सोमवार, मई 09, 2011

माया का मेगापोलिस

जमीन की लूट के लिए मायावती सरकार ने किसानों के खिलाफ युद्ध सा छेड दिया है




दिल्ली के पास ग्रेटर नोयडा के भट्टा-पारसौल गांव से भडकी किसान आंदोलन की चिंगारी मुख्यमंत्री मायावती के प्रिय प्रोजेक्ट यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे-किनारे आगरा और मथुरा तक फ़ैल गई है. लेकिन किसानों की मांगों पर सहानुभूति से विचार करने या उनसे संवाद करने के बजाय सर्वजन की सरकार ने पिछले चार महीनों से जमीन के मनमाने अधिग्रहण या कहिये लूट के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के मनोबल को तोड़ने के लिए पुलिस-पी.ए.सी को उतार दिया है.

कहने की जरूरत नहीं है कि उत्तर प्रदेश पुलिस-पी.ए.सी वहां वही कर रही है जिसके लिए वह दशकों से कुख्यात है. पंतनगर से लेकर मलियाना-हाशिमपुरा और रामपुर चौराहा तक जनसंहार, लूट और बलात्कार की दोषी पी.ए.सी के इतिहास से कौन नहीं परिचित है? वही पुलिस-पी.ए.सी किसानों पर फायरिंग, उनकी फसलों-घरों और संपत्ति को जलाने से लेकर अपने दो साथियों की मौत से इस कदर पागल हो गई है कि वह गांवों और किसानों के घरों में घुसकर बूढ़े-बच्चों और महिलाओं की पिटाई कर रही है. अंधाधुंध गिरफ्तारियां हो रही हैं.  

पुलिसिया आतंक का यह हाल है कि किसान गांव छोड़कर भाग गए हैं. यही नहीं, पुलिस किसानों के नेता मनवीर सिंह तेवतिया और उनके साथियों को ऐसे ही खोज रही है, जैसे अमेरिका ओसामा बिन लादेन को खोज रहा था. उसने तेवतिया पर ५० हजार रूपये का इनाम घोषित कर दिया है. पुलिस के रवैये से साफ है कि उसने आंदोलनकारी किसानों को सबक सिखाने का फैसला कर लिया है. निश्चय ही, इस पूरे दमन अभियान को खुद मुख्यमंत्री मायावती का समर्थन हासिल है क्योंकि उत्तर प्रदेश शासन में बिना उनके इशारे के पत्ता भी नहीं खड़कता है.

ऐसा लगता है कि मायावती सरकार ने बिल्डरों, रीयल इस्टेट कंपनियों और देशी-विदेशी बड़ी कंपनियों के हक में उत्तर प्रदेश में किसानों के खिलाफ एक तरह से युद्ध सा छेड दिया है. सीधे-सीधे सरकार की अगुवाई में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन लूटी जा रही है. कहीं यमुना एक्सप्रेस-वे के नाम से और कहीं गंगा एक्सप्रेस-वे के नाम पर. यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस गंगा-यमुना के किनारे एक पूरी सभ्यता-संस्कृति विकसित हुई और उसके उपजाऊ मैदानों में किसानों ने कड़ी मेहनत से लाखों-करोड़ों का पेट भरा, उन्हीं किसानों और उनके साथ इस पूरी सभ्यता को उजाड़ने का अभियान चल रहा है.

लेकिन विकास के नाम पर गंगा-जमुनी तहजीब की इस धरती पर कहीं फार्मूला वन की रेसिंग का ट्रैक बन रहा है, कहीं गोल्फ कोर्स, कहीं क्रिकेट स्टेडियम बन रहा है और कहीं लक्जरी अपार्टमेंट. इसके लिए किसानों की जमीनें जबरदस्ती छिनी जा रही हैं. मायावती सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर छह लेन के यमुना एक्सप्रेस-वे या गंगा एक्सप्रेस-वे की क्या जरूरत है? यह भी कि रेसिंग ट्रैक, गोल्फ कोर्स और लक्जरी अपार्टमेंट जरूरी हैं या करोड़ों किसानों की आजीविका और वह उपजाऊ जमीन जिससे पैदा होनेवाले अनाज से करोड़ों लोगों का पेट भर रहा है?

लेकिन मायावती राज में ऐसे सवाल बेमानी हो गए हैं. जमीन की लूट का आलम यह है कि एक सरकारी नोटिफिकेशन के जरिये इस साल फरवरी में मायावती सरकार ने एक झटके में यमुना एक्सप्रेस-वे के किनारे छह जिलों के करीब ११८७ गांवों की पूरी जमीन को ग्रामीण-कृषि भूमि से शहरी भूमि घोषित कर दिया. इसके तहत यमुना एक्सप्रेस-वे के बाईं ओर से यमुना के किनारे तक का १०-१५ किलोमीटर का पूरा इलाका रातों-रात शहरी और यमुना एकस्प्रेस-वे इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट अथारिटी के अधीन आ गया है.

हालांकि मायावती सरकार का दावा है कि इससे एक्सप्रेस-वे के किनारे संगठित और सुनियोजित विकास हो पायेगा लेकिन हकीकत यह है कि सर्वजन की सरकार ने एक झटके में ११८७ गांवों की लगभग २,३६,६८२ हेक्टेयर जमीन भू-माफिया, बिल्डरों और रीयल इस्टेट कंपनियों की खुली लूट के लिए थाली में परोस करके दे दी है. यह पूरी जमीन नोयडा और दिल्ली के कुल क्षेत्रफल से अभी अधिक है. इसमें दस से अधिक नोयडा बन सकते हैं.

मतलब यह कि मायावती मोहम्मद तुगलक की तरह अपना दौलताबाद यानी दिल्ली से भी बड़ा मेगापोलिस बनाना चाहती हैं. वैसे भी बहन जी का स्माल इज ब्यूटीफुल में कोई भरोसा नहीं है. उनका विशाल और भव्य से प्रेम किसी से छुपा नहीं है. चूँकि उनकी सरकार के अफसर मानते हैं कि देश का भविष्य शहरीकरण में है, इसलिए वे नए शहर बनाने में जुटे हैं. यह और बात है कि इन नए शहरों में गरीबों और दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के पुराने शहर बहन जी की अनदेखी के कारण बदहाल और बर्बाद होते जा रहे हैं.        

लेकिन बहन जी अपनी इन तुगलकी योजनाओं के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं. ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में सरकार जे.पी. समूह चला रहा है. अन्यथा क्या कारण है कि करोड़ों किसानों की आजीविका की चिंता करने के बजाय बहन जी जे.पी. समूह के हितों की रक्षा के लिए इस कदर उद्वेलित हैं? जे.पी समूह के प्रति उनका यह अत्यधिक स्नेह समझ से बाहर है. उसके लिए उन्हें किसानों का खून बहाने में भी संकोच नहीं हो रहा है.

लेकिन जे.पी समूह से प्रेम के मामले में बहन जी अकेली राजनेता नहीं हैं. जे.पी का फैन क्लब भाजपा से लेकर कांग्रेस तक फैला हुआ है. चाहे गुजरात में नरेंद्र मोदी हों या मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान हों या हिमाचल प्रदेश के प्रेम सिंह धूमल या पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह या फिर कांग्रेस के कमलनाथ या दिग्विजय सिंह या फिर सपा के मुलायम सिंह यादव. यह लिस्ट बहुत लंबी है. स्वाभाविक भी है. आखिर जे.पी कोई छोटी-मोटी कंपनी तो है नहीं.

ऐसी तेजी से बढ़ती कंपनी से दोस्ती कौन नहीं करेगा जिसका राजस्व १६ हजार करोड़ रूपये तक पहुंच चुका है. आश्चर्य नहीं कि आज जे.पी के चाहनेवाले हर पार्टी में मौजूद हैं जो जल्दी ही खींसे निपोरते हुए कहने लगेंगे कि विकास जरूर होना चाहिए लेकिन किसानों के हितों का ध्यान भी रखा जाना चाहिए. गौर करिए, जरूर और भी का अंतर. ये महानुभाव मायावती की जमकर लानत-मलामत करेंगे लेकिन विकास की तरफदारी भी करेंगे. कहने की जरूरत नहीं है कि विकास के नाम पर जमीन की लूट के सवाल पर सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति बन चुकी है.       

ऐसे में, किसान क्या करें? उनके पास विकल्प क्या है? हैरानी की बात नहीं है कि इस जमीन लूट के खिलाफ किसानों में नोयडा से लेकर अलीगढ़ और आगरा से मथुरा तक आग धधक रही है. किसानों के लिए यह अब जीवन-मरण की लड़ाई बन गई है. यह बात मायावती भी जानती हैं. उन्हें पता है कि अगर इस बार किसानों का आंदोलन साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेकर नहीं कुचला गया तो फिर उनका मेगापोलिस बनाने का सपना हमेशा के लिए टूट जायेगा. इसलिए वह किसानों का आंदोलन तोड़ने के लिए उनका मनोबल तोड़ने की कोशिश कर रही हैं.

एक ओर किसानों को अपराधी और अराजक साबित करने की कोशिश की जा रही है, उनके नेताओं को मोस्ट वांटेड घोषित किया जा रहा है और दूसरी ओर, उन्हें फुसलाने की कोशिशें हो रही हैं. एक ओर पुलिस-पी.ए.सी को दमन-उत्पीडन की खुली छूट दे दी गई है और दूसरी ओर, किसानों को प्रलोभन दिए जा रहे हैं. यानी वह हर तौर तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे किसानों का मनोबल तोडा जा सके. अलीगढ़ के टप्पल में वह यह प्रयोग कर चुकी हैं. भट्टा-पारसौल में भी वही दोहराने की कोशिश की जा रही है. 

                        

3 टिप्‍पणियां:

अनुराग दीक्षित ने कहा…

Jaypee Group ke baare mein aapne kafi spasht likha...baki tamam news channel aisi himmat nahi dikha sake. shayad dar raha hoga ki headlines ki sponsership hi na chali jaye...

अनुराग दीक्षित ने कहा…

Jaypee Group ke malik Jaiprakash Gour kabhi mere grah janpad mein chote se JE hua karte the.aaj hazaron Cr. ke malik. unke baare mein itni spasth rai jo aapne likhi, afsos koi news channel kahne se bach raha hai. headlines ki sponsership na chali jaye...shayad iska darr ho.

Indra ने कहा…

सर,मायावती हों या मुलायम या फिर कोई और इन्हें कौन समझाये कि बाजार को समाज ने पैदा किया है न कि बाजार ने समाज को। अगर समाज ने बाजार को पैदा किया है तो समाज को ही अपने हितों के अनुरूप यह तय करने का हक होना चाहिए कि उसका बाजार कैसा हो, वह कैसै चले। बाजार को यह तय करने का किसी कीमत पर हक नही कि समाज को कैसे चलाया जाय। किसानों के साथ सरकारें जिन तर्कों के आधार पर तमाशा खड़ा कर रहीं हैं वह समाज के एक खास वर्ग द्वारा देश के अधिकतम लोगों पर साम्राज्य स्थापित करने का एक तरह का हथकंडा है।