज्यादा समय नहीं गुजर जब यही चैनल/अखबार नए प्रधानमंत्री और एन.डी.ए सरकार के हिंदी प्रेम की बलैय्याँ ले रहे थे. लेकिन यू.पी.एस.सी में हिंदी के परीक्षार्थियों के साथ अन्याय और उनकी बेदखली के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन के प्रति हिंदी के अखबार/चैनल इतनी बेरुखी क्यों दिखा रहे हैं?
कहीं यह हिंदी अखबारों/चैनलों की उस “हीनता ग्रंथि” के कारण तो नहीं है जिसमें वे खुद को अंग्रेजी के अप-मार्केट के सामने गंवार ‘हिंदीवाला’ नहीं दिखाना चाहते हैं? सच यह है कि हिंदी के अधिकांश अखबार/चैनल आज ‘अंग्रेजी लाओ’ आंदोलन चला रहे हैं. पिछले एक-डेढ़ दशक में हिंदी के ज्यादातर अखबारों/चैनलों में खुद को अपमार्केट दिखने के लिए अंग्रेजी के ज्यादा करीब जाने और उसके ही सरोकारों, मुहावरों और प्रस्तुति पर जोर बढ़ा है.

आश्चर्य नहीं कि आज कई हिंदी अखबारों/चैनलों की भाषा हिंदी नहीं बल्कि हिंगलिश है. अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर अंग्रेजी के बड़े बुद्धिजीवियों की छोडिये, औसत दर्जे के पत्रकारों/स्तंभकारों को अनुवाद करके छापने और चैनलों की बहसों/चर्चाओं में अंग्रेजी के पत्रकारों/बुद्धिजीवियों/सेलिब्रिटी को बुलाने की कोशिश की जाती है.

यहाँ तक कि हिंदी के एक बड़े अखबार ने काफी पहले न सिर्फ धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों को इस्तेमाल करना शुरू किया बल्कि शीर्षकों में रोमन लिपि का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकिचाया. एक और बड़े अखबार ने अपने पाठकों को अंग्रेजी पढ़ाने का अभियान चलाया. हिंदी के ज्यादातर चैनलों के एंकरों/रिपोर्टरों की हिंदी के बारे में जितनी कम बात की जाए, उतना अच्छा है.
जाहिर है कि हिंदी के जिन चैनलों/अखबारों के न्यूजरूम पर मानसिक/व्यावसायिक रूप से अंग्रेजी और अंग्रेजी मानसिकता हावी है और हिंदी मजबूरी जैसी है, वहां उनकी दिलचस्पी एक ऐसे आंदोलन में कैसे हो सकती है जो अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ भारतीय भाषाओँ के हक में आवाज़ उठा रहा हो?
लेकिन कल्पना कीजिए कि अगर यही अखबार/चैनल देश की आज़ादी के आंदोलन के समय रहे होते तो उनका रवैया क्या आज से कुछ अलग होता?



(यह टिप्पणी 'तहलका' के लिए 11 जुलाई को लिखी थी. उसके बाद से इस आंदोलन ने और गति पकड़ी है और मीडिया का ध्यान भी उसकी ओर गया है लेकिन क्या वह पर्याप्त है?)                                 

मंगलवार, जून 17, 2014

आर अनुराधा एक मुस्कुराती जिजीविषा का नाम था

अलविदा मित्र!
आर अनुराधा चलीं गईं. कैंसर से १७ साल लड़ीं और लड़ते-लड़ते ही गईं. उनसे एक मई को मिलकर आया था. बीमारी की उस हालत में भी जब शायद उनसे बहुत बैठा नहीं जा रहा था,वे अपने कमरे से चलकर आईं, थोड़ी देर कुर्सी पर बैठीं और हालचाल पूछा. चेहरे पर वही हल्की, स्मित और अनुराधा मुस्कान थी. 

मैं उन्हें उसी मुस्कुराहट से जानता था. कोई २० साल पहले जब उनसे पहली बार मिला था और अब इस आख़िरी मुलाक़ात तक उनकी उस मुस्कान में कोई अंतर नहीं आया था.

हाँ, इस बार चेहरे पर दर्द की लकीरें ज़रूर थीं. लेकिन उनपर डर या हताशा के चिन्ह नहीं थे. कैंसर के आख़िरी स्टेज में होते हुए भी उनके चेहरे पर अपनी कविताओं की नई किताब को लेकर संतोष का एक भाव था. 
 
हालाँकि ख़ुद मैं उनसे बात करते हुए आँखें नहीं मिला पा रहा था, गले में कुछ अटकता हुआ सा महसूस हो रहा था और एक
असहायता को बोध छाता जा रहा था.
 
लेकिन अनुराधा जी की जीजिविषा में कोई कमी नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि हम नहीं, वे हमें ढाँढस बँधा रही हैं. उनकी कविताओं की तारीफ़ की जिसपर उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट दौड़ गई. मेरा जैसे दिल डूबा जा रहा था.
 
जानता हूँ कि खुद गहरी पीड़ा में होने के बावजूद उन्होंने दिलीप जी को कहकर मुझे घर पर क्यों बुलाया था. मैं खुद उस दिन हाल की घटनाओं के कारण बहुत परेशान और तनाव में था. अकेला महसूस कर रहा था. अनुराधा स्वस्थ होतीं तो शायद खुद घर आतीं लेकिन अपनी बीमारी के उस हाल में भी दिलीप जी मैसेज करवा के मुझे बुलाया। कहा कुछ नहीं लेकिन मैं उनके व्यवहार में वह ढाँढस महसूस कर सकता था.
 
हालाँकि उनसे मेरी कोई गहरी दोस्ती नहीं थी. अलबत्ता कैंसर से उनकी अनथक लड़ाई, उनके उन अनुभवों की किताब, उनके लेखन-संपादन और सक्रियताओं के कारण अनेकों लोगों की तरह मैं भी उनका चुप्पा फ़ैन बन चुका था. हालाँकि उनसे मुलाक़ात या बातचीत बहुत कम ही हो पाती थी. लेकिन मन ही मन उनके हौसले और सक्रियता और दिलीप जी के धैर्य, दृढ़ता, निष्ठा और समर्पण का कायल था.
 
महीनों में कभी कहीं किसी सभा-सेमिनार या कार्यक्रम में मुलाक़ात हो जाती थी. इन बीस सालों में मैं तीन-चार बार उनके घर
गया और एक बार वे दिलीप जी के साथ मेरे यहाँ खाने पर आईं. उस दिन वे एक पेंटिंग भी दे गईं जो मेरे कमरे में हमेशा उनकी याद दिलाती है. कभी-कभार फ़ोन पर भी बात हो जाती थी. 
 
इसके बावजूद वे जब भी मिलीं, उसी अनुराधा मुस्कान के साथ मिलीं. वे एक मिसाल हैं जिनसे जीवन जीने का सलीक़ा सीखा जा सकता है.

वे अपने जीवन के हर मिनट की क़ीमत जानती थीं और उसे भरपूर जी कर गईं. वे पी.एचडी करना चाहती थीं, लेकिन कैंसर ने उन्हें वह मौक़ा नहीं दिया. उसे उन्हें यह मौक़ा देना चाहिए था. 
 
वे चली गईं लेकिन अपने लेखन, कामों, इरादों और जिजीविषा के साथ वे हमारे साथ हैं. वे हम में से हर उस औरत या मर्द में जीवित रहेंगीं जो जीवन को अपनी शर्तों पर और मुस्कुराहट के साथ जीता है और जो कैंसर के पार भी इंद्रधनुष देखता है.

अलविदा मित्र आर अनुराधा! 

शुक्रवार, जून 06, 2014

अटकलकारिता और फील गुड पत्रकारिता का युग

लेकिन ख़बरों के इर्द-गिर्द है आयरन कर्टेन और लुटियन पत्रकारिता मुश्किल में   

दिल्ली में मोदी सरकार आने के साथ न्यूज मीडिया खासकर चैनलों की ‘पत्रकारिता’ में कई बदलाव दिखने लगे हैं. इसका पहला सुबूत यह है कि राजधानी के धाकड़ रिपोर्टरों, सत्ता के गलियारों में दूर तक पहुंच रखनेवाले संवाददाताओं और सर्वज्ञानी संपादकों को मोदी मंत्रिमंडल के संभावित मंत्रियों और उनके विभागों के बारे में तथ्यपूर्ण सूचनाएं नहीं थीं.
इसकी भरपाई वे परस्पर विरोधी सूचनाओं और अटकलों से करने की कोशिश कर रहे थे. यहाँ तक कि ‘अच्छे दिन लौटने’ की उम्मीद कर रहे भाजपा बीट के रिपोर्टरों के पास भी अटकलों के अलावा कुछ नहीं था.
नतीजा यह कि चैनल-दर-चैनल और अख़बारों तक में सिर्फ अटकलें थीं. चैनलों पर घंटों नहीं बल्कि कई दिनों तक एंकरों, रिपोर्टरों और चर्चाकारों में संभावित मंत्रिमंडल और मंत्रियों के विभागों को लेकर जिस तरह की अटकलबाजी चलती रही, क्या वह न्यूज मीडिया में पत्रकारिता की बजाय ‘अटकलकारिता’ युग के आगमन का संकेत है?

ऐसा लगता है कि सत्ता में बदलाव के साथ न सिर्फ सूचनाओं के स्रोत बदल गए हैं बल्कि खुद भाजपा और मोदी सरकार के अंदर सूचनाओं खासकर नकारात्मक सूचनाओं के बाहर आने पर पर सख्त नियंत्रण का युग शुरू हो चुका है.

इस लिहाज से मंत्रिमंडल का गठन और विभागों का वितरण सूचनाओं के नियंत्रण और प्रबंधन के लिए खड़े किये जा रहे इस नए ‘लौह दीवार’ (आयरन कर्टेन) की पहली परीक्षा थी जिसमें वह न सिर्फ कामयाब रही बल्कि उसने लुटियन दिल्ली के उन धाकड़ पत्रकारों को ‘अटकलकारिता’ करने पर मजबूर कर दिया जो कल तक मंत्रिमंडल बनवाने के दावे किया करते थे.
यह उन धाकड़ पत्रकारों/संपादकों के लिए एक चुनौती है जिनकी ‘पत्रकारिता’ लुटियन दिल्ली के भवनों और बंगलों की गणेश परिक्रमा में फल-फूल रही थी. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे इस नए ‘आयरन कर्टेन’ से कैसे निपटें?
अफसोस यह कि इसका नतीजा सिर्फ अटकलकारिता में ही नहीं बल्कि ‘फील गुड पत्रकारिता’ के पुनरागमन में भी दिख रहा है. आश्चर्य नहीं कि इन दिनों चैनलों और अखबारों में नई सरकार के बारे में या तो गुडी-गुडी ‘खबरें’ चल रही हैं या उसे बिन मांगी सलाहें दी जा रही हैं या फिर सरकार के लिए कारपोरेट समर्थित एजेंडा तय किया जा रहा है.

लेकिन यह सिर्फ चैनलों और अखबारों और मोदी सरकार के बीच शुरूआती हनीमून का नतीजा भर नहीं है बल्कि सूचनाओं खासकर नकारात्मक सूचनाओं/ख़बरों के बाहर निकलने पर आयद आयरन कर्टेन और सूचनाओं के अनुकूल प्रबंधन की सुविचारित रणनीति का भी नतीजा है.

यह नए प्रधानमंत्री की कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा रहा है. आश्चर्य नहीं कि यह सरकार जहाँ एक ओर महत्वपूर्ण खासकर नकारात्मक सूचनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, वहीँ दूसरी ओर मीडिया को उदारतापूर्वक ‘खबरें’ और ‘विजुअल्स’ दी जा रही हैं.
ये वे फीलगुड ‘खबरें’ और ‘विजुअल्स’ हैं जिनमें वास्तविक और जनहित से जुड़ी जानकारी कम और पी.आर ज्यादा है.
असल में, सरकार के मीडिया मैनेजरों को अच्छी तरह से मालूम है कि 24X7 न्यूज चैनलों के दौर में चैनलों के पर्दे को भरना और उन्हें चर्चा के लिए विषय देना बहुत जरूरी है.
इसलिए सूचना के प्रवाह को रोकने के बजाय उसे नियंत्रित और प्रबंधित करने पर ज्यादा जोर है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों के कैमरों को प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मंत्रिमंडल की बैठकों तक पहुँच दी गई है और आधिकारिक तौर पर हर दिन चर्चा के लिए अनुकूल विषय भी दिए जा रहे हैं.

मजे की बात यह है कि चैनल बिना किसी जांच-पड़ताल और छानबीन के उसे लपककर अपनी अटकलकारिता और फील गुड पत्रकारिता से खुश हैं. सचमुच, अच्छे दिन आ गए हैं.             

('तहलका' के 15 जून के अंक में प्रकाशित टिप्पणी का असंपादित अंश)

बुधवार, जून 04, 2014

सड़कों पर बहता निर्दोषों का लहू

सड़क सुरक्षा पर 'चलता है/क्या फर्क पड़ता है' के रवैए के कारण हर साल लाखों लोगों की जान जा रही है   
 
ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में हुई असामयिक मृत्यु ने सड़क सुरक्षा और हर साल सड़क दुर्घटनाओं में हो रही लाखों निर्दोष लोगों की मौत के मुद्दे को फिर से बहस में ला दिया है.
देश में सड़क सुरक्षा के हाल का अंदाज़ा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि एक केन्द्रीय मंत्री की मृत्यु देश की राजधानी में हुई है जहाँ सड़क सुरक्षा के इंतजाम देश के अन्य हिस्सों की तुलना में कहीं बेहतर हैं.
इसके बावजूद इस साल राजधानी दिल्ली में सड़क हादसों में श्री मुंडे से पहले तक ६६७ लोगों की मौत हो चुकी है. वे ६६८वें व्यक्ति हैं जिन्हें दिल्ली की सड़क पर इस तरह से अपनी जान गंवानी पड़ी. इन ६६८ लोगों में से अधिकांश को हम नहीं जानते हैं.
लेकिन वे सिर्फ संख्या या सड़क दुर्घटना से संबंधित आंकड़े भर नहीं हैं. वे भी हम सभी की तरह जीते-जागते इंसान थे. जीवन से भरपूर वे भी किसी के पिता-भाई-बहन-माँ-बेटा-बेटी और सगे-संबंधी थे. उनके घरों और मुहल्लों में भी उनके जाने के बाद कई दिनों तक चूल्हे नहीं जलते हैं. अनेकों घरों में महीनों-सालों तक सिसकियाँ सुनाई पड़ती हैं. कई घर इन दुर्घटनाओं की मार से कभी नहीं उबर पाते हैं.
इसके बावजूद हम सब जानते हैं कि सड़क दुर्घटना के शिकार हुए मुंडे आखिरी इंसान नहीं हैं. हम-आप सभी यह जानते हैं कि अगर सड़क सुरक्षा और लोगों की सोच में रातों-रात क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया और मौजूदा हालत को बदलने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए तो मुंडे के बाद भी दिल्ली की सड़कों पर लोग ऐसे ही जान गंवाते रहेंगे. सड़क दुर्घटना में मारे जानेवाले लोगों की संख्या इसी तरह बढ़ती रहेगी.

इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जब आप यह टिप्पणी पढ़ रहे होंगे, उन १५ मिनटों में देश के किसी कोने में सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी होगी. सचमुच, देश की सड़कों पर आदमी की जान से सस्ती कोई चीज नहीं है.
लेकिन जब तक हम सड़क दुर्घटनाओं को नियति मानकर स्वीकार करते रहेंगे और ‘चलता है/क्या फर्क पड़ता है’ की मानसिकता से इन्हें देखते रहेंगे, कुछ नहीं बदलनेवाला है.  
यह सचमुच बहुत शर्मनाक और त्रासद है कि देश में हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं या अपाहिज हो जा रहे हैं लेकिन बड़े-लंबे-चौड़े-चमकते फोर और सिक्स लेन हाईवे के सपनों में डूबे देश में इन मौतों से कोई खलल नहीं पड़ रही है.

देश में जितनी बातें हाईवे और कारों/गाड़ियों के नए माडलों पर होती है, उसकी एक फीसद चर्चा भी सड़क सुरक्षा और लोगों को एक बेहतर, संवेदनशील और जागरूक ड्राइवर बनाने पर नहीं होती है.

निश्चय ही, सड़कों पर होनेवाली ज्यादातर दुर्घटनाएं इसलिए होती हैं कि हममें से अधिकांश लोगों को सड़क सुरक्षा के नियमों की कोई परवाह नहीं है, हमें अपनी और उससे ज्यादा दूसरों के जान की कोई चिंता नहीं है और ट्रैफिक पुलिस को नियमों और सड़क सुरक्षा से ज्यादा पैसे बनाने की फ़िक्र होती है.
लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि सड़कों के डिजाइन से लेकर गड्ढों और उनकी दयनीय हालत तक और सड़क सुरक्षा के ढीले-ढाले नियमों से लेकर सड़क दुर्घटना के घायलों को बेहतर और तत्काल चिकित्सा न मुहैया करा पाने तक ढांचागत-सांस्थानिक कारण भी हैं जिनके कारण भारतीय सड़कें खूनी बनी हुई हैं.

नतीजा हम सबके सामने है. सड़कों पर बेगुनाह इंसानों का खून बह रहा है और देश सड़कों पर होनेवाली मौतों में नए रिकार्ड बना रहा है.

साफ़ है कि हम इन दुर्घटनाओं और इसमें होनेवाली जन-धन के नुकसान से चेतने को तैयार नहीं है क्योंकि हम सब इसके शिकार नहीं हुए हैं. इसलिए हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन यही हाल रहा तो हमारा भी नंबर कभी न कभी आएगा.