रविवार, दिसंबर 19, 2010

बड़ी पूंजी को खुश करने में जुटे युवराज

राहुल गांधी की निर्विवाद छवि गढ़ने में जुटी है कांग्रेस

ग़ालिब का एक बहुत मशहूर शेर है:
“थी खबर गर्म कि उडेंगे ग़ालिब के पुर्जे,
देखने हम भी गए, पै तमाशा न हुआ.”

कांग्रेस महाधिवेशन में भगवा उग्रवाद तो दूर किसी के पुर्जे नहीं उड़े. अन्यथा राहुल गांधी के भाषण को लेकर मीडिया और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खासी उत्तेजना थी. खबरें थीं कि विकीलिक्स के खुलासे के सन्दर्भ में राहुल इस भाषण में संघ परिवार पर हमला बोलेंगे. यह कि भगवा उग्रवाद की ऐसी-तैसी कर देंगे. लेकिन जैसीकि मुझे उम्मीद थी, राहुल गांधी ने बिल्कुल जैसे दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, उस अंदाज़ में लिखित भाषण पढ़ते हुए भगवा उग्रवाद पर एक शब्द भी नहीं कहा.

ऐसा लगा कि राहुल गांधी खुद तो अखबार आदि नहीं ही पढ़ते हैं, वे यह भी मानकर चलते हैं कि उनके कार्यकर्ता और नेता आदि भी अखबार आदि नहीं पढ़ते, जहां भगवा उग्रवाद पर उनका कथित बयान सुर्ख़ियों में छाया हुआ है. लगता है कि वे अपनी ही बनाई और राजनीतिक रूप से एक बिल्कुल साफ-सुथरी (sanitized) दुनिया में रहते हैं, जहां विवादों और ऐसे मुद्दों की जगह नहीं है जिनपर साफ स्टैंड लेने पर कुछ गंवाने का खतरा हो. स्वाभाविक है कि राहुल गांधी ने विकीलिक्स खुलासों में अपने कथित बयान को लेकर पिछले तीन दिनों से जारी राजनीतिक विवाद पर एक शब्द नहीं बोला.

अलबत्ता, राहुल गांधी का भाषण काफी चतुराई के साथ ऐसे तैयार किया गया था कि उससे एक ऐसे संवेदनशील युवा नेता की छवि उभरे जो आम आदमी की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है. लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस भाषण के जरिये राहुल गांधी ने देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट क्षेत्र को उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के प्रति आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए यह सन्देश देने की कोशिश की कि सुधारों की गति तेज की जायेगी. तर्क औए दावे वही थे जो प्रधानमंत्री से लेकर हर छोटा-बड़ा मंत्री दोहराता रहता है कि सुधारों की गति तेज करने से ही वृद्धि दर बढ़ेगी और लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे. भाषण का यह हिस्सा उन्होंने अंग्रेजी में पढ़ा क्योंकि वह कार्यकर्ताओं के लिए नहीं था.

असल में, पिछले कुछ महीनों से देश में बड़ी पूंजी यानी कारपोरेट क्षेत्र आर्थिक सुधारों की धीमी पड़ती गति और कुछ मामलों में कथित तौर पर निवेश विरोधी फैसलों से चिंतित, नाराज और बेचैन सा दिख रहा है. यही नहीं, कारपोरेट हितों के टकराव में पूरी सरकार पंगु सी हो गई है. खुद राहुल गांधी ने जिस तरह से वेदांता के नियामगिरी प्रोजेक्ट के मामले में रूख लिया, उससे कारपोरेट क्षेत्र काफी बेचैन था. जाहिर है कि कारपोरेट क्षेत्र की नाराजगी और उपेक्षा युवराज के राजनीतिक भविष्य के लिए खतरा बन सकता था. इसलिए जल्दी से जल्दी स्पष्टीकरण जरूरी था. आज राहुल के भाषण में वह सफाई आ गई.

साफ है कि राहुल गांधी की प्राथमिकताएं क्या हैं? उन्हें भगवा उग्रवाद और संघ साम्प्रदायिकता पर अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने और अमेरिकी राजदूत को कही गई बात को दुहराने के जरिये देश के अल्पसंख्यक समुदाय को आश्वस्त करने का राजनीतिक साहस दिखाने के बजाय कारपोरेट क्षेत्र को आश्वस्त करना जरूरी लगा. कांग्रेस ने यह काम कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के हवाले कर दिया है जिनकी खुद की विश्वसनीयता का आलम यह है कि खुद पार्टी ही उनके बयानों से अपने को अलग करते देर नहीं लगाती है.

2 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

... sattaaseen party ko bhaashano se ubhar kar sakaaratmak kaaryon par dhyaan denaa chaahiye !!!

preeti pandey ने कहा…

sir namaskar,
sir aapki anumati milne par maine aapke blog se aapka ek lekh The Gaursons Times me prakashit kiya , main us patr ki ek prati aapko bhejna chahti hun , kripa mere email par apna address bhejne ki kripa karein, sir sach me aapka lekhan mughe bahut pasand hai, sir aapke lekh ne humare paper ki garima bada di hai, apni kripa drashti The Gaursons Times par banaay rakhe.