बुधवार, दिसंबर 02, 2009

इस महंगाई के मायने

आनंद प्रधान
महंगाई बेकाबू होती जा रही है. खासकर आवश्यक खाद्य वस्तुओं की रिकार्डतोड़ महंगाई बिलकुल असहनीय हो गई है. खुद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 15.58 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह पिछले 11 वर्षों का रिकार्ड है. हालांकि भारत जैसे विकासशील देशों के लिए महंगाई कोई नई परिघटना नहीं है लेकिन ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि उसपर काबू पाने के मामले में केंद्र सरकार ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं. अभी तक भले ही सरकारें महंगाई पर पूरी तरह से काबू करने में नाकाम रहती रही हों लेकिन वो दावा जरुर करती थीं कि महंगाई पर नियंत्रण करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इस बार न सिर्फ केंद्र सरकार ने महंगाई पर रोक लगाने के लिए कुछ खास नहीं किया है बल्कि कृषि और उपभोक्ता मामलों के मंत्री शरद पवार ने साफ शब्दों में कह दिया है कि अगले तीन-चार महीनों यानि रबी की फसल आने तक वे कुछ नहीं कर सकेंगे और लोगों को इस महंगाई के साथ ही जीना पड़ेगा.
कृषि मंत्री का यह भी कहना है कि इस मामले में अगर कोई राहत देने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है. यही नहीं, वित्त मंत्री ने भी महंगाई को रोकने के मामले में अपनी मजबूरी जाहिर कहते हुए कह दिया कि अभी उनकी चिंता के केंद्र में वृद्धि दर को तेज करना है. ऐसे में, लोगों को महंगाई के साथ सामंजस्य बैठाकर चलाना पड़ेगा. उनके बयान से साफ है कि महंगाई के आगे यू.पी.ए सरकार ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं. इससे यह भी पता चलता है कि इस महंगाई के सामने सरकार कितनी लाचार हो गई है. सरकार की लाचारी का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रणव मुखर्जी ने अभी पिछले सप्ताह यह बयान दिया कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई के लिए बिचौलिए जिम्मेदार हैं. लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार को बिचौलियों के खिलाफ कार्रवाई करने में क्या दिक्कत हो रही है? यू.पी.ए सरकार उनके आगे इतनी लाचार क्यों दिख रही है?
असल में, इन बयानों से न सिर्फ केंद्र सरकार की लाचारी झलकती है बल्कि उसकी बहानेबाजी और चालाकी का भी पता चलता है. कभी वह सूखे को कभी वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट को और कभी बिचौलियों और राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाडना चाहती है. अपनी सुविधा के अनुसार हर मंत्री और अफसर कारण खोज रहा है. यही नहीं, केंद्र इस महंगाई से निपटने का जिम्मा भी राज्य सरकारों के मत्थे मढ़ने पर तुला हुआ है. गोया इस महंगाई के लिए केवल राज्य सरकारें जिम्मेदार हो और उसका इससे कोई लेना-देना नहीं हो. यह ठीक है कि महंगाई से निपटने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की भी है. वे सारी जवाबदेही केंद्र सरकार पर डालकर नहीं बच सकती हैं. लेकिन इस मामले में केंद्र सरकार का रवैया इसलिए ज्यादा खलनेवाला है क्योंकि महंगाई केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है और न ही उसकी कोई स्थानीय और तात्कालिक वजह है. जाहिर है कि इस कारण महंगाई से निपटने और आम आदमी को राहत पहुंचाने में राज्य सरकारों की भूमिका होते हुए भी उसकी सीमाएं हैं.
सच यह है कि यह महंगाई केंद्र सरकार की नीतियों का नतीजा है. इस महंगाई में साफ तौर पर कृषि की उपेक्षा, खाद्य प्रबंधन में ढिलाई, लापरवाही और भ्रष्टाचार, बिचौलियों-मुनाफाखोरों-जमाखोरों को बेलगाम छोड़ देने और कृषि वस्तुओं-खाद्यान्नों के वायदा कारोबार में सट्टेबाजों को खुली छूट देने जैसे नीतिगत कारणों से लेकर प्रशासनिक विफलताओं और मिलीभगत को साफ देखा जा सकता है. यही वजह है कि यह महंगाई केवल सूखे या खाद्य वस्तुओं और फल-सब्जियों की तात्कालिक आपूर्ति में कमी के कारण नहीं आई है बल्कि इसके कहीं गहरे नीतिगत और ढांचागत कारण हैं लेकिन यू.पी.ए सरकार उनपर पर्दा डालने के लिए कुछ तात्कालिक कारणों पर ही ज्यादा जोर दे रही है. यही नहीं, केंद्र सरकार के आर्थिक मैनेजर इस महंगाई को यह कहते हुए अपनी नीतियों की सफलता भी बता रहे हैं कि नरेगा और दूसरी योजनाओं के कारण गरीबों की आय बढ़ी है और वे अब खाद्यान्नों आदि का पूरा उपभोग कर रहे हैं जिससे इनकी मांग में बढ़ोत्तरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है.
यह तर्क नया नहीं है. जरा अपनी स्मृति पर जोर डालिए तो याद आ जायेगा कि पिछले साल जब खाद्यान्नों की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं तो अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा था कि भारत और चीन जैसे विकासशील देशों में गरीबों की आय बढाने से खाद्यान्नों की मांग बढ़ी है जिसके कारण महंगाई बढ़ रही है. तब जार्ज बुश की बहुत आलोचना हुई थी लेकिन अब यही तर्क देश में अर्थव्यवस्था के नियंता दे रहे हैं. यह सचमुच कितना अमानवीय और बेहूदा तर्क है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि गरीब भरपेट भोजन करने लगे हैं. सबसे पहली बात तो यह है कि यह सच नहीं है. विश्व खाद्य संगठन के मुताबिक देश में अब भी 22 करोड़ से ज्यादा लोग हैं जिन्हें दोनों जून रोटी नसीब नहीं है. वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 119 देशों में 94 वें स्थान पर है और कुल भूखे लोगों की तादाद के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है. इसके अलावा जिन लोगों को भोजन मिल भी रहा है उसमें बहुसंख्यक भारतीयों को जरूरी पौष्टिक भोजन नहीं मिल रहा है जिसके कारण देश में 50 फीसदी से अधिक बच्चे और माताएं कुपोषण के शिकार हैं.
दूसरी बात यह है कि जिन गरीबों की आय बढ़ी भी थी, खाद्य वस्तुओं की इस तीव्र महंगाई के कारण वे एक बार फिर पुरानी स्थिति में पहुंच गए हैं. यही कारण है कि महंगाई को गरीबों के लिए टैक्स माना जाता है. लेकिन खाद्यान्नों की ऐसी महंगाई तो दोहरा टैक्स है. सरकार स्वीकार करे या नहीं लेकिन तथ्य यह है कि इस महंगाई के कारण करोड़ों लोग फिर से गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं. जमीनी रिपोर्टें भी इसकी पुष्टि कर रही हैं. इसलिए यह महंगाई आम महंगाई से इस मायने में अलग है कि इसकी वास्तविक कीमत गरीब और असली आम आदमी चुका रहा है. तीसरी बात यह है कि यह अपने आप में कितनी शर्मनाक और अमानवीय शर्त है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए गरीबों की रोटी और उनके भरपेट भोजन के बुनियादी अधिकार को छीन लिया जाए. चौंकिए मत, बाज़ार यही तो कर रहा है, बढ़ती कीमतों के जरिये लाखों गरीब परिवार अपने आप भोजन के अधिकार से वंचित किये जा रहे हैं.
लेकिन यहां एक आम आदमी की सरकार है जो कह रही है कि वह महंगाई से निजात दिलाने के लिए कुछ नहीं कर सकती है. हालांकि यह सरकार इस वायदे के साथ सत्ता में आई थी कि वह गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को प्रति माह तीन रूपये किलो की दर से 25 किलो खाद्यान्न की गारंटी देगी. लेकिन लगता है कि यू.पी.ए सरकार वह आधा-अधूरा वायदा भी भूल गई है. वैसे इस महंगाई ने इस वायदे की सीमाएं भी स्पष्ट कर दी हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि असल मुद्दा व्यापक भोजन का अधिकार है. यह तभी सुनिश्चित किया जा सकता है अगर सरकार बाजार के बजाय खुद यह जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो. इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानि पी.डी.एस को न सिर्फ मजबूत, पारदर्शी और सक्षम बनाया जाए बल्कि उसे सार्वभौम किया जाए. हालांकि पी.डी.एस को ध्वस्त करने के लिए जिम्मेदार नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पैरोकार इसके लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे लेकिन पिछले कुछ वर्षों के अनुभव से साफ है कि महंगाई से निपटने का सवाल असल में खाद्य सुरक्षा का सवाल है.
इस महंगाई ने देश में खाद्य सुरक्षा की पोल खोल दी है. दरअसल, खाद्य सुरक्षा का एक सिरा अगर गरीबों की रोटी से जुड़ता है तो दूसरा सिरा कृषि और किसानो से जुड़ा है. खाद्य सुरक्षा खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भरता के बगैर संभव नहीं है. लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक से यह लगातार साफ होता जा रहा है कि खाद्यान्नों के उत्पादन की वृद्धि दर जनसंख्या की वृद्धि दर से कम हो गई है. यही नहीं, यह तथ्य भी किसी से छुपा नहीं है कि लगातार सरकारी उपेक्षा और डब्लू. टी.ओ के अस्तित्व में आने के बाद से कृषि क्षेत्र गंभीर संकट का सामना कर रहा है. किसानो की आत्महत्याओं के जरिये यह संकट लगातार देश के सामने था लेकिन उसे जानबूझकर अनदेखा किया गया. यह मान लिया गया कि कृषि की धीमी विकास दर के बावजूद चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि सेवा और औद्योगिक क्षेत्र के बदौलत देश 8-9 प्रतिशत की जी.डी.पी वृद्धि दर आसानी से हासिल कर लेगा. यही नहीं, कुछ नव उदारवादी विश्लेषकों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि कृषि की परवाह किये बगैर तीव्र जी.डी.पी वृद्धि दर हासिल करने पर जोर दिया जाना चाहिए क्योंकि उससे जो समृद्धि आएगी, उससे जरूरत के खाद्यान्न आयातित कर लिए जायेंगे.
इस सोच का नतीजा अब सबके सामने है. न माया मिली न राम. यहां तक कि अब यह भी स्पष्ट हो चुका है कि कृषि की उपेक्षा करके एक सीमा के बाद जी.डी.पी की वृद्धि दर को भी बढ़ाना भी मुश्किल है. यही नहीं, भारत जैसे देश के लिए खाद्यान्नों का आयात कोई विकल्प नहीं है. ताजा उदाहरण से यह बात एक बार फिर साबित हो गई है. खाद्यान्नों खासकर दालों, चीनी, चावल, खाद्य तेलों आदि की किल्लत से निपटने के लिए जब सरकार ने आयात करने की कोशिश की तो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में इन जिंसों की कीमतों में और उछाल आ गया. लेकिन अफसोस की बात यह है कि सरकार की असली चिंता खाद्य सुरक्षा नहीं बल्कि खाद्य सब्सिडी को कम करना है. हालांकि खाद्य सब्सिडी को कम करने की जितनी ही कोशिश हुई है, वह उतनी ही तेजी से बढ़ती गई है. इसकी वजह यह है कि इसी सरकार ने नहीं बल्कि पिछली सभी सरकारों ने खाद्य सब्सिडी को कम करने के नाम पर जिस तरह से आगा-पीछा सोचे हुए तात्कालिक और तदर्थ फैसले किये हैं, उससे सब्सिडी तो कम नहीं ही हुई उलटे खाद्य सुरक्षा अलग खतरे में पड़ गई है.
इस लिहाज से इस महंगाई को एक बड़े खतरे की पूर्वसूचना की तरह देखा जाना चाहिए. इससे निपटने के लिए तात्कालिक के साथ-साथ कुछ बुनियादी और दूरगामी फैसले करने पड़ेंगे. इसकी शुरुआत भोजन के मौलिक अधिकार के कानून से हो सकती है. यू.पी.ए सरकार ने एक कानून बनाया भी है लेकिन वह इतना सीमित और आधा-अधूरा है कि अभी गरीबों को जो राशन मिल भी रहा है, वह भी छीन जायेगा. सरकार चुनावी वायदे के मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे लोगों को तीन रूपये किलो की दर से हर महीने 25 किलो अनाज देने का प्रस्ताव कर रही है जबकि उन्हें अभी दो रूपये किलो के भाव 35 किलो अनाज मिल रहा है. जाहिर है कि ईद आधे-अधूरे कानून से कुछ नहीं होगा, इसके बदले सरकार को पूर्ण खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाना चाहिए. साथ ही, पी.डी.एस को सार्वभौम और मजबूत करना बहुत जरूरी है. दूसरे, कृषि क्षेत्र की उपेक्षा त्यागकर किसानो को वास्तविक लाभकारी मूल्य देने की गारंटी करनी होगी. कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा. तीसरे, अनाजों के व्यापार में बड़ी कंपनियों को घुसने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. साथ ही, खाद्यान्नों में वायदा कारोबार पर रोक लगाना ही होगा. चौथे, जब तक देश खाद्यान्नों के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर लेता और हर गरीब के लिए दोनों जून रोटी सुनिश्चित नहीं हो जाती, अनाजों का निर्यात नहीं होना चाहिए.

3 टिप्‍पणियां:

Bhoopendra a media man ने कहा…

BAHUT ACCHA LIKHA HAI AAPNE.. SARKAR BAN GAYEE AB GAREEBO KI SUDH KAHA. AB PHIR ELECTION AANE DO.. IS DESH KA YAHEE KHELAA HAI...

Bhoopendra a media man ने कहा…

BAHUT ACCHA LIKHA HAI AAPNE.. SARKAR BAN GAYEE AB GAREEBO KI SUDH KAHA. AB PHIR ELECTION AANE DO.. IS DESH KA YAHEE KHELAA HAI...

Krishna Kumar Mishra ने कहा…

सुन्दर प्रयास, कृपया आनन्द जी के लेखों की जेपीजी फ़ाइल भी यहां दे तो अच्छा होगा