बुधवार, सितंबर 26, 2012

क्या मौजूदा कड़े फैसलों और आर्थिक सुधारों का कोई विकल्प नहीं है?

आम आदमी के लिए कड़ी और कार्पोरेट्स के लिए मुलायम है यू.पी.ए सरकार 

यू.पी.ए सरकार हालिया कड़े आर्थिक फैसलों और आर्थिक सुधारों खासकर खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) के फायदों को गिनवाने में जुटी हुई है. लेकिन उसके आर्थिक मैनेजर इन फैसलों के पीछे सरकार की मजबूरियों भी बताना नहीं भूल रहे हैं.

यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री ने भी ‘राष्ट्र के नाम सन्देश’ में उन मजबूरियों और चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि अगर सरकार ये कड़े फैसले नहीं करती तो अर्थव्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती थी और देश संकट में फंस सकता था. उन्होंने बढ़ती डीजल सब्सिडी के कारण बढ़ते राजकोषीय घाटे और अर्थव्यवस्था में देशी-विदेशी निवेशकों के कमजोर पड़ते विश्वास का खास तौर से जिक्र किया है.

दूसरी ओर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने भी स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है कि अगर यू.पी.ए सरकार ये कड़े फैसले नहीं करती और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की पहल नहीं करती तो अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की क्रेडिट रेटिंग और गिरा देतीं, जिससे देश से विदेशी पूंजी का पलायन शुरू हो जाता, नया निवेश नहीं आता और इससे रूपये की कीमत और गिर जाती और देश एक बार से १९९१ वाले आर्थिक संकट में फंस सकता था. इन दोनों बयानों से साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार ने ये फैसले मजबूरी और दबाव में भी लिए हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि ये तर्क नव उदारवादी अर्थनीति के शास्त्रीय तर्क है. वह और उसके पैरोकार संकट को हमेशा एक अवसर की तरह देखते हैं. इस मायने में उसका सबसे बड़ा तर्क आर्थिक संकट स्वयं है.

इसलिए नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थक नीति निर्माता और सरकारें जानबूझकर संकट पैदा करती हैं और उसे इस स्थिति तक बिगड़ने देती हैं कि आमलोगों के पास उसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प न बचे. इसके लिए आर्थिक संकट के कारणों को न सिर्फ जानबूझकर छुपाया जाता है बल्कि बड़ी चतुराई से संकट के लिए आमलोगों को ही जिम्मेदार भी ठहरा दिया जाता है.
उदाहरण के लिए ताजा मामले को ही लीजिए. इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है. जी.डी.पी वृद्धि दर लगातार गिर रही है. चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून’१२) में जी.डी.पी की वृद्धि दर मात्र ५.५ प्रतिशत दर्ज की गई है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि बीते चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में औद्योगिक वृद्धि दर मात्र ०.१ फीसदी रही है.

इसका अर्थ यह है कि औद्योगिक क्षेत्र एक तरह से मंदी की चपेट में है. यही हाल अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों का भी है. निर्यात में गिरावट जारी है. महंगाई काबू में नहीं आ रही है. अर्थव्यवस्था के संकट का असर रोजगार पर भी दिखने लगा है. रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं और मौजूदा नौकरियों पर भी छंटनी की तलवार चलने लगी है.

स्थिति सचमुच गंभीर है. लेकिन सवाल यह है कि यह स्थिति क्यों आई और यहाँ तक कैसे पहुंची? क्या इसके लिए वही नव उदारवादी आर्थिक नीतियां और आर्थिक सुधार जिम्मेदार नहीं हैं जिन्हें पिछले दो दशकों से देश की सभी सरकारें पूरे उत्साह और आस्था से लागू करती रही हैं?

क्या यह सच नहीं है कि मौजूदा आर्थिक संकट की जड़ें वैश्विक आर्थिक संकट खासकर अमेरिका और यूरोप के आर्थिक-वित्तीय संकट से जुडी हुई हैं जहाँ इन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का बोलबाला है?
दूसरे, यह आर्थिक संकट आज अचानक नहीं आया है. इसके संकेत सबसे पहले अमेरिकी आर्थिक संकट की शुरुआत में २००७-०८ में ही दिखने लगे थे और जो किसी न किसी रूप में अर्थव्यवस्था में लगातार दिख रहा था. खासकर मौजूदा संकट के अनेकों संकेत पिछले कई महीनों से दिख रहे थे

लेकिन फिर भी यू.पी.ए सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और स्थिति को बिगड़ने दिया गया. यह सच है अमेरिकी आर्थिक मंदी से पैदा हुए घरेलू आर्थिक संकट से निपटने के लिए यू.पी.ए सरकार ने २००८ में बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट क्षेत्र को कुल दो लाख करोड़ रूपये से अधिक का बचाव पैकेज दिया था जिससे भारत को कुछ हद तक उस संकट से उबरने में मदद मिली थी.

कहने की जरूरत नहीं है कि उस समय जब देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट क्षेत्र को बचाव पैकेज दिया गया तो उसके कारण राजकोषीय घाटे में हुई बढ़ोत्तरी की चिंता किसी को नहीं हुई. लेकिन आज उसी बढ़े हुए राजकोषीय घाटे का बोझ यह कहते हुए आमलोगों पर डाला जा रहा है कि इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

प्रधानमंत्री ने भी ‘राष्ट्र के नाम सन्देश’ में कहा कि अगर सब्सिडी कम नहीं की गई तो शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए पैसा ही नहीं बचेगा क्योंकि ‘पैसा पेड़ पर नहीं लगता है.’ लेकिन सवाल यह है कि एक ऐसे समय में जब महंगाई खुद सरकारी आंकड़ों में दोहरे अंकों में है और आम आदमी पिछले तीन साल से अधिक समय से ऊँची महंगाई की मार से त्रस्त है, उस समय क्या सरकार के पास सब्सिडी कटौती और उसका बोझ लोगों पर डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं था?
सच यह है कि सरकार के विकल्प थे लेकिन सरकार ने उन विकल्पों को आजमाने की कोशिश नहीं की क्योंकि वह बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट क्षेत्र को नाराज करने का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं थी.

उदाहरण के लिए, केन्द्र सरकार हर साल देशी-विदेशी बड़ी पूंजी, कारपोरेट क्षेत्र, अमीरों, उच्च मध्यवर्ग आदि को कारपोरेट टैक्स, आयकर और सीमा शुल्क-उत्पाद कर आदि में पांच लाख करोड़ रूपये से अधिक की छूट और रियायतें देती है. खुद वित्त मंत्रालय के मुताबिक, वर्ष २०११-१२ में यू.पी.ए सरकार ने अमीरों और कार्पोरेट्स को कोई ५.११ लाख करोड़ रूपये की छूट और रियायतें दीं. हालाँकि सरकार इसे सब्सिडी नहीं कहती है लेकिन यह भी सब्सिडी ही है.

इसके बावजूद सरकार ने इस सब्सिडी में कटौती की कोई कोशिश नहीं की और यह साल दर साल बढ़ता जा रहा है. लेकिन इसे कभी भी बढ़ते राजकोषीय घाटे की वजह नहीं बताया जाता है. तथ्य यह है कि अमीरों और कार्पोरेट्स पर इस अतिरिक्त दयानतदारी के कारण भारत में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों की तुलना में काफी कम है.

भारत में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात १०.६ फीसदी है जोकि दुनिया के विकसित देशों के समूह ओसेड के औसत से आधे से भी कम है. खुद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने स्वीकार किया है कि इस मामले में भारत दुनिया के उन चंद चुनिन्दा देशों में है जहाँ टैक्स-जी.डी.पी इतना कम है. इसके पीछे की वजह भी किसी से छुपी नहीं है.
खुद वित्त मंत्री के मुताबिक, भारत में कारपोरेट टैक्स की दरें ३० फीसदी है लेकिन छूट/रियायतों के कारण प्रभावी कारपोरेट टैक्स की दर मात्र २४ फीसदी है और उसमें भी सैकड़ों कम्पनियाँ ऐसी हैं जो १० से २२ फीसदी की दर से ही टैक्स देती हैं.

मजे की बात यह है कि भारत में कारपोरेट टैक्स और आयकर की मौजूदा दरें दुनिया के कई विकसित पूंजीवादी देशों की तुलना में काफी कम हैं जहाँ इन टैक्सों की दरें ३५ से ४५ फीसदी तक हैं. साफ़ है कि मौजूदा ढांचे में ही सरकार की आय में बढ़ोत्तरी की भारी गुंजाइश है.

निश्चय ही, इस मामले में कड़े फैसले लेने की जरूरत है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वह केवल आम आदमी पर बोझ डालनेवाले कड़े फैसले करेगी और अमीरों/कार्पोरेट्स के प्रति मुलायम बनी रहेगी?

क्या यू.पी.ए सरकार में वह राजनीतिक इच्छाशक्ति है कि वह राजकोषीय घाटे को कम करने और शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और ढांचागत क्षेत्रों के विकास और विस्तार के लिए अधिक धन खर्च करने के लिए कुछ बोझ कार्पोरेट्स और अमीरों पर भी डालेगी?

अगर वह सिर्फ टैक्स-जी.डी.पी अनुपात को मौजूदा १०.६ फीसदी से २००७-०८ के १२ फीसदी तक ले जाए और अमीरों/कार्पोरेट्स को मिलनेवाली छूट/रियायतों में २५ फीसदी की कटौती कर सके तो सरकार को कुल चार लाख करोड़ रूपये से अधिक की आय हो सकती है जिससे राजकोषीय घाटे को कम करने के साथ आम आदमी के कल्याण में भी खर्च किया जा सकता है. इसके साथ ही अगर सरकार भ्रष्टाचार और काले धन की अर्थव्यवस्था पर ऐसी ही सख्ती दिखाए तो टैक्स-जी.डी.पी अनुपात १५ फीसदी तक पहुँच सकता है जिससे न्यूनतम तीन लाख करोड़ रूपये और आ सकते हैं. 
यही नहीं, इससे विदेशी पूंजी पर भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता कम होगी जो मौजूदा समय में उसके भयादोहन की एक सबसे बड़ी वजह बना हुआ है. विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए सरकार को अत्यंत संवेदनशील खुदरा व्यापार का क्षेत्र विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर गार को ठन्डे बस्ते में डालने और वोडाफोन जैसी कंपनियों की टैक्स बचा ले जाने को अनदेखा करने जैसे फैसले करने पद रहे हैं.

लेकिन असल सवाल यह है कि क्या यू.पी.ए सरकार ये कड़े फैसले करने के लिए तैयार है?

(दैनिक 'राष्ट्रीय सहारा' के सम्पादकीय पृष्ठ पर 26 सितम्बर को प्रकाशित लेख)

1 टिप्पणी:

kumar rakesh ने कहा…

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