गुरुवार, अगस्त 25, 2011

कर्ज लेकर घी पी रहा है अमेरिका

अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बढ़ते संकट में आवारा पूंजी की भूमिका  



 
अमेरिकी अर्थव्यवस्था दो साल के भीतर एक बार फिर गहरे संकट में फंसती हुई दिख रही है. अधिकांश विशेषज्ञों को आशंका है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोबारा मंदी की चपेट में आ सकती है. आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार मंद पड़ रही है, घरेलू मांग सुस्त बनी हुई है, उपभोग में गिरावट दर्ज की गई है, बेरोजगारी दर अभी भी बहुत ऊँची है और वित्तीय बाजारों में घबराहट का माहौल है.

ऐसे में, एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा की तर्ज पर वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी- स्टैण्डर्ड एंड पुअर ने अमेरिकी सरकार की साख को झटका देते हुए उसके ऋणपत्रों की रेटिंग को अपनी सर्वोच्च रेटिंग – ए.ए.ए से एक दर्जा नीचे घटाते हुए ए.ए प्लस करने का एलान करके इस घबराहट को और बढ़ा दिया है.

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति सहित अर्थव्यवस्था के मैनेजर इस फैसले से सहमत नहीं है और बाजार को आश्वस्त करने में जुटे हुए हैं. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है. उसकी लडखडाहट साफ दिख रही है. अर्थव्यवस्था से आ रहे विभिन्न आर्थिक और वित्तीय संकेतों से इसकी पुष्टि होती है.

बीते पखवाड़े अमेरिकी सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी) से संबंधित पिछले कुछ वर्षों के संशोधित आंकड़े जारी किये जिनसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. इनसे यह पता चला कि दो साल पहले आई मंदी पूर्व के अनुमानों से कहीं ज्यादा गहरी और गंभीर थी और उसके बाद दिखी आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार अनुमानों से कहीं धीमी थी.

इससे मंदी की दोबारा वापसी की आशंकाओं ने जोर पकड़ा है. स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दूसरी तिमाही में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मात्र १.३ फीसदी रही है जबकि पहली तिमाही में यह सिर्फ ०.३ फीसदी थी. इसी तरह मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले छह महीने में मात्र ०.८ फीसदी रह गई है.

इसके अलावा जून में उपभोक्ता व्यय नकारात्मक हो गया और जुलाई में भी उसमें गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि जुलाई महीने में रोजगार में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है लेकिन बेरोजगारी दर अभी भी ९.१ प्रतिशत की असहनीय ऊँचाई पर बनी हुई है. आर्थिक वृद्धि की इतनी धीमी रफ़्तार को आमतौर पर मंदी के आगमन का संकेत माना जाता है.

साफ है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी पिछली मंदी के प्रभावों से उबर नहीं पाई है. दूसरी ओर, अमेरिकी सरकार पर तेजी से बढ़ते घरेलू और विदेशी कर्जों के कारण वैश्विक वित्तीय पूंजी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और टिकाउपन को लेकर भी आशंकित है.

उल्लेखनीय है कि अमेरिकी सरकार पर कुल १४.५ खरब डालर का कर्ज है और जिस तरह से यह कर्ज बढ़ रहा है, उसके कारण आवारा पूंजी के प्रवक्ता और कई विशेषज्ञ यह कहने लगे हैं कि अमेरिका कर्ज लेकर घी पीने यानी अपने साधनों से बाहर जाकर खर्च करने के चरम पर पहुँच चुका है और यह स्थिति अब बहुत दिनों तक नहीं चल सकती है. आवारा पूंजी की हितरक्षक स्टैण्डर्ड और पुअर ने भी अमेरिकी साखपत्रों की रेटिंग को कम करते हुए यही कारण बताया है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ खतरे की सीमा को पार कर रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, बीते दिसंबर से इस जुलाई तक अमेरिकी सरकार पर हर दिन औसतन लगभग ५.४८ अरब डालर का कर्ज चढ़ता जा रहा है. हालत यह हो गई है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार सरकारी कर्ज कुल जी.डी.पी के लगभग १०० फीसदी तक पहुँच गया है.

इस तरह अमेरिका उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जहाँ सरकारी कर्ज उनके जी.डी.पी के बराबर या उससे अधिक हो गया है. यही नहीं, अगर सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सभी कर्जों को जोड़ दिया जाए तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कोई ५०.२ खरब डालर का कर्ज है जोकि उसके जी.डी.पी का लगभग साढ़े तीन गुना है.

निश्चय ही, यह स्थिति चिंताजनक है. इससे न सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की स्थिति पैदा हो गई है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी अनिश्चितता और अस्थिरता के बदल मंडराने लगे हैं. यह स्वाभाविक भी है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था अकेले आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की लगभग एक चौथाई है और उसके इंजन की तरह काम करती है.

ऐसे में, अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकट में फंसने का मतलब यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी झटके खाने लगेगी. अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर यह चिंता इसलिए और भी बढ़ गई है क्योंकि अधिकांश यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं पिछली वैश्विक मंदी की मार और वित्तीय/कर्ज संकट से अब तक नहीं उबर पाईं हैं.

जाहिर है कि इस कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में चिंता और घबराहट का माहौल है. लेकिन दूसरों को उपदेश देने में सबसे आगे रहनेवाला अमेरिका खुद अपने अंदर झांकने और अपनी आर्थिक रणनीति पर किसी पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं दिख रहा है.

यह वही अमेरिका है जिसकी अगुवाई में ७० और ८० के दशक में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने आर्थिक संकट में फंसे विकासशील देशों को कर्ज देने के लिए कड़ी शर्तें तय की थीं जिन्हें वाशिंगटन सहमति के नाम से जाना जाता है. उस दौर में वैश्विक आवारा पूंजी के प्रतिनिधि के बतौर मुद्रा कोष-विश्व बैंक ने भारत समेत अधिकांश विकासशील देशों पर कर्जों के लिए जिस तरह की शर्तें थोपीं और उसकी कीमत वसूली, उसे आसानी से भुलाना मुश्किल है.

अब वही वैश्विक आवारा पूंजी अमेरिका से भी कीमत वसूलने और इसके लिए उसे भी शर्तों में बांधने की कोशिश कर रही है. स्टैण्डर्ड और पुअर ने उसकी क्रेडिट रेटिंग में कटौती करके दबाव बनाने की कोशिश की है. दूसरी ओर, घरेलू राजनीति में रिपब्लिकन यही काम थोड़े अलग तरीके से कर रहे हैं. दोनों अमेरिकी वित्तीय घाटे में कटौती और इसके लिए सरकारी खर्चों में भारी कटौती के लिए अभियान चला रहे हैं.

मजे की बात यह है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और कमोबेश दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां और उनके राजनेता भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाहट के लिए चादर से बाहर पैर पसारने को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

लेकिन वे यह नहीं बता रहे हैं कि चादर से बाहर पैर किसने और किसके लिए फैलाया? सिर्फ बढ़ते सरकारी घाटे और कर्ज का शोर है. पिछले दिनों अमेरिकी कांग्रेस में राष्ट्रपति और रिपब्लिकन सांसदों के बीच कर्जों की सीमा बढ़ाने को लेकर छिडे राजनीतिक महाभारत में भी तथ्य कम और शोर ज्यादा था. रणनीति यह थी कि घाटे और बढ़ते कर्ज को लेकर अमेरिकी जनता में डर और घबराहट का ऐसा माहौल बनाया जाए ताकि कर्ज और घाटे की सीमा तय करने के साथ-साथ खर्चों में कटौती के लिए लोगों को तैयार किया जाए.

खासकर रिपब्लिकन पार्टी के अंदर एक मजबूत ताकत के रूप में उभरी कट्टर नव उदारवादी टी पार्टी समूह ने कर्ज का बोझ घटाने के लिए कर्ज की सीमा को बांधने और इसके लिए सरकारी खर्चों में भारी कटौती के पक्ष में पिछले कई महीनों से जबरदस्त अभियान छेड रखा था.

दिलचस्प तथ्य यह है कि कटौती की सीमा और तरीकों पर कुछ दिखावटी असहमतियों को छोड़ दिया जाए तो इस मुद्दे पर डेमोक्रटिक पार्टी और राष्ट्रपति ओबामा भी सैद्धांतिक तौर पर रिपब्लिकनों के साथ खड़े हैं. इसी सहमति का नतीजा है अमेरिकी संसद में हुआ कर्ज समझौता जिसमें यह तय किया गया है कि अगले दस वर्षों में वित्तीय घाटे में २.१ खरब डालर की कटौती की जायेगी.

इसके तहत यह भी तय हुआ है कि कर्ज की सीमा में एक खरब डालर की बढोत्तरी के बदले में अगले दस वर्षों में सरकारी खर्चों में ९१७ अरब डालर की कटौती की जायेगी. असली खेल यहीं हो रहा है. इस कटौती की गाज इन्फ्रास्ट्रक्चर, गृह निर्माण, सामुदायिक सेवाओं, शिक्षा के अलावा लोगों की सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी हकदारियों पर गिरेगी.

मतलब यह कि चादर से बाहर पैर पसारने की कीमत आम अमेरिकी जनता को चुकानी पड़ेगी. लेकिन इस कटौती का अमेरिकी रक्षा और आंतरिक सुरक्षा बजट के अलावा पूरी दुनिया में आतंकवाद से युद्ध के नाम लड़े जा रहे युद्धों पर हो रहे बेतहाशा खर्च पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. वर्ष २०१० में अमेरिका का कुल रक्षा बजट ६८० अरब डालर था.

इसके अलावा इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के लिए अलग से ३७ अरब डालर का प्रावधान है. यही नहीं, अनुमानों के मुताबिक, आतंकवाद से युद्ध के नामपर पिछले दस वर्षों में अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमेरिका का युद्ध बजट ३.७ खरब डालर तक पहुँच गया है और आशंका है कि अंतिम आकलन में यह ४.४ खरब डालर तक जा सकता है.

लेकिन इसमें कोई कटौती नहीं होगी क्योंकि रक्षा बजट और युद्धों में अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ के निहित स्वार्थ जुड़े हुए हैं. यह भी किसी से छुपा नहीं है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक तंत्र इसी सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ के इशारे पर चलता है. यही नहीं, इस कटौती की मार से एक बार फिर वह अमेरिकी कारपोरेट जगत और सुपर अमीर वर्ग बच निकला जिसको हासिल टैक्स छूट और रियायतों के कारण भी वित्तीय घाटा और सरकारी कर्ज इस हद तक बढ़ा है.

हालत यह है कि बड़ी-बड़ी अमेरिकी कम्पनियाँ भी आज एक डालर टैक्स नहीं दे रही हैं. उदाहरण के लिए, जेनरल इलेक्ट्रिक (जी.ई) जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने २०१० में १४.२ अरब डालर के व्यवसाय के बावजूद एक पैसा टैक्स नहीं दिया, उलटे ३.२ अरब डालर का टैक्स लाभ बटोर लिया.

असल में, ७० के दशक के आखिरी वर्षों में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में मुक्त बाजार की जिस नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी ने जोर पकड़ा, उसके केन्द्र में बड़ी पूंजी खासकर आवारा पूंजी और अमीरों को अधिक से अधिक टैक्स छूट और आम लोगों पर बोझ बढ़ाना शामिल था.

इस प्रक्रिया ने पिछले तीन दशकों में अमेरिका में यह स्थिति पैदा कर दी है कि अमेरिकी समाज में सबसे अमीर एक फीसदी लोग कुल राष्ट्रीय आय का एक चौथाई और कुल संपत्ति का ४० फीसदी गड़प कर जा रहे हैं. कोई २५ साल पहले यह आंकड़ा १२ और ३३ फीसदी का था. साफ है कि इस बीच सुपर अमीरों की आय तेजी से बढ़ी है. इसके उलट इन २५ वर्षों में आम अमेरिकी नागरिकों की वास्तविक आय में कमी आई है.

याद रहे, इस पूरी प्रक्रिया को राष्ट्रपति जार्ज बुश के कार्यकाल में और तेजी मिली. बड़ी पूंजी और सुपर अमीरों को जमकर टैक्स छूट और रियायतें दी गईं. नतीजा, वर्ष २००० के बाद से कर्ज और वित्तीय घाटा दोनों तेजी से बढ़े हैं. रही सही कसर पिछली वैश्विक मंदी के दौरान बड़े बैंकों, बीमा और वित्तीय कंपनियों और आटोमोबाइल जैसे औद्योगिक क्षेत्र को सैकड़ों अरब डालर के राहत और उत्प्रेरक पैकेजों ने पूरी कर दी. लेकिन इन सबपर कोई चर्चा नहीं हो रही है. ऐसे में, अमीरों और कारपोरेट जगत पर टैक्स बढ़ाने की बात करना भी पाप की तरह हो गया है.

लेकिन क्या इससे अमेरिकी संकट टल जाएगा? अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा कर्ज डील से संकट और गहराएगा क्योंकि खर्चों में भारी कटौती के कारण पहले से मंदी से लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था फिर से मंदी की चपेट में फंस सकती है. यूरोप में यही हो रहा है जहाँ अर्थव्यवस्थाएं इसी तरह के कड़े मितव्ययिता उपायों और कटौतियों के कारण एक के बाद एक संकट में फंसती जा रही हैं.

यह अमेरिका के साथ भी हो सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा हुआ तो वित्तीय घाटे में कटौती और कर्ज में कमी की योजना धरी की धरी रह जायेगी. इस तरह अमेरिका अपने साथ-साथ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को भी संकट में फंसा देगा जिसकी कीमत हम-आप सबको चुकानी पड़ेगी.

('जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर २५ अगस्त को प्रकाशित आलेख)

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