शनिवार, जून 18, 2011

भारत-पाकिस्तान में युद्ध कराने के लिए उतावले चैनल

जाने-अनजाने चैनल अमेरिकी और भारतीय-पाकिस्तानी शासक वर्गों के खेल में शामिल हो गए हैं

तीसरी और आखिरी किस्त

स्वाभाविक तौर पर इसका असर उनकी विश्व दृष्टि पर भी पड़ा है जो काफी हद तक दुनिया को अमेरिकी चश्मे से देखने लगे हैं. चाहे वह अफगानिस्तान और इराक पर हमले का मामला रहा हो या फिलिस्तीन का मसला या फिर अब लीबिया पर हमला – भारतीय मीडिया काफी हद तक अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के सुर में बोलने लगा है. लादेन मामले में भी यही हो रहा है.

नतीजा यह कि लादेन, अल कायदा और खासकर पाकिस्तान को लेकर देशी न्यूज चैनलों और अख़बारों में चल रही कई ख़बरों से किसी और के नहीं बल्कि अमेरिकी हित पूरे हो रहे हैं. इन खबरों के जरिये अमेरिका और ओबामा प्रशासन देश के अंदर ऐसा जनमत बनाने रहे हैं जिससे उन्हें इस उपमहाद्वीप में अपनी सैन्य उपस्थिति और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने में मदद मिले.


असल में, ओसामा के मारे जाने और उसके बाद पैदा हुए राजनीतिक हालात के मद्देनजर अमेरिका दक्षिण एशिया में अपनी उपस्थिति और मजबूत करना चाहता है. लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिका विरोधी भावनाएं बढ़ती जा रही हैं.

ऐसे में, वह बहुत चतुराई के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच मतभेद बढाने की कोशिश कर रहा है ताकि दोनों के बीच तनाव बना रहे. उस स्थिति में रणनीतिक रूप से दोनों देश अमेरिका को अपने पाले में रखना चाहेंगे. इससे उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी. दूसरे, वह दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने का नाटक करता हुआ अपने हित आगे बढ़ाता रहेगा.

लेकिन यह भी सच है कि इस बारीक़ खेल में दोनों देशों के शासक वर्ग भी शामिल हैं. यह खेल उनकी राजनीतिक और रणनीतिक जरूरतों के मुफीद भी है. यह किसे पता नहीं है कि अपनी गलतियों और कमियों का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ने में भारतीय और पाकिस्तानी शासक वर्गों का कोई जवाब नहीं है.

लादेन के मारे जाने के कुछ दिनों बाद ही जिस तरह से भारत और पाकिस्तान के बीच तू-तू,मैं-मैं शुरू हो गई है और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है, उसमें दोनों देशों के मीडिया की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

खासकर भारतीय न्यूज चैनलों ने जिस तरह से अमेरिका से प्रेरणा लेकर पाकिस्तान के अंदर घुसकर कथित आतंकवादी शिविरों को उड़ाने और भारत में मोस्ट वांटेड आतंकवादियों को मारने की पैरवी शुरू कर दी और इसे खुद सेनाध्यक्ष सिंह ने अपने बचकाने बयान से हवा दे दी. उससे अमेरिकी कार्रवाई के बाद अपनी ही जनता को सफाई देने में व्यस्त पाकिस्तानी हुकूमत और सेना को भारत विरोधी भावनाएं भड़काने का मौका मिल गया.

आश्चर्य नहीं कि इसके बाद से दोनों देश एक-दूसरे को चेतावनियां देने में लगे हैं. निश्चय ही, इससे सबसे अधिक खुशी अमेरिका को हो रही है. कहां अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ पाकिस्तान के अंदर अपनी एकतरफा सैन्य कार्रवाई के लिए वह और उसके पाकिस्तानी मित्र कठघरे में थे और कहां अब भारत-पाकिस्तान आपस में तू-तू,मैं-मैं कर रहे हैं?

इस स्थिति को पैदा करने में अपने न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. आश्चर्य की बात नहीं है कि अपने न्यूज मीडिया में लादेन मामले से जुड़ी अधिकांश खबरें पाकिस्तान विरोधी भी हैं. न्यूज चैनलों के लिए तो यह जैसे पाकिस्तान के खिलाफ अंध राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काने के एक और मौके की तरह आया है.

यही कारण है कि लादेन की मौत के बाद न्यूज चैनलों पर पाकिस्तान विरोधी खबरें सबसे अधिक चली हैं. इनमें लादेन/अल कायदा/तालिबान से लेकर भारत विरोधी आतंकवादियों को संरक्षण देने में पाक सेना और आई.एस.आई की भूमिका और पाकिस्तान के एक ‘आतंकी राज्य’ या ‘विफल राज्य’ में बदलने जैसी खबरें शामिल हैं.

इनमें से काफी खबरें ऐसी हैं जो प्रोपगंडा का हिस्सा हैं. हालांकि इनमें कुछ सच्चाई भी होती है लेकिन उन्हें इतना मिर्च-मसाला लगाकर पेश किया जाता है कि उनका सच दब सा जाता है. कहने की जरूरत नहीं है कि इन ख़बरों का एकमात्र मकसद दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बनाए रखना और इस बहाने देशी-विदेशी निहित स्वार्थी तत्वों के हितों को पूरा करना होता है. यही कारण है कि इन खबरों/रिपोर्टों और उन पर आधारित स्टूडियो चर्चाओं में कभी भी ऐसे असुविधाजनक सवाल नहीं पूछे जाते जिनसे इन निहित स्वार्थों का पर्दाफाश होता हो.

असल में, न्यूज चैनलों पर होनेवाली इन चर्चाओं में ही असली खेल होता है. यहीं सत्ता प्रतिष्ठान के स्पिन डाक्टर्स और पी.आर मशीनरी ख़बरों को अपने हिसाब से तोडती-मरोड़ती और उनके मायने निकलती है. हैरानी की बात नहीं है कि इन टी.वी चर्चाओं में रिटायर्ड सैन्य अफसर, ख़ुफ़िया एजेंसियों के अफसर, डिप्लोमैट और उनके साथ नत्थी रक्षा-सुरक्षा बीट कवर करनेवाले पत्रकार हावी रहते हैं.

चैनल इस बात की पर्याप्त सावधानी रखते हैं कि चर्चा में आमंत्रित विशेषज्ञों में बहुमत उनका हो जो चर्चा में सत्ता प्रतिष्ठान की सोच को आगे बढ़ाएं. यही लोग चर्चा का एजेंडा और दिशा तय करते हैं. आमतौर पर इन चर्चाओं में विरोधी विचार रखनेवालों को नहीं बुलाया जाता है या अगर बुला भी लिया गया तो उन्हें बोलने या अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया जाता है. उनकी बात को बात-बात पर काटने की कोशिश से लेकर ऐसे अप्रासंगिक सवाल पूछे जाते हैं कि वे अपनी बात नहीं कह सकें.

लादेन मामले में भी न्यूज चैनलों पर यही नजारा था. अधिकांश चर्चाओं में अपवादस्वरूप शायद किसी ने अमेरिकी कार्रवाई पर सवाल उठाया हो अन्यथा आम सुर अमेरिकी कमांडो कार्रवाई के प्रति प्रशंसा का था. सभी चैनल अमेरिकी पराक्रम की गाथाएं सुनाने में लगे थे. उनके हौसले की दाद देने में जुटे थे.

अमेरिकी कमांडो दस्ते- सील के शौर्य, साहस और क्षमता की बलैयां ली जा रही थीं. इसी का तार्किक विस्तार यह था कि भारत को भी ऐसी कार्रवाई करने की सलाह दी जाने लगी. लेकिन इसके क्या परिणाम हो सकते हैं, यह आमतौर पर चर्चा से गायब रही. सच पूछिए तो न्यूज चैनलों का वश चलता तो वे कब का भारत-पाकिस्तान में युद्ध करा चुके होते!

समाप्त

(कथादेश के जून'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)

1 टिप्पणी:

आशा जोगळेकर ने कहा…

पाकिस्तान कौनसा हमारा सगा है वह तो जब तब हमारे खिलाफ ही कारवाइयां करता रहता है ।