मंगलवार, मई 24, 2011

जयराम को चाहिए वर्ल्ड क्लास फैकल्टी


विश्वविद्यालय आसमान से नहीं, अपने समाज से पैदा होते हैं  



जयराम रमेश को सुर्ख़ियों में बने रहना आता है. इसके लिए उन्हें विवादों की भी परवाह नहीं रहती है. कई बार वे विवाद पैदा करने के लिए ही बोलते हैं. बहुत लोगों को लगता है कि रमेश खरी-खरी बातें और कई बार बिना सोचे बोलकर विवादों में फंस जाते हैं. लेकिन रमेश इतने भोले और मासूम नहीं हैं, जितना उनके बारे में ऐसी राय रखनेवाले मानते हैं.


सच यह है कि रमेश बहुत सोच-समझकर बोलते हैं और उनके हर कहे का बहुत गहरा मतलब होता है जिसे कई बार उनके दोस्त और निंदक दोनों नहीं समझ नहीं पाते हैं. रमेश ने पिछले कुछ वर्षों में बहुत मेहनत से अपनी पर्यावरणवादी छवि गढ़ने की कोशिश की है जो बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों से भी नहीं डरता और उसूलों का पक्का है. उनके कुछ फैसलों और बयानों से लगा कि इसमें कुछ हकीकत भी है.


लेकिन धीरे-धीरे उनकी सच्चाई सामने आने लगी है. जैतापुर से लेकर पास्को तक उनकी कड़क छवि बड़ी पूंजी की गर्मी से पिघलने लगी है. उन्हें भी अब पर्यावरण के बदले विकास की चिंता सताने लगी है. लेकिन जैसे-जैसे उनका असली चेहरा सामने आ रहा है, अपनी गढ़ी हुई छवि से प्यार करनेवाले रमेश अपनी मजबूरियां गिनाने लगे हैं.


लेकिन रमेश, आखिर रमेश हैं. उन्हें अब इलहाम हुआ है कि आई.आई.टी और आई.आई.एम में आनेवाले विद्यार्थी वर्ल्ड क्लास हैं लेकिन उनकी फैकल्टी और उनका शोध वर्ल्ड क्लास नहीं है. कहना मुश्किल है कि वर्ल्ड क्लास से उनका मतलब क्या है? लेकिन कई विश्लेषकों और अख़बारों ने भी उनकी इस राय से सहमति जताई है.


ऐसा लगता है कि वर्ल्ड क्लास से उनका मतलब विकसित पश्चिमी देशों से प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय जर्नलों में रिसर्च पेपर्स छपने और नोबल प्राइज जीतने से है. अगर यह कसौटी है तो निश्चय ही, आई.आई.टी और आई.आई.एम से लेकर तमाम अकादमिक संस्थानों और विश्वविद्यालय की फैकल्टी और उनका शोध वर्ल्ड क्लास का नहीं है. सच यह है कि इस तरह की वर्ल्ड क्लास फैकल्टी और शोध दुनिया के कुछ चुनिन्दा देशों तक सीमित है जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ़्रांस आदि शामिल हैं.

लेकिन इन देशों में वर्ल्ड क्लास फैकल्टी और शोध के पीछे वर्ल्ड क्लास विश्वविद्यालय और अकादमिक संस्थान हैं जो २०-४० साल में नहीं बल्कि २०० साल से लेकर ४०० सालों में बने हैं. उनका एक इतिहास और विरासत है. दूसरे, इन देशों ने अपने वर्ल्ड क्लास विश्वविद्यालयों को खड़ा करने के लिए आर्थिक संसाधन और अकादमिक स्वतंत्रता मुहैया कराने में में कभी कोई संकोच नहीं किया है. तीसरे, उनका शिक्षा और शोध का सालाना बजट भारत जैसे विकासशील देशों की तुलना में कई गुना अधिक है. चौथे, उन्होंने उच्च शिक्षा में गुणवत्ता के लिए उसके विस्तार के साथ उसमें सभी वर्गों की पहुंच और बराबरी सुनिश्चित की है.


इसलिए एक ऐसे देश में जहां अभी भी २५ फीसदी से अधिक आबादी साक्षर नहीं है, कालेज और यूनिवर्सिटी जाने लायक युवाओं की कुल आबादी में से मुश्किल से १४ फीसदी को वहां प्रवेश मिल पाता हो, उच्च शिक्षा समेत पूरी शिक्षा का कुल बजट जी.डी.पी के ४ फीसदी से भी कम हो और जहां ९५ फीसदी विश्वविद्यालयों को सिर्फ परीक्षा कराने और डिग्री बांटने तक सीमित कर दिया गया है, वहां वर्ल्ड क्लास शिक्षक और शोध कहां से और कैसे पैदा होंगे?


कहने की जरूरत नहीं है कि वर्ल्ड क्लास संस्थान, शिक्षक और शोध आसमान से नहीं पैदा नहीं होते हैं. वे आयातित भी नहीं किए जाते, जैसाकि यू.पी.ए सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने के लिए तर्क गढ़ रही है. यही नहीं, वर्ल्ड क्लास संस्थान और शिक्षक देश के बाकी विश्वविद्यालयों और संस्थानों की उपेक्षा करके और अधिक से अधिक संसाधन झोंककर आई.आई.टी और आई.आई.एम जैसे इलीट संस्थान खड़े करने से भी पैदा नहीं होते.   


याद रखिये, विश्वविद्यालय अपने देश और समाज की खास परिस्थितियों में पैदा होते और बढ़ते हैं. उनका अपने समाज और संस्कृति से आवयविक सम्बन्ध होता है. वर्ल्ड क्लास विश्वविद्यालय और संस्थान एक लंबी प्रक्रिया में बनते हैं जिसमें वे अपने समाज से लेते हैं और दूसरी ओर, उसे वापस भी देते हैं.


लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश में सभी आई.आई.टीज विदेशी मदद से खड़े किए गए और उनका अपने आसपास के समाज से कुछ खास लेना-देना नहीं है. यही हाल आई.आई.एम का है. उनका अपने समाज और उसकी जरूरतों से कोई सम्बन्ध नहीं है. जैसे अंग्रेजों ने कालेज और यूनिवर्सिटीज काले अंग्रेज पैदा करने के लिए बनाए थे, कुछ उसी तरह आई.आई.टीज और आई.आई.एम देश और समाज की सेवा के लिए नहीं बल्कि बड़ी पूंजी के हितों को पूरा करने के लिए खड़े किए गए. 


जयराम रमेश उसी व्यवस्था की पैदाइश हैं और उसी सोच में रचे-बसे हैं जिसके लिए वर्ल्ड क्लास का मतलब बड़ी पूंजी के लिए अनुकूल शोध पेश करना है. वे वर्ल्ड क्लास के सपने के नाम पर देश की शिक्षा व्यवस्था को देशी-विदेशी निजी पूंजी को सौंपना चाहते हैं. इसकी शुरुआत उन्होंने रिलायंस के साथ मैरिन संस्थान शुरू करके दे दी है.


जाहिर है कि वे ऐसे बयानों के जरिये फैकल्टी को अपमानित करके इलीट संस्थानों और इलीट उच्च शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं. जरूरत रमेश के इस बयान के निहितार्थों को समझने की है.                                   

4 टिप्‍पणियां:

abhishek ने कहा…

mera man na h ramesh ne jo keha usme thodi to sachai h he but india me politican ke byan sarthaktha se jyada prasidhi ke kye hote h is se me bhi sehmat hu

Anshul ने कहा…

Excellent Comments Jairam ramesh should look at the budget being spent on other universities which are starving for funds. The inhuman conditions of hostels in IITs is glaring example The admissions are not on merit but on certain reservations Faculties positions are not filled. Ifmerely publishing the articles andresearch papers are the criteria of good faculty than provide the same facilities which the world class universities are providing or else free the institutions from the interference of Government
Anil K Kothari

vikram ने कहा…

आप से मैँ सहमत हुँ और ये कोशिश करुँगा कि इसे अन्य को भी समझा सकुँ

NEERAJ BHATT ने कहा…

sir,
sach kadawa jarur hota hai par prbhavotpaadak hota hai.
sach to ye hai ki in snsthanon main padane vale students ko course ki har kasauti main jancha aur parakha jata hai.uska admission lene main hi tel nikal diya jata hai.phir aane vale waqt main bhi har kasauti par vo khara utarata hai kya same rule vahan padane vale faculty par bhi laagu hota hai?
kya interview lete samay jo jo prashno ki jhadee prtiyogi ke saamane lagayi jati hai vaise hi kya admission pane ke baad students ko bhi inti chhut hoti hai vo bhi uske andar uthrhe sawal pooch sakata hai?uttar hai nahi..