गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

लाबीइंग के खेल में हिंदी वाले दूध के धुले नहीं हैं

हिंदी मीडिया का अंडरवर्ल्ड : दलाली से ब्लैकमेल तक


नीरा राडिया टेप्स ने न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड से पर्दा उठा दिया है. अभी तक यह अंडरवर्ल्ड अख़बारों और चैनलों के समाचार कक्षों और प्रेस क्लबों में व्यक्तिगत बातचीत, कानाफूसियों और गासिप तक सीमित था. लेकिन यहां ‘आउटलुक’ को धन्यवाद देना जरूरी है जिसकी हिम्मत के कारण न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के एक हिस्से की कारगुजारियां सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बन गई हैं. इन टेप्स से समाचार माध्यमों और उनके उंचे पदों पर बैठे पत्रकारों के सत्ता और कारपोरेट समूहों के दलालों के साथ निरंतर घनिष्ठ होते संबंधों और उनके लेखन और रिपोर्टिंग पर पी.आर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों की निर्णायक रूप से पुष्टि होती है.

यह कई कारणों से चिंताजनक है. असल में, इन टेप्स में कई बड़े कारपोरेट समूहों के लिए सत्ता के गलियारों में लाबीइंग करनेवाली नीरा राडिया अंग्रेजी मीडिया के कई जाने-माने चेहरों और वरिष्ठ पत्रकारों से जिस अंतरंगता और अधिकार के साथ बातें करती हुई सुनाई देती हैं, उसके कंटेंट में ऐसा बहुत कुछ है जो एक पत्रकार और उसके समाचार स्रोत के बीच की बातचीत के दायरे से बाहर चला जाता है. निश्चय ही, एक पत्रकार को समाचार संग्रह और रिपोर्टिंग के लिए बहुत तरह के स्रोतों से बातचीत करनी पड़ती है और करनी चाहिए. उनमें पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के अधिकारी भी हो सकते हैं लेकिन ऐसी किसी भी बातचीत की कुछ सीमाएं भी हैं.

अफसोस की बात है कि नीरा राडिया के साथ बातचीत में कई पत्रकार, एक पत्रकार की स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका छोड़कर लाबीइंग कंपनी के एजेंट की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं. बातचीत से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इनमें से कुछ पत्रकार सत्ता की दलाली में शामिल हैं. साफ है कि ऐसा करते हुए वे अपनी भूमिकाओं से समझौता करते हुए दिखाई देते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी रिपोर्टिंग और लेखन भी इस सबसे परोक्ष –अपरोक्ष जरूर प्रभावित होती होगी.

असल में, हाल के वर्षों में न सिर्फ खबरों की खरीद-फरोख्त यानी पेड न्यूज के रूप में बल्कि बड़े देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों, पार्टियों, मंत्रियों-नेताओं और सरकार के लिए पी.आर और लाबीइंग करनेवाली कंपनियों की घुसपैठ समाचार कक्षों में बहुत ज्यादा बढ़ गई है. यह चिंता की बात इसलिए है कि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के प्रभाव से न सिर्फ खबरों की स्वतंत्रता, तथ्यात्मकता और निष्पक्षता प्रभावित होती है बल्कि खबरों का पूरा एजेंडा बदल जाता है. पी.आर और लाबीइंग कंपनियों को खबरों में अपने क्लाइंट के हितों के मुताबिक तोड़-मरोड़ करने, मनमाफिक खबरें प्लांट करने और नकारात्मक खबरों को रुकवाने के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि समाचार मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संपादकों की एक जिम्मेदारी पी.आर और लाबीइंग कंपनियों और उनके मैनेजरों को समाचार कक्ष से दूर रखने की भी रही है.

लेकिन जब संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ही पी.आर और लाबीइंग कंपनियों से प्रभावित और उनके लिए काम करने लगें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इन कंपनियों ने किस हद तक समाचार कक्षों का टेकओवर कर लिया है. नीरा राडिया प्रकरण इसी टेकओवर का सबूत है. लेकिन यह केवल अंग्रेजी मीडिया और कुछ जाने-पहचाने पत्रकारों तक सीमित नहीं हैं. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओँ का मीडिया भी दूध का धुला नहीं है. सच यह है कि हिंदी न्यूज मीडिया में भी सत्ता और बड़ी पूंजी की दलाली पर खड़े मीडिया के अंडरवर्ल्ड का पिछले तीन दशकों खासकर उदारीकरण के बाद काफी तेजी से विस्तार हुआ है. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड में चुनिन्दा संपादकों, वरिष्ठ पत्रकारों और रिपोर्टरों के अलावा उनके मालिकान भी शामिल हैं.

इस अंडरवर्ल्ड की बढ़ती ताकत और प्रभाव का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसकी सीधी पहुंच हिंदी क्षेत्रों के केन्द्रीय मंत्रियों, अन्य प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, बड़े अफसरों और नेताओं के अन्तःकक्षों तक है. हिंदी भाषी किसी भी राज्य में चले जाइये, मुख्यमंत्रियों के किचन कैबिनेट में आपको चुनिन्दा मंत्रियों, नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों, पावर ब्रोकर्स के अलावा कुछ संपादक और पत्रकार और भी मिल जाएंगे. हालांकि कुछ हद तक उत्तर प्रदेश में मायावती इसकी अपवाद हैं लेकिन उनकी जगह सत्ता के दूसरे सबसे ताकतवर केन्द्रों- सतीश मिश्र और कैबिनेट सचिव शशांक शेखर की किचन कबिनेट में चुनिन्दा संपादक-पत्रकार मौजूद हैं.

वास्तव में, यही किचन कैबिनेट राज्यों में राजकाज चला रही है. इसी किचन कैबिनेट में बड़े सौदों के लिए डील पक्की होती है. ठेके तय होते हैं. ट्रांसफर-पोस्टिंग का धंधा चलता है. लेकिन यहां तक पहुंच आसान नहीं है. कई मामलों में सौदे या डील पक्की करने के लिए इस किचन कैबिनेट तक पहुंचने के वास्ते उद्योगपति, कारोबारी, ठेकेदार और अफसर इस कैबिनेट के सदस्य संपादक-पत्रकारों को भी जरिया बनाते हैं. वे खुशी-खुशी जरिया बन भी रहे हैं. सौदे करा रहे हैं और उसकी मलाई भी काट रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि ऐसे संपादकों और पत्रकारों का सबसे पहले इस्तेमाल उनके मीडिया समूहों के मालिकान अपने दूसरे उद्योग धंधों और कारोबारों के लिए लाइसेंस, परमिट और कोटा लेने के अलावा अन्य तमाम वैध-अवैध कामों के लिए करते हैं.

हालात इतने खराब हैं कि कई अखबार और चैनल तो अपने संपादकों और रिपोर्टरों को मंत्रियों, अफसरों और व्यापारियों/ठेकेदारों के भयादोहन के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं. यही नहीं, हिंदी के कई बड़े अखबार समूहों और छोटे क्षेत्रीय चैनलों में संपादक या ब्यूरो चीफ या चीफ रिपोर्टर आदि बनने के लिए प्रोफेशनल काबिलियत से अधिक आपकी केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और बड़े अफसरों तक पहुंच और उनसे खबर निकालने की नहीं बल्कि काम करा पाने की आपकी क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी हो गई है. जैसे ही आप हिंदी के कई बड़े अख़बारों में स्थानीय संपादक/ब्यूरो चीफ/चीफ रिपोर्टर के पदों पर बैठे कई लोगों का अतीत और वर्तमान टटोलेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर उनकी दलाली की कहानियां सामने आने लगेंगी.

आश्चर्य नहीं कि अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बड़े-छोटे अखबार या क्षेत्रीय चैनल राज्य सरकारों के प्रति बहुत नरम रूख रखते हैं और मुख्यमंत्रियों के गुणगान में लगे रहते हैं. ऐसा लगता है कि जैसे इन राज्यों में रामराज्य आ गया हो. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड ने हिंदी न्यूज मीडिया के जनहित के मुद्दों पर तीखे तेवर, भ्रष्टाचार-अनियमितताओं के भंडाफोड और सरकार के प्रति आलोचनात्मक आवाज़ को कमजोर और खामोश कर दिया है.
('आउटलुक' हिंदी में दिसंबर'१० अंक में प्रकाशित आलेख)
नोट: जल्दी ही मीडिया पर पी.आर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों पर तीन किस्तों में विस्तृत आलेख पढ़िए जो 'कथादेश' के दिसंबर अंक में छपा है.

8 टिप्‍पणियां:

विनीत कुमार ने कहा…

इस पूरे मामले में आउटलुक के साथ ओपन मैगजीन का नाम लिया जाना जरुरी है,बल्कि आउटलुक का नाम प्रमुखता से लिया जाना चाहिए।.

ASHOK ने कहा…

media nahi ise media mafia khaie.radia parkarn ke bad kuch smpadak apne apne madyam se sfai de rahe hai.log inko mafnahi karne vale hai.logon ke sath kis kadar dokha karte hain. bat hindi english ki nahi dalolon ki hain jo paid news per sor macha rahe hai lakin piche se sab kuch bach rahe hain.ye gandgi jitna logon ke samne aygi utna hi acha hai. outlook ne sahi kiya hai.raton rat media garne karorone kaise bana rahe hai sab jante hai.

ASHOK ने कहा…

media nahi ise media mafia khaie.radia parkarn ke bad kuch smpadak apne apne madyam se sfai de rahe hai.log inko mafnahi karne vale hai.logon ke sath kis kadar dokha karte hain. bat hindi english ki nahi dalolon ki hain jo paid news per sor macha rahe hai lakin piche se sab kuch bach rahe hain.ye gandgi jitna logon ke samne aygi utna hi acha hai. outlook ne sahi kiya hai.raton rat media garne karorone kaise bana rahe hai sab jante hai.

'उदय' ने कहा…

... behatreen abhivyakti !!!

प्रमोद जोशी ने कहा…

पत्रकारीय कर्म में विभाजक रेखाएं बहुत महीन होती हैं। कारोबार से लेकर राजनैतिक समर्थन और विरोध को लेकर पत्रकारों पर पक्षधरता के आरोप लगते हैं। ये आरोप तब से लग रहे हैं जबसे पत्रकारिता ने जन्म लिया है। आज हम जिस काम की आलोचना कर रहे हैं, उसमें गुणात्मक और गणनात्क बदलाव दोनों हुए है।

पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी वैचारिक रंगत को स्पष्ट करे। यानी आपके कांग्रेस से रिश्ते हैं या भाजपा से और आपके आर्थक-सामाजिक दृष्टिकोण क्या हैं। इसे व्यक्त करने में लोग घबराते हैं। आपने ऐसे पत्रकार देखे होंगे जिनकी पीएमओ में पहुँच तब भी थी, जब अटल बिहारी थे और अब भी है, जब मनमोहन हैं। यह पीआर कौशल है। ऐसे व्यक्ति इस व्यवसाय में अपने प्रभाव को बढ़ाते हैं। दलाल शब्द खराब लगता है, पर व्यवहारतः दलाल बनने में काफी लोगों को ऐतराज नहीं है।
हिन्दी में ऐसे पत्रकारों की संख्या उतनी ही होगी जितनी किसी और भाषा मे है। चूंकि व्यक्ति महत्वपूर्ण है। हाँ एक फर्क यह है कि हिन्दी का असर दरोगाओं, संतरियों और मुख्यमंत्रियों तक सीमित है। या हिन्दी इलाके के सांसदों या मंत्रियों तक। हाँ एक फर्क यह भी आया है कि अब सम्पादक खुद इस काम में बढ़कर हिस्सा लेते हैं। उनके स्वामी भी यही चाहते हैं। एक वक्त तक कुछ सम्पादक ऐसा नहीं करते थे, तब भी उनकी नौकरी बची रह सकती थी। इसमें व्यक्ति और व्यवस्था सभी का योगदान है। पहले इसमें राजनीति का हिस्सा ज्यादा था। अब बिजनेस की भागीदारी बढ़ी है, इसलिए लेवल बढ़ गया है। और शायद इस वजह से बातें खुल भी रहीं हैं, क्योंकि जिसके आर्थिक हित खंडित होंगे वह बदला भी लेगा।

प्रमोद जोशी ने कहा…

पत्रकारीय कर्म में विभाजक रेखाएं बहुत महीन होती हैं। कारोबार से लेकर राजनैतिक समर्थन और विरोध को लेकर पत्रकारों पर पक्षधरता के आरोप लगते हैं। ये आरोप तब से लग रहे हैं जबसे पत्रकारिता ने जन्म लिया है।

आपने ऐसे पत्रकार देखे होंगे जिनकी पीएमओ में पहुँच तब भी थी, जब अटल बिहारी थे और अब भी है, जब मनमोहन हैं। यह पीआर कौशल है। ऐसे व्यक्ति इस व्यवसाय में अपने प्रभाव को बढ़ाते हैं। दलाल शब्द खराब लगता है, पर व्यवहारतः दलाल बनने में काफी लोगों को ऐतराज नहीं है।

हिन्दी में ऐसे पत्रकारों की संख्या उतनी ही होगी जितनी किसी और भाषा मे है। हिन्दी का असर दरोगाओं, संतरियों और मुख्यमंत्रियों तक सीमित है। या हिन्दी इलाके के सांसदों या मंत्रियों तक। एक फर्क यह भी आया है कि अब सम्पादक खुद इस काम में बढ़कर हिस्सा लेते हैं। उनके स्वामी भी यही चाहते हैं। एक वक्त तक कुछ सम्पादक ऐसा नहीं करते थे, तब भी उनकी नौकरी बची रह सकती थी। इसमें व्यक्ति और व्यवस्था सभी का योगदान है। पहले इसमें राजनीति का हिस्सा ज्यादा था। अब बिजनेस की भागीदारी बढ़ी है। इस वजह से बातें खुल भी रहीं हैं, क्योंकि जिसके आर्थिक हित खंडित होंगे वह बदला भी लेगा।

Dr. Mukul Srivastava ने कहा…

अद्भुत काश आप जैसी गति से इतना सार्थक लिख पाता बधाई

sanjeev dubey ने कहा…

if india stands in the lines of most corrupt nation. how come we can expect our media is out of it.