रविवार, अक्तूबर 21, 2012

लोकतंत्र में सवालों से ऊपर कोई नहीं है, केजरीवाल भी नहीं

इन २७ सवालों में केजरीवाल के पास छुपाने के लिए क्या है? जवाब दीजिए और आगे बढिए    

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को नजरंदाज़ करना मुश्किल है. उन्हें हँस कर या चिढकर टालना और मुश्किल है. राजनीति में उतर चुके अरविंद केजरीवाल यह बात जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा है.
इसकी वजह यह है कि दिग्विजय सिंह न सिर्फ गले तक सत्ता की राजनीति में डूबे चतुर और घाघ राजनेता हैं बल्कि उन्होंने एक साथ सत्ता की राजनीति से लेकर सिविल सोसायटी की राजनीति के बीच अपनी एक कट्टर आर.एस.एस विरोधी और धर्मनिरपेक्ष, दलित और आदिवासी समर्थक नेता की छवि बनाई है जो कई मुद्दों पर यू.पी.ए सरकार और दूसरे कांग्रेसी नेताओं से विरोधी राय भी रखता है. जाहिर है कि सिविल सोसायटी में भी उनके कई प्रशंसक मिल जाएंगे.
यह और बात है कि दिग्विजय सिंह अपनी राय और विचारों को उनके तार्किक परिणति तक ले जाने का जोखिम कभी नहीं लेते. चाहे बाटला हॉउस एनकाउंटर हो या आजमगढ़ में निर्दोष मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियां, चाहे छत्तीसगढ़ में माओवादियों के बहाने आम आदिवासियों के खिलाफ जारी ग्रीन हंट हो या सांप्रदायिक हिंसा निरोधक कानून का मामला- वे सिर्फ बयान देकर चुप्पी साधने की कला के माहिर हैं.

यही नहीं, अपने बयानों के ‘साहस’ को वे बड़ी चतुराई से गाँधी परिवार के नेतृत्व के प्रति अगाध श्रद्धा और आर.एस.एस विरोध से संतुलित करने की कला भी जानते हैं. कांग्रेसी राजनीति की चाटुकारिता संस्कृति में भी उनकी प्रवीणता का कोई जवाब नहीं है. अपने राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह की तरह उनके भी रसूख की सबसे बड़ी वजह गाँधी परिवार के प्रति उनकी अगाध निष्ठा और स्वामीभक्ति है. उनका वश चलता तो राहुल गाँधी अब तक प्रधानमंत्री बन चुके होते.

लेकिन इन सबके बावजूद दिग्विजय सिंह और खासकर उनके सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. वजह यह कि उनके सवालों में दम होता है. दिग्विजय सिंह को तो इक पल के लिए खारिज भी किया जा सकता है लेकिन उनके सवालों से बचना मुश्किल है.    

इसका अंदाज़ा दिग्विजय सिंह के अरविंद केजरीवाल से पूछे २७ सवालों से लगाया जा सकता है. वैसे इन सवालों में नया कुछ नहीं है. इनमें से अधिकांश सवाल पहले भी उठते रहे हैं. लेकिन अरविंद केजरीवाल ने इन सवालों का जवाब देने के बजाय दिग्विजय सिंह पर असली मुद्दों और कांग्रेसी नेताओं के भ्रष्टाचार और घोटालों से ध्यान बंटाने की चाल बताते हुए जवाब देने से इनकार कर कर दिया है.
हालाँकि उसके एक दिन बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने पहले के रूख में थोड़ा बदलाव करते हुए यह कहा है कि पहले दिग्विजय सिंह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी को खुली बहस के लिए तैयार कर लें तो वे उनके हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं.
केजरीवाल ने पलटवार करते हुए कहा है कि पहले राबर्ट वाड्रा पर उठे सवालों का जवाब मिलना चाहिए. लेकिन यह कहते हुए वे दिग्विजय सिंह के बिछाए हुए जाल में फंस चुके हैं. असल में, दिग्विजय सिंह को इन सवालों के जवाब में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे तो केजरीवाल को फंसाना चाहते थे.

सवालों से कन्नी काटने और उन्हें मजाक में उड़ाने की कोशिश करके केजरीवाल खुद घिर गए हैं. ऐसे में यह सवाल जरूर उठेंगे और उठने चाहिए कि जब आप सभी पार्टियों और नेताओं को सवालों पूछने और उन्हें जवाबदेह बनाने की मांग कर रहे हैं तो खुद उससे कैसे बाहर हो सकते हैं?

निश्चय ही, लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन खासकर राजनीति में सक्रिय कोई भी नेता, कार्यकर्ता और पार्टी-संगठन सवालों से परे नहीं है. अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने इसी सिद्धांत को सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में स्थापित करने की कोशिश की है.
ऐसे में, वे खुद सवालों से बच नहीं सकते हैं. अगर वे इन २७ सवालों का सिलसिलेवार और तथ्यपूर्ण जवाब जल्दी नहीं देते हैं तो इससे न सिर्फ उनके आंदोलन की नैतिक आभा कम होगी बल्कि २७ सवालों के २७० सवाल होने में देर नहीं लगेगी. अच्छा होता कि वे दिग्विजय सिंह को हर सवाल का जवाब देते, अगर कोई कमियां-गलतियाँ हों तो उसे भी खुलकर स्वीकार करते, उसे सार्वजनिक करते और फिर दिग्विजय सिंह को चुनौती देते कि वे भ्रष्टाचार/घोटालों के मुद्दे पर जवाब दें.
कहने की जरूरत नहीं है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने राजनीति और सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की जो मुहिम शुरू की है, उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी नैतिक और पारदर्शी राजनीति और व्यवहार है. इसलिए उसपर सवाल उठे हैं, आगे भी उठेंगे और उठते रहने चाहिए और उनका जवाब देने से बचने की कोशिश नहीं होनी चाहिए क्योंकि जवाब न देने की कोई गुंजाइश इस वैकल्पिक राजनीति में नहीं है.

अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाये, उनकी राजनीति के लिए यह उतना ही अच्छा होगा. आखिर इन २७ सवालों में उनके पास छुपाने के लिए क्या है? जवाब दीजिए और आगे बढिए.              

2 टिप्‍पणियां:

कुमार संजय ने कहा…

eयहाँ तो सबकुछ उल्टा है सर. अरविन्द जी ये सोच रहे है की ये लोकतान्त्रिक देश सिर्फ उन्हें ही सवाल पूछने का हक दिया है, उनसे कोई सवाल नहीं पूछ सकता है और ऐसी मानसिकता तो नाज़ी और फाशिवादियो की रही है, क्या देश का यह आम आदमी उसी रास्ते की और निकल पड़ा है? मुझे नहीं लगता है की दिग्विजय सिंह के सवाल में कुछ गलत है, और अरविन्द अगर एक ही जगह २० साल नौकरी किये है जबकि नियम ये कहता है की तीन साल से ज्यादा एक आदमी नहीं रह सकता तो फिर कैसे ये उस पद पर २० साल तक बने रहे, क्या इस आम आदमी ने कुछ ख़ास किया था या कुछ ख़ास करने के लिए किसी को उपकृत किया था? आखिर कौन सी वजह है ये तो इस आम आदमी को बताना ही चाहिए? ऐसा मेरा मानना है. जब भी अरविन्द जी से कोई कुछ पूछता है तो वो कहते है वेबसाइट पर है देख लो, अरे भाई आप ही उस वेबसाइट को देख के क्यों नहीं बता देते? जहा तक मैंने उनकी जो वेबसाइट देखि है उसमे ऐसा कुछ मुझे नहीं दिखा जिस से अरविन्द जी पाक साफ़ दिखते है, क्या कबीर फाउंडेशन को फोर्ड फाउंडेशन से पैसा मिला है या नहीं मिला है ये बताने में क्यों नाराज़ हो रहे ये लोग.
जब आप किसी को कठघरे में खड़े कर सकते है तो आप को कोई क्यों नहीं कर सकता है, सच पूछना कोई गुनाह नहीं है तो फिर सच बताना क्यों गुनाह माना जा रहा है, अरुधंति रॉय ने भी ये बात कही थी की अरविन्द जी की संस्था को फोर्ड फाउंडेशन से कुछ मिला है, एक प्रेस कांफ्रेंस में अरविन्द कह रहे थे की नेशनल एडवाइजरी कौंसिल के पास कोई पॉवर नहीं है, क्या अरविन्द जी ये आन्दोलन इसी पॉवर के लिए कर रहे है, अगर पारदर्शिता इन्हें इतना ही पसंद है तो अपने ही टीम को एक व्यक्ति को बाहर क्यों कर दिया था? सिर्फ इसलिए की उसने मीटिंग की रिकॉर्डिंग कर ली थी. ऐसे में कोई कैसे यकीं कर ले की अरविन्द दूध के धुले हुए है बाके घुन में सने हुए है

अमित भारतीय ने कहा…

राष्ट्रगान के लिखने पर कुछ लोगोँ ने गुरुदेव पर जार्ज पंचम का स्तुतिगान करने का आरोप लगाया था। तब गुरुदेव ने बस इतना कहा था कि इस प्रकार के प्रश्नोँ का उत्तर देना वे उचित नहीँ समझते।
करगिल के युद्ध के समय को लेकर जब विरोधी सक्रीय हुये तो अटल जी ने कहा कि यहाँ तो उनकी राष्ट्रभक्ति पर संदेह किया जा रहा जिसका मेरे पास कोई जबाव नहीँ है और ऐसा अपराध तो उनसे कभी सपने मेँ भी नहीँ होगा।

निश्चित रुप से लोकतंत्र मेँ सवालोँ से ऊपर कोई नहीँ होता। दिग्विजय के सवालोँ का जवाव दिया जाये या नहीँ, उनकी संख्या तो 270 होना निश्चित है। कुछेक प्रश्नोँ को छोड़कर सभी वे-सिर-पैर के प्रश्न हैँ।

और अंत मेँ, मेरी आशा ये है कि कब मैँ, डा. योगेन्द्र यादव और डा. आनंद कुमार के साथ आपको अरविँद केजरीवाल के साथ मंच पर देखूँ।