मंगलवार, नवंबर 08, 2011

महंगाई का राजनीतिक अर्थशास्त्र


अर्थनीति, राजनीति के नियंत्रण से मुक्त हो चुकी है और सरकार ने बाजार के आगे घुटने टेक दिए हैं





अर्थव्यवस्था जब राजनीति की पकड़ से निकल जाती है तो आम लोगों की जरूरतें कुछ होती हैं और अर्थव्यवस्था ठीक उसकी उलटी राह लेती है. ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार के राज में भी अर्थव्यवस्था, राजनीति की पकड़ से बाहर निकल चुकी है.

इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई पिछले दो-ढाई वर्षों से लगातार नए रिकार्ड बना रही है लेकिन यू.पी.ए सरकार का उसपर कोई काबू नहीं रह गया है. सच पूछिए तो सरकार ने न सिर्फ महंगाई पर अंकुश लगाने के मुद्दे पर एक तरह से हाथ खड़े कर दिए हैं बल्कि महंगाई की सुरसा के आगे घुटने टेक दिए हैं.

यही नहीं, अर्थव्यवस्था पर यू.पी.ए सरकार की राजनीतिक पकड़ किस हद तक कमजोर पड़ चुकी है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जिस दिन यह खबर आई कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई नौ महीने के नए रिकार्ड १२.२१ फीसदी पर पहुँच चुकी है, सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमतों में प्रति लीटर १.८२ रूपये की बढोत्तरी की घोषणा कर दी.

खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया कि इस फैसले से महंगाई और बढ़ेगी लेकिन उन्होंने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए कि पेट्रोल की कीमतें नियंत्रणमुक्त हो चुकी हैं और कीमतें बढ़ाने का फैसला तेल कंपनियों का है, उसमें वह कुछ नहीं कर सकते हैं.

हालांकि इस फैसले का आर्थिक तर्क संदेहास्पद है लेकिन एक मिनट के लिए तेल की कीमतों में बढोत्तरी के आर्थिक तर्क को मान भी लिया जाए तो इसका राजनीतिक तर्क समझ से बाहर है. एक ऐसे समय में जब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी यू.पी.ए सरकार साख के संकट का सामना कर रही है और आसमान छूती महंगाई के कारण आम लोगों के बीच अलोकप्रिय होती जा रही है, उस समय आग में घी डालने की तरह तेल की कीमतों में फिर बढोत्तरी के फैसले के दो ही अर्थ हो सकते हैं.

पहला यह कि यू.पी.ए सरकार अर्थव्यवस्था खासकर तेल कंपनियों की आर्थिक सेहत के हित में राजनीतिक जोखिम उठाने के लिए तैयार है और उसे इसके राजनीतिक नतीजों की बहुत परवाह नहीं है. दूसरे, अर्थव्यवस्था वास्तव में राजनीति की पकड़ से मुक्त हो चुकी है और वह आम लोगों की समस्याओं और जरूरतों से ज्यादा मुनाफे के खालिस आर्थिक तर्क से संचालित हो रही है. ऊपर से अलग दिखनेवाली इन दोनों ही बातों में वास्तव में कोई फर्क नहीं है. वे एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं. इसके आर्थिक-राजनीतिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं.

लेकिन यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. दरअसल, यह नव उदारवादी राजनीतिक-आर्थिक सैद्धांतिकी है जिसकी बुनियाद इस तर्क और समझ पर टिकी है कि राज्य यानी राजनीति को अर्थव्यवस्था से दूर रहना चाहिए. इस आधार पर अर्थव्यवस्था को राजनीतिक दबावों और हस्तक्षेप से मुक्त रखने और बाजार की शक्तियों के हवाले छोड़ने की वकालत की जाती रही है. वैसे तो इस सैद्धांतिकी की वैचारिक जड़ें मुक्त बाजार की क्लासिकल पूंजीवादी सैद्धांतिकी में धंसी हुई हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थैचर के नेतृत्व में इसका नया पुनर्जन्म हुआ.

लेकिन इसका पालन-पोषण विश्व बैंक-मुद्रा कोष की अगुवाई में हुआ और ८० और खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद ९० के दशक में ‘इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है’ (टीना फैक्टर) का हवाला देते हुए भारत जैसे तमाम विकासशील देशों पर थोप दिया गया. मजे की बात यह है कि भारतीय शासक वर्ग ने न सिर्फ इसे आगे बढ़कर स्वीकार किया बल्कि उसे जोर-शोर से लागू करने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखी. इसके तहत अर्थव्यवस्था यानी बाजार को राजनीति के नियंत्रण से मुक्त करने की शुरुआत एक गैर राजनीतिक व्यक्ति मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाने से हुई.

उसके बाद का इतिहास सबको पता है. इन दो दशकों में बाजार न सिर्फ राजनीति के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त होता चला गया बल्कि राजनीति की कमान भी बाजार के हाथों में पहुँच गई है. इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि इन दो दशकों में कांग्रेस, भाजपा और उनके गठबंधनों के अलावा तीसरे मोर्चे की सरकारें आईं लेकिन सरकार चाहे जिस रंग और झंडे की रही हो लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों में कोई फर्क नहीं आया.

सभी पूरी निष्ठा से नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाने में लगे रहे. राजनीति, अर्थनीति की पिछलग्गू बनके रह गई. नतीजा, अर्थनीति के स्वतंत्र होते ही राजनीति सिर्फ राजनीति के लिए होने लगी जिसमें शोर तो बहुत है लेकिन कोई सत्व नहीं है.

इसी दौर में यह भी हुआ है कि अर्थनीति, बजट और आर्थिक फैसलों में राजनीति के बजाय बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और उसके कारपोरेट प्रतिनिधियों का दखल बढ़ता चला गया है. इसे प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में बड़े उद्योगपतियों और टेक्नोक्रेट अर्थशास्त्रियों को शामिल करके संस्थागत रूप भी दे दिया गया है.

आर्थिक नीतियों और फैसलों में बड़ी पूंजी के लाबीइंग संगठनों- सी.आई.आई, एसोचैम और फिक्की और बड़े कारपोरेट समूहों का हस्तक्षेप किसी से छुपा नहीं है. यही नहीं, बड़े कारपोरेट समूह विभिन्न आर्थिक मंत्रालयों में अपनी पसंद के मंत्री और अफसर तक नियुक्त कराने में कामयाब होने लगे.

यही नहीं, अर्थनीति के राजनीति के नियंत्रण से मुक्त होने का एक और सुबूत यह है कि सरकार के गोदामों में रिकार्ड ६५० लाख टन से अधिक अनाज होने और उसके सड़ने और बर्बाद होने से खीजे सुप्रीम कोर्ट के उसे मुफ्त बाँटने के निर्देश के बावजूद यू.पी.ए सरकार टस से मस नहीं हुई. जाहिर है कि उसे वित्तीय घाटे की चिंता ज्यादा है.

कारण यह कि नव उदारवादी अर्थनीति में वित्तीय घाटे पर अंकुश को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है. वित्तीय घाटे पर अंकुश रखने के पीछे असली मकसद राजनीति को अंकुश में रखना है क्योंकि अगर आम लोगों को महंगाई से राहत देना है या उनकी दूसरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना है तो निश्चित ही, वित्तीय घाटा बढ़ेगा. या फिर सरकार को अपनी आय बढ़ानी पड़ेगी जिसके लिए अमीरों और कारपोरेट पर टैक्स बढ़ाना पड़ेगा.

लेकिन नव उदारवादी अर्थनीति अमीरों और कार्पोरेट्स पर टैक्स बढ़ाने का सबसे ज्यादा विरोध करती है क्योंकि वह इसे बाजार विरोधी मानती है. इस तरह, वित्तीय घाटे को काबू में करने के नाम पर इसका सारा जोर सरकारी खर्चों में कटौती और तमाम उत्पादों और सेवाओं के बाजार मूल्य के भुगतान पर होता है. इस तर्क के आधार ही यू.पी.ए सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने की वकालत करती रही है.

यही नहीं, इस बाजार में उसकी इतनी गहरी आस्था है कि पिछले दो साल से रिकार्ड बनाती महंगाई के बावजूद वह इसमें किसी भी हस्तक्षेप के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसका मानना है कि यह महंगाई मांग और आपूर्ति के असंतुलन से पैदा हुई है और उसे बाजार का ‘अदृश्य हाथ’ ही ठीक करेगा.

यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री का भी यह मानना है कि यह महंगाई लोगों की आय बढ़ने और उसके कारण खाद्य वस्तुओं की मांग में बढोत्तरी के कारण है. साफ है कि प्रधानमंत्री इस महंगाई को भी अपनी अर्थनीति की सफलता के रूप में देख रहे हैं. नतीजा यह कि वह भी महंगाई पर अंकुश के लिए किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के बजाय बाजार के ‘अदृश्य हाथ’ पर भरोसा करके बैठे हैं.

इसी भरोसे के कारण वह हर कुछ महीने पर अगले कुछ महीनों में मुद्रास्फीति में कमी आने का दावा करते हैं. लेकिन वह भूल रहे हैं कि बाजार का ‘अदृश्य हाथ’ कीमतों को बढ़ाने के जरिये ही मांग और आपूर्ति के अंतर की भरपाई और इस तरह करोड़ों गरीबों को बाजार से बाहर कर रहा है.

यह है महंगाई का असली राजनीतिक अर्थशास्त्र.

(दैनिक 'नया इंडिया' और 'जनसंदेश टाइम्स' में क्रमश: ७ और ८ नवम्बर को प्रकाशित लेख)

2 टिप्‍पणियां:

Swarajya karun ने कहा…

विचारणीय आलेख. वाकई भयानक हालात हैं . बाबा तुलसी बहुत पहले लिख गए हैं-
जासू राज प्रिय ,प्रजा दुखारी ,
सो नृप अवसी नरक अधिकारी .

चन्दन..... ने कहा…

अब सरकार चल रही है कि व्यापर चल रहा है पता हि नही चलता... सरकर इन सभी चीजों पर नियंत्रण के लिए हि हम से कर लेती है साबुन से लेकर सीमेंट पर भी और इनके वेतन भी इसी मद से इन्ही कामों के लिए दिए जाते हैं... अब जब सब चीजें नियंत्रण से मुक्त किये जा रहे हैं तो जनता के पैसे को क्यूँ नही नियंत्रण से मुक्त किया जा रहा है|

बहुत बढ़िया और समायिक आलेख!

धन्यवाद!