शनिवार, २९ सितम्बर २००७
छात्र राजनीतिः संघर्ष का अधिकार बचाने की लड़ाई
ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अगर छात्रसंघों और छात्र राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार को उन्हें खत्म करने का र्प्याप्त तर्क मान लिया गया तो हमें विधायिका-संसद और विधानसभाओं के साथ-साथ लोकतांत्रिक राजनीति को भी भंग और प्रतिबंधित करना पड़ेगा। दरअसल, उत्तरप्रदेश में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगाने का मायावती सरकार का फैसला न सिर्फ किसी भी लोकतांत्रिक तर्क से परे है बल्कि काफी हद तक मरीज को लाइलाज घोषित करके उसे मारने की तरह है। मायावती और उनके जैसे अन्य लोगों का छात्रसंघों के खिलाफ सबसे बड़ा और शायद एकमात्र तर्क यह है कि वे अपराधियों और लंपट तत्वों के मंच बन गए हैं और परिसर के शैक्षणिक माहौल को बिगाड़ने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के लिए भी गंभीर समस्या बन गए है।
इस आरोप में काफी हद तक सच्चाई है। छात्र राजनीति में गिरावट और दिशाहीनता के कारण अपराधी, लंपट, ठेकेदार, जातिवादी, अवसरवादी और माफिया तत्वों की न सिर्फ घुसपैठ बढ़ी है बल्कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों-कांग्रेस, भाजपा, सपा आदि के जेबी छात्रसंगठनों के जरिए परिसरों के अंदर और छात्रसंघों में उनका दबदबा काफी बढ़ गया है। परिसरों की छात्र राजनीति में बाहुबलियों और धनकुबेरों के इस बढ़ते दबदबे के कारण आम छात्र न सिर्फ राजनीति और छात्रसंघों से दूर हो गए हैं बल्कि वे छात्र राजनीति और छात्रसंघों के मौजूदा स्वरूप से घृणा भी करने लगे हैं। यही नहीं, छात्र राजनीति और छात्रसंघोंं के अपराधीकरण के खिलाफ आम शहरियों में भी एक तरह गुस्सा और विरोध मौजूद है।
जाहिर है कि मायावती छात्र समुदाय और आम शहरियों की इसी छात्रसंघ विरोधी भावना को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन इस आधार पर यह मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी कि उनका मकसद परिसरों की सफाई और उनमें शैक्षणिक माहौल बहाल करना है। दरअसल, उत्तरप्रदेश या देश के अन्य राज्यों में जहां विश्वविद्यालय परिसर शैक्षणिक अराजकता के पर्याय बन गए हैं, उसके लिए छात्रसंघों को दोषी ठहराना सच्चाई पर पर्दा डालने और असली अपराधियों को बचाने की कोशिश भर है। सच यह है कि लंपट, अपराधी और अराजक छात्रसंघ और छात्र राजनीति मौजूदा शैक्षणिक अराजकता के कारण नहीं, परिणाम हैं। इस शैक्षणिक अराजकता के लिए केन्द्र और प्रदेश की सरकारों के साथ-साथ विश्वविद्यालय प्रशासन मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
अगर ऐसा नहीं है तो उत्तर प्रदेश और बिहार के विश्वविद्यालयों में भ्रष्ट, लंपट, नाकारा और शैक्षणिक रूप से बौने कुलपतियों की नियुक्ति के लिए कौन जिम्मेदार है? आखिर क्यों पिछले एक दशक से भी कम समय में उत्तरप्रदेश के राज्यपाल को कुलपतियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, अनियमितता और अन्य गंभीर आरोपों के कारण सामूहिक कार्रवाई करनी पड़ी है? क्या इसके लिए भी छात्रसंघ और छात्र राजनीति जिम्मेदार है? तथ्य यह है कि उत्तरप्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों में पढ़ाई-लिखाई को छोड़कर वह सब कुछ हो रहा है जो शैक्षणिक गरिमा और माहौल के अनुकूल नहीं है। उस सबके लिए सिर्फ छात्रसंघों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
सच यह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश सहित उत्तर और मध्य भारत के अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसर शिक्षा के कब्रगाह बन गए हैं। भ्रष्ट और नाकारा कुलपतियों और विभाग प्रमुखों ने पिछले तीन दशकों में परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और राजनीतिक दबाव के आधार पर निहायत नाकारा और शैक्षणिक तौर पर जीरो रहे लोगों को संकाय में भर्ती किया। इससे न सिर्फ परिसरों का शैक्षणिक स्तर गिरा बल्कि अक्षम अध्यापकों ने अपनी कमी छुपाने के लिए जातिवादी, क्षेत्रीय, अपराधी और अवसरवादी गुटबंदी शुरू कर दी।़ परिसरोंे में ऐसे अधिकारी-अध्यापक गुटों ने छात्रों में भी ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देना और आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। कालांतर में कुलपतियों और विश्वविद्यालयों के अन्य अफसरों ने भी अपने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर पर्दा डालने के लिए ऐसे गुटों और गिरोहों का सहारा और संरक्षण लेना-देना शुरू कर दिया।
जाहिर है कि इससे परिसरों का शैक्षणिक माहौल बिगड़ने लगा। रही-सही कसर ९० के दशक में केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूरी कर दी। नयी शिक्षा नीति और आर्थिक सुधारों के दबाव में केन्द्र और राज्य सरकारों ने उच्च शिक्षा से सब्सिडी खत्म करने के नाम पर विश्वविद्यालयों/कॉलेजों के बजट में भारी कटौती शुरू कर दी और विश्वविद्यालयों को अपने संसाधन खुद जुटाने के लिए कह दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि परिसरों में लाइब्रेरी में नयी किताबें और जर्नल आने बंद हो गए, प्रयोगशाला में उपकरणों और रसायनों का टोटा पड़ गया और उनका आधारभूत ढांचा चरमराने लगा। इस स्थिति से निपटने की हड़बड़ी में विश्वविद्यालयों ने बिना किसी तैयारी और आधारभूत ढांचे के स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों के नाम पर डिग्रियां बेचने और मान्यता देने का धंधा शुरू कर दिया।
इसके साथ ही अधिकांश विश्वविद्यालयों का ध्यान शैक्षिक गुणवत्ता, शोध, अध्यापन के बजाय अधिक से अधिक धन कमाने पर केन्द्रित हो गया। इस बहती गंगा में कुलपतियों से लेकर राज्य सरकार के शिक्षा विभाग में बैठे अफसरों और मंत्रियों तक सभी हाथ धो रहे हैं। दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस आक्टोपसी रैकेट में राज्यपाल और मुख्यमंत्री से लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के आला अधिकारी तक सभी शामिल रहे हैं। विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल बिगाड़ने की पूरी जिम्मेदारी इसी प्रभावशाली शैक्षिक माफिया की है जिसने उत्तरप्रदेश-बिहार से लेकर मध्यप्रदेश-राजस्थान तक परिसरों को अपने कब्जे में ले रखा है।
तथ्य यह है कि इस शैक्षिक माफिया ने ही छात्रसंघों और छात्र राजनीति को भी भ्रष्ट बनाया है। यह एक सुनियोजित योजना के तहत किया गया है। असल में, परिसरों में एक ईमानदार, संघर्षशील और बौद्धिक रूप से प्रगतिशील छात्रसंघ और छात्र राजनीति की मौजूदगी शैक्षिक माफिया को हमेशा से खटकती रही है क्योंकि वह उसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता रहा है। इसलिए लड़ाकू और ईमानदार छात्र राजनीति को खत्म करने के लिए शैक्षिक माफिया ने परिसरों में जानबूझकर लंपट, अपराधी, जातिवादी और क्षेत्रवादी तत्वों को संरक्षण और प्रोत्साहन देना शुरू किया। दूसरी ओर, उन्होंने छात्रसंघों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को 'घूस खिलाना, भ्रष्ट बनाना, फिर बदनाम करना और आखिर में दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने` की रणनीति पर काम करना शुरू किया। इसका सीधा उद्देश्य अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालना था।
शैक्षिक माफिया को अपने इस अभियान में छात्रऱ्युवा राजनीति के अपराधीकरण की उस प्रक्रिया से बहुत मदद मिली जो ७० के दशक में युवा हृदय सम्राट संजय गांधी की अगुवाई में शुरू हुई थी। संजय गांधी और उनकी चौकड़ी के नेतृत्व में युवा कांग्रेस और बाद में एनएसयूआई के अपराधीकरण ने जल्दी ही एक संक्रामक रोग की तरह समाजवादी और कथित राष्ट्रवादी धारा के छात्र संगठनों को भी अपने चपेट में ले लिया। जनता पार्टी सरकार के पतन, संपूर्ण क्रांति के आकस्मिक गर्भपात और लालू-नीतिश से लेकर असम आंदोलन से निकले छात्र नेताओं के उसी दलदल में फंसते जाने के साथ ही छात्र राजनीति से आदर्शवाद और बदलाव की इच्छा भी अकाल मृत्यु की शिकार हो गयी। जाहिर है कि शैक्षिक माफिया और अपराधी-जातिवादी-लंपट छात्र गिरोहों ने इस स्थिति का सबसे अधिक फायदा उठाया। उन्होंने छात्र राजनीति और छात्रसंघों को अपराधीकरण और जातिवादी गिरोहबंदी का पर्याय बना दिया।
इससे एनएसयूआई से लेकर 'ज्ञान-शील-एकता` की दुहाई देनेवाली विद्यार्थी परिषद और समाजवादी छात्र सभा जैसा कोई छात्र संगठन नहीं बचा। अपवाद सिर्फ वे वामपंथी और क्रांतिकारी जनवादी छात्र संगठन रहे जिन्होंने ८० के दशक के मध्य में उत्तरप्रदेश, बिहार और दिल्ली के परिसरों में इस अपराधीकरण और शैक्षिक अराजकता को चुनौती देने की कोशिश की। लेकिन आश्चर्य की बात है कि परिसरोें में छात्र राजनीति के अपराधीकरण का रोना-रोनेवाले विश्वविद्यालय और राज्य प्रशासन ने छात्र राजनीति की इस धारा को कुचलने और खत्म करने की सबसे ज्यादा कोशिश की है। इसकी वजह बिल्कुल साफ है। ये छात्र संगठन शैक्षिक माफिया की कारगुजारियों को लगातार चुनौती देते रहे हैं।
इसलिए जो लोग यह सोचते और आशा बांधे हुए हैं कि मायावती के फैसले या सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गठित लिंगदोह समिति की सिफारिशों से परिसरों में शैक्षिक पुनर्जागरण हो जाएगा, वे बहुत बड़े भ्रम में हैं। अगर ऐसा होना होता तो बिहार के सभी विश्वविद्यालय आज शैक्षणिक प्रगति की शानदार मिसाल होते क्योंकि इन विश्वविद्यालयों में पिछले २२ वर्षों से छात्रसंघ के चुनाव नहीं हुए हैं। लेकिन तथ्य इसके उल्टे हैं। बिहार के सभी विश्वविद्यालय शिक्षा की कब्रगाह बने हुए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि विश्वविद्यालयों के ढांचे में आमूलचूल बदलाव और उससे भ्रष्ट तत्वों की सफाई के बिना परिसरों की मौजूदा स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा क्योंकि मायावती मर्ज के बजाय लक्षण का इलाज कर रही हैं। अब तो खैर उन्होंने लक्षण का भी नहीं बल्कि सीधे मरीज को ही मार देने का उपाय कर दिया है। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग की बल्ले-बल्ले
जाहिर है कि मीडिया उद्योग में कारोबारी गतिविधियां और हलचलें बहुत तेज हैं। नए टीवी चैनल खुल रहे हैं, चालू अखबारों के नए संस्करण और कुछ नए अखबार शुरू हो रह हैं, एफएम रेडियो चैनलों के स्टेशन नए शहरों में पहुंच रहे हैं और इंटरनेट की लोकप्रियता छोटे शहरों और जिला मुख्यालयों तक पहुंच गयी है। इन सब कारणों से अपनी सुर्खियों के लिए मशहूर मीडिया उद्योग खुद खबरों की सुर्खियों में है। इसका कुछ अंदाजा आप इन तथ्यों और अनुमानों से लगा सकते हैं :
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (२००७-१२) के दृष्टिकोण पत्र के अनुसार, मीडिया उद्योग अर्थव्यवस्था का एक ऐसा क्षेत्र है जिसने अर्थव्यवस्था की विकास (जीडीपी) दर की तुलना में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है। योजना आयोग का अनुमान है कि यह उद्योग २०१० तक १९ प्रतिशत की कंपाउंड औसत वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ेगा। आयोग के मुताबिक, इनमें से टेलीविजन उद्योग ४२ प्रतिशत, प्रेस ३१ फीसदी, फिल्म १९ प्रतिशत, विज्ञापन ३ प्रतिशत, संगीत और लाइव मनोरंजन २ प्रतिशत और रेडियो उद्योग एक प्रतिशत की वृद्धि दर से आगे बढ़ेगा। आयोग का कहना है कि मीडिया उद्योग एक ऐसा क्षेत्र है जहां मांग, आय की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ रही है।
अंतर्राष्ट्रीय निवेश, शोध और सलाहकार कंपनी प्राइसवाटर हाउस कूपर्स की भारतीय मीडिया उद्योग पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २००४ में इस उद्योग का संपूर्ण आकार ७ अरब डालर (लगभग ३३६ रुपए) था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह उद्योग १४ फीसदी की कंपाउंड सालाना औसत वृद्धि दर के साथ २००९ तक १३ अरब डालर (लगभग ६०० अरब रूपये) का हो जाएगा। कूपर्स की रिपोर्ट के मुताबिक २०१५ तक वैश्विक मीडिया और मनोरंजन उद्योग १.८ खरब डालर के चकरा देनेवाली उंचाई पर पहुंच जाएगा और उसका केन्द्र धीरे-धीरे एशिया की ओर झुकने लगेगा। भारत के मीडिया उद्योग में यह संभावना है कि वह वैश्विक मीडिया उद्योग का एक हिस्सा लगभग २०० अरब डालर (१०००० अरब रुपए) अपने कब्जे में ले ले।
भारतीय निवेश सलाहकार और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया उद्योग के कुल राजस्व में औसतन सालाना १५.६ प्रतिशत की दर से वृद्धि होगी और यह वर्ष २००५ के ३६१ अरब रूपए से बढ़कर २०१० तक ७४४ अरब रूपए का हो जाएगा। एक और अंतर्राष्ट्रीय निवेश और शोध कंपनी जेपी मार्गन की भारतीय मीडिया उद्योग पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले मनोरंजन उद्योग (प्रेस, इंटरनेट और आउटडोर को छोड़कर) औसतन सालाना १८ प्रतिशत की वृद्धि दर से २००९ तक ४५४.५ अरब का राजस्व कमाने लगेगा। इस रिपोर्ट के अनुसार अगले तीन वर्षों में कुल विज्ञापन आय का ५० प्रतिशत टीवी के हिस्से में चला जाएगा। इसके कारण अगले तीन वर्षों में १०० और टीवी चैनल शुरू हो सकते हैं। अभी उपलब्ध टीवी चैनलों की संख्या लगभग १६० है।
इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया उद्योग अब अपनी कुटीर और लघु उद्योग की छवि से बाहर आ रहा है। वह न सिर्फ तेजी से बढ़ और फल-फूल रहा है बल्कि बड़ी पूंजी भी उसकी ओर आकर्षित हो रही है। इसके साथ ही मीडिया उद्योग एक विभाजित, विखंडित और असंगठित कारोबार से निकलकर कारपोरेटीकरण की ओर बढ़ रहा है। चाहे वह प्रेस हो या सिनेमा, रेडियो हो या टीवी या फिर इंटरनेट-हर मीडिया में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी आ रही है और अपने साथ प्रबंधन, तकनीक, अंतर्वस्तु, सांगठनिक संरचना, प्रस्तुति और मार्केटिंग के नए तौर-तरीके ले आ रही है।
इस प्रक्रिया में मीडिया उद्योग में कई नए और सफल उद्यमी उभर कर सामने आए हैं, कुछ पुराने उद्यमी संकट में हैं और कुछ ने मैदान छोड़कर हट जाना ही बेहतर समझा है। वे पुराने मीडिया घराने जो आज भी व्यावसायिक होड़ में बने हुए हैं, उनका प्रबंधकीय और संगठनिक ढांचा न सिर्फ बहुत बदला है बल्कि वे भी कारपोरेटीकरण की राह पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि १९९१ में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के साथ जिस तरह अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुए हैं, उसी तरह मीडिया उद्योग भी पिछले डेढ़ दशक में एक व्यापक बदलाव से गुजरा है। चेहरे के साथ-साथ उसके चरित्र में भी परिवर्तन आया है। अपनी स्थानीय विशेषताओं के साथ अब वह एक व्यापक वैश्विक मीडिया और मनोरंजन उद्योग का हिस्सा है।
निश्चय ही, भारतीय मीडिया उद्योग और कारोबार में पिछले डेढ़ दशक में कई नई प्रवृत्तियां उभरी हैं। मीडिया उद्योग का कोई क्षेत्र इस परिवर्तन से अछूता नहीं बचा है। मीडिया उद्योग में उभर रही इन नयी प्रवृत्तियों की पहचान और पड़ताल के साथ उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलाव और विकासक्रम को देखना दिलचस्प होगा।
प्रेस
प्रेस यानि अखबार-पत्रिकाएं आदि मीडिया उद्योग के सबसे प्रारंभिक और बुनियादी घटक रहे हैं। भारत में समाचारपत्रों का इतिहास २२६ वर्षों पुराना हो चुका है लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों में उनमें जितना बदलाव आया है, वह २०० वर्षों में भी नहीं आया। इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि १९८० में प्रेस का कुल राजस्व १५० करोड़ रूपए था जो विगत २५ वर्षों में उछलकर ९५०० करोड़ रूपए तक पहुंच गया है। इस तरह २५ वर्षों में प्रेस के कुल राजस्व में ६३ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। इसी तरह, प्रेस की विज्ञापनों से होनेवाली कुल आय १९९१ में १०६९ करोड़ रूपए थी जो २००५ में ६४१ प्रतिशत की वृद्धि के साथ ७९२९ करोड रूपए पहुंच गई है।
इस बीच, समाचारपत्रों के सर्कुलेशन और पाठक संख्या में भी भारी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण (एनआरएस) २००५ के मुताबिक देश में पाठकों की कुल संख्या २१ करोड़ से कुछ अधिक हो गयी है जिनमें से आधे ग्रामीण पाठक हैं। सबसे उल्लेखनीय बात यह हुई है कि समाचारपत्रों की दुनिया में भाषाई समाचारपत्र पाठक संख्या के मामले में अंग्रेजी के अखबारों से काफी आगे निकल गए हैं। इसके बावजूद कमाई के मामले में अंग्रेजी अखबार अभी भी भाषाई अखबारों से आगे हैं।
हालांकि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। भाषाई अखबारों ने भी अपने छोटे, पारिवारिक और बंद दायरे से बाहर निकलकर व्यावसायिक जोखिम उठाना, प्रबंधन को प्रोफेशनल हाथों में सौंपना, मार्केटिंग के आधुनिक तौर-तरीके अपनाना और ब्रांडिंग पर जोर देना शुरू कर दिया है। उनमें पूंजी बाजार से पूंजी उठाने या विदेशी पूंजी से हाथ मिलाने में कोई हिचकिचाहट नहीं रह गयी है। हिंदी के दो अखबार समूहों- जागरण और भास्कर, जो पाठक संख्या के मामले में देश के पहले और दूसरे नंबर के अखबार हैं, ने आधुनिक और व्यावसायिक प्रबंधन और मार्केटिंग के तौर-तरीकों को अपनाने में गजब की आक्रामकता दिखायी है।
जागरण भाषाई समाचारपत्र समूहों में पहला ऐसा समूह है जो आर्थिक उदारीकरण के बाद बदली हुई परिस्थितियों में देशी मीडिया विशेषकर प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खुले विरोध के अपने स्टैंड से पलटते हुए सबसे पहले आयरलैंड के इंडिपेंडेट न्यूज एंड मीडिया समूह से १५० करोड़ रूपए का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ले आया। यही नहीं, वह हिंदी का पहला और भारतीय भाषाओं का भी संभवत: पहला समाचारपत्र है जो आइ पी ओ लेकर पूंजी बाजार में आया। आज वह शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी है जिसका बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) १७८९ करोड़ रूपए है। जागरण समूह ने एफडीआई और आइपीओ के जरिए जुटाई गयी रकम का इस्तेमाल नए संस्करण शुरू करने और प्रिंट से बाहर टेलीविजन (चैनल ७) व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए किया। विदेशी और शेयर बाजार की पूंजी ने जागरण समूह को कानपुर के एक छोटे, पारिवारिक और बंद दायरे से बाहर एक कारपोरेट समूह के रूप में कायांतरण में अहम भूमिका अदा की है।
दूसरी ओर, मूलत: मध्यप्रदेश के भास्कर समूह की विकास यात्रा भाषाई समाचारपत्रों के नए, आक्रामक और बढ़े हुए आत्मविश्वास की कथा है। सिर्फ १५ वर्षों में उसने मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। वह हिंदी का पहला अखबार है जिसने मार्केटिंग के आक्रामक तौर-तरीकों का सहारा लिया और जमे-जमाए प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया। वह पहला ऐसा भाषाई अखबार समूह है जो न सिर्फ अपने क्षेत्रीय दायरे से बाहर निकला बल्कि दूसरी भाषाओं के समाचारपत्र निकालने में भी पीछे नहीं रहा। उसने गुजराती में दिव्य भास्कर और फिर जी समूह के साथ मिलकर मुंबई से अंग्रेजी अखबार डीएनए का प्रकाशन शुरू कर टाइम्स समूह और हिंदुस्तान टाइम्स समूह को कड़ी चुनौती दी है। हालांकि भास्कर समूह ने अभी तक न तो शेयर बाजार से पूंजी उठाई है और न ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने की कोशिश की है लेकिन देर-सबेर उसे अपने तगड़े प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए बाजार में आना ही पड़ेगा।
निश्चय ही, समाचारपत्र घरानों का शेयर बाजार में आना और विदेशी पूंजी के साथ हाथ मिलाना हाल के वर्षों में प्रिंट मीडिया क्षेत्र में हुआ सबसे बड़ा परिवर्तन है। हालांकि यह परिवर्तन अभी तक हिंदी के एक प्रमुख समाचारपत्र घराने के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स, मिड डे, और डेक्कन क्रॉनिकल समूहों तक ही पहुंचा है। (देखें-चार्ट-२) लेकिन इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। इससे समाचारपत्र उद्योग में प्रतियोगिता तीखी हुई है और होड़ में आगे रहने के लिए समाचारपत्र समूह न सिर्फ अपने क्षेत्रीय/स्थानीय वर्चस्व के क्षेत्र से बाहर निकलने और फैलने की कोशिश कर रहे हैंं बल्कि एक-दूसरे के वर्चस्व के क्षेत्र में घुसकर चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। यही नहीं, कई अखबार समूह मीडिया के नए क्षेत्रों जैसे टीवी, रेडियो, इंटरनेट में घुसने और पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं तो कई समूह ताकतवर प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले के लिए आपस में हाथ मिलाते और गठबंधन करते दिख रहे हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में समाचारपत्र उद्योग में कई नयी प्रवृत्तियां उभरती हुई दिख रही हैं :
बड़ी पूंजी और उसके साथ आयी आक्रामक मार्केटिंग के बढ़ते दबदबे के कारण जहां कुछ समाचारपत्र समूहों (जैसे टाइम्स समूह, एचटी, जागरण, भास्कर, डेक्कन क्रॉनिकल आदि) ने बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की है, वहीं कई बड़े, मध्यम और छोटे समाचारपत्र समूहों (जैसे आज, नयी दुनिया, देशबंधु, प्रभात खबर, पॉयनियर, अमृत बाजार पत्रिका, एनआइपी, स्टेटसमैन आदि) के सामने अपना अस्तित्व बचाए रखने या होड़ में टिके रहने का संकट पैदा हो गया है। कुछ और बड़े और माध्यम आकार के अखबार समूहों (जैसे अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, नवभारत (म.प्र.), ट्रिब्यून, इंडियन एक्सप्रेस आदि) पर अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के बढ़ते दबाव का असर साफ देखा जा सकता है।
संकेत साफ हैं। आनेवाले वर्षों में समाचारपत्र उद्योग में कई बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं। यह आशंका बढ़ती जा रही है कि बड़ी पूंजी के दबाव में छोटे और मंझोले खिलाड़ी प्रतियोगिता से बाहर हो जाएंगे। कुछ बड़े अखबार या मीडिया समूहों का दबदबा और बढ़ेगा। समाचारपत्र उद्योग में अधिग्रहण और विलयन (खरीद-बिक्री और आपसी गठबंधन) की प्रक्रिया तेज होगी। इस तरह समाचारपत्र उद्योग में कंसोलिडेशन बढ़ेगा और एक शहर से प्रकाशित होनेवाले कई समाचारपत्रों वाली विविधता और बहुलता की स्थिति नहीं रह जाएगी।
इसकी वजह समाचारपत्र उद्योग में लागू होनेवाला 'तीन का नियम` (रूल ऑफ थ्री) है जिसे सबसे पहले एमोरी विश्वविद्यालय (अटलांटा, अमेरिका) के प्रो. जगदीश सेठ ने पेश किया था। इस नियम के अनुसार अधिकतर स्थानीय/क्षेत्रीय बाजारों में नंबर एक अखबार (गुणवत्ता नहीं बल्कि पाठक/प्रसार संख्या के आधार पर) राजस्व और मुनाफे का बड़ा हिस्सा उड़ा ले जाता है, दूसरे नंबर का अखबार भी संतोषजनक मुनाफा कमा लेता है जबकि तीसरे नंबर का अखबार किसी तरह 'ब्रेक इवेन` यानी बहुत थोड़ा मुनाफा बना पाता है। इन तीन के अलावा बाकी सभी व्यावसायिक रूप से घाटा झेलते हैं। वे तभी चल सकते हैं जब उनका कोई और संस्करण मुनाफा कमा रहा हो या किसी और व्यवसाय से उसकी भरपाई हो रही हो।
किसी अखबार समूह की व्यावसायिक सफलता उसके अंतर्वस्तु की गुणवत्ता से कहीं अधिक मार्केटिंग की आक्रामक रणनीति से तय हो रही है। इस कारण अखबारों के अंदर संपादकीय विभाग का महत्व और कम हुआ है और प्रबंधन का दबदबा बढ़ा है। यहां तक कि अखबार की अंतर्वस्तु के निर्धारण में संपादकीय विभाग की भूमिका कम हुई है और मार्केटिंग मैनेजरों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है। अधिकांश अखबार समूहों में संपादक की भूमिका मैनेजर की हो गयी है और नयी पीढ़ी के संपादकों की पहली प्राथमिकता अखबार की अन्तर्वस्तु नहीं बल्कि उसे एक 'बिक्री योग्य लोकप्रिय उत्पाद` में बदलने की है। भाषाई समाचारपत्रों में संपादक और वरिष्ठ पत्रकारों को विज्ञापन जुटाने की रणनीति बनाने से लेकर एडवर्टोरियल लिखते हुए आसानी से देखा जा सकता है।
अखबार समूहों के राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय का प्रतिशत और घट गया है जबकि विज्ञापन का हिस्सा और बढ़ गया है। अखबार समूहों के बीच बढ़ती प्रतियोगिता के बीच पाठकों को लुभाने के लिए कीमतों में कटौती से लेकर मुफ्त उपहार आदि की आक्रामक मार्केटिंग रणनीति का असर यह पड़ा है कि अखबारों के कुल राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय का हिस्सा लगातार घटा है। स्थिति यह हो गयी है कि अंग्रेजी के बड़े अखबारों (जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स आदि) के कुल राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय ५ से १० प्रतिशत रह गयी है। भाषाई अखबारों में यह प्रतिशत २५ से ३० प्रतिशत है। इस तरह समाचारपत्र के कुल राजस्व में विज्ञापन का हिस्सा दो तिहाई से लेकर ९० फीसदी तक हो गया है। उल्लेखनीय है कि २०-२५ वर्षों पहले तक प्रसार और विज्ञापन से होनेवाली आय का अनुपात ५०:५० होता था और प्रथम प्रेस आयोग (१९५३) ने १२७ समाचारपत्रों के सर्वेक्षण में यह अनुपात ६०:४० का पाया था।
साफ है कि समाचारपत्रों की विज्ञापनों पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ गयी है। नतीजा यह हुआ है कि अखबारों पर विज्ञापनदाताओं का दबाव काफी बढ़ गया है। वे न सिर्फ अपनी शर्तें (जैसे उनकी कंपनी के बारे में नकारात्मक खबर नहीं जानी चाहिए या कोई सकारात्मक खबर छापनी होगी) थोप रहे हैं बल्कि कुलमिलाकर समाचारपत्र की अंतर्वस्तु को भी प्रभावित कर रहे हैं। अधिकांश सफल समाचारपत्रों में आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के खिलाफ समाचार/टिप्पणियों का प्रकाशन संभव नहीं है या छिटपुट और असंतुलित है। दूसरे, समाचारपत्रों में कारपोरेट भ्रष्टाचार और अपराधों से जुड़ी खबरों के लिए कोई जगह नहीं है। समाचारपत्रों के लिए कारपोरेट समूह ऐसी पवित्र गाय हैं जिनमें कोई गड़बड़ी या अनियमितता नहीं होती है।
तीसरे, समाचारपत्रों के अंतर्वस्तु में इस तरह से परिवर्तन किया गया है कि वह नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं की जरूरत को पूरा करें क्योंकि विज्ञापनदाता को उपभोक्ता चाहिए न कि नागरिक। उपभोक्ता की चिंताएं खुद तक सीमित और अधिक से अधिक उपभोग की ओर उन्मुख होती हैं जबकि नागरिक की चिताएं खुद तक सीमित नहीं होती हैं और व्यापक दायरे तक फैली होती हैं। वह अपने उपभोग की सीमा जानता है। लेकिन व्यावसायिक रूप से सफल अखबारों और अन्य माध्यमों की अंतर्वस्तु नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। उनकी कोशिश नागरिकों को भी उपभोक्ता में बदलने की है। ऐसा किए बिना विज्ञापनदाता का मकसद पूरा नहीं हो सकता है। जैसाकि जानेमाने मीडिया विश्लेषक बेन बैगडिकियन ने लिखा है कि, 'गंभीर कार्यक्रम (या आलेख/समाचार) दर्शकों को याद दिलाते हैं कि जटिल मानवीय समस्याएं किसी नए पाउडर या डिओडोरेंट के इस्तेमाल से नहीं सुलझती हैं।` इसलिए समाचारपत्रों और दूसरे माध्यमों में गंभीर/विश्लेषणात्मक आलेखों/टिप्पणियों/रिपोर्टों के बजाय हल्के-फुल्के तथाकथित 'मानवीय रूचि` के हल्के-फुल्के समाचारों/फीचरों/टिप्पणियों के प्रकाशन/प्रसारण पर जोर बढ़ता जा रहा है।
समाचारपत्रों के कारपोरेटीकरण और प्रोफेशनल प्रबंधन की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद भाषाई समाचारपत्र समूहों में पत्रकारों के वेतन और सेवा शर्तों में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। यहां तक कि व्यवसायिक रूप से हिंदी के सर्वाधिक सफल दो समाचारपत्र समूहों में भी स्थिति बहुत नहीं बदली है। आर्थिक उदारीकरण के शोर में स्थायी नियुक्ति और वेतनमान आदि की तो अब कहीं बात भी नहीं होती। कांट्रैक्ट व्यवस्था के तहत पत्रकारों की नियुक्ति होती है, वेतनमान के बजाय मनमाने और मोलतोल के आधार तनख्वाह तय होती है और सेवा शर्तों की हालत दिन-पर-दिन बदतर होती जा रही है। अस्थायी नौकरी का तनाव और दबाव उन्हें प्रबंधन के आगे झुकने के लिए बाध्य कर देता है। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश अखबारों में पत्रकारों की यूनियन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। जिला स्तर और तहसील स्तर के संवाददाताओं/स्ट्रिगर्स को न तो नियुक्ति पत्र मिलता है और न ही अपेक्षित वेतन। चूंकि जिला और मंडल स्तर पर अखबार तीन से पांच स्थानीय पृष्ठ देने लगे हैं, पत्रकारों पर काम का बोझ बहुत होता है। लेकिन उन्हें उचित वेतन नहीं मिलता है। वेतन की भरपाई के लिए उन्हें विज्ञापन जुटाना पड़ता है जिसका कमीशन मिलता है। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें प्रभावशाली नेताओं, अफसरों, व्यापारियों और ठेकेदारों के हितों का ध्यान रखना पड़ता है।
सबसे हैरत की बात यह है कि जिला और मंडल स्तर पर पहुंचकर 'हिंदुस्तान`, 'जागरण`, 'भास्कर`, 'अमर उजाला`, जैसे बड़े अखबारों और छोटे-मंझोले अखबारों के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता है। भारतीय समाचारपत्र व्यवसाय के साथ एक अच्छी बात यह है कि न सिर्फ अखबारों का प्रसार और पाठकवर्ग बढ़ रहा है बल्कि उसने टीवी के हमले को भी झेल लिया है। ध्यान रहे कि यूरोप, अमेरिका और जापान में समाचारपत्रों की प्रसार संख्या लगातार गिर रही है। विकसित देशों में समाचारपत्रों को इंटरनेट से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। लेकिन भारत में औसतन १० से १२ फीसदी सालाना की वृद्धि दर से अखबारों खासकर भाषाई अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है। चीन और भारत दुनिया में समाचारपत्रों के सबसे बड़े बाजार के रूप में उभर रहे हैं। अधिकांश विश्लेषक इस राय से सहमत हैं कि भारत में अगले डेढ़-दो दशकों तक बढ़ती साक्षरता, आर्थिक आय और राजनीतिक जागरूकता के कारण समाचारपत्रों की प्रसार संख्या बढ़ती रहेगी। इस कारण जैसे-जैसे इस उद्योग का आकार और मुनाफा बढ़ेगा, बड़ी और विदेशी पूंजी इस ओर और अधिक आकर्षित होगी। इसके साथ ही, सरकार पर समाचारपत्र उद्योग में २६ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को खत्म करने और विदेशी अखबारों/प्रकाशनों के प्रकाशन की इजाजत देने का दबाव भी बढ़ेगा।
टेलीविजन
भारत में टीवी उद्योग का विकास इस मायने में अभूतपूर्व है कि दुनिया के इतिहास में ऐसी कोई और मिसाल नहीं मिलती। आज भारत, चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है। आज टीवी देश के १०.८ करोड़ घरों तक पहुंच रहा है जिसमें ६.८ करोड़ घरों में केबल और सेटलाइट टीवी पहुंच रहा है। इसके बावजूद टीवी की पहुंच देश के ६० प्रतिशत घरों से कम ही है और केबल और सेटलाइट टीवी की पहुंच तो देश के कुल घरों के एक चौथाई से भी कम है। इसका अर्थ यह है कि अभी देश में टीवी के विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
दूसरे, इतने सीमित विस्तार के बावजूद टीवी उद्योग आज देश का सबसे बड़ा मीडिया उद्योग है। २००५ में उसका कुल राजस्व लगभग १८५०० करोड़ रूपए का था जो मीडिया उद्योग में उसके निकटतम प्रतिद्वंद्वी पे्रस के कुल राजस्व से दुगुना था। (देखें चार्ट-१) सिर्फ डेढ़-दो दशकों मे टीवी उद्योग का विज्ञापन राजस्व १९९१ के ३९० करोड़ से उछलकर २००५ में ६७४६ करोड़ रूपए पर पहुंच गया है। आज देश में १६० से अधिक टीवी चैनल विभिन्न भाषाओं और प्रकारों/रूपों में टीवी दर्शकों तक पहुंच रहे हैं। कोई ३५ से ४० हजार केबल वाले और आधा दर्जन एमएसओ के साथ-साथ सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन और कोई एक दर्जन बड़े देशी-विदेशी प्रसारणकर्ता इस बाजार में शामिल हैं।
हालांकि अंतर्राष्ट्रीय और खासकर विकसित देशों के टीवी उद्योग पर निगाह डालें तो उनकी तुलना में भारतीय टीवी उद्योग अभी भी साफ्टवेयर निर्माण, वितरण और प्रसारण के तीनों प्रमुख क्षेत्रों में काफी विभाजित और बिखरा हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे टीवी बाजार में कुछ बड़े प्रसारणकर्ता साफ्टवेयर से लेकर वितरण व्यवसाय पर अपना नियंत्रण कायम करते हुए दिख रहे हैं। (देखें चार्ट-३) इनमें से दो प्रसारणकर्ता- स्टार और सोनी क्रमश: रूपर्ट मर्डाक के न्यूज कॉरपोरेशन और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनी कोलंबिया ट्रिस्टार की सहयोगी कंपनियां हैं जबकि जी टेलीफिल्मस और सन नेटवर्क भारतीय टीवी कंपनियां हैं जिनमें विदेशी भागीदारी भी है। इसमें से सोनी को छोड़कर बाकी तीनों प्रसारणकर्ता समाचार प्रसारण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। यही नहीं, स्टार-जी-सन टीवी का केबल व्यवसाय से लेकर डीटीएच प्रसारण के क्षेत्र में भी पूरा दबदबा है।
चूंकि टीवी उद्योग में विदेशी पूंजी की भागीदारी को लेकर कई पाबंदियां अभी भी बनी हुई हैं, इसलिए बड़े विदेशी प्रसारणकर्ता भारतीय टीवी बाजार में उस स्तर पर घुस नहीं पाए हैं, जैसी उनकी इच्छा और तैयारी है। इसके बावजूद अकेले स्टार टीवी ने जिस तरह से भारतीय टीवी बाजार पर दबदबा कायम करना शुरू कर दिया है, उसके मुकाबले में बहुत कम भारतीय प्रसारणकर्ता खड़े होते दिखाई पड़ रहे हैं। टीवी के २० सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रमों में १५ से १८ कार्यक्रम स्टार के चैनलों के होते हैं। दर्शकों को आकर्षित करने के मामले में स्टार के चैनल अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे निकल गए हैं। स्टार के प्रोफेशनल प्रबंधन और आक्रामक मार्केटिंग के आगे सुभाष चंद्रा की जी टेजीफिल्मस का सिंहासन हिल रहा है।
इसके बावजूद भारतीय टीवी उद्योग में अभी विस्तार का दौर होने के कारण कंसोलिडेशन की वह प्रक्रिया तेज नहीं हुई है जिसमें कमजोर खिलाड़ी बाजार से बाहर हो जाएंगे। लेकिन देर-सबेर यह होना है और अगले तीन-चार वर्षों बाद वही प्रसारणकर्ता बाजार में टिक पाएगा जिसके पास न सिर्फ बड़ी पूंजी होगी बल्कि उसके चैनल बाजार में अपने सेगमेंट में पहले तीन या चार चैनलों में होंगे। दरअसल, प्रिंट मीडिया पर लागू होनेवाला 'तीन का नियम` टीवी बाजार पर भी काफी हद तक और कुछ अपवादों के साथ लागू होता है। यहां भी विज्ञापनदाताओं की निगाह टैम रेटिंग के आधार पर पहले, दूसरे और तीसरे नंबर के चैनल से आगे नहीं जाती है। हालांकि टीवी उद्योग में केबल/डीटीएच शुल्क (सब्सक्रिप्शन) से आनेवाला राजस्व भी आय का महत्वपूर्ण स्रोत है लेकिन अभी वितरण का बाजार बहुत विभाजित और बिखरा हुआ है, इसलिए प्रसारणकर्ताओं को 'पे चैनलों` से वह आय नहीं हो रही है जो विकसित देशों में होती है।
चार्ट- १
भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग (वर्ष २००५)
मीडिया राजस्व (अरब रुपए)टीवी प्रसारण १८५
प्रेस ९५
फिल्म ७९.६७
संगीत १५
रेडियो ३.६
स्थानीय मीडिया
आउटडोर १२
इवेंट्स ८
स्थानीय प्रेस १२
ग्रामीण मीडिया ५
अन्य ५
कुल ४२०.२७
स्रोत : वनिता खांडेकर, इंडियन मीडिया बिजनेस (द्वितीय संस्करण` २००६), रिस्पांस बुक्स, नई दिल्ली
चार्ट- २
शेयर बाजार में लिस्टेड प्रमुख मीडिया कंपनियां
कंपनी शेयर मूल्य बाजार पूंजीकरण पी/ई अनुपात
(रुपऐ में) (करोड़ रुपऐ में)
जी टेलीफिल्मस ३५८ १६८३८ ८९.५
एच टी मीडिया ७५७ ३५५० ४६.१
डेक्कन क्रॉनिकल लिमिटेड ७०२ ३१४८ २४.१
जागरण प्रकाशन लिमिटेड २९६ १७८९ ३५.६
एनडीटीवी २२७ १३९५ --
बालाजी टेलीफिल्मस १४५ ९४१ १४.१
टीवी टुडे नेटवर्क ७४ ४२५ १७.४
यूटीवी साफ्टवेयर २२७ ६३५ ७४.२
एडलैब फिल्मस ४०१ १७४९ ३७.१
पी वी आर २४६ ५६१ ६७.८
मिड डे मल्टीमिडिया ५४ २४० १८५.१
टीवी १८ समूह ८९५ १८०० ९५.४
सन टीवी १२९५ ८९२१ ६३.८
चार्ट-३
भारत के प्रमुख टीवी प्रसारणकर्ता
कंपनी कुल राजस्व (२००४-०५) अन्य मीडिया कारोबार
(करोड रुपए में)
जी टेलीफिल्मस १३६० केबल, समाचारपत्र, डीटीएच
स्टार इंडिया १३०० केबल, डीटीएच
सोनी इंटरटेन्मेंट टीवी १००० फिल्म, संगी
दूरदर्शन ६६५ रेडियो, डीटीएच
सन टीवी ३०० केबल, एमएम रेडियो, समाचारपत्र
चार्ट-४
विभिन्न माध्यमों पर किया जानेवाला कुल विज्ञापन व्यय
(करोड़ रुपयों में)
वर्ष टीवी प्रेस रेडियो सिनेमा आउटडोर इंटरनेट कुल व्यय
२००० ४४३९ ४३१६ १४६ ७० ६४० - ९६११
२००१ ४५६४ ४३२५ १७६ ७९ ६४० ३० ९८१४
२००२ ४७१७ ४४२४ २११ ७९ ४३९.२ ५० ९९२०
२००३ ५०९४ ४६८९ २२७ ८२ ५४८.८ ५४ १०६९४.८
२००४ ५८०२ ६०३४.८ २७६.९ ९८.४ ६८६ ७०.२ १२९६८.३
२००५ ६७४६ ७९२९ ३६० ११६ ९९४ १२२.९ १६२६७.८
स्रोत : वनिता कोहली खांडेकर, वही
चार्ट-५
कुल विज्ञापन व्यय में विभिन्न माध्यमों की हिस्सेदारी
(करोड़ रुपयों में)
वर्ष टीवी प्रेस रेडियो सिनेमा आउटडोर इंटरनेट कुल
२००० ४६ ४५ २ १ ७ ० १००
२००१ ४७ ४४ २ १ ७ ० १००
२००२ ४८ ४५ २ १ ४ १ १००
२००३ ४८ ४४ २ १ ५ १ १००
२००४ ४५ ४७ २ १ ५ १ १००
२००५ ४१ ४९ २ १ ६ १ १००
स्रोत: वनिता कोहली खांडेकर, वही
स्टिंग बनाम कलम और स्याही की पारंपरिक खोजी पत्रकारिता
कहने की जरूरत नहीं है कि छुपे कैमरों की अति सक्रियता ने संसद से लेकर छोटे-बड़े सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को टेलीविजन के पर्दे पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साल गुजरते-गुजरते पूरे देश ने 'ऑपरेशन दुर्योधन` और 'ऑपरेशन चक्रव्यूह` के जरिए इस जानी-पहचानी हकीकत को खुद अपनी आंखों से देखा कि देश की सबसे बड़ी पंचायत के माननीय सदस्य न सिर्फ अपने सबसे बुनियादी काम सवाल पूछने के बदले में पैसे वसूल रहे हैं बल्कि सांसद निधि से होने वाले ''विकास`` के कामों के लिए खुलेआम कमीशन खा रहे हैं। आप कह सकते हैं कि इसमें नई बात क्या है ?
नई बात यह है कि छुपे हुए कैमरे के कारण यह संभव हुआ है कि अब तक जो पर्दे के पीछे खुलेआम चलता था और जिसके बारे में हर खासोआम को पता था, लेकिन जिसे साबित करना मुश्किल था, वह सजीव रूप में सारी दुनिया के सामने आ गया है। अब उस गलाजत को झुठलाना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर हो गया है। कैमरा तकनीक में विकास के साथ सबकुछ साफ-साफ दिखाना आसान हो गया है। हालांकि स्टिंग ऑपरेशनों में अभी तक इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर कोई बड़ी मछली नहीं फंसी है लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि छुपा हुआ कैमरा भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ताकतवर हथियार के रूप में उभरकर सामने आया है। समाचार चैनलों ने इस हथियार का जमकर इस्तेमाल भी कर रहे हैं।
लेकिन इसके साथ ही स्टिंग ऑपरेशनों की नैतिकता, वैधता, प्रासंगिकता और उसके औचित्य पर गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं। छुपे हुए कैमरे की पत्रकारिता पर सवाल उठाने वालों में दोनों तरह के लोग हैं। पहले खेमे में वे राजनेता, अफसर और प्रभावशाली लोग हैं जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से स्टिंग ऑपरेशनों की मार झेल रहे हैं। दूसरे खेमे में वे लोग हैं जो पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों के आधार पर स्टिंग ऑपरेशनों की नैतिकता और वैधता पर सवाल उठा रहे हैं। दोनों ही खेमों के कई तर्क समान हैं हालांकि सवाल उठाने के पीछे के मकसद में फर्क है।
स्टिंग ऑपरेशनों के खिलाफ सबसे बड़ी आपत्ति यह उठाई जा रही है कि यह किसी व्यक्ति की निजी गोपनीयता या एकांत का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि छुपे हुए कैमरे के जरिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के बीच के कार्य व्यापार को रिकार्ड करना और उसे सबके सामने पेश करना न सिर्फ अनैतिक और अवैध है बल्कि भरोसे को तोड़ना भी है। कानूनन सभी को अपनी गोपनीयता या एकांत की रक्षा का अधिकार है और छुपा हुआ कैमरा इसी निजी एकांत को भंग करता है। हर व्यक्ति को अपने तरीके से निजी जीवन जीने का अधिकार है और उसमें किसी भी दूसरे व्यक्ति को यानी छुपे हुए कैमरे को घुसपैठ करने का कोई हक नहीं है। यह तर्क बहुत हद तक जायज है।
दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि स्टिंग ऑपरेशनों में मूलत: किसी व्यक्ति को लालच देकर फंसाया जाता है जो कि किसी भी तरह से उचित या नैतिक नहीं माना जा सकता है। यह तर्क देने वालों का कहना है कि जब किसी व्यक्ति को पैसे या स्त्री शरीर जैसा कोई प्रस्ताव दिया जाता है तो उसे ठुकरा पाना बहुत कम लोगों के लिए संभव है। उनकी दलील है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के किसी प्रस्ताव के लालच में आ जाने वाला व्यक्ति मूलत: भ्रष्ट या बदचलन है।
कहने की जरूरत नहीं है कि इन दोनों ही तर्कों में खासकर पहले तर्क में एक हद तक दम है। स्टिंग ऑपरेशनों के साथ दोनों ही बातें काफी हद तक सही हैं कि उसमें व्यक्ति की निजी गोपनीयता या एकांत का उल्लंघन होता है और साथ ही उसे लालच देकर फंसाया जाता है। लेकिन जो लोग इन दोनों तर्कों के आधार पर भ्रष्ट और अपराधी राजनेताओं और अफसरों को बचाने की कोशिश और स्टिंग ऑपरेशनों पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं वे दरअसल, गाड़ी को घोड़े के आगे रखने की कोशिश कर रहे हैं। यह ऐसे ही है जैसे भ्रष्ट, अपराधी और दुष्ट लोग कुरान की आयतें पढ़ रहें हों या फंस जानेपर नीति शास्त्रों की दुहाइयां दे रहे हों।
हैरत की बात यह है कि लालच देकर फसाए जाने का आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो सार्वजनिक जिम्मेदारी के पदों पर बैठे हैं और जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे लोभ और लालच से दूर रहकर काम करेंगे। मजे की बात यह है कि वे इसकी शपथ भी लेते हैं। ऐसे मामले अपवाद ही होंगे जिसमें कोई राजनेता या अफसर भ्रष्ट न होते हुए भी तात्कालिक लालच या झांसे में फस जाए। इसके उलट इस बात की संभावना अधिक है कि वह आदती तौर पर भ्रष्ट हो। इसी तरह से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों की निजी जीवन में हस्तक्षेप की शिकायत में बहुत दम नहीं है। अगर उनके निजी जीवन के कार्य व्यापार का संबंध उनके सार्वजनिक जीवन से जुड़ता है तो समाज को न सिर्फ उसकी जांच-पड़ताल का हक है बल्कि वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकता है।
यह सही है कि छुपे हुए कैमरे की पत्रकारिता की गहरी सीमाएं हैं। यह भी सही है कि 50 फीसदी से ज्यादा स्टिंग ऑपरेशनों का उद्देश्य सिर्फ सनसनी पैदा करना है। खासकर मशहूर और ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के निजी जीवन और उनके बेडरूम में ताक-झांक के पीछे मकसद दर्शकों को छिछले स्तर का परपीड़क सुख और रतिक आनंद देना होता है। छुपे हुए कैमरे के जरिए किसी मशहूर और प्रभावशाली व्यक्ति के वैध-अवैध संबंधों और सेक्स लाइफ को दिखाने से आखिर कौन सा और किसका सार्वजनिक हित सधता है ? जबतक किसी के अवैध संबंधों की छाया सार्वजनिक हित के मुद्दों और नीति निर्णयों पर न पड़ रही हो तो उससे किसी और को क्यों मतलब होना चाहिए ? दोहराने की जरूरत नहीं है कि दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति के आधार पर बनने वाले सेक्स संबंधों में कुछ भी गैर कानूनी नहीं हैं और किसी को भी इस तरह के मामलों में नैतिक पुलिसिंग का अधिकार नहीं है, बशर्ते उस संबंध का असर किसी सार्वजनिक हित के सवाल पर न पड़ रहा हो।
ध्यान रहे कि पत्रकारिता का संबंध सार्वजनिक हित (पब्लिक गुड) से है और वही एक मात्र कसौटी है जिसके आधार पर स्टिंग पत्रकारिता के औचित्य, नैतिकता और प्रासंगिकता को कसा जा सकता है। अगर किसी मामले में सार्वजनिक हित जुड़ा हुआ हो और सच्चाई को सामने लाने के लिए पत्रकार के पास और कोई चारा न हो तो छुपे हुए कैमरे के इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जैसा कि हर ताकतवर और मारक हथियार के साथ होता है, छुपे कैमरे का इस्तेमाल सबसे आखिरी उपाय के रूप में ही करना चाहिए। छोटे-मोटे अपराधियों के पर्दाफाश के लिए इस हथियार का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अन्यथा इससे इसका प्रभाव कम होने लगेगा और धीरे-धीरे यह मजाक का विषय बन सकता है।
लेकिन अगर इसका सावधानी से और काफी सोच समझकर इस्तेमाल किया जाए तो यह सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खुलासे का एक कारगर औजार बन सकता है। जो लोग भी स्टिंग पत्रकारिता पर रोक लगाने या उसे अमरीका की तरह कानूनी प्रक्रियाओं के तहत लाने की मांग कर रहे हैं उनकी मांग का विरोध होना चाहिए। यह ठीक है कि स्टिंग पत्रकारिता के नाम पर काफी गड़बड़िया भी हुई हैं और संभव है कि आगे भी हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन कुछ गड़बड़ियों को रोकने के नाम पर उसके जरिए जो कुछ अच्छे काम यानि शीर्ष स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हो पा रहा है, उस संभावना की ही हत्या कर दी जाए।
तथ्य यह है कि स्टिंग पत्रकारिता के नाम पर बेडरूम में घुसने की जो शुरूआती कोशिशें हुईं, उसका जिस तरह से प्रतिवाद हुआ और उस पर जिस तरह से मीडिया के अंदर बहस चली, उसके बाद उस प्रवृत्ति को एक विचलन मानते हुए खारिज कर दिया गया। यही कारण है कि इंडिया टीवी मार्का स्टिंग पत्रकारिता को कभी जन स्वीकृति नहीं मिली और वह स्टिंग पत्रकारिता की मुख्यधारा नहीं बन सकी है। इसके उलट स्टिंग पत्रकारिता का वह रूप जिसमें शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार को सामने लाने की कोशिश की गई है, उसे एक सामाजिक स्वीकृति मिली है। आश्चर्य नहीं कि उसके दबाव में आपरेशन दुर्योधन के बाद संसद ने अपने दागी सदस्यों को निकाल बाहर फेंकने में बिलकुल देर नहीं लगाई।
लेकिन इस सब के बावजूद यह कहना पड़ेगा कि स्टिंग पत्रकारिता कलम, स्याही, खोजबीन और प्रतिबद्धता की उस खोजी पत्रकारिता की जगह कभी नहीं ले सकती है जिसने दुनियाभर में सरकारों को हिला देने वाली खबरों का पर्दाफाश किया। यह याद रखना चाहिए कि चाहे वह वाटरगेट कांड रहा हो या अपने देश में बोफर्स कांड या फिर ऐसे ही अनेकों घोटाले या अनियमितताएं उनका खुलासा कभी भी छुपे हुए कैमरे से नहीं बल्कि कलम और विश्वसनीय सूत्रों की पारम्परिक पत्रकारिता ने ही किया। यह कैमरे की सीमा है कि वह छवियों तक सीमित है। लेकिन वास्तविक खोजी पत्रकारिता में सैकड़ों सरकारी फाइलों को खंगालने से लेकर उनके बीच के तारों को जोड़ने और उनकी व्याख्या का लंबा सिलसिला होता है।
यह काम कैमरा नहीं कर सकता। यह एक प्रतिबद्ध पत्रकार ही कर सकता है। एक खोजी पत्रकार में जिन क्षमताओं की जरूरत है, वह कैमरे में हो ही नहीं सकती है। कैमरा एक माध्यम भर है, वैसे ही जैसे कलम और स्याही। उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है, यह सबसे अहम मसला है। एक खोजी पत्रकार मूलत: तथ्यों की छानबीन, उनका विश्लेषण और कानूनी प्रक्रियाओं से उनके अंतर्संबंधों की व्याख्या करता है। लेकिन छवियों तक सीमित स्टिंग पत्रकारिता उन प्रक्रियाओं और तथ्यों के बीच के अंतर्संबंधों की अनदेखी कर देती है जो वास्तव में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को फलने-फूलने का मौका देती है।
इसका नतीजा यह होता है कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की सांस्थानिक प्रक्रिया को निशाना बनाने के बजाय कुछ छोटे-बड़े चेहरों को ही भ्रष्टाचार का पर्याय मान लिया जाता है। लेकिन कुछ सांसदों, अफसरों और कुछ प्रभावशाली लोगों को खलनायक बना देने मात्र से भ्रष्टाचार की सांस्थानिक जड़ों को कोई नुकसान नहीं होता है। उल्टे ऐसा लगता है जैसे पूरी व्यवस्था तो बिल्कुल पाक-साफ है लेकिन कुछ गंदी मछलियां इस पवित्र तालाब में चली आईं हैं। इससे वह भ्रष्ट व्यवस्था निशाने पर आने से बच जाती है।
दरअसल, छुपे हुए कैमरे की यह सबसे बड़ी सीमा है कि वह शीर्ष स्तर पर व्याप्त बड़े भ्रष्टाचार और अनियमितताओं और उनके पीछे छिपी प्रक्रियाओं को कभी सामने नहीं ला सकता है। और अब तो ऐसी भी तकनीक आ गई है कि उसे किसी खास कमरे या मकान में लगा देने के बाद खुफिया कैमरे उस खास इलाके में काम नहीं करेंगे। उस समय क्या होगा ? तकनीक की यही सीमा है। एक तकनीक को दूसरी तकनीक काट सकती है।
इसलिए पारंपरिक खोजी पत्रकारिता का कोई विकल्प नहीं है, स्टिंग पत्रकारिता भी नहीं। अफसोस की बात यह है कि जिस दौर में स्टिंग पत्रकारिता की तूती बोल रही है, उस दौर में पारंपरिक खोजी पत्रकारिता नेपथ्य में चली गई है।
हिंदी पत्रकारिता का 'रविवार` काल
आपातकाल के पहले हिंदी क्षेत्र के पाठकों की बौद्धिक आवाज और गंभीर पत्रकारिता की प्रतिनिधि 'दिनमान` की आपातकाल के दौरान चुप्पी ने उसकी साख को काफी कमजोर कर दिया और उसके साथ ही 'दिनमान` अस्त हो गया। बदले हुए समय और माहौल में पाठकों को एक नए अखबार या पत्रिका की तलाश थी जो आपातकाल की सच्चाइयों को सामने ले आ सकता और सत्ता में आई जनता पार्टी के दिग्गजों की तू-तू-मैं-मैं की अंदरूनी कहानियां बता सकता। यह जरूरत पूरी की 'रविवार` ने। यह संयोग ही था कि एक जमाने में जिस कलकत्ता में हिंदी पत्रकारिता का जन्म हुआ था, वहीं से आनंद बाजार समूह ने 1977 में साप्ताहिक पत्रिका 'रविवार` की शुरूआत की।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपने युवा संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में 'रविवार` ने जल्दी ही 'दिनमान` के पराभव से पैदा हुए शून्य को भर दिया। 'रविवार` कई मामलों में बुनियादी तौर पर 'दिनमान` से भिन्न था। उसने एक नए किस्म की पत्रकारिता शुरू की। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उसने 'दिनमान` से उलट फील्ड रिपोर्टिंग पर जोर दिया। वह विचार और टिप्पणियों से अधिक घटनास्थल से की गई रिपोर्टिंग की पत्रिका थी। उसमें घटनाओं के विश्लेषण के बजाय घटनाओं के पीछे की अंतर्कथा ज्यादा होती थी। हिंदी पत्रकारिता में पहली बार 'रविवार` ने राजनीतिक जोड़-तोड़, उठा-पटक और राजनेताओं के अंत:पुर की कहानियों से लेकर देश के दूर-दराज के इलाकों में सामंती और पुलिसिया जुल्म, मुठभेड हत्याओं, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की बेखौफ रिर्पोटें छापीं।
पाठकों ने 'रविवार` को हाथों-हाथ लिया। हालांकि यह केवल 'रविवार` तक सीमित परिघटना नहीं थी और इस नई पत्रकारिता की छाप धीरे-धीरे हिंदी के अधिकांश अखबारों और पत्रिकाओं पर दिखने लगी। लेकिन निश्चय ही इसकी शुरूआत 'रविवार` और अंग्रेजी में 'संडे` ने की थी। संयोग से यह दौर राजनीतिक रूप से भी बहुत उथल-पुथल का था। अखबारों और पत्रिकाओं के पास छापने के लिए बहुत कुछ था और राजनीतिक रूप से जागरूक पाठकों में पढ़ने की गजब की भूख थी। आश्चर्य नहीं कि 1976 के मध्य से लेकर 1979 के बीच सिर्फ तीन वर्षों में समाचारपत्रों की खपत में 40 फीसदी और पत्रिकाओं की बिक्री में 34 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
पत्रिकाओं में 'रविवार` ने सबको पीछे छोड़ दिया। इसके बाद अगले एक दशक तक 'रविवार` जनमानस पर छाया रहा। यह हिंदी पत्रकारिता का 'रविवार` काल था। लेकिन यह अफसोस की बात है कि उस दौर की हिंदी पत्रकारिता और खासकर 'रविवार` के योगदान के बारे में न तो कोई गंभीर और आलोचनात्मक शोध अध्ययन सामने आया है और न ही उस दौर की पत्रकारिता से जुड़े संपादको और पत्रकारों के संस्मरण और लेखों के पर्याप्त संग्रह आए हैं जिसके आधार पर उसे समझने में आसानी हो। संतोष भारतीय की पुस्तक 'पत्रकारिता : नया दौर, नए प्रतिमान` इस कमी को एक हद तक पूरा करने की कोशिश करती है। संतोष भारतीय 'रविवार` की युवा टीम के एक सक्रिय रिपोर्टर थे, जो बजरिए जयप्रकाश आंदोलन पत्रकारिता में आए थे।
इस पुस्तक में उन्होंने 'रविवार` के लिए रिपोर्टिंग करने के दौरान हुए अनुभवों को समेटने की कोशिश की है। यह पुस्तक में 1979 से 1985 के बीच संतोष भारतीय द्वारा 'रविवार` के लिए लिखी गई कोई 30 रिपोर्टों को भी शामिल किया गया है। उनमें संतोष भारतीय की फील्ड रिपोर्टिंग की मेहनत और घटनाओं को उनकी समग्रता में देखने की दृष्टि साफ दिखाई पड़ती है। इन रिपोर्टों में आपको उस दौर की राजनीति और समाज की गहरी पड़ताल दिखेगी। चाहे वह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र की कारगुजारियां हों या फिर चंबल इलाके में डकैतों की समस्या। उनकी रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह न सिर्फ घटनास्थल पर जाते हैं बल्कि हर मामले में स्पष्ट तौर पर सही और गलत, न्याय और अन्याय के बीच फर्क करते हुए सही और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं।
दरअसल, पत्रकारों को निष्पक्षता और संतुलन की आड में जिस तरह से 'तुम भी सही, तुम भी सही` की नपुंसक और त्रिशंकु पत्रकारिता के लिए बाध्य किया जाता है, 'रविवार` की पत्रकारिता उससे अलग थी।
संतोष भारतीय लिखते हैं, 'रविवार का मानना था कि सच्चाई कभी दो पक्षों के साथ खड़ी नहीं हो सकती, इसलिए सच्चाई जिस पक्ष के साथ हो, रिपोर्टर को उसका साथ देना चाहिए और रिपोर्ट के पक्ष में उसे खड़ा होना चाहिए।` संतोष भारतीय की रिपोर्टिंग की एक और खास पहचान उसकी कथात्मकता है। वे बहुत सरल और आम बोलचाल की भाषा में और सीधे-सीधे घटनाक्रम को कहानी की तरह बताते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि उस दौर में ये रिपोर्टें खूब पढ़ी गईं। खासकर डाकू फूलनदेवी, विक्रम मल्लाह, मुस्तकीम, छविराम आदि की कहानियों में अपराध कथाओं की लोकप्रिय शैली से अलग आपको उस समय की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का भी पता चलता है।
लेकिन संतोष भारतीय की खुद की रिपोर्टों के अलावा इस पुस्तक की खास बात यह है कि उन्होंने 'रविवार` कैसे 'रविवार` बना और उसकी ताकत क्या थी, इसकी भी विस्तार से चर्चा की है। यह पुस्तक उस दौर की पत्रकारिता में आए बदलाव और नए प्रयोगों में 'रविवार` के संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह और 'संडे` के संपादक एमजे अकबर के योगदान को भी सामने ले आती है। इसके साथ ही संतोष भारतीय ने अपने लंबे पत्रकारीय अनुभव के आधार पर पुस्तक में संपादक, कार्यकारी संपादक, डेस्क पर काम करने वाले उप संपादकों और संवाददाताओं के लिए जरूरी गुणों और उनके दायित्व की भी चर्चा की है जो पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए भी काफी उपयोगी है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि 'रविवार` हिंदी पत्रकारिता में एक मील का पत्थर है। 'रविवार` में बहुतेरी खूबियां थीं लेकिन संतोष भारतीय से यह भी अपेक्षा थी कि वे हिंदी पत्रकारिता के 'रविवार` काल की उन कमजोरियों को भी बेबाकी से सामने रखेंगे, जिनमें से कुछ आज हिंदी पत्रकारिता में खूब फल-फूल रही हैं। रिपोर्टों को सनसनीखेज बनाने या सतही लेकिन बिकाऊ विषयों को प्रमुखता देने में 'रविवार` की भूमिका की पडताल होना अभी बाकी है। यही नहीं, राजनीतिक रिपोर्टिंग को राजनेताओं की जोड़-तोड़, पर्दे के पीछे के षडयंत्र और अन्त:पुर की कहानियों में सीमित करने का 'श्रेय` भी 'रविवार` को जाता है। पाठकों के 'लोएस्ट कॉमन डिनोमिनेटर` को सहलाने और उनकी राजनीतिक जागरूकता को बाधित करने की कुछ जिम्मेदारी 'रविवार` को लेनी पड़ेगी। उम्मीद करना चाहिए कि इस पुस्तक के बाद हिंदी पत्रकारिता के 'रविवार` काल में अध्येताओं और पत्रकारों की आलोचनात्मक रूचि और बढ़ेगी।
'पत्रकारिता : नया दौर, नए प्रतिमान'
संतोष भारतीय
राधा कृष्ण प्रकाशन
नागरिक पत्रकारिता की दस्तक से उठे सवाल
दुनियाभर के मीडिया में इन दिनों नागरिक पत्रकारिता यानी सिटिजन जर्नलिज्म को लेकर गरमागरम बहस छिड़ी हुई है। हालांकि भारतीय मीडिया के लिए यह शब्द अपेक्षाकृत नया है लेकिन उसे लेकर अब मुख्यधारा के मीडिया में भी हलचल शुरू हो गई है। कुछ महीनों पहले जब वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने नए चैनल सीएनएन-आईबीएन की शुरूआत की तो उसके प्रचार होर्डिंगों में प्रमुख थीम नागरिक पत्रकारिता को ही बनाया गया था। इसमें आम नागरिकों का आह्वान किया गया था कि वे 'सिटिजन जर्नलिस्ट` (नागरिक पत्रकार) बनने के लिए आगे आएं। सीएनएन-आईबीएन की वेबसाइट पर भी लोगों को सिटिजन जर्नलिस्ट बनने के लिए आमंत्रित किया गया है। चैनल का कहना है कि उसके दर्शकों या आम लोगों में से किसी के पास अगर कोई महत्वपूर्ण खबर और उसकी वीडियो क्लिप हो तो वे उसे चैनल को भेज सकते हैं।
सीएनएन-आईबीएन अपने सिटिजन जर्नलिस्ट अभियान के तहत समय-समय पर दर्शकों से मानसून, आरक्षण विरोधी आंदोलन और ऐसे ही सामयिक मुद्दों पर वीडियो क्लिप/फुटेज भेजने की अपील करता रहता है। उसकी अपील पर लोग उसे खबरें और वीडियो/फिल्म भेज भी रहे हैं और उसमें से कुछ खबरें और वीडियो क्लिप चैनल पर दिखाए भी जा रहे हैं। लेकिन अभी तक इक्का-दुक्का मामलों को छोड़कर सिटिजन जर्नलिस्टों की ओर से कोई उल्लेखनीय खबर या फुटेज नहीं आई है। इसके बावजूद चैनल ने नागरिक पत्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए इस साल सर्वश्रेष्ठ नागरिक पत्रकार को पुरस्कार देने की घोषणा भी की है। उसे उम्मीद है कि वह अपने इस अभियान के जरिये बड़ी संख्या में दर्शको को अपने साथ जोड़ पाएगा। यह भी संभव है कि उसे भविष्य में अपने नागरिक पत्रकारों से कोई बड़ी खबर या फुटेज भी मिल जाए जो चैनल की व्यावसायिक सफलता के लिए जरूरी है।
सीएनएन-आईबीएन की देखा-देखी कुछ और समाचार चैनलों और अखबारों ने अपने दर्शकों और पाठकों को खबरें और वीडियो क्लिप भेजने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है। इसका असर भी हुआ है और इन चैनलों और अखबारों में दर्शकों और पाठकों की ओर से भेजी गई खबरों और वीडियो क्लिप को अक्सर दिखाया भी जा रहा है। हालांकि अभी यह शुरूआत है और उसके विभिन्न स्याह-सफेद पहलुओं पर एक व्यापक चर्चा होना बाकी है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता ने भारत में भी दस्तक दे दी है। अभी हम चैनलो पर नागरिक पत्रकारिता का सिर्फ एक रूप देख रहे हैं लेकिन अगर दुनिया के और देशों खासकर विकसित देशों के अनुभवों को ध्यान में रखें तो यह स्पष्ट है कि आनेवाले दिनों में यह विचार और जोर पकड़ेगा।
नागरिक पत्रकारिता : एक विचार जिसका समय आ गया है
दरअसल, नागरिक पत्रकारिता वह विचार है जिसका समय आ गया है। मुख्यधारा के कई समाचार संगठनों और पत्रकारो की ओर से व्यक्त किए जा रहे संदेहों और उपेक्षा के भाव के बावजूद अब उसे रोकना संभव नहीं रह गया है। इसकी कई वजहे हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता भारत में उस समय दस्तक दे रही है जब लंबे संघर्ष के बाद आम नागरिकों को सूचना का अधिकार मिला है। सूचना के अधिकार ने हर नागरिक को एक पत्रकार के अधिकार, सतर्कता और तत्परता से लैस कर दिया है। जाहिर है अब सूचनाओं पर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार नहीं रह गया है। पत्रकारों के साथ-साथ अब आम नागरिकों को भी सूचना मांगने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
यही नहीं, देश भर में दर्जनों नागरिक संगठन लोगों को सूचना के अधिकार के इस्तेमाल के लिए तैयार और प्रोत्साहित कर रहे हैं। लोग सार्वजनिक से लेकर निजी मामलों तक में सरकार और उसके विभिन्न संगठनों से सूचनाएं मांग रहे हैं। इस तरह अब सूचनाएं सिर्फ पत्रकारों के पास ही नहीं बल्कि आम लोगों के पास भी हैं। कई मामलों में तो पत्रकारों से कहीं ज्यादा सूचनाएं आम लोगों के पास हैं। उनमें से कई सूचनाएं सार्वजनिक महत्व की हैं। उन सूचनाओं का हजारों-लाखों लोगों से सीधा सरोकार है। ये सूचनाएं समाचार की किसी भी परिभाषा और कसौटी पर खरी उतरती है। कोई भी समाचार संगठन उन्हें नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। अगर वह उन्हें नजरअंदाज करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता को धक्का लगता है बल्कि वह अपने प्रतियोगी समाचार संगठन को उस सूचना के इस्तेमाल का अवसर मुहैया करा रहा है।
कहने की जरूरत नहीं है कि इस प्रक्रिया में हजारों नागरिक भविष्य के पत्रकार की भूमिका के लिए तैयार हो रहे हैं। अगर पत्रकारिता का अर्थ सूचनाओं का संग्रह, उनकी प्रोसेसिंग और किसी जनमाध्यम के जरिए व्यापक ऑडियंस तक उसकी प्रस्तुति है तो सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सूचनाएं हासिल कर रहे नागरिक भी पत्रकार की भूमिका के लिए तैयार हो रहे है। इन नागरिक पत्रकारों की खूबी यह है कि वे न सिर्फ मुख्यधारा के समाचार मीडिया के पाठक, दर्शक और श्रोता (ऑडियंस) हैं बल्कि वे पुराने दौर के निष्क्रिय ऑडियंस की तुलना में अपने अधिकारों को लेकर सक्रिय ऑडियंस हैं। वे खुद को सिर्फ सूचनाएं हासिल करने तक सीमित रखने को तैयार नहीं हैं। वे उन सूचनाओं का हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।
लोकतंत्र में यह तभी संभव है जब इन सूचनाओं को एक बड़ा ऑडियंस मिले। इसके बिना सार्वजनिक जीवन और कामकाज में जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व तय करने के लिए हासिल सूचनाओं का प्रभावी उपयोग नहीं किया जा सकता है। आखिर सार्वजनिक पदो पर बैठे अफसरों और कार्यालयों में सूचना के अधिकार का दबाव इसीलिए बना है क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि प्राप्त सूचनाओं का लोग किस तरह से और क्या इस्तेमाल करेगें। उन्हें इस बात का भय होता है कि जब ये सूचनाएं सार्वजनिक हो जाएंगी तो लोग उन सूचनाओं पर प्रतिक्रिया करेंगे। इससे एक जनमत और जनदबाव पैदा हो सकता है और सरकार को जवाब देने और कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
लेकिन यह तब तक संभव नहीं है जब तक ये सूचनाएं एक बड़े जनसमुदाय तक न पहुंचे। जाहिर है कि उन सूचनाओं को व्यापक जनता तक पहुंचाने के लिए ऐसे जनमाध्यमों की जरूरत है जिनकी पहुंच एक बड़े ऑडियंस तक है। मुख्यधारा का समाचार मीडिया ऐसा ही एक प्लेटफार्म है जो सूचना के अधिकार आंदोलन से पैदा हो रहे नागरिक पत्रकारों को मौका दे सकता है। इसलिए नागरिकों को मुख्यधारा के मीडिया की जरूरत है ताकि वे सूचना के अधिकार का प्रभावी इस्तेमाल कर सके। स्वयं समाचार माध्यमों के लिए भी यह एक बेहतरीन अवसर है जिसका इस्तेमाल कर वे अपने ऑडियंस और साथ ही साथ अपने कवरेज का भी विस्तार कर सकते है।
ऐसा करके वे काफी हद तक उस ''लोकतांत्रिक घाटे`` की भी भरपाई कर सकते हैं जो पिछले कुछ वर्षों में मुख्यधारा के समाचार संगठनों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। दरअसल, मुख्यधारा के मीडिया में आम नागरिकों के सरोकारों और चिंताओं को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। मुख्यधारा के मीडिया का जैसे-जैसे क्रिकेट, क्राइम, सिनेमा और सेलीब्रिटी यानि फोर सीज के प्रति ऑब्सेशन बढ़ता गया है, वैसे-वैसे मीडिया में आम नागरिकों खासकर हाशिए पर पड़े लोगों की समस्याओं, जरूरतों और चिंताओंं के लिए जगह और सहानुभूति कम होती गई है। इस कारण मुख्यधारा के मीडिया और आम नागरिकों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है। यह एक तरह का लोकतांत्रिक घाटा है जिसने समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता को भी काफी नुकसान पहुंचाया है।
इस कारण मुख्यधारा के समाचार माध्यमों के पास नागरिक पत्रकारिता को जगह देकर अपनी बची-खुची विश्वसनीयता को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बचा है। इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में मुख्यधारा के मीडिया की अपरिहार्यता लगातार कम हुई है। मुख्यधारा के मीडिया पर जैसे-जैसे कारपोरेट हितों और प्रभुत्वशाली वर्गों का वर्चस्व बढ़ा है, आम लोगों से उसकी दूरी बढ़ी है, वैसे-वैसे नागरिकों और उनके संगठनों में भी वैकल्पिक मीडिया मंचों की तलाश तेज हुई है। जाहिर है कि नागरिक पत्रकारिता भी एक ऐसा ही वैकल्पिक मीडिया मंच उपलब्ध कराती है। इसलिए नागरिक पत्रकारिता की जमीन नीचे से भी तैयार हो रही है।
नागरिक पत्रकारिता के विचार को अगर सूचना के अधिकार ने ताकत और गति दी है तो नए मीडिया और संचार माध्यमों ने उसे आसान बना दिया है। निश्चय ही, आज से कुछ वर्षों पहले तक वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करना जितना श्रमसाध्य था और उसके लिए जितनी पूंजी और संसाधनों की जरूरत थी, नए माध्यमों (खासकर इंटरनेट) ने उसे काफी हद तक सरल, सहज और कम खर्चीला बना दिया है। आज आप कुछ हजार रुपयों में अपनी एक वेबसाइट शुरू कर और चला सकते हैं। अगर यह भी संभव न हो तो आप बिना किसी खर्च के अपना एक ब्लॉग शुरू कर सकते हैं। दुनियाभर में इंटरनेट ने वेबसाइट, ब्लॉग और अन्य दूसरे तरीकों से लाखों नागरिकों को अपनी बात कहने और एक-दूसरे से संपर्क और संवाद करने का मौका दिया है। सच तो यह है कि नागरिक पत्रकारिता का वास्तविक और प्रभावी रूप नए माध्यमों के जरिए ही सामने आया है।
दरअसल, इंटरनेट पर व्यक्तियों से लेकर नागरिक समूहों तक की सक्रिय उपस्थिति ने एक तरह की छोटी-छोटी लाखों क्रांतियां पैदा कर दी हैं। कुछ इस हद तक कि मुख्यधारा के माध्यमों को भी नोटिस लेना पड़ रहा है और उसे अपने अंदर जगह देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सीएनएन-आईबीएन इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। दुनिया के कई देशों विशेषकर विकसित देशों में मुख्यधारा के मीडिया को अपनी साख बचाने के लिए नागरिक पत्रकारिता को अपने मंच पर जगह देनी पड़ रही है। यह ठीक है कि भारत में अभी नए माध्यमों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है और इन माध्यमों पर काम करने के लिए जिस स्तर की तकनीकी दक्षता और कौशल की जरूरत है, वह बहुत कम नागरिकों के पास मौजूद है। लेकिन भारत में सूचना तकनीक और नए माध्यमों के प्रसार और लोगों में उसे अंगीकार करने की गति इतनी तेज है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसे लोगों की तादाद काफी बढ़ जाएगी जो उसे सहजता से इस्तेमाल कर सकेंगे।
इसके अलावा आज मुख्यधारा के अलग-अलग माध्यमों (जैसे प्रिंट बनाम टेलीविजन, इंटरनेट बनाम टीवी और प्रिंट, टीवी बनाम सिनेमा आदि) और मीडिया संगठनों के बीच जैसे-जैसे आपसी प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, वैसे-वैसे उनपर पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं यानि ऑडियंस को अपने साथ जोड़ने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। यह तब तक संभव नहीं है, जब तक मीडिया संगठन अपने ऑडियंस को अपना साझेदार नहीं बनाते हैं। अभी तक मीडिया संगठनों में 'संपादक के नाम पत्र`, 'फीड बैक`, 'एसएमएस` जैसे सीमित और शायद अपनी उपयोगिता खो चुके मंचों के अलावा ऐसा कोई माध्यम या प्लेटफार्म नहीं है जिससे आम लोग अपने विचार, मुद्दे, सरोकार और चिंताएं साझा कर सकें। मुख्यधारा के मीडिया ने एक तरह से अपने ऑडियंस को अभी तक 'निष्क्रिय उपभोक्ता` बनाकर रखा हुआ है।
लेकिन नए माध्यमों ने ऑडियंस को सक्रिय बनाया है, उन्हें आवाज दी है, उनके बीच अंतर्क्रिया को बढ़ावा दिया है और उन्हें एकजुट होने का अवसर दिया है। ऑडियंस के बीच आपसी संवाद बढ़ा है और उनका एक तरह से सशक्तिकरण भी हुआ है। नए माध्यमों ने उन्हें अपनी बात कहने की जितनी आजादी दी है, वह उन्हें पारंपरिक जनमाध्यमों में कभी उपलब्ध नहीं थी। आश्चर्य की बात नहीं है कि हाल के वर्षों में नए माध्यमों की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी है। खासकर 15 से 35 वर्ष के युवाओं को नए माध्यमों ने अभिव्यक्ति के व्यापक मौके और विस्तृत क्षितिज प्रदान किए हैं और उनकी गतिविधियों का मुख्य प्लेटफार्म नए माध्यम बन गए हैं। इसी प्रक्रिया में वे नागरिक पत्रकार भी पैदा हो रहे हैं जो सांस्थानिक पत्रकारों और मुख्यधारा के मीडिया के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं। अपनी बात कहने के लिए अब वे मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर नहीं हैं। उनके पास अनेकों विकल्प और माध्यम मौजूद हैं। मुख्यधारा के मीडिया के लिए यह एक खतरे की घंटी है।
क्या है नागरिक पत्रकारिता ?
सवाल उठता है कि आखिर नागरिक पत्रकारिता क्या है ? क्या यह सिर्फ इंटरनेट, ब्लॉग्स आदि तक सीमित है या उसकी जद्दोजहद सिर्फ मुख्यधारा के मीडिया में अपने लिए जगह हासिल करने तक सीमित है ? क्या नागरिक पत्रकारिता की भूमिका किसी टीवी चैनल को कोई वीडियो फुटेज भेज देने तक सीमित है या यह उससे आगे भी जाती है ? कहने की जरूरत नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता को लेकर काफी भ्रम हैं और बहुतेरे मीडिया विश्लेषक उसे सार्वजनिक मामलों या जनसुविधाओं की पत्रकारिता (पब्लिक अफेयर्स या सिविक जर्नलिज्म) का ही एक रूप या उसका विस्तार मानते हैं। मुख्यधारा के मीडिया में भी नागरिक पत्रकारिता को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं हैं जिनमें से कुछ वाजिब और कुछ स्पष्टता न होने के कारण गैर वाजिब शिकायतें हैं।
दरअसल, नागरिक पत्रकारिता के बाबत अस्पष्टता, भ्रम, आशंकाएं और विवाद इसलिए भी हैं क्योंकि अभी वह एक विकसित हो रही अवधारणा है। यह भी सच है कि नागरिक पत्रकारिता के कई पहलू है। इसके बावजूद नागरिक पत्रकारिता की अवधारणा को लेकर धीरे-धीरे एक सहमति बनती हुई दिखाई पड़ रही है। यह ठीक है कि हर पत्रकार एक नागरिक भी है। लेकिन हाल के वर्षों में अधिक से अधिक नागरिक, पत्रकार बन रहे हैं यानि वे पेशे से तो पत्रकार नहीं है लेकिन कर्म से पत्रकारिता के औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नागरिक पत्रकारिता से आशय साझेदारी पर आधारित एक ऐसी पत्रकारिता से है जिसमे आम नागरिक स्वयं सूचनाओं के संकलन, विश्लेषण, रिपोर्टिंग और उनके प्रकाशन-प्रसारण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। नागरिक पत्रकारिता की अवधारणा को स्पष्टता के साथ सामने लाने वाली शेन बाउमैन और क्रिस विलिस की मशहूर रिपोर्ट 'वी मीडिया : हाउ ऑडियंसेज आर सेपिंग द फ्यूचर ऑफ न्यूज एंंड इंफॉरमेशन` के अनुसार नागरिकों की ''इस भागीदारी का उद्देश्य स्वतंत्र, विश्वसनीय, तथ्यपूर्ण, व्यापक और प्रासंगिक सूचनाएं मुहैया कराना है जो कि एक लोकतंत्र की मांग होती है।`
स्पष्ट है कि नागरिक पत्रकारिता सार्वजनिक मामलों की पत्रकारिता से इस मामले में अलग है कि नागरिक पत्रकारिता में प्रोफेशनल पत्रकार के बजाय आम नागरिक पत्रकार की भूमिका निभाते हैं। आमतौर पर ये वे नागरिक हैं जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज करता रहा है या जिनके सरोकारों, मुद्दों और समस्याओं को उसमें पर्याप्त जगह नहीं मिलती रही है। एक तरह से यह नागरिकों की ओर से मुख्यधारा के मीडिया में हस्तक्षेप है और साथ ही साथ वैकल्पिक मीडिया मंचों का निर्माण भी है। नागरिक पत्रकारिता किसी एक व्यक्ति के सरोकार से भी संचालित हो सकती है और वह नागरिकों के संगठित समूहों के सरोकारों से भी प्रेरित हो सकती है। लेकिन बुनियादी बात यह है कि नागरिक पत्रकारिता मुख्यधारा के मीडिया में मौजूद ''लोकतांत्रिक घाटे`` (डेमोक्रेटिक डेफिसिट) और व्यावसायिक दबावों के कारण आम नागरिको और वास्तविक मुद्दों की उपेक्षा के जवाब में पैदा हुई है।
दरअसल, मुख्यधारा के मीडिया के कारपोरेटीकरण और तथाकथित प्रोफेशनलिज्म के कारण उसके अंदर एक ऐसी ढांचागत कठोरता (रिजीडिटी) और अहमन्यता पैदा हुई है जिसमें समाचार माध्यमों के अंदर बैठे पत्रकार खुद को हर तरह की आलोचना, सुधार और परिवर्तन से परे समझने लगे हैं। उन्हें लगता है कि वे जिसे समाचार समझते हैं, उसे जिस तरह से प्रस्तुत करते हैं और उसका जिस तरह से विश्लेषण करते हैं, वह न सिर्फ सौ फीसदी सही है बल्कि ऑडियंस को भी उसी तरह से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन सूचनाओं के स्रोतों के विस्तार, उनके बीच आपसी प्रतियोगिता और नए माध्यमों ने इस समझदारी को एक चुनौती पेश की है। अब मुख्यधारा का कोई पत्रकार किसी घटना को मनमाने या आधे-अधूरे तरीके से रिपोर्ट कर बच नहीं सकता।
यही नहीं, मुख्यधारा के मीडिया के लिए अब किसी घटना, मुद्दे, समस्या और विचार को नजरअंदाज करना या ब्लैकऑउट करना भी संभव नहीं रह गया है। दुनियाभर में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब मुख्यधारा के मीडिया द्वारा समाचारों के ब्लैकऑउट या उन्हें तोड़मरोड़ कर पेश करने को नागरिक पत्रकारों ने वैकल्पिक माध्यमों-ब्लॉग्स आदि के जरिए चुनौती दी है। नागरिक पत्रकारों ने जानेमाने समाचार संगठनों के प्रोफेशनल पत्रकारों की रिपोर्टों और लेखों में तथ्यगत अशुद्धियों से लेकर उनके पूर्वाग्रहों, राजनीतिक झुकावों और व्यावसायिक दबावों को न सिर्फ उजागर किया है बल्कि उसे सार्वजनिक चर्चा और विचारविमर्श का मुद्दा बनाने में सफलता हासिल की है।
इराक के मामले में अमरीकी समाचार माध्यमों की भूमिका पर सबसे पहले इन्हीं नागरिक पत्रकारों ने सवाल खड़े किए और उन्हें चुनौती दी। यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि इराक के बारे में सबसे अधिक तथ्यपूर्ण और आंखे खोल देनेवाली रिपोर्टें मुख्यधारा के समाचार माध्यमों के जरिए नहीं बल्कि एक नागरिक पत्रकार दाहर जमाल के ब्लॉग्स के जरिए सामने आई हैं। इस मायने में नागरिक पत्रकारिता मुख्यधारा के मीडिया के लोकतांत्रिकरण के आंदोलन का हिस्सा है। उसने आम पाठकों/दर्शकों/श्रोताओं को सक्रिय बनाया है और उनके अंदर मीडिया की एक समझ भी पैदा की है। इस सक्रियता और समझ के साथ ये पाठक/दर्शक/श्रोता मुख्यधारा के मीडिया में हस्तक्षेप कर रहे हैं और अपने और अपने सरोकारों के लिए जगह की मांग कर रहे है।
नागरिक पत्रकारिता बनाम 'पीपुलराज्जी': गेटकीपरों की भूमिका और चुनौतियां
लेकिन नागरिक पत्रकारिता की राह इतनी आसान नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया ने इसे अपने अंदर समाहित कर लेने के लिए कोशिशें शुरू कर दी हैं। सीएनएन-आईबीएन और दूसरे टीवी चैनल जिस नागरिक पत्रकारिता को प्रोत्साहित कर रहे हैं, वह नागरिक पत्रकारिता की लोकतांत्रिक भावना और संघर्ष को जगह देने के बजाय उसके रूप या फार्म को जगह देने की कोशिश है। कहने का तात्पर्य यह है कि चैनल के अपने अलोकतांत्रिक चरित्र और स्वरूप में बदलाव के बजाय प्रतीकात्मक तौर पर कुछ नागरिकों की ओर से किसी बड़ी घटना या मामले की कोई एक्सक्लूसिव वीडियो या फिल्म फुटेज भेजने और उसे चैनल पर दिखाने से कोई खास फर्क नहीं पड़नेवाला है।
दरअसल, एक मायने में मुख्यधारा के समाचार चैनल अपने ऑडियंस को एक खास तरह की नागरिक पत्रकारिता के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिसमें उनका जोर ऐसे अजीबोगरीब, अटपटे और चौंकानेवाले वीडियो क्लिप पर होता है जिसका कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है। वे एक तरह से अपने दर्शकों को उन्हीं समाचारीय मानदंडों और सोच के अनुरूप खबरें और वीडियो भेजने के लिए तैयार कर रहे हैं जिसके प्रतिरोध में नागरिक पत्रकारिता खड़ी हुई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि चैनलों को दर्शकों से इस तरह के एक्सक्लूसिव लेकिन अटपटे फुटेज मिल रहे हैं जिनका सार्वजनिक जीवन से कोई खास ताल्लुक नहीं है। अगर बहुत हुआ तो उनका संबंध कुछ सार्वजनिक समस्याओं से है लेकिन वे कहीं से उन सार्वजनिक नीतियों को निशाना नहीं बनाते जो नागरिक पत्रकारिता के एजेंडे पर होना चाहिए। चाहे वह मुंबई की जबरदस्त बारिश और बाढ हो या दिल्ली में पहाड़गंज में बम विस्फोट या फिर दिल्ली में ओबराय फ्लाई ओवर पर कार में आग जैसी कई घटनाओं की तस्वीरें चैनलों पर दर्शकों द्वारा भेजी गई वीडियो क्लिप के जरिए ही दिखाई गयीं।
लेकिन इससे चैनलों के समाचार प्रस्तुति में मौजूद लोकतांत्रिक घाटे पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि उल्टे चैनलों ने नागरिक पत्रकारों को बड़ी चतुराई के साथ इस्तेमाल कर लिया। असल में, हाल के वर्षों में संचार माध्यमों की तकनीक में विकास और उनके व्यापक प्रसार के बाद आम लोगों के हाथ में भी ऐसे उपकरण जैसे कैमरा फोन, हैंडीकैम आदि आ गए हैं जो अब तक चैनलों के पास थे। आमतौर पर जब कोई बड़ी घटना या दुर्घटना होती है तो संयोगवश बहुतेरे दर्शक वहां मौजूद होते हैं और उनमें से कई अपने कैमरा फोन या हैंडीकैम से उसकी तस्वीरे भी उतारने में कामयाब हो जाते है। चूंकि अचानक होनेवाली घटनाओं के समय चैनलों के पत्रकारों और कैमरा टीमों का वहां होना संभव नहीं होता है तो उस समय इस तरह की एमेच्योर वीडियो फुटेज की भी मांग बढ़ जाती है। यह भी नागरिक पत्रकारिता का एक रूप है लेकिन इसमें नागरिक के विचारों और सरोकारों की भूमिका कम और घटनात्मक संयोग की भूमिका अधिक है।
इसी का एक और पहलू यह है जिसमें लोग अपने कैमराफोन या हैंडीकैम के जरिए जानेमाने लोगों यानी सेलिब्रीटीज की तस्वीरे कई बार चोरी-छिपे और कई बार खुलकर उतारते हैं और सेलिब्रीटीज के ऑब्सेशन से ग्रस्त चैनल उन्हें खुशी-खुशी दिखाते भी है। लेकिन यह नागरिक पत्रकारिता का विकृत रूप है। इसीलिए इसे पैपराज्जी की तर्ज पर पीपुलराज्जी भी कहा जाता है। इसमें सेलिब्रीटीज के निजी जीवन में तांकझांक की कोशिश को साफ देखा जा सकता है। इस तरह की विकृत पत्रकारिता का एक चर्चित मामला कुछ साल पहले तब सामने आया था जब कुछ चैनलों ने कैमरा फोन से खींचे गए दो मुंबइया फिल्मी सितारों- करीना और शाहिद कपूर के किसी होटल में चुंबन लेते दृश्य को जोरशोर से दिखाया था।
निश्चय ही, यह नागरिक पत्रकारिता नहीं है। इस मायने में करीना और शाहिद कपूर के प्रकरण को चैनलों पर दिखाने का विरोध बिल्कुल ठीक था। उस घटना के बाद इक्का-दुक्का प्रसंगों को छोड़कर आमतौर पर मीडिया ने ''पीपुलराज्जी पत्रकारिता`` को बढ़ावा नहीं दिया। लेकिन हाल के दिनों में समाचार माध्यमों के बीच बढ़ती व्यावसायिक प्रतियोगिता ने ऐसे वीडियो क्लिपों की मांग को बढ़ा दिया है जिसमें सेलीब्रिटी के निजी जीवन में तांक-झांक करने से लेकर अजीबोगरीब और हैरत अंगेज कारनामों को दिखाया गया हो। एक प्रमुख चैनल ने हाल में एक कैमरा फोन से खींची गई एक ऐसी कार की तस्वीरें घंटों दिखाईं जिसके बारे में दावा किया गया कि वह कार बिना ड्राइवर के चल रही है। जबकि सच्चाई यह थी कि चैनल को पहले से पता था कि यह एक ट्रिक है और उसे दिखाकर दर्शकों को मूर्ख बनाया जा रहा है। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि उस चैनल ने वह वीडियो क्लिप काफी भारी भरकम रकम चुकाकर खरीदी थी।
यह एक तरह से अपने दर्शकों को भ्रष्ट बनाने की भी कोशिश है। यह नागरिक पत्रकारिता के लिए एक चुनौती है। इस मामले में नागरिक पत्रकारों के साथ-साथ चैनलों को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। खासकर समाचार माध्यमों में यही पर गेटकीपरों यानि संपादकों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें न सिर्फ नागरिकों द्वारा भेजे गए ऐसे वीडियो फुटेज को हतोत्साहित करना चाहिए बल्कि नागरिकों की ओर से मिलनेवाले हर वीडियो फुटेज/खबर की पूरी छानबीन और जांचपड़ताल करनी चाहिए। एक्सक्लूसिव फुटेज चलाने की हड़बड़ी में चैनल के गेटकीपरों द्वारा पारंपरिक पत्रकारिता के सिद्धांतों को कतई अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि मुख्यधारा के समाचार संगठन प्रोफेशनल पत्रकारिता के उसूलों को भी भूल गए हैं।
नागरिक पत्रकारिता : संभावनाएं और चुनौतियां
हालांकि भारत में नागरिक पत्रकारिता की अभी उस तरह से शुरूआत नहीं हुई है जैसे दुनिया के कई देशों में उसने अपनी अलग पहचान बनाई है। इसके बावजूद भारत में नागरिक पत्रकारिता की संभावनाएं असीमित हैं। निश्चय ही इन संभावनाओं के द्वार खोलने के लिए पहले संगठित नागरिक समूहों और आंदोलनो को आगे आना पड़ेगा। यह सचमुच अफसोस और चिंता की बात है कि देश में नागरिक आंदोलनो और नागरिक समाज के संगठनो के विस्तार के बावजूद उनकी चिंता और कार्यक्रमों के दायरे में व्यापक समाज के साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान और अपने मुद्दों और सरोकारों को एजेंडे पर लाने की वैसी कोशिश नहीं दिखाई पड़ती है जिसकी जरूरत काफी अरसे से महसूस की जा रही है।
निश्चय ही, नागरिक आंदोलनो और संगठनों को इस ओर ध्यान देना पड़ेगा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कुछ पहलकदमियां हुई हैं लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस सिलसिले में सूचना के अधिकार ने नागरिक पत्रकारिता के लिए नए रास्ते खोल दिए है। दुनिया के और देशों में नागरिक पत्रकारिता को लेकर किए जा रहे प्रयोगों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जगह की कमी के कारण यहां उन सब की चर्चा तो संभव नहीं है लेकिन कुछ ऐसे प्रासंगिक उदाहरणों की चर्चा जरूरी है जिनको हम एक मॉडल मान सकते हैं :
दक्षिण कोरिया में ''ओहमाइन्यूज`` नागरिक पत्रकारिता का व्यावसायिक रूप से भी एक सफल उदाहरण है। फरवरी 2000 में ओह युन-हो ने इसकी स्थापना की थी और इसका ध्येय वाक्य है- ''हर नागरिक एक रिपोर्टर है।`` ''ओहमाइन्यूज`` की कुल सामग्री में से लगभग 80 फीसदी उन हजारों नागरिक पत्रकारों से आती है जो देश के कोने-कोने में और दुनिया के विभिन्न देशों में फैले हुए है और 20 प्रतिशत सामग्री इसमें काम करनेवाले प्रोफेशनल पत्रकारों द्वारा लिखी जाती है। ''ओहमाइन्यूज`` के नागरिक पत्रकार वास्तव में आम नागरिक है और पत्रकारिता उनका पेशा नहीं है। लेकिन वे अपने इलाके और आस-पास की समस्याओं और घटनाओं पर रिपोर्ट और टिप्पणियां लिखते हैं।
नागरिक पत्रकारिता का एक और रूप वे ब्लॉग्स हैं जिनमें व्यक्तिगत से लेकर विभिन्न क्षेत्रों और व्यवसायों की चिंताओं और सरोकारों को उठाया जा रहा है, उन पर चर्चा हो रही है और कई बार सामूहिक कार्रवाइयां भी हो रही है। ऐसे बहुतेरे ब्लॉग भारत में भी सक्रिय हैं। उनके बीच नेटवर्किंग बढ़नी चाहिए और आपसी संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए।
मुख्यधारा के मीडिया में नागरिक पत्रकारिता का हस्तक्षेप कई रूपों में सामने आ रहा है। उसका एक रूप तो यह है कि समाचार माध्यम अपने वेबसाइट पर कुछ रिपोर्टों, लेखों, संपादकीयों और खबरों को पाठकों की टिप्पणियों के लिए खोल रहे हैं। पाठक इन रिपोर्टों आदि को पढ़ने के बाद उस पर अपनी टिप्पणी दर्ज कर सकते हैं और साथ ही अन्य पाठकों की टिप्पणियों पर भी चर्चा कर सकते हैं। इसके अलावा समाचार माध्यम अपने पाठको को इन रिपोर्टों आदि की रेटिंग करने के लिए भी कह रहे हैं।
मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में इसका एक और रूप इस तरह भी सामने आ रहा है जिसमें समाचार माध्यम अपने पाठको को अपने किसी प्रोफेशनल रिपोर्टर या लेखक की खबर, रिपोर्ट और फीचर पर न सिर्फ टिप्पणी करने के लिए बल्कि उसमें कुछ नयी जानकारियां या सूचनाएं जोड़ने के लिए कह रहे हैं। इसके जरिए समाचार माध्यम दरअसल अपने पाठको और दर्शकों को यह मौका दे रहे हैं कि वे किसी घटना या मसले पर उसकी कवरेज को और व्यापक और सघन बना सकें।
तात्पर्य यह कि नागरिक पत्रकारिता में असीमित संभावनाएं हैं। लेकिन उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया की सबसे बड़ी शिकायत ही यह है कि नागरिक पत्रकारिता, पत्रकारिता के कई बुनियादी सिद्धांतों जैसे वस्तुनिष्ठता, तथ्यपरकता, निष्पक्षता और संतुलन आदि का ध्यान नहीं रखती है। इसमें कुछ हद तक सच्चाई है। कई बार कुछ पाठक ब्लॉग्स आदि में न सिर्फ अश्लील टिप्पणियां करते हैं बल्कि व्यक्तिगत आक्षेप पर भी उतर आते है। इस तरह की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए नागरिक पत्रकारिता में सक्रिय गंभीर और ईमानदार लोगों के अलावा गेटकीपरों को आगे आना पड़ेगा। लेकिन इस सब के बावजूद नागरिक पत्रकारिता को अब रोक पाना संभव नहीं है।
मीडिया कंपनियां और हितों का संघर्ष
आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार और सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले तेलुगु दैनिक 'इनाडु` समूह के मालिक रामोजी राव के बीच छिड़ी जंग और आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य सरकार का आरोप है कि रामोजी राव के मालिकाने वाली हिंदू संयुक्त परिवार (एचयूएफ) चिट फंड कंपनी-मार्गदर्शी फिनांसियर्स- कई तरह की अनियमितताओं में संलग्न है। राज्य सरकार द्वारा गठित रंगाचारी जांच समिति के अनुसार मार्गदर्शी की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर है कि वह अपने बचतकर्ताओं के एक रूपए में से सिर्फ ४९ पैसे लौटाने की स्थिति में है। इस रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर आंध्र पुलिस की अपराध जांच शाखा (सीआईडी) ने एक स्थानीय अदालत से अनुमति लेकर मार्गदर्शी के तीन दफ्तरों पर छापे मारे और कई दस्तावेज जब्त कर लिए।
दूसरी ओर, 'इनाडु` समूह के मालिक रामोजी राव इसे प्रतिशोध की कार्रवाई बताते हुए राजशेखर रेड्डी सरकार पर प्रेस को दबाने और मुंह बंद करने का आरोप लगा रहे हैं। वे मार्गदर्शी चिट फंड कंपनी पर लगाए गए आरोपों को आधारहीन बताते हुए दावा कर रहे हैं कि बचतकर्ताओं का धन पूरी तरह से सुरक्षित है और अगर जरूरत पड़ी तो वे अपनी अन्य कंपनियों की परिसंपत्तियों से बचतकर्ताओं का पाई-पाई लौटा देंगे। रामोजी राव ने राज्य सरकार के रवैये के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में एक अपील भी दायर की जिसमें उन्हें 'द हिंदू` के संपादक एन राम और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का समर्थन भी मिला है। यही नहीं, राव के पक्ष में एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक सख्त बयान जारी करते हुए राज्य सरकार पर मार्गदर्शी के बहाने 'इनाडु` पर दबाव डालकर उसे खामोश करने की कोशिश का आरोप लगाया है।
कहने की जरूरत नहीं है कि एडीटर्स गिल्ड और प्रेस के एक बड़े हिस्से ने इस पूरे मामले को प्रेस यानी अभिव्यक्ति की आजादी परएक और हमले के उदाहरण की तरह पेश किया है। कहा जा रहा है कि राजशेखर रेड्डी सरकार 'इनाडु` के मालिक रामोजी राव के खिलाफ खुंदक में कार्रवाई कर रही है क्योंकि राव और उनका अखबार 'इनाडु` राज्य सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ कई वरिष्ठ मंत्रियों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने में भी आगे रहा है। इस आरोप में काफी हद तक सच्चाई है। राजशेखर रेड्डी सरकार की 'इनाडु` से खुन्नस किसी से छिपी नहीं है। 'इनाडु` आंध्र प्रदेश का सर्वाधिक प्रसार वाला तेलुगु दैनिक है जिसकी प्रसार संख्या 11 लाख प्रतियां और पाठक संख्या 1.3 करोड़ है। 'इनाडु` को आमतौर पर कांगे्रस विरोधी और तेलुगु देशम समर्थक अखबार माना जाता है। आंध्र की राजनीति में कांग्रेस विरोधी एक लोकप्रिय राजनीतिक शक्ति के बतौर एनटी रामाराव के नेतृत्व वाले तेलुगु देशम की स्थापना और 1983 में कांग्रेस को बेदखल कर उसे सत्ता तक पहुंचाने में रामोजी राव और 'इनाडु` की अहम भूमिका थी। उसके बाद से ही रामोजी राव तेलुगु देशम और पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु के पक्ष में झुके रहे हैं।
इसलिए कांग्रेस और रेड्डी सरकार की 'इनाडु` से नाराजगी को समझा जा सकता है। जाहिर है कि वह यह खुन्नस निकालने के लिए मौके की तलाश में थी और 'इनाडु` पर सीधा हमला करने के बजाय रामोजी राव की कोई और कमजोर नस खोज रही थी। वह 'इनाडु` पर सीधा हमला करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी क्योंकि उस लड़ाई में मुद्दा प्रेस की आजादी बनाम राज्य सरकार की तानाशाही बन जाता और रेड्डी सरकार को मुंह की खानी पड़ती। इसलिए बहुत सुनियोजित तरीके से रामोजी राव के मालिकानेवाली चिट फंड कंपनी मार्गदर्शी फिनांसियर्स को निशाना बनाया गया ताकि राव को इस तरह घेरा जाए जिससे उन्हें प्रेस की आजादी को मुद्दा बनाने का मौका न मिले और उन्हें कठघरे में खड़ा करके 'इनाडु` समूह की विश्वसनीयता और साख को नुकसान पहुंचाया जा सके।
कहने की जरूरत नहीं है कि राजशेखर रेड्डी सरकार अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब रही है। उसने रामोजी राव को बचाव की भूमिका में खड़ा कर दिया है। उन्हें मार्गदर्शी फिनांसियर्स की गतिविधियों और अनियमितताओं के लिए सफाई देनी पड़ रही है। हालांकि राव और मीडिया के एक हिस्से ने पूरे मामले को प्रेस का गला घोंटने का मुद्दा बनाने की कोशिश की है लेकिन वे एक हद से ज्यादा कामयाब नहीं दिख रहे हैं। इस विवाद के दौरान राज्य सरकार के एक आदेश (जीओ 338) से एकबार यह मुद्दा प्रेस यानी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले का बनता हुआ दिखा लेकिन विरोध बढ़ता देख रेड्डी सरकार ने इसे वापस लेने में देर नहीं की। इस आदेश के जरिए राज्य सरकार ने इस मामले में समाचार और राज्य सरकार की आलोचना छापने पर रोक लगाने की कोशिश की थी।
हालांकि रेड्डी सरकार ने इस आदेश को तुरंत वापस ले लिया लेकिन इससे उसकी असली मंशा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जाहिर है कि रेड्डी सरकार कोई दूध की धुली नहीं है और 'इनाडु` के हालिया खुलासों से बौखलाई हुई है। इसी बौखलाहट में वह रामोजी राव और उनकी चिट फंड कंपनी को निशाना बना रही है। लेकिन इस सच्चाई के बावजूद अगर राव को मीडिया के एक हिस्से को छोड़कर व्यापक जनतांत्रिक शक्तियों का वैसा खुला समर्थन नहीं मिल रहा है, जैसा आमतौर पर किसी मीडिया समूह पर सरकारी हमले/धौंस-धमकी के दौरान मिलता रहा है तो यह सोचने का समय आ गया है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या समाचार मीडिया अपनी साख और इस कारण जनसमर्थन खो रहा है? ध्यान देने की बात है कि इस मुद्दे पर स्थानीय मीडिया और मीडिया विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. बीपी संजय और मीडिया विश्लेषक टी शिव राम कृष्ण शास्त्री ने रामोजी राव की भूमिका पर कई सवाल उठाए हैं। उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
लेकिन इस विवाद में सबसे चौंकानेवाली टिप्पणी उच्चतम न्यायालय की ओर से आई है। रामोजी राव और उनके अखबार 'इनाडु` की स्वामी कंपनी उशोदया इंटरप्राइजेज की ओर से दाखिल एक स्पेशल लीव पेटीशन की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति रवीन्द्रन ने टिप्पणी की कि 'जब मुख्यमंत्री कोई गलती करते हैं, आप उसे उठाते हैं। इसी तरह से जब आपने गलती की तो राज्य सरकार ने कार्रवाई की। आपके मुवक्किल (रामोजी राव) ने एक साथ दो जिम्मेदारियां संभाल रखी हैं। एक समाचारपत्र के मालिक की और दूसरी चिट फंड कंपनी के मालिक की।` यही नहीं, इस याचिका में हस्तक्षेपकर्ता के बतौर एन राम और कुलदीप नैयर की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने साफ कहा कि 'इस मामले का प्रेस की स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल एक वित्तीय धंधे का मामला है।` उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में कोई आदेश नहीं दिया और याचिकाकर्ताओं को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायलय के पास जाने के लिए कहा।
हालांकि उच्चतम न्यायालय ने कोई फैसला नहीं दिया लेकिन उसकी टिप्पणियों ने बड़े मीडिया समूहों के उस पहलू की ओर इशारा करके एक जरूरी बहस की जमीन तैयार कर दी है जिसे अब तक न सिर्फ स्वाभाविक माना जाता रहा है बल्कि उसे बहस और विचार का विषय भी नहीं समझा जाता है। सवाल बहुत सीधा और स्पष्ट है कि क्या किसी मीडिया कंपनी के मालिक की उन गतिविधियों या कारोबार पर देश के कानून इसलिए लागू नहीं होंगे कि वे किसी अखबार/समाचार चैनल आदि के मालिक हैं? क्या किसी समाचार मीडिया कंपनी के स्वामी को देश के कानूनों से मुक्ति मिली हुई है और वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं? अगर किसी मीडिया कंपनी के मालिक अन्य धंधों और कारोबार में लगे हों तो क्या उस धंधे या कारोबार की जांच-पड़ताल या उसके खिलाफ कार्रवाई को मीडिया यानी प्रेस की आजादी पर हमला माना जाएगा?
इन सवालों का उत्तर खोजना बहुत जरूरी है क्योंकि 'इनाडु` के रामोजी राव बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के टकराव का मुद्दा न तो ऐसी पहली घटना है और न ही आखिरी। भारत में जैसे-जैसे मीडिया उद्योग का विकास और विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे छोटी और मध्यम आकार की मीडिया कंपनियां न सिर्फ बड़ी हो रही हैं बल्कि एक बड़ी कारपोरेट कंपनी के बतौर मीडिया के अलावा अन्य उद्योग-धंधों और कारोबार में भी कदम रख रही हैं। यही नहीं, मीडिया उद्योग के विस्तार और उसमें बढ़ते मुनाफे के कारण ऐसी कई कंपनियां भी इस क्षेत्र में कदम रख रही हैं जिनका मुख्य कारोबार कुछ और है। लेकिन इसके साथ ही, यह भी सच है कि जहां मीडिया कंपनियां अन्य उद्योग-धंधों में प्रवेश के लिए अपने प्रभाव और लॉबीइंग की शक्ति का इस्तेमाल कर रही हैं, वहीं अन्य उद्योग-धंधों से जुड़ी कंपनियां मीडिया कारोबार में इसलिए भी प्रवेश कर रही हैं क्योंकि इससे उनके राजनीतिक प्रभाव और लॉबीइंग की ताकत में इजाफा होता है। इनका सीधा लाभ उनके मुख्य कारोबार को होता है।
हालांकि यह कोई नयी प्रवृत्ति नहीं है। पहले भी मीडिया कंपनियां अपने अन्य धंधों और कारोबार को संरक्षण देने के लिए अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करती रही हैं। यही नहीं, सरकार, राजनेता और अफसर भी मीडिया कंपनियों की ऐसी गतिविधियों को नजरअंदाज करते रहे हैं जहां अखबार की आड़ में अनुचित और कई बार कानूनों का उल्लंघन भी होता रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह थी कि सरकार में बैठे राजनेता और अफसर भी दूध के धुले नहीं थे और मीडिया कंपनियों से पंगा लेने के बजाय चुप रहना बेहतर समझते थे। इसी तरह, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि मीडिया कंपनियों की इस ताकत, प्रभाव और लॉबीइंग शक्ति का दुरूपयोग मालिकों के साथ-साथ संपादकों और पत्रकारों के एक छोटे ही सही समूह ने भी किया है। जिला और ब्लॉक स्तर से लेकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक 'प्रेस` लिखी गाड़ियों का प्रभाव और उनके कारनामे किसी से छुपे नहीं हैं।
हालांकि यह कहने का तात्पर्य कतई नहीं है कि सभी मीडिया कंपनियां, उनके मालिक और उनसे जुड़े पत्रकार इस गोरखधंधे में शामिल हैं और अखबार/समाचार चैनल की आड़ में कारोबार में अनुचित तौर-तरीकोंऔर गैरकानूनी उपायों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि तालाब में अब सिर्फ एक नहीं बल्कि कई गंदी मछलियां मौजूद हैं और तालाब को गंदा कर रही हैं। यहीं नहीं, इन मछलियों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है और कई मामलों में तो मीडिया कंपनियां विशुद्ध ब्लैकमेलिंग भी कर रही हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई करना लगातार कठिन होता जा रहा है क्योंकि वे उसे तुरंत मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले का मामला बना देती हैं। आपसी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद ऐसे मौकों पर ये कंपनियां एकजुट हो जाती हैं और प्रशासन को पीछे हटना पड़ता है। दूसरी ओर, भ्रष्ट और खुद अनियमितताओं में लिप्त प्रशासन भी मीडिया कंपनियों की अनुचित और अवैध धंधों या तौर तरीकों के खिलाफ आवाज उठाने का नैतिक साहस नहीं दिखा पाता है।
इस तरह मीडिया के अलावा अन्य प्रकार के कारोबार में अनुचित तौर-तरीकों और गैरकानूनी उपायों का सहारा लेनेवाली मीडिया कंपनियों और भ्रष्ट शासन-प्रशासन के बीच एक अवैध किस्म का अघोषित गठजोड़ बन गया है। यही कारण है कि इस प्रवृत्ति के जोर पकड़ने के बावजूद 'इनाडु` से जुड़े मार्गदर्शी फिनांसियर्स जैसे मामले कम ही सामने आ पाते हैंं। लेकिन पिछले एक दशक में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब किसी मीडिया कंपनी ने अपने दूसरे कारोबारों और अनुचित गतिविधियों की जांच पड़ताल और उसके खिलाफ कार्रवाई रोकने के लिए उसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले का मुद्दा बना दिया। 'द टाइम्स ऑफ इंडिया` (बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड) समूह के मालिक स्वर्गीय अशोक जैन के खिलाफ जब फेरा के तहत कार्रवाई शुरू हुई तो समूह के अखबारों ने न सिर्फ इसे मानवाधिकार हनन का मुद्दा बनाकर अभियान शुरू कर दिया बल्कि फेरा कानून को अतार्किक, उत्पीड़क और अप्रासंगिक कानून बताते हुए उसे खत्म करने की मुहिम छेड़ दी। इसी तरह, 'आउटलुक` (रहेजा बिल्डर्स) समूह के मालिकों पर छापे की कार्रवाई को मीडिया पर हमले की कार्रवाई घोषित करते हुए आसमान सिर पर उठा लिया गया।
मीडिया को ढाल की तरह इस्तेमाल करने के ये मामले अपवाद नहीं है। 80 के दशक के उत्तरार्ध और 90 के दशक में कई चिट फंड कंपनियों (सहारा, जेवीजी, कुबेर आदि) ने बचतकर्ताओं से जमा लेने के अलावा बड़े जोरशोर से अखबार-पत्रिकाएं और टीवी चैनल शुरू किए। उनमें से कई कंपनियां डूब गयीं और उनके साथ ही लाखों निवेशकों की गाढ़ी कमाई भी डूब गयी। लेकिन मीडिया के प्रभाव का नतीजा था कि जब तक ये कंपनियां डूब नहीं गयीं, सरकार और प्रशासन ने सब जानते-समझते हुए भी उस ओर से आंखें मूंदे रखीं। आज भी ऐसी कई कंपनियों के आगे उनकी मीडिया कंपनियां ढाल बनकर खड़ी हैं। मामला सिर्फ चिट फंड कंपनियों तक सीमित नहीं है बल्कि पिछले कुछ वर्षों में कई बड़ी मीडिया कंपनियों ने रीयल इस्टेट, शॉपिंग मॉल-इंटरटेंमेंट कारोबार, सुगर मिल, शराब जैसे धंधों में प्रवेश किया है। या इसके उलट इन क्षेत्रों की कंपनियां धड़ल्ले से मीडिया कारोबार में आ रही हैं।
खासकर पिछले दो-तीन वर्षों के अंदर रीयल इस्टेट के धंधे में सक्रिय कई बिल्डरों ने मीडिया कारोबार में प्रवेश किया है। जाहिर है कि यह उनके लिए सिर्फ एक और धंधा नहीं बल्कि उससे अधिक मूल कारोबार को संरक्षण देने का एक विश्वसनीय, सक्षम और सम्मानजनक तरीका है। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि अगर कोई मीडिया कंपनी किसी अन्य कारोबार में हाथ आजमाना चाहती है या किसी अन्य कारोबार से जुड़ी कोई कंपनी मीडिया कारोेबार में आना चाहती है तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? कानूनन इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है और यह पूरी तरह से वैध है। यही नहीं, मीडिया भी किसी अन्य कारोबार की तरह ही एक और कारोबार है, इसलिए जैसे रीयल इस्टेट, उसी तरह मीडिया बिजनेस।
लेकिन क्या यह इतना सीधा और सपाट रिश्ता है? जाहिर है कि नहीं, क्योंकि अगर मीडिया भी किसी अन्य कारोबार या धंधे की तरह सिर्फ एक और कारोबार हैं तो मीडिया कंपनियों के मालिक अपने और अपनी कंपनी के साथ विशेष व्यवहार और कानूनी संरक्षण की मांग क्यों करते हैं? किसी भी अन्य कंपनी की तुलना में वे मीडिया कंपनी के लिए विभिन्न रियायतें (जमीन/भवन आवंटन से लेकर पानी, बिजली और टैक्स) क्यों मांगते हैं? यही नहीं, किसी भी अन्य कंपनी की तरह मीडिया कंपनियां स्वयं को सार्वजनिक और प्रशासनिक छानबीन और जांच पड़ताल के लिए प्रस्तुत क्यों नहीं करती हैं? किसी भी जांच पड़ताल के संकेत मात्र से ही वे 'मीडिया की स्वतंत्रता` पर हमले का शोर मचाना क्यों शुरू कर देती हैं? स्पष्ट है कि मीडिया कारोबार मूलत: कारोबार होते हुए भी अन्य सभी कारोबारों से कई मायनों में अलग है।
दरअसल, एक उदार पूंजीवादी लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में मीडिया नागरिकों को सूचित करने के अलावा उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। एक गतिशील लोकतंत्र के लिए व्यापक रूप से सूचित नागरिकों का होना बहुत जरूरी है। नागरिकों के लिए सूचनाएं खासकर सरकार के कामकाज और विभिन्न रांजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक हलचलों और मुद्दों से परिचित होना जरूरी है, अन्यथा वे अपने विभिन्न लोकतांत्रिक अधिकारों खासकर वोट देने और अपने प्रतिनिधि तथा सरकार चुनने के अधिकार का सही तरीके से प्रयोग नहीं करर पाएंगे। लोगों को सूचित करने और अपने समय के मुद्दों और उससे जुड़े विभिन्न पक्षों और उनके विचारों से अवगत कराने का काम काफी हद तक मीडिया करता है। मशहूर समाजवैज्ञानिक जर्गेन हैबरमास के अनुसार मीडिया लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए जरूरी 'सार्वजनिक मंच` (पब्लिक स्फेयर) का निर्माण करता है जिसपर राजनीतिक रूप से महत्व के मुद्दों पर नागरिक बहस-मुबाहिसा करते हैं और जहां नागरिकों के सामुदायिक जीवन में सक्रियता और भागीदारी के लिए जरूरी सभी सूचनाएं मुहैया कराई जाती हैं।
जैसाकि हम जानते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिक जिस 'सार्वजनिक मंच` के जरिए भागीदारी करते हैं, उसमें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे बुनियादी शर्त है। मीडिया की स्वतंत्रता इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से निसृत होती है जो कि नागरिकों के जानने के अधिकार से जुड़ी हुई है। स्पष्ट है कि मीडिया की ताकत का आधार सूचित और सक्रिय नागरिक हैं। लेकिन हैबरमास के अनुसार लोकतंत्र का प्राण वायु 'सार्वजनिक मंच` तभी सबसे प्रभावी तरीके से काम करता है जब वह संस्थागत रूप में राज्य और समाज की ताकतवर आर्थिक शक्तियों से स्वतंत्र होता है। तात्पर्य यह कि मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ राज्य के नियंत्रण और वर्चस्व से मुक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि उसे निजी बड़ी पूंजी के दबाव से भी पूरी तरह मुक्त होना चाहिए। लेकिन दुनिया के अधिकांश उदार पूंजीवादी लोकतंत्रों की तरह भारतीय लोकतंत्र में भी ऐसे उदाहरण अपवाद सरीखे हैं जहां मीडिया संस्थान राज्य या निजी पूंजी के वर्चस्व या दबावों से पूरी तरह स्वतंत्र हों।
इसलिए जरूरी है कि 'इनाडु` और इस तरह के दूसरे प्रकरणों में मीडिया स्वतंत्रता पर हमले को मुद्दा बनाने के बजाय इसे निजी पूंजी द्वारा मीडिया स्वतंत्रता के दुरूपयोग के मामले के बतौर देखा जाए। मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जरूरी है कि मीडिया कंपनियों के कामकाज में न सिर्फ पारदर्शिता को बढ़ाया जाए बल्कि उनके अन्य आर्थिक हितों और कारोबार को मीडिया संस्थान से अलग रखा जाए। दरअसल, जब कोई मीडिया कंपनी किसी अन्य कारोबार से जुड़ती है या कोई अन्य कारोबार करने वाली कंपनी मीडिया कारोबार में प्रवेश करती है तो उससे 'हितों के टकराव` का मामला भी बनता है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि जिस मीडिया कंपनी के आर्थिक और कारोबारी हित किसी अन्य व्यवसाय या धंधे से जुड़े हुए हैं तो वह उस व्यवसाय से संबंधित सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने के मकसद से पूर्वाग्रहपूर्ण रिपोर्टिंग करेगी या उस व्यवसाय में अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को अनुचित तरीके से निशाना बनाने की कोशिश करेगी अथवा अपने उत्पाद/सेवा को प्रतिद्वंद्वी के उत्पाद/सेवा की तुलना में बेहतर साबित करने की कोशिश करेगी।
यह कोई काल्पनिक आशंका नहीं है। ऐसे कई मामले हाल के दिनों में दिखाई पड़े है। 'द टाइम्स ऑफ इंडिया` समूह ने एक प्राइवेट ट्रीटी के नाम से योजना शुरू की है। इस योजना के तहत टाइम्स नगद भुगतान करके किसी नई या पुरानी कंपनी के शेयर खरीद लेती है। बदले में वह कंपनी टाइम्स को विज्ञापन और अपने प्रचार प्रसार के लिए भुगतान के बतौर वह रकम लौटा देती है। इस प्रक्रिया में जब उस कंपनी के शेयर बाजार में अच्छे भाव पर पहुंच जाते है तो टाइम्स उसे बेचकर मुनाफा वसूल लेती है। जाहिर है कि इससे टाइम्स के साथ-साथ उस कंपनी को भी काफी फायदा होता है। लेकिन इसके लिए टाइम्स को निश्चय ही, अपनी संपादकीय स्वतंत्रता के साथ समझौता करना पड़ता है क्योंकि टाइम्स समूह जिस भी कंपनी के साथ प्राइवेट ट्रीटी करता है, बाजार में उसका भाव चढ़ाने के लिए उसे सकारात्मक और बढ़ा-चढ़ाकर कवरेज देनी पड़ती है। इस तरह पाठकों को बिना बताए टाइम्स न सिर्फ उन्हें अंधेरे में रखता है बल्कि अपनी संपादकीय स्वतंत्रता और निष्पक्षता को भी अपने आर्थिक हितों के लिए दांव पर लगा रहा है।
जाहिर है कि यह प्रवृत्ति सिर्फ टाइम्स समूह तक सीमित नहीं है। माना जाता है कि टाइम्स समूह जो आज करता है, अन्य मीडिया समूह उसे कल करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि अन्य मीडिया समूहों में भी यह प्रवृत्ति इस या अन्य दूसरे रूपों में बढ़ रही है। यह देश में एक स्वस्थ, स्वतंत्र, विविधतापूर्ण, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक मीडिया के विकास के लिहाज से बुरी खबर है। इस मामले में इनाडु प्रकरण एक खतरे की घंटी है। मीडिया संस्थानों को इस बारे में गंभीरता से विचार और फैसला करना होगा कि मीडिया की स्वतंत्रता के दुरूपयोग को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएं। अगर इस मुद्दे पर तत्काल कदम नहीं उठाये गए तो राजशेखर रेड्डी जैसी सरकारों को मीडिया की विश्वसनीयता और साख पर सवाल उठाने के साथ-साथ उन पर हमला करने और उनका मुंह बंद करने का मौका मिल जाएगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह उससे कहीं बड़ा खतरा है। लेकिन इस खतरे को रोकने के लिए मीडिया कंपनियों को खुद ही पहल करनी पड़ेगी।
बुधवार, २६ सितम्बर २००७
विनियमन बनाम नियंत्रण
भारत में टीवी चैनलों के विनियमन के उद्देश्य से लाए जा रहे प्रसारण सेवाएं विनियमन विधेयक' 2006 (प्रसारण विधेयक) को लेकर उठे विवाद और विरोध के तीखे स्वरों के बीच सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह विधेयक कैबिनेट से वापस लेने का फैसला करना पड़ा है। 'देर आयद, दुरस्त आयद` की तर्ज पर मंत्रालय ने अब इस विधेयक को खुली बहस के लिए सार्वजनिक कर दिया है। लेकिन इस विधेयक को लेकर मंत्रालय और यूपीए सरकार का रवैया सचमुच हैरान और चिंतित करनेवाला है। उसने जिस तरह से बिना किसी सार्वजनिक चर्चा और विचार-विमर्श के इस विधेयक को तैयार किया और जिस जल्दबाजी और हड़बड़ी में इसे संसद के मानसून सत्र में पेश करने की कोशिश की, उससे इन आशंकाओं को बल मिला कि सरकार इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर समाचार चैनलों का मुंह बंद करने की तैयारी कर रही है।
विधेयक के मसौदे से इन आशंकाओं की पुष्टि ही हुई है। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक संसद में पास हो जाता तो टीवी चैनलों पर सरकार का पूरी तरह से नियंत्रण हो जाता और उसे हर तरह की मनमानी की छूट मिल जाती। लेकिन अब उम्मीद की जा सकती है कि इस विधेयक पर होनेवाली सार्वजनिक चर्चाओं और बहसों के आलोक में सरकार इस विधेयक में फेरबदल करने के बाद ही उसे संसद में पेश करने के बारे में सोचेगी। निश्चय ही, इस विधेयक ने टीवी चैनलों के विनियमन से जुड़े कई बुनियादी और जरूरी सवालों को एक बार फिर से उठा दिया है जिनपर व्यापक और खुली चर्चा की जरूरत है।
विनियमन बनाम नियंत्रण: क्या जरूरी है विनियमन
इस विधेयक के संदर्भ में सबसे बुनियादी सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या टीवी चैनलों का विनियमन जरूरी है ? उदार बुद्धिजीवियों और मीडिया उद्योग के एक बड़े हिस्से का मानना है कि राज्य की ओर से टीवी चैनलों के विनियमन की कोई जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि विनियमन वास्तव में, नियत्रंण का पर्याय है और राज्य की ओर से विनियमन का अर्थ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करना है। उनका यह भी तर्क है कि एक लोकतांत्रिक ढांचे और उदार अर्थव्यवस्था में राज्य की ओर से मीडिया के विनियमन का कोई तुक नहीं है। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था खुद ही मीडिया की कमियों और गलतियों का हिसाब-किताब कर लेती है।
एक मायने में इन तर्कों में दम है। दुनिया के अधिकांश देशों और खुद भारत का अनुभव यह बताता है कि राज्य ने जब भी मीडिया के विनियमन की कोशिश की है तो वह व्यवहार में नियंत्रण और अंकुश में तब्दील हो गया है। भारत में इमरजेंसी की दौरान जिस तरह से पे्रस को नियंत्रित और उसका मुंह बंद करने की कोशिश की गई, उसके कड़वे अनुभवों के बाद से जब भी इस तरह के दूसरे प्रयास हुए हैं, नागरिक समाज की ओर से उनका कड़ा विरोध हुआ है। यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि नागरिक अधिकारों विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने या उसे सीमित करने की प्रवृत्ति, राज्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। पूंजीवादी राज्य और शासक-अभिजात्य वर्ग हमेशा इस या उस बहाने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करते रहते हैं, जिसमे प्रेस और मीडिया की स्वतंत्रता भी शामिल है।
दरअसल, राज्य हमेशा ऐसे मौकों की तलाश में रहता है जब वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित या सीमित कर सके और दूसरी ओर, नागरिक और राजनीतिक आंदोलतों की कोशिश इस स्वतंत्रता के दायरे को लगातार फैलाने की होती है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पूंजीवादी मीडिया संस्थान अपने कारनामों से राज्य को पे्रस की स्वतंत्रता को सीमित या बाधित करने का अवसर देते रहते हैं। यहां इस तथ्य का उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले कुछ वर्षों में टीवी चैनलों ने समाचार और मनोरंजन के नाम पर दर्शकों के सामने जो कुछ परोसा है, उसने नागरिक समाज के एक बड़े हिस्से को चैनलों के विनियमन की मांग उठाने के लिए बाध्य कर दिया है।
टीवी चैनलों के विनियमन की जमीन यहीं से तैयार होती है। यह सवाल पिछले काफी समय से उठ रहा है कि अभिव्यक्ति यानि मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से टीवी चैनल लगातार लोक मर्यादाओं की सभी सीमाएं लांघते जा रहे हैं और स्वतंत्रता सामाजिक अराजकता, मनमानी और विचलन का पर्याय बन गयी है, उसे देखते हुए उनका विनियमन क्यों नहीं होना चाहिए ? आखिर मीडिया की भी सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही होती है और इस जिम्मेदारी और जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए एक सांस्थानिक व्यवस्था यानि एक स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक एजेंसी क्यों नहीं होनी चाहिए ? यही नहीं, प्रेस की निगरानी और जवाबदेही के साथ-साथ उसकी स्वतंत्रता की हिफाजत के लिए जब पे्रस परिषद जैसी एजेंसी पहले से काम कर रही है तो टीवी चैनलों के लिए एक ऐसी एजेंसी गठित करने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए ?
यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि दुनिया के बहुतेरे लोकतांत्रिक देशों में प्रेस के साथ-साथ टीवी चैनलों के कामकाज पर निगरानी रखने और उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक एजेंसियां काम कर रही हैं। उन्हें लेकर यह सवाल हो सकता है कि वे कितनी सफल या प्रभावी हैं या उनके भूमिका क्या होनी चाहिए लेकिन उनकी होने को लेकर बहुत सवाल नहीं हैं। इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि विनियमन होना चाहिए या नहीं बल्कि सवाल यह है कि विनियमन का परिपे्रक्ष्य क्या होना चाहिए और उसके मद्देनजर विनियामक एजेंसी की भूमिका क्या होनी चाहिए ?
निश्चय ही, विनियमन, नियंत्रण की विपरीत धारणा है। विनियमन की लोकतांत्रिक अवधारणा के मूल में राज्य की निरंकुश शक्ति और निजी पूंजी के सीमित स्वार्थों के दोतरफा दबावों से नागरिकों के सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। विनियमन का अर्थ राज्य को मीडिया को 'नियंत्रित` करने का अधिकार देना नहीं है और न ही उसका उद्देश्य राज्य और उस पर काबिज प्रभुत्वशाली वर्गों को छान-बीन और आलोचना के दायरे से बाहर करना है। इसीलिए लोकतांत्रिक विनियमन का सबसे उपयुक्त मॉडल यही हो सकता है कि विनियामक एजेंसी को दोनों यानि राज्य और निजी स्वार्थों के कब्जे से बाहर रखा जाए और उसकी खुद की स्वतंत्रता और स्वायत्ता की गारंटी की जाए।
प्रसारण सेवा विनियामक: सरकार का विस्तार या स्वतंत्र एजेंसी
यह स्वीकार करने के बावजूद कि विनियमन जरूरी है, यूपीए सरकार द्वारा पेश प्रसारण विधेयक न सिर्फ निराश करता है बल्कि अपनी अंतर्वस्तु में विनियमन को बदतर सरकारी नियंत्रण का पर्याय बनाने की कोशिश करता दिखायी पड़ता है। हालांकि इस विधेयक के साथ जारी किए गए विमर्श पत्र और खुद विधेयक में कहा गया है कि विनियामक प्राधिकरण एक स्वतंत्र संस्था होगी लेकिन इसके ठीक उलट विधेयक का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि दावों के विपरीत यह विनियमन का दायित्व केन्द्र सरकार और उसके अफसरों के हाथ में सौंपने की सिफारिश करता है। इस विधेयक में विनियामक एजेंसी एक स्वतंत्र और स्वायत एजेंसी के बजाय खुले तौर पर केन्द्र सरकार का विस्तार दिखायी पड़ती है।
विधेयक के मसौदे की धारा 5, 9, 38 और 48 आदि में केन्द्र सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। इन धाराओं को देखने से ऐसा लगता है कि विनियामक एजेंसी एक तरह से केन्द्र सरकार की कठपुतली होगी जिसे नचाने का पूरा अधिकार सरकार के पास होगा। जाहिर है कि केन्द्र सरकार को इतने अधिकार देने के बाद किसी स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक प्राधिकरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। विनियामक प्राधिकरण के अधिकांश कार्य और अधिकार सीधे या परोक्ष रूप से केन्द्र सरकार के पास ही होंगे। ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठता है कि जब विनियमन के सारे दायित्व, कार्य और अधिकारों का प्रयोग केन्द्र सरकार और उसके नौकरशाह ही करेंगे तो विनियामक प्राधिकरण के आवरण की जरूरत क्या है ?
जाहिर है कि इन प्रावधानों के कारण एक स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक एजेंसी के गठन का पूरा उद्देश्य ही पराजित हो जाता है। इससे उन आशंकाओं और आलोचनाओं को बल मिलता है कि यूपीए सरकार के लिए विनियमन सिर्फ एक बहाना है और उसका असली मकसद टीवी चैनलों की बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाना और उन्हें नियंत्रित करना है। कहने की जरूरत नहीं है कि कोई भी लोकतांत्रिक समाज ऐसी विनियामक एजेंसी का समर्थन नहीं कर सकता है जो मीडिया की स्वतंत्रता का गला घोंटने या उसे सीमित करने का उपकरण बन सकता है। ऐसी एजेंसी की तुलना में बिना किसी विनियमन का मीडिया फिर भी बेहतर है। अपनी सीमाओं और लोक मर्यादाओं को लांघने और 'लोकहित` पर 'निजी हित` को प्राथमिकता देनेवाला मीडिया भी सरकारी नियंत्रण, मनमानी और निरंकुशता की तुलना में कम नुकसानदेह और खतरनाक है।
यह सचमुच अफसोस की बात है कि विनियमन जैसी एक लोकतांत्रिक और स्वायत्त अवधारणा को सरकारी नियंत्रण का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है जिसके कारण उस पूरी अवधारणा का ही विरोध हो रहा है। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन इसमें गौर करने वाली बात यह है कि जहां एक ओर सरकार विनियमन को नियंत्रण का हथियार बनाना चाहती है, वहीं संकीर्ण निजी स्वार्थ इसका लाभ उठाते हुए स्वयं को अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता का पहरेदार साबित करने में जुटे हुए हैं। इसका बहाना लेकर वे विनियमन के खुले विरोध में उतर आए हैं। इस तरह दो-तरफा संकीर्ण हितों की लड़ाई में व्यापक दर्शकों के हितों को कुर्बान किया जा रहा है जबकि विनियमन की सबसे अधिक जरूरत उन्हें ही है।
एकाधिकार बनाम बहुलता और विविधता: किस्सा क्रास मीडिया पाबंदियों का
इस विधेयक का इस बात के लिए स्वागत किया जाना चाहिए कि इसमें पहली बार मीडिया में एकाधिकारवादी (मोनोपॉली) प्रवृत्तियों को चिन्हित करते हुए उसपर रोक लगाने के प्रावधान किए गए है। विधेयक की धारा 10 में मीडिया में निजी हितों के संग्रहण पर पाबंदी लगाने के प्रावधान किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि केन्द्र सरकार को प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में हितों के संग्रहण (एकाधिकार) को रोकने के लिए अर्हता की शर्तें और प्रतिबंध लगाने का अधिकार होगा।
इस विधेयक में इस सिलसिले में तीन प्रस्ताव किए गए हैं। पहले प्रस्ताव के तहत किसी कंटेंट ब्राडकास्टिंग सेवा प्रदाता (टीवी चैनल) को किसी ब्राडकास्टिंग नेटवर्क सेवा प्रदाता कंपनी (केबल नेटवर्क) में 20 प्रतिशत से अधिक के शेयर रखने की इजाजत नहीं होगी जबकि इसी तरह कोई ब्राडकास्टिंग नेटवर्क सेवा प्रदाता कंपनी किसी कंटेंट ब्राडकास्टिंग सेवा प्रदाता कंपनी में 20 प्रतिशत से अधिक के शेयर नहीं रख सकती है। तीसरा प्रस्ताव यह है कि कंटेंट ब्राडकास्टिंग सेवा प्रदाता कंपनी और उसकी सहयोगी कंपनियों को किसी शहर या राज्य में एक निश्चित संख्या से अधिक चैनल चलाने की इजाजत नहीं होगी जिसकी पूरे देश में अधिकतम सीमा 15 प्रतिशत होगी।
कहने की जरूरत नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी मीडिया कंपनियों की बढ़ती ताकत और वर्चस्व के मद्देनजर एकाधिकार के खतरों को रोकने के लिए क्रास मीडिया होल्डिंग पर पाबंदी लगाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिका सहित कई विकसित देशों में इस तरह के प्रावधान हैं। हालांकि भारत में अभी स्पष्ट तौर पर मीडिया एकाधिकार की स्थिति नहीं पैदा हुई है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस तरह की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां मजबूत हुई हैं। किसी और आर्थिक गतिविधि और क्षेत्र की तुलना में मीडिया में एकाधिकार का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह सूचना और विचारों के प्रसार के मामले में विविधता और बहुलता को सीमित कर देता है।
जाहिर है कि इसका सबसे बुरा प्रभाव लोकतांत्रिक बहस-मुबाहिसे पर पड़ता है। लोकतंत्र की सफलता के लिए अकसर जिस ''जनक्षेत्र`` (पब्लिक स्फेयर) को मजबूत करने की बात की जाती है, उसका एक महत्वपूर्ण माध्यम और मंच मीडिया है। ''जनक्षेत्र`` की सफलता इस बात में निहित है कि वह राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय मुद्दों और विषयों पर होनेवाली लोकतांत्रिक बहसों और चर्चाओं में विभिन्न विचारों को सामने आने की किस हद तक जगह और गुंजाइश पैदा करता है। मीडिया खासकर समाचार माध्यमों में एकाधिकार के कारण एक ही तरह के विचारों और सूचनाओं को जगह मिल पाती है और इस तरह आर्थिक एकाधिकार के कारण मीडिया कंपनियों के धनी होने के बावजूद लोकतंत्र गरीब होता चला जाता है।
इसलिए आम पाठकों और दर्शकों के परिपे्रक्ष्य को ध्यान में रखें तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में क्रास मीडिया प्रतिबंधों का स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि इस विधेयक में प्रस्तावित प्रावधान न सिर्फ बहुत कमजोर बल्कि आधे-अधूरे हैं। इसके बावजूद प्रसारण विधेयक के जिस एक पहलू की मीडिया कंपनियों खासकर बड़े मीडिया संस्थानों ने सबसे अधिक विरोध किया है, वह क्रास मीडिया प्रतिबंधों का प्रस्ताव ही है। वैसे यह आश्चर्य की बात है कि उदारीकरण का मंत्र जपनेवाली सरकार क्रास मीडिया प्रतिबंधों का प्रस्ताव लेकर आई है जिसका उसकी आर्थिक नीतियों के साथ कोई तालमेल नहीं दिखाई पड़ता है। इसलिए हैरत नहीं होगी अगर यूपीए सरकार सबसे पहले क्रास मीडिया प्रतिबंधों की ही बलि चढ़ाए। अगर ऐसा होता है तो यह बहुत अफसोस की बात होगी।
प्राधिकरण का ढांचा : कैसे सुनिश्चित करें स्वतंत्रता और स्वायत्तता
प्रसारण विधेयक के अध्याय तीन में विनियामक प्राधिकरण के जिस ढांचे का प्रस्ताव किया गया है, उससे साफ है कि सरकार प्राधिकरण को एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था के रूप में खड़ा नहीं होने देना चाहिए है। विधेयक के मुताबिक विनियामक प्राधिकरण को दूरसंचार क्षेत्र की विनियामक संस्था-दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) - के मॉडल पर खड़ा किया जाएगा लेकिन ट्राई के मॉडल की सीमाएं स्पष्ट हैं। पहली बात तो यह है कि प्रसारण प्राधिकरण (ब्राई) का दायरा और भूमिका ट्राई के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यापक और महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्राई टीवी की अंतर्वस्तु (कंटेंट) को भी विनियमित (रेग्यूलेट) करेगी। दूसरे, ट्राई के अनुभव से साफ है कि वह उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के बजाय टेलीकॉम कंपनियों के हितो को अधिक ध्यान रखती है। वह टेलीकॉम कंपनियों का अखाड़ा बन गयी है। इसलिए प्रसारण प्राधिकरण का मॉडल ट्राई कतई नहीं हो सकती है।
लेकिन सरकार प्रसारण प्राधिकरण (ब्राई) को ट्राई के मॉडल पर ही खड़ा करना चाहती है। विधेयक के अनुसार ब्राई के अध्यक्ष और अन्य छह पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति सीधे केन्द्र सरकार करेगी। केन्द्र सरकार का अर्थ है- स०त्तारूढ़ दल। जाहिर है कि ब्राई के अध्यक्ष और सदस्य सत्तारूढ़ दल के पसंद के होंगे और वे वही करेंगे जो सत्तारूढ़ दल चाहेगा। यह स्थित स्वतंत्र विनियमन की अवधारण के बिल्कुल विपरीत है। हैरत की बात यह है कि प्रसारण विधेयक के निर्माताओं को प्रसार भारती कानून का भी ध्यान नहीं रहा जिसमें प्रसार भारती बोर्ड की स्वतंत्रता और स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए उसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति हेतु राज्यसभा के अध्यक्ष, प्रेस परिषद के अध्यक्ष और राष्ट्रपति के प्रतिनिधि की एक समिति करती है। हालांकि यह समिति भी प्रसार भारती की स्वतंत्रता और स्वायत्ता की गारंटी करने में नाकाम रही है, वैसे में सीधे केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त ब्राई कितनी 'स्वतंत्र और स्वायत्त` होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन सरकार को इतने से संतोष नहीं है। प्रसारण विधेयक के अनुसार ब्राई का सचिव प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) होगा जो केन्द्र सरकार की ओर से मुहैया कराए गए तीन अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारियों में से चुना जाएगा। इसी तरह ब्राई के पांच क्षेत्रीय केन्द्रांे-दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और गुवाहाटी- के निदेशक केन्द्र सरकार के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी होंगे। इस तरह ब्राई केन्द्र सरकार का, केन्द्र सरकार के लिए और केन्द्र सरकार द्वारा गठित एक ऐसी संस्था होगी जो प्रमुख तौर पर केन्द्र सरकार के गुन गाएगी। उसके 'स्वतंत्र` रवैया अपनाना चाहे तो विधेयक की धारा 38 के तहत केन्द्र सरकार को उसे निर्देश देने का अधिकार है जिसे ब्राई को मानना ही होगा।
जाहिर है कि इस तरह का विनियामक प्राधिकरण स्वतंत्र और स्वायत्त विनियमन के बजाय संकीर्ण नियंत्रण का औजार बन जाएगा। ऐसी ऐजेंसी को चैनलों के अन्तर्वस्तु (कंटेंट) जैसे संवेदनशील मसले को विनियमित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। अन्तर्वस्तु का मसला सीधे-सीधे अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। इस स्वतंत्रता के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता है और न ही किसी भी एजेंसी खासकर सरकारी एजेंसी को उसमें हस्तक्षेप करने की अनुमति दी जा सकती है। वैसे तो आदर्श स्थिति यही हो सकती है कि किसी भी किस्म का विनियमन न हो लेकिन उसके लिए यह जरूरी है कि मीडिया राज्य और निजी पूंजी दोनों के कब्जे से बाहर हो। चूंकि ऐसी आदर्श स्थिति नहीं है, इसलिए राज्य और निजी पूंजी दोनों के दबावों से नागरिकों के सूचना और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक प्राधिकरण जरूरी है।
सवाल यह है कि एक स्वतंत्र और स्वायत्त विनियामक प्राधिकरण का ढांचा कैसा होना चाहिए ? क्या इस प्राधिकरण को किसी और देश के विनियामक प्राधिकरण के मॉडल (जैसे ब्रिटेन के ऑफकॉम या अमेरिका के एफसीसी) पर खड़ा किया जाए ? कहने की जरूरत नहीं है कि ब्रिटिश और अमेरिका मॉडल की भी कई सीमाएं हैं। अमेरिका में तो एफसीसी द्वारा मीडिया उद्योग को अ-विनियमित (डीरेगुलेट) करने के प्रयासों के खिलाफ व्यापक जन अभियान चल रहा है। ऐसे में, उनके और अन्य देशों के अनुभवों से सीखते हुए भारत में देश के आंतरिक जरूरतों के मुताबिक एक ऐसा विनियामक प्राधिकरण का ढांचा तैयार किया जाना चाहिए जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक और पारदर्शी हो।
इसके लिए जरूरी है कि प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया से केन्द्र सरकार और उसके अफसरों को दूर रखा जाए। प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए जिसमें लोकसभा अध्यक्ष, उपराष्ट्रपति, लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रेस परिषद के अध्यक्ष, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त, एडीटर्स गिल्ड के अध्यक्ष, आईएनएस के अध्यक्ष, दिल्ली स्थित केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय के कुलपति, मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पत्रकार संगठन के अध्यक्ष, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त आदि को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए। प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए स्पष्ट तौर पर कुछ अर्हताएं निश्चित की जानी चाहिए जिनमें सार्वजनिक जीवन में उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका, मीडिया के साथ संबंध और किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य न होना जरूरी होना चाहिए।
इस बोर्ड द्वारा प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के चयन के बाद उसके अधिकारियों और कर्मचारियों के चयन और नियुक्ति का अधिकार प्राधिकरण के पास होना चाहिए और उसमें केन्द्र सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। प्राधिकरण के सीईओ और क्षेत्रीय निदेशको के बतौर किसी नौकरशाह की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। प्राधिकरण को स्वयं अपने नियम और कानून बनाने के अधिकार होने चाहिए। जनता द्वारा मिलनेवाली शिकायतो खासकर कंटेंट से संबंधित शिकायतो पर प्राधिकरण को खुली जांच-पड़ताल करना चाहिए और जहां तक संभव हो, उसकी कार्यवाहियां खुली और पारदर्शी होनी चाहिए। प्राधिकरण के निर्णयों को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
यहां एक और सवाल पर विचार जरूरी है कि क्या प्राधिकरण को टीवी चैनलों और केबल आपरेटरों को दंडित करने का अधिकार होना चाहिए ? और अगर यह अधिकार होना चाहिए तो दंड की सीमा क्या होनी चाहिए ? प्रसारण विधेयक ने प्राधिकरण को दंड के व्यापक और सख्त अधिकार दिए गए हैं। प्राधिकरण दो साल से लेकर पांच साल तक की सजा सुना सकता है और दस लाख से लेकर पच्चास लाख रूपये तक का जुर्माना कर सकता है। उसे चैनलों और केबल आपरेटरों के स्टूडियों और दफ्तरों पर छापा मारने से लेकर उनके उपकरणों को जब्त करने तक का अधिकार दिया गया है।
निश्चय ही, एक उदार लोकतंत्र में किसी विनियामक प्राधिकरण को इतने व्यापक अधिकार देने का कोई औचित्य नहीं है। यह तर्क दिया जा सकता है कि कड़े दंड की व्यवस्था सिर्फ डराने या निरोधक (डेटरेंट) उपाय के रूप में रखी गई है। लेकिन फिर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को देखते हुए इतने सख्त निरोधक उपाय को किसी तरह से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए दंड और जुर्माने की व्यवस्था को हल्का किया जाना चाहिए और इसके बजाय गड़बड़ी करने वाले चैनलों पर अंकुश लगाने के लिए 'नाम लेकर शर्मिंदा करने` (नेम एंड शेम) की पद्धति पर जोर देना चाहिए। एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र विनियामक प्राधिकरण का उद्देश्य टीवी चैनलों पर अंकुश लगाने से अधिक एक ऐसा लोकतांत्रिक माहौल बनाने पर होना चाहिए जिसमें दर्शकों को अधिक से अधिक सक्रिय और जागरूक बनाया जा सके।
दरअसल, विनियमन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया उपर के बजाय नीचे से शुरू हो तो वह स्थिति आदर्श स्थिति होगी। इसके लिए जरूरी है कि दर्शकों में मीडिया साक्षरता का अभियान चलाया जाए। प्राधिकरण के साथ-साथ यह जिम्मेदारी तमाम नागरिक संगठनो, शैक्षणिक संस्थानों और मीडिया संस्थानों को उठाना चाहिए। जागरूक और सचेत दर्शकों का समूह ही गड़बड़ी करनेवाले मीडिया का वास्तविक जवाब हो सकता है।
भारतीय समाचार माध्यमों में खबरपाल
समय आ गया है सबकी खबर लेने और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों और संस्थाओं से जवाबदेही की मांग करनेवाले समाचार माध्यमों के कामकाज की खबर ली जाए और जवाबदेही तय की जाए
अंग्रेजी के प्रतिष्ठित दैनिक 'द हिंदू` ने पहल कर दी है। उसने 'समाचारपत्र के कामकाज में आत्म-नियमन, जवाबदेही और पारदर्शिता की प्रक्रिया को संस्थावद्ध बनाने के उद्देश्य` से एक पूर्वकालिक पाठक संपादक (रीडर्स एड़ीटर) नियुक्त करने की घोषणा की है। उसके साथ ही मराठी के लोकप्रिय दैनिक 'सकाल` ने भी अपने अखबार में ओम्बुडसमैन की नियुक्ति का ऐलान किया है। 'द हिंदू` के पहले पाठक संपादक के नारायणन होंगे जो कि 1966 से ही इस अखबार समूह से जुड़े रहे हैं और 1996 में सेवानिवृत्त होने के बाद से वरिष्ठ संपादकीय सलाहकार के बतौर काम कर रहे थे। इस तरह 'द हिंदू` ने अपने पहले पाठक संपादक के बतौर अखबार के ही एक वरिष्ठ सहयोगी को चुना है। 'द हिंदू` के मुताबिक उसके पाठक संपादक का कार्यक्षेत्र और सेवा शर्तें ब्रिटेन के मशहूर अखबार ' द गार्जियन` के रीडर्स एडीटर के मॉडल पर होंगी।
उम्मीद के मुताबिक 'द हिंदू` की इस पहल का उसके पाठकों ने स्वागत किया है लेकिन इस मुद्दे पर मराठी दैनिक 'सकाल` के अलावा अन्य समाचार माध्यमों और प्रमुख मीडिया समूहों की चुप्पी हैरान करनेवाली है। 'द हिंदू` की इस महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय पहल पर चर्चा और बहस तो दूर उसकी नोटिस तक नहीं ली गयी है। एक तरह से मुख्यधारा के बड़े मीडिया समूहों ने इस खबर को पूरी तरह से 'ब्लैकआउट` करके यह साबित करने की कोशिश की है कि 'द हिंदू` की इस पहल का कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है और यह उसका आंतरिक मामला है। लेकिन क्या यह सचमुच, 'द हिंदू` और 'सकाल` का आंतरिक मामला भर है और इसका कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है?
कहने की जरूरत नहीं है कि यह 'द हिंदू` या 'सकाल` का आंतरिक मामला भर नहीं है और इसका सार्वजनिक महत्व बहुत अधिक है। पहली बात तो यह है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में समाचार माध्यम निजी हाथों में होने के बावजूद सार्वजनिक महत्व के संस्थान हैं। उनकी राष्ट्रीय और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे लोकतंत्र के चौथे खंभे माने जाते हैं और जनहित में अन्य सार्वजनिक संस्थाओं और व्यक्तियों के कामकाज की निगरानी करते हैं। ऐसे में, जब समाचार माध्यम सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों और संस्थाओं से निरंतर जवाबदेही की मांग करते हैं तो वे स्वयं को इस जवाबदेही से अलग कैसे रख सकते हैं?
जाहिर है कि समाचार माध्यम भी आलोचना से परे नहीं हैं। उनसे सत्ता के प्रति नहीं बल्कि समाज के प्रति जवाबदेह होने की अपेक्षा की जाती है। इसका एक अर्थ यह है कि उन्हें अपने पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं के प्रति जवाबदेह होना ही चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में समाचार माध्यमों में अपनी गलतियों और अशुद्धियों को अनदेखा करने और पाठकों और ऑडियंस की शिकायतों के प्रति ठंडा रवैया बरतने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। खासकर इलेक्ट्रानिक समाचार माध्यमों के विस्तार के बाद तो पानी सिर के उपर से बहने लगा है। समाचार माध्यम न सिर्फ तथ्यगत अशुद्धियों के प्रति लापरवाह हो गए हैं बल्कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं हो रहा है।
समाचार माध्यमों का इस 'टैबलॉयड पत्रकारिता` से आर्थिक तौर पर मुनाफा भले हो रहा हो लेकिन इसका सीधा असर उनकी विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। उनकी साख लगातार गिर रही है। भारत में तो ऐसा कोई तुलनात्मक सर्वेक्षण नहीं होता जिससे पता चल सके कि समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता का ग्राफ किधर जा रहा है लेकिन अमेरिका में ऐसे सर्वेक्षण होते रहते हैं। अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित सर्वेक्षण एजेंसी प्यू रिसर्च के मुताबिक अमेरिका में 80 के दशक में दस में से सात अमेरिकी नागरिक समाचार माध्यमों पर भरोसा करते थे लेकिन अब उनकी संख्या घटकर आधी रह गई है। इसकी बड़ी वजह अमेरिकी समाचार माध्यमों की पूर्वाग्रह और पक्षपात से भरी रिपोर्टिंग और अपनी गलतियों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति है। अमेरिका का उदाहरण देने के पीछे मकसद यह है कि आजकल अधिकांश भारतीय समाचार माध्यम भी अमेरिकी मॉडल को ही अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन पाठक, दर्शक और श्रोता अब बदल चुके हैं। वे अब समाचार माध्यमों के निष्क्रिय उपभोक्ता भर नहीं हैं। जैसे-जैसे जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना बढ़ रही है, पाठकों और दर्शकों की सक्रियता भी बढ़ रही है। उनकी आवाज को दबाना या सच्चाई को छुपाना संभव नहीं रह गया है। 'मीडिया प्रबंधन` की सीमाएं उजागर होने लगी हैं। पाठकों और दर्शकों ने अपनी बात कहने के वैकल्पिक माध्यम खोज निकाले हैं। इंटरनेट ने ब्लॉग्स आदि के जरिए उन्हें अपनी बात कहने और आपस में विचार-विमर्श का अवसर दिया है। इंटरनेट पर आज ऐसे दर्जनों समूह सक्रिय हैं जो मुख्यधारा के मीडिया की सार्वजनिक भूमिका के संदर्भ में उसके कामकाज और उसकी अन्तर्वस्तु की समीक्षा कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर सुधार के लिए अभियान भी चला रहे हैं। साफ है कि अब समाचार माध्यम मनमानी करके बच नहीं सकते हैं और उनपर जवाबदेही का दबाव बढ़ रहा है।
हाल के अमेरिकी उदाहरण से भी यह स्पष्ट है कि इराक युद्ध के पहले युद्ध के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अमेरिकी समाचार माध्यमों ने बिना किसी जांच-पड़ताल के जिस तरह से सरकारी झूठ का प्रचार किया, उसकी कलई खुलने के बाद उन्हें मुंह छुपाने के लिए जगह नहीं मिल रही है। नागरिक समाज के संगठनों ने इस मुद्दे पर अभियान चलाकर समाचार माध्यमों को माफी मांगने और दोषी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया है। इसी तरह भारत में भी नागरिक समाज के संगठनों ने कुछ बड़े समाचारपत्रों में छप रही अश्लील सामग्री के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और अब सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर विचार कर रहा है।
लेकिन इस बीच, एक खतरनाक बात यह हुई है कि सत्ता प्रतिष्ठान मुख्यधारा के समाचार माध्यमों की गड़बड़ियों के प्रति आम लोगों के आक्रोश को भुनाने की कोशिश कर रहा है। हाल के दिनों में सरकार की ओर से समाचार माध्यमों खासकर इलेक्ट्रानिक समाचार माध्यमों के नियमन और निगरानी के लिए कानून बनाने से लेकर दर्शक मंच जैसी संस्थाएं गठित करने तक के कई प्रस्ताव आए हैं। हालांकि सत्ता प्रतिष्ठान को समाचार माध्यमों के मौजूदा नकारात्मक रूझानों से कोई खास शिकायत नहीं है क्योंकि यह स्थिति कुल मिलाकर उसके मुफीद ही बैठती है।
आखिर अखबारों और टेलीविजन पर अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के प्रेम प्रसंगों, भारत-पाक क्रिकेट श्रृंखला और टुटपुंजिये अपराधों की खबरें छाई रहें तो भला सत्ता प्रतिष्ठान से अधिक खुश कौन होगा? उसके लिए इससे अधिक राहत की बात क्या होगी कि किसानों की आत्महत्याओं, बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और चरमराती प्रशासनिक मशीनरी जैसे अहम प्रश्नों पर उसे कोई जवाब नहीं देना पड़ रहा है। इसके बावजूद अगर सत्ता प्रतिष्ठान को मौका मिल जाए तो वह मीडिया पर अंकुश लगाने से बाज नहीं आएगा। इसके जरिए वह उन समाचार माध्यमों को काबू में करने की कोशिश कर सकता है जिनका अभी 'टैबलॉयडाइजेशन` नहीं हुआ है। इसलिए समय आ गया है जब समाचार माध्यमों के कामकाज में आत्मनियमन, जवाबदेही और पारदर्शिता की प्रक्रिया को संस्थाबद्ध बनाने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि इसकी पहल सरकार के बजाए सार्वजनिक जीवन में सक्रिय संस्थाओं और समूहों और सबसे बढ़कर मीडिया समूहों की ओर से होनी चाहिए। 'द हिंदू` और 'सकाल` ने पाठक संपादक नियुक्त करके इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। जरूरत इस बहस को आगे बढ़ाने की है।
हालांकि भारत में 'द हिंदू या 'सकाल` पहले पहला अखबार नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की आंतरिक आलोचना और सुधार की संस्थाबद्ध कोशिश की है। इससे पहले 80 के दशक में 'द टाइम्स आफ इंडिया` समूह ने न्यायमूर्ति पी एन भगवती को अपने अखबार का ओम्बुडसमैन या हिंदी में कहिए तो खबरपाल नियुक्त किया था। लेकिन उसका यह प्रयोग अल्पजीवी साबित हुआ। उसने पी एन भगवती के कार्यकाल के पूरा होने के बाद पूर्व महालेखाकार टीएन चतुर्वेदी को इस पद पर नियुक्त किया लेकिन उसके बाद किसी की नियुक्ति नहीं हुई और बहुत खामोशी के साथ यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। वैसे 'टाइम्स आफ इंडिया` समूह का यह प्रयोग इसलिए बहुत उल्लेखनीय साबित नहीं हो पाया क्योंकि उसके खबरपालों ने वह सक्रियता नहीं दिखाई या उन्हें दिखाने नहीं दिया गया जिसकी उनसे अपेक्षा की गयी थी।
दरअसल, मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर यह सवाल हमेशा से तीखी बहसों और विवादों का विषय रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सर्वोच्चता को ध्यान में रखते हुए समाचार माध्यमों की निगरानी और जवाबदेही निश्चित करने का क्या तरीका होना चाहिए? एक तरह से इस मसले पर अब तक आत्मनियमन की व्यवस्था अपनाने को लेकर आम सहमति रही है। इसके तहत पहले यह माना जाता था कि समाचार माध्यमों के अंदर गलतियों को पकड़ने और सुधारने की संपादकीय व्यवस्था पर्याप्त है। लेकिन बाद में संपादकीय व्यवस्था की सीमाएं साफ दिखने लगीं। खासकर हाल के वर्षों के अनुभवों से यह साफ है कि यह व्यवस्था न सिर्फ इस जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम रही है बल्कि कुछ मामलों में तो गलतियों और गड़बड़ियों को प्रश्रय देने का काम कर रही है।
इस बीच, मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में स्वयं संपादक नाम की संस्था को लगातार कमजोर करने या पूरी तरह से खत्म करने की कोशिशें भी तेज हुईं हैं। कई अखबारों में आज मालिक ही संपादक हैं और कई में संपादक की भूमिका बदलकर मैनेजर की हो गई है। उसका प्राधिकार लगातार छीजता जा रहा है। ऐसे में, संपादक के स्तर पर गलतियों और गड़बड़ियों के सुधार-संशोधन की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। इसी तरह आत्मनियमन की अन्य व्यवस्थाएं- पत्रकारीय आचार संहिता और प्रेस कांउसिल जैसी संस्थाएं भी एक हद तक ही उपयोगी साबित हुई हैं और पिछले वर्षों के अनुभवों से उनकी सीमाएं साफ हो गईं हैं।
इसलिए अब आत्मनियमन की व्यवस्था के तहत ही समाचार माध्यमों में संपादकीय व्यवस्था से अलग ओम्बुडसमैन या खबरपाल नियुक्त करने की मांग जोर पकड़ रही है। एक अमेरिकी अखबार 'सैक्रेमेंटो बी' के ओम्बुडसमैन रह चुके आर्थर सी नाउमन के मुताबिक ओम्बुडसमैन या खबरपाल वह व्यक्ति है जो लोगों से शिकायते प्राप्त करता है, उनकी जांच करता है और विवादों के उचित समाधान की कोशिश करता है। वह एक तरह से अखबार का आंतरिक आलोचक है लेकिन वह संपादकीय नियंत्रण से स्वतंत्र है। हालांकि ओम्बुडसमैन की व्यवस्था बहुत पुरानी है और कुछ इतिहासकारों के मुताबिक इसकी शुरूआत स्वीडन से हुई लेकिन दुनियाभर में समाचार माध्यमों में ओम्बुडसमैन के जिस रूप को हम आज देख रहे हैं, वह चालीस-पच्चास साल से अधिक पुराना नहीं है। वैसे कुछ लोग मानते हैं कि जापानी समाचारपत्र 'असाही शिम्बुन` ने 1920 के दशक की शुरूआत में ही पाठक प्रतिनिधि की नियुक्ति करके इसकी शुरूआत की थी।
बहरहाल, आज दुनिया के कई देशों में ओम्बुडसमैन की व्यवस्था काम कर रही है। हालांकि इस संस्था के नाम, स्वरूप, सेवाशर्तों और कामकाज के दायरे में काफी विभिन्नताएं हैं लेकिन सबके पीछे मूलभावना एक ही है। ओम्बुडसमैन को कहीं रीडर्स एडीटर, कहीं पब्लिक एडीटर, कहीं रीडर्स रिपे्रजेंटेटिव कहा जाता है। कुछ समाचार माध्यम बाहर के वरिष्ठ पत्रकारों को और कुछ अपने ही संस्थान में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों को इस पद पर नियुक्त करते हैं। कुछ समाचार माध्यम खबरपाल को निश्चित समयावधि के लिए नियुक्त करते हैं और सेवाशर्त के मुताबिक बाद में उन्हें अपने यहां कोई नौकरी नहीं देते ताकि उनकी स्वतंत्रता बनी रहे। कुछ समाचार माध्यम खबरपाल के कार्यकाल को आपसी सहमति के आधार पर लंबे समय तक विस्तार देते रह सकते हैं।
खबरपाल के कार्यक्षेत्र में समाचार माध्यम की गलतियों और गड़बडियों पर नजर रखना, उसके लिए जिम्मेदारी तय करना, संपादकीय विभाग को उससे अवगत कराना और सार्वजनिक तौर पर सुधार-संशोधन की व्यवस्था को लागू करना होता है। वह इसके लिए न सिर्फ पाठकों और दर्शकों की शिकायतंे सुनने की संस्थाबद्ध व्यवस्था बनाता है बल्कि समाचार माध्यम के कामकाज में बरती जा रही गलतियों और गड़बड़ियों पर वह स्वतंत्र रूप से भी कार्रवाई करता है। अधिकांश समाचार माध्यमों ने खबरपालों को अखबार में अपनी बात कहने के लिए साप्ताहिक कालम या टेलीविजन पर साप्ताहिक कार्यक्रम के लिए समय दिया हुआ है। समाचार माध्यम उसके द्वारा दिए गए फैसलों, सुधारों-संशोधनों और उसके विचारों के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक नहीं लगा सकते।
खबरपाल किसी भी शिकायत की जांच करते हुए अखबार के संपादकीय विभाग से जुड़े संबंधित सदस्य को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देता है। लेकिन जांच-पड़ताल के बाद वह स्वतंत्र निर्णय लेता है और उससे न सिर्फ वरिष्ठ संपादक और प्रबंधन को अवगत कराता है बल्कि पाठकों भी उसकी जानकारी देता है। खबरपाल समाचार माध्यम के दफ्तर में ही बैठता है और अधिकांश समाचार माध्यमों में उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह संपादकीय बैठकों में शामिल हो सकता है। यह संभव है कि कई बार शिकायतें सही न हों लेकिन पाठकों को यह लगता है कि कोई उनकी भी बात सुनने और उसपर जांच-पड़ताल करने वाला है। एक तरह से वह पाठक-दर्शक और समाचार माध्यम के बीच पुल और संवाद के सक्रिय मंच की तरह काम करता है।
यह ठीक है कि कई समाचार माध्यमों ने खबरपाल की नियुक्ति अपनी छवि सुधारने या कहिए कि एक 'पीआर एक्सरसाइज` के बतौर की है। यह भी ठीक है कि सबकुछ के बावजूद आज भी पूरी दुनिया में मुश्किल से 50 के आसपास ओम्बुडसमैन काम कर रहे हैं और अधिकांश समाचार माध्यमों ने इस विचार को अब तक स्वीकार नहीं किया है। लेकिन यह भी सही है कि हाल के वर्षों में खासकर मुख्यधारा के समाचार मीडिया पर कारर्पोरेट नियंत्रण बढ़ने के साथ जिस तरह की गलतियां और गड़बड़ियां हो रही है उसे देखते हुए खबरपाल की प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है।
खबरपाल की प्रासंगिकता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि जिन समाचार माध्यमों ने इस व्यवस्था को अपनाया है, उनमें से अधिकांश यह स्वीकार करते हैं कि खबरपाल की मौजूदगी के कारण न सिर्फ पाठकों का उनमें विश्वास बढ़ा है बल्कि समाचार माध्यम की गुणवत्ता में भी काफी सुधार हुआ है। दरअसल, एक सक्रिय और स्वतंत्र खबरपाल की मौजूदगी के कारण समाचार माध्यमों के संपादकों और संवाददाताओं में अतिरिक्त सतर्कता देखी जाती है। समाचार माध्यमों की गलतियों पर खुली चर्चा के कारण अच्छी पत्रकारिता को भी प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि एक खबरपाल समाचार माध्यम में पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों-वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता, संतुलन, सच्चाई और जनहित के पालन की गारंटी करता है। उसके जरिए समाचार माध्यम में पाठकों और दर्शकों की भागीदारी भी बढ़ती है।
खबरपाल अपने साप्ताहिक स्तंभों के जरिए पाठकों में एक तरह से मीडिया साक्षरता पैदा करने का काम भी करता है। वह पाठकों को समाचारपत्रों को पढ़ने और समझने के सूत्र देता है और एक तरह से उन्हें जागरूक पाठक के रूप में तैयार करता है। इस तरह से वह हजारों छोटे-छोटे खबरपाल तैयार कर देता है। पाठकों की जागरूकता बढ़ने के साथ ही समाचारपत्र पर अपनी गुणवत्ता बढ़ाने का दबाव भी बढ़ता जाता है। एक तरह से वह कुल मिलाकर पत्रकारिता के भविष्य के लिए एक बेहतर जमीन तैयार करने की कोशिश करता है।
उम्मीद करनी चाहिए कि 'द हिंदू` और 'सकाल` की पहल को फलने-फूलने का पूरा मौका मिलेगा। इस प्रयोग पर न सिर्फ मीडिया से जुड़े लोगों की बल्कि मीडिया के स्वास्थ्य में रूचि रखने वाले हर नागरिक की निगाह है। 'द हिंदू` और 'सकाल` को अपने खबरपालों को ऐसा माहौल और पूरी स्वतंत्रता देनी होगी ताकि वे अपने काम से भविष्य के खबरपालों के लिए एक मानदंड कायम कर सकें। लेकिन इस प्रयोग की सफलता में पाठकों की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उनकी सक्रियता से ही खबरपालों को ताकत मिलेगी।
गुमनाम स्रोतों पर उठा बवाल
रिपोर्टिंग में गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार भी विवादों के केंद्र में अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचारपत्र और 'न्यूजपेपर ऑफ रिकार्डस` कहे जाने वाले 'न्यूयार्क टाइम्स` और उसकी पत्रकार जुडिथ मिलर हैं। मिलर अभी हाल में ही अपनी एक खबर के स्रोत की पहचान का खुलासा न करने के कारण ८५ दिन जेल में रहकर लौटी हैं। सरसरी तौर पर देखने पर ऐसा लगता है कि स्रोत की गोपनीयता बनाए रखने के लिए मिलर ने जेल जाना कबूल किया लेकिन स्रोत की पहचान नहीं उजागर की। इसी आधार पर कुछ लोग मिलर को शहीद के रूप में पेश कर रहे हैं। आखिर पत्रकारिता के कुछ सबसे बुनियादी उसूलोंं में से एक उसूल स्रोत की गोपनीयता बनाए रखने का है।
लेकिन अमेरिकी मीडिया और पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा मिलर को शहीद के बजाय खलनायक मानता है। यहां तक कि हाल-हाल तक उनके साथ खड़े 'न्यूयार्क टाइम्स` के संपादक और प्रकाशक ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। मिलर शहीद हैं या खलनायक-इस सवाल का उत्तर जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि पूरा मसला क्या है ? मामला यह है कि जब बुश प्रशासन इराक पर हमले की तैयारी कर रहा था और इसके लिए इराक के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर रहा था तो उसने इराक पर एक आरोप यह भी लगाया था कि जनसंहार के हथियार तैयार करने के लिए उसने अफ्रीकी देश नाइजर से चोरी-छुपे यूरेनियम मंगवाया था। लेकिन इस बारे में सबूत इकट्ठा करने के लिए सीआईए की ओर से नाइजर भेजे गए अमेरिकी राजदूत जोसफ विल्सन ने अपनी जांच में इस आरोप को फर्जी पाया। उन्होंने बाद में 'न्यूयार्क टाइम्स` में एक लेख लिखकर इस आरोप को झूठा बताते हुए खुलासा किया कि बुश प्रशासन ने इराक पर हमले के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए खुफिया सूचनाओं में तोड़-मरोड़ की है।
विल्सन के इस खुलासे से बुश प्रशासन बौखला गया और इराक पर हमले के कुछ प्रमुख सूत्रधारों ने जवाबी हमले में जुडिथ मिलर जैसे कुछ चहेते पत्रकारों के जरिए यह खबर लीक की कि विल्सन की पत्नी वैलरी प्लेम सीआईए की अधिकारी हंै और उन्होंने जानबूझकर एक पूर्व डेमोक्रेट विल्सन को नाइजर भेजा था। इस लीक के गुमनाम स्रोतों के हवाले से पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद हंगामा हो गया क्योंकि अमेरिकी कानूनों के मुताबिक खुफिया सेवा में काम करने वाले एजेंट की पहचान उजागर करना अपराध है। यह सवाल उठा कि वैलेरी प्लेम की पहचान किसने उजागर की ? दबाव बढ़ने के बाद इसकी जांच के लिए कानून मंत्रालय ने सरकारी वकील पैट्रिक फिट्जेराल्ड को नियुक्त किया।
फिट्जेराल्ड ने जुडिथ मिलर सहित कुछ और पत्रकारों को नोटिस भेजकर गवाही के लिए बुलाया और उनसे अपने स्रोत की पहचान बताने के लिए कहा। लेकिन जुडिथ मिलर को छोड़कर अधिकांश पत्रकारों ने सरकारी वकील के साथ सहयोग किया। मिलर ने स्रोत की पहचान उजागर करने से साफ मना कर दिया। इस कारण मिलर को जेल जाना पड़ा।
लेकिन फिट्जेराल्ड ने इस मामले की पूरी सक्रियता से छानबीन की और अंतत: यह स्पष्ट हो गया कि उपराष्ट्रपति डिक चेनी के चीफ ऑफ स्टॉफ आई लुइस 'स्कूटर` लिबी और राष्ट्रपति बुश के चीफ ऑफ स्टॉफ कार्ल रोव ने ये सूचना लीक की थी। हालांकि जांच अभी जारी है लेकिन स्कूटर लिबी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है। इस बीच मिलर जेल से बाहर आ गई हैं लेकिन उनकी रिपोर्टिंग और स्रोतों के इस्तेमाल के तौर-तरीकों को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। यहां तक कि 'न्यूयार्क टाइम्स` के संपादक बिल केलर ने एक आंतरिक मेमो में स्वीकार किया है कि मिलर ने स्रोतों के मामले में उन्हें भी गुमराह किया। 'न्यूयार्क टाइम्स` के पब्लिक एडीटर यानी पाठकों के संपादक बायरन काल्मे ने मिलर की रिपोर्टिंग के तौर-तरीको पर सवाल उठाते हुए कहा है कि 'न्यूयार्क टाइम्स` को गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल के मामले में अपनी आचार संहिता के निर्देशों को और बेहतर बनाने की जरूरत है।
दरअसल, वैलेरी प्लेम के मामले के सामने आने से पहले से ही इराक प्रकरण में जुडिथ मिलर की रिपोर्टिंग को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। मिलर पर यह आरोप है कि उन्होंने इराक पर हमले के पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए गुमनाम स्रोतों के हवाले से लगातार ऐसी खबरें लिखीं जिनमें दावे के साथ यह कहा गया था कि इराक के पास जनसंहार के हथियार उपलब्ध हैं। 'न्यूयार्क टाइम्स` ने इन खबरों को काफी प्रमुखता से छापा भी। अब यह किसी से नहीं छुपा है कि इराक पर हमले के लिए बेचैन बुश प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों और मंत्रियों ने मिलर के जरिए ये विवादास्पद और झूठी सूचनाएं 'न्यूयार्क टाइम्स` में प्लांट करवाई थीं। बुश प्रशासन का मकसद इन खबरों के जरिए युद्ध के पक्ष में जनमत तैयार करना था। कह सकते हैं कि इस मामले में मिलर युद्ध से पहले ही बुश प्रशासन की 'नत्थी पत्रकार` (इम्बेडेड जर्नलिस्ट) के बतौर काम कर रही थी।
लेकिन इस प्रक्रिया में मिलर ने पत्रकारिता के उसूलों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने बुश प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं की छानबीन करने और उनकी पुष्टि हो जाने के बाद ही खबर लिखने के बजाय गुमनाम और विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से बेसिर-पैर की खबरें लिखीं, जिससे बुश प्रशासन को युद्ध के पक्ष में माहौल बनाने में मदद मिली। हालांकि मिलर और 'न्यूयार्क टाइम्स` इस मामले में अकेले नहीं थे और इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर समूचे अमेरिकी कार्पोरेट मीडिया ने युद्ध के पक्ष में माहौल बनाने के लिए इराक और सद्दाम हुसैन के खिलाफ बढ़ा-चढ़ाकर और कई बार बिलकुल झूठी खबरें प्रकाशित कीं। लेकिन 'न्यूयार्क टाइम्स` की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता के कारण मिलर की लिखी खबरें ज्यादा चर्चा में रहीं।
अब जब इराक में जनसंहार के हथियारों के बारे में बुश प्रशासन का सफेद झूठ उजागर हो चुका है तो कार्पोरेट मीडिया को अपनी विश्वसनीयता की चिंता सताने लगी है। यह एक सच्चाई है कि बुश प्रशासन के साथ-साथ अमेरिका में कार्पोरेट मीडिया की विश्वसनीयता भी अपने सबसे निम्नतम बिन्दु पर पहुंच गई है। अमेरिका की प्रतिष्ठित शोध संस्था प्यू रिसर्च के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 45 प्रतिशत अमेरिकी अखबारों में छपने वाली खबरों पर बहुत कम या बिलकुल भरोसा नहीं करते। इसका एक बड़ा कारण गुमनाम स्रोतों के जरिए छपने वाली खबरें हैं। पेन्सिल्वानिया विश्वविद्यालय के एनेनबर्ग पब्लिक पॉलिसी सेंटर द्वारा इस साल कराए गए एक सर्वेक्षण में 89 प्रतिशत पाठकों ने यह स्वीकार किया कि गुमनाम स्रोतों पर आधारित खबरों की सत्यता पर संदेह पैदा होता है। यही नहीं, 53 प्रतिशत पाठकों का कहना था कि गुमनाम स्रोतों पर आधारित खबरें छपनी ही नहीं चाहिए।
दरअसल, अमेरिकी पाठक कार्पोरेट समाचार मीडिया द्वारा ताकतवर सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ के हितों को आगे बढ़ाने वाले एजेंडे के जनमत तैयार करने के लिए खबरों में तोड़-मरोड़ करने और खबरे प्लांट करने से आजिज आ चुके हैं। खबरों में तोड़-मरोड़ करने और उन्हें प्लांट करने का प्रमुख तरीका गुमनाम स्रोतों का इस्तेमाल है। हाल के वर्षों में अमेरिकी मीडिया में गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल का चलन काफी बढ़ गया है। असल में, गुमनाम स्रोतों के हवाले से लिखी गई अधिकांश खबरें गढ़ी हुई होती हैं और वास्तविक सच्चाई से उनका बहुत कम लेना-देना होता है।
'न्यूयार्क टाइम्स` के एक स्टार पत्रकार जैसन ब्लेयर ने तो इस मामले में हद ही कर दी थी। ब्लेयर ने घर बैठे फर्जी डेटलाइन और सूत्रों के हवाले से दर्जनों खबरें लिख डालीं। बाद में जब उसका भांडा फूटा तो चेहरा बचाने के लिए ब्लेयर को तो निकाला ही गया, 'न्यूयार्क टाइम्स` के कार्यकारी संपादक को भी इस्तीफा देना पड़ा। तब 'न्यूयार्क टाइम्स` ने एलान किया था कि वह गुमनाम सूत्रों के हवाले से खबरें छापने के मामले में कड़ाई बरतेगा। मजे की बात यह है कि न्यूयार्क टाइम्स समेत अधिकांश अखबारों और पत्रिकाओं ने गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल को लेकर नीति बना रखी है। लेकिन हाल के उदाहरणों से जाहिर है कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं।
अभी ज्यादा समय नहीं गुजरा, इस साल मई में मशहूर समाचार पत्रिका 'न्यूजवीक` ने गुमनाम स्रोत के हवाले से यह खबर छापी कि गुआंतनामो जेल में अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने मुस्लिम कैदियों का मुंह खुलवाने और उनका मनोबल तोड़ने के लिए कुरान का अपमान किया। इस रिपोर्ट के छपने के बाद पूरे मुस्लिम जगत मंे तूफान खड़ा हो गया। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के साथ संघर्ष में दर्जनों लोग मारे गए और बड़ी संख्या में घायल हुए। इस प्रकरण में बुश प्रशासन ने गुमनाम सूत्रों के हवाले से इतनी संवेदनशील और भड़काऊ रिपोर्ट छापने के लिए 'न्यूजवीक` की कड़ी आलोचना की। बाद में 'न्यूजवीक` ने इस रिपोर्ट को वापस ले लिया और ऐलान किया कि वह भविष्य में गुमनाम सूत्रों के इस्तेमाल के मामले में अधिक सर्तकता बरतेगी। हालांकि बाद में यह बात सच साबित हुई कि गुआंतनामो में कुरान के अपमान और कैदियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं हुई थीं।
हैरानी की बात नहीं है कि 'न्यूजवीक` अपनी रिपोर्ट के बचाव में ज्यादा देर खड़ी नहीं रह पाई। अमेरिकी कॉरपोरेट मीडिया की सरकार से नत्थी (एंबेडेड) पत्रकारिता की यही सीमा है। 'न्यूजवीक` या 'न्यूयार्क टाइम्स` उसके अपवाद नहीं हैं। वह अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और उसके हितों नुकसान नहीं पहुंचा सकते क्योंकि वह स्वयं इस प्रतिष्ठान का उपक्रम है; हालांकि कॉरपोरेट मीडिया अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए तथ्यों की सच्चाई पर जोर देता है, लेकिन हकीकत यह है कि उसे सच वहीं तक मंजूर है जहां तक वह सत्ता प्रतिष्ठान के हितों के लिए खतरा न बन जाए। यही कारण है कि जब सच खतरा बनने लगता है तो कॉरपोरेट मीडिया उसे दबाने या तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश करता है।
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान से नत्थी कॉरपोरेट पत्रकारिता का एक दूसरा पहलू यह है कि प्रतिष्ठान के हितों को पूरा करने के लिए उसे सच से ही परहेज नहीं जरूरत पडे तो झूठ बोलने में भी कोई दिक्कत नहीं होती। नोम चौम्स्की ने ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए हैं और सबसे ताजा मामला इराक पर हमले से पहले युद्ध के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए अमेरिकी कॉरपोरेट मीडिया में छपी वे खबरें हैं जिनमें गुमनाम और सरकारी सूत्रों के हवाले से इराक के पास जनसंहार के हथियार होने का दावा किया गया था।
तब 'न्यूयार्क टाइम्स` और 'न्यूजवीक` ने भी ऐसी कई रिपोर्टें छापी थीं जिनमें इराक के पास जनसंहार के हथियार होने की बात कही गई थीं। लेकिन कुरान के अपमान से संबंधित खबर को फौरन वापस लेने वाले न्यूजवीक ने सच्चाई सामने आने के बावजूद आज तक उन खबरों के लिए माफी नहीं मांगी है।
कॉरपोरेट मीडिया पर निगरानी रखने वाले अमेरिकी संगठन 'फेयर` का यह कहना बिलकुल सही है कि सूत्रों के मामले में कॉरपोरेट मीडिया दोहरा रवैया रखता है। उसके मुताबिक गुमनाम सूत्रों का इस्तेमाल तब तक सही है जब तक कि वह सरकार की अधिकारिक नीति को चुनौती देने की बजाय आगे बढ़ा रहा हो। फेयर के अनुसार अगर आपकी रिपोर्ट पूरी तरह से गलत हो तो भी कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते वह सत्ता प्रतिष्ठान के हितों को पुख्ता कर रही हो। गलत रिपोर्टिंग के कारण होने वाले जानमाल के नुकसान का लेखा-जोखा तभी लिया जाता है तब सत्ता में बैठे लोगों के लिए इसका हिसाब-किताब लेना जरूरी हो।
आश्चर्य नहीं कि बुश प्रशासन ने आज तक इराक के मामले में अमेरिकी मीडिया को रिपोर्टिंग पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया और कॉरपोरेट मीडिया में भी इसे लेकर कोई अपराधबोध नहीं दिखता है कि उसकी गलत रिपोर्टिंग के कारण इराक पर हुए हमले के बाद से अब तक वहां एक लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इसलिए अमेरिकी कॉरपोरेट मीडिया में गुमनाम सूत्रों का इस्तेमाल रोकने को लेकर जारी बहस का एक ही मतलब है और वह यह कि सत्ता प्रतिष्ठान के अंदरूनी अंतर्विरोधों के कारण गुमनाम सूत्रों के हवाले से कॉरपोरेट मीडिया में कभी-कभार छपने वाली खबरों को भी रोकने और दबाने की कोशिश।
अन्यथा इस बात से कौन इंकार करेगा कि रिपोर्टिंग में कई बार गुमनाम सूत्रों का इस्तेमाल बहुत जरूरी हो जाता है और उस पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। गुमनाम लेकिन विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी और सूचनाएं एक रिपोर्टर को अहम खबरें सामने लाने में मदद करती है। अगर ऐसी सूत्रों से मिली खबरें न छापी जाएं तो अखबार प्रेस विज्ञप्तियों और प्रेस कांफ्रेसों पर आधारित पीआर खबरों से भर जाएंगे। यह एक तथ्य है कि दुनियाभर में सत्ता प्रतिष्ठान के भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ खोजी खबरें ऐसे ही विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से मिलती हैं जिनकी पहचान गोपनीय रखे बिना ऐसी खबरें निकालना संभव नहीं है।
यह संयोग ही है कि जब गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है, ठीक उस समय अमेरिका के इतिहास में खोजी पत्रकारिता के सबसे बड़े उदाहरण वाटरगेट प्रकरण को सामने लाने वाले पत्रकारों-बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन के सबसे प्रमुख सूत्र-डीप थ्रोट-ने अपनी पहचान खुद ही उजागर की है। कहने की जरूरत नहीं है कि डीप थ्रोट एक विश्वसनीय लेकिन गुमनाम सूत्र था जिसकी मदद से वाटरगेट प्रकरण का खुलासा हुआ और अमेरिका के ताकतवर राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। वुडवर्ड और बर्नस्टीन ने डीप थ्रोट की गोपनीयता को तीस वर्षों तक छुपाए रखा और अब खुद डीप थ्रोट के खुलासे के बाद दुनिया को यह पता चला है कि वे एफबीआई के तत्कालीन उप प्रमुख मार्क फेल्ट थे।
दोहराने की जरूरत नहीं है कि अगर मार्क फेल्ट ने वे सूचनाएं और जानकारियां न दी होतीं तो वाटरगेट प्रकरण का शायद पूरी तरह से खुलासा नहीं हो पाता। इसकी वजह यह है कि उन सूचनाओं तक केवल मार्क फेल्ट की ही पहुंच थी और बिना उनकी मदद के उनका बाहर आ पाना संभव नहीं था। लेकिन अगर वुडवर्ड और बर्नस्टीन ने उनकी गोपनीयता को छुपाए रखने का वायदा न किया होता तो फेल्ट शायद ही वे जानकारियां देने के लिए तैयार हुए होते। पर यहां यह जोड़ना बहुत जरूरी है कि वुडवर्ड और बर्नस्टीन ने केवल फेल्ट की दी हुई जानकारियों पर भरोसा नहीं किया बल्कि उन्होंने उसे दूसरे स्रोतों से क्रॉसचेक किया या अन्य सूत्रों से मिली हुई जानकारियों की फेल्ट से पुष्टि करवाई।
साफ है कि मसला गुमनाम स्रोतों के इस्तेमाल से ज्यादा उनके इस्तेमाल के तौर-तरीकों का है। एक रिपोर्टर को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि अगर कोई सूत्र गुमनाम रखने की शर्त पर जानकारी दे रहा है तो न सिर्फ उसे यह जानने की कí