शुक्रवार, जनवरी 14, 2011

मनरेगा की मजदूरी

न्यूनतम मजदूरी कानून लागू करने से पीछे क्यों हट रही है यू.पी.ए सरकार


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अड़े हुए हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जा सकती है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चिट्ठी के जवाब में उनका कहना है कि अधिक से अधिक मनरेगा के तहत निश्चित १०० रूपये प्रतिदिन की मजदूरी दर को मुद्रास्फीति के साथ जोड़ा जा सकता है. इस चिट्ठी के बाद केन्द्र सरकार ने मनरेगा के तहत विभिन्न राज्यों में दी जा रही मजदूरी में मुद्रास्फीति के आधार पर १७ से लेकर ३० प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने का एलान किया है जो कि पिछले दो सालों की भारी महंगाई की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है.

याद रहे कुछ महीने पहले सरकार ने करोड़पति-लखपति सांसदों-मंत्रियों के वेतन में ३०० से ४०० फीसदी की बढ़ोत्तरी की है लेकिन गरीबी रेखा के नीचे के मजदूरों की मजदूरी में सिर्फ १७ से ३० प्रतिशत की वृद्धि- इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? यही नहीं, इस फैसले से साफ है कि यू.पी.ए सरकार मनरेगा की मजदूरी दर को विभिन्न राज्यों की न्यूनतम मजदूरी के बराबर करने के लिए तैयार नहीं हैं. निश्चय ही, सरकार के इस फैसले से मनरेगा की मजदूरी को राज्यों की न्यूनतम मजदूरी दर के बराबर करने की मांग को लेकर पिछले कई महीनों से लड़ रहे जन संगठनों और करोड़ों मजदूरों को घोर निराशा हुई है.

प्रधानमंत्री के पास अपने फैसले के पक्ष में कोई तर्क नहीं है - न कानूनी, न संवैधानिक, न राजनीतिक और न ही नैतिक. यहां तक कि उनके पास आर्थिक तर्क भी नहीं है. आखिर कोई सरकार संसद द्वारा पारित न्यूनतम मजदूरी कानून का उल्लंघन कैसे कर सकती है? यहां तक कि खुद केंद्र सरकार की एडिशनल सोलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने इस मामले में अपनी कानूनी राय में कहा था कि न्यूनतम मजदूरी कानून से कम मजदूरी देना कानून सम्मत नहीं है और इसे ‘जबरन श्रम’ या बंधुआ मजदूरी माना जायेगा.

इससे पहले, आन्ध्र उच्च न्यायालय ने भी मनरेगा के तहत राज्य सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी देने पर नाराजगी जाहिर करते हुए केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के उस सर्कुलर पर आंध्र में रोक लगा दी थी जिसमें मनरेगा के तहत मजदूरी को सौ रूपये प्रतिदिन पर फिक्स कर दिया गया था. लेकिन इसके बावजूद केन्द्र की यू.पी.ए सरकार मनरेगा की मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी के बराबर न करने के फैसले पर अडी हुई है. यह अन्यायपूर्ण है. यह श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ वर्षों पहले एक फैसले में कहा था कि सरकार को एक आदर्श नियोक्ता की तरह पेश आना चाहिए. लेकिन अगर केन्द्र सरकार खुद न्यूनतम मजदूरी देने के लिए तैयार नहीं है तो वह निजी नियोक्ताओं को न्यूनतम मजदूरी देने के लिए कैसे बाध्य कर सकती है? कैसा मजाक है कि जिससे आदर्श नियोक्ता बनने की अपेक्षा की जा रही है, वह खुद कानून की धज्जियाँ उड़ा रहा है जो एक तरह से निजी नियोक्ताओं को मनमानी करने का लाइसेंस देने जैसा है. यह किसी से छुपा नहीं है कि निजी क्षेत्र ने न्यूनतम मजदूरी कानून की कभी परवाह नहीं की है. सरकार की मौन और कई बार खुली सहमति से निजी क्षेत्र इस कानून को ठेंगा दिखता रहा है.

याद रहे कि न्यूनतम मजदूरी कानून का पालन कानूनन अनिवार्य है. लेकिन इसका ईमानदारी से कभी पालन नहीं हुआ है और श्रमिकों के साथ हमेशा एक छल चलता रहा है. अब जब खुद ‘आम आदमी’ की सरकार श्रमिकों के साथ यह छल कर रही है तो वे किससे गुहार करें? सच पूछिए तो यह फैसला राजनीतिक और नैतिक रूप से भी अन्यायपूर्ण है. आखिर जो राजनीतिक तंत्र सांसदों, मंत्रियों और अफसरों की तनख्वाहों को अत्यंत उदारता से बढ़ाने में शर्म महसूस नहीं करता, वह करोड़ों मजदूरों को मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी देने से किस मुंह से इंकार कर सकता है?

असल में, यू.पी.ए सरकार ने यह फैसला निजी क्षेत्र के दबाव और वित्तीय कठमुल्लावाद के असर में लिया है. यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि निजी क्षेत्र मनरेगा के कारण मजदूरों की अनुपलब्धता और मजदूरी में बढ़ोत्तरी की शिकायत करता रहा है. निजी क्षेत्र के मुताबिक, मनरेगा के कारण मजदूर गांवों में ही रुक जा रहे हैं जिससे श्रमिकों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है और कम आपूर्ति के कारण उनकी मजदूरी में भी इजाफा करना पड़ रहा है. इससे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं और निर्माण क्षेत्र प्रभावित हो रहा है.

निजी क्षेत्र को यह भी आशंका है कि अगर मनरेगा के तहत मजदूरी न्यूनतम मजदूरी के बराबर कर दी गई तो न सिर्फ मजदूर न मिलने की समस्या और बढ़ जायेगी बल्कि उन्हें मजदूरी दर में और बढ़ोत्तरी करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. इस तरह खुलकर न कहते हुए भी निजी क्षेत्र का केन्द्र सरकार पर दबाव है कि वह न सिर्फ मनरेगा के तहत मजदूरी न बढ़ाये बल्कि इस पूरी योजना को इस हद तक अनाकर्षक बना दे कि मजदूर उसकी तरफ देखे भी नहीं ताकि निजी क्षेत्र बिना किसी रोकटोक मजदूरों के श्रम का शोषण करता रह सके.

निश्चय ही, इस फैसले से निजी क्षेत्र की यह इच्छा पूरी हो गई है. लेकिन इससे सरकार में बैठे उन वित्तीय कठमुल्लावादियों की भी इच्छा पूरी हो गई है जो इस योजना को शुरू से ही इस आधार पर विरोध करते रहे हैं कि इससे वित्तीय घाटा बढ़ जायेगा. वे इस योजना को निरर्थक, सरकारी खजाने में छेद और आर्थिक रूप से अनुपयोगी मानते रहे हैं. उनका वश चलता तो यह योजना कभी अमल में ही नहीं आती लेकिन उनके न चाहने पर भी राजनीतिक कारणों से यह योजना लागू हुई. उसके बाद से ही इस योजना को असफल करने की कोशिशें होती रही हैं. इस योजना के तहत न्यूनतम मजदूरी देने से इंकार करना भी इन्हीं कोशिशों का हिस्सा है.

(दैनिक 'अमर उजाला' में  14 जनवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख ) 

3 टिप्‍पणियां:

Salman ने कहा…

I Like it. Nice work.

ROHIT ने कहा…

manrega bura nahi hai.parntu jo paisa sarkar majduro ko de rahi hai utna kam bhi unse lena chahiye aur unka paisa unhi ko milna chahie na ki anyalogo ko..................

ROHIT ने कहा…

manrega bura nahi hai.parntu jo paisa sarkar majduro ko de rahi hai utna kam bhi unse lena chahiye aur unka paisa unhi ko milna chahie na ki anyalogo ko..................