मंगलवार, सितंबर 18, 2012

बड़ी विदेशी पूंजी को खुश करने के फेर में दूरगामी नतीजों को अनदेखा कर रही है यू.पी.ए सरकार


आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए गए ताजा फैसलों के मायने
   

यू.पी.ए सरकार जल्दी में है. उसकी घबराहट भी किसी से छुपी नहीं है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार दोहरे दबाव में है. एक ओर हर दिन घोटालों और भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में नए खुलासों से घिरी सरकार पर विपक्ष के हमले तेज हो रहे हैं, सरकार की गिरती साख और महंगाई से लेकर अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में उसकी नाकामी के कारण यू.पी.ए के सहयोगी दल बेचैन हो रहे हैं.

दूसरी ओर, देशी-विदेशी बड़ी पूंजी, कारपोरेट समूह, वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और मीडिया सरकार पर कड़े आर्थिक फैसले लेने और नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकाम रहने का आरोप लगा रहे हैं. इसी जल्दबाजी और घबराहट में उसने एक झटके में ऐसे कई बड़े और विवादस्पद आर्थिक फैसले किये हैं जिनका मकसद देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों को खुश करना और सरकार पर लग रहे “नीतिगत लकवे” (पॉलिसी पैरालिसिस) के आरोपों को धोना है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि और रसोई गैस के सब्सिडीकृत सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने से लेकर मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई), नागरिक उड्डयन क्षेत्र में ४९ प्रतिशत एफ.डी.आई के साथ विदेशी एयरलाइंस को भी निवेश की इजाजत, ब्राडकास्टिंग क्षेत्र में डी.टी.एच आदि में ७४ फीसदी एफ.डी.आई और पावर ट्रेडिंग में ४९ फीसदी एफ.डी.आई के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की चार प्रमुख कंपनियों में विनिवेश का एलान करके यू.पी.ए सरकार ने सबको चौंका दिया है.
याद रहे कि कुछ सप्ताह पहले वित्त मंत्रालय के पूर्व आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने वाशिंगटन में कहा था कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में आर्थिक सुधारों के अगले दौर को आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है और अब २०१४ के आम चुनावों के बाद नई सरकार ही इन आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा पाएगी. पिछले कुछ सप्ताहों में यू.पी.ए सरकार का राजनीतिक संकट जिस तरह से बढ़ा है और २०१४ के बजाय २०१३ में ही आम चुनाव होने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है, उसे देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों का जबरदस्त दबाव भी था.
इसी दबाव, जल्दबाजी और घबराहट में कांग्रेस नेतृत्व ने यह दाँव चला है. ऐसा लगता है कि कांग्रेस के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने यह तय किया कि अगले आम चुनावों में जाने से पहले अनुकूल माहौल बनाने के लिए देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट समूहों को खुश करना और उनका विश्वास और समर्थन हासिल करना ज्यादा जरूरी है.

आश्चर्य की बात नहीं है कि कल तक यू.पी.ए सरकार पर “नीतिगत लकवे” का आरोप लगा रहे और उसकी खुली आलोचना कर रहे बड़े कारपोरेट समूह और सी.आई.आई-फिक्की-एसोचैम जैसे बड़े औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबीइंग संगठन और गुलाबी आर्थिक अखबार और मीडिया सरकार के गुणगान में लग गए हैं. शेयर बाजार बमबम है और मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक एक झटके में ४४३ अंक चढ़ गया.

कहा जा रहा है कि बाजार में फीलगुड फैक्टर लौट आया है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया का दावा है कि इन कड़े और जरूरी आर्थिक फैसलों से सरकार की आर्थिक साख बेहतर होगी और अब विदेशी रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग को नहीं गिराएंगी. इससे पटरी से उतरती भारतीय अर्थव्यवस्था को सँभालने में मदद मिलेगी.
अहलुवालिया के बयान से साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार के ताजा आर्थिक फैसलों का मुख्य उद्देश्य देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और बाजार को खुश करना और उसके जरिये बाजार में फीलगुड का माहौल पैदा करना है. जाहिर है कि सरकार को उम्मीद इसके साथ ही सरकार के राजनीतिक मैनेजरों का आकलन है कि एक झटके में ‘चौंकाने और बोलती बंद’ (शॉक एंड आव) करनेवाले अंदाज़ में लिए गए इन फैसलों से एक ओर जहाँ राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे से भ्रष्टाचार और घोटालों जैसे नकारात्मक मुद्दों को हटाने में मदद मिलेगी, वहीं एक ही बार में कई और बड़े फैसलों के एलान से लोगों को भ्रम में डालना आसान हो जाता है.

इससे सहयोगी दलों से लेकर विपक्ष तक को संभलने का मौका नहीं मिलता है. इसके साथ ही सरकार के आर्थिक मैनेजरों को यह भी उम्मीद है कि इन फैसलों से संकट में फंसी अर्थव्यवस्था में नई चमक आ सकती है और उसका राजनीतिक फायदा सरकार को ही मिलेगा.  

उल्लेखनीय है कि चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून’१२) में जी.डी.पी की वृद्धि दर मात्र ५.५ प्रतिशत दर्ज की गई है जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह ८ फीसदी थी. इसी तरह औद्योगिक वृद्धि की दर जुलाई महीने में लगभग नगण्य ०.१ फीसदी रही. यही नहीं, पिछले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में औद्योगिक वृद्धि दर मात्र ०.१ फीसदी रही जिसका अर्थ यह है कि औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि ठहर गई है.

उधर, निर्यात में गिरावट जारी है. महंगाई काबू में नहीं आ रही है और रूपये पर दबाव बना हुआ है. नया निवेश नहीं हो रहा है और ज्यादातर प्रोजेक्ट्स रुक से गए हैं. साफ़ है कि अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है. इसका असर रोजगार पर भी दिखने लगा है. रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं और मौजूदा नौकरियों पर भी छंटनी की तलवार चलने लगी है.
लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि सब्सिडी में कटौती के जरिये वित्तीय घाटे को कम करने और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले इन फैसलों से क्या अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट दूर हो जाएगा? यह यू.पी.ए सरकार की सबसे बड़ी खुशफहमी है.

असल में, भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट की सबसे बड़ी वजह निवेश में आई गिरावट है. निवेश में गिरावट के कारण मांग पर असर पड़ा है और वृद्धि दर में गिर रही है. निवेश इसलिए नहीं बढ़ रहा है क्योंकि वैश्विक आर्थिक संकट समेत कई कारणों से देशी-विदेशी निजी पूंजी निवेश से हिचक रही है जबकि सरकार वित्तीय घाटे को कम करने के दबाव में निवेश से कन्नी काट रही है.

लेकिन अर्थव्यवस्था को मौजूदा संकट और गतिरोध से निकालने के लिए नया निवेश चाहिए खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में. मुश्किल यह है कि यू.पी.ए सरकार अभी भी अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने के लिए देशी-विदेशी निजी बड़ी पूंजी पर भरोसा कर रही है. लेकिन निजी पूंजी की मांग है कि निवेश बढ़ाने के लिए न सिर्फ ब्याज दरों में कटौती की जाए बल्कि उसे और रियायतें और छूट दी जाए.

आश्चर्य नहीं कि बड़ी निजी पूंजी को खुश करने के लिए यू.पी.ए सरकार ने पिछले कुछ दिनों में टैक्स से बचने पर रोक लगाने के लिए लाये गए ‘गार’ नियमों से लेकर पीछे से टैक्स लगाने (वोडाफोन प्रकरण) जैसे कानूनी संशोधन को ठंढे बस्ते में डालने का फैसला किया है. इसी क्रम में बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स की मांग पर अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एफ.डी.आई की इजाजत देने का फैसला भी किया गया है.
लेकिन इन सभी फैसलों खासकर अर्थव्यवस्था के अहम क्षेत्रों में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के फैसले का मतलब यह नहीं है कि इन क्षेत्रों में विदेशी कम्पनियाँ अरबों डालर लेकर दरवाजे पर खड़ी हैं और इजाजत मिलते ही निवेश शुरू कर देंगी. तथ्य यह है कि इन सभी क्षेत्रों में विदेशी निवेश बहुत हद तक वैश्विक आर्थिक माहौल पर निर्भर करेगा.

उदाहरण के लिए, उड्डयन क्षेत्र में मौजूदा हालात में जब विदेशी एयरलाइंस की भी स्थिति नाजुक है, इस बात की कम उम्मीद है कि कोई बड़ा निवेश तुरंत आएगा. आखिर अर्थव्यवस्था के जिन क्षेत्रों में बहुत पहले से विदेशी निवेश की इजाजत मिली हुई है, वहां इस समय विदेशी निवेश क्यों नहीं आ रहा है. कारण बहुत स्पष्ट है. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता और गहराते संकट के बीच बड़ी निजी पूंजी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में है.

साफ़ है कि इन फैसलों से तात्कालिक तौर पर अर्थव्यवस्था को कोई वास्तविक लाभ नहीं होने जा रहा है और न ही अर्थव्यवस्था का संकट दूर होने जा रहा है. अलबत्ता इन फैसलों से कुछ दिनों के लिए शेयर बाजार में सटोरियों को खेलने और सरकार को फीलगुड का माहौल बनाने का मौका जरूर मिल जाएगा.

इससे चौतरफा दबावों से घिरी यू.पी.ए सरकार को थोड़ा सांस लेने का अवसर भी मिल जाएगा क्योंकि वैश्विक रेटिंग एजेंसियों भारत की रेटिंग में और कटौती नहीं करेंगी. लेकिन सवाल यह है कि देश पर दूरगामी असर डालनेवाले बड़े आर्थिक फैसले क्या विदेशी रेटिंग एजेंसियों की शर्तों को पूरा और उन्हें खुश करने के लिए होंगे?
उससे भी बड़ा सवाल यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले इन फैसलों का अर्थव्यवस्था और आमलोगों पर दूरगामी असर क्या होगा? सरकार का दावा है कि इन फैसलों से किसानों और उपभोक्ताओं को फायदा होगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और आर्थिक विकास की दर को तेज करने में मदद मिलेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के इन सभी दावों में बड़े झोल हैं. उदाहरण के लिए, खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई अगर कृषि से लेकर महंगाई तक सभी मर्जों का इलाज है तो उसकी इजाजत केवल १० लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों के लिए ही क्यों दी जा रही है? उसमें सौ फीसदी एफ.डी.आई की इजाजत क्यों नहीं दी गई? उसपर कई शर्तें क्यों लगाईं गई हैं?

साफ़ है कि मनमोहन सिंह सरकार को भी मालूम है कि खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई का सीधा असर मौजूदा खुदरा व्यापारियों पर पड़ेगा और वालमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों से मुकाबले में देशी खुदरा व्यापारियों के बड़े हिस्से की छोटी और मंझोली दुकाने बंद हो जायेगी.

याद रहे कि खुदरा व्यापार क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का कृषि के बाद सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिससे सबसे अधिक लोगों की रोजी-रोटी चल रही है. लेकिन देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के दबाव में फैसले कर रही सरकार को इन नतीजों पर गौर करने का वक्त कहाँ है?

('दैनिक जागरण' के राष्ट्रीय संस्करण में 17 सितम्बर को आप-एड पृष्ठ पर प्रकाशित टिप्पणी)  

बुधवार, सितंबर 12, 2012

नव उदारवादी अर्थनीति की विकल्पहीनता ही अर्थव्यवस्था के संकट की जड़ में है

अर्थव्यवस्था के आधार को बढ़ाए और इससें गरीबों को हिस्सेदार बनाए बिना इस संकट का कोई स्थाई समाधान नहीं है
 दूसरी किस्त 
लेकिन कोई भी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक तेज रफ़्तार में नहीं दौड़ सकती है, अगर वह एक छोटे वर्ग और क्षेत्र तक सीमित है. उसे देशी-विदेशी सट्टेबाज वित्तीय पूंजी और राज्य पूंजी के स्टिमुलस के सहारे कुछ वर्षों तक तेज रफ़्तार में हांका जा सकता है, उसे किसानों और श्रमिकों के शोषण से हासिल मुनाफे से कुछ दिन और दौडाया जा सकता है लेकिन लंबी दौड़ में उसका हांफना और लडखडाना तय है.
भारतीय अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट इस अर्थ में सिर्फ तात्कालिक या बाह्य कारणों (यूरोपीय देशों और वैश्विक आर्थिक-वित्तीय संकट) से नहीं है बल्कि यह बुनियादी तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनागत सीमाओं से पैदा हुआ है. भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनागत सीमा यह है कि यह मूलतः एक अर्द्ध सामंती-अर्द्ध पूंजीवादी और अर्द्ध औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था बनी हुई है और पिछले डेढ़-दो दशकों में विदेशी पूंजी पर उसकी निर्भरता और बढ़ी है.
यही नहीं, कोढ़ में खाज की तरह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण को जोर-शोर से आगे बढ़ाया जा रहा है. ऐसे में, स्वाभाविक तौर जब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था बूम पर थी, विदेशी पूंजी भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर दौडी चली आ रही थी और वेतन आयोग से लेकर बैंक कर्जों की कृत्रिम स्टिमुलस के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनागत कमजोरियां न सिर्फ दब-छुप गईं बल्कि उसकी तेज रफ़्तार ने कुछ समय के लिए यह भ्रम पैदा कर दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था ३ फीसदी की ‘हिंदू वृद्धि दर’ से बाहर निकल आई है और उच्च वृद्धि दर के स्थाई दौर में पहुँच गई है.
हालाँकि इस बीच भी अर्थव्यवस्था को कई झटके लगे लेकिन विदेशी पूंजी के नए डोज और कृत्रिम स्टिमुलस के जरिये वह बार-बार बाहर निकल आई. लेकिन इस बार संकट चौतरफा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है और विदेशी पूंजी का प्रवाह धीमा हो गया है. यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ अमेरिकी-जापानी अर्थव्यवस्थाएं भी हांफ रही हैं.
दूसरी ओर, देश के अंदर विदेशी पूंजी के धीमे पड़ते प्रवाह और संरचनागत अंतर्विरोधों के उभर आने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था एक साथ ऊँची मुद्रास्फीति और ब्याज दर, रूपये की कीमत में तेज गिरावट, निर्यात में गिरावट और आयात में वृद्धि के कारण बढते व्यापार और चालू खाते के घाटे, गिरती औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर, नए निवेश में कमी और राजकोषीय घाटे में वृद्धि जैसी तात्कालिक कठिनाइयों में फंस गई है.

इन सब कारणों से उसकी रफ़्तार भी मंद पड़ने लगी है. लेकिन जी.डी.पी की रफ़्तार में मंदी के कारण देशी-विदेशी बड़ी पूंजी देश से बाहर निकल रही और संकट और गहरा रहा है. इस तरह अर्थव्यवस्था एक तरह के दुष्चक्र में फंसती हुई दिख रही है. रही-सही कसर इस साल मॉनसून की बारिश कम होने और सूखे की आशंकाओं ने पूरी कर दी है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्थिति चिंताजनक है. संकट दिन पर दिन गहरा रहा है. सबसे अधिक मुश्किल उन गरीबों, बेरोजगारों और श्रमिकों के लिए है जो अर्थव्यवस्था के बूम के दिनों में भी हाशिए पर थे और अब जब वह संकट में है तो उसकी असली कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ रही है.
पिछले तीन वर्षों में औद्योगिक मंदी और आर्थिक संकट के बहाने लाखों श्रमिकों की छंटनी हो चुकी है. तनख्वाहें नहीं बढ़ रही हैं. रोजगार के नए अवसर सूख से गए हैं. यही नहीं, राजकोषीय घाटा कम करने के नामपर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि से लेकर बिजली-उर्वरक आदि की कीमतों में भारी वृद्धि की जा रही है. इसके अलावा खर्चों में कटौती के नामपर उसका बोझ कल्याणकारी योजनाओं के बजट पर डाला जा रहा है.
दूसरी ओर, जिन नीतियों के कारण यह संकट आया है, उन्हीं में इसका हल ढूंढा जा रहा है. हैरानी की बात नहीं है कि यू.पी.ए सरकार इस संकट से निपटने के लिए अर्थव्यवस्था के बचे-खुचे क्षेत्रों को भी विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को और अधिक रियायतें देने की वकालत कर रही है. उसे लगता है कि इन उपायों से देशी-विदेशी निवेशकों की “एनिमल इंस्टिंक्ट” को जगाया और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है.

यही कारण है कि नए वित्त मंत्री का सबसे अधिक जोर खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर विदेशी पूंजी को अधिक से अधिक रियायतें (टैक्स से बचने पर रोक लगाने के लिए तैयार गार को स्थगित करने से लेकर वोडाफोन पर टैक्स माफ करने तक) देने पर है.

लेकिन क्या इससे अर्थव्यवस्था का संकट खत्म हो जाएगा? बिलकुल नहीं. संकट कुछ समय के लिए टल सकता है लेकिन खत्म नहीं होगा. हालिया अनुभवों से साफ़ है कि इन फैसलों से भले ही कुछ दिन के लिए जी.डी.पी में एक बार फिर कृत्रिम छलांग दिखे लेकिन जल्दी ही संकट वापस लौट आएगा क्योंकि अर्थव्यवस्था के आधार को बढ़ाए और इससें गरीबों को हिस्सेदार बनाए बिना इस संकट का कोई स्थाई समाधान नहीं है.
कहने की जरूरत नहीं है कि संकट के समाधान के लिए सबसे पहले नव उदारवादी आर्थिक नीतियों से परे देखना होगा. लेकिन क्या इसके लिए यू.पी.ए सरकार तैयार है? अफसोस की बात यह है कि विपक्ष खासकर सत्ता की दावेदारी कर रही एन.डी.ए के पास भी इन नव उदारवादी नीतियों का कोई विकल्प नहीं है.
क्या अब भी कहना पड़ेगा कि यह विकल्पहीनता ही अर्थव्यवस्था के संकट की जड़ में है?


('सामयिक वार्ता' के सितम्बर अंक में प्रकाशित लेख की पहली किस्त) 

सोमवार, सितंबर 10, 2012

संकट में भारतीय अर्थव्यवस्था : लेकिन यह संकट किसका है?

अर्थव्यवस्था जब कुलांचे भर रही थी, तब भी आम आदमी का हाल बुरा था 

पहली किस्त

भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट गहराता जा रहा है. यह संकट कई रूपों में दिखाई पड़ रहा है. लेकिन सरकार और गुलाबी अखबार आर्थिक विकास दर यानी जी.डी.पी की वृद्धि दर में आ रही गिरावट से सबसे ज्यादा चिंतित और परेशान हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि जब तक जी.डी.पी की वृद्धि दर ८ और ९ फीसदी से ऊपर चल रही थी, सरकार से लेकर शेयर बाजार तक और देशी-विदेशी निवेशकों/कार्पोरेट्स से लेकर विश्व बैंक-मुद्रा कोष, मूडीज और स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स जैसी देशी-विदेशी संस्थाओं तक सभी सातवें आसमान पर थे.
हर ओर बूम और जश्न का माहौल था, जी.डी.पी को दोहरे अंकों में ले जाने के दावे थे और गुलाबी कारपोरेट मीडिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की कामयाबियों और आर्थिक महाशक्ति बनने की संभावनाओं की सुर्खियाँ छाई हुई थीं.
लेकिन पिछले डेढ़ साल में इन सबका सुर बदल चुका है. कहा जा रहा है कि ‘भारत की कहानी’ (इंडिया स्टोरी) खत्म हो चुकी है. कारण, पिछले वित्तीय वर्ष २०११-१२ में आर्थिक विकास यानी सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी) की वृद्धि दर में तेज गिरावट दर्ज की गई है. उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष २०११-१२ में जी.डी.पी की वृद्धि दर ६.५ फीसदी रही जोकि उसके पिछले साल (२०१०-११) की उच्च जी.डी.पी वृद्धि दर ८.४ फीसदी से लगभग २ फीसदी कम है.

सबसे ज्यादा चिंता इस बात पर जताई जा रही है कि पिछले वित्तीय वर्ष की चौथी और आखिरी तिमाही में जी.डी.पी की वृद्धि दर लुढककर मात्र ५.३ फीसदी रह गई जोकि पिछले नौ वर्षों में अर्थव्यवस्था का सबसे खराब प्रदर्शन है.

यही नहीं, चालू वित्तीय वर्ष २०१२-१३ की पहली तिमाही (अप्रैल-जून’१२) के जी.डी.पी के आंकड़े नहीं आए हैं लेकिन इस दौरान औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर के नकारात्मक रहने और दूसरे सूचकांकों के लचर प्रदर्शन को देखते हुए आशंका यह है कि इस तिमाही में जी.डी.पी में वृद्धि दर ५ से ६ फीसदी के बीच रहेगी.
इसके बावजूद प्रधानमंत्री और उनकी सलाहकार परिषद को लगता है कि इस साल जी.डी.पी की वृद्धि दर पिछले साल की तुलना में बेहतर रहेगी. लेकिन अर्थव्यवस्था की मौजूदा ढीली हालत खासकर यूरोपीय और वैश्विक आर्थिक संकट, देश में सूखे और बढ़ती मुद्रास्फीति-ब्याज दरों आदि के कारण अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी की वृद्धि दर में और गिरावट दर्ज की जाएगी और यह ५.५० से ६ फीसदी के बीच रहेगी.
यहाँ तक कि रिजर्व बैंक ने भी जी.डी.पी वृद्धि का अनुमान घटाकर ६ फीसदी कर दिया है. इन अनुमानों के मद्देनजर कई विदेशी रेटिंग एजेंसियों जैसे मूडीज, स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स और फिच ने यू.पी.ए सरकार को “नीतिगत लकवे” का शिकार बताते हुए भारत में निवेश सम्बन्धी रेटिंग में कटौती करके उसे नकारात्मक श्रेणी में डाल दी है और चेतावनी दी है कि अगर अगले कुछ महीनों में इसमें सुधार नहीं हुआ तो भारत की रेटिंग को जंक यानी निवेश के लायक नहीं श्रेणी में डाल दिया जायेगा.

इसके बाद से सरकार के अंदर और बाहर कारपोरेट समूहों और उनके लाबी संगठनों में हडकंप और घबराहट का माहौल है. ऐसा लगता है जैसे जी.डी.पी की वृद्धि दर में ८ या ९ फीसदी से गिरावट के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ जाएगा और सब कुछ खत्म हो जाएगा.           

यह ठीक है कि आज अर्थव्यवस्था संकट में है. लेकिन सवाल यह है कि क्या जब अर्थव्यवस्था आठवें या नवें आसमान पर चढ़ी हुई थी, उस समय कोई संकट नहीं था और सब कुछ अच्छा चल रहा था?
याद रहे कि जी.डी.पी की वृद्धि दर २००५-०६ से लेकर ०७-०८ तक तीन वर्षों तक ९ फीसदी से ऊपर रही लेकिन अमेरिका में सब प्राइम संकट के बाद आई वैश्विक मंदी के दौरान २००८-०९ में यह गिरकर ६.७ फीसदी रह गई. लेकिन यू.पी.ए सरकार द्वारा घोषित ‘स्टिमुलस पैकेज’ और २००९ के आम चुनावों से पहले की चुनावी तोहफों से अर्थव्यवस्था ने फिर रफ़्तार पकड़ी और २००९-१० और १०-११ में जी.डी.पी की रफ़्तार फिर उछलकर ८.४ फीसदी तक पहुँच गई.
कहने की जरूरत नहीं है कि उस समय हर ओर “इंडिया स्टोरी” की चर्चा हो रही थी. शेयर बाजार से लेकर देशी-विदेशी निवेशक तक और रेटिंग एजेंसियों से लेकर गुलाबी अखबारों तक सब बम-बम थे. लेकिन क्या अर्थव्यवस्था के साथ सब अच्छा चल रहा था और कोई संकट नहीं था?

सच यह है कि संकट उस समय भी था लेकिन वह संकट की मार सिर्फ आम आदमी यानी गरीबों, बेरोजगारों, बीमारों, भूखमरी के शिकार लोगों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर पड़ रही थी. अर्थव्यवस्था जी.डी.पी की कसौटी पर जरूर अच्छा कर रही थी और उसका फायदा भी मुट्ठी भर देशी-विदेशी कार्पोरेट्स, निवेशकों, अमीरों, उच्च मध्यवर्ग और मध्य वर्ग के एक हिस्से को मिल रहा था लेकिन आम लोगों का हाल बुरा था.

इसकी वजह यह है कि एक तो जी.डी.पी आधारित यह आर्थिक विकास का यह नव उदारवादी माडल कुछ खास क्षेत्रों और वर्गों तक सीमित था और दूसरे, आर्थिक विकास की प्रक्रिया विषमतापूर्ण और गैर बराबरी को बढ़ानेवाली थी. इस कारण इस आर्थिक विकास में आम लोगों की हिस्सेदारी नहीं थी. उल्टे इसके लिए उन्हें कीमत चुकानी पड़ रही थी.
उदाहरण के लिए, जब अर्थव्यवस्था जब तेज रफ़्तार से कुलांचे भर रही थी, उस समय रोजगार की वृद्धि दर कछुए की चाल से सरक रही थी. एन.एस.एस.ओ के ताजा ६६ वें दौर के सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष २००४-०५ से ०९-१० के बीच सिर्फ १० लाख नए रोजगार के अवसर पैदा हुए जबकि सरकार का दावा हर साल ५० लाख रोजगार के नए अवसर पैदा करने का था.
दूसरी ओर, समावेशी विकास के दावों के बीच देश में गैर बराबरी भी तेजी से बढ़ रही है. हालाँकि यह देखने-समझने के लिए आंकड़ों और सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है कि ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीबों और अमीरों के बीच खाई कितनी तेजी से बढ़ रही है लेकिन खुद सरकारी आंकड़े भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं.

हाल ही में जारी एन.एस.एस.ओ के ६८ वें दौर (२०११-१२) के उपभोग व्यय सर्वेक्षण के नतीजों के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अमीर दस फीसदी लोगों और सबसे गरीब दस फीसदी लोगों की आय के बीच का अनुपात २००४-५ के ४.९ से बढ़कर ६.९ हो गया है जबकि शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक आय वाले दस फीसदी लोगों और सबसे कम आय वाले दस फीसदी लोगों की आय का अनुपात २००४-०५ के ८.४ से बढ़कर १०.९ हो गया है.

साफ़ है कि तेज आर्थिक विकास के बावजूद उससे निकलनेवाली समृद्धि में आमलोगों को उनका वास्तविक देय नहीं मिल रहा है. यह समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है कि जब जी.डी.पी की तीव्र वृद्धि दर के बावजूद रोजगार में बहुत नगण्य वृद्धि हो रही है तो ऐसे “रोजगारविहीन विकास” के बीच गैर बराबरी नहीं तो और क्या बढ़ेगी?
हैरानी की बात नहीं है कि इसी दौर में आसमान छूती महंगाई खासकर खाद्य पदार्थों की महंगाई ने गरीबों का जीना दूभर कर दिया है. याद रहे कि इस तरह की महंगाई गरीबों पर दोहरे टैक्स की तरह है. लेकिन जले पर नमक छिड़कने की तरह यू.पी.ए सरकार का दावा है कि यह महंगाई इसलिए बढ़ी है क्योंकि किसानों को उनकी उपज की अधिक कीमत दी जा रही है और ग्रामीण गरीबों की आय में मनरेगा के कारण इजाफा हुआ है.
लेकिन तथ्य यह है कि देश में हर महीने ७० किसान आत्महत्या कर रहे हैं. खुद सरकार द्वारा दी गई सूचना के मुताबिक, वर्ष २००८ से २०११ के बीच ३३३४ किसानों ने आत्महत्या की है. आरटीआई के तहत कृषि मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, इन तीन सालों में सबसे अधिक महाराष्ट्र में 1,862 किसानों ने आत्महत्या की जबकि आंध्रप्रदेश में 1,065, कर्नाटक में 371 किसानों ने आत्महत्या की. इस दौरान में पंजाब में 31 किसानों ने आत्महत्या की जबकि केरल में 11 किसानों ने कर्ज से तंग आ कर मौत को गले लगाया.

आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार, देश भर में सबसे अधिक किसानों ने सूदखोरों से कर्ज लिया है. देश में किसानों के 1,25,000 परिवारों के सूदखोरों एवं महाजनों से कर्ज लिया है जबकि 53,902 किसान परिवारों ने व्यापारियों से कर्ज लिया. बैंकों से 1,17,100 किसान परिवारों ने कर्ज लिया जबकि कोओपरेटिव सोसाइटी से किसानों के 1,14,785 परिवारों ने कर्ज लिया.
साफ़ है कि किसानों को अगर ऊँची कीमतें मिल रही होतीं तो उन्हें आत्महत्या करने की नौबत नहीं आती. लेकिन जाहिर है कि गुलाबी अखबारों और रेटिंग एजेंसियों के लिए यह अर्थव्यवस्था का संकट नहीं है. उन्हें इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि जी.डी.पी की तेज रफ़्तार के बावजूद रोजगार वृद्धि की दर नगण्य है और देश में गैर बराबरी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है. उन्हें यह संकट नहीं लगता है.
कहने की जरूरत नहीं है कि जी.डी.पी की ऊँची दर को भारत की सभी समस्याओं का इलाज बतानेवाले नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों को यह भी अर्थव्यवस्था का संकट नहीं लगता है कि जी.डी.पी की रफ़्तार तेज करने के नाम पर इन वर्षों में जिस तरह से सार्वजनिक संसाधनों- जल-जंगल-जमीन और खनिजों की लूट हुई है और सेज जैसी विकास योजनाओं के जरिये गरीब किसान-आदिवासियों को उनकी जमीनों और जंगलों से बेदखल किया गया है, उसके कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, अपनी आजीविका के साधनों से वंचित हो गए हैं और उन इलाकों का पर्यावरण तबाह हो गया है.

जारी ........ 


('सामयिक वार्ता' के सितम्बर अंक में प्रकाशित लेख की पहली किस्त)

शुक्रवार, सितंबर 07, 2012

साउंडबाईट पत्रकारिता की सीमाएं

राजनीति का असली अखाडा बन है टी.वी का पर्दा

कोयला खदानों के आवंटन में धांधली पर सी.ए.जी की रिपोर्ट और उसपर संसद में मचे हंगामे के बाद से देश भर में कोयला घोटाला न्यूज मीडिया की सुर्ख़ियों में है. इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग पर अड़े विपक्ष ने संसद के मॉनसून सत्र को ठप्प कर दिया.
नतीजा, इस मुद्दे पर बहस का मंच संसद के बजाय न्यूज चैनलों के स्टूडियो हो गया और वहीं कांग्रेस और भाजपा के नेता और मंत्री ‘तू-तू-मैं-मैं’ और एक-दूसरे को नंगा करते नजर आने लगे. इसमें कोई नई बात नहीं है. संसद चले या नहीं, संसद सत्र हो या नहीं लेकिन चैनलों पर बिला नागा इस या उस मुद्दे पर बहस से लेकर महाबहस चलती रहती है.
ऐसा लगता है जैसे चैनलों के स्टूडियो ने संसद की जगह ले ली है. यह भारतीय राजनीति के सम्पूर्ण टीवीकरण का एक और उदाहरण है. सच पूछिए तो राजनीति टी.वी के जरिये ही हो रही है. राजनेता और राजनीतिक पार्टियां टी.वी को ध्यान में रखकर राजनीतिक आयोजन और पहलकदमियां लेने लगी हैं.

टी.वी का पर्दा राजनीति का असली अखाडा बन है. टी.वी पर ही शह और मात होने लगी है. २४ घंटों के न्यूज चैनलों के कारण राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों का संवेदी सूचकांक (पोल्सेक्स) घंटे-घंटे में चढ़ने-उतरने लगा है. प्रधानमंत्री संसद में बयान नहीं दे पाते तो वे टी.वी के कैमरों पर बोलते हैं. उसका जवाब तुरंत विपक्ष के नेता देते हैं. सब कुछ लाइव है. राजनीति लाइव हो चुकी है.

सचमुच, न्यूज चैनलों ने भारतीय राजनीति को बदल दिया है. चैनलों के कारण भारतीय राजनीति ज्यादा गतिशील और त्वरित हुई है और एक हद तक जवाबदेह और पारदर्शी भी हुई है लेकिन इससे कहीं ज्यादा उसमें ड्रामे का महत्व बढ़ा है, तर्क और तथ्य की जगह वाक्पटुता या कहें कि गले की ताकत और प्रदर्शन क्षमता ने ले ली है और बहस का मतलब शोर-शराबा होता जा रहा है.
इन सबके बीच राजनीतिक पत्रकारिता का ‘चाल-चरित्र-चेहरा’ काफी बदल सा गया है और वह चाहे-अनचाहे साउंडबाईट और पी.आर पत्रकारिता में बदलती जा रही है. यही नहीं, साउंडबाईट, लाइव और स्टूडियो बहस के बीच फाइलों-दस्तावेजों और स्रोतों पर आधारित खोजी पत्रकारिता तो जैसे अतीत की बात हो गई है.
कोयला घोटाले को ही लीजिए. इस मुद्दे पर चैनलों ने दिनों-घंटों का एयर टाइम खर्च किया है, खूब हंगामी बहसें हुई हैं, लाइव प्रेस कांफ्रेंसों में आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं लेकिन इन सबके शोर-शराबे के बीच स्पष्टता कम और भ्रम (कन्फ्यूजन) ज्यादा बढ़ गया है.

कोयला आवंटन पर सी.ए.जी की रिपोर्ट, विपक्ष के आरोपों, सरकार के बचाव और सिविल सोसायटी की ओर से दोनों पर लगाये आरोपों ने भारी कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है. इसके कारण राष्ट्रीय राजनीति में भी भारी कन्फ्यूजन का माहौल है. दर्शक हैरान हैं. लेकिन न्यूज चैनल इस कन्फ्यूजन को दूर करने के बजाय और बढ़ाने में लगे हुए हैं.

असल में, चैनलों पर छा गए साउंडबाईट पत्रकारिता की यह सबसे बड़ी विफलता है. वह राष्ट्रीय राजनीति की मौजूदा गुत्थियों को सुलझाने और सच्चाई को सामने लाने में नाकाम रहे हैं क्योंकि उनसे यह अपेक्षा थी और है कि वे कोयला घोटाले की बारीकियां को खोलेंगे, उसकी स्वतंत्र पड़ताल करेंगे, उसे एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखेंगे और दर्शकों के लिए उसके मायने बतलायेंगे.
उदाहरण के लिए, जिन ५७ कोयला ब्लाकों का आवंटन हुआ है, उसकी लाभार्थी कम्पनियाँ कौन सी हैं, उनकी किस योग्यता पर यह आवंटन हुआ, उसका उन्हें क्या फायदा हुआ, वे कोयले की खुदाई क्यों नहीं शुरू कर पाईं और विभिन्न राज्य सरकारों की इसमें क्या भूमिका रही है?
ये कुछ सवाल हैं लेकिन ऐसे बहुतेरे सवाल है जिनका उत्तर मिलना अभी बाकी है. लेकिन चैनलों की ‘आरामतलब पत्रकारिता’ पार्टी कार्यालयों की साउंडबाईट और स्टूडियो बहसों से बाहर निकलने और मेहनत करने के लिए तैयार नहीं दिख रही है.

इसके कारण देश की बेशकीमती प्राकृतिक सम्पदा के लूटखसोट पर राजनीति तो बहुत हो रही है लेकिन अफसोस की बात यह है कि साउंडबाईट के बढते शोर में चोर को भाग निकलने का मौका मिल जा रहा है.

('तहलका' के 15 सितम्बर अंक में प्रकाशित स्तम्भ) 

सोमवार, सितंबर 03, 2012

क्यों डरती हैं सरकारें सोशल मीडिया से

सोशल मीडिया दुधारी तलवार है लेकिन ताकतवर लोग उसकी चुनौती से घबराए हुए हैं  
 

सोशल मीडिया एक बार फिर सुर्ख़ियों में है. हालांकि इस बार वह अच्छे कारणों से सुर्ख़ियों में नहीं है. उसपर आरोप है कि कुछ सांप्रदायिक संगठनों और समूहों के अलावा निहित स्वार्थी तत्व सांप्रदायिक नफ़रत और अफवाहें फैलाने, लोगों को सांप्रदायिक आधार पर भड़काने और प्रवासी समुदायों को डराने के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं.
इन आरोपों में कुछ हद तक सच्चाई भी है. पिछले कुछ सप्ताहों में खासकर असम में साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा भडकने के बाद से सोशल मीडिया सांप्रदायिक नफरत अभियान का नया मंच बन गया है. असम और म्यांमार की हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर दिखानेवाली कुछ वास्तविक और ज्यादातर फर्जी और गढ़ी हुई तस्वीरों, वीडियो और भडकाऊ संदेशों ने सोशल मीडिया के जरिये देश में सांप्रदायिक तापमान बढ़ा दिया है.
यू.पी.ए सरकार को जैसे इसी का इंतज़ार था. उसने देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और भय-पलायन के लिए सोशल मीडिया को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे कठघरे में खड़ा करने और उसपर पाबंदी लगाने की बातें दोहरानी शुरू कर दीं. सरकार को मुख्यधारा के मीडिया के एक हिस्से के अलावा विश्लेषकों-बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से का भी समर्थन मिल रहा है.

लेकिन क्या देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव, अफवाहों और नफ़रत के लिए केवल सोशल मीडिया को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या अगर सोशल मीडिया पर पाबन्दी लगा दी जाए तो देश और समाज से साम्प्रदायिकता खत्म हो जायेगी और सांप्रदायिक कुप्रचार, अफवाहें और नफ़रत फैलानेवाले सन्देश बंद हो जायेंगे?

सच यह है कि सोशल मीडिया सिर्फ एक प्लेटफार्म या माध्यम है जिसका इस्तेमाल सांप्रदायिक और निहित स्वार्थी तत्व अपने संकीर्ण मकसद को पूरा करने के लिए कर रहे हैं. सीधी बात यह है कि अगर देश और समाज में सांप्रदायिक और घृणा फैलानेवाली शक्तियां हैं तो एक सामाजिक माध्यम या प्लेटफार्म होने के कारण वे शक्तियां भी वहां होंगी और वे उसकी ताकत और पहुँच का दुरुपयोग भी करेंगी.
लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि सोशल मीडिया पर ऐसे धर्मनिरपेक्ष संगठनों, समूहों और व्यक्तियों की संख्या भी अच्छी-खासी है जो साम्प्रदायिक अफवाहों और नफ़रत फैलानेवाले अभियान का जवाब दे रही हैं और लोगों को जागरूक करने और उनमें भरोसा पैदा करने की कोशिश कर रही हैं.
यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत और खूबी है. अगर उसपर सांप्रदायिक और कठमुल्ले तत्व हैं जो लोगों के बीच नफ़रत फ़ैलाने में जुटे हैं तो दूसरी ओर, उसपर ऐसे समूह और व्यक्ति भी सक्रिय हैं जो सांप्रदायिक तत्वों और कठमुल्लों की पोल खोलने और लोगों को सावधान, सजग और एकजुट करने में लगे हैं.

सच पूछिए तो भारतीय सन्दर्भों में सोशल मीडिया और कुछ नहीं बल्कि देश के मुख्यतः शहरी और कुछ हद तक कस्बाई समाज का एक लघु रूप है. जैसे शहरी भारतीय समाज में विभिन्न तरह की सामाजिक-राजनीतिक शक्तियां मौजूद हैं, उसी तरह सोशल मीडिया पर भी उनके प्रतिनिधि सक्रिय हैं और इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल अपने-अपने हितों- गलत या सही को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं.

लेकिन इसके लिए मीडिया या प्लेटफार्म को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. असल में, सोशल मीडिया (फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर आदि) पारंपरिक मीडिया (अखबार, टी.वी, रेडियो आदि) से बुनियादी तौर पर अलग है. असल में, सोशल मीडिया वास्तव में सोशल यानी सामाजिक मीडिया है. इसका कोई भी सदस्य बन सकता है और इसके सदस्य एक दूसरे के मित्र और अनुगामी (फालोवर) बन सकते हैं.
इस तरह एक दूसरे के संदेशों/विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं. इसमें संदेशों/विचारों का आदान-प्रदान काफी हद तक बराबरी के स्तर पर होता है और संचालकों की ओर से किसी तरह की कोई बंदिश/पाबंदी या सेंसरशिप नहीं होने के कारण इसके सदस्य खुलकर अपनी राय जाहिर और शेयर करते हैं.
इस मायने में सोशल मीडिया एक ऐसे खुले पार्क की तरह है जहाँ समाज के सभी लोग घूमने-टहलने और अपने सरोकारों को साझा करने आते हैं. उसकी यह लोकतांत्रिकता उसकी सबसे बड़ी ताकत है. इसके उलट पारंपरिक मीडिया में उसके संचालक/गेटकीपर तय करते हैं कि उसमें क्या बताया//दिखाया/सुनाया जाएगा. यह एकतरफा संचार है जिसमें अखबार/टी.वी चैनल/रेडियो के पाठकों/दर्शकों/श्रोताओं के पास तुरंत अपनी राय जाहिर करने और उसे अन्य पाठकों/दर्शकों/श्रोताओं से साझा करने की सुविधा नहीं होती है.

लेकिन इसके विपरीत सोशल मीडिया में उसका हर सदस्य अपने साथियों/मित्रों/फालोवर के साथ तत्काल और निरंतर विचारों/सूचनाओं का साझा और अंतर्क्रिया कर सकता है. जाहिर है कि इसने लोगों को उनकी आवाज़ और उसे खुलकर अभिव्यक्त करने का मंच प्रदान किया है और इस तरह उनका सशक्तिकरण किया है.

यही नहीं, सूचनाओं के आदान-प्रदान का उन्मुक्त और तुरंत प्रवाह उसे वाइरल भी बनाता है जिसका मतलब यह है कि किसी सूचना या विचार को एक से दूसरे और फिर तीसरे और चौथे और आगे तक पहुँचने में कुछ सेकेंडों/मिनटों का समय लगता है. हैरानी की बात नहीं है कि सोशल मीडिया पर बहुतेरे सन्देश/वीडियो/फोटो/गाने आदि रातों-रात लोकप्रिय हो जाते हैं.
यही नहीं, उसने पारंपरिक मीडिया को भी उसकी गलतियों को उजागर करके ज्यादा जिम्मेदार बनाया है. इसके अलावा एक कम खर्चीले, सहज सुलभ, बाहरी नियंत्रण से मुक्त और व्यापक प्रसार वाले माध्यम के बतौर सोशल का उपयोग जन-आंदोलनकारी/सिविल सोसायटी संगठनों/समूहों ने भी लोगों को विभिन्न मुद्दों पर जागरूक और गोलबंद करने में किया है.
कहने की जरूरत नहीं है कि अरब वसंत से लेकर भारत में अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और अमेरिका समेत कई विकसित देशों में आक्युपाई वाल स्ट्रीट जैसे आन्दोलनों/विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने में आयोजकों ने सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल किया और सफल रहे. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि सोशल मीडिया उन देशों की सरकारों और कंपनियों और दूसरी ताकतवर शक्तियों के नियंत्रण से अभी बाहर है.

सच पूछिए तो सोशल मीडिया से सरकारों के डर और उसे नियंत्रित करने की कोशिश की सबसे बड़ी वजह उसकी लोगों को जागरूक, गोलबंद और आंदोलित करने की उसकी ताकत है. असल में, सोशल मीडिया की यह आज़ादी, उसका खुलापन और साझेदारी का लोकतंत्र उसे पारंपरिक माध्यमों की तुलना में ज्यादा प्रभावी, आकर्षक और लोकप्रिय बनाता है.

इसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी है कि जिस दौर में पारंपरिक माध्यम विभिन्न कारणों (खासकर बड़ी पूंजी और कारपोरेट नियंत्रण) से साख के संकट का सामना कर रहे हैं, उसमें सोशल मीडिया पर कही गई बातों/विचारों की साख कहीं ज्यादा है क्योंकि कहने-सुनने वाले एक-दूसरे के परिचित हैं और उनका एक-दुआसरे पर ज्यादा भरोसा है.
दूसरे, अगर उसपर कोई गलत या आधी-अधूरी सूचना शेयर की जाएगी तो उसे देखने/पढ़ने वाले सैकड़ों/हजारों/लाखों लोगों में से कोई न कोई पकड़ लेगा और सच सामने आ जाएगा लेकिन पारंपरिक माध्यमों में उसके सुधरने में काफी समय लग जाता है. इस तरह सोशल मीडिया में तत्काल फीडबैक के कारण गलतियों/भूलों के सुधार की सम्भावना काफी ज्यादा रहती है.
यही नहीं, अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर सदस्यों को यह अधिकार है कि वे ऐसे सदस्यों को अपनी मित्र सूची से बाहर और उन्हें अपने सन्देश/विचार देखने/पढ़ने से रोक सकते हैं जो अनुचित व्यवहार कर रहे हैं या आपत्तिजनक विचार प्रकट कर रहे हैं.

इसी तरह फेसबुक पर कोई भी सदस्य किसी सन्देश के आपत्तिजनक/गाली-गलौज/भडकाऊ होने की शिकायत कर सकता है और उसे हटाने में फेसबुक की मदद कर सकता है. इस तरह सोशल मीडिया में स्व-नियमन की प्रक्रिया मौजूद है. एक लोकतान्त्रिक माध्यम के नियमन के लिए स्व-नियमन से ज्यादा बेहतर और प्रभावी तरीका नहीं हो सकता है.   

यह ठीक है कि इस स्व-नियमन की प्रक्रिया से कम सदस्य परिचित हैं या वे इसका सक्रियता से इस्तेमाल नहीं करते हैं या उसके प्रति एक उदासीन रवैया अपनाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए सरकार या उनकी स्वामी कंपनियों को कंटेंट की सेंसरशिप करने की इजाजत दी जाए.
अगर ऐसा हुआ तो पारंपरिक मीडिया की तुलना में ज्यादा स्वतंत्र, लोकतान्त्रिक और विश्वसनीय माध्यम के बतौर सोशल मीडिया की साख खत्म हो जायेगी. याद रहे कि उसकी सबसे बड़ी ताकत सूचनाओं/विचारों का खुला, स्वतंत्र और मुक्त प्रवाह है जिसमें पारंपरिक मीडिया की तरह संदेशदाताओं के बीच स्तरीकरण नहीं बल्कि बराबरी का संबंध है.
दरअसल, आज जरूरत यह है कि लोगों को सोशल मीडिया के बारे में ज्यादा जागरूक करने और शिक्षित करने की है. दूसरे, उसके इस्तेमाल करनेवालों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी और संदेशों/विचारों का प्रवाह बढ़ेगा, उसके साथ उसके इस्तेमाल के स्वतः विकसित तौर-तरीके और सामाजिक नियम भी विकसित होंगे. इससे सोशल मीडिया में कंटेंट की साझेदारी में जिम्मेदारी का बोध भी विकसित होगा.

लेकिन अगर उसे जिम्मेदार बनाने के नामपर सरकार या कोई दूसरी एजेंसी उसे नियंत्रित करने और उसपर सेंसरशिप थोपने की कोशिश करती है तो यह सरकारी और कारपोरेट नियंत्रण से मुक्त, लोकतान्त्रिक, विविधतापूर्ण और वैकल्पिक मीडिया प्लेटफार्म के बतौर उभरते सोशल मीडिया की अकाल मृत्यु का एलान होगा.

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप परिशिष्ट में 1 सितम्बर को प्रकाशित टिप्पणी का असंपादित और पूर्ण अंश)