सोमवार, अप्रैल 09, 2012

बिहारी मीडिया का ‘नीतिश (रीति) काल’

अखबार और चैनल नीतिश सरकार के साथ ऐसे नत्थी (एम्बेडेड)हो  गए हैं कि उनके भोपूं बन गए हैं   
पहली किस्त

यह किसी से छुपा नहीं है कि बिहार में न्यूज मीडिया खासकर प्रेस को नीतिश कुमार सरकार के जबरदस्त दबाव में काम करना पड़ रहा है. राज्य में एक अघोषित किस्म की सेंसरशिप है जिसके कारण मुख्यधारा के अखबार और चैनल सरकार और खासकर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बारे में कोई भी नकारात्मक खबर छापने या दिखाने से परहेज करते हैं.
लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान करनेवाली बात यह है कि खुद मुख्यधारा के मीडिया में इसकी चर्चा बहुत कम  होती है. राज्य के अधिकांश अख़बारों और चैनलों ने इस अघोषित इमर्जेंसी के आगे घुटने टेक दिए हैं.
यही नहीं, नीतिश कुमार के मीडिया मैनेजमेंट की असली सफलता यह है कि इस अघोषित मीडिया इमरजेंसी को इक्का-दुक्का अपवादों को छोडकर अधिकांश अख़बारों और चैनलों ने स्वीकार कर लिया है. कुछ इस हद तक कि राज्य में नीतिश कुमार सरकार ने न्यूज मीडिया को झुकने के लिए कहा तो वह रेंगने लगा.

हालाँकि बिहार के पत्रकारों से औपचारिक-अनौपचारिक चर्चाओं में और सभाओं-गोष्ठियों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर होनेवाली बहसों में इस अघोषित इमरजेंसी की बाबत बहुत कुछ सुन सकते हैं. लेकिन ये चर्चाएँ कभी भी बड़े मंचों पर नहीं पहुँच पाती हैं. यह कभी भी मीडिया की सुर्खी नहीं बन पाई.

इसलिए जब प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पटना के एक सेमिनार में इस ओर इशारा कर दिया तो हंगामा हो गया. स्वाभाविक तौर पर सबसे ज्यादा कड़ी प्रतिक्रिया राज्य सरकार की ओर से ही आई. राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने जस्टिस काटजू के वक्तव्य को ‘आधारहीन और बेबुनियाद’ बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग कर दी.
लेकिन सवाल यह है कि उन्होंने ऐसा क्या कह दिया जिसपर इतना हंगामा मचा हुआ है? प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष ने सिर्फ इतना कहा कि मैंने सुना है कि बिहार में मीडिया में राज्य सरकार और उसके अधिकारियों के खिलाफ लिखने/बोलने पर अघोषित रोक है और इसका उल्लंघन करनेवाले अख़बारों का विज्ञापन रोकने से लेकर पत्रकारों को नौकरी से निकालने के लिए संपादकों पर दबाव तक डाला जाता है.
उन्होंने कहा कि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी की भावना के विरुद्ध है और संविधान के सुचारू संचालन में बाधा डालने की तरह है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिहार में मीडिया पर अघोषित सेंसरशिप के आरोपों की वस्तुस्थिति पता लगाने के लिए प्रेस काउंसिल की एक समिति गठित करेंगे जो पूरे मामले की छानबीन करके सच्चाई सामने लाएगी.

अपने वायदे के मुताबिक उन्होंने एक तीन सदस्यी जांच समिति गठित कर दी है. समिति ने जांच शुरू कर दी है और यहाँ तक कि अख़बारों में विज्ञापन देकर इस बाबत पत्रकारों और अन्य लोगों से पक्ष रखने की अपील की है.

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रेस काउंसिल की यह पहलकदमी और सक्रियता बहुत महत्वपूर्ण और दूरगामी नतीजों वाली है. ऐसी कोई दूसरी नजीर हाल के वर्षों में नहीं दिखाई पड़ती है जब प्रेस काउंसिल जैसे वैधानिक संगठन ने किसी राज्य में मीडिया पर अघोषित सेंसरशिप आयद करने के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की हो. समिति गठित करना तो दूर, तथ्य यह है कि प्रेस काउन्सिल ऐसे आरोपों की नोटिस तक नहीं लेता रहा है.
यह भी सच है कि ये आरोप नए नहीं हैं और न ही यह केवल बिहार तक सीमित परिघटना है. ऐसे कई राज्य हैं जहाँ न्यूज मीडिया का मुंह बंद रखने के लिए राज्य सरकारें हर हथकंडा अपना रही हैं. उनमें से कई सफल भी हैं.

लेकिन बिहार का मामला इसलिए खास है क्योंकि यहाँ न्यूज मीडिया राज्य सरकारों और नेताओं/अधिकारियों के भ्रष्टाचार, घोटालों, अनियमितताओं के खुलासों से लेकर गरीबों और कमजोर वर्गों के पक्ष में मुखर और सक्रिय रहा है. इस कारण बिहार की पत्रकारिता में खासकर १९७७ के बाद से एक धार रही है और उसे नियंत्रित करने की कोशिशें उतनी सफल नहीं हो पाईं जितनी अन्य राज्यों में सफल रहीं.

यहाँ तक कि जब १९८३ में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने बिहार के अखबारों और पत्रकारों को नियंत्रित करने के लिए बिहार प्रेस विधेयक लाने की कोशिश की तो राज्य और उसके बाहर पत्रकार संगठनों और जनसंगठनों के आंदोलन के कारण उन्हें अपने पैर पीछे खींचने पड़े.
इस जीत ने बिहार की पत्रकारिता को एक नई पहचान, धार और सबसे बढ़कर आत्मविश्वास दिया. हालाँकि १९८३ में खुद बिहार से छपनेवाले प्रमुख अख़बारों की स्थिति बेहतर नहीं थी, उनमें से ज्यादातर रीढविहीन और सरकार समर्थक थे लेकिन बिहार की पत्रकारिता में बहुत जीवंतता और गतिशीलता थी.
इसकी सबसे प्रमुख वजह १९७७ के बाद बिहार में नए जनांदोलनों का उभार और ७७ के बाद आये पत्रकारों की नई पीढ़ी और साप्ताहिक/पाक्षिक/मासिक पत्र-पत्रिकाएं (जैसे ‘रविवार’, ‘दिनमान’ और ‘माया’) थीं. इन युवा और राजनीतिक रूप से जागरूक और संवेदनशील पत्रकारों के जरिये बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और उनके मंत्रियों/अफसरों की कारगुजारियों से लेकर बिहारी समाज में सामंती और पुलिसिया जोर-जुल्म, गरीबों-दलितों के उत्पीडन की खबरें/रिपोर्टें देश भर की पत्र/पत्रिकाओं में छपने लगीं.

असल में, ७७ में इमरजेंसी हटने के बाद देश भर में खासकर बिहार और उत्तर भारत में खबरों की जबरदस्त भूख पैदा हो गई थी. यह बिहार आंदोलन का असर था जिसने लोगों को जागरूक और सक्रिय कर दिया था.

यही वह दौर था जब राष्ट्रीय मीडिया में बिहार को ऐसी खबरों की खान समझा जाने लगा था. यही नहीं, इस दौरान बिहार में समाचारपत्रों और पत्रिकाओं की बिक्री भी तेजी से बढ़ी. हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं और अखबारों की सबसे ज्यादा मांग बिहार में थी.
इसके बावजूद कुछ छोटे अख़बारों और पत्रिकाओं को छोड़ दिया जाए तो स्थानीय अख़बारों में तब भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया था. लेकिन ८० के दशक के मध्य में पटना में ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रकाशन ने स्थानीय पत्रकारिता को नई धार दी.
ऐसा नहीं है कि उस दौर में बिहार की पत्रकारिता कोई बहुत रैडिकल या क्रांतिकारी हो गई थी. इसके बावजूद यह सच है कि अख़बारों में न सिर्फ सरकार, मुख्यमंत्रियों और अफसरों के खिलाफ बहुत कुछ छप जाता था बल्कि जनांदोलनों और रैडिकल वामपंथी आंदोलन को भी कुछ हद तक सहानुभूतिपूर्ण कवरेज मिल जाती थी.

इससे बिहार की पत्रकारिता की एक ऐसी विविधता और बहुलतापूर्ण छवि बनी जिसका अपना खास तेवर, धार और स्वर था.
बिहार की पत्रकारिता की यह पहचान और छवि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी दौर में पडोसी राज्यों खासकर मध्यप्रदेश में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के नेतृत्व में पत्रकारों और अखबार मालिकों को विभिन्न वैध-अवैध सुविधाओं और उपहारों से लुभाने और खामोश करने की सुनियोजित और संगठित कोशिश शुरू हो गई थी.
इसका असर भी जल्दी ही दिखने लगा. मध्यप्रदेश के सफल प्रयोग से सीखकर और भी कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने न्यूज मीडिया खासकर अखबारों और उनके पत्रकारों को साधने के लिए ‘साम, दाम, दंड और भेद’ का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.
इसमें भी खासकर अखबारों और पत्रकारों को चुप करने और अपने समर्थन में लिखने के लिए राज्य सरकारों ने उन्हें सरकारी खजाने से लेकर निजी स्रोतों से हर तरह की सुविधाएँ दीं. इसी दौर में अख़बारों और मीडिया समूहों को सस्ती दरों पर जमीन और अन्य सुविधाएँ देने से लेकर पत्रकारों को सरकारी आवास, चिकित्सा सुविधा, घर बनाने के लिए सस्ते प्लाट और नगद सहायता दी गई.

इसके अलावा यह आरोप भी लगते रहे हैं कि राज्यों की राजधानियों में चुनिन्दा पत्रकार और संपादक मुख्यमंत्रियों और ताकतवर मंत्रियों/अफसरों के पे-रोल पर भी रहे हैं. उन्हें हर महीने एक निश्चित रकम मिलती रही है. इसमें कुछ दिल्ली के राष्ट्रीय अखबारों/चैनलों में काम करनेवाले पत्रकार/संपादक भी शामिल रहे हैं.
इसके अलावा कुछ मुख्यमंत्रियों ने विवेकाधीन कोष से राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया के महत्वपूर्ण पत्रकारों/संपादकों को उनके एन.जी.ओ या पत्रिका निकालने या किसी दूसरे नाम पर लाखों रूपयों की सहायता भी देते रहे हैं.

यही नहीं, राज्यों में पत्रकारों और नेताओं/अफसरों के बीच की यह नजदीकी यहाँ तक पहुँच गई कि कुछ मुंहलगे पत्रकार अफसरों के मनमाफिक ट्रांसफर और पोस्टिंग से लेकर ठेका/लाइसेंस/कोटा-परमिट भी दिलाने लगे थे.

आश्चर्य नहीं कि इन कुछ पत्रकारों/संपादकों के इस ‘गुण’ ने उनके मालिकों को भी उनका इस्तेमाल अपने दूसरे धंधों को आगे बढ़ाने में करना शुरू कर दिया.

("कथादेश" और "समकालीन जनमत" में प्रकाशित आलेख की पहली किस्त...कल पढ़िए दूसरी किस्त..आप की टिप्पणियों का इंतजार रहेगा) 

4 टिप्‍पणियां:

विनीत कुमार ने कहा…

सर,वहां जो भी अखबार और चैनल हैं उनमें से अधिकांश राष्ट्रीय स्तर के हैं और उनकी एक ईकाई वहां काम करती है. ऐसे में क्या उसे बिहारी मीडिया कहना सही होगा ? क्योंकि स्ट्रैटजी तो दिल्ली में ही बैठकर लोग बनाते होंगे..मुझे लगता है इस मीडिया के साथ बिहारी शब्द लगाना सही नहीं है.

sajhamorcha ने कहा…

आपके विचार से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ विनीत जी ...बिहार में कार्यरत मीडिया मे से अधिकांश निश्चित ही राष्ट्रीय स्तर के मीडिया की इकाइयां हैं . मजे की बात ये है की राष्ट्रीय स्तर के मीडिया में लगभग ऊँचे पदों पर तमाम बिहारी बैठे है और तमाम निर्णय वही लेते हैं. आलेख बढियां है. हाँ! शीर्षक के संपादन की जरुरत जरुर है...theevien inhav

sanjay ने कहा…

सर, आपका लेख पढ़ा इस लेख को पढ़ कर मुझे ऐसा लगता है कि बिहार के मीडिया की दशा आपतकाल के मीडिया की तरह हो गई है. पीसीआई के अध्यक्ष ने बिहार के मीडिया के लिए जाँच समिति बना दी है. इस समिति से आगे राज्य सरकारे मीडिया को कंट्रोल करने से पहले हिचकेगी. लेकिन बाकि मीडिया की दशा भी कुछ बेहतर नहीं है.

Saurabh ने कहा…

There are hundreds of dailies and media magazines in Bihar and buying or manipulating all of them is a impossible task. We also have bihar editions of TOI and hindustan times India today outlok etc etc which are national daily, how can nitish Govt manipulate them. Now the question is why a media will be manipulated all the time - i repeat all the time. Their survival is for bottom line and if they publish news which people wants and have controversial subjects the profit will be more. How much money to all newspaper they will push everyday. Then we have national and international dailies too. It so hard to manipulate. Why not congress learns from this govt then :) now coming to dont beive part, when you share a post you want people to read on ur behalf, wat made you believe in these articles- as i see these are mere perception not based on everyday facts, there are no references.. and why not this author was manipulated.........When you post such blogs you can always go for open discussions not necessarily submitting proofs... Just food for thought... hard to believe ....