शुक्रवार, जनवरी 07, 2011

नव उदारवाद की कोख से निकला है क्रोनी पूंजीवाद

यहाँ हर दस्तखत की कीमत है

तीन किस्तों की श्रृंखला की पहली किस्त
यह सिर्फ संयोग नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को शुरू हुए इस साल जब दो दशक पूरे हो रहे हैं, शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार का मुद्दा देश के सामने सबसे बड़े सवाल के रूप में खड़ा है. यह संयोग इसलिए नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और भ्रष्टाचार के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है. हालांकि आज से दो दशक पहले जब नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई थी तो इन सुधारों के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया गया था कि इससे लाइसेंस-कोटा-परमिट राज का खात्मा हो जायेगा और इस कारण भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जायेगा.

लेकिन पिछले दो दशकों के अनुभव से साफ है कि भ्रष्टाचार खत्म होना तो दूर, उल्टे उसका आकार और प्रसार बहुत ज्यादा बढ़ता जा रहा है. चाहे वह ८० हजार करोड़ रूपये का कामनवेल्थ घोटाला हो या १.७६ लाख करोड़ रूपये का २ जी घोटाला या फिर हजारों करोड़ रूपये का लोन घोटाला या सैकड़ों करोड़ रूपये का आदर्श हाऊसिंग घोटाला या फिर कर्नाटक में हजारों करोड़ रूपये की अवैध माइनिंग और जमीन आवंटन का घोटाला- यह सूची दिन पर दिन फैलती और बड़ी होती जा रही है. चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें, बिना अपवाद के लगभग सभी रंगों की सरकारें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी हैं.

भ्रष्टाचार और घोटाले एक नियम की तरह हो गए हैं. कोई भी सरकारी नीति, फैसला, परियोजना और कार्यक्रम की कल्पना भ्रष्टाचार के बिना नहीं की जा सकती है. यही नहीं, भ्रष्टाचार का एक तरह से केन्द्रीयकरण सा हो गया है. मंत्री और मुख्यमंत्री के स्तर पर हर काम और फैसले की कीमत तय हो गई है. हर काम और फैसले में सबका हिस्सा तय है.

कहते हैं कि फैसले तक पहुँचने की प्रक्रिया में हर दस्तखत की कीमत है और सबका हिस्सा तय है. आदर्श हाऊसिंग घोटाले में इसका बेहतरीन उदाहरण है जहां उस अवैध हाऊसिंग काम्प्लेक्स की मंजूरी के लिए जिस भी मंत्री और अफसर के दस्तखत जरूरी थे, उन सभी को उनकी हैसियत के अनुसार फ्लैट दे दिए गए और मंजूरी मिलती चली गई.

यह यूं ही नहीं है कि पिछले दो दशकों से एक के बाद दूसरे बड़े घोटाले ने राष्ट्रीय जीवन को उद्वेलित कर रखा है. भ्रष्टाचार और घोटाले राष्ट्रीय पहचान बनते जा रहे हैं. आश्चर्य नहीं कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट में भारत भ्रष्ट देशों की सूची में तीन पायदान और नीचे गिरकर सत्तासीवें स्थान पर पहुंच गया है. यहां तक कि भ्रष्ट देशों की सूची में भारत अफ्रीका और एशिया के कई देशों से भी नीचे है. इसका सम्बन्ध निश्चय ही, पिछले कुछ महीनों में शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार के एक के बाद दूसरे बड़े मामले सामने आने से है. हालिया मामलों ने घोटालों और भ्रष्टाचार के पिछले सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि ये घोटाले हवा में नहीं हो रहे हैं. इनका सीधा सम्बन्ध नव उदारवादी आर्थिक सुधारों से है. सच यह है कि इन सुधारों के साथ भ्रष्टाचार का भी पूरी तरह से उदारीकरण हो गया है. इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि आज़ादी के बाद से भारत से जो कालाधन अवैध तरीके से देश से बाहर गया, उसका ६८ प्रतिशत अकेले १९९१ के आर्थिक सुधारों के बाद से गया है.

पिछले साल नवंबर में जारी हुई ग्लोबल फिनान्सियल इंटीग्रिटी (जी.एफ.आई) रिपोर्ट के मुताबिक, १९४८ से २००८ के बीच अवैध तरीके से देश से लगभग २१३ अरब डालर की रकम विदेशों में खासकर स्विस और अन्य आफशोर बैंकों में चली गई. अगर इस रकम को मुद्रास्फीति के साथ एडजस्ट करें तो भ्रष्ट और घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों और माफियाओं ने इन साठ वर्षों में कोई ४६२ अरब डालर की रकम लूटकर विदेशों में भेज दिया.

लेकिन उससे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका ६८ प्रतिशत यानी ३१४ अरब डालर आर्थिक सुधारों के शुरू होने के बाद उड़ गए. इस रिपोर्ट के मुताबिक, १९९१ के आर्थिक सुधारों के पहले जहां प्रति वर्ष औसतन ९.१ प्रतिशत की दर से अवैध कालाधन विदेशी बैंकों में जा रहा था, वह सुधारों की शुरुआत के बाद उछलकर सीधे १६.४ प्रतिशत सालाना की दर से जाने लगा.

यही नहीं, इस रिपोर्ट के अनुसार, २००२ से २००८ के बीच औसतन हर साल १६ अरब डालर यानी ७३६ अरब रूपये का कालाधन अवैध तरीके से देश से बाहर चला गया. यहां एक और तथ्य पर गौर करना जरूरी है कि देश में भ्रष्टाचार और घोटालों के अलावा सार्वजनिक सम्पदा की लूट से कमाए गए कालेधन का सिर्फ ७२ प्रतिशत ही विदेशों में जाता है, बाकी २८ फीसदी देश में ही रह जाता है.

जी.एफ.आई रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल जी.डी.पी का लगभग ५० प्रतिशत कालेधन की अर्थव्यवस्था है. इसका अर्थ यह हुआ कि २००८ में जब भारतीय जी.डी.पी ६४० अरब डालर की थी, उसका ५० प्रतिशत यानी ३२० अरब डालर की समानांतर कालेधन की अर्थव्यवस्था साथ में ही फल-फूल रही थी. कालेधन की इस भूमिगत अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार, घोटालों, सार्वजनिक सम्पदा की लूट और टैक्स चोरी के जरिये पैदा होता है. आश्चर्य नहीं कि कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, अकेले स्विस बैंकों में भारतीयों का लगभग १.४ खरब डालर यानी आज के हिसाब से ६३ खरब डालर जमा है. वैसे कहा जाता है कि स्विस बैंकों में जमा विदेशी धन में पहले स्थान पर भारतीय ही हैं.

यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि यही कालाधन जो बंद अर्थव्यवस्था के दौर में देश से बाहर चला गया था, हाल के वर्षों में कई रूपों में भारतीय अर्थव्यवस्था में लौट रहा है. उदारीकरण ने इसे खुद को सफ़ेद करने के बहुतेरे अवसर मुहैया करा दिए हैं. यही नहीं, यह कालाधन तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में पैसे से पैसा बनाने के लिए आ रहा है. माना जाता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थागत निवेशकों-एफ.आई.आई की पीठ पर चढ़कर ऐसा कालाधन बड़े पैमाने पर आया है.

असल में, एफ.आई.आई निवेश का एक बड़ा हिस्सा पी नोट्स के जरिये आता है जिसके स्रोत के बारे में विदेशी निवेशकों से कुछ नहीं पूछा जा सकता है. इस पी. नोट्स के जरिये ही भारत से गया कालाधन वापस शेयर बाज़ार में आ कर न सिर्फ सट्टेबाजी के जरिये मोटा मुनाफा कमा रहा है बल्कि काले को सफ़ेद भी कर रहा है.

इस पी. नोट्स के बारे में रिजर्व बैंक से लेकर सेबी तक सबने अनेकों बार चिंता व्यक्त की है. इनसे बाज़ार की स्थिरता के लिए खतरा तो था ही, उनपर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि पी. नोट्स के जरिये माफिया, अपराधी और यहां तक कि आतंकवादी संगठन भी भारतीय बाज़ारों में निवेश कर रहे हैं. हालत यह हो गई थी कि एक समय कुल विदेशी संस्थागत निवेश का लगभग ५० प्रतिशत पी. नोट्स से आ रहा था, जिसके स्रोत के बारे में एफ.आई.आई के अलावा किसी को पता नहीं था. काफी हंगामा होने और दबाव पड़ने के बाद सेबी ने इस साल अप्रैल में पी. नोट्स पर कुछ शर्तें लगाईं लेकिन आज भी कुल एफ.आई.आई निवेश का १५ प्रतिशत पी. नोट्स से ही आ रहा है.

जारी...
'समकालीन जनमत' के जनवरी'११ अंक में प्रकाशित आलेख की पहली किस्त

1 टिप्पणी:

Voice of youths ने कहा…

इस पूंजीवाद से मुक्ति का रास्ता क्या होना चाहिए? यह भी बड़ा सवाल है|