बुधवार, दिसंबर 29, 2010

नव उदारवादी अर्थनीति के रतौंध और निकट दृष्टि दोष से ग्रस्त है कांग्रेस

कांग्रेसी राजनीति के अंतर्विरोध  



कांग्रेस पार्टी के लिए उसकी स्थापना का १२५ वां वर्ष इससे बुरे समय में नहीं आ सकता था. पार्टी की नेतृत्व वाली केन्द्र और राज्य सरकारें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरी हुई हैं. खुद पार्टी कारपोरेट युद्ध में पार्टी बन गई है. पार्टी और सरकार के अंदर कारपोरेट समूहों से लेकर आलाकमान खासकर अगली पीढ़ी से नजदीकी साबित करने के लिए गुटबाजी, खींचतान और भितरघात से जबरदस्त उथल-पुथल का माहौल है. इस कारण मनमोहन सिंह सरकार दिशाहीन, उद्देश्यहीन और राजनीतिक रूप से लकवाग्रस्त सी हो गई है. हालत यह हो गई कि २००९ के आम चुनावों में जीत के डेढ़ साल के अंदर ही यू.पी.ए सरकार की चमक फीकी पड़ने लगी है.

खुद कांग्रेस पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है. बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी के लगभग सम्पूर्ण सफाए से साफ हो गया है कि एक अखिल भारतीय पार्टी के बतौर कांग्रेस के पुनर्जीवन का रास्ता इतना आसान नहीं है. दूसरी ओर, पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ आंध्र प्रदेश में दिवंगत मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी की खुली बगावत और राजनीतिक रूप से अत्यंत ज्वलनशील तेलंगाना के फिर से भड़कने की आशंकाओं के बीच पार्टी की हालत बहुत पतली है. इसी तरह, अपने दूसरे मजबूत गढ़ महाराष्ट्र में पार्टी इतने अधिक गुटों में बंटी है और सभी एक-दूसरे के खिलाफ ऐसे घात-प्रतिघात के खेल में लगे हैं कि वहां पार्टी का खेल खत्म करने के लिए विरोधियों की जरूरत नहीं है.

हालांकि कांग्रेस के लिए ऐसी गुटबाजी और उठा-पटक कोई नई बात नहीं है. यह कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति की खास पहचान बन चुकी है. लेकिन नई बात यह है कि अपने १२५ वें साल में कांग्रेस कुछ नए, कुछ पुराने राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक और वैचारिक अंतर्विरोधों में ऐसी फंस गई है जिससे उसकी राजनीतिक अग्रगति ठहरती सी दिखाई दे रही है.

असल में, कांग्रेस तय नहीं कर पा रही है कि वह एक मध्य-वाम झुकाव वाली सामाजिक जनवादी पार्टी के बतौर आगे बढ़े या पूरी तरह से नव उदारवादी सैद्धांतिकी को जोरशोर से आगे बढ़ानेवाली मध्य-दक्षिण लिबरल पार्टी का चोला धारण कर ले या फिर दोनों के बीच संतुलन बनाकर चले?

अभी तक कांग्रेस बड़ी चतुराई के साथ दोनों खेमों को साध कर चल रही थी. मौके और मुद्दे के मुताबिक वह कभी मध्य वाम और कभी मध्य दक्षिण रूख के साथ संतुलन बनाने में कामयाब दिख रही थी. जैसे आर्थिक नीतियों के मामले में पार्टी पूरी तरह से नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के साथ खड़ी रही है लेकिन २००४ के आम चुनावों के बाद उसने सामाजिक-राजनीतिक तौर पर आर्थिक सुधारों को सहनीय बनाने के लिए आम आदमी को भी कुछ राहत देनेवाले फैसले किए हैं.

एक तरह से कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली यू.पी.ए सरकार अपने पहले कार्यकाल में अपनी राजनीतिक-आर्थिक नीतियों में अन्तर्निहित अंतर्विरोधों को सफलता के साथ साधने में कामयाब रही. निश्चय ही, गठबंधन में वाम पार्टियों की मौजूदगी से भी उसे मदद मिली.

लेकिन २००९ के चुनावों में जीत और वामपंथी पार्टियों पर निर्भरता खत्म होते ही कांग्रेस के अंदर और बाहर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने और कई रुके हुए नीतिगत फैसलों जैसे खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने, श्रम कानूनों में ढील से लेकर बैंकिंग-बीमा समेत पूरे वित्तीय क्षेत्र को और खोलने की मांग जोर पकड़ने लगी.

यह भी कि विनिवेश की प्रक्रिया तेज की जाए, सेज योजनाओं का रास्ता साफ किया जाए और स्थानीय समुदायों खासकर आदिवासी समुदाय के विरोध के कारण रुकी पास्को और वेदांता जैसी दर्जनों बड़ी योजनाओं को हरी झंडी दी जाए. यही नहीं, वित्तीय कठमुल्लावादी भी राजकोषीय घाटे पर काबू करने की मांग के साथ सक्रिय हो गए जिसका अर्थ यह था कि कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की जाए और खाद से लेकर खाद्य सब्सिडी पर अंकुश लगाया जाए.

दूसरे, २००९ की जीत को एक अखिल भारतीय पार्टी के रूप में अपनी पुनर्वापसी का सबूत मानते हुए कांग्रेस ९० के दशक के पहले की सर्वोच्चता के सपने देखने लगी. उसे यह भ्रम हो गया कि बिखरी और पस्त भाजपा के विपक्ष में रहते उसका अब कोई विकल्प नहीं है. इसे पार्टी नेताओं ने मनमानी और सत्ता की मलाई का खुलकर मजा लूटने का लाइसेंस मान लिया.

नतीजा यह हुआ कि नई यू.पी.ए सरकार ने न सिर्फ २००९ के जनादेश के उलट नव उदारवादी एजेंडे पर जोरशोर से अमल शुरू कर दिया बल्कि सत्ता की मलाई में हिस्से के लिए आपसी संघर्ष को भी तेज कर दिया. निश्चय ही, इस एजेंडे को कांग्रेस नेतृत्व की मौन सहमति भी थी. आश्चर्य नहीं कि नई सरकार के पहले दो बजटों में खाद और खाद्य सब्सिडी में कटौती और विनिवेश को तेज करने जैसे फैसलों से लेकर नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने के साफ संकेत देखे जा सकते हैं.

दूसरी ओर, प्रधान मंत्री के आशीर्वाद के साथ गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने ‘विकास की राह’ में रोड़ा बन रहे माओवादियों के सफाए के लिए आदिवासी इलाकों में ग्रीन हंट के रूप में खुला युद्ध शुरू कर दिया. ऐसा लगा कि यू.पी.ए सरकार काफी हड़बड़ी में है और वह जल्दी से पिछले पांच साल की भरपाई भी कर लेना चाहती है. लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी और तेज गति ने पार्टी और सरकार में कांग्रेस नेताओं के एक हिस्से को बेचैन कर दिया.

इस बेचैनी की एक वजह यह भी थी कि सत्ता की मलाई में इन्हें हिस्सा नहीं मिला था या इनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिला था. इसके अलावा कुछ बड़े कारपोरेट समूहों को भी शिकायत थी कि उनके हितों की कीमत पर दूसरे समूहों को बढ़ावा दिया जा रहा है.

नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के एक हिस्से ने न सिर्फ यू.पी.ए सरकार के मंत्रियों बल्कि सरकार की नव उदारवादी नीतियों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया. इस प्रवृत्ति को कांग्रेस के उस अंदरूनी सत्ता संघर्ष से और बल मिला जिसका सम्बन्ध भविष्य में पार्टी नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन से है. ध्यान रहे कि कांग्रेस नेताओं में अगले कुछ सालों में राहुल गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस में अपनी जगह पक्की करने की होड़ सी मची है.

इस पूरी प्रक्रिया को जमीनी जनसंघर्षों ने एक नया आयाम दे दिया. असल में, कांग्रेस नेतृत्व की उम्मीद के विपरीत नव उदारवादी नीतियों की आम लोगों में तीखी प्रतिक्रिया हुई और दूसरी ओर, ग्रीन हंट से लेकर बेलगाम माइनिंग और औद्योगिकीकरण के नाम पर जमीन की लूट के खिलाफ गरीबों, किसानों और आदिवासियों ने घुटने टेकने के बजाय संघर्ष तेज कर दिया.

इधर मध्यवर्ग में भी दो कारणों से सरकार और कांग्रेस को लेकर नाराजगी और बेचैनी बढ़ रही है. पहला, महंगाई बेलगाम हो गई है और सरकार ने एक तरह से उसके आगे घुटने टेक दिए हैं. लगातार तेईस महीनों से भी ज्यादा समय से महंगाई खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर दोहरे अंकों में चल रही है.

यही नहीं, बेरोजगारी भी नया रिकार्ड बना रही है. अर्थव्यवस्था की तीव्र वृद्धि दर के बावजूद रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं हो रही है. खुद सरकार के श्रम ब्यूरो के मुताबिक, २००९-१० में बेरोजगारी की दर ९.४ प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. दूसरे, पिछले कुछ महीनों में भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में सरकार के साथ-साथ सुरेश कलमाड़ी जैसे नेताओं और अशोक चव्हाण जैसे मुख्यमंत्रियों के नाम सामने आने के बाद पार्टी की साख बुरी तरह से गिरी है.

हालांकि कांग्रेस ने २ जी घोटाले के सामने आने के बाद उसे यू.पी.ए के कुछ घटक दलों तक सीमित समस्या और गठबंधन राजनीति की मजबूरी के रूप में पेश करने की कोशिश की लेकिन नीरा राडिया टेप्स से साफ है कि भ्रष्टाचार में सिर्फ घटक दलों के ही नहीं, कांग्रेस के मंत्री भी किसी से पीछे नहीं हैं. यही नहीं, २ जी घोटाले की जे.पी.सी से जांच न करवाने के मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व जिस तरह से अड गया है, उससे भी लोगों में यह सन्देश गया है कि सरकार और कांग्रेस कुछ छुपाने की कोशिश कर रही है. इस सबके बाद कांग्रेस नेतृत्व के लिए नैतिक रूप से खुद को सबसे ऊपर दिखाने की रणनीति की धार कमजोर पड़ी है.

सच तो यह है कि कांग्रेस नेतृत्व ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लीपापोती का और अड़ियल रवैया अपनाकर भाजपा को भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई का चैम्पियन बनने का मौका दे दिया है. एक तरह से कांग्रेस की गलतियों से भाजपा को राजनीतिक संजीवनी सी मिल गई है. ऐसे में, कांग्रेस चाहे भगवा सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ चाहे जितना आग उगले लेकिन सच्चाई यह है कि उसकी अपनी राजनीति के कारण भाजपा को पुनर्जीवन मिल रहा है.

हालांकि तथ्य यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा का रिकार्ड कांग्रेस से अच्छा नहीं है और उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई नैतिक हक नहीं है लेकिन विडम्बना देखिये कि यही भाजपा आज कांग्रेस की कृपा से भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई की चैम्पियन बनती दिख रही है.

यह कांग्रेस की साम्प्रदायिकता विरोधी रणनीति के दिवालिएपन का प्रतीक है. अगर कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ हल्ला बोलकर वह उन्हें रोक लेगा तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है. साम्प्रदायिकता विरोधी लड़ाई राजनीतिक रूप से कभी भी एकांगी नहीं हो सकती है. उसे राजनीति में भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे के साथ-साथ रोजगार और महंगाई से लेकर गरीबों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के हक-हुकूक के मुद्दों को जोड़ना पड़ेगा.

लेकिन हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस की साम्प्रदायिकता विरोधी मुहिम में ये सवाल कहीं नहीं हैं. यही नहीं, साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर वह नरम हिंदुत्व की लाइन को आगे बढ़ाते हुए भाजपा और संघ परिवार को निशाना बनाकर खुद को धर्मनिरपेक्षता की चैम्पियन साबित करने की कोशिश कर रही है जिसकी सीमाएं बहुत पहले ही सामने आ चुकी हैं.

आश्चर्य नहीं कि जब विकीलिक्स के खुलासे से यह ‘तथ्य’ सामने आया कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे मुस्लिम आतंकी संगठनों के जवाब में उभर रहे घरेलू हिंदू आतंकी संगठनों को बड़ा खतरा मानते हैं और भाजपा ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की, कांग्रेस ने युवराज के बयान पर लीपापोती करके तुरंत पीछा छुडाने की कोशिश की. इस मामले में कांग्रेस की घबराहट देखने लायक थी. असल में, कांग्रेस जिस नरम हिंदुत्व की राजनीति करती है, उसमें उग्र हिंदुत्व के खिलाफ खुलकर बोलने की गुंजाईश नहीं है.

यही कारण है कि वह भाजपा और संघ का डर दिखाकर और खुद को उनका सबसे बड़ा विरोधी बताकर मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने की राजनीति तो कर सकती है लेकिन उसमें राजनीतिक और वैचारिक रूप से उग्र हिंदुत्व का मुकाबला करने की हिम्मत नहीं है. अयोध्या विवाद पर कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया इसका एक और प्रमाण है.

दरअसल, यह कांग्रेस की साम्प्रदायिकता विरोधी राजनीति का ऐसा अंतर्विरोध है जिससे संघ और भाजपा को सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा हुआ है. उम्मीद थी कि कांग्रेस अपने ८३ वें महाधिवेशन में इन सभी मुद्दों और राजनीतिक अंतर्विरोधों पर अधिक स्पष्टता के साथ सामने आएगी. लेकिन महाधिवेशन के प्रस्तावों और प्रमुख नेताओं के भाषणों से साफ है कि अपने १२५ वें साल में कांग्रेस राजनीति और वैचारिक रूप से न सिर्फ निकट दृष्टि दोष का शिकार है बल्कि वह नव उदारवादी अर्थनीति के रतौंध से भी ग्रस्त है.

नतीजा यह कि कांग्रेसी राजनीति में धुंधलापन बढ़ता ही जा रहा है. इस राजनीतिक-वैचारिक धुंधलेपन में गुटबाजी, चापलूसी, भितरघात, सत्तालोलुपता और सत्ता की मलाई में हिस्से के लिए मारकाट नहीं मचेगी तो और क्या होगा? इसका राजनीतिक फायदा किसे हो रहा है, यह बताने की जरूरत नहीं है.

(दैनिक 'जनसत्ता' में २९ दिसंबर'१० को प्रकाशित)

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