शुक्रवार, मई 20, 2011

ब्रेकिंग न्यूज : आपरेशन ओसामा

ओसामा के मारे जाने की कहानी में झोल ही झोल


न्यूज चैनलों का ब्रेकिंग न्यूज प्रेम जगजाहिर है.इस प्रेम का आलम यह है कि चैनलों पर हर दस मिनट (कई चैनलों पर हर पांच, कुछ पर हर एक-दो मिनट) में एक बार ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चलने का एक अघोषित नियम सा बन गया है. सच पूछिए तो न्यूज चैनलों की सांस ब्रेकिंग न्यूज से ही चलती है.

इस मायने में, न्यूज चैनल और ब्रेकिंग न्यूज एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं. यह और बात है कि चैनलों के ब्रेकिंग न्यूज प्रेम ने ब्रेकिंग न्यूज की ऐसी-तैसी कर दी है. वहां अब वह हर खबर ब्रेकिंग न्यूज है जो चैनल पर पहली बार चलती है.
लेकिन अकसर यह देखा गया है कि जब असल में ब्रेकिंग न्यूज आती है तो वे तैयार नहीं होते हैं. उस समय उनकी हड़बड़ी और गडबडियां देखने लायक होती हैं. उनमें जोश तो बहुत होता है लेकिन होश नहीं रहता.

आश्चर्य नहीं कि जब अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन की अमेरिकी कमांडो आपरेशन में मारे जाने की ब्रेकिंग न्यूज आई तो हिंदी और अंग्रेजी के देशी चैनल जोश में बावले हो गए. हालांकि उनके पास दिखाने को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की घोषणा और लादेन की कुछ फ़ाइल फुटेज के अलावा और कुछ खास नहीं था.


लेकिन इससे हमारे कल्पनाशील न्यूज चैनलों को कहां फर्क पड़ता है? एयर टाइम भरने के लिए खबर को फ़ैलाने और तानने की उनकी क्षमता असंदिग्ध है. खबर गढ़ने में उनका कोई जोड़ नहीं है.

जाहिर है कि लादेन के मारे जाने की खबर के मामले में भी उन्होंने सूचनाओं, तथ्यों और ताजा फुटेज की कमी की भरपाई अपनी कल्पनाशीलता, कच्ची-पक्की कहानियों, ओसामा के पुराने फ़ाइल फुटेज और स्टूडियो में एंकर और न्यूज रूम में रिपोर्टर की सांस फुलानेवाली उत्साह और उत्तेजना से भरी कमेंट्री के साथ की. उत्साह और उत्तेजना का आलम यह था कि एंकर-रिपोर्टर ओबामा को ओसामा और ओसामा को ओबामा बनाने से नहीं चूके.

कारण, चैनलों में हमेशा की तरह एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ लगी हुई थी. इसी हड़बड़ी और उत्साह में कई चैनलों ने मृत ओसामा की (फर्जी) तस्वीर भी दिखानी शुरू कर दी, यह चेतावनी देते हुए कि ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं. कहना मुश्किल है कि चैनलों के संपादकों को इस तस्वीर ने विचलित किया या नहीं?


लेकिन इस तस्वीर की सच्चाई यह थी कि यह इंटरनेट पर २००९ से मौजूद थी और हुआ यह होगा कि चैनलों के उत्साही रिसर्चरों ने जैसे ही गूगल के इमेज सर्च में यह तस्वीर देखी होगी, बिना जांच-पड़ताल के लपक लिया होगा. वैसे भी चैनलों में रिसर्च इंटरनेट पर गूगल बाबा के ज्ञान तक सीमित है.


चलिए मान लिया कि जैसे बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, वैसे ही बड़ी-बड़ी खबरों के साथ-साथ छोटी-छोटी गलतियां होती रहती हैं. लेकिन यहां तो पूरी कहानी ही फ़िल्मी थी. हालांकि इसमें अपने देशी चैनलों की गलती (अगर मानें तो) सिर्फ इतनी थी कि वे इस अमेरिकी फ़िल्मी कहानी को बिना सोचे-समझे ज्यों का त्यों रिले कर रहे थे.

अमेरिका ने ओसामा को मारे जाने की जो कहानी गढ़ी, उसमें शुरू से इतने झोल थे कि खुद उसे कई बार कहानी बदलनी पड़ी. इसके बावजूद हर बार नई कहानी से जितने सवालों के जवाब मिलते थे, उससे ज्यादा नए सवाल पैदा हो जाते थे.


नतीजा, कमांडो आपरेशन के एक सप्ताह बाद भी हर दिन अमेरिकी प्रशासन से कभी आन द रिकार्ड और कभी आफ द रिकार्ड आधी सच्ची-आधी झूठी ख़बरें प्लांट की जा रही हैं. अमेरिकी मीडिया इसे एक धारावाहिक सीरियल की तरह से छाप और दिखा रहा है. देशी चैनल भी पूरी स्वामीभक्ति के साथ इस जूठन को परोसने में जुटे हुए हैं.

इस तरह हर दिन परस्पर विरोधी खबरें एक नए एंगल, कुछ नए मिर्च-मसाले के साथ बतौर एक्सक्लूसिव छप और दिखाई जा रही हैं. रही-सही कसर अपने देशी न्यूज चैनलों के अत्यंत सृजनशील आउटपुट डेस्क पर पूरी हो जाती है जो तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने के उस्ताद हैं.


इस तरह चैनलों पर ओसामा गाथा के नाम पर उल्टी-पुल्टी ख़बरें जारी हैं. लगता है कि चैनल खुद भी यह नहीं देखते कि उन्होंने कल क्या दिखाया था? यही कारण है कि लादेन, कमांडो आपरेशन, पाकिस्तान को लेकर एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह बे-सिर पैर की रिपोर्टें दिखा रहे हैं जिनमें कोई तारतम्यता, तार्किकता और वास्तविकता नहीं है.

इसीलिए कहते हैं कि झूठ को याद रखने की जरूरत पड़ती है. इसके बावजूद हर बार उसे दोहराते हुए कुछ न कुछ गडबडी हो ही जाती है जिससे पोल खुल जाती है.
 
कहने की जरूरत नहीं है कि एबाटाबाद आपरेशन के बारे में ऐसा बहुत कुछ है जिसे अमेरिका और पाकिस्तान दोनों छुपा रहे हैं. संभव है कि कुछ महीनों या सालों (जैसे ओबामा के दोबारा चुनाव) के बाद विकीलिक्स की कृपा से सच्चाई सामने आए क्योंकि अभी तो अमेरिकी मीडिया ओसामा के मारे जाने की राष्ट्रीय उपलब्धि से उछल रहा है.
भारतीय चैनल भी अमेरिकी बहादुरी से पूरी तरह से अभिभूत हैं. नतीजा, देशी चैनलों का राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है और हमेशा की तरह बहस शुरू हो गई है कि हम भी पाकिस्तान के अंदर घुसकर ऐसी ही कमांडो कार्रवाई क्यों नहीं करते हैं?


चैनलों पर एंकरों के नथुने फड़क रहे हैं, सुरक्षा विशेषज्ञ, डिप्लोमैट और सेना के पूर्व जनरल ललकार रहे हैं और राजनेता चेतावनियां दे रहे हैं. लेकिन कोई नहीं बता रहा कि ऐसी कार्रवाई के क्या नतीजे हो सकते हैं? ऐसे मौकों पर अगर किसी ने तर्क और विवेकपूर्ण बात कहने की कोशिश की तो स्टार एंकरों की खिसियाहट, चिढ़ और गुस्सा देखते ही बनता है.


किसी ने ठीक ही कहा है कि युद्ध इतना गंभीर मामला है कि इसे जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. अब इसमें यह जोड़ लेना चाहिए कि ख़बरें इतनी गंभीर मुद्दा हैं कि उन्हें न्यूज चैनलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है.

(तहलका के ३१ मई'११ के अंक में प्रकाशित) 

1 टिप्पणी:

अपनी बात ने कहा…

सब मजबूर हैं। कोई आदत से तो कोई स्वार्थ से। सवाल यह भी है कि हम खबरों के लिए कौन सा नया माध्यम खोजें जो सही जानकारी दे।