शुक्रवार, अक्तूबर 01, 2010

किसका मीडिया, कैसा मीडिया

पार्ट:चार

भारत में मीडिया की स्वतंत्रता के बहुत दावे किये जाते हैं। लेकिन यह स्वतंत्रता वास्तविक कम और आभासी अधिक है। सच यह है कि देश में मुख्यधारा का मीडिया भी उतना ही स्वतंत्र है, जितना मौजूदा व्यवस्था से जुडी अन्य संस्थाएं स्वतंत्र हैं। कहने कि जरुरत नहीं है कि इस स्वतंत्रता की स्पष्ट सीमायें हैं और उसी दायरे में रहकर अन्य संस्थाओं की तरह मीडिया भी काम करता है।

मीडिया की यह सीमाएं उस समय और खुलकर सामने आ जाती हैं, जब सीधे व्यवस्था के हितों पर चोट करनेवाला कोई मुद्दा सामने आ जाता है। उस समय न सिर्फ कॉरपोरेट मीडिया की सीमाएं खुलकर सामने आ जाती हैं बल्कि उसकी कथित निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और तथ्यपूर्णता की कलई भी उतर जाती है।


समाचारपत्रों और चैनलों में कारपोरेट भ्रष्टाचार और अपराधों से जुड़ी खबरों के लिए कोई जगह नहीं है। समाचारपत्रों के लिए कारपोरेट समूह ऐसी पवित्र गाय हैं जिनमें कोई गड़बड़ी या अनियमितता नहीं होती है।

हालांकि देश में बिजनेस अखबारों और चैनलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन इनमें कारपोरेट क्षेत्र की अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के बारे में खबरें न के बराबर होती हैं। इसका इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि सत्यम घोटाले के बारे में इन अखबारों या चैनलों को कोई खबर नहीं लगी या अगर लगी भी तो उसे छुपाकर रखा गया। इसके बजाय कि वे इस भ्रष्टाचार और गोरखधंधे का पर्दाफ़ाश करते एक बिजनेस चैनल ने तो रामलिंग राजू को कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए गोल्डेन पिकॉक पुरस्कार तक से नवाज़ा था।

समाचार मीडिया के कारपोरेटीकरण का एक और नतीजा यह हुआ है कि निवेशकों और खासकर विज्ञापनदाताओं के दबाव में अखबारों और चैनलों की अंतर्वस्तु में इस तरह से परिवर्तन किया गया है कि वह नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं की जरूरत को पूरा करें क्योंकि विज्ञापनदाता को उपभोक्ता चाहिए न कि नागरिक। उपभोक्ता की चिंताएं खुद तक सीमित और अधिक से अधिक उपभोग की ओर उन्मुख होती हैं जबकि नागरिक की चिंताएं खुद तक सीमित नहीं होती हैं और व्यापक दायरे तक फैली होती हैं। वह अपने उपभोग की सीमा जानता है। लेकिन व्यावसायिक रूप से सफल अखबारों और अन्य माध्यमों की अंतर्वस्तु नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। उनकी कोशिश नागरिकों को भी उपभोक्ता में बदलने की है।

ऐसा किए बिना विज्ञापनदाता का मकसद पूरा नहीं हो सकता है। जैसाकि जानेमाने मीडिया विश्लेषक बेन बैगडिकियन ने लिखा है कि, 'गंभीर कार्यक्रम (या आलेख/समाचार) दर्शकों को याद दिलाते हैं कि जटिल मानवीय समस्याएं किसी नए पाउडर या डिओडोरेंट के इस्तेमाल से नहीं सुलझती हैं।` इसलिए समाचारपत्रों और दूसरे माध्यमों में गंभीर/विश्लेषणात्मक आलेखों/टिप्पणियों/रिपोर्टों के बजाय तथाकथित 'मानवीय रूचि` के हल्के-फुल्के समाचारों/फीचरों/टिप्पणियों के प्रकाशन/प्रसारण पर जोर बढ़ता जा रहा है।

अगर बारीकी से समाचार चैनलों की अंतर्वस्तु का अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि समाचार चैनलों के एजेंडे पर मनोरंजन, अपराध, सेलिब्रिटी, व्यक्तिगत अफेयर्स, फैशन, खेल और लाइफ स्टाइल से जुड़ी खबरों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। जानेमाने मीडिया शोध संस्थान सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक समाचार चैनलों पर अपराध, मनोरंजन,खेल और मानवीय रुचि के समाचारों को सबसे अधिक प्राथमिकता मिलती है।

इस सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2005 से 2008 के बीच देश के 6 प्रमुख राष्ट्रीय समाचार चैनलों (एनडीटीवी 24x7, सीएनएन आईबीएन, आज तक, डीडी न्यूज़, स्टार न्यूज, ज़ी न्यूज़) पर सबसे अधिक लगभग 20 फीसदी स्थान खेल की खबरों को दिया गया। इसी तरह मनोरंजन जगत से जुड़ी खबरों को लगभग 15 प्रतिशत और अपराध से जुड़ी खबरों को करीब 10 प्रतिशत कवरेज दिया गया।

यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया में धीरे-धीरे अधिकांश चैनल और अखबार बड़े मनोरंजन उद्योग का हिस्सा बनाते जा रहे हैं. अब समाचार मीडिया के अधिकांश बड़े समूह या तो किसी न किसी बड़ी मनोरंजन मीडिया कम्पनी के स्वामित्व में हैं या उनका उनके साथ गंठजोड़ है या फिर एक-दूसरे में क्रास मीडिया इक्विटी है. उदाहरण के लिए आज शेयर बाज़ार में लिस्टेड हर मीडिया कंपनी खासकर समाचार मीडिया कंपनियों में अनिल अम्बानी की कंपनियों के 5 से लेकर 15 प्रतिशत तक शेयर हैं.

खुद अनिल अम्बानी आज मनोरंजन उद्योग में सबसे बड़े खिलाडी बनाने की ओर बढ़ रहे हैं. मनोरंजन उद्योग का हिस्सा बनाने के बाद समाचार माध्यमों का इस्तेमाल न सिर्फ फिल्मों के प्रोमोशन और प्रचार में किया जा रहा है बल्कि सस्ते फ़िल्मी मनोरंजन से चैनलों और अखबारों को भी भर दिया गया है. निश्चय ही इसका असर उनके कंटेंट और कवरेज पर साफ तौर पर देखा जा सकता है.

समाचारपत्रों के कारपोरेटीकरण और प्रोफेशनल प्रबंधन की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद भाषाई समाचारपत्र समूहों में पत्रकारों के वेतन और सेवा शर्तों में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। यहां तक कि व्यवसायिक रूप से हिंदी के सर्वाधिक सफल दो समाचारपत्र समूहों में भी स्थिति बहुत नहीं बदली है। आर्थिक उदारीकरण के शोर में स्थायी नियुक्ति और वेतनमान आदि की तो अब कहीं बात भी नहीं होती।

कांट्रैक्ट व्यवस्था के तहत पत्रकारों की नियुक्ति होती है, वेतनमान के बजाय मनमाने और मोलतोल के आधार तनख्वाह तय होती है और सेवा शर्तों की हालत दिन-पर-दिन बदतर होती जा रही है। अस्थायी नौकरी का तनाव और दबाव उन्हें प्रबंधन के आगे झुकने के लिए बाध्य कर देता है। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश अखबारों में पत्रकारों की यूनियन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है।

जिला स्तर और तहसील स्तर के संवाददाताओं/स्ट्रिगर्स को न तो नियुक्ति पत्र मिलता है और न ही अपेक्षित वेतन। चूंकि जिला और मंडल स्तर पर अखबार तीन से पांच स्थानीय पृष्ठ देने लगे हैं, पत्रकारों पर काम का बोझ बहुत होता है। लेकिन उन्हें उचित वेतन नहीं मिलता है। वेतन की भरपाई के लिए उन्हें विज्ञापन जुटाना पड़ता है जिसका कमीशन मिलता है। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें प्रभावशाली नेताओं, अफसरों, व्यापारियों और ठेकेदारों के हितों का ध्यान रखना पड़ता है।

सबसे हैरत की बात यह है कि जिला और मंडल स्तर पर पहुंचकर 'हिंदुस्तान`, 'जागरण`, 'भास्कर`, 'अमर उजाला`, जैसे बड़े अखबारों और छोटे-मंझोले अखबारों के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता है।

इसी से जुड़ा मीडिया के कारपोरेटीकरण और गरीबों के सवालों को मुख्यधारा से बाहर करने की इस प्रक्रिया का एक और थोडा अनदेखा लेकिन गंभीर पहलू यह है कि 90 के दशक में अखबारों से एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन सभी पत्रकारों को बाहर किया गया जो वामपंथी रूझान के थे या गरीबों के सवालों पर मुखर और नई आर्थिक नीतियों के कटु आलोचक थे या वामपंथी-जनवादी आंदोलनों से पत्रकारिता में आये थे। टाइम्स समूह ने इस "मीडिया मैकार्थीवाद" की भी अगुवाई की।

इस दौर में कई जाने-माने पत्रकार मीडिया संस्थानों से बाहर किये गए जिसका गरीबों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले बाकी पत्रकारों पर यह असर पड़ा कि वे खामोश हो गए। यही नहीं, जनान्दोलनों से किसी तरह का सम्बन्ध रखनेवाले पत्रकारों के लिए कार्पोरेट मीडिया के दरवाजे बंद होने लगे। जिनको निकला नहीं गया, उन्हें किनारे कर दिया गया या फिर बहुत ही महत्वहीन जगहों पर भेज दिया गया जहां से वे अखबार या चैनलों की नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रह गए।

दूसरी ओर, पत्रकारों में नव उदारवादी नीतियों के प्रति समर्थकों की फौज तैयार करने के लिए पत्रकारों की भर्ती में भी अनुबंध और संविदा पर नियुक्तियों का सहारा लिया गया। यहां भी एक सोची-समझी रणनीति अपने गई। ऊपर के पदों यानि संपादकों आदि के स्तर पर खूब मोटी तनख्वाहें दी गईं, इतनी की पत्रकारों ने कभी सोची भी नहीं होंगी। चैनलों और अखबारों में मुट्ठी भर संपादकों को मैनेजरों के बराबर वेतन दिए गए।

इसका असर यह हुआ कि चैनलों और अखबारों में पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ जिसे नव उदारवादी नीतियों का खूब फायदा मिला और वह उन नीतियों के मुखर समर्थक के रूप में सामने आया। कहते हैं कि जो काम एक ज़माने में इमरजेंसी नहीं कर पाई, वह काम मीडिया में पत्रकारों को ऊँची तनख्वाहों के जरिये कार्पोरेट नियंत्रण में लेकर बहुत ख़ामोशी से कर दिया गया।

इसके बाद अखबारों और चैनलों के मालिकों को कुछ नहीं करना पड़ा और नव उदारवादी नीतियों के समर्थक "नए पत्रकार मुल्लाओं" ने अखबारों और चैनलों को इन नीतियों के खुले प्रवक्ताओं में बदल दिया। जाने माने अमेरिकी मीडिया विशेषज्ञ राबर्ट मैक्चेस्नी ने अमेरिकी मीडिया में 80 के दशक में चली इस प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए लिखा है कि इसके कारण समाचार मीडिया में नव उदारवादी नीतियों के समर्थकों की ऐसी बाढ़ आई कि बिना किसी घोषित सेंसर या रोक के खुद ब खुद इन नीतियों के खिलाफ एक छलनी काम करने लगी और सत्ता और कार्पोरेट के खिलाफ खबरें छपनी कठिन होती चली गईं।

भारतीय मीडिया उद्योग में भी इस प्रक्रिया को काम करते हुए साफ तौर पर देखा जा सकता है। आश्चर्य नहीं कि आज मुख्यधारा के समाचार मीडिया में गरीबों के सवाल और मुद्दों के साथ-साथ उनके संघर्षों की खबरें गायब होती जा रही हैं।




समाप्त
[इसके साथ ही, यह श्रृंखला यहीं समाप्त होती है...मुझे आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा.] 

2 टिप्‍पणियां:

ajit gupta ने कहा…

बहुत अच्‍छा आलेख। सारे ही दृष्टिकोणों को इंगित करता हुआ।

Prabhash Dutta ने कहा…

मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। लेकिन मुझे इसमें कुछ और जोड़ना है, जो शायद आप भूल गये। मीडिया उतनी स्वतंत्र नहीं है, जितनी इसे होना चाहिए, ये सच है। लेकिन, क्या हम आज उतने अच्छे पत्रकार हैं, जिसकी हमें दरक़ार है। हमारे प्रेस की स्वतंत्रता उसी क्षमता से निकल कर आएगी। क्षमता तो कॉरपोरेट वर्ल्ड तय नहीं कर रहा है। इस पक्ष पर भी हमारा ध्यान होना चाहिए। काबिलियत के बग़ैर स्वतंत्रता नहीं मिल सकती है।