सोमवार, फ़रवरी 24, 2014

नीडो की कुर्बानी

उत्तर पूर्व के साथ भेदभाव में मीडिया भी शामिल है

देश की राजधानी में उत्तर पूर्व के लोगों के साथ होनेवाला नस्ली भेदभाव एक ऐसा बर्बर और कड़वा सच है जिसे जानते सब हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के लिए कम ही तैयार होते हैं. चाहे पुलिस-प्रशासन हो या मीडिया या फिर सिविल सोसायटी- सब अलग-अलग कारणों से उससे आँख चुराते हैं या बहुत दबी जुबान में चर्चा करते हैं.
अफ़सोस की बात यह है कि दिल्ली और देश के अन्य राज्यों/शहरों में उत्तर पूर्व के लोगों को जिस तरह का नस्ली भेदभाव, उत्पीडन और अपमान झेलना पड़ता है, उसे मुद्दा बनाने और न्यूज मीडिया सहित नागरिक समाज की चेतना को झकझोरने के लिए अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया को अपनी जान देनी पड़ी.
अफ़सोस यह भी कि शुरू में कई चैनलों और उनके रिपोर्टरों ने पुलिस के तोते की तरह नीडो की मौत को ‘मामूली मारपीट और ड्रग्स के ओवरडोज’ जैसी स्टीरियोटाइप ‘स्टोरीज’ से दबाना-छुपाना चाहा.

लेकिन सलाम करना चाहिए उत्तर पूर्व के उन सैकड़ों छात्र-युवाओं और प्रगतिशील-रैडिकल छात्र संगठनों का जिन्होंने नीडो की नस्ली हत्या के बाद लाजपतनगर से लेकर जंतर-मंतर तक अपने गुस्से और विरोध का इतना जुझारू इजहार किया कि मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियों-नेताओं और सरकार-पुलिस-प्रशासन को उसे नोटिस करना पड़ा. उन चैनलों/अखबारों का भी जिन्होंने पुलिस की प्लांटेड स्टोरीज को ख़ारिज करके इसे मुद्दा बनाया.

नतीजा, उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्ली भेदभाव का मुद्दा एक बार न्यूज मीडिया की सुर्ख़ियों में है. हालात कितने खराब हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि नीडो की हत्या के खून अभी सूखे भी नहीं थे कि राजधानी में मणिपुर की एक बच्ची के साथ बलात्कार और एक युवा पर जानलेवा हमले का मामला सामने आ गया.
ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं लेकिन होता यह था कि या तो उन्हें दबा दिया जाता दिया जाता था या फिर उन्हें रुटीन अपराध के मामले मानकर निपटा दिया जाता था. नस्ली छींटाकशी और उपहास तो जैसे आम बात थी. 
लेकिन नीडो की मौत के बाद लगता है उत्तर-पूर्व के युवाओं का धैर्य जवाब देने लगा है. वे इसे और सहने के बजाय इससे लड़ने और चुनौती देने का मन बना चुके हैं. इससे चैनलों-अख़बारों से लेकर सिविल सोसायटी की अंतरात्मा भी जागी दिखती है. अगले लोकसभा चुनावों के कारण नेताओं का दिल भी फटा जा रहा है.

क्या स्थिति बदलेगी या फिर कुछ दिनों बाद फिर किसी नीडो को जान देनी पड़ेगी? यह सवाल पूछना इसलिए जरूरी है क्योंकि उत्तर पूर्व के लोगों के साथ लंबे समय से जारी नस्ली भेदभाव के लिए एक खास सवर्ण हिंदू राष्ट्रवादी-मर्दवादी-नस्लवादी मानसिकता जिम्मेदार है जिसकी जड़ें पुलिस-प्रशासन से लेकर मीडिया तक में फैली हुईं है. इसके शिकार सिर्फ उत्तर पूर्व के ही नहीं बल्कि सभी कमजोर वर्ग और अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम-सिख और आदिवासी आदि हैं.

यह इतनी आसानी से खत्म होनेवाला नहीं है. इससे लड़ने के लिए न सिर्फ इस मानसिकता को चुनौती और एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है बल्कि नस्लभेद के उन सभी दबे-छिपे रूपों और स्टीरियोटाइप्स को खुलकर नकारना और सार्वजनिक मंचों को ज्यादा से ज्यादा समावेशी बनाना होगा.
अपने न्यूज चैनलों को ही देख लीजिए, उनके कितने एंकर/रिपोर्टर उत्तर पूर्व के हैं? इन चैनलों पर उत्तर पूर्व की ख़बरों को कितनी जगह मिलती है? कितने चैनलों के उत्तर पूर्व में रिपोर्टर हैं? मनोरंजन चैनलों पर कितने धारावाहिकों के पात्र उत्तर पूर्व के हैं? उत्तर पूर्व को लेकर उपेक्षा, भेदभाव और स्टीरियोटाइप्स की यह सूची बहुत लंबी है.
क्या नीडो की मौत के बाद न्यूज मीडिया अपने अंदर भी झांकेगा? क्या इस ‘पब्लिक स्फीयर’ में भी हम कुछ बदलाव की उम्मीद करें?

('तहलका' के 28 फ़रवरी के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)   


शनिवार, फ़रवरी 22, 2014

अर्थनीति वह जो कारपोरेट मन भाए

नव उदारवादी अर्थनीति की बीन बजाने में जुटी है ‘आप’

आम आदमी पार्टी (आप) के आर्थिक दर्शन और नीतियों से धीरे-धीरे पर्दा हटने लगा है. हालाँकि पार्टी ने वायदे के बावजूद अब तक अपने आर्थिक दर्शन और अर्थनीति संबंधी दस्तावेज पेश नहीं किया है लेकिन उसके शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल और मुख्य विचारक-रणनीतिकार योगेन्द्र यादव के हालिया भाषणों और बयानों से पार्टी की अर्थनीति की दिशा साफ़ होने लगी है.
केजरीवाल ने उद्योगपतियों के लाबी संगठन- सी.आई.आई की सभा में यह कहकर पार्टी के आर्थिक दर्शन की दिशा स्पष्ट कर दी कि पार्टी पूंजीवाद के खिलाफ नहीं है और वह सिर्फ याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) का विरोध करती है. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का काम बिजनेस नहीं है और बिजनेस पूरी तरह से निजी क्षेत्र और उद्यमियों का काम है. इसके लिए लाइसेंस और इंस्पेक्टर राज खत्म होना चाहिए.
दूसरी ओर, आप के मुख्य प्रवक्ता योगेन्द्र यादव ने मुंबई में निवेशकों की एक सभा में कहा कि खाद्य सब्सिडी नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि सीधे खाद्यान्न देना गरीबों की मदद का सबसे निष्प्रभावी और महंगा तरीका है.

उनके मुताबिक, गरीबों की मदद का सबसे बेहतर तरीका उनके लिए अलग से उपाय नहीं बल्कि बिजनेस के अनुकूल माहौल बनाकर और भ्रष्टाचार पर काबू पाकर आर्थिक विकास को तेज करना है ताकि सभी को ऊपर उठाया जा सके. यादव ने यह भी कहा कि पार्टी निजी पूंजी के अनुकूल माहौल बनाने के लिए वि-नियमन (डी-रेगुलेशन), बिजनेस मामलों में राज्य के अहस्तक्षेप की नीति और स्वच्छ राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है.

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चौंक गए? ये बातें पहले भी सुनी हुई लग रही हैं? आपका चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि आम आदमी पार्टी के नेताओं के अर्थनीति संबंधी इन बयानों में नया कुछ नहीं है. न भाषा में और न लहजे में. कांग्रेस और भाजपा के आर्थिक दर्शन और अर्थनीति की दिशा यही है. केजरीवाल और योगेन्द्र यादव कमोबेश वही बोल रहे हैं जिसे देश पिछले दो दशकों से अहर्निश मनमोहन सिंह-पी. चिदंबरम-मोंटेक सिंह अहलुवालिया से सुनता रहा है और इन दिनों नरेन्द्र मोदी से सुन रहा है.
अगर आप की अर्थनीति की दिशा के बारे में केजरीवाल और यादव के ताजा बयानों और भाषणों को उसकी भविष्य में घोषित होनेवाली आर्थिक नीति की पूर्वपीठिका मानें तो सच यह है कि अर्थनीति के बुनियादी उसूलों और दिशा के बारे में मनमोहन सिंह, नरेन्द्र मोदी और केजरीवाल की सोच में कोई बुनियादी फर्क नहीं है.        
संभव है कि योगेन्द्र यादव इसे स्वीकार न करें लेकिन संकेत यही है कि वे जिस अर्थनीति की वकालत कर रहे हैं, वह उसी नव उदारवादी अर्थनीति की बगलगीर दिखाई पड़ रही है जिसका समर्थन कांग्रेस और भाजपा करती रही हैं और जो पिछले दो दशकों से केन्द्र में सरकारों में बदलाव के बावजूद बिना किसी रुकावट के जारी हैं.

आम आदमी पार्टी की अर्थनीति- नव उदारवादी अर्थनीति के करीब जा रही है, इसका संकेत इस तथ्य से भी मिलता है कि पार्टी के आग्रह पर नव उदारवादी अर्थनीति के आलोचक और वैकल्पिक अर्थनीति की पैरवी करनेवाले प्रो. अरुण कुमार जैसे अर्थशास्त्रियों ने कुछ महीनों पहले अर्थनीति का जो मसौदा तैयार किया था, उसे एक तरह से ठंडे बस्ते में डालकर पार्टी ने जनवरी के आखिरी सप्ताह में अर्थनीति तय करने के लिए सात सदस्यी नई समिति बनाई जिसके ज्यादातर सदस्य घोषित तौर पर नव उदारवादी आर्थिक नीति के समर्थक हैं.

निश्चय ही, आम आदमी पार्टी के नव उदारवादी अर्थनीति को गले लगाने के साफ़ संकेतों के कारण उनके बहुतेरे समर्थकों और शुभचिंतकों को निराशा हुई है जो उससे अर्थनीति के मामले में एक वैकल्पिक दृष्टिकोण और दर्शन की अपेक्षा कर रहे थे.
हालाँकि पार्टी के विचारक और मुख्य प्रवक्ता योगेन्द्र का कहना है कि आप २० सदी की विचारधाराओं और वैचारिक खेमों- वाम और दक्षिण में विश्वास नहीं करती है और उन्हें भारत के लिए प्रासंगिक नहीं मानती है.
यह भी कि आप किसी भी पूर्व निर्धारित आर्थिक नीति के पैकेज से सहमत नहीं है और देश की जरूरतों के मुताबिक हर आर्थिक समस्या का घरेलू समाधान ढूंढने की कोशिश करेगी.  केजरीवाल भी कह चुके हैं कि वे वाम और दक्षिण के वैचारिक विभाजनों में यकीन नहीं करते हैं और समस्याओं का जहाँ से भी समाधान मिलेगा, उसे लेने में उन्हें परहेज नहीं होगा.
इन दावों और बयानों से ऐसा भ्रम होता है कि आप वाम और दक्षिण से अलग एक वैकल्पिक राजनीतिक-आर्थिक वैचारिकी की वकालत कर रहा है. लेकिन सच यह है कि वाम और दक्षिण के वैचारिक विभाजनों और नीतिगत पैकेजों को ख़ारिज करने का जुबानी दावा करते हुए भी आम आदमी पार्टी वास्तव में एक दक्षिणपंथी आर्थिक एजेंडे यानी मुक्त बाजार की नव उदारवादी अर्थनीति को ही नए पैकेज में पेश करने की कोशिश कर रही है.

लेकिन उसकी भाषा और मुहावरे इतने जाने-पहचाने हैं कि इसे छिपा पाना मुश्किल है. वैसे आप इसे छुपाना भी नहीं चाहती है. इसकी वजह यह है कि वह बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स का भरोसा और समर्थन जीतने के लिए बेचैन है.

इस मायने में कांग्रेस, भाजपा और आप यानी तीनों पार्टियां नव उदारवादी अर्थनीति के साथ खड़ी हैं और फर्क सिर्फ कुछ मामलों में जोर और प्रस्तुति भर का है. उदाहरण के लिए, कांग्रेस नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को गरीबों को कुछ मामूली राहतों (जैसे मनरेगा, भोजन के अधिकार आदि) के साथ लागू करने के पक्ष में है जबकि भाजपा-नरेन्द्र मोदी उसे बिना किसी बाधा और गरीबों को राहत देने जैसे सब्सिडी बोझ के बगैर लागू करना चाहते हैं.
वहीँ आप का दावा है कि वह इसे बिना याराना (क्रोनी) पूंजीवाद के लागू करना चाहती है. यही नहीं, नव उदारवादी अर्थनीति को लागू करने के मामले में आप वास्तव में भाजपा और नरेन्द्र मोदी के ज्यादा करीब खड़ी है.     
असल में, आम आदमी पार्टी के नेताओं और रणनीतिकारों को लगता है कि शासन की पार्टी (पार्टी आफ गवर्नेंस) बनने के लिए बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स का भरोसा जीतना जरूरी है. इसके बिना सत्ता में पहुंचना और खासकर सरकार चला पाना मुश्किल है.

यही कारण है कि आप के नेता सी.आई.आई से लेकर मुम्बई के निवेशकों और गुलाबी अखबारों तक यह सफाई देते घूम रहे हैं कि वे उद्यमियों के खिलाफ नहीं हैं, उल्टे वे भ्रष्टाचार खत्म करके बिजनेस करने के लिए अनुकूल माहौल बनाना चाहते हैं.

ही नहीं, खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई की अनुमति देने के शीला दीक्षित सरकार के फैसले को पलटने, निजी बिजली वितरण कंपनियों का सी.ए.जी से आडिट कराने और के.जी. बेसिन गैस मामले में एफ.आई.आर दर्ज कराने जैसे फैसलों से बेचैन कारपोरेट जगत को आश्वस्त करने के लिए केजरीवाल और यादव लगातार कह रहे हैं कि ये उनकी नीति नहीं बल्कि चुनिंदा मामलों में लिए गए फैसले भर हैं.

लेकिन सवाल यह है कि क्या नव उदारवादी अर्थनीति से याराना पूंजीवाद या भ्रष्टाचार को अलग किया जा सकता है? बिलकुल नहीं, भ्रष्टाचार और क्रोनी कैपिटलिज्म का सीधा सम्बन्ध नव उदारवादी आर्थिक सुधारों से है.
सच यह है कि इन सुधारों के साथ भ्रष्टाचार का भी पूरी तरह से उदारीकरण हो गया है. इसका सुबूत यह है कि आज़ादी के बाद से भारत से जो कालाधन अवैध तरीके से देश से बाहर गया, उसका ६८ प्रतिशत अकेले १९९१ के आर्थिक सुधारों के बाद से गया है. ग्लोबल फिनान्सियल इंटीग्रिटी (जी.एफ.आई) रिपोर्ट’२०१३ के मुताबिक, १९४८ से २००८ के बीच अवैध तरीके से भारत से लगभग २१३ अरब डालर की रकम विदेशों में खासकर आफशोर बैंकों में चली गई.
अगर इस रकम को मुद्रास्फीति के साथ एडजस्ट करें तो भ्रष्ट और घोटालेबाज मंत्रियों, नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों और माफियाओं ने इन साठ वर्षों में कोई ४६२ अरब डालर की रकम लूटकर विदेशों में भेज दिया. लेकिन उससे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका ६८ प्रतिशत यानी ३१४ अरब डालर आर्थिक सुधारों के शुरू होने के बाद गए हैं.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, १९९१ के आर्थिक सुधारों के पहले जहां प्रति वर्ष औसतन ९.१ प्रतिशत की दर से अवैध कालाधन विदेशी बैंकों में जा रहा था, वह सुधारों की शुरुआत के बाद उछलकर सीधे १६.४ प्रतिशत सालाना की दर से जाने लगा. यही नहीं, इस रिपोर्ट के अनुसार, २००२ से २००८ के बीच औसतन हर साल १६ अरब डालर यानी ७३६ अरब रूपये का कालाधन अवैध तरीके से देश से बाहर चला गया.          

असल में, नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के साथ भ्रष्टाचार में वृद्धि कई कारणों से हुई है. पहली बात तो यह है कि यह धारणा अपने आप में एक मिथ है कि लाइसेंस-कोटा-परमिट राज खत्म हो जाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा.
सच यह है कि भ्रष्टाचार पूंजीवादी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है. लाइसेंस-कोटा-परमिट राज भी एक तरह का नियंत्रित पूंजीवाद था, जिसमें हर लाइसेंस-कोटे-परमिट की कीमत थी. लेकिन नियंत्रित और बंद अर्थव्यवस्था होने के कारण दांव इतने उंचे नहीं थे, जितने आज हो गए हैं. नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में भी लाइसेंस-कोटा-परमिट राज खत्म नहीं हुआ बल्कि कुछ मामलों में उसका रूप थोड़ा बदल गया है जबकि कुछ में वह अब भी वही पुराना लाइसेंस-कोटा-परमिट है. अलबत्ता, अब उनका आकार बहुत बढ़ गया है.
दूसरे, उदारीकरण के इस दौर में कंपनियों की ताकत बहुत ज्यादा बढ़ गई है. खासकर बड़ी विदेशी पूंजी के आने के बाद उनकी मोलतोल की क्षमता बेतहाशा बढ़ गई है. यह इसलिए हुआ है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के तहत राज्य को बड़ी पूंजी के हितों का सबसे बड़ा संरक्षक, हितैषी, उसके हितों को आगे बढ़ानेवाला और उसके निवेश और मुनाफे की राह से रोड़े हटानेवाला बना दिया गया.

नव उदारवादी पूंजीवादी सुधारों के तहत राजनीति और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के बीच ऐसा गठबंधन तैयार हुआ है जिसने राज्य को कार्पोरेट्स की सेवा में लगा दिया है. राज्य की भूमिका अब देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के लिए सार्वजनिक संसाधनों खासकर दुर्लभ प्राकृतिक और अन्य संसाधनों को मनमाने तरीके से औने-पौने दामों में मुहैया कराना रह गया है.

इसके लिए नव उदारवादी सुधारों के तहत ऐसी नीतियां तैयार की गईं हैं जो कीमती और दुर्लभ सार्वजनिक संसाधनों को कार्पोरेट्स के हवाले करने का रास्ता साफ करती हैं. कहने का अर्थ यह कि भ्रष्टाचार और घोटालों से इतर कार्पोरेट्स के पक्ष में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसे कानूनी अर्थों में भ्रष्टाचार नहीं माना जाता है क्योंकि वह सब कानून और नियमों के अनुकूल है.
सच पूछिए तो पिछले दो दशकों में उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक हितों की कीमत पर जिस तरह से देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के हितों को आगे बढ़ाया गया है, उससे बड़ा घोटाला और कोई नहीं है.
इस नए निजाम में सबसे ज्यादा जोर कंपनियों के मनमाने मुनाफे को बढ़ाने पर है और इसके लिए उन्हें जो रियायतें और छूट दी जा सकती हैं, बिना किसी शर्म-संकोच के दी जा रही हैं. उदाहरण के लिए, हर साल बजट में कंपनियों और कारोबारियों को विभिन्न तरह के टैक्सों में अरबों रूपये की छूट दी जा रही है जो एक तरह की सब्सिडी ही है.

असल में, पिछले डेढ़-दो दशकों में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को ‘तेज विकास दर और भारत को आर्थिक महाशक्ति’ बनाने की आड़ में आगे बढ़ाया गया है, उसने वास्तव में गरीबों, किसानों, आदिवासियों, दलितों और आम आदमी के हितों की कीमत पर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी द्वारा बेशकीमती सार्वजनिक संसाधनों- जल, जंगल, जमीन और खनिजों की बेशर्म लूट का रास्ता साफ़ किया है.

सच पूछिए तो यह सिर्फ याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) नहीं बल्कि मूलतः यह लुटेरा पूंजीवाद (रोबर कैपिटलिज्म) है. लेकिन इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं है. यह पूंजीवाद का कोई विपथगमन (एबेरेशन) नहीं बल्कि अन्तर्निहित चरित्र है. इसका इलाज मुक्त बाजार और वि-नियमन (डी-रेगुलेशन) नहीं है बल्कि ये इसके ही स्वाभाविक सहोदर हैं.
केजरीवाल और आम आदमी पार्टी नीतिगत रूप से इसका विकल्प पेश किये बिना सिर्फ ईमानदार राजनीति के प्रस्ताव से समाधान का दावा कर रही है लेकिन वे भूल रहे हैं कि ईमानदार तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी हैं लेकिन वे कहाँ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाए?
याद रहे, मार्क्स ने कहा था कि राजनीति, अर्थनीति का ही संकेंद्रित रूप है. साफ़ है कि केजरीवाल जिस नव उदारवादी अर्थनीति की बीन बजाकर कार्पोरेट्स को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, वह राजनीतिक रूप से भी उन्हें उसी याराना पूंजीवाद की गोद में बैठा देगी.

उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि आप अर्थनीति के मामले में जो मध्य-दक्षिण (सेंटर-राईट) पोजिशनिंग की कोशिश कर रही है, वह उन्हें बहुत दूर नहीं ले जा पाएगी. इसकी वजह यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में मध्य-दक्षिण जगह खाली नहीं है. क्या उन्हें पता है कि वह जगह भाजपा और नरेन्द्र मोदी ने पहले से ही भर दी है? वहां मोदी से प्रतियोगिता करके उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा. 

केजरीवाल चाहे या न चाहें लेकिन उनके सामने बाएं मुड़ने या मोदी की 'हवा' में उड़ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.  
('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में 22 फ़रवरी को प्रकाशित टिप्पणी का असंपादित आलेख   

रविवार, फ़रवरी 16, 2014

मोदीनोमिक्स की सच्चाई

गैर बराबरी बढ़ानेवाली नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकार हैं मोदी  

हालिया चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में लोकसभा चुनावों में एन.डी.ए के सत्ता के करीब पहुँचने और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बढ़ती संभावनाओं से भाजपा नेताओं और समर्थकों के बाद सबसे ज्यादा खुशी कारपोरेट जगत और मुंबई शेयर बाजार को हुई है.
आश्चर्य नहीं कि शेयर बाजार तुरंत उछलने लगा, कारपोरेट जगत ने अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर सरकार की जरूरत बताते हुए संतोष जाहिर किया और गुलाबी अखबारों ने राहत की सांस ली. निश्चय ही, भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति के कारण अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी- मूडी की रेटिंग गिराने (डाउनग्रेड) की चेतावनी के बावजूद मोदी के सत्ता में आने की ‘खबर’ से उछलते शेयर बाजार की खुशी बहुत कुछ कहती है.
यह किसी से छुपा नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और उसके कारपोरेट प्रतिनिधियों ने इस बार लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी पर दांव लगाया है और वे हर हाल में उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. इसकी वजह भी किसी से छुपी नहीं है.

घोषित तौर पर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को नरेन्द्र मोदी में एक “सख्त, निर्णायक और परिणामोन्मुखी” प्रशासक दिखाई पड़ रहा है जो अर्थव्यवस्था को मौजूदा “संकट” और “नीतिगत लकवे” की स्थिति से बाहर निकालकर पटरी पर ला सकता है. कार्पोरेट्स की मोदी में इस भरोसे की बड़ी वजह यह है कि गुजरात में मोदी ने यह करके दिखाया है.

असल में, कार्पोरेट्स और देशी-विदेशी पूंजी को नरेन्द्र मोदी से बहुत उम्मीदें हैं. उसे लगता है कि मौजूदा परिस्थितियों में मोदी में ही वह राजनीतिक कौशल और क्षमता है कि वे कारपोरेट-परस्त नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की कड़वी गोली को लोगों के हलक में उतार और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को और अधिक रियायतें और छूट दे सकते हैं.
कार्पोरेट्स को अच्छी तरह से पता है कि अगले दौर के आर्थिक सुधार आसान नहीं हैं और उन्हें लागू करने में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यू.पी.ए सरकार की नाकामी के बाद मोदी से ही उम्मीदें बची हैं. हैरानी की बात नहीं है कि नव उदारवादी अर्थशास्त्रियों से लेकर शेयर बाजार के सटोरियों तक और बड़ी पूंजी के मुखपत्र गुलाबी अखबारों से लेकर औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबी संगठनों जैसे फिक्की, सी.आई.आई आदि तक सभी खुलकर मोदी की वकालत कर रहे हैं.
दूसरी ओर, मोदी भी कार्पोरेट्स को आश्वस्त करने में पीछे नहीं हैं. उदाहरण के लिए, पिछले महीने गांधीनगर में उद्योगपतियों के बड़े संगठन- फिक्की की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने कार्पोरेट्स की हर मांग पर मोहर लगाई.

कार्पोरेट्स ने मोदी के सामने श्रम सुधारों यानी श्रम कानूनों को ढीला करने, स्थाई नौकरियों की जगह कांट्रेक्ट व्यवस्था, हायर एंड फायर यानी जब चाहें भर्ती और जब चाहें छंटनी और यूनियनों को काबू में करने के अलावा रक्षा उत्पादन के निजीकरण की मांगें उठाईं. मोदी ने वायदा किया कि वे श्रम को राज्य विषय बना देंगे और निजी पूंजी निवेश को बढ़ाने के लिए सभी अनुकूल उपाय करेंगे.

लेकिन मोदी यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि वे सत्ता में आयेंगे तो ‘टैक्स आतंकवाद’ खत्म करेंगे. आखिर यह ‘टैक्स आतंकवाद’ क्या है? असल में, देशी-विदेशी कार्पोरेट्स पिछले कई महीनों से वोडाफोन, आई.बी.एम से लेकर नोकिया और दूसरी कई कंपनियों के मामले में आयकर विभाग द्वारा टैक्स नोटिस जारी करने को टैक्स आतंकवादबता रहे हैं.
यह किसी से छुपा नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियाँ टैक्स कानूनों में मौजूद छिद्रों का चतुराई से फायदा उठाकर टैक्स देने से बचने से लेकर वास्तविक टैक्स से कम टैक्स देती रही हैं. मजे की बात यह है कि हर साल केन्द्र सरकार कार्पोरेट्स और अमीरों को साढ़े चार लाख करोड़ रूपये से अधिक की टैक्स छूट और रियायतें देती रही हैं.
इसके बावजूद कार्पोरेट्स वास्तविक टैक्स देने से बचने के लिए तीन-तिकडम करते रहे हैं. इससे हर साल सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रूपये का चूना लगता है. उल्लेखनीय है कि वोडाफोन को ११ हजार करोड़ रूपये से ज्यादा का टैक्स भरने की नोटिस दी गई थी. ऐसे और कई मामले हैं लेकिन ये कम्पनियाँ इसे ज्यादती बताते हुए टैक्स भरने के लिए तैयार नहीं हैं.

तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इन कंपनियों से टैक्स वसूलने के लिए टैक्स कानून में संशोधन करके पीछे से टैक्स वसूलने (रेट्रोस्पेक्टिव) का प्रावधान शामिल किया था. इसके अलावा टैक्स देने से बचने की तिकड़मों पर अंकुश लगाने के लिए गार नियम लाये गए थे लेकिन कार्पोरेट्स ने इन प्रावधानों पर खूब हंगामा किया, इसे निवेश विरोधी बताया और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को इन्हें ठंडे बस्ते में डालने के लिए मजबूर कर दिया.

कहने की जरूरत नहीं है कि कार्पोरेट्स इसी रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स प्रावधान और गार नियमों को ‘टैक्स आतंकवाद’ कहते हैं जिससे मोदी निजात दिलाने का वायदा कर रहे हैं. यह और बात है कि इससे टैक्स कानूनों में मौजूद छिद्रों का लाभ उठानेवाले कार्पोरेट्स को खुली छूट मिल जाएगी. भला ऐसे प्रधानमंत्री को कार्पोरेट्स क्यों नहीं पसंद करेंगे?
असल में, एन.डी.ए और उनके प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी की अर्थनीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी यह कारपोरेट-परस्ती है जिसे वह छुपाने की कोशिश नहीं करते हैं. यहाँ तक कि कार्पोरेट्स को खुश करने के चक्कर में मोदी अपनी मातृ संस्था- आर.एस.एस की प्रिय अर्थनीति- स्वदेशी का भूल से भी जिक्र नहीं करते हैं.
याद रहे कि मोदी राजनीतिक तौर पर उस दक्षिणपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मुक्त बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और निजी पूंजी और उद्यमशीलता को खुली छूट देनेवाली नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी की वकालत करती रही है.             

सच पूछिए तो इस मामले में भाजपा-नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के आर्थिक दर्शन में कोई बुनियादी फर्क नहीं है. अगर कोई फर्क है तो सिर्फ उसके विभिन्न पहलुओं पर जोर और उसकी प्रस्तुति, पैकेजिंग और मार्केटिंग के तरीके में फर्क है.

उल्लेखनीय है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी अर्थव्यवस्था में राज्य की सीमित या न के बराबर भूमिका और निजी पूंजी खासकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को अगुवा भूमिका देने की वकालत करती है.

यही नहीं, नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी मूलतः मुक्त बाजार पर आधारित भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण को आगे बढाती है और वह राज्य की कल्याणकारी भूमिका को भी सीमित करने यानी सब्सिडी आदि खत्म करने की पैरवी करती है.
लेकिन बुनियादी तौर पर मुक्त बाजारपर आधारित नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकार होने के बावजूद जहाँ मोदी उसे सख्ती से लागू करने और उसके विरोध की हर आवाज़ को दबा देने के पक्षधर हैं वहीँ कांग्रेस थोड़ी नरमी बरतने और लोगों को उसकी मार से राहत देने और बदले में उनका समर्थन जीतने के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं की वकालत करती है.
लेकिन देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को लगता है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की कांग्रेसी रणनीति अब अप्रभावी हो गई है. उसे इन सुधारों को सख्ती से आगे बढ़ाने वाले नेता की जरूरत है. मोदी के रूप में उसे मुंहमांगा नेता मिल गया है जो बिना किसी शर्म या हिचक के कार्पोरेट्स के एजेंडे को देश के ‘विकास और खुशहाली’ का एजेंडा बताने और उसे आमलोगों खासकर गरीबों-निम्न मध्यवर्ग में स्वीकार्य बनाने में कामयाब होता दिख रहा है.   

यह और बात है कि पिछले दो दशकों से देश में नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी पर आधारित आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाए जाने और जी.डी.पी के पैमाने पर आर्थिक विकास की अपेक्षाकृत तेज गति के बावजूद गरीबों की स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है, आर्थिक गैर बराबरी तेजी से बढ़ी है और गरीबों, निम्न मध्यमवर्ग, छोटे-मध्यम किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों में असंतोष बढ़ा है.
इसकी मुख्य वजह यह है कि उन्हें आर्थिक सुधारों का कोई खास फायदा नहीं मिला है. उल्टे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है. सच यह है कि इन वर्गों के लिए आर्थिक सुधार एक कड़वी गोली की तरह साबित हुए हैं जिसे और निगलने के लिए वे तैयार नहीं हैं.
यहाँ तक कि इन आर्थिक सुधारों के लाभार्थी- मध्यम वर्ग में भी हाल के वर्षों में अवसरों के सीमित होने और याराना पूंजीवाद की अगुवाई में बेतहाशा भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ने से निराशा का माहौल है. इसके कारण नव उदारवादी आर्थिक सुधारों पर सवाल उठने लगे हैं और राजनीतिक तौर पर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आम लोगों के बीच स्वीकार्य बनाना एक बड़ी चुनौती बन गई है.

कांग्रेस के नेतृत्ववाले यू.पी.ए ने इसी चुनौती के मद्देनजर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की कड़वी गोली को लोगों में स्वीकार्य बनाने के लिए उसे मनरेगा जैसी योजनाओं की चाशनी में लपेट कर पेश करने और गरीबों, कृषि मजदूरों, दलितों और आदिवासियों का समर्थन जीतने की कोशिश की लेकिन शुरूआती सफलता के बाद यह रणनीति भी दस सालों में फीकी पड़ने लगी है.

('सबलोग' के फ़रवरी अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली क़िस्त। बाकी आप पत्रिका खरीद कर पढ़िए) 

शुक्रवार, फ़रवरी 07, 2014

मीडिया आक्सीजन के बिना ‘आप’

मीडिया की अहर्निश प्रशंसा का नशा आप पार्टी के मंत्रियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं के सिर चढ़कर बोलता रहा है

आम आदमी पार्टी (आप) और उसके नेता अरविंद केजरीवाल इन दिनों न्यूज मीडिया से खासे नाराज और खिन्न से दिख रहे हैं. उन्हें लगता है कि न्यूज चैनल और अखबार पूर्वाग्रह और एक एजेंडे के तहत उनकी सरकार की गैर जरूरी आलोचना कर रहे हैं और नकारात्मक खबरें दिखा रहे हैं. केजरीवाल के मुताबिक, पत्रकार तो ईमानदार हैं लेकिन मीडिया के मालिक इस या उस पार्टी से जुड़े हैं और पत्रकारों पर दबाव डालकर ‘आप’ के खिलाफ खबरें करवा रहे हैं.
दूसरी ओर, नस्लवाद, मोरल पुलिसिंग और विजिलैंटिज्म के आरोपों से घिरे दिल्ली सरकार में कानून मंत्री सोमनाथ भारती की मीडिया से नाराजगी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि टी.वी रिपोर्टरों के सवालों पर वे आपा खो बैठे और उल्टे रिपोर्टर पर सवाल दाग दिया कि सवाल पूछने के लिए (नरेन्द्र) मोदी ने कितने पैसे दिए हैं?
हालाँकि भारती ने बाद में माफ़ी मांग ली लेकिन आप पार्टी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं की न्यूज मीडिया से नाराजगी खत्म नहीं हुई है. असल में, वे चैनलों और अखबारों के लगातार तीखे होते सवालों और आलोचनाओं को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. आप पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बौखलाहट से ऐसा लगता है कि उनमें आलोचना सुनने की आदत नहीं है.

गोया वे भगवान हों जो गलतियाँ नहीं कर सकता और किसी भी तरह की आलोचना से परे है. आलोचना के हर सुर को वे संदेह और साजिश की तरह देख रहे हैं. वे अपनी गलतियों और कमजोरियों को देखने के लिए तैयार नहीं हैं. उल्टे गलतियाँ और कमियां बतानेवालों को निशाना बना रहे हैं.
 

लेकिन इसके लिए न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनल भी जिम्मेदार हैं. दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप की कामयाबी के बाद चैनलों और अखबारों में जिस तरह से दिन-रात राग आप क्रांति बज रहा था और उसमें सिर्फ खूबियां ही खूबियां नजर आ रही थीं, वह किसी भी नेता, पार्टी और उसके समर्थकों का दिमाग खराब कर सकती है.
यही हुआ. चैनलों और अखबारों की अहर्निश प्रशंसा का नशा आप पार्टी के कई मंत्रियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है. कानून मंत्री सोमनाथ भारती हों या कवि-नेता कुमार विश्वास या फिर आप के अन्य नेता- उनके क्रियाकलापों, हाव-भाव और बयानों में अहंकार और आक्रामकता के अलावा आलोचनाओं के प्रति उपहास का रवैया साफ़ देखा जा सकता है.
लेकिन इससे न्यूज मीडिया का नहीं बल्कि आप पार्टी को नुकसान हो रहा है. केजरीवाल और उनके साथी अपने अंदर झांकने और अपनी गलतियों और कमियों को दूर करने के बजाय इसकी ओर इशारा करनेवाले न्यूज मीडिया को निशाना बनाकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. चैनलों और अखबारों से लड़कर उन्हें कुछ हासिल होनेवाला नहीं है.

आखिर केजरीवाल से बेहतर कौन जानता है कि न्यूज मीडिया की सकारात्मक कवरेज आप पार्टी की आक्सीजन है? ‘आप’ को याद रखना चाहिए कि उन्होंने खुद सार्वजनिक जीवन में नैतिक आचार-विचार के इतने ऊँचे मानदंड तय किये हैं कि उन मानदंडों पर सबसे पहले उनकी ही परीक्षा होगी. वे इससे बच नहीं सकते हैं बल्कि उनपर कुछ ज्यादा ही कड़ी निगाह रहेगी या रहनी चाहिए. आखिर लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें हैं.

लेकिन ‘आप’ के प्रति न्यूज मीडिया के रवैये में अचानक आए बदलाव और तीखी होती आलोचनाओं के पीछे कोई एजेंडा या पूर्वाग्रह नहीं है? यह मानना भी थोड़ा मुश्किल है.
क्या मीडिया के रुख में इस बदलाव के पीछे खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति नहीं देने या निजी बिजली कंपनियों की आडिट करवाने जैसे फैसलों की भी कोई भूमिका है? क्या चैनलों/अखबारों पर मोदी को ज्यादा और सकारात्मक कवरेज देने का दबाव नहीं है? हाल में कुछ संपादक किस दबाव के कारण हटाए गए हैं? कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है.                 
('तहलका' के स्तम्भ 'तमाशा मेरे आगे' में प्रकाशित टिप्पणी)

सोमवार, फ़रवरी 03, 2014

सरोकारों और आदर्शों की मार्केटिंग और कारोबार के खतरे

कारपोरेट पत्रकारिता के मुकाबले वैकल्पिक पत्रकारिता को उसी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों की मदद से खड़ा नहीं किया जा सकता

दूसरी और आखिरी क़िस्त

लेकिन सफलता की चमक ने तेजपाल और उनके समर्थकों की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी. अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि तेजपाल जिस फिसलन के रास्ते पर बढ़ रहे थे लेकिन दूसरी ओर, ‘तहलका’ के साहसी, प्रतिबद्ध और मेहनती युवा पत्रकारों के सरोकारी और खोजी रिपोर्टों के कामों की चमक से उसे ढंकने में कामयाब हो रहे थे, उससे उन्हें भ्रम हो गया था कि उन्हें रोकनेवाला और उनपर सवाल उठानेवाला कोई नहीं है.
जाहिर है कि इस दुस्साहस को अपनी बेटी के समान कनिष्ठ सहयोगी पर यौन हमले जैसे नैतिक और आपराधिक स्खलन में पतित होना था. कहने की जरूरत नहीं है कि तरुण तेजपाल जैसे सितारे का इस तरह से पतित होना वैकल्पिक और जनहित की पत्रकारिता और दूसरे मानवीय मूल्यों, आदर्शों और सरोकारों के लिए एक बड़ा धक्का है.
लेकिन इसके साथ ही यह उन सभी लोगों के लिए एक सबक भी है जो बड़ी पूंजी की समझौता-परस्त पत्रकारिता के मुकाबले गरीबों, कमजोर और बेआवाज़ लोगों के हक में बेहतर मानवीय आदर्शों, सरोकारों और उद्देश्यों की वैकल्पिक पत्रकारिता करना चाहते हैं.

निस्संदेह, तेजपाल के पतन का सबसे बड़ा सबक यह है कि उद्देश्य और सरोकार बड़े होते हैं न कि उनके लिए काम करने का दावा करनेवाला पत्रकार-संपादक. दूसरे, आप जिन सिद्धांतों, मूल्यों और आदर्शों के पालन की अपेक्षा दूसरों से करते हैं, उनपर सबसे पहले आपको खुद खरा उतरना होगा. इसके बिना आप लोगों का भरोसा नहीं जीत सकते हैं.

तीसरे, सरोकारों और आदर्शों की मार्केटिंग और कारोबार का मतलब फिसलन और विचलन की शुरुआत है और जिसका अंत बहुत त्रासद होता है.

चौथे, वैकल्पिक पत्रकारिता के लिए सांस्थानिक ढांचा भी वैकल्पिक होना चाहिए. अगर ‘तहलका’ का ढांचा इतना व्यक्ति केंद्रित और अलोकतांत्रिक नहीं होता तो संस्थान में सुप्रीम कोर्ट के विशाखा फैसले के मुताबिक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने की ज्यादा सक्रिय और पारदर्शी व्यवस्था होती.
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण यह कि बड़ी पूंजी की कारपोरेट पत्रकारिता के मुकाबले वैकल्पिक और सरोकारी पत्रकारिता को उसी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों की मदद से खड़ा नहीं किया जा सकता है. इन दोनों में एक स्वाभाविक हितों का टकराव है जिसे बचा पाना असंभव है और जिसमें अंततः बड़ी और कारपोरेट पूंजी के हित ही भारी पड़ते हैं.   
लेकिन सवाल यह है कि क्या तरुण तेजपाल के विचलनों और अपराध की सजा ‘तहलका’ को दी जानी चाहिए? निश्चय ही, तेजपाल पर लग रहे आरोपों पर कानूनी फैसला आना बाकी है और उन्हें बचाव करने का पूरा हक है. यही नहीं, इस मामले की कई न्यूज चैनलों और अखबारों में जिस तरह से सनसनीखेज तरीके और एक परपीडक आनंद और चटखारे के साथ रिपोर्टिंग की गई, उनकी मंशा भी किसी से छुपी नहीं है.

लेकिन आरोपों की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए इस सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि तेजपाल पर लगे आरोपों से ‘तहलका’ की साख पर असर पड़ा है. तरुण तेजपाल और ‘तहलका’ जिस तरह से एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे, उसमें पत्रिका के लिए खुद को उस दाग से बचा पाना आसान नहीं है.

सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि यह एक ऐसी त्रासदी है जिसकी तेजपाल से अधिक कीमत ‘तहलका’ और उसके प्रतिबद्ध पत्रकारों को चुकानी पड़ रही है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि साख और विश्वसनीयता हासिल करने में बरसों लग जाते हैं लेकिन एक बड़ी भूल और गलती उसे मिनटों में मिट्टी में मिला सकती है. इस तथ्य के बावजूद कि ‘तहलका’ खासकर हिंदी संस्करण में युवा और प्रतिबद्ध पत्रकार पत्रिका की साख को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध हैं, पत्रिका के लिए आनेवाले महीने चुनौती के होंगे.
उनके लिए यह परीक्षा की घड़ी है और निश्चय ही, उन्हें यह साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए कि ‘तहलका’ का तेजपाल से अलग भी अस्तित्व है और वह वैकल्पिक पत्रकारिता के उन आदर्शों, सरोकारों और उद्देश्यों के लिए पहले से कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध है.
खासकर ‘तहलका’ पर हो रहे उन दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी और भगवा ताकतों के हमलों का पर्दाफाश जरूर किया जाना चाहिए जो इस मौके का इस्तेमाल न सिर्फ ‘तहलका’ बल्कि दूसरे सभी प्रगतिशील और जनोन्मुखी वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रयोगों को निशाना बनाने के लिए कर रहे हैं.

इसके साथ ही, न्यूज मीडिया ने तेजपाल प्रकरण में जिस तरह से उन्मत्त (हिस्टरिकल) मीडिया ट्रायल चलने की कोशिश की है, उससे इस आशंका को बल मिल रहा है कि वह ‘भीड़ न्याय’ (लिंच मॉब) मानसिकता को आगे बढ़ा रहा है. यह कहने का आशय कतई नहीं है कि न्यूज मीडिया को ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए या उसे दबाने-छुपाने की कोशिश करनी चाहिए.

इसके उलट ऐसे मामलों में न्यूज मीडिया से अतिरिक्त संवेदनशीलता और सक्रियता की अपेक्षा की जाती है. आरोपी जितना ताकतवर और प्रभावशाली हो, न्यूज मीडिया को उतने ही साहस और प्रतिबद्धता के साथ सच को सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए.
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि रिपोर्टिंग में पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों- तथ्यों की पुष्टि, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और अनुपातबोध का ध्यान नहीं रखा जाए. इस रिपोर्टिंग का उद्देश्य यह होना चाहिए कि सच सामने आए, यौन हिंसा की पीड़िता को न्याय मिले और अपराधी चाहे जितना बड़ा और रसूखदार हो, वह बच न पाए.
लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि यौन हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग में पूरी संवेदनशीलता बरती जाए. जैसे पीड़िता की पहचान गोपनीय रखी जाए और बलात्कार के चटखारे भरे विवरण और विस्तृत चित्रीकरण से हर हाल में बचा जाए. उसे सनसनीखेज बनाने के लोभ से बचा जाए.

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि न्यूज मीडिया के एक बड़े हिस्से में ठीक इसका उल्टा हो रहा है. इस मामले को जिस तरह से सनसनीखेज तरीके से पेश किया जा रहा है और ‘भीड़ का न्याय’ (लिंच मॉब) मानसिकता को हवा दी जा रही है, उससे सबसे ज्यादा नुकसान न्याय का ही हो रहा है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया की रिपोर्टिंग और चैनलों की प्राइम टाइम बहसों से ऐसा लग रहा है कि यौन उत्पीडन और हिंसा के मामले में खुद न्यूज मीडिया के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक है और न्यूज मीडिया में एकमात्र ‘सड़ी मछली’ तेजपाल थे. तेजपाल मामले में चैनलों और अखबारों की अति सक्रियता कहीं उसी चोर भाव से तो नहीं निकल रही है?
झांसा देने के लिए चोर खुद बहुत जोरशोर से चिल्लाता है. क्या न्यूज मीडिया के शोर के पीछे भी यही वजह है? सच यह है कि न्यूज मीडिया में भी महिला पत्रकारों को उतना ही यौन उत्पीड़न झेलना पड़ता है जितना अन्य किसी भी प्रोफेशन में झेलना पड़ता है. खासकर हाल के वर्षों में जैसे-जैसे न्यूज मीडिया विशेषकर चैनलों में महिला कर्मियों की संख्या बढ़ी है, यौन उत्पीड़न की घटनाएं भी बढ़ी हैं.
लेकिन ज्यादातर मामलों में न्यूज मीडिया संस्थानों के अंदर के सामंती माहौल और पुरुषवादी वर्चस्व के कारण महिला पत्रकारों/कर्मियों के लिए उसे उठाना और न्याय पाना लगभग मुश्किल है. न्यूज मीडिया संस्थानों का प्रबंधन और नेतृत्वकर्ता संपादक शिकायतों को सुनने के लिए तैयार नहीं होते और उसे दबाने और छुपाने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखते हैं.

सच यह है कि न्यूज मीडिया के अन्तःपुर में कई तेजपाल हैं और उनके बारे में प्रबंधन सहित बहुतों को जानकारी है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती है.

सच पूछिए तो तेजपाल प्रकरण इस मामले भी एक टेस्ट केस है कि कितने अखबारों और चैनलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन और हिंसा के मामलों से तुरंत और सक्षम तरीके से निपटने और पीडितों को संरक्षण और न्याय दिलाने की सांस्थानिक व्यवस्था है?
क्या न्यूज मीडिया ने इसकी कभी आडिट की? तथ्य यह है कि इस मामले में पहले सुप्रीम कोर्ट के विशाखा निर्देशों और बाद में कानून बनने के बावजूद ज्यादातर अखबारों और चैनलों में कोई स्वतंत्र, सक्रिय और प्रभावी यौन उत्पीडन जांच और कार्रवाई समिति नहीं है या सिर्फ कागजों पर है.
क्या तेजपाल प्रकरण से सबक लेते हुए न्यूज मीडिया अपने यहाँ यौन उत्पीडन के मामलों से ज्यादा तत्परता, संवेदनशीलता और सख्ती से निपटना शुरू करेगा और अपने संस्थानों में प्रभावी और विश्वसनीय व्यवस्था बनाएगा? इसपर सबकी नजर रहनी चाहिए.

('कथादेश' के जनवरी'14 अंक में प्रकाशित टिप्पणी की दूसरी और आखिरी क़िस्त)