सोमवार, फ़रवरी 03, 2014

सरोकारों और आदर्शों की मार्केटिंग और कारोबार के खतरे

कारपोरेट पत्रकारिता के मुकाबले वैकल्पिक पत्रकारिता को उसी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों की मदद से खड़ा नहीं किया जा सकता

दूसरी और आखिरी क़िस्त

लेकिन सफलता की चमक ने तेजपाल और उनके समर्थकों की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी. अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि तेजपाल जिस फिसलन के रास्ते पर बढ़ रहे थे लेकिन दूसरी ओर, ‘तहलका’ के साहसी, प्रतिबद्ध और मेहनती युवा पत्रकारों के सरोकारी और खोजी रिपोर्टों के कामों की चमक से उसे ढंकने में कामयाब हो रहे थे, उससे उन्हें भ्रम हो गया था कि उन्हें रोकनेवाला और उनपर सवाल उठानेवाला कोई नहीं है.
जाहिर है कि इस दुस्साहस को अपनी बेटी के समान कनिष्ठ सहयोगी पर यौन हमले जैसे नैतिक और आपराधिक स्खलन में पतित होना था. कहने की जरूरत नहीं है कि तरुण तेजपाल जैसे सितारे का इस तरह से पतित होना वैकल्पिक और जनहित की पत्रकारिता और दूसरे मानवीय मूल्यों, आदर्शों और सरोकारों के लिए एक बड़ा धक्का है.
लेकिन इसके साथ ही यह उन सभी लोगों के लिए एक सबक भी है जो बड़ी पूंजी की समझौता-परस्त पत्रकारिता के मुकाबले गरीबों, कमजोर और बेआवाज़ लोगों के हक में बेहतर मानवीय आदर्शों, सरोकारों और उद्देश्यों की वैकल्पिक पत्रकारिता करना चाहते हैं.

निस्संदेह, तेजपाल के पतन का सबसे बड़ा सबक यह है कि उद्देश्य और सरोकार बड़े होते हैं न कि उनके लिए काम करने का दावा करनेवाला पत्रकार-संपादक. दूसरे, आप जिन सिद्धांतों, मूल्यों और आदर्शों के पालन की अपेक्षा दूसरों से करते हैं, उनपर सबसे पहले आपको खुद खरा उतरना होगा. इसके बिना आप लोगों का भरोसा नहीं जीत सकते हैं.

तीसरे, सरोकारों और आदर्शों की मार्केटिंग और कारोबार का मतलब फिसलन और विचलन की शुरुआत है और जिसका अंत बहुत त्रासद होता है.

चौथे, वैकल्पिक पत्रकारिता के लिए सांस्थानिक ढांचा भी वैकल्पिक होना चाहिए. अगर ‘तहलका’ का ढांचा इतना व्यक्ति केंद्रित और अलोकतांत्रिक नहीं होता तो संस्थान में सुप्रीम कोर्ट के विशाखा फैसले के मुताबिक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने की ज्यादा सक्रिय और पारदर्शी व्यवस्था होती.
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण यह कि बड़ी पूंजी की कारपोरेट पत्रकारिता के मुकाबले वैकल्पिक और सरोकारी पत्रकारिता को उसी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों की मदद से खड़ा नहीं किया जा सकता है. इन दोनों में एक स्वाभाविक हितों का टकराव है जिसे बचा पाना असंभव है और जिसमें अंततः बड़ी और कारपोरेट पूंजी के हित ही भारी पड़ते हैं.   
लेकिन सवाल यह है कि क्या तरुण तेजपाल के विचलनों और अपराध की सजा ‘तहलका’ को दी जानी चाहिए? निश्चय ही, तेजपाल पर लग रहे आरोपों पर कानूनी फैसला आना बाकी है और उन्हें बचाव करने का पूरा हक है. यही नहीं, इस मामले की कई न्यूज चैनलों और अखबारों में जिस तरह से सनसनीखेज तरीके और एक परपीडक आनंद और चटखारे के साथ रिपोर्टिंग की गई, उनकी मंशा भी किसी से छुपी नहीं है.

लेकिन आरोपों की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए इस सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि तेजपाल पर लगे आरोपों से ‘तहलका’ की साख पर असर पड़ा है. तरुण तेजपाल और ‘तहलका’ जिस तरह से एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे, उसमें पत्रिका के लिए खुद को उस दाग से बचा पाना आसान नहीं है.

सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि यह एक ऐसी त्रासदी है जिसकी तेजपाल से अधिक कीमत ‘तहलका’ और उसके प्रतिबद्ध पत्रकारों को चुकानी पड़ रही है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि साख और विश्वसनीयता हासिल करने में बरसों लग जाते हैं लेकिन एक बड़ी भूल और गलती उसे मिनटों में मिट्टी में मिला सकती है. इस तथ्य के बावजूद कि ‘तहलका’ खासकर हिंदी संस्करण में युवा और प्रतिबद्ध पत्रकार पत्रिका की साख को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध हैं, पत्रिका के लिए आनेवाले महीने चुनौती के होंगे.
उनके लिए यह परीक्षा की घड़ी है और निश्चय ही, उन्हें यह साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए कि ‘तहलका’ का तेजपाल से अलग भी अस्तित्व है और वह वैकल्पिक पत्रकारिता के उन आदर्शों, सरोकारों और उद्देश्यों के लिए पहले से कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध है.
खासकर ‘तहलका’ पर हो रहे उन दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी और भगवा ताकतों के हमलों का पर्दाफाश जरूर किया जाना चाहिए जो इस मौके का इस्तेमाल न सिर्फ ‘तहलका’ बल्कि दूसरे सभी प्रगतिशील और जनोन्मुखी वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रयोगों को निशाना बनाने के लिए कर रहे हैं.

इसके साथ ही, न्यूज मीडिया ने तेजपाल प्रकरण में जिस तरह से उन्मत्त (हिस्टरिकल) मीडिया ट्रायल चलने की कोशिश की है, उससे इस आशंका को बल मिल रहा है कि वह ‘भीड़ न्याय’ (लिंच मॉब) मानसिकता को आगे बढ़ा रहा है. यह कहने का आशय कतई नहीं है कि न्यूज मीडिया को ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए या उसे दबाने-छुपाने की कोशिश करनी चाहिए.

इसके उलट ऐसे मामलों में न्यूज मीडिया से अतिरिक्त संवेदनशीलता और सक्रियता की अपेक्षा की जाती है. आरोपी जितना ताकतवर और प्रभावशाली हो, न्यूज मीडिया को उतने ही साहस और प्रतिबद्धता के साथ सच को सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए.
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि रिपोर्टिंग में पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों- तथ्यों की पुष्टि, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और अनुपातबोध का ध्यान नहीं रखा जाए. इस रिपोर्टिंग का उद्देश्य यह होना चाहिए कि सच सामने आए, यौन हिंसा की पीड़िता को न्याय मिले और अपराधी चाहे जितना बड़ा और रसूखदार हो, वह बच न पाए.
लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि यौन हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग में पूरी संवेदनशीलता बरती जाए. जैसे पीड़िता की पहचान गोपनीय रखी जाए और बलात्कार के चटखारे भरे विवरण और विस्तृत चित्रीकरण से हर हाल में बचा जाए. उसे सनसनीखेज बनाने के लोभ से बचा जाए.

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि न्यूज मीडिया के एक बड़े हिस्से में ठीक इसका उल्टा हो रहा है. इस मामले को जिस तरह से सनसनीखेज तरीके से पेश किया जा रहा है और ‘भीड़ का न्याय’ (लिंच मॉब) मानसिकता को हवा दी जा रही है, उससे सबसे ज्यादा नुकसान न्याय का ही हो रहा है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया की रिपोर्टिंग और चैनलों की प्राइम टाइम बहसों से ऐसा लग रहा है कि यौन उत्पीडन और हिंसा के मामले में खुद न्यूज मीडिया के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक है और न्यूज मीडिया में एकमात्र ‘सड़ी मछली’ तेजपाल थे. तेजपाल मामले में चैनलों और अखबारों की अति सक्रियता कहीं उसी चोर भाव से तो नहीं निकल रही है?
झांसा देने के लिए चोर खुद बहुत जोरशोर से चिल्लाता है. क्या न्यूज मीडिया के शोर के पीछे भी यही वजह है? सच यह है कि न्यूज मीडिया में भी महिला पत्रकारों को उतना ही यौन उत्पीड़न झेलना पड़ता है जितना अन्य किसी भी प्रोफेशन में झेलना पड़ता है. खासकर हाल के वर्षों में जैसे-जैसे न्यूज मीडिया विशेषकर चैनलों में महिला कर्मियों की संख्या बढ़ी है, यौन उत्पीड़न की घटनाएं भी बढ़ी हैं.
लेकिन ज्यादातर मामलों में न्यूज मीडिया संस्थानों के अंदर के सामंती माहौल और पुरुषवादी वर्चस्व के कारण महिला पत्रकारों/कर्मियों के लिए उसे उठाना और न्याय पाना लगभग मुश्किल है. न्यूज मीडिया संस्थानों का प्रबंधन और नेतृत्वकर्ता संपादक शिकायतों को सुनने के लिए तैयार नहीं होते और उसे दबाने और छुपाने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखते हैं.

सच यह है कि न्यूज मीडिया के अन्तःपुर में कई तेजपाल हैं और उनके बारे में प्रबंधन सहित बहुतों को जानकारी है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती है.

सच पूछिए तो तेजपाल प्रकरण इस मामले भी एक टेस्ट केस है कि कितने अखबारों और चैनलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन और हिंसा के मामलों से तुरंत और सक्षम तरीके से निपटने और पीडितों को संरक्षण और न्याय दिलाने की सांस्थानिक व्यवस्था है?
क्या न्यूज मीडिया ने इसकी कभी आडिट की? तथ्य यह है कि इस मामले में पहले सुप्रीम कोर्ट के विशाखा निर्देशों और बाद में कानून बनने के बावजूद ज्यादातर अखबारों और चैनलों में कोई स्वतंत्र, सक्रिय और प्रभावी यौन उत्पीडन जांच और कार्रवाई समिति नहीं है या सिर्फ कागजों पर है.
क्या तेजपाल प्रकरण से सबक लेते हुए न्यूज मीडिया अपने यहाँ यौन उत्पीडन के मामलों से ज्यादा तत्परता, संवेदनशीलता और सख्ती से निपटना शुरू करेगा और अपने संस्थानों में प्रभावी और विश्वसनीय व्यवस्था बनाएगा? इसपर सबकी नजर रहनी चाहिए.

('कथादेश' के जनवरी'14 अंक में प्रकाशित टिप्पणी की दूसरी और आखिरी क़िस्त)

1 टिप्पणी:

heer trv ने कहा…

सर आप ने ultimately गाँधीजी के सिद्धांत ही कह दीए है! पांच मुद्दों में!हाँ यहाँ प्रस्तुत समय और विषय के अनुसंधान में और आप के विचारों के परिपाक के तौर पर ही सही:-)
(1)साध्य शुद्धि-सिद्धांत केंद्री व्यवस्था-व्यक्ति केंद्री नहीं
(2)प्रमाण सिद्धि-अपने ही सिद्धांतों में प्रमाणित होना
(3)सिद्धांत का व्यवसायीकरण न करना
(4)पारदर्शी व्यवस्था-सिद्धांत/प्रणाली केंदी
(5)साधन शुद्धि

है न सरल?संस्था चाहे कोई भी हो!!