शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

टी.आर.पी के गुलाम

समस्या टी.आर.पी नहीं बल्कि व्यावसायिक टी.वी के मुनाफा आधारित बिजनेस माडल में है 

दूसरी और आखिरी किस्त

सच यह है कि इस प्रक्रिया में चैनल एक तरह से टी.आर.पी के गुलाम बन जाते हैं. किसी एक सप्ताह की टी.आर.पी के आधार पर किसी कार्यक्रम की गुणवत्ता तय होने लगती है. कार्यक्रम निर्माताओं के पास कोई स्वायत्तता नहीं रह जाती है. ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब टी.आर.पी में गिरावट के कारण किसी कार्यक्रम की कहानी की दिशा, उसके पात्रों के चरित्र चित्रण या प्रस्तुति में उलटफेर करना पड़ा है. इसी तरह, टी.आर.पी की दृष्टि से सफल कार्यक्रमों की नक़ल या प्रतिरूप सभी चैनलों पर छा जाते हैं जिसका सबसे पहला शिकार विविधता और बहुलता होती है.

यही कारण है कि कई समाचार चैनलों के संपादक यह मांग करते रहे हैं कि जैसे अख़बारों की पाठक संख्या का सर्वेक्षण हर छह महीने पर आता है, उसी तरह से टी.वी चैनलों की रेटिंग भी छह महीने पर आनी चाहिए. खुद समिति के मुताबिक, इससे अनावश्यक रूप से एयरटाइम का जिन्सीकरण होता है और इससे प्रसारक और विज्ञापनदाता दोनों तात्कालिक टी.आर.पी बढ़ोत्तरी के पीछे भागने लगते हैं.

लेकिन समिति ने टी.आर.पी व्यवस्था की इस अपर्याप्तता और विसंगतियों का समाधान सैम्पल साइज को बढ़ाने में खोजा है. समिति ने सिफारिश की है कि अगले पांच वर्षों में पीपुल मीटर्स की संख्या को बढ़ाकर तीस हजार तक ले जाया जाए. समिति के मुताबिक इन अतिरिक्त २२००० मीटर्स को लगाने का खर्च लगभग ६६० करोड़ रूपये आएगा जिसे टी.वी उद्योग से एक सालाना फ़ीस के रूप में वसूला जा सकता है. समिति ने टैम और अन्य रेटिंग एजेंसी को टी.वी उद्योग से जुड़े प्रसारकों, विज्ञापन दाताओं और विज्ञापन एजेंसियों का प्रतिनिधित्व करनेवाली संस्था ब्राडकास्ट आडिएंस रिसर्च काउन्सिल- बार्क की निगरानी में लाने की भी सिफारिश की है.

समिति ने इसके अलावा, केबल, टेरेस्ट्रियल, डी.टी.एच, आई.पी.टी.वी और अन्य तकनीकों को भी टी.आर.पी के दायरे में लाने की सिफारिश की है. समिति का मानना है कि रेटिंग की घोषणा प्रतिदिन के बजाय साप्ताहिक आधार पर ही होनी चाहिए और बार्क चाहे तो इसे पाक्षिक भी कर सकता है. समिति ने यह भी सिफारिश की है कि हितों का टकराव टालने के लिए रेटिंग एजेंसियों, प्रसारकों, विज्ञापन दाताओं और विज्ञापन एजेंसियों के बीच क्रास मीडिया निवेश नहीं होना चाहिए.

समिति ने टी.आर.पी व्यवस्था की निगरानी के लिए गठित की जानेवाली संस्था- बार्क में एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने की भी सिफारिश की है जिसमें विशेषज्ञों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए. समिति ने टी.आर.पी संग्रह की पूरी प्रक्रिया और उसके नतीजों को सार्वजनिक करने की भी सिफारिश की है ताकि उन्हें स्वतंत्र रूप से जांचा-परखा जा सके.

सवाल यह है कि क्या इन सिफारिशों से टी.आर.पी के कारण पैदा होनेवाली कई बुनियादी समस्याएं और गडबडियां दूर हो जाएंगी? निश्चय ही, सिर्फ टी.आर.पी मीटर्स की संख्या को चौगुना कर देने और उसमें ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य उपेक्षित राज्यों को भी शामिल भर कर लिए जाने भर से न तो टी.आर.पी का अवांछित दबाव कम होनेवाला है और न ही उसके दबाव के कारण कंटेंट के स्तर होनेवाली गडबडियां दूर होनेवाली है. उल्टे इस बात की आशंका अधिक है कि मीटर्स की संख्या बढ़ने से उसे और ज्यादा महत्व मिलने लगेगा जिसके कारण कार्यक्रमों फार्मेट से लेकर उसके स्वरुप, सिक्वेंस और ट्रीटमेंट में टी.आर.पी की घुसपैठ और बढ़ जायेगी.

असल में, टी.आर.पी व्यवस्था के साथ सबसे बुनियादी समस्या यह है कि यह व्यावसायिक टेलीविजन और उसके मुनाफे के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी व्यवस्था है. व्यावसायिक टेलीविजन मुनाफे के लिए चलता है और फ़िलहाल, प्रसारकों के मुनाफे का मुख्य स्रोत विज्ञापनों से होनेवाली आय है. स्वाभाविक तौर पर विज्ञापनदाता उस चैनल या कार्यक्रम को ज्यादा और ऊँची कीमत पर विज्ञापन देता है जिसके पास सबसे अधिक दर्शक होते हैं.

कहा भी जाता है कि टी.वी के कार्यक्रमों के पीछे मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक दर्शक जुटाकर विज्ञापनदाताओं को बेच देना होता है. यही नहीं, विज्ञापनदाता यह भी देखता है कि उसके दर्शक समाज के किन वर्गों से आते हैं. जाहिर है कि उनकी प्राथमिकता उन दर्शकों की होती है जिनके पास इतनी क्रयशक्ति है कि वे उन उत्पादों और सेवाओं को खरीद पायें.

टी.आर.पी के मौजूदा ढांचे में बड़े महानगरों और समृद्ध राज्यों में अधिक पीपुल मीटर्स का लगा होना इसी जरूरत को पूरा करने के लिए है. वास्तव में, टी.आर.पी व्यवस्था उन विज्ञापन दाताओं के लिए ही बनाई गई है जो चाहते हैं कि विज्ञापन पर खर्च होनेवाला उनका पैसा बेकार न जाए. लेकिन सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि इस समिति ने टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था में कई बड़ी कमियों और गडबडियों की शिकायतों को सही मानते हुए भी समाधान की बहुत सीमित और सतही पेशकश की है. यह टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था के अंदर ही कुछ प्रक्रियागत सुधारों के जरिये उसे और सशक्त और प्रभावी बनाने की कोशिश है.

आश्चर्य नहीं कि समिति ने टी.आर.पी के कंटेंट पर पड़नेवाले नकारात्मक प्रभावों पर सिवाय इसके कुछ नहीं कहा है कि चैनल कंटेंट के मामले में स्व-नियमन और अनुशासन का पालन करें. लेकिन सवाल है कि जब तक चैनलों मुनाफे के लिए विज्ञापन और उससे जुड़े टी.आर.पी पर आश्रित हैं तो स्व-नियमन की परवाह कौन करता है? जाहिर है कि इससे रेटिंग की तानाशाही कमजोर नहीं पड़ेगी.

इस पूरी बहस की सबसे बड़ी त्रासदी यही है. दरअसल, उसे टी.वी रेटिंग की व्यवस्था से कोई शिकायत नहीं है. उसे सिर्फ टैम की रेटिंग प्रणाली की कमियों-खामियों से शिकायत है. लेकिन समस्या सिर्फ टैम की रेटिंग तक सीमित नहीं है बल्कि इस तरह की किसी भी रेटिंग व्यवस्था की यह अन्तर्निहित विकृति है जिसका उद्देश्य विज्ञापनदाताओं के लिए टार्गेट आडिएंस खोजना है. याद रहे, इस रेटिंग व्यवस्था का मूल मकसद विज्ञापनदाता के लिए उन दर्शकों की तलाश है जिनके पास उसके उत्पादों/सेवाओं को खरीदने की सामर्थ्य है.

जाहिर है कि जब तक समृद्ध और उपभोक्ता दर्शकों की पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर रेटिंग होगी और उसे आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम बनाये जायेंगे, रेटिंग के दलदल से बाहर निकलना संभव नहीं है. चाहे टैम हो या बार्क- समस्या हल होनेवाली नहीं है. असल में, मूल मुद्दा टैम का नहीं, टी.वी रेटिंग का विकल्प खोजने का है या कहें कि विज्ञापन आय पर निर्भर टी.वी को विज्ञापनों और मुनाफे की जकडबंदी से बाहर निकालने का है.

समाप्त
('कथादेश' के फरवरी'११ में प्रकाशित)

1 टिप्पणी:

PADMSINGH ने कहा…

वास्तव मे स्थिति ऐसी ही है... बाज़ार वाद का मुलम्मा हर जगह चढ़ा हुआ है... समाचार चैनल तो केवल एडवरटाइज़िंग और गुरुघंटालों का अड्डा बन के रह गया है।