सोमवार, नवंबर 12, 2007

बिना संघर्ष के नहीं मिलेगा रोजगार का अधिकार...

वित्तीय कठमुल्लावाद से उबरे बिना रोजगार का अधिकार संभव नहीं है

कहते हैं कि हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। देश में अधिकांश लोक कल्याणकारी योजनाओं और कानूनों का कुछ यही हाल है। 2 फरवरी को बहुत धूमधाम के साथ देश के 200 जिलों में लागू किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानून के साथ भी कुछ यही त्रासदी दोहराई जा रही है। कहने को इस कानून के लागू होने के बाद अब कोई भी ग्रामीण बेरोजगार एक अधिकार के बतौर सरकार से कम से कम 100 दिनों के रोजगार की मांग कर सकता है। लेकिन कानून लागू हुए दो महीने से अधिक गुजर जाने के बावजूद सच्चाई यह है कि इस कानून के तहत रोजगार की मांग करने वाले लाखों लोगों के लिए 100 दिन का रोजगार सपना ही बना हुआ है।

रोजगार तो दूर उन्हें इस कानून के तहत रोजगार कार्ड हासिल करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। राजधानी दिल्ली के साउथ ब्लाक में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सरकार के सबसे बडे  वायदे को पूरा करने के लिए भले ही अपनी पीठ ठोंक रहे हों लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों से आ रही खबरों पर भरोसा किया जाए तो रोजगार के लिए पंजीकरण कराने और रोजगार कार्ड मांगने आ रहे ग्रामीणों को न सिर्फ तरह-तरह से टरकाया जा रहा है बल्कि स्थानीय स्तर पर नौकरशाही इस कानून का मजाक बनाने पर तुली हुई है। ऐसा लगता है कि इस कानून के लागू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मांगने वाले लोगों के उत्साह और दिन पर दिन बढ़ती उनकी तादाद से न सिर्फ केन्द्र सरकार घबरा गई है बल्कि स्थानीय नौकरशाही को भी समझ में नहीं आ रहा है कि वह लोगों की अपेक्षाओं को कैसे पूरा करे ?

दरअसल, केन्द्र सरकार और इस कानून को जिलास्तर पर लागू करने वाली राज्य सरकारों को इसका बिल्कुल अनुमान नहीं था कि इस कानून के तहत रोजगार की मांग करने वाले लोगों की तादाद इतनी अधिक होगी। प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक इस कानून के तहत रोजगार के लिए पंजीकरण के वास्ते आवेदन करने वाले लोगों की तादाद लगभग 2 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। इतने लोगों को एक साथ 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराने में स्थानीय प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। सच तो यह है कि जिन जिलों में यह योजना लागू की गई है, वहां के स्थानीय प्रशासन ने इसे ईमानदारी से लागू करने के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की है। इस योजना को लागू करने के लिए स्थानीय स्तर पर जिस तरह के सार्वजनिक कार्यों को शुरू करने की योजना बननी चाहिए थी, वह नहीं बनाई गई है और न ही उसके लिए उपयुक्त संसाधनों की व्यवस्था की गई है।
 
कहने की जरूरत नहीं है कि जल्दी ही केन्द्र और राज्य सरकारें इस योजना को ठीक तरीके से न लागू किए जाने को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर देंगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस कानून को लागू करने को लेकर कई राज्य सरकारों खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार का रवैया कतई उचित नहीं है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि इस कानून को ईमानदारी से लागू करने को लेकर यूपीए सरकार का मन भी बहुत साफ नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार चाहे जो कहे लेकिन हकीकत यह है कि यह एक केन्द्रीय योजना है और इसकी सफलता बहुत हद तक केन्द्र सरकार के रवैये पर निर्भर करती है। यह उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी भी है।
 
लेकिन यह एक कडवी सच्चाई है कि इस कानून के बनने से पहले से ही इसके प्रति यूपीए सरकार का रवैया दोमुहां रहा है। यह किसी से छुपी हुई बात नहीं है कि इस योजना की सफलता जिन केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदम्बरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर निर्भर करती है, वे शुरू से ही इसका विरोध करते रहे हैं। उनके मुताबिक यह योजना एक तरह से वित्तीय संसाधनों की बरबादी है और इससे गरीबों और बेरोजगारों को कोई लाभ नहीं होगा। उल्टे केन्द्र सरकार का वित्तीय घाटा बहुत अधिक बढ़ जाएगा।
 
इस विरोध के कारण ही यूपीए सरकार ने एक सार्वभौमिक रोजगार के अधिकार का कानून बनाने के बजाए एक सीमित और आधा-अधूरा ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून बनाया। अफसोस की बात यह है कि यूपीए सरकार इस सीमित और आधे-अधूरे कानून को भी ईमानदारी से लागू करने से कतरा रही हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वित्तमंत्री पी चिदम्बरम चालू वित्तीय वर्ष 2006-07 के लिए ग्रामीण रोजगार कानून को लागू करने के वास्ते बजट में पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में कम धनराशि का प्रावधान नहीं करते। उन्होंने चालू वित्तीय वर्ष में ग्रामीण रोजगार के कानून को लागू करने के लिए लगभग 11,300 करोड रूपये का प्रावधान किया है जो रोजगार की मांग करने वाले 2 करोड से अधिक ग्रामीण बेरोजगारों को 100 दिनों का रोजगार देने के लिए नाकाफी है।

आश्चर्य नहीं कि रोजगार की मांग करने वाले ग्रामीणों को टरकाया जा रहा है। दुर्भाग्य से ऐसा लगता है कि इस योजना का भी हश्र अन्य दूसरी विकास योजनाओं की तरह ही होगा। यह योजना भी स्थानीय स्तर पर नौकरशाही, ठेकेदार, राजनेता और माफिया गठजोड़ की भेंट चढ़ती हुई दिखाई पड़ रही है। दरअसल, अगर इस योजना को ईमानदारी से लागू किया जाना है तो न सिर्फ यूपीए सरकार को पी चिदम्बरम के ''वित्तीय कठमुल्लावाद`` से पीछा छुड़ाना होगा बल्कि राज्य सरकारों को भी कुंभकर्णी निद्रा से बाहर निकलना होगा। इसके लिए जरूरी है कि  इस कानून को लागू करने के लिए संघर्षरत जनांदोलनों को स्थानीय स्तर पर अफसर-ठेकेदार-राजनेता और माफिया गठजोड़ के खिलाफ मुहिम छेड़नी होगी।
 
पिछले अनुभवों से यह साफ है कि यह कानून तब तक आम लोगों का अधिकार नहीं बन सकता है जब तक लोग सड़कों पर उतरकर इसके लिए संघर्ष न करें। दरअसल, अधिकार कभी तोहफे या मुफ्त में नहीं मिलते, उनके लिए जूझना पड़ता है। ग्रामीण रोजगार अधिकार कानून पर तो यह बात और भी अधिक लागू होती है।

1 टिप्पणी:

परमजीत बाली ने कहा…

ज्यादातर सरकारी योजनाओ का यही हाल होता है...लेकिन सरकार इस से कभी कोई सबक नही लेती...वय तो बस इन योजना का झून्झुना बजाती है वोट बटोरती है...और सब भूल जाती है।