मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

समाचारपत्र और विश्वसनीयता का संकट

आनंद प्रधान
‘समाचारपत्र के अंत’ की भविष्यवाणियों के बीच एक अच्छी खबर यह है कि दुनियाभर में पिछले साल मंदी के बावजूद समाचारपत्रों के प्रसार में लगभग 1.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। हालांकि ऊपरी तौर पर यह बढ़ोत्तरी बहुत मामूली दिखाई पड़ती है लेकिन अगर पिछले पांच वर्षों की बढ़ोत्तरी पर निगाह डालें तो समाचारपत्रों के सर्कुलेशन में 9 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। आज समाचारपत्र पूरी दुनिया की 34 फीसदी आबादी तक पहुंच रहे हैं। प्रतिदिन लगभग 1.9 अरब लोग अखबार पड़ रहे हैं। इससे भी अच्छी खबर यह है कि जहां अमेरिका और यूरोप में समाचारपत्रों के सर्कुलेशन में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है वहीं आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा समाचारपत्र बाज़ार बन गया है। भारत में अखबारों की प्रतिदिन लगभग 10.7 करोड़ प्रतियां बिक रही हैं और उसके कई गुना लोग अखबार पढ़ रहे हैं। शायद यही कारण है कि दिसंबर के पहले सप्ताह में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज़पेपर्स ने अपनी सालाना कॉन्फ्रेंस हैदराबाद में आयोजित की। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, दक्षिण अफ्रीका और लातिन अमेरिका में समाचारपत्रों का सर्कुलेशन लगातार बढ़ रहा है।
ज़ाहिर है कि भारत जैसे देशों में समाचारपत्रों को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। आनेवाले दशकों में बढ़ती साक्षरता, क्रयशक्ति, जागरूकता और तकनीक के प्रसार के साथ समाचारपत्रों का सर्कुलेशन बढ़ता रहेगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय समाचारपत्रों के सामने कोई खतरा या चुनौती नहीं है। सच यह है कि समाचारपत्रों की आर्थिक सेहत को भले ही कोई खतरा नहीं हो, लेकिन हाल के वर्षों में ‘पैकेज पत्रकारिता’ के उद्भव के साथ उनकी विश्वसनीयता और साख ज़रूर सवालों के घेरे में आ गई है। समाचारपत्र उद्योग के लिए चिंता की बात यह होनी चाहिए कि मुनाफे की बढ़ती भूख के कारण विज्ञापन और समाचार के बीच की पवित्र दीवार जिस तरह से ढह रही है, उसके कारण समाचारपत्र अपना मूल चरित्र गंवाते जा रहे हैं।
असल में, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में समाचारपत्रों की भूमिका अपने पाठकों को देश- दुनिया, समाज और आसपास हो रहे बदलावों से वाकिफ़ कराने के अलावा लोगों के चौकीदार के रूप में सत्ता पर नज़र रखने की भी है। लेकिन पैकेज पत्रकारिता के उदय के साथ समाचारपत्रों ने न सिर्फ चौकीदार की भूमिका छोड़ दी है बल्कि वे चोर के साथ खड़े हो गए हैं। वे अपने उन पाठकों को धोखा दे रहे हैं, जो उनपर विश्वास करते हैं। पाठकों का विश्वास खोकर समाचारपत्र उद्योग बहुत दिनों तक ज़िंदा नहीं रह सकता है।
भारतीय समाचारपत्र उद्योग के उन सदस्यों को यह बात याद रखना चाहिए जो पैकेज पत्रकारिता को अपने व्यवसाय का आधार बना रहे हैं कि अमेरिका में समाचारपत्र उद्योग सिर्फ इंटरनेट के कारण ही नहीं बल्कि अपनी विश्वसनीयता खोने के कारण भी संकट में फंसा दिखाई पड़ रहा है। 80 के दशक तक हर दस अमेरिकी में 7 अपने समाचारपत्रों पर भरोसा करते थे लेकिन अब यह संख्या घटकर सिर्फ 3 रह गई है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि पाठकों का विश्वास खोकर समाचारपत्र उद्योग तरक्की नहीं कर सकता है। इस सच्चाई को भारतीय समाचारपत्र उद्योग के चमकते सितारे जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा।