गुरुवार, मार्च 07, 2013

प्राइम टाइम पर बढ़ती बहसों का सिकुड़ता दायरा

चर्चाओं में शोर-शराबा और सनसनी ज्यादा है और संवाद और गहराई कम 
 
पहली क़िस्त   
 
न्यूज चैनलों पर प्राइम टाइम में बहसों और चर्चाओं की संख्या और मात्रा लगातार बढ़ती ही जा रही है. इसके कारण यह बहुत संभव है कि देर शाम अगर आप समाचार बुलेटिन देखने के लिए कोई न्यूज चैनल आन करें तो वहाँ समाचारों के बजाय किसी ताजा मुद्दे पर गर्मागर्म चर्चा या बहस चल रही हो.

असल में, कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश न्यूज चैनलों पर प्राइम टाइम में एक घंटे से लेकर आधा घंटे लंबी चर्चाओं/बहसों के दैनिक कार्यक्रमों की संख्या हाल के दो-ढाई वर्षों में अच्छी-खासी बढ़ी है. इससे पहले चर्चा/बहस के ऐसे कार्यक्रम न सिर्फ कम थे बल्कि आमतौर पर सप्ताहांत कार्यक्रमों के हिस्सा थे.

लेकिन हाल के दो-ढाई वर्षों में खासकर अन्ना हजारे के नेतृत्ववाले भ्रष्टाचार विरोधी जन-लोकपाल आंदोलन के दौरान शुरू हुई तीखी बहसों और प्राइम टाइम में ‘टाइम्स नाउ’ पर अर्नब गोस्वामी के दैनिक चर्चा/बहस के कार्यक्रम ‘न्यूज-आवर’ की बढ़ती ‘लोकप्रियता’ ने अधिकांश न्यूज चैनलों को प्राइम टाइम पर समाचारों के बजाय चर्चाओं/बहसों के कार्यक्रम शुरू करने को प्रेरित किया.
इसके बाद देखते-देखते अधिकांश चैनलों पर समाचार चर्चा/बहस के कार्यक्रम प्राइम टाइम के स्थाई और अभिन्न हिस्से हो गए हैं. हालत यह हो गई है कि शाम छह बजे से ही अधिकांश हिंदी न्यूज चैनलों पर बहस/चर्चा के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं और अलग-अलग समयों पर रात के ११ बजे तक चलते रहते हैं.
ऐसा नहीं है कि प्राइम टाइम पर समाचार बुलेटिन नहीं दिखाए जाते हैं. बेशक दिखाए जाते हैं लेकिन हाल के वर्षों में न सिर्फ उनकी संख्या घटी और चर्चा और बहसों के कार्यक्रमों की संख्या और उनकी अवधि बढ़ी है बल्कि समाचारों के कवरेज का दायरा घटा है और उनकी प्रस्तुति कमजोर हुई है. इसके कारण प्राइम टाइम पर समाचार बुलेटिनों की उपेक्षा साफ़ देखी जा सकती है.

नतीजा यह हुआ है कि अगर आप समाचारों के लिए न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम समाचार बुलेटिनों पर निर्भर हैं तो खतरा यह है कि आप देश-दुनिया में होनेवाली अनेकों महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी से वंचित रह जाएंगे.
इसके बावजूद न्यूज चैनलों पर इन प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों के बढ़ते महत्व का अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि पिछले कई संसद सत्रों के दौरान जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और हंगामे के कारण कई-कई दिनों और सप्ताहों तक संसद ठप्प रही, उस दौरान न्यूज चैनलों के स्टूडियो ने संसद की चर्चाओं/बहसों की जगह ले ली.
यही नहीं, जब संसद सत्र नहीं चल रहा होता है तो उस दौरान प्राइम टाइम चर्चाएं आभासी संसद बन जाती हैं जहाँ प्रमुख संसदीय दलों के वरिष्ठ नेताओं/प्रवक्ताओं से लेकर मंत्री तक बहस/चर्चा में शामिल होते हैं. यहाँ तक कि इन चर्चाओं ने राष्ट्रीय राजनीति और सम-सामयिक मुद्दों पर बहसों/चर्चाओं के एजेंडे को भी प्रभावित करना और एजेंडा बनाना शुरू कर दिया है.        
लेकिन सवाल यह है कि क्या न्यूज चैनलों पर होनेवाली दैनिक प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों से सम-सामयिक घटनाओं/मुद्दों के बारे में दर्शकों की समझदारी बढ़ रही है? क्या उन्हें इन प्राइम टाइम चर्चाओं में उठाये गए विषयों/घटनाओं/मुद्दों के सभी पहलुओं/पक्षों की राय जानने, उसकी बारीकियों को समझने और उसकी गहराई में उतरने का मौका मिल पाता है?

क्या ये प्राइम टाइम चर्चाएं भारतीय समाज में मौजूद वैचारिक विविधता और बहुलता को शामिल कर पाती हैं? क्या इन चर्चाओं से दर्शक राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक, सामाजिक तौर पर ज्यादा सक्रिय और सांस्कृतिक रूप से ज्यादा समृद्ध नागरिक बन पा रहे हैं? क्या इन चर्चाओं से व्यापक समाज और राजनीति में लोकतांत्रिक वाद-संवाद बढ़ा है?

यह भी कि क्या इन चर्चाओं से भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक-वैचारिक रूप ज्यादा समृद्ध, सहिष्णु, उदार और गतिशील हुआ है? ये और ऐसे ही कई सवाल इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं कि न्यूज चैनलों की प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों ने राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे को निर्धारित करने से लेकर उसकी दिशा तय करने तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू कर दिया है.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कई अतिरेकों, समस्याओं, विसंगतियों और विरोधाभासों के बावजूद इन प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों ने लोकतांत्रिक संसदीय राजनीति को एक हद तक जवाबदेह बनाया है. उसने अपनी अन्तर्निहित सीमाओं और संकीर्णताओं के बावजूद लोकतांत्रिक बहसों और चर्चाओं को आमलोगों के लिए खोला है. इन चर्चाओं/बहसों में आम दर्शकों की रूचि इसका प्रमाण है.
लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि न्यूज चैनलों ने प्राइम टाइम बहसों/चर्चाओं को अधिक से अधिक दर्शक बटोरने की कोशिश में सनसनीखेज और गर्मागर्म बनाने पर इतना जोर देना शुरू कर दिया है कि उनमें गंभीर और बारीक चर्चा की जगह अतिरेकपूर्ण सनसनी, शोर-शराबे और हंगामे ने ले ली है.

इस कारण कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश चर्चाएं और उनका वैचारिक स्तर बहुत छिछला, हल्का और उथला दिखता है जिसे बेवजह के शोर-शराबे और गर्मागर्मी से भरने और छिपाने की कोशिश की जाती है.

नतीजा यह कि इन चर्चाओं/बहसों में संवाद की जगह विवाद, बहस की जगह आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे, चर्चा की जगह बातों को घुमाने-फिराने की कला यानी स्पिन और वैचारिक खुलेपन की जगह पूर्वाग्रह, दंभ और संकीर्णता ने ले ली है.

इस कारण न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम पर ऐसी चर्चाओं/बहसों की संख्या और अवधि बढ़ने के बावजूद उनकी गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है. कहना मुश्किल है कि इन चर्चाओं/बहसों से आम दर्शकों की समझ कितनी बढ़ रही है?
अलबत्ता, इन चर्चाओं में हमेशा सनसनी और विवादों की खोज और उनकी आधी वास्तविक-आधी गढ़ी हुई गर्मागर्मी, शोर-शराबे और आरोप-प्रत्यारोपों ने उसे दैनिक मनोरंजक तमाशे में जरूर बदल दिया है जिसमें दर्शक की भूमिका बहस के अखाड़े में काटा-काटी करते एंकर और उसके चर्चाकारों की भिडंत में परपीडक सुख उठाने तक सीमित हो जाती है.
उदाहरण के लिए जानेमाने समाजशास्त्री आशीष नंदी और अभिनेता शाहरुख खान के हालिया भाषण और लेख पर शुरू हुए विवाद को ही लीजिए. इसमें टी.वी न्यूज चैनलों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे बात का बतंगड बनाते हैं और गैर-जरूरी विवाद पैदा करते हैं?

यह भी कि क्या चैनल जानबूझकर अधिक से अधिक पाठक या दर्शक आकर्षित करने के लिए ये विवाद पैदा करते हैं? क्या इसके लिए वह घटनाओं, बयानों, मुद्दों और प्रसंगों को उनके व्यापक सन्दर्भों, परिप्रेक्ष्यों, पृष्ठभूमि और अन्तर्निहित प्रक्रियाओं से काटकर पेश करता है? क्या न्यूज चैनलों का सनसनीखेज चरित्र उसकी स्वभावगत विशेषता बन गया है?

ये और ऐसे ही अनेकों सवाल एक बार फिर से चर्चाओं में हैं. ताजा प्रसंग में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी के गंभीर खतरों को लेकर बहस शुरू हो गई है.
खासकर इस साल के शुरू में जिस तरह से न्यूज चैनलों के एक बड़े हिस्से ने एल.ओ.सी पर भारत-पाकिस्तान की सेनाओं के बीच हुई सीमित सैन्य झड़पों को जिस युद्धोन्मादी अंदाज़ और तेवर में पेश किया, उससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और स्थिति हाथ से निकलते-निकलते बची.
इसके बाद समाजशास्त्री आशीष नंदी के बयान और अभिनेता शाहरुख खान के लेख को जिस तरह से सन्दर्भों और परिप्रेक्ष्य से काटकर पेश किया गया, उससे चैनलों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.  
हालाँकि मीडिया खासकर टी.वी न्यूज को लेकर उठनेवाले ये सवाल नए नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि बी.बी.सी के महानिदेशक रहे जान बर्ट ने ७० के दशक के मध्य में टेलीविजन न्यूज के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि इसमें समझदारी के विरुद्ध एक पूर्वाग्रह है.

उनके कहने का तात्पर्य यह था कि टी.वी न्यूज में दृश्यों पर अत्यधिक जोर के कारण उसमें उनके विश्लेषण और अर्थ को स्पष्ट करने की क्षमता सीमित होती है. यही कारण है कि टी.वी न्यूज किसी घटना के लिए जिम्मेदार प्रक्रियाओं, उसकी पृष्ठभूमि, सन्दर्भ और बारीकियों के भीतर गहराई से जाने के बजाय उसे बहुत ही सतही स्तर पर पकड़ता और पेश करता है.  

जारी ....

('कथादेश' के मार्च अंक में प्रकाशित स्तम्भ की पहली क़िस्त)

2 टिप्‍पणियां:

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

सुंदर लेखन

Indra ने कहा…

बेहतरीन साइड मारी है सर आपने, हक्का-बक्का वाली..।