मंगलवार, जनवरी 15, 2008

नैनो संस्कृति का आगाज...

टाटा मोटर्स की नैनो इस साल बाजार में आ जाएगी. एक अध्ययन के मुताबिक देश में 55 लाख दो-पहिया मालिक 2007 में कार खरीदने की योजना बना रहे थे. क्या मोबाइल क्रांति के बाद ऑटोमोबाइल क्रांति का आगाज होने वाला है? नैनो वह ऑटोमोबाइल क्रांति पता नहीं लाएगी या नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि पूरी दुनिया चकित है. जो एक लाख की कार और उसकी गुणवत्ता का सवाल उठा रहे थे, अब पर्यावरण और परिवहन प्रणाली के भविष्य को लेकर चिंतित हैं.

टाटा की छोटी ‘पीपुल्स कार’ नैनो ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया के कार बाजार में हलचल पैदा कर दी है. आश्चर्य, ईर्ष्या, खुशी, प्रशंसा और डर के अलग-अलग सुरों में नैनो का स्वागत किया जा रहा है.

हालांकि अभी भी अनेक ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों को टाटा की एक लखटकिया कार की कीमत को लेकर विश्वास नहीं हो रहा है. लेकिन खुद रतन टाटा का कहना है कि वे अपने वायदे को पूरा करेंगे. नैनो को बाजार में उतरने में अभी भी आठ से दस महीने और लगेंगे और इस बीच सभी की निगाहें टाटा के इस वायदे पर टिकी होंगी.

सचमुच, यह लाख टके का सवाल है कि क्या टाटा नैनो की कीमत एक लाख रुपए रख सकेंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि नैनो की सबसे बड़ी खूबी और उसका आकर्षण उसकी एक लाख रुपए की कीमत ही है. उसकी कीमत ने ही भारत सहित दुनिया भर के ऑटोमोबाइल बाजार में जबर्दस्त हलचल पैदा की है.

ऑटोमोबाइल बाजार के छोटे-बड़े सभी खिलाड़ियों के लिए एक लाख की कार एक अविश्वसनीय और लगभग असंभव सी घटना है. इसलिए टाटा के इस इंजीनियरिंग चमत्कार का ऑटोमोबाइल उद्योग पर लगभग वैसा ही असर पड़ेगा जैसा मारुति 800 ने अस्सी के दशक में डाला था.

याद रहे कि भारतीय मध्य वर्ग के लिए मारुति एक सपने और जीवनशैली के पर्याय की तरह छा गई थी. मारुति सिर्फ एक कार नहीं थी बल्कि एक खास शहरी संस्कृति का प्रतीक बन गई थी.

लेकिन 21वीं सदी पहले दशक में नैनो के आगमन के साथ ही एक नई शहरी मध्यवर्गीय संस्कृति की नींव पड़ सकती है. नैनो मारुति संस्कृति को और नीचे और व्यापक आधार दे सकती है जो अपनी कार का सपना देखते हैं.

निःसंदेह आने वाले दशक में एक नई नैनो संस्कृति के आगाज की जमीन तैयार कर सकती है. इसकी वजह यह है कि नैनो की सफलता अन्य ऑटोमोबाइल कंपनियों को न सिर्फ अपनी कीमतों को घटाने के लिए बाध्य कर सकती हैं बल्कि छोटी कार के बाजार पर टाटा के कब्जे को चुनौती देने के लिए वे भी इसी कीमत में अपनी कार ले आने की तैयारी कर सकती हैं. बजाज ने अपनी कांसेप्ट कार लाने की घोषणा करके यह संकेत दे दिया है.

असल में नैनो के बाजार में आने पर सबसे अधिक दबाव दो-पहिया वाहन निर्माता कंपनियों पर ही पड़ेगा. छोटी कारों के 90 फीसदी खरीददार दो-पहिया वाहनों के मालिक होंगे. इसलिए दो-पहिया वाहन निर्माता कंपनियों के लिए नैनो की चुनौती से निपटने का एक ही तरीका है कि वे छोटी कार के बाजार में उतरें और अपने दो-पहिया की कीमत कम करें.

यही नहीं, नैनो के जिरए टाटा ने मारुति सुजुकी को भी चुनौती दी है. छोटी और सस्ती कार के बाजार पर मारुति के एकाधिकार को चुनौती देकर टाटा ने एक ऐसी प्रतियोगिता शुरू की है जिसमें सुजुकी सहित अन्य कंपनियों को भी अपनी रणनीति पर गहराई से पुनर्विचार करना होगा.

हालांकि सुजुकी अभी मारुति की कीमतों में कटौती से इंकार कर रही है लेकिन एक बार नैनो के बाजार में आ जाने और सड़कों पर अपनी क्षमता साबित कर देने के बाद सुजुकी के पास कीमतों में कटौती के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा.

लेकिन छोटी कारों के बाजार में कीमतों में कटौती का असर अन्य सेगमेंट की कारों पर पड़ेगा या नहीं, यह कहना अभी जल्दी होगी. इसके बावजूद यह स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि नैनो की कामयाबी के बाद कार बाजार पहले की तरह नहीं रह जाएगा.

न सिर्फ कारों की मांग में भारी वृद्धि होगी बल्कि एक ऑटोमोबाइल क्रांति की शुरुआत हो जाएगी. 2006 में मारुति उद्योग-एनसीएईआर के एक बाजार अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया था कि देश में कुल 6 करोड़ दो-पहिया वाहन परिवारों में से लगभग 55 लाख परिवार 2007 तक कार खरीदने की योजना बना रहे थे. निश्चय ही 2008 के आते-आते ऐसे परिवारों की तादाद और बढ़ गई होगी जो छोटी और सस्ती कार खरीदने को बेताब होंगे.

लेकिन इस ऑटोमोबाइल क्रांति और नैनो संस्कृति की शुरुआत के साथ कई गंभीर सवाल भी जुड़े हुए हैं.

नैनो के नशे में डूबे मध्यवर्ग, मीडिया और बाजार को उन नतीजों के बारे में भी जरूर सोचना चाहिए जो इस ‘जनता कार’ के कारण आम जनता को भुगतने पड़ेंगे.

दरअसल, नैनो अपने साथ ऐसी कई चुनौतियां लेकर आ रही है जिन्हें अनदेखा करने का नतीजा आने वाली पीढ़ियों पर भारी पड़ सकता है. नैनो के साथ सबसे बड़ी चुनौती शहरी परिवहन व्यवस्था की अराजकता, सार्वजनिक परिवहन की दुर्व्यवस्था और शहरी पर्यावरण में घुलते जहर की समस्याओं से निपटने की है.

स्वयं रतन टाटा ने छोटी कारों की बढ़ती संख्या के दबाव के संदर्भ में नैनो को पर्यावरण अनुकूल बताया है. लेकिन सच यह है कि अगर नैनो दो-पहिया वाहनों की तरह बिकने लगी तो बड़े महानगरों के साथ-साथ देश के अधिकांश शहरों में सड़कों के वाहनों के चलने की जगह नहीं रह जाएगी.

अधिकांश शहरों में बिना नैनो के ही जाम और गाड़ियों की पार्किंग की समस्या नियंत्रण से बाहर हो गई है. कल्पना कीजिए कि अगले दस वर्षों में दिल्ली की सड़कों पर दस लाख नैनो कार उतर जाए तो क्या होगा? ट्रैफिक को संभालना न सिर्फ असंभव हो जाएगा बल्कि दिल्ली की सड़कों पर यात्रा एक दुःस्वप्न की तरह हो जाएगी.

इसी तरह शहरी पर्यावरण के लिए भी यह ऑटोमोबाइल क्रांति दुर्घटना साबित हो सकती है. दिल्ली समेत देश के अधिकांश शहरों में हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है. कलकत्ता स्थित चितरंजन राष्ट्रीय कैंसर शोध संस्थान के अनुसार दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण 24 फीसदी नागरिकों में क्रोमोसोम स्तर पर नुकसान और 60 प्रतिशत को फेफड़े संबंधी बीमारियां हो गई हैं.

कहने की जरूरत नहीं कि शहरी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की सबसे बड़ी दोषी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री है. अगर शहरों में कार की संख्या ऐसे ही बढ़ती रही तो शहर जीवन के नहीं मृत्यु के केंद्र बन जाएंगे.

असल में नैनो की धूम के साथ एक बड़ी त्रासदी यह भी है कि नैनो की कामयाबी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की नाकामी और उसकी दुर्व्यवस्था के साथ जुड़ी हुई है. नैनो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की कब्र पर उग रही है.

अफसोस और चिंता की बात यह है कि नैनो की सफलता के साथ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने का सवाल हमेशा के लिए हाशिए पर चला जाएगा. यह न तो शहरों के भविष्य के लिए अच्छी खबर है और न ही उन करोड़ों आम लोगों के लिए, जिन्हें आज भी 20 रुपए से कम की आय पर गुजारा करना पड़ता है.

‘पीपुल्स कार’ की सच्चाई यह है कि 50 रुपए प्रतिदिन की किस्त चुकाकर नैनो कार खरीदने का सामर्थ्य इस देश के 77 फीसदी लोगों के पास नहीं है. लेकिन विडंबना देखिए कि ‘पीपुल्स कार’ की असली कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ेगी.

1 टिप्पणी:

akhil ने कहा…

गुरू जी
बधाई। यह अच्छा माध्यम है साथ रहनॆ का।