सोमवार, दिसंबर 13, 2010

‘बनाना रिपब्लिक’ कहिए या कंपनी राज

महाशय टाटा, देश को 'बनाना रिपब्लिक' किसने बनाया है?

२ जी घोटाले और नीरा राडिया टेप्स को लेकर जारी शोर-शराबे के बीच पर्दे के पीछे राजनीति और कारपोरेट जगत में ऐसा बहुत कुछ चल रहा है जिसके बहुत गहरे निहितार्थ हैं. उदाहरण के लिए मौजूदा विवाद के बीच हाल में टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा और केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के दो अलग-अलग लेकिन काफी हद तक आपस में जुड़े बयान आए हैं.

लेकिन बहुत महत्वपूर्ण और दूरगामी नतीजों वाले बयान होने के बावजूद उनपर उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी. एक टी.वी चैनल को दिए लंबे इंटरव्यू में रतन टाटा ने राडिया टेप्स को लीक किए जाने और उद्योगपतियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारत के ‘बनाना रिपब्लिक’ में तब्दील हो जाने का खतरा पैदा हो गया है.

२ जी को लेकर उठे विवाद खासकर राडिया के साथ खुद की बातचीत के टेप्स लीक किए जाने से रतन टाटा की नाराजगी किसी से छुपी नहीं है. इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए टाटा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर की है. टाटा के बयान के बाद अब कृषि मंत्री शरद पवार भी मैदान में कूद पड़े हैं. खबरों के मुताबिक, पवार ने यू.पी.ए के घटक दलों की बैठक में सरकार को चेताया है कि अगर सरकार ने कार्पोरेट समूहों को बिना किसी ‘विशेष कारण’ के निशाना बनाना और उनके खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करना जारी रखा तो सरकार की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है.

पवार के अनुसार, हाल की घटनाओं से कारपोरेट समूहों में नाराजगी बढ़ रही है और अगर स्थिति को जल्दी संभाला नहीं गया तो वे अपनी वफ़ादारी विपक्ष के साथ जोड़ लेंगे जो कि सरकार के भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा. पवार ने खुलकर कहा है कि यू.पी.ए सरकार को टाटा की चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए. पवार के मुताबिक, कारपोरेट समूहों के बीच यह भावना बढ़ रही है कि यह सरकार ‘कारपोरेट मित्र’ नहीं रही और इसका कंपनियों पर ‘अच्छा और मुलायम प्रभाव’ खत्म होता जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि शरद पवार ने हाल के महीनों में यू.पी.ए सरकार के कई फैसलों को लेकर खुली और परोक्ष नाराजगी जाहिर की है. अभी हाल ही में, उन्होंने महाराष्ट्र में पुणे के नजदीक बन रही लवासा सिटी को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा नियमों के उल्लंघन की नोटिस दिए जाने की खुलकर आलोचना की है. पवार का लवासा प्रेम जग जाहिर है.

उन्होंने हाल ही में रीयल इस्टेट कंपनियों को बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा अनुचित तरीके से दिए गए कर्जों की सी.बी.आई से जांच और बैंक अधिकारियों की गिरफ़्तारी को कारपोरेट समूहों को निशाना बनाने के उदाहरण के बतौर पेश किया बताते हैं. यही नहीं, पवार ने सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले एन.ए.सी द्वारा तैयार खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे से भी अपनी असहमति खुलकर जाहिर की है.

इस लिहाज से पवार और टाटा के बयानों के गहरे निहितार्थों को समझना और उनपर चर्चा जरूरी है. ये कोई मामूली बयान नहीं हैं. एक बयान देश के सबसे बड़े कारपोरेट समूह के प्रमुख का है जो आमतौर पर बहुत कम और तौल-तौलकर बोलने के लिए जाने जाते हैं. दूसरे यू.पी.ए सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में से एक हैं. इन्हें कतई अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

एक बात तो तय है कि इन दोनों बयानों से कारपोरेट समूहों और सरकार के अंदर चल रही उठापटक, घात-प्रतिघात, असंतोष और चिंताओं का पता चलता है. इससे यह भी पता चलता है कि सरकार कैसे और किन दबावों में काम कर रही है और सरकार और कारपोरेट समूहों के बीच ‘अच्छे रिश्ते’ किसी सरकार के स्थायित्व के लिए किस हद तक जरूरी हो गए हैं?

सच पूछिए तो शरद पवार और रतन टाटा ने जाने-अनजाने भारतीय लोकतंत्र और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के बारे में एक ऐसे कड़वे यथार्थ को सामने ला दिया है जिसे बहुत दबा-छुपाकर रखने की कोशिश की जाती रही है. लेकिन यह कुछ ऐसा समय है जिसमें सत्ता प्रतिष्ठान, राजनीति, कारपोरेट जगत और मीडिया के अंदर मची रार और युद्ध के कारण टाटा और पवार जैसे खिलाड़ी संकोच और लिहाज छोड़कर मैदान में कूद पड़े हैं.

ऐसे में, अगर पवार की इस बात को मान लें कि देश में किसी भी सरकार का स्थायित्व कारपोरेट क्षेत्र के समर्थन और उसे खुश रखने पर टिका है तो कहना पड़ेगा कि टाटा का यह आकलन भी सही है कि देश एक ‘बनाना रिपब्लिक’ बन चुका है.

आखिर ‘बनाना रिपब्लिक’ क्या है? याद रहे, यह राजनीतिक पद उन दक्षिण अमेरिकी देशों के सन्दर्भ में आता है जहां कुछ चुनिन्दा कंपनियों और स्वयम्भू ताकतवर राजनेताओं के हाथों में सत्ता की पूरी कमान होती है और जो बिना किसी नियम-कानून की परवाह किए भ्रष्ट तौर-तरीकों के साथ निजी हित में सरकार चलाते हैं.

इस अर्थ में देखा जाए तो २ जी घोटाले से लेकर सी.डब्ल्यू.जी, आदर्श हाऊसिंग सोसाइटी और कर्ज घोटाले तक की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि देश में एक तरह का क्रोनी कैपिटलिज्म हावी होता जा रहा है जिसमें सत्ता के करीबी पूंजीपतियों/उद्योगपतियों को मनमाने और भ्रष्ट तरीकों से सार्वजनिक और राष्ट्रीय संसाधनों को लूटने की खुली छूट मिल गई है.

यही नहीं, निजी हित और कंपनियों के मुनाफे को सार्वजनिक हितों पर प्राथमिकता दी जा रही है. ऐसा लगता है कि जैसे कंपनियां ही देश चला रही हैं. सरकार चाहे जिस पार्टी या रंग की हो, उसने अर्थनीति निर्धारण को देशी-विदेशी कंपनियों और उनके एजेंटों को आउटसोर्स कर दिया है. वास्तव में, अर्थनीति के निर्धारण में देशी-विदेशी कंपनियों की सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका हो गई है.

हालत यह हो गई है कि कैबिनेट की बैठक से पहले ही कंपनियों को पता होता है कि क्या फैसला होनेवाला है? पवार की खुली स्वीकारोक्ति से इसकी पुष्टि होती है. इस कंपनी राज का ही नतीजा है कि पिछले कुछ वर्षों में पूरे देश में नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए देशी-विदेशी कंपनियों को कभी सेज के नाम पर और कभी खनिज दोहन के बहाने लाखों एकड़ जमीन कब्जाने की इजाजत दी गई है.

उडीसा और छत्तीसगढ़ से लेकर कर्नाटक जैसे राज्यों में पास्को, टाटा-कलिंगनगर, वेदांता, जिंदल जैसे विशाल और हजारों करोड़ रूपये के स्टील प्रोजेक्ट्स के लिए न सिर्फ हजारों एकड़ जमीन आवंटित की गई है बल्कि रेड्डी बंधुओं जैसे माइनिंग किंग्स को बेलगाम खनिज दोहन की इजाजत भी दी गई है. खुद यू.पी.सरकार की एक समिति के मुताबिक यह ‘कोलंबस के बाद जमीन की सबसे बड़ी लूट है.’ यही नहीं, इन कंपनियों को प्रोजेक्ट्स और खनन के लिए जमीन के पट्टे और लाइसेंस देते हुए पर्यावरण कानूनों और नियमों को अनदेखा किया गया. जब तक कंपनियों का देशी-विदेशी कार्टेल ही आपसी सहमति से नीतियां बनाता और फैसले लेता रहा, सब कुछ मजे में चलता रहा.

कहने की जरूरत नहीं है कि बिल्कुल ‘बनाना रिपब्लिक’ की तर्ज पर यह सब कुछ ‘विकास’ और ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर होता रहा. इस कारपोरेट विकास की आड़ में कंपनियों, नेताओं, अफसरों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और माफियाओं का एक गिरोह बेरोक-टोक देश और उसकी सम्पदा को लूटने में लगा रहा. सार्वजनिक और राष्ट्रीय संपत्ति की इस लूट से शायद ही कोई क्षेत्र बचा रहा हो.

इस लूट का आलम यह था कि ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ २००० से २००८ के बीच लगभग १२५ अरब डालर की रकम कालेधन के रूप में देश से बाहर चली गई. यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि कई मीडिया कंपनियां भी इस लूट में अपना हिस्सा वसूलकर विकास राग गाने में लगी रहीं.

लेकिन कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच पिछले कई वर्षों से जारी यह जुगलबंदी कंपनियों के संकीर्ण हितों में बढ़ते टकरावों और दूसरी ओर, नीचे से गरीबों, आदिवासियों और दबे-कुचले लोगों के तीखे होते संघर्षों के दबाव में टूटती दिखाई दे रही है. इसके कारण ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार एक ओर देशी-विदेशी कंपनियों खासकर टेलीकाम और इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के बीच आपस में छिड़े तीखे कारपोरेट युद्ध में फंस गयी है और दूसरी ओर, नीचे जमीन पर गरीबों के जुझारू होते संघर्षों से घिरती जा रही है.

इन संघर्षों के दबाव में हाल में यू.पी.ए सरकार को वेदांता, पास्को, जिंदल से लेकर लवासा जैसे कुछ मामलों में कंपनियों को नोटिस देने से लेकर उनकी मंजूरी रद्द करने तक के फैसले करने पड़े हैं. हालांकि इन फैसलों में भी सरकार की मनमानी और अपारदर्शिता किसी से छुपी नहीं है. इसके अलावा, कुछ अन्य कंपनियों के बड़े प्रोजेक्ट्स जन प्रतिरोध के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं और कुछ को अपने प्रोजेक्ट्स बंद करने पड़े हैं.

ऊपर से यू.पी.ए सरकार में कुछ खास कंपनियों के प्रति अतिरिक्त उदारता और लाइसेंस आदि के बंटवारे में पक्षपात ने कई बड़ी कंपनियों को भड़का दिया है. जाहिर है कि इससे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कंपनियों में बेचैनी और अधिक बढ़ गई है. टाटा का बयान इस बेचैनी का संकेत है. कंपनियों की इस बेचैनी से शरद पवार जैसे नेताओं को यह डर सताने लगा है कि कहीं ये कंपनियां एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा न छेड दें. निश्चय ही, शरद पवार को अस्सी के दशक के उत्तरार्ध के वे दिन याद होंगे, जब दो बड़े कारपोरेट समूहों के बीच छिड़े युद्ध में राजीव गांधी की सरकार अपनी नीतियों के कारण फंस गई थी.

असल में, जब तक कंपनियों के बीच विभिन्न मुद्दों पर सहमति रहती है, ऐसा लगता है कि सरकार सहजता से चल रही है. उनके मनमाफिक नीतियां बनती रहती हैं और उनका खेल निर्बाध चलता रहता है. इसे भ्रष्टाचार नहीं माना जाता है. लेकिन जैसे ही कंपनियों के बीच हितों का टकराव, खींचतान और कारपोरेट युद्ध शुरू होता है, सरकार पंगु हो जाती है, उससे फैसले लेते नहीं बनता है. जैसे आजकल यू.पी.ए सरकार की हालत हो गई है. कंपनियों के आपसी संघर्षों में घोटालों का भांडा फूटने लगता है और राडियाओं के टेप बाहर आने लगते हैं.

इसे आप ‘बनाना रिपब्लिक’ कहिये या भारतीय सन्दर्भों में स्वतंत्रता पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी वाले दौर का कंपनी राज लेकिन सच यह है और पवार के बयानों से इसकी पुष्टि होती है कि कंपनियों को नाराज करके कोई सत्ता में नहीं रह सकता है. आश्चर्य नहीं कि आज सत्ता प्रतिष्ठान को लोगों से ज्यादा कंपनियों की परवाह है.

लेकिन सवाल है कि क्या इस देश में कंपनियों के आगे नियम-कानूनों और लोगों की राय और भावनाओं की कोई कीमत नहीं है? पवार जैसों की मानें तो इसका जवाब है नहीं. इसका अर्थ यह हुआ कि अपनी सलामती चाहनेवाली सरकारें अब वेदांता, पास्को और उस जैसी कंपनियों के खिलाफ फैसले नहीं कर सकेगी.

मानिये या न मानिये लेकिन इस पूरे प्रकरण ने लोकतंत्र के आवरण में चल रही सत्ता व्यवस्था के असली चरित्र को उजागर कर दिया है. क्या अब भी किसी को शक है कि देश बनाना रिपब्लिक नहीं है?

('जनसत्ता' में सम्पादकीय पृष्ठ पर ११ दिसंबर'१० को प्रकाशित)

5 टिप्‍पणियां:

किलर झपाटा ने कहा…

इस पर इतनी बड़ी पोस्ट लिखने की क्या ज़रूरत थी ? ये तो वैसे ही पेपर में आ चुका था। बड़े आए जनसत्त से साभार वाले। वो लोग ब्लॉग से साभार लिखते हैं कभी। हाँ नहीं तो।

ajit gupta ने कहा…

आपका आलेख बहुत ही सारगर्भित है। बनाना राज भी समझ आ गया कि केले की तरह बिना रूकावट देश की सम्‍पत्ति को हजम कर जाओ। मुझे तो लगता है कि अमेरिका में चूंकि केला ही होता है इसलिए बनाना राज की बात आयी है। मुझे लगता है कि भारत के संदर्भ में मेंगो या आम रिपब्लिक शब्‍द होना चाहिए। आम की तरह देश को चूस जाओ और गुठली को फेंक दो। गुठली अर्थात गरीब जनता। यही कारण है कि आज अमीर और अमीर बनता जा रहा है तथा गरीब और गरीब। राजनेता, पत्रकार और पूंजीपति मिलकर इस देश की सम्‍पत्ति पर अधिकार जमा रहे हैं।
लवासा का सत्‍य कौन नहीं जानता। शरद पंवार की तो उसमें हिस्‍सेदारी है। टाटा कहते हैं कि मुझसे 15 करोड मांगे गए। अब इन उद्योग घरानों से पूछो कि उनके बजट में कितना प्रतिशत बजट ऐन्‍टरटेंट के नाम का होता है? क्‍या वें किसी को कुछ नहीं देते? विज्ञापन के नाम पर ही लोगों को उपकृत करते हुए करोड़ो या अरबों रूपए देते हैं।

RAJESH KUMAR ने कहा…

मुझे लगता है अब व्यवस्था को कोसने वाले ही भ्रष्ट हो गए...जिनने भी यहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज उठाई...उनका मक़सद केवल और केवल व्यवस्था में हिस्सा लेना ही रहा... अफसोस से कहना पड़ रहा है..कि इस सड़ चुके सिस्टम में सबसे ज्यादा चिल्लाने वाले बुद्धिजीवियों ने भी आखिर साबित कर ही दिया कि ... वे भी इसी गली व्यवस्था की उपज हैं...कहा जाता था कि जैसा समाज होता है..वैसी ही पुलिस और वैसे ही लीडर मिलते हैं..लेकिन अब ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि मीडियाकर्मी भी वैसे ही मिले...कम से कम इतनी फजीहत के बाद सत्ता के हाथों बिक चुके मीडिया हाऊस को कुछ नहीं कहना चाहिए ... क्योंकि चोरी के बाद सीनाजोरी अच्छी नहीं लगती .. लेकिन इसमें एक बात है जो हमारे जैसों का हौसला डिगाती है..और वो ये है कि जिन्हें देखके चलने का हुनर सीखा वहीं दाएं बाएं होने लगे....

RAJESH KUMAR ने कहा…

मुझे लगता है अब व्यवस्था को कोसने वाले ही भ्रष्ट हो गए...जिनने भी यहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज उठाई...उनका मक़सद केवल और केवल व्यवस्था में हिस्सा लेना ही रहा... अफसोस से कहना पड़ रहा है..कि इस सड़ चुके सिस्टम में सबसे ज्यादा चिल्लाने वाले बुद्धिजीवियों ने भी आखिर साबित कर ही दिया कि ... वे भी इसी गली व्यवस्था की उपज हैं...कहा जाता था कि जैसा समाज होता है..वैसी ही पुलिस और वैसे ही लीडर मिलते हैं..लेकिन अब ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि मीडियाकर्मी भी वैसे ही मिले...कम से कम इतनी फजीहत के बाद सत्ता के हाथों बिक चुके मीडिया हाऊस को कुछ नहीं कहना चाहिए ... क्योंकि चोरी के बाद सीनाजोरी अच्छी नहीं लगती .. लेकिन इसमें एक बात है जो हमारे जैसों का हौसला डिगाती है..और वो ये है कि जिन्हें देखके चलने का हुनर सीखा वहीं दाएं बाएं होने लगे....

Ashish ने कहा…

महाराष्ट्र माझा नामक एक वेबसाईट पे Most Corrupt Indian -२०१० के लिए मतदान चल रहा है, उसमे शरद पवार साहब को सब से ज्यादा वोट्स मिल रहे है, देखते है अखिर मैं कोन जितता है, भ्रष्टाचारी तो सब है लेकिन उन सबके बाप का खिताब जनता किसे देती है येह देखना रोमांचकारी होगा.