मंगलवार, फ़रवरी 19, 2013

वामपंथ से क्यों फिसली हिंदी पट्टी?

रैडिकल बदलाव के एजेंडे और जनसंघर्षों और स्वतंत्र दावेदारी की राजनीति को छोड़कर बुर्जुआ पार्टियों का पिछलग्गू बनने की कीमत चुका रहा है वामपंथ


हिंदी पट्टी में वामपंथ के फलने-फूलने की अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद उसकी विफलता भारतीय जनतांत्रिक राजनीति की एक ऐसी त्रासदी है जिसने उसमें निहित संभावनाओं को न सिर्फ संकुचित और सीमित कर दिया है बल्कि प्रगतिशील और रैडिकल विकल्प की उम्मीदों को भी अवरुद्ध सा कर दिया है.
यह त्रासदी इसलिए कुछ ज्यादा ही चुभती है कि हिंदी पट्टी की राजनीति में वामपंथ इस तरह से हाशिए पर पहले कभी नहीं था. तथ्य यह है कि आज़ादी के बाद हिंदी पट्टी खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के मुकाबले मुख्य विपक्ष की भूमिका में सी.पी.आई ही थी. उसका असर मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी था.
लेकिन पहले नेहरु के छद्दम समाजवाद के आकर्षण और धीरे-धीरे जनसंघर्षों से पीछे हटकर चुनावी राजनीति के दलदल में फंसते गए वामपंथ को ६० के दशक में वैचारिक-कार्यनीतिक सवालों पर मतभेद के कारण विभाजन का शिकार होना पड़ा. इस विभाजन ने सी.पी.आई को न सिर्फ सांगठनिक-राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया बल्कि उसका राजनीतिक आकर्षण भी कम होने लगा.

यही नहीं, विभाजन के बाद वह कांग्रेस के और नजदीक पहुँच गई और उत्तर भारत की राजनीति में गैर कांग्रेसवाद के सबसे जबरदस्त उभार के दौर में इमरजेंसी में वह कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आई. इसने उसकी रही-सही साख भी खत्म कर दी.

सच यह है कि सी.पी.आई उस सदमे से कभी बाहर नहीं निकल पाई. लेकिन दूसरी ओर सी.पी.आई से अलग होकर बनी सी.पी.आई-एम भी जल्दी ही उसी राह पर चल निकली. जल्दी ही सी.पी.आई-एम में भी १९६७ में भी विभाजन हो गया और चारु मजुमदार के नेतृत्व में सी.पी.आई-एम.एल ने संसदीय राजनीति के उलट सशस्त्र क्रांति का आह्वाहन किया.
इसने सी.पी.आई-एम को अंदर से हिला कर रख दिया. इस झटके से वह वास्तव में कभी नहीं उबर पाई क्योंकि उसने उसके वैचारिक आभामंडल को निस्तेज सा कर दिया. हालाँकि सी.पी.आई-एम ने सी.पी.आई की तरह इमरजेंसी में कांग्रेस के साथ खड़े होने की गलती नहीं की लेकिन वह खुलकर इमरजेंसी विरोधी आंदोलन में भी नहीं उतरी.
सच यह है कि इमरजेंसी विरोधी आंदोलन का विरोध करके और उससे दूर रहकर मुख्यधारा की इन दोनों वामपंथी पार्टियों ने खुद को हिंदी पट्टी में खड़ा होने का एक बेहतरीन मौका गँवा दिया. हालाँकि देश भर में खासकर उत्तर और पूर्व भारत में कांग्रेस विरोधी लहर का फायदा सी.पी.आई-एम को पश्चिम बंगाल में मिला.
उसने इस मौके का फायदा उठाकर खुद को बंगाल की राजनीति में पंचायत स्तर तक खड़ा करने में कामयाबी भी हासिल की लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि बंगाल में लगातार ३५ सालों तक सत्ता में रहने के बावजूद सी.पी.आई-एम कभी भी हिंदी पट्टी के राज्यों खासकर बिहार में जड़ें नहीं जमा पाई.

हालाँकि इसी दौर में सी.पी.आई का लगातार क्षरण हो रहा था और १९८९-९० में सोवियत संघ के ध्वंस ने उसके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोवियत संघ के ध्वंस का नकारात्मक असर समूचे वामपंथ पर पड़ा.
लेकिन ८० के दशक के उत्तरार्द्ध और खासकर ९० के दशक में हिंदी पट्टी में सी.पी.आई और सी.पी.आई-एम ने जिस तरह से पहले कांग्रेस से लड़ने के नामपर जनता दल जैसी मध्यमार्गी पार्टियों के एजेंडे के पीछे-पीछे चलना शुरू किया और वामपंथी की स्वतंत्र भूमिका और दावेदारी को छोड़ना शुरू किया, वैसे-वैसे उनकी कतारें भी उन मध्यमार्गी पार्टियों खासकर अस्मितावादी पार्टियों के पीछे खिसकने लगीं.
अगर यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी पट्टी में मुलायम सिंह और बिहार में लालू प्रसाद के लिए जमीन तैयार करने में दोनों वामपंथी पार्टियों ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उस दौर में कांग्रेस विरोधी रैलियों में सबसे ज्यादा लाल झंडे दिखाई देते थे लेकिन उन रैलियों का एजेंडा और राजनीति के अलावा नेता भी वी.पी.सिंह, मुलायम सिंह और लालू प्रसाद हुआ करते थे.

यही नहीं, १९८७ से लेकर ९५ तक इन दोनों राज्यों में पहले कांग्रेस को हटाने और फिर साम्प्रदायिकता को रोकने के नामपर दोनों वाम पार्टियों ने हर तरह से मुलायम सिंह और लालू प्रसाद को खड़ा करने और फिर अपनी जड़ें जमाने में मदद की.

यहाँ तक कि सी.पी.आई और सी.पी.आई-एम हिंदी पट्टी में अपने बचे-खुचे आधारों को गंवाकर भी मध्यमार्गी पार्टियों का झंडा ढोने में जुटी रहीं. असल में, मुद्दा सिर्फ मध्यमार्गी बुर्जुआ पार्टियों के पीछे चलने का ही नहीं था.
बुर्जुआ पार्टियों के साथ तालमेल और गठबंधन के लिए वामपंथी मोर्चे की पार्टियों खासकर सी.पी.आई और सी.पी.आई-एम ने समाज में रैडिकल बदलाव के एजेंडे और उसके लिए चलाए जानेवाले जनसंघर्षों को भी छोड़ दिया. यह वामपंथी मोर्चे के सरकारी वामपंथ में पतित होने का दौर था, जब सरकार और संसदीय राजनीति की क्षणिक और तुच्छ सफलताओं के लिए दोनों वामपंथी पार्टियों ने अगणित समझौते किये.
इस दौर में एक ओर सी.पी.आई जहाँ बुर्जुआ पार्टियों के साथ तालमेल में मिलनेवाली गिनती की सीटों और सरकारों में घुसने की राजनीति की ओर बढ़ चली, वहीँ सी.पी.आई-एम हिंदी पट्टी में घुसने के लिए इन बुर्जुआ पार्टियों की ओर से मिलनेवाली इक्का-दुक्का सीटों के लालच में उनके पीछे खड़ी होने लगी.

यही नहीं, ९० के इस झंझावाती दशक में जब हिंदी पट्टी एक जबरदस्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी और वामपंथ के लिए एक रैडिकल एजेंडे को आगे बढ़ाने का शानदार मौका था, उस समय उसने न सिर्फ बुर्जुआ पार्टियों और उनके संकीर्ण अस्मितावादी राजनीतिक एजंडे के आगे समर्पण कर दिया बल्कि उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत विचलनों को भी अनदेखा करने लगीं.

सच पूछिए तो यह हिंदी पट्टी की राजनीति में एक रैडिकल हस्तक्षेप करने और उसे वाम दिशा देने का दूसरा शानदार मौका था जिसे सरकारी वामपंथ ने अपनी अवसरवादी राजनीति के कारण गँवा दिया.
इस दौर में हालत यह हो गई थी कि सी.पी.आई-एम के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत बुर्जुआ राजनीति के ‘चाणक्य’ माने जाने लगे थे जिनकी सबसे बड़ी ‘खूबी’ बुर्जुआ पार्टियों और उनके नेताओं के बीच मध्यस्थता कराना, जोड़तोड़ करना और बेमेल गठबंधनों को चलाना था. ऊपर से आ रहे इन संकेतों की तार्किक परिणति यह हुई कि सी.पी.आई और सी.पी.आई-एम की हिंदी पट्टी की राज्य इकाइयों में भी सुरजीत की अनुकृतियाँ उभर आईं.
अफ़सोस की बात यह है कि उस दौर में बहुतेरे वाम बुद्धिजीवी न सिर्फ सुरजीत और सरकारी वामपंथ की कथित सफलताओं की बलैयां ले रहे थे बल्कि हिंदी पट्टी में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे ‘सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता’ के नए बुर्जुआ चैम्पियनों के गुणगान में जुटे हुए थे.

हालाँकि यह सबको पता था कि ‘सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता’ की इस राजनीति का न कोई व्यापक रैडिकल एजेंडा था और न ही उसके प्रति कोई गहरी प्रतिबद्धता थी. वह न सिर्फ संकीर्ण जातिवादी एजेंडे और वोटों के सिनिकल जोड़तोड़ और गुणा-भाग पर टिकी थी बल्कि भ्रष्ट, अपराधी और अवसरवादी तत्वों का गठजोड़ भी थी. लेकिन जनता के उनसे जल्दी ही हुए मोहभंग के बावजूद सरकारी वामपंथ उनके पीछे खड़ा रहा.

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी वामपंथ की बुर्जुआ पार्टियों की इस पिछलग्गू और सिनिकल-अवसरवादी राजनीति ने हिंदी पट्टी में एक ओर संकीर्ण अस्मितावादी राजनीति करनेवाली सपा-बसपा-राजद-जे.डी-यू जैसी बुर्जुआ पार्टियों को और दूसरी ओर, भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टियों को जड़ें जमाने का मौका दिया.
कांग्रेस ने हिंदी पट्टी में जो जगह खाली की, उसे भरने की स्वाभाविक दावेदार होते हुए भी वामपंथी ताकतें हिंदी पट्टी में फिर पिछड गईं. लेकिन अफसोस की बात यह है कि सरकारी वामपंथ ने इससे कोई सबक नहीं सीखा. गलतियाँ और ऐतिहासिक भूलें दोहराने का यह सिलसिला जारी रहा.
२००४ में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यू.पी.ए सरकार को बाहर से समर्थन देकर और यू.पी.ए के साथ को-आर्डिनेशन कमिटी में बैठकर सरकारी वामपंथ ने जिस तरह से उसे चलाया, उसने न सिर्फ कांग्रेस को नया जीवन दिया बल्कि वामपंथ को हिंदी पट्टी के साथ-साथ अपने आधार राज्यों से भी बेदखल कर दिया.
हद तो यह हो गई कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों का विरोध करनेवाली सी.पी.आई-एम ने पश्चिम बंगाल के औद्योगीकरण के नामपर उन्हीं सुधारों को जिस निर्ममता से लागू करना शुरू किया, उसके कारण सिंगुर-नंदीग्राम में किसानों पर गोलियाँ चलाने में भी उस हिचक नहीं हुई. उसे जल्दी ही इसकी बड़ी राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी और बंगाल में ३५ वर्षों के राज का अंत हो गया.
लेकिन इसका सीधा असर हिंदी पट्टी पर भी पड़ा. सरकारी वामपंथ की बची-खुची आभा और नैतिक तेज भी जाता रहा. इसके अलावा उसने नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के खिलाफ बोलने का नैतिक अधिकार भी खो दिया.

लेकिन हैरानी की बात नहीं है कि सरकारी वामपंथ इससे भी सबक सीखने को तैयार नहीं है. खासकर सी.पी.आई-एम अब भी कांग्रेस के साथ खुले या परोक्ष जोड़तोड़ का मौका खोज रही है ताकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल को अलग-थलग करके पुनर्वापसी का रास्ता आसान हो सके. यही कारण है कि पार्टी के अंदर तीखे विरोध के बावजूद सी.पी.आई-एम ने राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को समर्थन दिया.

सरकारी वामपंथ के इस रवैये के सिलसिले में सी.पी.आई-एम.एल के महासचिव विनोद मिश्र एक बड़े पते की बात कहा करते थे. उनका कहना था कि एक ओर सी.पी.आई-एम है जो अपनी राज्य सरकारों को बचाने के लिए अपने मुद्दे भी कुर्बान करने से परहेज नहीं करती है और दूसरी ओर संघ परिवार और भाजपा है जिसने अपने मुद्दे (रामजन्मभूमि) के लिए अपनी पांच राज्य सरकारें भी कुर्बान कर दीं.
इसे वामपंथ और भाजपा की तुलना और भाजपा को बेहतर बताने की कोशिश के बजाय इस रूप में देखने की जरूरत है कि आप अपनी राजनीति, विचार और एजेंडे को लेकर कितने प्रतिबद्ध और दृढ हैं.
आखिर क्या कारण है कि भाजपा ने हिंदी पट्टी की राजनीति में जड़ें जमाने में कामयाबी हासिल की और वामपंथ उखड गया? क्या इसके लिए सरकारी वामपंथ की वामपंथी-रैडिकल एजेंडे को छोड़कर बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों के पीछे-पीछे चलने की पिछलग्गू राजनीति जिम्मेदार नहीं है? यहाँ यह सवाल पूछा जा सकता है कि इसी दौर में हिंदी पट्टी में धूमकेतु की तरह उभरी सी.पी.आई-एम.एल (लिबरेशन) या माले की चमक क्यों मंद पड़ गई?

इसमें कोई शक नहीं है कि ८० के दशक के उत्तरार्द्ध और ९० के दशक के मध्य तक हिंदी पट्टी खासकर बिहार के खेत-खलिहानों और उत्तर प्रदेश के परिसरों में रैडिकल वामपंथ की स्वतंत्र पताका लेकर खड़ी हुई माले इस अग्रगति को कायम नहीं रख पाई लेकिन आज भी वह हिंदी पट्टी में वामपंथ की सबसे मुखर आवाज़ है. सबसे ज्यादा उम्मीद भी उससे ही है.

लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे न सिर्फ सरकारी वामपंथ की भूलों की कीमत चुकानी पड़ रही है बल्कि वह अस्मितावादी राजनीति के सकारात्मक निषेध पर खड़ी रैडिकल बदलाव की राजनीति का लोकप्रिय मुहावरा खोज पाने में कामयाब नहीं हो रही है.
यही नहीं, वह वाम राजनीति में संयुक्त मोर्चे के वैकल्पिक माडल को भी खड़ा कर पाने में सफल नहीं हुई है जिसके कारण वह काफी हदतक अलग-थलग पड़ी रहती है. लेकिन सरकारी वामपंथ की नाकामियों को देखते हुए यह भी सच है कि हिंदी पट्टी में वामपंथ की सफलता का कोई शार्टकट नहीं है. वह रैडिकल बदलाव की राजनीति के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता और जनसंघर्षों से ही आएगी.            
(लखनऊ से प्रकाशित 'समकालीन सरोकार' के फ़रवरी' १३ के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)

1 टिप्पणी:

अमित भारतीय ने कहा…

बामपंथ के पतन की समझ देने वाला अच्छा लेख