मंगलवार, नवंबर 17, 2009

क्यों टूट रहा है मुलायम सिंह का जादू ?

आनंद प्रधान
कहते हैं कि किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती है. संस्कृत की भी एक कहावत है- अति सर्वत्र वर्जयेत. लेकिन लगता है कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को यह पता नहीं है, अन्यथा वह फिरोजाबाद में अपनी बहु और पार्टी सांसद अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने से पहले दस बार जरुर सोचते. माना कि परिवारवाद आज की भारतीय राजनीति की एक सर्वव्यापी सच्चाई बन चुका है और कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं बची है लेकिन परिवारवाद की भी एक हद है, यह मुलायम सिंह भूल गए. ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश खासकर फिरोजाबाद के मतदाताओं ने इस बार तय कर लिया था कि मुलायम सिंह यादव को यह हद बता दिया जाना चाहिए.
नतीजा सबके सामने है. समाजवादी पार्टी और उससे अधिक उसके नेता मुलायम सिंह अपने ही गढ़ में मत खा गए. फिरोजाबाद के मतदाताओं ने राजनीतिक रूप से लगभग असंभव को संभव कर दिखाते हुए मुलायम सिंह की बहु को नकार कर कांग्रेस के राज बब्बर को 85 हजार से अधिक वोटों से जीता दिया. यह कांग्रेस और राज बब्बर की जीत से अधिक मुलायम सिंह की हार है. यह मुलायम सिंह से ज्यादा मुलायम सिंह की परिवारवादी राजनीति की हार है. उन्होंने जिस तरह से समाजवाद के नाम पर पूरी बेशर्मी से पार्टी को अपने परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है, उसे फिरोजाबाद के मतदाताओं ने अब और बर्दाश्त करने से इंकार कर दिया. सचमुच, यह कितना सुंदर और जनतान्त्रिक न्याय है कि परिवारवाद की इस बेशर्म राजनीति को और किसी ने नहीं बल्कि मुलायम सिंह की राजनीति के गढ़ या कहिये घर के मतदाताओं ने ही नकार दिया.
यह ठीक है कि इस हार को पूरे उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनावों के नतीजों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है जहां समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बहुत ख़राब और निराशाजनक रहा है. इस मायने में, फिरोजाबाद की हार पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक ट्रेंड के अनुरूप ही है. यह भी ठीक है कि फिरोजाबाद में डिम्पल यादव की हार के और भी कई कारण हैं. लेकिन कम से कम डिम्पल की हार का कारण वह नहीं है जो कांग्रेस पार्टी और यहां तक कि समाजवादी पार्टी भी बताने की कोशिश कर रही है. निश्चय ही, डिम्पल केवल इस लिए नहीं हारीं कि राज बब्बर के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने प्रचार किया. कांग्रेस अगर यह दावा कर रही है तो यह बहुत स्वाभाविक है. कांग्रेस में चापलूसी की 'उच्च परंपरा' के अनुसार पार्टी की जीत का सेहरा हमेशा से नेता के सिर बंधता रहा है और नेता अगर नेहरू-गाँधी परिवार का और भविष्य का प्रधानमंत्री हो तो भला कांग्रेस में उसके अलावा किसी और को श्रेय देने का कुफ्र कौन कर सकता है?
लेकिन हैरानी की बात यह है कि समाजवादी पार्टी भी अपनी हार का श्रेय राहुल गाँधी को दे रही है. पार्टी महासचिव अमर सिंह और खुद अखिलेश यादव फिरोजाबाद में राहुल गाँधी के प्रचार करने पर नाराजगी जता चुके हैं. अखिलेश ने तो इसे बिलकुल व्यक्तिगत लडाई की तरह लेते हुए ऐलान किया है कि अब उत्तर प्रदेश में वह खुद युवराज का मुकाबला करेंगे. उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि फिरोजाबाद में राहुल गाँधी यह जानते हुए भी कि यहां से मुलायम सिंह की बहु उम्मीदवार है, चुनाव प्रचार के लिए क्यों आये? जबकि समाजवादी पार्टी ने नेहरु-गाँधी परिवार के प्रति अपना सम्मान जताते हुए सोनिया और राहुल गाँधी के खिलाफ रायबरेली और अमेठी में कोई उम्मीदवार खडा नहीं किया था. साफ है कि समाजवादी पार्टी इस शिकायत के जरिये यह कहने की कोशिश कर रही है कि एक-दूसरे के पारिवारिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए यानि जहां एक के परिवार के लोग चुनाव मैदान में हों, वहां दूसरे के परिवार को दूर रहना चाहिए.
जाहिर है कि ऐसा कहकर सपा अपने हार के वास्तविक कारण- नग्न परिवारवाद पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. कहने की जरुरत नहीं है कि यह एक ऐसा तर्क है जिसके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. यही नहीं, यह तर्क देकर समाजवादी पार्टी परिवारवाद की राजनीति का भी बचाव करने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि वह उस कड़वी सच्चाई से आंख चुराने की कोशिश कर रही है जो सीधे उनके घर फिरोजाबाद से आई है. फिरोजाबाद का सन्देश साफ है कि समाजवाद के नाम पर परिवारवाद की अति की राजनीति अब और नहीं चलेगी. मुलायम सिंह के लिए यह सोचने का समय आ गया है कि आखिर वह परिवारवाद को कहाँ तक ले जाना चाहते हैं? जिस तरह से पूरी पार्टी खुद उनके परिवार तक सिमटती जा रही है और बाकी जो बचा-खुचा है, वहां अमर सिंह का फ़िल्मी परिवार काबिज है, उसके बाद वहां बाकी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए और क्या बचता है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के टूटते राजनीतिक जादू की सबसे बड़ी वजह भी यही है. उन्होंने न सिर्फ पार्टी को पूरी तरह से अपने परिवार की संपत्ति बना दिया है बल्कि उसे जिस तरह से एक पारिवारिक निजी मालिकानेवाली पार्टी की तरह से चला रहे हैं, उसमें आज नहीं तो कल समाजवादी पार्टी का यही हश्र होना है. एक पार्टी जिसके अन्दर कोई लोकतंत्र नहीं है और प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह चलाई जा रही है, उसमे अमर सिंह जैसे मैनेजर और उनका राजनीतिक-आर्थिक कारोबार तो फलफूल सकता है लेकिन वह उत्तर प्रदेश जैसे जटिलता और विविधतापूर्ण राज्य की राजनीति और समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है. इस कारण सपा में साफ तौर पर एक "लोकतान्त्रिक घाटा" दिखाई पड़ रहा है.
इस "लोकतान्त्रिक घाटे" का ही नतीजा है कि पार्टी राज्य में न सिर्फ अपना सामाजिक जनाधार खोती जा रही है बल्कि उसे जमीनी सच्चाइयों का भी अंदाजा नहीं रह गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कारण है कि लोगों की नब्ज पर हाथ रखने का दावा करनेवाले मुलायम सिंह को भाजपा के पूर्व नेता और बाबरी मस्जिद गिराने के प्रमुख दोषी माने जानेवाले कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के नतीजों का अंदाजा नहीं हो पाया? आखिर यह मुलायम की कैसी समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा है कि उसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषी कल्याण के लिए भी जगह बन गई? दोहराने की जरुरत नहीं है कि पिछले लोकसभा चुनावों और अब उपचुनावों में सपा की अपमानजनक हार के पीछे एक बड़ी वजह अल्पसंख्यक मतदाताओं का सपा को छोड़ जाना है. इसके बाद अब यह राजनीतिक अवसरवाद की इन्तहा है कि बिना अपने किये की माफ़ी मांगे कल्याण सिंह से किनारा भी कर लिया.
यह सब निजी रिश्तों के नाम पर जायज ठहराया गया. लेकिन सवाल मुलायम सिंह और कल्याण सिंह के निजी रिश्तों का नहीं है. मुद्दा है एक ऐसे नेता और उसके राजनीतिक-वैचारिक अतीत के साथ राजनीतिक दोस्ती का जो सपा की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के साथ पूरी तरह से असंगत है. ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह को यह पता नहीं है लेकिन कल्याण सिंह या फिर अमर सिंह या अनिल अम्बानी और अमिताभ बच्चन के साथ निजी और राजनीतिक दोस्ती के फर्क को वही नेता भूल सकता है जिसके लिए अपनी राजनीति और वैचारिकी से पहले और ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तिगत रिश्ते हों. इन व्यक्तिगत रिश्तों को निभाने की ऐसी जिद वही राजनेता कर सकता है जो अपनी राजनीति को परिवार के दायरे से बाहर नहीं देख पाता हो.
जाहिर है कि परिवार तक सिमटी हुई राजनीति कभी भी समावेशी नहीं हो सकती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अब बिना समावेशी राजनीति के खड़े रह पाना मुश्किल है. 2007 के विधानसभा चुनावों के पहले से ही यह स्पष्ट होने लगा था और चुनावों के बाद उसकी पुष्टि भी हो गई कि उत्तर प्रदेश में संकीर्ण जातीय और धार्मिक गोलबंदी की राजनीति का तेल खत्म होने लगा है और जो भी पार्टी सामाजिक जनाधार को फैलाने और विस्तृत करने की ईमानदार कोशिश नहीं करेगी, वह बहुत दूर तक नहीं चल पायेगी. बसपा ने कई सीमाओं के साथ 2007 में अपनी "सामाजिक इंजीनियरिंग" से कुछ हद तक यह करिश्मा कर दिखाया लेकिन मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को साथ लेकर जिस व्यापक पिछड़ा गोलबंदी की कोशिश की, उसने अल्पसंख्यक मतदाताओं को नाराज और पार्टी से दूर कर दिया.
कहने की जरुरत नहीं है कि सपा और मुलायम को पहले लोकसभा और अब उपचुनावों के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम वोटरों के पार्टी से छिटकने के कारण हुआ है. सभी जानते हैं कि मुस्लिम और पिछडी जातियों में मुख्य रूप से यादव सपा के मूल आधार रहे हैं. लेकिन मुस्लिम वोटरों के खिसकने के साथ पार्टी के जनाधार में बिखराव और छीजन की एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो गई है कि उसके मूल आधार पिछडी किसान जातियों खासकर यादवों के एक हिस्से ने भी किनारा करना शुरू कर दिया है. इसका संकेत उपचुनावों के नतीजों में साफ देखा जा सकता है. सपा न सिर्फ फिरोजाबाद की "घरेलू" मानी जानेवाली लोकसभा सीट हार गई बल्कि मुलायम के गढ़ में पड़नेवाली भरथना और इटावा की विधानसभा सीटें भी हार गईं. यही नहीं, पार्टी 2007 के विधानसभा चुनावों में जीती अपनी पांचों सीटें- इसौली,हैंसर बाज़ार,पुवायां, भरथना और इटावा हार गईं.
सबसे शर्मनाक बात तो यह हुई कि पार्टी 11 विधानसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत पाई और कई सीटों पर तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंच गई. मुलायम सिंह के लिए यह खतरे की घंटी है. इसकी वजह यह है कि अगर सपा उत्तर प्रदेश में बसपा से सीधे मुकाबले से बाहर हुई तो उसके लिए अपने खिसकते जनाधार को संभाल पाना और मुश्किल हो जायेगा. कांग्रेस इसी मौके का इंतजार कर रही है. उसकी पूरी कोशिश यह है कि वह 2012 के विधानसभा चुनावों से पहले बसपा से सीधे मुकाबले में आ जाए. कहने की जरुरत नहीं है कि जो पार्टी बसपा से सीधे मुकाबले में होगी, उसे बसपा सरकार के खिलाफ बने विक्षोभ और नाराजगी का सीधा फायदा मिलेगा. हालांकि अभी कोई भी निष्कर्ष निकालना थोडी जल्दबाजी होगी लेकिन उपचुनावों के नतीजों से यह साफ है कि सपा की राजनीतिक जमीन खिसक रही है और वह बसपा से सीधे मुकाबले में बाहर हो रही है.
लेकिन इसके लिए और कोई नहीं बल्कि खुद मुलायम सिंह जिम्मेदार हैं जिन्होंने समाजवाद के नाम पर पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह की राजनीति को आगे बढाया है, वह अब बंद गली के आखिरी मुहाने पर पहुंच गई है. यहां से आगे का रास्ता बंद है और नए रास्ते खोलने के लिए उन्हें न सिर्फ परिवारवाद (और अमरवाद मार्का समाजवाद) से पीछा छुडाना पड़ेगा बल्कि समाजवादी राजनीति की जड़ों की ओर लौटना होगा. उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार को और समावेशी बनाने के लिए आम आदमी के मुद्दों पर जनसंघर्षों और ग्रामीण गरीबों, किसानो,बुनकरों,दलितों और अल्पसंख्यकों के हक़-हुकूक की लडाई में उतरना होगा.
जाहिर है कि विपक्ष की राजनीति पांच सितारा होटलों और सैरगाहों से नहीं चल सकती है. लेकिन जिस पार्टी के नेता अपने भाई-भतीजे-बेटे-बहू और अमर सिंह, संजय दत्त, जया बच्चन जैसे हों, उससे इसकी उम्मीद करना भी बेकार है. कहने की जरुरत नहीं है कि सपा की मौजूदा पारिवारिक-कारपोरेट राजनीति में अवसरवादी-दलाल-भ्रष्ट-ठेकेदार-गुंडा-माफिया तत्व ही फलफूल सकते हैं. लेकिन इस राजनीति की सीमाएं उजागर हो चुकी हैं. अब यह मुलायम को तय करना है कि वह किस रास्ते जायेंगे.

3 टिप्‍पणियां:

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

प्राईवेट लि० मे तो बाहर के भी कुछ लोग होते है . स पा तो प्रोप्राइटर फ़र्म है .और एक बात तो बता ही दी मुलायम सिंह ने आदमी का इस्तेमाल कर फ़ेक देते है . आज़म खान , कल्याण सिंह जैसे लिस्ट बहुत लम्बी है

Suman ने कहा…

nice

सत्यम न्यूज़ ने कहा…

सर ये ठीक है की सपा मैं परिवारवाद की जड़ें जम चुकीं हैं लेकिन ये भी सपा की मानसिक मज़बूरी बन चुकी है.प्रदेश मैं मुलायम और कांसीराम ने मिल कर इस प्रदेश को गृह युद्ध जैसे हालातों से बचाया था.एससी और ओबीसी को वोट के जरिये गुस्से का इज़हार करने का मोका दिया.लेकिन मुलायम सिंह का राजनेतिक करियर गलतिओं से भरा है और ये वो गलतियाँ वे हैं जो मुलायम सिंह ने नहीं की.सपा को प्रदेश में बने रहना है तो उसे पुराने नेताओं से जुड़ना होगा.