मंगलवार, अगस्त 10, 2010

अघोषित आपातकाल की दस्तक

मीडिया और पत्रकारों पर राज्यसत्ता, सांप्रदायिक फासीवादी संगठनों और माफियाओं के बढ़ते हमले का मकसद सच को दबाना है लेकिन खुद कारपोरेट मीडिया भी सच को छुपाने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है


बीते १६ जुलाई को खुद को सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन बतानेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.आर.एस) से जुड़े सैकड़ों अराजक, गुंडे और लम्पट तत्वों की भीड़ ने समाचार चैनल ‘आजतक’ के दिल्ली स्थित दफ्तर पर हमला बोल दिया और पुलिस की मौजूदगी में जमकर तोड़फोड़ मचाया और पत्रकारों के साथ बदसलूकी की. उनकी नाराजगी की वजह यह थी कि ‘आजतक’ के सहयोगी अंग्रेजी चैनल ‘हेडलाइन्स टुडे’ ने एक स्टिंग आपरेशन के जरिये इस भगवा संगठन के कुछ बड़े नेताओं की हिंदू आतंकवादी संगठनों से सम्बन्ध दिखाने की कोशिश की थी. ठीक इसी दिन, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में शिव सेना के गुंडों ने ‘जी मराठी’ चैनल के दफ्तर में घुसकर तोड़फोड़ मचाई और पत्रकारों के साथ मारपीट की. उस समय चैनल पर कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद पर बहस चल रही थी.


हालांकि चैनलों पर ऐसे हमले नए नहीं हैं और पहले भी, देश के अलग-अलग हिस्सों में चैनलों और उनके पत्रकारों को सांप्रदायिक फासीवादी संगठनों के अलावा खुद सरकार, पुलिस, माफिया, ठेकेदार और अपराधी नेता निशाना बनाते रहे हैं. लेकिन इन हमलों में नई बात यह है कि ना सिर्फ चैनलों बल्कि समूचे समाचार मीडिया और पत्रकारों को काबू में करने और सच को दबाने की एक बड़ी परियोजना का हिस्सा मालूम होते हैं. निश्चय ही, यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि पिछले कुछ महीनों में समाचार मीडिया और खासकर पत्रकारों पर संगठित हमले बढ़े हैं. हालत किस कदर बदतर हो गए हैं, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन हमलों के असली योजनाकार न सिर्फ खुलेआम घूम रहे हैं बल्कि इन हमलों को जायज ठहराने में जुटे हुए हैं.

सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि इन हमलों को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें न सिर्फ चुप और लापरवाह दिखती हैं बल्कि असली हमलावरों को बचाने की भी कोशिश कर रही हैं. इस मामले में, राजनीतिक दलों की भूमिकाएं भी संदिग्ध हैं. कृपया, उनकी दिखावटी प्रतिक्रियाओं पर मत जाइये. सच यह है कि इन हमलों को उनकी परोक्ष या मौन सहमति हासिल है. यही नहीं, यू.पी.ए सरकार जिस तरह से समाचार चैनलों को काबू में करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय प्रसारण प्राधिकरण (एन.बी.ए.आई) बनाने की पेशबंदी हो रही है, उससे जाहिर है कि समाचार मीडिया पर सिर्फ शारीरिक हमले ही नहीं बल्कि कानूनी हमले की भी तैयारी हो रही है.

बात यहीं नहीं खत्म हो जाती है. पिछले कुछ महीनों में खासकर आपरेशन ग्रीनहंट की शुरुआत के बाद से जिस तरह से केन्द्रीय गृह मंत्रालय और खुद गृह मंत्री ने कथित तौर पर “नक्सलियों/माओवादियों से सहानुभूति रखनेवाले” पत्रकारों/बुद्धिजीवियों/लेखकों को सार्वजनिक रूप से डराने, धमकाने के अलावा उनके खिलाफ वैचारिक अभियान छेड रखा है, निःसंदेह, वह इसी बड़ी परियोजना का हिस्सा लगता है. यह अभियान किस स्तर तक पहुंच गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर छत्तीसगढ़ पुलिस ने मेधा पाटकर जैसी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, प्रो. नंदिनी सुन्दर और अरुंधती राय जैसी बुद्धिजीवी और जावेद इक़बाल जैसे पत्रकार पर खुलेआम यह आरोप लगाया कि उन्होंने एक कांग्रेस नेता की हत्या में शामिल कथित ‘माओवादी नेता’ लिंगाराम को संरक्षण दिया है. हालांकि सच यह था कि लिंगाराम भी एक आदिवासी छात्र हैं जो दिल्ली में रहकर पढाई कर रहे हैं.

दूसरी ओर, सच को दबाने और खामोश करने की इसी परियोजना की अंतिम तार्किक परिणति के बतौर जुलाई के पहले सप्ताह में स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पाण्डेय (हेमंत पाण्डेय) की हत्या एक कथित मुठभेड़ में कर दी गई. उनका अपराध सिर्फ इतना था कि वे भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य चेरिकुरी राजकुमार (आजाद) की आंध्र पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी के एकमात्र चश्मदीद गवाह थे. निश्चय ही, हेमचन्द्र की मुठभेड़ हत्या उसी सिलसिले की अगली कड़ी है जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में पत्रकारों-बुद्धिजीवियों को ‘माओवादी’ बताकर गिरफ्तार किया जा रहा है और बिना किसी चार्जशीट के महीनों जेल में बंद रखा जा रहा है. डा. विनायक सेन की माओवादियों से सम्बन्ध रखने के झूठे आरोपों में गिरफ़्तारी और दो साल तक जेल में बंद रखने के साथ जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह उत्तराखंड में प्रशांत राही, उत्तर प्रदेश में सीमा और विश्वविजय आजाद और उडीशा में लक्ष्मण चौधरी जैसे दर्जनों पत्रकारों की गिरफ़्तारी से होता हुआ अब हेमचन्द्र पाण्डेय की हत्या तक पहुंच गया है.

हेमचंद्र की हत्या में एक अघोषित आपातकाल की दस्तक को साफ सुना जा सकता है. इस हत्या और मीडिया और पत्रकारों पर बढ़ते हमलों की तुलना आपातकाल के काले दिनों से करने की वजह यह है कि ये हमले ना सिर्फ बहुत संगठित तरीके से हो रहे हैं बल्कि उन्हें सीधे-सीधे राज्यसत्ता का आशीर्वाद और प्रोत्साहन हासिल है. दूसरे, इन हमलों में उन पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार-कारपोरेट-माफिया गठजोड़ की प्राकृतिक और खनिज संसाधनों की खुली लूट का पर्दाफाश करने की कोशिश कर रहे हैं या राज्यसत्ता के खिलाफ अपने जायज हकों के लिए लड़ रहे आमलोगों की आवाज़ को उठाने की पहल कर रहे हैं. ये वे पत्रकार/लेखक/बुद्धिजीवी हैं जो शासक वर्गों द्वारा नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पक्ष में बनाई गई आम सहमति के खिलाफ बोलने और लिखने की जुर्रत कर रहे हैं.

स मायने में हेमचंद्र की नृशंस हत्या को एक टेस्ट केस माना जाना चाहिए. निश्चय ही, इस हत्या को हाल के दिनों में चैनलों और मीडिया के साथ-साथ पत्रकरों पर बढ़ते हमलों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. लेकिन अफसोस की बात यह है कि मुख्यधारा के मीडिया में चैनलों पर हुए हमलों और हेमचन्द्र पाण्डेय की हत्या को अलग-अलग करके देखा जा रहा है. कहा जाता है कि स्वतंत्रता या आजादी अविभक्त होती है यानी उसे टुकड़ों-टुकड़ों में बांटकर नहीं देखा जा सकता है. यह नहीं हो सकता है कि ‘आजतक’, जी मराठी, स्टार न्यूज, आई.बी.एन-लोकमत आदि चैनलों पर सांप्रदायिक फासीवादी संगठनों के हमलों और चैनलों पर नियमन के कानूनी अंकुश लगाने की कोशिशों को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना जाए लेकिन हेमचन्द्र पाण्डेय की हत्या और उन जैसे अन्य दर्जनों पत्रकारों को बिना कारण जेल में बंद रखने को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले के तौर नहीं देखा जाए?

यह कैसे हो सकता है कि चैनलों पर नियमन के नाम पर कानूनी शिकंजा डालकर उनकी आवाज को बंद करने को लोकतंत्र पर हमला माना जाए लेकिन पत्रकारों/बुद्धिजीवियों/लेखकों को माओवादियों से सम्बन्ध रखने के नाम पर गिरफ्तार करने और यहां तक कि उनकी हत्या कर देने का अधिकार देनेवाले छत्तीसगढ़ विशेष कानून, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट जैसे काले कानूनों को स्वीकार कर लिया जाए? चैनलों पर हमले को निश्चय ही, किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है लेकिन लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की यह लड़ाई एकांगी नहीं हो सकती है. चैनलों और मुख्यधारा के मीडिया के साथ-साथ एडिटर्स गिल्ड, एन.बी.ए जैसे अन्य संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बड़े और नामी चैनलों के पक्ष में बोलते हुए कश्मीर, मणिपुर, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उडीशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में छोटे चैनलों औए अख़बारों के पत्रकारों के उत्पीडन के मामलों पर चुप न रहें.

कहने की जरूरत नहीं है कि जो दूसरों की आजादी की हिफाजत नहीं कर सकता है, वह अपनी भी आजादी को नहीं बचा सकता है. अगर चैनलों पर भी यह बात सौ फीसदी लागू होती है. ऐसे में, जो चैनल और समाचार मीडिया हेमचंद्र पाण्डेय के जीवन और अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए आवाज नहीं उठा रहे हैं और कहीं न कहीं चेरुकुरी राजकुमार और हेमचन्द्र पाण्डेय की हत्या को दो माओवादियों की हत्या को स्वाभाविक मानकर चुप हैं, वे अपनी आजादी को भी खतरे में डाल रहे हैं. यह सचमुच हैरान करनेवाला है कि इस मामले में बिना किसी अपवाद के लगभग सभी बड़े चैनल और अखबार सरकार और आंध्र पुलिस के दावों पर चुप क्यों हैं? क्या उन्हें सचमुच यह विश्वास है कि आज़ाद और हेम पाण्डेय की आदिलाबाद के जंगलों में चार घंटे की मुठभेड़ के बाद मौत हुई है, जैसाकि आंध्र पुलिस दावा कर रही है?


क्या कारण है कि किसी चैनल या अखबार ने इस मुद्दे पर आंध्र पुलिस के दावों की स्वतंत्र छानबीन करने की कोशिश नहीं की? यहां तक कि सी.आर.पी.एफ पर माओवादियों के हर बड़े-छोटे हमले के बाद छत्तीसगढ़ और बंगाल के सुदूर ग्रामीण अंचलों में कैमरा लेकर दौड़ पड़नेवाले चैनलों ने मुठभेड़ स्थल तक जाने की भी जहमत नहीं उठाई. सच पूछिए तो यह किसी भी एंगल से यह घटना मानवाधिकार हनन की एक बड़ी घटना से लेकर सरकार-माओवादियों के बीच शांति प्रक्रिया को पलीता लगाने की साजिश के रूप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक खबर थी जिसकी खोजबीन जरूरी थी लेकिन चैनलों और अख़बारों ने उसे ऐसे अनदेखा किया, गोया वह कोई खबर ही नहीं है या उसे छूते ही करंट लग जायेगा. क्या यह किसी काहिली, लापरवाही और नासमझी के कारण हुआ या इसके पीछे कोई और भी गहरा कारण है?

निश्चय ही, यह काहिली, लापरवाही और नासमझी का मामला नहीं लगता है क्योंकि ऐसा होता तो एक-दो, चार-पांच चैनलों तक सीमित होता और कोई न कोई चैनल या अखबार इस मामले की गहराई से पड़ताल करने की कोशिश जरूर करता. लेकिन एक सामूहिक चुप्पी से साफ है कि मामला बहुत गहरा है और इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है. क्या इसके पीछे गहरे राजनीतिक-वैचारिक कारण नहीं हैं? कारपोरेट मीडिया के व्यवहार से साफ है कि बड़ी पूंजी के स्वामित्ववाले कारपोरेट चैनल भी माओवादियों को न सिर्फ आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं बल्कि कथित माओवादियों या कारपोरेट लूट के विरुद्ध संघर्ष कर रहे आम आदिवासियों के खिलाफ वे केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा छेड़े गए युद्ध- आपरेशन ग्रीनहंट में पुलिस और सी.आर.पी.एफ के साथ कलम और कैमरा लेकर शामिल हो गए हैं.

यह एक त्रासद सच्चाई है कि चैनल इस आत्मघाती युद्ध के निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ और सच्चे समाचारदाता के बजाय एक पार्टी बन गए हैं. यह पत्रकारिता नहीं है. यह देशभक्ति भी नहीं है. यह राष्ट्रहित भी नहीं है. इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता सच्चाई को छुपाकर या दबाने में सरकार की मदद करके देशभक्ति या राष्ट्रहित में नहीं काम कर रही है. इसके उलट सच्चाई को सामने लाकर ही वह देश को हकीकत को जानने और उसमें से कोई लोकतान्त्रिक रास्ता निकालने में मदद कर सकती है. ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं है. अगर अमेरिका में समाचार मीडिया ने बुश प्रशासन की बातों पर आँख मूंदकर भरोसा करने के बजाय सच्चाई सामने लाने की कोशिश की होती और खुद को सरकार के साथ नत्थी (एम्बेडेड) न किया होता तो अमेरिका, आज इराक और अफगानिस्तान में इस खूनी जंग में नहीं फंसा होता. मीडिया को इतिहास का यह सबक जरूर याद रखना चाहिए कि किसी भी देश और समाज का सच से बड़ा मित्र और कोई नहीं होता है और झूठ से बड़ा कोई दुश्मन नहीं होता है.

झूठ के साथ खड़ा होके मीडिया अपनी साख भी खो रहा है. सरकारें आती-जाती रहती है लेकिन मीडिया ने अपनी साख गवां दी तो उसे हासिल करना बहुत मुश्किल होता है. इसमें किसी को आपति नहीं ही सकती है कि विचार और चर्चा के कार्यक्रमों और पृष्ठों पर चैनल और समाचार मीडिया माओवादी राजनीति और विचार पर सवाल खड़े करें लेकिन खबरों में पक्ष लेने और सच्चाई को दबाने की कीमत उन्हें अपनी विश्वसनीयता चुकाकर देनी पड़ रही है. इस सच्चाई को चैनल जितनी जल्दी समझ जाएं, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उतना ही अच्छा होगा. अन्यथा झूठ का साथ देकर वे अपनी आजादी से भी समझौता कर रहे हैं. आखिर झूठ पर खड़ी आजादी कितने दिन टिकी रह सकती है?

(कथादेश, अगस्त'10)