सोमवार, जुलाई 11, 2011

न्यूज चैनलों के ‘अस्पृश्य’

मजदूरों के लिए जगह नहीं है चैनलों पर


पहली किस्त



याद कीजिये कि आपने श्रमिकों- संगठित और असंगठित यानि सभी तरह के श्रमिकों, उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति और कामकाज की परिस्थितियों के बारे में टी.वी. न्यूज चैनलों पर आखिरी बार कोई रिपोर्ट कब देखी थी? क्या आपने हाल में कोई ऐसी रिपोर्ट देखी जिससे यह पता चलता हो कि देश में श्रमिकों की क्या स्थिति है?

क्या आपको न्यूज चैनलों पर हर दिन होनेवाली प्राईम टाइम चर्चाओं में हाल में श्रमिकों की स्थिति, उनके मुद्दों, मांगों, संघर्षों, हड़ताल आदि पर कोई गरमागरम चर्चा सुनाई पड़ी? क्या आपको किसी भी न्यूज चैनल का कोई स्टार रिपोर्टर याद आता है जो नियमित तौर पर श्रमिक मामलों का बीट कवर करता हो?

मुझे डर है कि इनमें से अधिकांश का जवाब ढूंढने के लिए आपको दिमाग पर बहुत जोर डालना पड़ेगा. इसके बाद भी इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि आपको ऐसी कोई हालिया न्यूज रिपोर्ट या प्राईम टाइम चर्चा या श्रमिक बीट कवर करनेवाले रिपोर्टर की याद आए.

यही नहीं, हाल-फिलहाल को छोड़ भी दें तो पिछले कई महीनों या सालों में भी शायद ही ऐसी किसी न्यूज रिपोर्ट, प्राईम टाइम चर्चा या श्रमिक बीट कवर करनेवाले रिपोर्टर की याद आ पाए. संभव है कि दिमाग पर बहुत जोर डालने पर आपको पिछले कुछ वर्षों में किसी श्रमिक हड़ताल खासकर उसके दौरान हुई हिंसा पर हुई इक्का-दुक्का रिपोर्टों की याद आ जाए.

संभव है कि आपमें से कुछ लोग पिछले साल जेट एयरवेज से निकाले गए केबिन कर्मचारियों की हड़ताल या हाल में एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल या सरकारी बैंकों के कर्मचारियों की एकदिवसीय हड़ताल की कवरेज का हवाला दें. निश्चय ही, एयरलाइन के केबिन कर्मचारियों और पायलटों की हड़ताल को खासा कवरेज मिला. उनपर प्राईम टाइम चर्चाएँ भी हुईं. उन्हें कवर करने के लिए स्टार रिपोर्टरों में भी होड़ लगी हुई थी.

लेकिन इसकी कई वजहें थीं. एयरलाइन उद्योग एक अप-मार्केट और इलीट उद्योग है जिसमें उच्च मध्यवर्ग और अमीरों की खासी दिलचस्पी रहती है. दूसरे, अगर उन एयरलाइन कर्मचारियों और पायलटों को श्रमिक मान भी लिया जाए तो वे उच्च मध्यवर्गीय व्हाइट-कालर श्रमिक हैं जिनके प्रति इलीट समुदाय की सहानुभूति स्वाभाविक है.

तीसरे, पायलटों या बैंक कर्मचारियों की हड़ताल से प्रभावित होनेवाले लोग- ‘पीपुल लाइक अस’ (पी.एल.यू) हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि वे न्यूज चैनलों के टारगेट आडिएंस हैं जिन्हें अनदेखा करना संभव नहीं है. आश्चर्य नहीं कि उनके हड़ताल को अच्छी-खासी कवरेज मिली.

जाहिर है कि न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों में अच्छी-खासी और सहानुभूतिपूर्ण कवरेज के कारण एयरलाइन कर्मचारियों और पायलटों के आंदोलन सरकार और एयरलाइन कंपनियों पर दबाव बनाने और काफी हद तक अपनी मांगें मनवाने में भी सफल रहे.

लेकिन लगता है कि दिल्ली से सटे गुड़गांव-मानेसर इलाके में स्थित जापानी आटोमोबाइल कंपनी मारुति सुजूकी उद्योग के श्रमिकों में वह आकर्षण नहीं था कि न्यूज चैनल उनकी दस दिनों से भी ज्यादा चली शांतिपूर्ण हड़ताल को कवरेज और प्राईम टाइम चर्चा के लायक मानते. नतीजा यह कि इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी न्यूज चैनल ने इस हड़ताल को कवरेज नहीं दिया.

किसी स्टार रिपोर्टर ने दिल्ली से सिर्फ ५० किलोमीटर दूर मारुति उद्योग तक जाने का कष्ट उठाना जरूरी नहीं समझा. स्वाभाविक ही था कि देश का ठेका उठाए एंकर संपादकों और प्राईम टाइम टाइगरों ने इस मुद्दे को १० मिनट की चर्चा के लायक भी नहीं माना.

यह ठीक है कि उन्हीं दिनों में चैनल बाबा रामदेव के अनशन, रामलीला मैदान की पुलिस कार्रवाई और अन्ना हजारे के प्रतिवाद अनशन के अलावा लोकपाल बनाम जोकपाल की दैनिक बहस में अति व्यस्त थे. सारे स्टार रिपोर्टर रामलीला मैदान, शास्त्री भवन, नार्थ ब्लाक, अकबर रोड, रेस कोर्स रोड से लेकर हरिद्वार तक दौड़-भाग में जुटे थे, उनके पास मारुति के दो हजार से अधिक श्रमिकों की शांतिपूर्ण हड़ताल कवर करने की फुर्सत कहाँ थी? इसी तरह, स्टार और 'टाइगर' एंकरों को भ्रष्टाचार, कालेधन और लोकपाल जैसे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा से फुर्सत नहीं थी.

ऐसे में, आप कह सकते हैं कि इस दौरान श्रमिकों की हड़ताल ही क्यों, और भी कई बड़ी घटनाओं और मुद्दों के लिए २४ घंटे के चैनलों पर जगह नहीं थी. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये घटनाएँ और मुद्दे नहीं होते तो मारुति के श्रमिकों की १३ दिनों तक चली हड़ताल को एयरलाइन के केबिन कर्मचारियों या पायलटों की हड़ताल के बराबर कवरेज मिलती? या उतनी नहीं तो कम से कम इतनी कवरेज मिलती, जिसकी वह हकदार थी? शायद नहीं.

संभव है कि कुछ चैनलों में फटाफट खबरों में एकाध बार ३० सेकेण्ड की खबर के रूप में या बहुत हुआ तो एक मिनट के एक पैकेज के रूप में किसी बुलेटिन में यह खबर चल जाती लेकिन इसकी सम्भावना न के बराबर है कि उसे एक बड़ी खबर के रूप में प्राईम टाइम बुलेटिन में जगह मिलती. लाइव कवरेज या प्राईम टाइम चर्चा बहुत दूर की बात है.

यही नहीं, इस बात की सम्भावना काफी ज्यादा है कि उसे सिरे से अनदेखा कर दिया जाता, जैसाकि अधिकांश चैनलों ने किया और करते रहते हैं. इसकी वजह यह है कि दिन-रात लोकतंत्र की कसमें खानेवाले चैनलों के कवरेज का लोकतंत्र बहुत सीमित और संकुचित है.

इस लोकतंत्र में सबसे ज्यादा जगह ‘पीपुल लाइक अस’ के लिए रिजर्व है. जाहिर है कि श्रमिक खासकर असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिक पी.एल.यू नहीं हैं यानी उनमें विज्ञापनदाताओं की दिलचस्पी नहीं है, इसलिए चैनल की भी उनमें कोई रूचि नहीं है.

यही कारण है कि आमतौर पर चैनलों में श्रमिकों खासकर अगर वह व्हाइट कालर कर्मचारी नहीं हैं तो उन्हें कवरेज के लायक नहीं समझा जाता है. संगठित क्षेत्र के श्रमिकों को अपवादस्वरूप थोड़ी-बहुत जगह मिल भी जाती है लेकिन असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को तो लगभग अछूत सा समझा जाता है.

आश्चर्य नहीं कि आप न्यूज चैनलों पर असंगठित क्षेत्र के उन करोड़ों श्रमिकों के दीन-दशा, समस्याओं और संघर्षों के बारे में अपवादस्वरूप भी कोई खबर या रिपोर्ट नहीं देखते हैं जिनके बारे में भारत सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट बताती है कि उनमें से ७९ फीसदी प्रतिदिन २० रुपये से भी कम की आय में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं.

ऐसा लगता है, जैसे वे देश के नागरिक नहीं हैं. तथ्य यह है कि देश की कुल श्रमशक्ति में लगभग ९२ फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करने को मजबूर हैं जहाँ न्यूनतम मजदूरी भी नहीं या बहुत मुश्किल से मिलती है. सामाजिक सुरक्षा आदि की बातें उनके लिए सपने की तरह हैं. यहाँ कोई श्रम कानून लागू नहीं होता है.

उनके काम करने की अमानवीय और शारीरिक रूप से असुरक्षित परिस्थितियों से लेकर उनके रहने की नारकीय स्थितियों तक ऐसा बहुत कुछ है जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन करने के लिए काफी है. लेकिन जाहिर है कि देश-दुनिया के बोझ से परेशान चैनलों को इससे कोई बेचैनी नहीं होती है.

यहाँ तक कि न्यूज चैनलों पर संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए भी जगह नहीं है. मारुति के श्रमिकों की हड़ताल को अनदेखा किया जाना इसका ताजा उदाहरण है. सच पूछिए तो संगठित क्षेत्र कोई स्वर्ग नहीं है और न उसमें काम करनेवाले सभी श्रमिक स्वर्ग का आनंद उठा रहे हैं. तथ्य यह है कि हाल के वर्षों में संगठित क्षेत्र में भी श्रमिकों के लिए काम की परिस्थितियां लगातार बिगड़ी हैं. नौकरी की सुरक्षा बीते दिनों की बात हो चुकी है.

कारण, स्थाई श्रमिकों और कर्मचारियों की जगह ठेका और दिहाड़ी श्रमिकों की भर्ती की प्रवृत्ति बढ़ी है जिन्हें जब चाहा रखा और जब चाहा निकाल दिया जाता है. यहाँ तक कि निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों में ज्यादातर श्रमिक ठेके पर हैं जिन्हें स्थाई कर्मचारियों वाली सुविधाएँ और लाभ नहीं मिलते हैं. उन्हें यूनियन बनाने या अपनी मांग उठाने के संवैधानिक अधिकार से भी वंचित रखा जाता है.


जारी......


(कथादेश के जुलाई’११ के अंक में प्रकाशित आलेख की पहली किस्त)

2 टिप्‍पणियां:

उमेश कुमार ने कहा…

media bajar me aa gyi hai aur bajar me wahi bikta hai jo dikhta hai. isliye is par koi ashcharya karna nahi chahiye ki media aam logon se dur hai.
media aam logon ke liye nahi khas logon ke liye ho gyi hai.

Arunesh c dave ने कहा…

ur write ups are always very good and informative on burning issues