शनिवार, सितंबर 29, 2007

मीडिया और मनोरंजन उद्योग की बल्ले-बल्ले

भारतीय मीडिया उद्योग और मनोरंजन की इन दिनों 'बल्ले-बल्ले` है। इस उद्योग की वृद्धि दर अर्थव्यवस्था की विकास दर से भी अधिक लगभग दोगुनी है। उसका मुनाफा उससे भी तेज गति से बढ़ रहा है। आश्चर्य नहीं कि इन दिनों चढ़ते हुए शेयर बाजार में मीडिया और मनोरंजन उद्योग से जुड़ी हुई कंपनियों के शेयर देशी-विदेशी निवेशकों के लाडले बने हुए हैं। बड़े देशी कारपोरेट समूहों (जैसे अनिल अंबानी का रिलायंस समूह, टाटा समूह आदि) के साथ-साथ दुनिया भर से बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियां तेजी से फैलते-बढ़ते भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग (आगे से मीडिया उद्योग) में अपनी हिस्सेदारी और जगह बनाने के लिए खींची चली आ रही हैं।

जाहिर है कि मीडिया उद्योग में कारोबारी गतिविधियां और हलचलें बहुत तेज हैं। नए टीवी चैनल खुल रहे हैं, चालू अखबारों के नए संस्करण और कुछ नए अखबार शुरू हो रह हैं, एफएम रेडियो चैनलों के स्टेशन नए शहरों में पहुंच रहे हैं और इंटरनेट की लोकप्रियता छोटे शहरों और जिला मुख्यालयों तक पहुंच गयी है। इन सब कारणों से अपनी सुर्खियों के लिए मशहूर मीडिया उद्योग खुद खबरों की सुर्खियों में है। इसका कुछ अंदाजा आप इन तथ्यों और अनुमानों से लगा सकते हैं :

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (२००७-१२) के दृष्टिकोण पत्र के अनुसार, मीडिया उद्योग अर्थव्यवस्था का एक ऐसा क्षेत्र है जिसने अर्थव्यवस्था की विकास (जीडीपी) दर की तुलना में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है। योजना आयोग का अनुमान है कि यह उद्योग २०१० तक १९ प्रतिशत की कंपाउंड औसत वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ेगा। आयोग के मुताबिक, इनमें से टेलीविजन उद्योग ४२ प्रतिशत, प्रेस ३१ फीसदी, फिल्म १९ प्रतिशत, विज्ञापन ३ प्रतिशत, संगीत और लाइव मनोरंजन २ प्रतिशत और रेडियो उद्योग एक प्रतिशत की वृद्धि दर से आगे बढ़ेगा। आयोग का कहना है कि मीडिया उद्योग एक ऐसा क्षेत्र है जहां मांग, आय की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ रही है।

अंतर्राष्ट्रीय निवेश, शोध और सलाहकार कंपनी प्राइसवाटर हाउस कूपर्स की भारतीय मीडिया उद्योग पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २००४ में इस उद्योग का संपूर्ण आकार ७ अरब डालर (लगभग ३३६ रुपए) था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह उद्योग १४ फीसदी की कंपाउंड सालाना औसत वृद्धि दर के साथ २००९ तक १३ अरब डालर (लगभग ६०० अरब रूपये) का हो जाएगा। कूपर्स की रिपोर्ट के मुताबिक २०१५ तक वैश्विक मीडिया और मनोरंजन उद्योग १.८ खरब डालर के चकरा देनेवाली उंचाई पर पहुंच जाएगा और उसका केन्द्र धीरे-धीरे एशिया की ओर झुकने लगेगा। भारत के मीडिया उद्योग में यह संभावना है कि वह वैश्विक मीडिया उद्योग का एक हिस्सा लगभग २०० अरब डालर (१०००० अरब रुपए) अपने कब्जे में ले ले।

भारतीय निवेश सलाहकार और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया उद्योग के कुल राजस्व में औसतन सालाना १५.६ प्रतिशत की दर से वृद्धि होगी और यह वर्ष २००५ के ३६१ अरब रूपए से बढ़कर २०१० तक ७४४ अरब रूपए का हो जाएगा। एक और अंतर्राष्ट्रीय निवेश और शोध कंपनी जेपी मार्गन की भारतीय मीडिया उद्योग पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले मनोरंजन उद्योग (प्रेस, इंटरनेट और आउटडोर को छोड़कर) औसतन सालाना १८ प्रतिशत की वृद्धि दर से २००९ तक ४५४.५ अरब का राजस्व कमाने लगेगा। इस रिपोर्ट के अनुसार अगले तीन वर्षों में कुल विज्ञापन आय का ५० प्रतिशत टीवी के हिस्से में चला जाएगा। इसके कारण अगले तीन वर्षों में १०० और टीवी चैनल शुरू हो सकते हैं। अभी उपलब्ध टीवी चैनलों की संख्या लगभग १६० है।

इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया उद्योग अब अपनी कुटीर और लघु उद्योग की छवि से बाहर आ रहा है। वह न सिर्फ तेजी से बढ़ और फल-फूल रहा है बल्कि बड़ी पूंजी भी उसकी ओर आकर्षित हो रही है। इसके साथ ही मीडिया उद्योग एक विभाजित, विखंडित और असंगठित कारोबार से निकलकर कारपोरेटीकरण की ओर बढ़ रहा है। चाहे वह प्रेस हो या सिनेमा, रेडियो हो या टीवी या फिर इंटरनेट-हर मीडिया में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी आ रही है और अपने साथ प्रबंधन, तकनीक, अंतर्वस्तु, सांगठनिक संरचना, प्रस्तुति और मार्केटिंग के नए तौर-तरीके ले आ रही है।

इस प्रक्रिया में मीडिया उद्योग में कई नए और सफल उद्यमी उभर कर सामने आए हैं, कुछ पुराने उद्यमी संकट में हैं और कुछ ने मैदान छोड़कर हट जाना ही बेहतर समझा है। वे पुराने मीडिया घराने जो आज भी व्यावसायिक होड़ में बने हुए हैं, उनका प्रबंधकीय और संगठनिक ढांचा न सिर्फ बहुत बदला है बल्कि वे भी कारपोरेटीकरण की राह पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि १९९१ में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के साथ जिस तरह अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुए हैं, उसी तरह मीडिया उद्योग भी पिछले डेढ़ दशक में एक व्यापक बदलाव से गुजरा है। चेहरे के साथ-साथ उसके चरित्र में भी परिवर्तन आया है। अपनी स्थानीय विशेषताओं के साथ अब वह एक व्यापक वैश्विक मीडिया और मनोरंजन उद्योग का हिस्सा है।

निश्चय ही, भारतीय मीडिया उद्योग और कारोबार में पिछले डेढ़ दशक में कई नई प्रवृत्तियां उभरी हैं। मीडिया उद्योग का कोई क्षेत्र इस परिवर्तन से अछूता नहीं बचा है। मीडिया उद्योग में उभर रही इन नयी प्रवृत्तियों की पहचान और पड़ताल के साथ उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलाव और विकासक्रम को देखना दिलचस्प होगा।

प्रेस

प्रेस यानि अखबार-पत्रिकाएं आदि मीडिया उद्योग के सबसे प्रारंभिक और बुनियादी घटक रहे हैं। भारत में समाचारपत्रों का इतिहास २२६ वर्षों पुराना हो चुका है लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों में उनमें जितना बदलाव आया है, वह २०० वर्षों में भी नहीं आया। इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि १९८० में प्रेस का कुल राजस्व १५० करोड़ रूपए था जो विगत २५ वर्षों में उछलकर ९५०० करोड़ रूपए तक पहुंच गया है। इस तरह २५ वर्षों में प्रेस के कुल राजस्व में ६३ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। इसी तरह, प्रेस की विज्ञापनों से होनेवाली कुल आय १९९१ में १०६९ करोड़ रूपए थी जो २००५ में ६४१ प्रतिशत की वृद्धि के साथ ७९२९ करोड रूपए पहुंच गई है।

इस बीच, समाचारपत्रों के सर्कुलेशन और पाठक संख्या में भी भारी वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण (एनआरएस) २००५ के मुताबिक देश में पाठकों की कुल संख्या २१ करोड़ से कुछ अधिक हो गयी है जिनमें से आधे ग्रामीण पाठक हैं। सबसे उल्लेखनीय बात यह हुई है कि समाचारपत्रों की दुनिया में भाषाई समाचारपत्र पाठक संख्या के मामले में अंग्रेजी के अखबारों से काफी आगे निकल गए हैं। इसके बावजूद कमाई के मामले में अंग्रेजी अखबार अभी भी भाषाई अखबारों से आगे हैं।

हालांकि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। भाषाई अखबारों ने भी अपने छोटे, पारिवारिक और बंद दायरे से बाहर निकलकर व्यावसायिक जोखिम उठाना, प्रबंधन को प्रोफेशनल हाथों में सौंपना, मार्केटिंग के आधुनिक तौर-तरीके अपनाना और ब्रांडिंग पर जोर देना शुरू कर दिया है। उनमें पूंजी बाजार से पूंजी उठाने या विदेशी पूंजी से हाथ मिलाने में कोई हिचकिचाहट नहीं रह गयी है। हिंदी के दो अखबार समूहों- जागरण और भास्कर, जो पाठक संख्या के मामले में देश के पहले और दूसरे नंबर के अखबार हैं, ने आधुनिक और व्यावसायिक प्रबंधन और मार्केटिंग के तौर-तरीकों को अपनाने में गजब की आक्रामकता दिखायी है।

जागरण भाषाई समाचारपत्र समूहों में पहला ऐसा समूह है जो आर्थिक उदारीकरण के बाद बदली हुई परिस्थितियों में देशी मीडिया विशेषकर प्रिंट मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खुले विरोध के अपने स्टैंड से पलटते हुए सबसे पहले आयरलैंड के इंडिपेंडेट न्यूज एंड मीडिया समूह से १५० करोड़ रूपए का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ले आया। यही नहीं, वह हिंदी का पहला और भारतीय भाषाओं का भी संभवत: पहला समाचारपत्र है जो आइ पी ओ लेकर पूंजी बाजार में आया। आज वह शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी है जिसका बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) १७८९ करोड़ रूपए है। जागरण समूह ने एफडीआई और आइपीओ के जरिए जुटाई गयी रकम का इस्तेमाल नए संस्करण शुरू करने और प्रिंट से बाहर टेलीविजन (चैनल ७) व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए किया। विदेशी और शेयर बाजार की पूंजी ने जागरण समूह को कानपुर के एक छोटे, पारिवारिक और बंद दायरे से बाहर एक कारपोरेट समूह के रूप में कायांतरण में अहम भूमिका अदा की है।

दूसरी ओर, मूलत: मध्यप्रदेश के भास्कर समूह की विकास यात्रा भाषाई समाचारपत्रों के नए, आक्रामक और बढ़े हुए आत्मविश्वास की कथा है। सिर्फ १५ वर्षों में उसने मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात जैसे राज्यों में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। वह हिंदी का पहला अखबार है जिसने मार्केटिंग के आक्रामक तौर-तरीकों का सहारा लिया और जमे-जमाए प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया। वह पहला ऐसा भाषाई अखबार समूह है जो न सिर्फ अपने क्षेत्रीय दायरे से बाहर निकला बल्कि दूसरी भाषाओं के समाचारपत्र निकालने में भी पीछे नहीं रहा। उसने गुजराती में दिव्य भास्कर और फिर जी समूह के साथ मिलकर मुंबई से अंग्रेजी अखबार डीएनए का प्रकाशन शुरू कर टाइम्स समूह और हिंदुस्तान टाइम्स समूह को कड़ी चुनौती दी है। हालांकि भास्कर समूह ने अभी तक न तो शेयर बाजार से पूंजी उठाई है और न ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने की कोशिश की है लेकिन देर-सबेर उसे अपने तगड़े प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए बाजार में आना ही पड़ेगा।

निश्चय ही, समाचारपत्र घरानों का शेयर बाजार में आना और विदेशी पूंजी के साथ हाथ मिलाना हाल के वर्षों में प्रिंट मीडिया क्षेत्र में हुआ सबसे बड़ा परिवर्तन है। हालांकि यह परिवर्तन अभी तक हिंदी के एक प्रमुख समाचारपत्र घराने के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स, मिड डे, और डेक्कन क्रॉनिकल समूहों तक ही पहुंचा है। (देखें-चार्ट-२) लेकिन इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। इससे समाचारपत्र उद्योग में प्रतियोगिता तीखी हुई है और होड़ में आगे रहने के लिए समाचारपत्र समूह न सिर्फ अपने क्षेत्रीय/स्थानीय वर्चस्व के क्षेत्र से बाहर निकलने और फैलने की कोशिश कर रहे हैंं बल्कि एक-दूसरे के वर्चस्व के क्षेत्र में घुसकर चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। यही नहीं, कई अखबार समूह मीडिया के नए क्षेत्रों जैसे टीवी, रेडियो, इंटरनेट में घुसने और पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं तो कई समूह ताकतवर प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले के लिए आपस में हाथ मिलाते और गठबंधन करते दिख रहे हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में समाचारपत्र उद्योग में कई नयी प्रवृत्तियां उभरती हुई दिख रही हैं :

बड़ी पूंजी और उसके साथ आयी आक्रामक मार्केटिंग के बढ़ते दबदबे के कारण जहां कुछ समाचारपत्र समूहों (जैसे टाइम्स समूह, एचटी, जागरण, भास्कर, डेक्कन क्रॉनिकल आदि) ने बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की है, वहीं कई बड़े, मध्यम और छोटे समाचारपत्र समूहों (जैसे आज, नयी दुनिया, देशबंधु, प्रभात खबर, पॉयनियर, अमृत बाजार पत्रिका, एनआइपी, स्टेटसमैन आदि) के सामने अपना अस्तित्व बचाए रखने या होड़ में टिके रहने का संकट पैदा हो गया है। कुछ और बड़े और माध्यम आकार के अखबार समूहों (जैसे अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, नवभारत (म.प्र.), ट्रिब्यून, इंडियन एक्सप्रेस आदि) पर अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के बढ़ते दबाव का असर साफ देखा जा सकता है।

संकेत साफ हैं। आनेवाले वर्षों में समाचारपत्र उद्योग में कई बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं। यह आशंका बढ़ती जा रही है कि बड़ी पूंजी के दबाव में छोटे और मंझोले खिलाड़ी प्रतियोगिता से बाहर हो जाएंगे। कुछ बड़े अखबार या मीडिया समूहों का दबदबा और बढ़ेगा। समाचारपत्र उद्योग में अधिग्रहण और विलयन (खरीद-बिक्री और आपसी गठबंधन) की प्रक्रिया तेज होगी। इस तरह समाचारपत्र उद्योग में कंसोलिडेशन बढ़ेगा और एक शहर से प्रकाशित होनेवाले कई समाचारपत्रों वाली विविधता और बहुलता की स्थिति नहीं रह जाएगी।

इसकी वजह समाचारपत्र उद्योग में लागू होनेवाला 'तीन का नियम` (रूल ऑफ थ्री) है जिसे सबसे पहले एमोरी विश्वविद्यालय (अटलांटा, अमेरिका) के प्रो. जगदीश सेठ ने पेश किया था। इस नियम के अनुसार अधिकतर स्थानीय/क्षेत्रीय बाजारों में नंबर एक अखबार (गुणवत्ता नहीं बल्कि पाठक/प्रसार संख्या के आधार पर) राजस्व और मुनाफे का बड़ा हिस्सा उड़ा ले जाता है, दूसरे नंबर का अखबार भी संतोषजनक मुनाफा कमा लेता है जबकि तीसरे नंबर का अखबार किसी तरह 'ब्रेक इवेन` यानी बहुत थोड़ा मुनाफा बना पाता है। इन तीन के अलावा बाकी सभी व्यावसायिक रूप से घाटा झेलते हैं। वे तभी चल सकते हैं जब उनका कोई और संस्करण मुनाफा कमा रहा हो या किसी और व्यवसाय से उसकी भरपाई हो रही हो।

किसी अखबार समूह की व्यावसायिक सफलता उसके अंतर्वस्तु की गुणवत्ता से कहीं अधिक मार्केटिंग की आक्रामक रणनीति से तय हो रही है। इस कारण अखबारों के अंदर संपादकीय विभाग का महत्व और कम हुआ है और प्रबंधन का दबदबा बढ़ा है। यहां तक कि अखबार की अंतर्वस्तु के निर्धारण में संपादकीय विभाग की भूमिका कम हुई है और मार्केटिंग मैनेजरों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है। अधिकांश अखबार समूहों में संपादक की भूमिका मैनेजर की हो गयी है और नयी पीढ़ी के संपादकों की पहली प्राथमिकता अखबार की अन्तर्वस्तु नहीं बल्कि उसे एक 'बिक्री योग्य लोकप्रिय उत्पाद` में बदलने की है। भाषाई समाचारपत्रों में संपादक और वरिष्ठ पत्रकारों को विज्ञापन जुटाने की रणनीति बनाने से लेकर एडवर्टोरियल लिखते हुए आसानी से देखा जा सकता है।

अखबार समूहों के राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय का प्रतिशत और घट गया है जबकि विज्ञापन का हिस्सा और बढ़ गया है। अखबार समूहों के बीच बढ़ती प्रतियोगिता के बीच पाठकों को लुभाने के लिए कीमतों में कटौती से लेकर मुफ्त उपहार आदि की आक्रामक मार्केटिंग रणनीति का असर यह पड़ा है कि अखबारों के कुल राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय का हिस्सा लगातार घटा है। स्थिति यह हो गयी है कि अंग्रेजी के बड़े अखबारों (जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स आदि) के कुल राजस्व में प्रसार से होनेवाली आय ५ से १० प्रतिशत रह गयी है। भाषाई अखबारों में यह प्रतिशत २५ से ३० प्रतिशत है। इस तरह समाचारपत्र के कुल राजस्व में विज्ञापन का हिस्सा दो तिहाई से लेकर ९० फीसदी तक हो गया है। उल्लेखनीय है कि २०-२५ वर्षों पहले तक प्रसार और विज्ञापन से होनेवाली आय का अनुपात ५०:५० होता था और प्रथम प्रेस आयोग (१९५३) ने १२७ समाचारपत्रों के सर्वेक्षण में यह अनुपात ६०:४० का पाया था।

साफ है कि समाचारपत्रों की विज्ञापनों पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ गयी है। नतीजा यह हुआ है कि अखबारों पर विज्ञापनदाताओं का दबाव काफी बढ़ गया है। वे न सिर्फ अपनी शर्तें (जैसे उनकी कंपनी के बारे में नकारात्मक खबर नहीं जानी चाहिए या कोई सकारात्मक खबर छापनी होगी) थोप रहे हैं बल्कि कुलमिलाकर समाचारपत्र की अंतर्वस्तु को भी प्रभावित कर रहे हैं। अधिकांश सफल समाचारपत्रों में आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के खिलाफ समाचार/टिप्पणियों का प्रकाशन संभव नहीं है या छिटपुट और असंतुलित है। दूसरे, समाचारपत्रों में कारपोरेट भ्रष्टाचार और अपराधों से जुड़ी खबरों के लिए कोई जगह नहीं है। समाचारपत्रों के लिए कारपोरेट समूह ऐसी पवित्र गाय हैं जिनमें कोई गड़बड़ी या अनियमितता नहीं होती है।

तीसरे, समाचारपत्रों के अंतर्वस्तु में इस तरह से परिवर्तन किया गया है कि वह नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं की जरूरत को पूरा करें क्योंकि विज्ञापनदाता को उपभोक्ता चाहिए न कि नागरिक। उपभोक्ता की चिंताएं खुद तक सीमित और अधिक से अधिक उपभोग की ओर उन्मुख होती हैं जबकि नागरिक की चिताएं खुद तक सीमित नहीं होती हैं और व्यापक दायरे तक फैली होती हैं। वह अपने उपभोग की सीमा जानता है। लेकिन व्यावसायिक रूप से सफल अखबारों और अन्य माध्यमों की अंतर्वस्तु नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। उनकी कोशिश नागरिकों को भी उपभोक्ता में बदलने की है। ऐसा किए बिना विज्ञापनदाता का मकसद पूरा नहीं हो सकता है। जैसाकि जानेमाने मीडिया विश्लेषक बेन बैगडिकियन ने लिखा है कि, 'गंभीर कार्यक्रम (या आलेख/समाचार) दर्शकों को याद दिलाते हैं कि जटिल मानवीय समस्याएं किसी नए पाउडर या डिओडोरेंट के इस्तेमाल से नहीं सुलझती हैं।` इसलिए समाचारपत्रों और दूसरे माध्यमों में गंभीर/विश्लेषणात्मक आलेखों/टिप्पणियों/रिपोर्टों के बजाय हल्के-फुल्के तथाकथित 'मानवीय रूचि` के हल्के-फुल्के समाचारों/फीचरों/टिप्पणियों के प्रकाशन/प्रसारण पर जोर बढ़ता जा रहा है।

समाचारपत्रों के कारपोरेटीकरण और प्रोफेशनल प्रबंधन की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद भाषाई समाचारपत्र समूहों में पत्रकारों के वेतन और सेवा शर्तों में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। यहां तक कि व्यवसायिक रूप से हिंदी के सर्वाधिक सफल दो समाचारपत्र समूहों में भी स्थिति बहुत नहीं बदली है। आर्थिक उदारीकरण के शोर में स्थायी नियुक्ति और वेतनमान आदि की तो अब कहीं बात भी नहीं होती। कांट्रैक्ट व्यवस्था के तहत पत्रकारों की नियुक्ति होती है, वेतनमान के बजाय मनमाने और मोलतोल के आधार तनख्वाह तय होती है और सेवा शर्तों की हालत दिन-पर-दिन बदतर होती जा रही है। अस्थायी नौकरी का तनाव और दबाव उन्हें प्रबंधन के आगे झुकने के लिए बाध्य कर देता है। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश अखबारों में पत्रकारों की यूनियन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। जिला स्तर और तहसील स्तर के संवाददाताओं/स्ट्रिगर्स को न तो नियुक्ति पत्र मिलता है और न ही अपेक्षित वेतन। चूंकि जिला और मंडल स्तर पर अखबार तीन से पांच स्थानीय पृष्ठ देने लगे हैं, पत्रकारों पर काम का बोझ बहुत होता है। लेकिन उन्हें उचित वेतन नहीं मिलता है। वेतन की भरपाई के लिए उन्हें विज्ञापन जुटाना पड़ता है जिसका कमीशन मिलता है। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें प्रभावशाली नेताओं, अफसरों, व्यापारियों और ठेकेदारों के हितों का ध्यान रखना पड़ता है।

सबसे हैरत की बात यह है कि जिला और मंडल स्तर पर पहुंचकर 'हिंदुस्तान`, 'जागरण`, 'भास्कर`, 'अमर उजाला`, जैसे बड़े अखबारों और छोटे-मंझोले अखबारों के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता है। भारतीय समाचारपत्र व्यवसाय के साथ एक अच्छी बात यह है कि न सिर्फ अखबारों का प्रसार और पाठकवर्ग बढ़ रहा है बल्कि उसने टीवी के हमले को भी झेल लिया है। ध्यान रहे कि यूरोप, अमेरिका और जापान में समाचारपत्रों की प्रसार संख्या लगातार गिर रही है। विकसित देशों में समाचारपत्रों को इंटरनेट से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। लेकिन भारत में औसतन १० से १२ फीसदी सालाना की वृद्धि दर से अखबारों खासकर भाषाई अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है। चीन और भारत दुनिया में समाचारपत्रों के सबसे बड़े बाजार के रूप में उभर रहे हैं। अधिकांश विश्लेषक इस राय से सहमत हैं कि भारत में अगले डेढ़-दो दशकों तक बढ़ती साक्षरता, आर्थिक आय और राजनीतिक जागरूकता के कारण समाचारपत्रों की प्रसार संख्या बढ़ती रहेगी। इस कारण जैसे-जैसे इस उद्योग का आकार और मुनाफा बढ़ेगा, बड़ी और विदेशी पूंजी इस ओर और अधिक आकर्षित होगी। इसके साथ ही, सरकार पर समाचारपत्र उद्योग में २६ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को खत्म करने और विदेशी अखबारों/प्रकाशनों के प्रकाशन की इजाजत देने का दबाव भी बढ़ेगा।

टेलीविजन

भारत में टीवी उद्योग का विकास इस मायने में अभूतपूर्व है कि दुनिया के इतिहास में ऐसी कोई और मिसाल नहीं मिलती। आज भारत, चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है। आज टीवी देश के १०.८ करोड़ घरों तक पहुंच रहा है जिसमें ६.८ करोड़ घरों में केबल और सेटलाइट टीवी पहुंच रहा है। इसके बावजूद टीवी की पहुंच देश के ६० प्रतिशत घरों से कम ही है और केबल और सेटलाइट टीवी की पहुंच तो देश के कुल घरों के एक चौथाई से भी कम है। इसका अर्थ यह है कि अभी देश में टीवी के विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

दूसरे, इतने सीमित विस्तार के बावजूद टीवी उद्योग आज देश का सबसे बड़ा मीडिया उद्योग है। २००५ में उसका कुल राजस्व लगभग १८५०० करोड़ रूपए का था जो मीडिया उद्योग में उसके निकटतम प्रतिद्वंद्वी पे्रस के कुल राजस्व से दुगुना था। (देखें चार्ट-१) सिर्फ डेढ़-दो दशकों मे टीवी उद्योग का विज्ञापन राजस्व १९९१ के ३९० करोड़ से उछलकर २००५ में ६७४६ करोड़ रूपए पर पहुंच गया है। आज देश में १६० से अधिक टीवी चैनल विभिन्न भाषाओं और प्रकारों/रूपों में टीवी दर्शकों तक पहुंच रहे हैं। कोई ३५ से ४० हजार केबल वाले और आधा दर्जन एमएसओ के साथ-साथ सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन और कोई एक दर्जन बड़े देशी-विदेशी प्रसारणकर्ता इस बाजार में शामिल हैं।

हालांकि अंतर्राष्ट्रीय और खासकर विकसित देशों के टीवी उद्योग पर निगाह डालें तो उनकी तुलना में भारतीय टीवी उद्योग अभी भी साफ्टवेयर निर्माण, वितरण और प्रसारण के तीनों प्रमुख क्षेत्रों में काफी विभाजित और बिखरा हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे टीवी बाजार में कुछ बड़े प्रसारणकर्ता साफ्टवेयर से लेकर वितरण व्यवसाय पर अपना नियंत्रण कायम करते हुए दिख रहे हैं। (देखें चार्ट-३) इनमें से दो प्रसारणकर्ता- स्टार और सोनी क्रमश: रूपर्ट मर्डाक के न्यूज कॉरपोरेशन और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनी कोलंबिया ट्रिस्टार की सहयोगी कंपनियां हैं जबकि जी टेलीफिल्मस और सन नेटवर्क भारतीय टीवी कंपनियां हैं जिनमें विदेशी भागीदारी भी है। इसमें से सोनी को छोड़कर बाकी तीनों प्रसारणकर्ता समाचार प्रसारण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। यही नहीं, स्टार-जी-सन टीवी का केबल व्यवसाय से लेकर डीटीएच प्रसारण के क्षेत्र में भी पूरा दबदबा है।

चूंकि टीवी उद्योग में विदेशी पूंजी की भागीदारी को लेकर कई पाबंदियां अभी भी बनी हुई हैं, इसलिए बड़े विदेशी प्रसारणकर्ता भारतीय टीवी बाजार में उस स्तर पर घुस नहीं पाए हैं, जैसी उनकी इच्छा और तैयारी है। इसके बावजूद अकेले स्टार टीवी ने जिस तरह से भारतीय टीवी बाजार पर दबदबा कायम करना शुरू कर दिया है, उसके मुकाबले में बहुत कम भारतीय प्रसारणकर्ता खड़े होते दिखाई पड़ रहे हैं। टीवी के २० सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रमों में १५ से १८ कार्यक्रम स्टार के चैनलों के होते हैं। दर्शकों को आकर्षित करने के मामले में स्टार के चैनल अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे निकल गए हैं। स्टार के प्रोफेशनल प्रबंधन और आक्रामक मार्केटिंग के आगे सुभाष चंद्रा की जी टेजीफिल्मस का सिंहासन हिल रहा है।

इसके बावजूद भारतीय टीवी उद्योग में अभी विस्तार का दौर होने के कारण कंसोलिडेशन की वह प्रक्रिया तेज नहीं हुई है जिसमें कमजोर खिलाड़ी बाजार से बाहर हो जाएंगे। लेकिन देर-सबेर यह होना है और अगले तीन-चार वर्षों बाद वही प्रसारणकर्ता बाजार में टिक पाएगा जिसके पास न सिर्फ बड़ी पूंजी होगी बल्कि उसके चैनल बाजार में अपने सेगमेंट में पहले तीन या चार चैनलों में होंगे। दरअसल, प्रिंट मीडिया पर लागू होनेवाला 'तीन का नियम` टीवी बाजार पर भी काफी हद तक और कुछ अपवादों के साथ लागू होता है। यहां भी विज्ञापनदाताओं की निगाह टैम रेटिंग के आधार पर पहले, दूसरे और तीसरे नंबर के चैनल से आगे नहीं जाती है। हालांकि टीवी उद्योग में केबल/डीटीएच शुल्क (सब्सक्रिप्शन) से आनेवाला राजस्व भी आय का महत्वपूर्ण स्रोत है लेकिन अभी वितरण का बाजार बहुत विभाजित और बिखरा हुआ है, इसलिए प्रसारणकर्ताओं को 'पे चैनलों` से वह आय नहीं हो रही है जो विकसित देशों में होती है।

चार्ट- १

भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग (वर्ष २००५)

मीडिया राजस्व (अरब रुपए)टीवी प्रसारण १८५
प्रेस ९५
फिल्म ७९.६७
संगीत १५
रेडियो ३.६

स्थानीय मीडिया
आउटडोर १२
इवेंट्स ८
स्थानीय प्रेस १२
ग्रामीण मीडिया ५
अन्य ५
कुल ४२०.२७

स्रोत : वनिता खांडेकर, इंडियन मीडिया बिजनेस (द्वितीय संस्करण` २००६), रिस्पांस बुक्स, नई दिल्ली

चार्ट- २

शेयर बाजार में लिस्टेड प्रमुख मीडिया कंपनियां

कंपनी शेयर मूल्य बाजार पूंजीकरण पी/ई अनुपात
(रुपऐ में) (करोड़ रुपऐ में)
जी टेलीफिल्मस ३५८ १६८३८ ८९.५
एच टी मीडिया ७५७ ३५५० ४६.१
डेक्कन क्रॉनिकल लिमिटेड ७०२ ३१४८ २४.१
जागरण प्रकाशन लिमिटेड २९६ १७८९ ३५.६
एनडीटीवी २२७ १३९५ --
बालाजी टेलीफिल्मस १४५ ९४१ १४.१
टीवी टुडे नेटवर्क ७४ ४२५ १७.४
यूटीवी साफ्टवेयर २२७ ६३५ ७४.२
एडलैब फिल्मस ४०१ १७४९ ३७.१
पी वी आर २४६ ५६१ ६७.८
मिड डे मल्टीमिडिया ५४ २४० १८५.१
टीवी १८ समूह ८९५ १८०० ९५.४
सन टीवी १२९५ ८९२१ ६३.८

चार्ट-३

भारत के प्रमुख टीवी प्रसारणकर्ता

कंपनी कुल राजस्व (२००४-०५) अन्य मीडिया कारोबार
(करोड रुपए में)
जी टेलीफिल्मस १३६० केबल, समाचारपत्र, डीटीएच
स्टार इंडिया १३०० केबल, डीटीएच
सोनी इंटरटेन्मेंट टीवी १००० फिल्म, संगी
दूरदर्शन ६६५ रेडियो, डीटीएच
सन टीवी ३०० केबल, एमएम रेडियो, समाचारपत्र

चार्ट-४

विभिन्न माध्यमों पर किया जानेवाला कुल विज्ञापन व्यय
(करोड़ रुपयों में)

वर्ष टीवी प्रेस रेडियो सिनेमा आउटडोर इंटरनेट कुल व्यय
२००० ४४३९ ४३१६ १४६ ७० ६४० - ९६११
२००१ ४५६४ ४३२५ १७६ ७९ ६४० ३० ९८१४
२००२ ४७१७ ४४२४ २११ ७९ ४३९.२ ५० ९९२०
२००३ ५०९४ ४६८९ २२७ ८२ ५४८.८ ५४ १०६९४.८
२००४ ५८०२ ६०३४.८ २७६.९ ९८.४ ६८६ ७०.२ १२९६८.३
२००५ ६७४६ ७९२९ ३६० ११६ ९९४ १२२.९ १६२६७.८

स्रोत : वनिता कोहली खांडेकर, वही

चार्ट-५

कुल विज्ञापन व्यय में विभिन्न माध्यमों की हिस्सेदारी
(करोड़ रुपयों में)
वर्ष टीवी प्रेस रेडियो सिनेमा आउटडोर इंटरनेट कुल
२००० ४६ ४५ २ १ ७ ० १००
२००१ ४७ ४४ २ १ ७ ० १००
२००२ ४८ ४५ २ १ ४ १ १००
२००३ ४८ ४४ २ १ ५ १ १००
२००४ ४५ ४७ २ १ ५ १ १००
२००५ ४१ ४९ २ १ ६ १ १००

स्रोत: वनिता कोहली खांडेकर, वही

1 टिप्पणी:

गुस्ताख़ ने कहा…

http://www.gustakh.blogspot.com/

ये इस गुस्ताख़ मंजीत का ब्लॉग है, कभी भ्रमण करें।