सोमवार, जनवरी 02, 2012

२०११ में अर्थव्यवस्था:लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और लाल बुझक्कड़ सरकार

लेकिन नव उदारवादी सुधारों के प्रति व्यामोह से स्थिति और बिगड़ रही है  

 पहली किस्त

उम्मीदों के विपरीत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह साल कोई खास अच्छा नहीं रहा. अर्थव्यवस्था के लिए इस साल की शुरुआत उम्मीदों के साथ हुई लेकिन साल का मध्य आते-आते अर्थव्यवस्था को जैसे झटके लगने लगे, उससे यह साफ़ होने लगा कि स्थिति कोई खास बेहतर नहीं रहनेवाली है.

अमेरिका से लेकर यूरोप तक में गहराते आर्थिक और वित्तीय संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट के बादलों से यह स्पष्ट हो चुका था कि हालात बद से बदतर होनेवाले हैं. डी-कपलिंग के तमाम दावों के बावजूद २००८ की अमेरिकी मंदी के अनुभव से यह साफ़ हो चुका था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की दोबारा डावांडोल होती स्थिति के प्रभाव से भारतीय अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रहनेवाली है.

रही-सही कसर देश के अंदर भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों से घिरी और अपने ही अंतर्विरोधों में फंसी यू.पी.ए सरकार के अनिर्णय और नव उदारवादी सुधारों के प्रति व्यामोह ने पूरी कर दी. नतीजा, साल के खत्म होते-होते अर्थव्यवस्था को लेकर एक गहरी निराशा का माहौल बन गया है.

अर्थव्यवस्था से आ रहे अधिकांश संकेत इस निराशा को गहरी कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जी.डी.पी की वृद्धि दर गिरकर ६.९ प्रतिशत रह गई है जो पिछले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था का सबसे खराब प्रदर्शन है.

हालांकि अमेरिका से लेकर यूरोप तक दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में यह फिर भी बेहतर प्रदर्शन है लेकिन अगर साल की शुरुआत खासकर फ़रवरी में पेश बजट में इस साल जी.डी.पी के ८.७५ प्रतिशत रहने के अनुमान से इसकी तुलना करें तो साफ़ है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति कमजोर हुई है.

यही नहीं, साल की शुरुआत में वित्त मंत्री से लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों तक सभी इतने अपबीट थे कि जी.डी.पी के नौ प्रतिशत तक पहुँचने के दावे किये जा रहे थे. लेकिन अब हालत यह है कि खुद वित्त मंत्री चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी के ७.५ फीसदी रहने की उम्मीद जता रहे हैं.

लेकिन अर्थव्यवस्था के अधिकांश स्वतंत्र विश्लेषकों की राय है कि वित्त मंत्री के भाग्य अच्छे हुए तो वृद्धि दर ६.५ फीसदी से ७ फीसदी के बीच रह सकती है. अन्यथा स्थिति और भी बदतर हो सकती है. इसके संकेत भी मिल रहे हैं. जैसे औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर फिसलकर अक्टूबर में नकारात्मक – ५.१ प्रतिशत हो गई है.

पिछले २८ महीनों में औद्योगिक क्षेत्र का यह सबसे बदतर प्रदर्शन है. इसका सीधा असर शेयर बाजार के संवेदी सूचकांक- सेंसेक्स पर भी दिखाई पड़ रहा है जो पिछले साल की तुलना में इस साल कोई २३ फीसदी नीचे लुढ़क चुका है.

यही नहीं, डालर के मुकाबले रूपये की कीमत में भी अच्छी-खासी लगभग १५ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. तथ्य यह है कि एशिया की अन्य मुद्राओं की तुलना में रूपये का प्रदर्शन सबसे बदतर है. रूपये की कीमत में गिरावट की एक बड़ी वजह यह है कि विदेशी निवेशक बाजार से डालर निकाल रहे हैं और नया विदेशी निवेश नहीं आ रहा है.

इससे रूपये पर दबाव बढ़ा है. कई बाजार विश्लेषकों का मानना है कि रूपये की कीमत में आई तेज गिरावट इस बात का सबूत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्वास कमजोर हुआ है.

लेकिन दूसरी ओर सरकार का दावा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोरियों और समस्याओं के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हुई है पर चिंता की कोई बात नहीं है. अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधारतत्व (फंडामेंटल्स) मजबूत हैं और जल्दी ही अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ जायेगी और तेज रफ़्तार से दौड़ने लगेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के दावे में एक तरह की निश्चिन्तता और खुशफहमी दिखती है जबकि बाजार विश्लेषकों के आकलन में जरूरत से ज्यादा घबराहट और निराशा दिखाई पड़ती है.

सच्चाई इन दोनों से अलग है. निश्चय ही, मौजूदा वैश्विक और घरेलू माहौल में ६.५ से लेकर ७ फीसदी की जी.डी.पी वृद्धि दर भी पर्याप्त है बशर्ते आप जी.डी.पी वृद्धि दर को ही अर्थव्यवस्था की मुक्ति न मानते हों और हमेशा नौ से दस फीसदी वृद्धि दर का राग अलापने में न जुटे रहते हों.

मुश्किल यह है कि मनमोहन सिंह सरकार खुद ही मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह नौ से दस फीसदी की ऊँची वृद्धि दर के सपने देखती और दिखाती रहती है. ऐसे में, उसकी खुद की बनाई कसौटी पर अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कमजोर है, इस तथ्य को वह कैसे नकार सकती है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उसकी क्षमताओं और उम्मीदों से कहीं कम है. लेकिन मुद्दा केवल अर्थव्यवस्था की विकास दर नहीं है और न ही अकेले यह उसकी सेहत और बेहतरी का सबूत है. सच यह है कि अर्थव्यवस्था की तेज दर के बावजूद पिछले वर्षों में आम लोगों की स्थिति में कोई खास सुधार हुआ है और न ही उनकी परेशानियां और तकलीफें कम हुई हैं.

उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष जी.डी.पी की अपेक्षाकृत ८.५ फीसदी की तेज रफ़्तार के बावजूद आम लोगों को आसमान छूती महंगाई रुलाती रही. यही नहीं, एन.एस.एस.ओ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २००४-०९ के बीच ऊँची विकास दर के बावजूद यह ‘रोजगारविहीन विकास’ था जिसके कारण इन पांच वर्षों में रोजगार में वृद्धि दर लगभग नगण्य रही.

आश्चर्य नहीं कि इस साल विकसित देशों के संगठन – ओ.ई.सी.डी द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्षों में जब देश में जी.डी.पी तेज वृद्धि दर के साथ बढ़ रही थी, उसी दौरान देश में अमीर-गरीब के बीच खाई भी तेजी से बढ़ रही थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां नव उदारवादी सुधारों के इस दौर में तेज विकास दर के बावजूद सबसे अधिक गैर बराबरी बढ़ी है. इसका सबसे बड़ा सबूत तो गरीबी रेखा के बारे में योजना आयोग का सुप्रीम कोर्ट में दिया गया वह हलफनामा है जिसमें ग्रामीण इलाकों में प्रति दिन २६ और शहरी इलाकों में ३२ रूपये से ऊपर की आमदनी वाले लोगों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया गया.

हैरानी की बात नहीं है कि गरीबी का मजाक उड़ानेवाली इस गरीबी रेखा को लेकर इस साल खूब हंगामा हुआ. सरकार ने भी माना कि यह गरीबी की वास्तविक रेखा नहीं है. लेकिन विडम्बना देखिए कि जिस गरीबी रेखा को ख़ारिज करने की बात की गई, वही गरीबी रेखा साल के बीतते-बीतते भोजन के अधिकार विधेयक में एक बार फिर आधिकारिक रेखा बनकर करोड़ों लोगों की रोटी का फैसला करने आ गई. कहते हैं कि ‘चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही पहले की तरह रहती हैं.’ गरीबी की परिभाषा पर इतनी सारी बहसों और चर्चाओं के बावजूद गरीबी रेखा जस की तस बनी हुई है.

कल भी जारी...

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप के ३१ दिसंबर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली किस्त)

शनिवार, दिसंबर 31, 2011

गरीबी रेखा से ही तय होगा भोजन के अधिकार का फैसला

इस कानून से देश में खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी

दूसरी और आखिरी किस्त


यह विधेयक खाद्य सुरक्षा के दायरे को बढ़ाने के बजाय कई मामलों में और सीमित कर देता है. इसमें खाद्य सुरक्षा के लाभार्थियों को ‘प्राथमिकता’ और ‘सामान्य’ के दो खांचों में बांटा गया है जो वास्तव में पहले से मौजूद बी.पी.एल और ए.पी.एल श्रेणियों के ही नए नाम हैं.

विधेयक में प्राथमिकता श्रेणी में शामिल लाभार्थियों में प्रत्येक व्यक्ति को सस्ते दर (दो रूपये किलो गेहूं और तीन रूपये किलो चावल) पर सात किलो अनाज मिलेगा जबकि सामान्य श्रेणी में शामिल प्रत्येक लाभार्थी को अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमत (मौजूदा कीमतों के आधार पर ६.५० रूपये किलो गेहूं और ५.५० रूपये किलो चावल) पर तीन किलो अनाज मिलेगा.


साफ़ है कि सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को न सिर्फ अनाजों की दोगुनी से लेकर तिगुनी कीमत चुकानी पड़ेगी बल्कि उन्हें प्राथमिकता श्रेणी की तुलना में अनाज भी आधे से कम मिलेगा. इस तरह लगभग सभी व्यावहारिक अर्थों में सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को खाद्य सुरक्षा नाम पर एक झुनझुना भर थमा दिया गया है.

यही नहीं, खाद्य सुरक्षा का यह केन्द्रीय कानून तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां पी.डी.एस का दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है, उसे भी सीमित कर देगा. इसके अलावा देश के कई राज्यों में प्रस्तावित कानून की तुलना में कहीं ज्यादा सस्ता अनाज राज्य सरकारें पहले से दे रही हैं, उसपर भी रोक लग जायेगी.

खाद्य सुरक्षा का यह विधेयक कितना सीमित है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसके तहत कथित खाद्य सुरक्षा का लाभ ग्रामीण क्षेत्र के ७५ प्रतिशत और शहरी क्षेत्र के ५० प्रतिशत नागरिकों को मिलेगा. लेकिन इसमें भी प्राथमिकता (पूर्व बी.पी.एल) श्रेणी के लाभार्थियों की संख्या विधेयक के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में ४६ फीसदी और शहरी इलाकों में २८ फीसदी होगी.

यह और कुछ नहीं बल्कि तेंदुलकर समिति द्वारा तय गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे लोगों की संख्या में १० फीसदी और जोड़कर बनाई गई सीमा है. इस तरह ना-ना करते हुए भी वही पुरानी गरीबी रेखा फिर से भूखमरी के शिकार करोड़ों लोगों के भाग्य का फैसला करने आ गई.

यह साफ़ तौर पर यू.पी.ए सरकार की वायदाखिलाफी है. याद रहे कि ग्रामीण क्षेत्रों में २६ रूपये और शहरी क्षेत्रों में ३२ रूपये से कम की आय वाले लोगों को ही गरीब मानने वाले योजना आयोग के हलफनामे के बाद पूरे देश में जबरदस्त हंगामा हुआ था. उस समय केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने वायदा किया था कि इस गरीबी रेखा को भोजन के अधिकार के लाभार्थियों के साथ नहीं जोड़ा जाएगा.

लेकिन संसद में पेश विधेयक से साफ़ है कि गरीबी निर्धारण के नाम पर गरीबों का मजाक उड़ानेवाली गरीबी रेखा से ही यह तय होगा कि देश में कितने और कौन लोगों को खाद्य सुरक्षा का लाभ मिलेगा.

साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार ने इस विधेयक के जरिये न सिर्फ भोजन के सार्वभौम (यूनिवर्सल) अधिकार यानी सभी नागरिकों के लिए खाद्य सुरक्षा के अधिकार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है बल्कि करोड़ों गरीबों और भूखमरी के शिकार लोगों को प्राथमिकता और सामान्य श्रेणियों के कृत्रिम विभाजन में बांटकर करोड़ों भूखे लोगों को भी ठेंगा दिखा दिया है.

लेकिन इस मजाक के लिए सिर्फ यू.पी.ए सरकार ही नहीं बल्कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके नेतृत्व में काम करनेवाली एन.ए.सी भी उतनी ही जिम्मेदार है. एन.ए.सी ने ही सबसे पहले प्राथमिकता और सामान्य श्रेणियों के इस कृत्रिम विभाजन का प्रस्ताव करके सरकार को और मनमानी करने की छूट दे दी.

लेकिन मजा देखिए कि इतने सीमित प्रावधानों बावजूद अभी भी इस विधेयक का सरकार के अंदर और बाहर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों की ओर से जितना कड़ा विरोध हो रहा है, उसे देखते हुए इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस सीमित कानून को भी लागू करने को लेकर सरकार बहुत उत्सुक और उत्साहित नहीं है. साफ़ है कि भोजन के मौलिक अधिकार की लड़ाई अभी लंबी चलनी है.


समाप्त

('समकालीन जनमत' के जनवरी'१२ में प्रकाशित टिप्पणी की दूसरी और अंतिम किस्त)

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

खाद्य सुरक्षा के नाम पर भूखों को फिर ठेंगा

भोजन के अधिकार की आड़ में पी.डी.एस को ठिकाने लगाने की तैयारी  


पहली किस्त

काफी ना-नुकुर, खींचतान और दांवपेंच के बाद आख़िरकार यू.पी.ए सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पेश कर दिया. पिछले दो सालों से अधिक समय से सरकार के अंदर और बाहर इस कानून के मसौदे को लेकर बहस चल रही थी. दूसरी ओर, देश भर में खाद्य सुरक्षा यानी सभी नागरिकों को भोजन के अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो रहे थे.

सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दोनों दबाव थे. सचमुच इससे अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि जी.डी.पी की तेज रफ़्तार और भारत के आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बनने के दावों के बीच देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की कुल तादाद बढ़कर २७ करोड़ से अधिक पहुँच गई है?

यही नहीं, दुनिया भर में भूखमरी के शिकार लोगों की कुल आबादी का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा अकेले भारत में रहता है. आश्चर्य नहीं कि वैश्विक भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर ८४ देशों में भारत कई अत्यधिक गरीब अफ़्रीकी और एशियाई देशों से भी नीचे ६७ वें स्थान पर है.

विडम्बना देखिए कि पिछले डेढ़-दो दशकों खासकर १९९० से २००५ के बीच तेज वृद्धि दर के कारण जहां भारत के जी.डी.पी का आकार दुगुना हो गया और प्रति व्यक्ति आय में तिगुनी वृद्धि दर्ज की गई, उसी दौरान देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की तादाद में कमी आने के बजाय उनकी संख्या में लगभग ६.५ करोड़ की और बढोत्तरी हो गई.

हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश में कोई ४८ फीसदी बच्चे और ४० फीसदी वयस्क भरपेट और पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन न मिलने के कारण कुपोषण के शिकार हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि इस कानून से देश के उन करोड़ों लोगों को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं जो आज़ादी के ६३ साल बाद आज भी भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं.

लेकिन इतनी उम्मीदों, सरकार के भारी-भरकम दावों और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की व्यक्तिगत दिलचस्पी के बाद जो विधेयक संसद में पेश किया गया है, उसका मकसद कहीं से भी सबको भोजन का मौलिक अधिकार देना नहीं है.

इसके उलट सच यह है कि खाद्य सुरक्षा का यह विधेयक न सिर्फ बहुत सीमित, आधा-अधूरा, विसंगतियों और अंतर्विरोधों से भरा हुआ है बल्कि यह देश में खाद्य असुरक्षा बढ़ानेवाला कानून साबित होगा. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा के नाम पर यह भूखे लोगों का मजाक उड़ानेवाला विधेयक है जिसका असली मकसद खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आड़ में खादयान्नों के कारोबार से जुड़ी बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों की मदद करना है.

इस कानून के जरिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस) में सुधार के नाम पर उसे पूरी तरह बर्बाद करने की तैयारी कर ली गई है जिससे सबसे ज्यादा फायदा बड़ी बहुराष्ट्रीय खाद्यान्न कंपनियों को होगा.

असल में, यू.पी.ए सरकार इसके लिए बहुत दिनों से मौका खोज रही थी. यह किसी से छुपा नहीं है कि पी.डी.एस में सुधार के नाम पर उसे समेटने और बंद करने की कोशिशें लंबे समय से चल रही थीं. पी.डी.एस में सुधार की आड़ में उसे पहले ही लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस) में बदलकर कमजोर और खोखला किया जा चुका है.

इसी नव उदारवादी एजेंडे को आगे बढाने के लिए अब खाद्य सुरक्षा विधेयक को एक मौके की तरह इस्तेमाल किया गया है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस कानून को लागू करने के लिए सभी राज्यों को पी.डी.एस में सुधार करना होगा.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पी.डी.एस व्यवस्था में जितना भ्रष्टाचार और अराजकता है, उसे देखते हुए उसमें सुधार की और उसे भ्रष्टाचारमुक्त, प्रभावी और जन नियंत्रण में लाने की सख्त जरूरत है. लेकिन सरकार का इरादा उसमें सुधार करके उसे सशक्त और प्रभावी बनाने का नहीं है. इसके उलट वह पी.डी.एस में सुधार के बहाने उसमें अत्यंत विवादास्पद आधार पहचानपत्र (यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर) को घुसेड़ना चाहती है.

लेकिन इस विधेयक में सबसे खतरनाक प्रावधान यह किया गया है कि केन्द्र सरकार जिस दिन से और जिस क्षेत्र में अनाज की जगह कैश ट्रान्सफर, फ़ूड कूपन जैसी योजनाओं को लागू करना चाहेगी, राज्य सरकारों को उसे लागू करना होगा.

साफ़ है कि सरकार का असली इरादा लोगों को पी.डी.एस के माध्यम से अनाज मुहैया कराके खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं बल्कि कैश ट्रांसफर और फ़ूड कूपन के बहाने खाद्यान्न के बड़े व्यापारियों और बड़ी कंपनियों को मोटे मुनाफे की गारंटी करना है.

यह किसी से छुपा नहीं है कि पहले एन.डी.ए और अब यू.पी.ए सरकार पिछले कई वर्षों से राशन लाभार्थियों को अनाज के बजाय नकद पैसा या फ़ूड कूपन देने की पेशकश करते रहे हैं जिसका इस्तेमाल करके वह खुले बाजार से अपनी पसंद का अनाज खरीद ले.

ऊपर से देखने पर यह योजना बहुत आकर्षक लगती है कि लाभार्थी को राशन की दूकान और उसमें मिलनेवाले घटिया अनाज से मुक्ति मिल जायेगी और वह अपनी सुविधा और पसंद से अनाज खरीद सकता है.

लेकिन सच यह है कि सुधार के नाम पर गरीबों और भूखमरी से जूझ रहे लोगों को भ्रष्ट पी.डी.एस के बजाय खुले बाजार की मनमानी के भरोसे छोड़ा जा रहा है. आखिर कितने गरीब खुले बाजार से फ़ूड कूपन या नकद से अपनी इच्छा या पसंद से अनाज खरीद पाएंगे?

दूसरी ओर, एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर सरकार कैश ट्रांसफर या फ़ूड कूपन को आगे बढ़ाने जा रही है तो उसके अपने अनाज भण्डार का क्या होगा? अगर सरकार पी.डी.एस से अनाज का वितरण नहीं करना चाहती है तो उसे किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने और अनाज भण्डार रखने की भी क्या जरूरत है?

मतलब साफ़ है. सरकार का असली मकसद न सिर्फ पी.डी.एस को खत्म करना है बल्कि वह किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने की जिम्मेदारी से भी मुक्ति चाहती है. इस तरह वह किसानों को भी बाजार और बड़े अनाज व्यापारियों और कंपनियों के रहमो-करम पर छोड़ना चाहती है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इससे सबसे ज्यादा खुशी अनाज के कारोबार से जुड़े बड़े व्यापारियों और देशी-विदेशी कंपनियों को होगी. लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि किसानों और राशन लाभार्थियों दोनों को बाजार के भरोसे छोडकर सरकार वास्तव में देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगाने जा रही है.

यही इस विधेयक की असलियत है. सच यह है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक में नया कुछ भी नहीं है. इसमें मौजूदा व्यवस्था को ही नए नाम से पेश कर दिया गया है.
 
बाकी कल...
 
('समकालीन जनमत' के जनवरी'१२ के अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली किस्त)

बुधवार, दिसंबर 28, 2011

लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सरकार का अनिर्णय

सरकार और उद्योग जगत के बीच टकराव बढ़ रहा है


यह किसी से छुपा नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है. लेकिन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों की शिकायत है कि उद्योग जगत देश में बेवजह निराशा और चिंता का माहौल बना रहा है. इसके कारण स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है.

इस मामले में उद्योग जगत के नकारात्मक रवैये से प्रधानमंत्री इतने नाराज हैं कि उन्होंने देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ एक हालिया बैठक में उन्हें झिड़कने से भी परहेज नहीं किया.

प्रधानमंत्री उद्योग जगत के उन बयानों से अधिक नाराज हैं जिनमें अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति के लिए यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ को जिम्मेदार ठहराया गया है. कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों उद्योग जगत की इस राय से न सिर्फ इत्तेफाक नहीं रखते हैं बल्कि उन्हें लगता है कि उनकी सरकार को बदनाम और अस्थिर करने की कोशिश हो रही है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसे बयानों से अनिश्चितता बढ़ती है. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन बयानों से यह पता चलता है कि यू.पी.ए सरकार और उद्योग जगत के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है.

उल्टे ऐसा लगता है कि दोनों के बीच अविश्वास और टकराव बढ़ता जा रहा है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार को लेकर उद्योग जगत खासकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी की निराशा और हताशा बढ़ती जा रही है.

उसे लगने लगा है कि यह सरकार जिस तरह से अपने ही अंतर्विरोधों में फंसती और अपना राजनीतिक इकबाल गंवाती जा रही है, उसके कारण आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का एजेंडा पीछे छूटता जा रहा है.

दरअसल, इस सरकार से उद्योग जगत को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं. उद्योग जगत को विश्वास था कि वामपंथी पार्टियों के दबाव से मुक्त यू.पी.ए-२ सरकार न सिर्फ नव उदारवादी सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएगी बल्कि देश भर में नए औद्योगिक प्रोजेक्ट्स की राह में आ रही बाधाओं को भी हटाएगी.

लेकिन पिछले ढाई साल में यह सरकार उनमें से ज्यादातर अपेक्षाओं और उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई. इसके भी कारण किसी से छुपे नहीं हैं. एक तो यह सरकार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण राजनीतिक रूप से घिर गई और आपसी झगडों में उलझ गई और दूसरी ओर, देश भर में जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण को लेकर किसानों-आदिवासियों और स्थानीय समुदायों का विरोध और संघर्ष तेज होता गया.

नतीजा, यह सरकार चाहकर भी उद्योग जगत की इच्छाएं पूरी नहीं कर पाई. यही नहीं, भ्रष्टाचार के मामलों में राजनेताओं और अफसरों के साथ उद्योग जगत की कई बड़ी हस्तियों को भी जेल जाना पड़ा है. इससे उद्योग जगत की बेचैनी बढ़ी है. आश्चर्य नहीं कि इसी निराशा और बेचैनी में उद्योग जगत का एक हिस्सा न सिर्फ सरकार की मुखर आलोचना करने लगा है बल्कि इस सरकार के राजनीतिक विकल्पों की खोज भी करने लगा है.

इसी प्रक्रिया में पिछले कुछ महीनों में उद्योग जगत की ओर से सरकार की आलोचना के स्वर मुखर हुए हैं. यही नहीं, कई बड़े उद्योगपतियों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की उम्मीदवारी को भी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है.

जाहिर है कि इससे मनमोहन सिंह सरकार में नाराजगी है. लेकिन वह जानती है कि उद्योग जगत के नाराज करके सत्ता में टिके रहना मुश्किल है. इसलिए उसने उद्योग जगत को खुश करने की बहुत कोशिश की है. पिछले डेढ़ महीने में सरकार ने आनन-फानन में ऐसे कई फैसले किये जिनका असली मकसद बड़ी पूंजी को खुश करना है.

निश्चित ही, इनमें सबसे बड़ा फैसला खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने का था. लेकिन अपने राजनीतिक अंतर्विरोधों और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के कारण सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा.

इससे उद्योग जगत और सरकार के बीच खिंचाव और अविश्वास बढ़ा है. उद्योग जगत को लगता है कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण फैसले के बचाव के लिए उतनी गंभीर कोशिश नहीं की जितनी परमाणु डील के समय की थी.

सरकार का तर्क है कि उद्योग जगत गठबंधन राजनीति की मजबूरियों को समझ नहीं पा रहा है. इस तरह सरकार और उद्योग जगत के बीच टकराव बढ़ता ही जा रहा है. इस टकराव के कारण जो ‘नीतिगत पक्षाघात’ की स्थिति बन गई है, उसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

यह किसी से छुपा नहीं है कि औद्योगिक उत्पादन दर के साथ-साथ जी.डी.पी की वृद्धि दर भी गिर रही है. साफ़ है कि अर्थव्यवस्था में नया निवेश नहीं हो रहा है. घरेलू और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता के कारण बड़ी निजी पूंजी नया निवेश नहीं कर रही है.

इससे मांग भी मंद पड़ रही है. इस प्रक्रिया में अर्थव्यवस्था एक तरह के दुष्चक्र में फंसती हुई दिखाई दे रही है. अगर अर्थव्यवस्था को इस दुष्चक्र से निकालने की तुरंत कोशिश नहीं की गई तो स्थिति सचमुच बद से बदतर हो सकती है.

अच्छी बात यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति उतनी बुरी नहीं है जितनी गुलाबी अखबार और उद्योग जगत बताने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी इस कोशिश के पीछे उनका अपना एजेंडा है. वे सरकार पर दबाव बनाने और आर्थिक सुधारों की गति तेज करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन इससे स्थिति में कोई सुधार नहीं आनेवाला है. इसके उलट अगर सरकार में इच्छाशक्ति हो तो वह अर्थव्यवस्था खासकर आधारभूत ढांचे में सार्वजनिक निवेश को बढाकर अर्थव्यवस्था को संभाल सकती है.

लेकिन मुश्किल यह है कि यू.पी.ए सरकार खुद नव उदारवादी सुधारों से इस कदर मोहग्रस्त है कि वह सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है. इसकी वजह यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका घटाने और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर अधिक जोर दिया जाता है.

इसके लिए तर्क यह दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र किसी बिजनेस को चलाने में ज्यादा सक्षम और प्रभावी होता है. इनकी नजर में सार्वजनिक क्षेत्र भ्रष्टाचार और काहिली का पर्याय है. यही कारण है कि आर्थिक सुधारों के पिछले डेढ़-दो दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को विनिवेश के नाम पर औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया है.

लेकिन मनमोहन सिंह सरकार यह भूल रही है कि इस समय जब देश औद्योगिक मंदी के खतरे के सामने है और निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे नहीं आ रहा है तो उस समय निवेश के बजाय विनिवेश की कोशिश अर्थव्यवस्था के लिए बहुत घातक साबित हो सकती है.

असल में , इस समय निजी निवेश को भी प्रोत्साहित करने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक निवेश को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया जाए. इससे अर्थव्यवस्था में पूंजीगत से लेकर अन्य औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ेगी जो निजी क्षेत्र को नए निवेश के लिए आकर्षित करेगी.

लगता है कि यह सरकार पूंजीवादी अर्थशास्त्र में कीन्स के इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को भूल गई है जो कहता है कि मंदी के समय निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना चाहिए. यही नहीं, सरकार के पास संसाधनों की भी कमी नहीं है.

अलबत्ता, मनमोहन सिंह सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ़ दिखाई पड़ रही है. यह सचमुच हैरानी की बात है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो दर्जन कम्पनियों के पास इस समय २०५२५५ करोड़ रूपये का नगद और बैंक डिपोजिट है.

लेकिन ये कम्पनियाँ इसे नई परियोजनाओं में निवेश नहीं कर रही हैं. उल्टे सरकार इन कंपनियों का विनिवेश करने पर तुली हुई है. लेकिन सरकार अगर इन कम्पनियों को निवेश खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित करे तो औद्योगिक विकास में आ रही गिरावट को रोका जा सकता है. क्या सरकार इसके लिए तैयार है?

(दैनिक 'नया इंडिया' में २६ दिसंबर और 'जनसंदेश टाइम्स' में २८ दिसंबर को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख)

शनिवार, दिसंबर 24, 2011

सरकार के न्यौते पर आई है औद्योगिक मंदी

सरकार के पास संसाधनों की नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है 



भारतीय अर्थव्यवस्था लड़-खड़ाकर पटरी से उतर रही है. यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे अनदेखा करना अब मुश्किल है. इसका सबसे ताजा सबूत यह है कि अक्टूबर महीने में औद्योगिक विकास की दर फिसलकर नकारात्मक हो गई है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सवा दो वर्षों में पहली बार औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर अक्टूबर महीने में तेज गिरावट के साथ (–) ५.१ प्रतिशत रह गई है. पिछले वर्ष इसी महीने में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर ११.३ फीसदी थी.

औद्योगिक विकास की दर के नकारात्मक होने की गंभीरता को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इससे पहले अमेरिकी वित्तीय संकट और उसके कारण पैदा हुई वैश्विक मंदी के बीच औद्योगिक उत्पादन की दर दिसंबर’०८ से लगातार छह महीने तक नकारात्मक रही थी.

लेकिन इसमें चौंकानेवाली कोई बात नहीं है. सच यह है कि औद्योगिक उत्पादन की दर में गिरावट की आशंका काफी पहले से जाहिर की जा रही थी. इसके संकेत भी पहले से मिलने लगे थे. जैसे, इससे ठीक पहले सितम्बर महीने में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर लुढ़ककर मात्र १.९ फीसदी रह गई थी.

यही नहीं, इस वित्तीय वर्ष में जुलाई से सितम्बर की तिमाही में औद्योगिक उत्पादन दर सिर्फ ३ फीसदी रही और अप्रैल से सितम्बर के बीच छह महीनों में औद्योगिक उत्पादन की दर सिर्फ ५ फीसदी रही जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह दर ८.२ फीसदी थी. साथ ही, इस वित्तीय वर्ष के पहले छह महीनों में जी.डी.पी की वृद्धि दर गिरकर सिर्फ ६.९ प्रतिशत रह गई है.

साफ़ है कि औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट न तो अचानक है और न ही अप्रत्याशित. लेकिन इस गिरावट की गहराई जरूर अप्रत्याशित और चिंतित करनेवाली है. यह गिरावट इसलिए भी गंभीर और चिंतित करनेवाली है क्योंकि गिरावट का दायरा और गहराई औद्योगिक उत्पादन के कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं है बल्कि उसके प्रभाव से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं बचा है.

उदाहरण के लिए, औद्योगिक उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण घटक मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में वृद्धि दर नकारात्मक (-) ६ फीसदी और खनन (माइनिंग) क्षेत्र में भी वृद्धि दर नकारात्मक (-) ७.२ फीसदी रही.

यही नहीं, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी किसी भी क्षेत्र- चाहे बेसिक गुड्स हो या इंटरमीडिएट गुड्स या कैपिटल गुड्स या फिर कंज्यूमर गुड्स में धनात्मक वृद्धि दर नहीं दर्ज की गई है. यहाँ तक कि पूंजीगत सामानों (कैपिटल गुड्स) की वृद्धि दर में सबसे तेज और भारी गिरावट दर्ज की गई है जहां ऋणात्मक वृद्धि दर (-) २५.५ तक पहुँच गई.

इसमें भी विद्युत मशीनरी और उपकरणों में (-) ५८.८ प्रतिशत और अन्य मशीनरी और उपकरणों में (-) १२.१ फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है. दूसरी ओर, खनन क्षेत्र में गिरावट का आलम यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में लगातार तीसरे महीने इस क्षेत्र में ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की गई है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संकट कितना गहरा और गंभीर है.

कहने की जरूरत नहीं है कि औद्योगिक उत्पादन में मौजूदा गिरावट के कई कारण हैं. अर्थव्यवस्था के सरकारी मैनेजर इसका सारा दोष अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था के संकट और उसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में ठहराव और अनिश्चितता के मत्थे मढ़कर बच निकलने की कोशिश कर रहे हैं.

जबकि उद्योग जगत और गुलाबी अखबार इसका सारा ठीकरा यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ यानी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकामी और रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति पर फोड़ रहे हैं. लेकिन न तो सरकार और न ही उद्योग जगत पूरी सच्चाई बता रहे हैं.

यह सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता और कमजोरी का भारतीय अर्थव्यवस्था खासकर औद्योगिक उत्पादन पर असर पड़ा है. इसका प्रभाव खासकर भारतीय निर्यात में आए गिरावट में दिख रहा है जिससे औद्योगिक उत्पादों के मांग में कमी आई है.

यह भी सही है कि पिछले डेढ़ साल से रिजर्व बैंक ने आसमान छूती मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए जिस तरह से ब्याज दरों में वृद्धि की है, उसके कारण नए निवेश खासकर निजी पूंजी निवेश में भारी गिरावट आई है जो औद्योगिक उत्पादन खासकर कैपिटल गुड्स में भारी गिरावट की एक बड़ी वजह है.

यही नहीं, नए निवेश में गिरावट की एक वजह सरकार का अनिर्णय और ‘नीतिगत पक्षाघात’ भी है लेकिन यह वह ‘पक्षाघात’ नहीं है जो उद्योग जगत और गुलाबी अखबार बता रहे हैं. दरअसल, औद्योगिक उत्पादन में ऋणात्मक वृद्धि की सबसे बड़ी और बुनियादी वजह यह है कि औद्योगिक उत्पादों की मांग में निरंतर और व्यापक वृद्धि का अभाव और इस कारण नए निवेश में वृद्धि का न होना.

इसके लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं. इस मायने में इस औद्योगिक मंदी को सरकार ने निमंत्रित किया है. तथ्य यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के प्रति अति व्यामोह (आब्सेशन) के कारण सरकार ने औद्योगिक क्षेत्र को पूरी तरह से निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ दिया है. लेकिन निजी क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र खासकर आधारभूत ढांचागत क्षेत्र में निवेश को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखता है या अपनी शर्तों पर और भारी मुनाफे की गारंटी के साथ निवेश करना चाहता है.

केन्द्र और राज्य सरकारों ने ‘विकास’ के नाम पर देशी-विदेशी बड़ी निजी पूंजी की इन मांगों को सहर्ष स्वीकार भी किया है लेकिन मुश्किल यह है कि आम लोग खासकर गरीब किसान, आदिवासी और हाशिए पर पड़े लोग इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.

इसका नतीजा यह हुआ है कि हाल के वर्षों में देश भर में जहां भी बड़ी देशी-विदेशी पूंजी नई परियोजनाएँ शुरू करने की कोशिश कर रही है, स्थानीय जनता के साथ जल, जंगल और जमीन से लेकर खनिजों के दोहन को लेकर तीखा संघर्ष शुरू हो जा रहा है. लोगों की आजीविका से लेकर पर्यावरण के सवाल उठ रहे हैं. इसके कारण स्टील से लेकर बिजली और खनन से लेकर रीयल इस्टेट तक अनेकों बड़ी-छोटी परियोजनाएं ठप्प पड़ी हैं या उनमें काम की रफ़्तार बहुत धीमी है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इन टकरावों में चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें, वे बड़ी पूंजी के साथ खड़ी हैं. वे निजी पूंजी को हर तरह की रियायतें देने से लेकर उनपर सार्वजनिक संसाधनों को लुटाने (बतर्ज २ जी) में अब भी संकोच नहीं कर रही हैं. लेकिन दूसरी ओर, दमन के बावजूद गरीब लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.

उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है. सरकार चाहकर भी उन्हें हटा नहीं पा रही है. दूसरी ओर, उद्योग जगत अभी भी गरीब किसानों की भावनाओं और जरूरतों को समझने के लिए तैयार नहीं है. वह न तो मुनाफे की भूख को कम करने के लिए राजी है और न ही अपने मुनाफे में स्थानीय समुदायों और गरीबों को उनकी न्यायोचित हिस्सेदारी देने के लिए तैयार है.

नतीजा यह कि एक गतिरोध बन गया है. इस गतिरोध को उद्योग जगत और उनके भोंपू गुलाबी अखबार ‘नीतिगत पक्षाघात’ बता रहे हैं और चाहते हैं कि सरकार न सिर्फ अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए और खोले बल्कि मौजूदा परियोजनाओं के रास्ते में आ रही बाधाओं को भी दूर करे.

यू.पी.ए सरकार अपनी ‘राजनीतिक और लोकतान्त्रिक मजबूरियों’ के बीच यह कोशिश भी कर रही है लेकिन उतनी कामयाब नहीं हो पा रही है जितनी उद्योग जगत अपेक्षा कर रहा है. जाहिर है कि इसके कारण निजी निवेश पर नकारात्मक असर पड़ रहा है.

लेकिन अब समय आ गया है जब सरकार और उद्योग जगत विकास के नाम पर विस्थापन और गरीबों की आजीविका छीनने और पर्यावरण को ठेंगा दिखाने की नीति से बाज आयें. साफ है कि औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में लोगों को बराबरी का हक दिए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है.

लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि निजी निवेश में कमी इस कारण भी आ रही है क्योंकि आधारभूत ढांचा क्षेत्र की लंबे अरसे से उपेक्षा और अपेक्षित निवेश न होने से निजी निवेश के लिए नए निवेश में अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं है.

ऐसे में, यह जरूरी है कि सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अर्थव्यवस्था खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश बढ़ाए. इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, उससे मांग बढ़ेगी और निजी क्षेत्र के निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनेगा. एक बात साफ़ है कि घरेलू मांग को बढ़ाए बिना औद्योगिक मंदी को रोक पाना असंभव है.

लेकिन जब भी अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश और उसके जरिये मांग को बढ़ाने की बात होती है, सरकार तुरंत संसाधनों की कमी का रोना रोने लगती है.

लेकिन यह सच नहीं है. सच यह है कि सरकार के पास संसाधनों की नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. यह सचमुच हैरानी की बात है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो दर्जन कम्पनियों के पास इस समय २०५२५५ करोड़ रूपये का नगद और बैंक डिपोजिट है.

लेकिन ये कम्पनियाँ इसे नई परियोजनाओं में निवेश नहीं कर रही हैं. उल्टे सरकार इन कंपनियों का विनिवेश करने पर तुली हुई है. लेकिन सरकार अगर इन कम्पनियों को निवेश खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित करे तो औद्योगिक विकास में आ रही गिरावट को रोका जा सकता है.

उदाहरण के लिए, चीन इस समय अपने रेल नेटवर्क के भारी विस्तार में जुटा है. साथ ही, वह आधारभूत ढांचा में भारी निवेश के जरिये घरेलू मांग को बढ़ाने की नीति पर चल रहा है.

इस मामले में चीन से सीखने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के व्यामोह से बाहर आना पड़ेगा. क्या यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार है?

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में प्रकाशित आलेख: http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=17 )