बुधवार, नवंबर 04, 2009

अपने दामन में झांकें कोड़ा पर कोड़ा चलाने वाले


आनंद प्रधान

झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को देश का पहला ऐसा पूर्व मुख्यमंत्री होने का 'गौरव' हासिल हो गया है जिसके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय और सी बी आइ ने न सिर्फ आय से अधिक संपत्ति जुटाने बल्कि हवाला के जरिये उसे देश से बाहर भेजने के आरोप में मामला दर्ज किया है। पिछले दो दिनों में देशभर के आठ शहरों में कोड़ा और उनके करीबी सहयोगियों के 70 से अधिक ठिकानो पर आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के छापों में कोई 2000 करोड़ रुपये से अधिक की नामी-बेनामी संपत्ति का पता चला है. इसमे लाइबेरिया से लेकर दुबई, मलेशिया, लाओस, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में संपत्ति खरीदने से लेकर कोयला और स्टील कंपनियों में निवेश तक की सूचना है. हालांकि अभी पूरे तथ्यों और जानकारियों का सामने आना बाकी है लेकिन इतना साफ हो चुका है कि यह अभी भ्रष्टाचार के हिमशैल(आइसबर्ग) का उपरी सिरा भर है और सतह के नीचे न जाने कितना कुछ छुपा हुआ है.

कहने की जरुरत नहीं है कि देश के सबसे गरीब और पिछड़े राज्य में कोड़ा और उनके राजनीतिक साथियों और करीबी सहयोगियों ने सिर्फ कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान बना दिए हैं। यह सचमुच कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस राज्य का गठन देश के इस सबसे पिछड़े इलाके को विकास की मुख्यधारा में लाने और उसका हक दिलाने के लिए किया गया था, वह राज्य भ्रष्टाचार के मामले में कीर्तिमान बना रहा है. उससे कम बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि जिस राज्य के गठन की लडाई का सबसे अहम मुद्दा यह था कि इस आदिवासी बहुल राज्य का शासन यहीं के लोगों के हाथ में होना चाहिए क्योंकि इस जमीन से पैदा लोग बाहरी लोगों की तरह लूटने-खसोटने के बजाय यहां का दर्द समझेंगे और राज्य के विकास के लिए काम करेंगे, वो लूटने-खसोटने में बाहरी लोगों से भी आगे निकलते हुए दिखाई दे रहे हैं. इस मायने में, कोड़ा और उनके मंत्रिमंडल के कई आदिवासी साथियों ने सबसे अधिक धोखा अपने राज्य और उसके गठन के लिए कुर्बानी देनेवाले लाखों नागरिकों के साथ किया है.

निश्चय ही, कोड़ा और उनके साथियों को इसके लिए माफ़ नहीं किया जा सकता है। वे माफ़ी के काबिल इसलिए भी नहीं हैं कि उन्होंने एक अत्यंत निर्धन राज्य के संसाधनों की न सिर्फ बेशर्मी खुली लूट की है बल्कि उस राज्य के गरीबों के साथ छल किया है जो इस तरह की लूट को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं. लेकिन कोड़ा कोई अपवाद नहीं हैं. यहाँ तो पूरे कुएं में ही भंग पड़ी है. क्या कोड़ा के भ्रष्टाचार में खुले-छिपे शामिल उन महान 'राजनीतिक दलों' और उनके 'पवित्र नेताओं' की कोई भूमिका नहीं है जो कल तक साथ-साथ सत्ता की मलाई चाट रहे थे लेकिन अब पाकसाफ होने का दावा कर रहे हैं ? क्या यह सच नहीं है कि कोड़ा और उनके निर्दलीय साथियों को सत्ता और सम्मान देने के मामले में कांग्रेस या भाजपा में कोई पीछे नहीं था? याद रहे कि कोड़ा संघ परिवार की ट्रेनिंग और भाजपा की छत्रछाया में राजनीति में आये. तथ्य यह भी है कि कोड़ा का खनन मंत्रालय से रिश्ता भाजपा की मरांडी और मुंडा सरकारों के दौरान बना और कांग्रेस और राजद के सहयोग से वे निर्दलीय होते हुए भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गए. आखिर इससे बड़ा राजनीतिक मजाक और क्या हो सकता है कि यू पी ए खासकर कांग्रेस ने झारखण्ड जैसे राज्य का मुख्यमंत्री एक निर्दलीय को बनवा दिया.

असल में, जब से झारखण्ड बना है, कांग्रेस और भाजपा जैसी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने न सिर्फ उसके साथ राजनीतिक खिलवाड़ किया है बल्कि वहां के स्थानीय आदिवासी नेतृत्व और राजनीतिक दलों को भ्रष्ट बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. यह कहने का अर्थ यह नहीं है कि कोड़ा या सोरेन जैसे आदिवासी नेताओं की कोई गलती नहीं है और उन्हें कांग्रेस या भाजपा के नेताओं ने बहला-फुसलाकर भ्रष्ट बना दिया लेकिन इस सच्चाई को अनदेखा कैसे किया जा सकता है कि झारखंड की पिछले तीन दशकों की राजनीति में सोरेन जैसे लड़ाकू नेताओं और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे दलों को कांग्रेस ने कैसे भ्रष्ट बनाया? क्या नरसिम्हा राव की सरकार को बचाने में झामुमो के सांसदों को दी गई रिश्वत के लिए केवल रिश्वत लेनेवाले ही जिम्मेदार हैं या देनेवालों की भी कोई जिम्मेदारी बनती है? यहीं नहीं, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बहुत योजनाबद्ध तरीके से यहां के स्थानीय आदिवासी नेतृत्व को भ्रष्ट बनाया गया है ताकि झारखंड जैसे संसाधन संपन्न राज्य के साधनों की लूट में कोई अड़चन नहीं आये.

इसका नतीजा कोड़ा और सोरेन जैसे नेताओं के रूप में हमारे सामने है। लेकिन आश्चर्य नहीं कि झारखण्ड जैसे निर्धन राज्य में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं नहीं बन पा रहा है. वजह साफ है. असल में, लोगों को पता है कि कोड़ा किसकी शह और आर्शीवाद से लूट का साम्राज्य खडा करने में जुटे हुए थे. यही नहीं, लोगों को यह भी पता है कि कोड़ा अब एक सिर्फ नाम भर नहीं हैं बल्कि एक प्रवृत्ति के उदाहरण बन चुके हैं. न जाने कितने कोड़ा इस या उस पार्टी में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं या बिना किसी रोक-टोक या भय के लूट-खसोट का कारोबार जारी रखे हुए हैं. आप माने या न मानें, लेकिन इस तथ्य को अनदेखा करना मुश्किल है कि स्थानीय आदिवासी नेतृत्व के भ्रष्ट होने के कारण ही माओवाद को वह राजनीतिक जमीन मिली है जिसपर कल तक सोरेन और कोड़ा जैसे नेता खड़े थे.

साफ है कि झारखण्ड में कितना खतरनाक खेल खेला जा रहा है. यह सिर्फ एक और भ्रष्टाचार का मामला भर नहीं है बल्कि इसमें पूरी जनतांत्रिक प्रक्रिया दांव पर लगी हुई है. यहां यह भी कहना जरुरी है कि एक कोड़ा या सुखराम को पकड़ने से कुछ नहीं बदलनेवाला क्योंकि वह भ्रष्ट व्यवस्था ज्यों-की-त्यों बनी हुई है. आश्चर्य नहीं कि इस देश में भ्रष्टाचार खासकर उच्च पदों का भ्रष्टाचार अब कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, कम से कम राजनीतिक दलों के लिए तो यह कोई मुद्दा नहीं रह गया है. जब भ्रष्टाचार शासन व्यवस्था का इस तरह से हिस्सा बन जाए कि प्रशासन का कोई पुर्जा और पूरी मशीन बिना रिश्वत के 'ग्रीज' के चलने में अक्षम हो गई हो तो वह कोड़ा जैसों को ही पैदा कर सकती है. आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसी के पास कोई जवाब है कि पिछले तीन दशकों से अधिक समय से वायदे के बावजूद आजतक लोकपाल कानून क्यों नहीं बना? क्या कारण है कि अभी चार साल भी नहीं हुए और नौकरशाही-नेताशाही आर टी आइ कानून को बदलने पर तुल गई है? कोड़ा पर कोड़ा चलानेवाले क्या अपने दामन में झांकेंगे?

2 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

साफ है कि झारखण्ड में कितना खतरनाक खेल खेला जा रहा है. यह सिर्फ एक और भ्रष्टाचार का मामला भर नहीं है बल्कि इसमें पूरी जनतांत्रिक प्रक्रिया दांव पर लगी हुई है. यहां यह भी कहना जरुरी है कि एक कोड़ा या सुखराम को पकड़ने से कुछ नहीं बदलनेवाला क्योंकि वह भ्रष्ट व्यवस्था ज्यों-की-त्यों बनी हुई है. आश्चर्य नहीं कि इस देश में भ्रष्टाचार खासकर उच्च पदों का भ्रष्टाचार अब कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, कम से कम राजनीतिक दलों के लिए तो यह कोई मुद्दा नहीं रह गया है. जब भ्रष्टाचार शासन व्यवस्था का इस तरह से हिस्सा बन जाए कि प्रशासन का कोई पुर्जा और पूरी मशीन बिना रिश्वत के 'ग्रीज' के चलने में अक्षम हो गई हो तो वह कोड़ा जैसों को ही पैदा कर सकती है. आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसी के पास कोई जवाब है कि पिछले तीन दशकों से अधिक समय से वायदे के बावजूद आजतक लोकपाल कानून क्यों नहीं बना? क्या कारण है कि अभी चार साल भी नहीं हुए और नौकरशाही-नेताशाही आर टी आइ कानून को बदलने पर तुल गई है? कोड़ा पर कोड़ा चलानेवाले क्या अपने दामन में झांकेंगे?

Fantastic, पूरा निचोड़ यही पर मौजूद है ! मैं भी इस विषय पर एक लेख लिख रहा हूँ शायद दिन तक पोस्ट कर पाने में शक्षम हो सकू !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अंधेर नगरी, चौपट राजा.....