सोमवार, दिसंबर 06, 2010

जे.पी.सी से क्यों डर रही है सरकार?

सरकार का इक़बाल खत्म हो रहा है

पिछले तीन सप्ताहों से संसद ठप्प है. आशंका है कि संसद का शीतकालीन सत्र ऐसे ही निकल जायेगा. कारण? विपक्ष की मांग है कि अब तक के सबसे बड़े २ जी घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय जांच समिति गठित की जाए. लेकिन यू.पी.ए सरकार खासकर कांग्रेस जे.पी.सी के लिए कतई तैयार नहीं है. दूसरी ओर, विपक्ष भी अपनी मांग पर अड़ा हुआ है. दोनों के टकराव में कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है.

यह टकराव इस हद तक पहुंच चुका है कि न संसद में कोई कामकाज हो रहा है और न ही सरकार कोई काम कर पा रही है. एक साथ कई घोटालों से घिरी और कारपोरेट समूहों के आपसी युद्ध में सरकार एक तरह से पंगु सी हो गई है. खुद प्रधानमंत्री सवालों के घेरे में हैं. वह लाचार से दिख रहे हैं. उनकी लाचारी का ताजा उदाहरण सी.वी.सी पी.जे थामस के मुद्दे पर सरकार की फजीहत के बावजूद कोई स्पष्ट फैसला न कर पाने के रूप में दिख रहा है. मंत्रिमंडल का विस्तार रुका हुआ है. यही नहीं, यू.पी.ए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के डेढ़ साल के अंदर ही अपनी नैतिक सत्ता और इक़बाल गंवाती हुई दिख रही है.

लेकिन पिछले तीन सप्ताहों से संसद से लेकर सरकार तक में कामकाज न हो पाने के बावजूद यू.पी.ए सरकार का हठी और बेपरवाह रवैया समझ से बाहर है. 2 जी घोटाले की जे.पी.सी से जांच न कराने को लेकर सरकार खासकर कांग्रेस का तर्क है कि विपक्ष सिर्फ राजनीति कर रहा है. उसकी रणनीति जांच से ज्यादा सरकार खासकर प्रधानमंत्री को परेशान और अपमानित करने की है. सरकार जे.पी.सी के बजाय संसद की लोक लेखा समिति- पी.ए.सी और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सी.बी.आई से जांच के हक में है.

लेकिन सरकार के तर्क में कोई खास दम नहीं है. अगर विपक्ष राजनीति के कारण जे.पी.सी की मांग कर रहा है तो यह भी तय है कि कांग्रेस उसका राजनीति के कारण ही विरोध कर रही है. आखिर कांग्रेस राजनीति से घबरा क्यों रही है? राजनीति अपने आप में कोई बुराई नहीं है बल्कि अरस्तू की मानें तो राजनीति, मनुष्य की सृजनात्मकता की सबसे उच्चतर अभिव्यक्ति है.

आखिर राजनीति क्या है? राजनीति और कुछ नहीं, लोगों की इच्छाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है. राजनीति तब गडबड हो जाती है जब वह व्यापक जनसमुदाय की इच्छाओं और अपेक्षाओं के बजाय मुट्ठी भर लोगों के स्वार्थों को पूरा करने का माध्यम बन जाती है. सवाल है कि संसद के मौजूदा गतिरोध में किसकी राजनीति व्यापक सार्वजनिक हित में है? सच पूछिए तो लोग सच जानना चाहते हैं. वे चाहते है कि इस घोटाले के दोषियों को सजा मिले और लूटे हुए पैसे सरकारी खजाने में वापस आएं.

लेकिन कांग्रेस को यह डर सता रहा है कि अगर जे.पी.सी बनती है तो उसमें संसद की मौजूदा संख्या के आधार पर सत्ता पक्ष और खासकर कांग्रेस अल्पमत में रहेगी और उसे समर्थन के लिए बी.एस.पी और सपा जैसे दलों की खुशामद करनी पड़ेगी. दूसरे, उसे यह भी डर लग रहा है कि यह समिति प्रधानमंत्री समेत अन्य मंत्रियों को भी पूछताछ के लिए बुला सकती है. तीसरे, उसे आशंका भी घेरे हुए है कि विपक्ष जे.पी.सी की बैठकों और उसकी रिपोर्ट को अगले छह महीनों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में एक बड़े मुद्दे की तरह इस्तेमाल कर सकता है. चौथे, उसके डर का एक कारण यह भी है कि इस मामले ने चुनावों के बाद से बिखरे विपक्ष को एकजुट कर दिया है.

इन सभी राजनीतिक कारणों से कांग्रेस जे.पी.सी के लिए तैयार नहीं है. लेकिन उसका यह अड़ियल रूख सरकार की साख को खत्म कर रहा है. उसके इस रूख के कारण लोगों में यह सन्देश जा रहा है कि यू.पी.ए सरकार जरूर कुछ छुपाने की कोशिश कर रही है. इसकी वजह यह है कि २ जी घोटाला कोई मामूली भ्रष्टाचार और घोटाला नहीं है. यह अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है जिसमें सरकारी खजाने को कोई १.७६ लाख करोड़ रूपये का चूना लगा है. यह रकम देश के मौजूदा शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, नरेगा आदि के सम्मिलित बजट से भी ज्यादा है. यही नहीं, यह मौजूदा योजना बजट का लगभग ४५ फीसदी है.

साफ है कि यह मामूली रकम नहीं है और न ही कोई ‘काल्पनिक नुकसान’- नोशनल लॉस- भर है जैसाकि कांग्रेस का दावा है. लेकिन मुद्दा सिर्फ आर्थिक नुकसान का ही नहीं है. तथ्य यह है कि यह सीमित राष्ट्रीय संसाधन- स्पेक्ट्रम की निजी और कारपोरेट हितों में लूट का मामला है. इसे किसी भी तरह से हल्के में नहीं लिया जा सकता है. इसे हल्के में लेने का अर्थ यह होगा कि देश निजी देशी-विदेशी निवेशकों और कंपनियों को यह सन्देश दे रहा है कि वह राष्ट्रीय संसाधनों के सार्वजनिक हित में इस्तेमाल को लेकर बेपरवाह है.

इसका नतीजा यह हो सकता है कि देशी-विदेशी कंपनियां स्पेक्ट्रम की तरह अन्य सीमित राष्ट्रीय संसाधनों जैसे तमाम खनिजों आदि के साथ भी यही व्यवहार कर सकती हैं. इस घोटाले की जड़ तक पहुँचना और सभी दोषियों को सजा दिलवाना इसलिए भी जरूरी है कि इसे भविष्य के लिए एक नजीर बनाया जा सकता है. यह नजीर पेश करना इसलिए जरूरी है कि यू.पी.ए सरकार उदारीकरण के तहत अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में निजी देशी-विदेशी कंपनियों को आमंत्रित कर रही है और सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह इन कंपनियों को सार्वजनिक हित में नियंत्रित करे.

लेकिन अगर बाड़ ही खेत खाने लगे तो क्या होगा? निश्चय ही, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सबसे संदेहास्पद भूमिका सरकार खासकर तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा की है. यह भी ठीक है कि इस घोटाले का सबसे अधिक फायदा देशी-विदेशी कंपनियों ने उठाया लेकिन उन्हें इसका मौका संचार मंत्रालय ने दिया. लेकिन इस पूरे मामले में गठबंधन सरकार होने के बावजूद खुद प्रधानमंत्री और पूरा मंत्रिमंडल भी अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता है.

सवाल है कि कोई प्रधानमंत्री यह जानते और देखते हुए भी कि एक मंत्री अपनी मनमानी कर रहा है और उससे देश को भारी नुकसान होने जा रहा है, चुप कैसे रह सकता है? ये और ऐसे ही कई सवाल हैं जिनका जवाब प्रधानमंत्री और सरकार को देना है. जनता की भावनाओं का सम्मान करनेवाली कोई भी सरकार इन सवालों से भाग नहीं सकती है. अगर सरकार पाक-साफ़ है और कुछ भी छुपाना नहीं चाहती है तो उसे जे.पी.सी से डर क्यों लगना चाहिए? सच यह है कि जे.पी.सी के गठन से सरकार की बदनामी नहीं बल्कि उसका खोया हुआ इक़बाल वापस आ सकता है. अलबत्ता, २ जी घोटाले की जे.पी.सी जाँच सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए और जाँच का दायरा जबसे टेलीकाम सेक्टर में उदारीकरण की शुरुआत हुई है, तब तक जाना चाहिए.  

क्या देश पी. आर डेमोक्रसी बनने की ओर बढ़ रहा है?

तीसरी और आखिरी किस्त

हाल के वर्षों में खासकर आर्थिक उदारीकरण के बाद जहां एक-एक सौदे और लाइसेंस में एक-दो नहीं बल्कि सैंकडों-हजारों करोड़ दांव पर लगे हुए हैं, वहां सौदे हासिल करने में पी.आर और लाबीइंग की ताकत का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.


लाबीइंग कंपनियां सरकार को अपने कारपोरेट क्लाइंट के पक्ष में रखने के लिए हर तिकडम आजमाती हैं. उनमें से ही एक है- मीडिया और पत्रकारों का इस्तेमाल. कई बार उनका इस्तेमाल मंत्रियों और अधिकारियों तक पहुंचने के लिए किया जाता है और कई बार उनके जरिये अपने अनुकूल राजनीतिक माहौल और जनमत तैयार किया जाता है.

इस कारण पी.आर अब सिर्फ पी.आर नहीं है बल्कि वह लाबीइंग और उससे बढ़कर क्राइसिस मैनेजमेंट, इमेज मैनेजमेंट और इश्यू मैनेजमेंट तक पहुंच चुका है जहां पी.आर कंपनियां अपने क्लाइंट्स के हितों को पूरा करने के लिए अपने प्रतिकूल हर सूचना और जानकारी को न सिर्फ मैनेज कर रही है बल्कि जवाब में झूठी सूचनाएं और जानकारियां प्रचारित कर रही हैं.

जाहिर है कि इसके लिए समाचार मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया जाता है. मीडिया एक तरह से पी.आर और लाबींग कंपनियों का अखाडा है जहां वे जनहित के नाम पर अपने क्लाइंट के हितों को आगे बढाती हैं. खबरों को नया स्पिन देती हैं.

इसलिए अगर आप कभी ध्यान से देखें कि चैनलों पर प्राइम टाइम की स्टूडियो चर्चाओं में चाहे वह राजनीतिक मुद्दा हो या आर्थिक या कोई अन्य मुद्दा- कुछ खास चेहरे ही आपको सभी मुद्दों पर स्वतंत्र एक्सपर्ट या सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई पड़ेंगे. इनमें सुहेल सेठ, अलिक पद्मसी, शोभा डे, प्रह्लाद कक्कर आदि अत्यधिक मौजूदगी एक खास पैटर्न की ओर इशारा करती है. इसी तरह, कुछ खास स्वतंत्र पत्रकारों जैसे विनोद शर्मा, स्वपन दासगुप्ता, चन्दन मित्र, विनोद मेहता, शेखर गुप्ता आदि की उपस्थिति भी एक स्पष्ट संकेत है.

ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे देश एक “पी.आर. डेमोक्रेसी” की ओर बढ़ रहा है जहां पी.आर और लाबीइंग की आड़ में मीडिया का अंडरवर्ल्ड बड़ी पूंजी और सत्ता के गठजोड़ के हक में जनमत बनाएगा. वह दिन दूर नहीं जब हालत कुछ कुछ ब्रिटेन की तरह होंगे जहां पत्रकारों की तुलना में पी.आर प्रोफेशनलों की संख्या ज्यादा हो चुकी है. निक डेविस के मुताबिक इस समय ब्रिटेन में 47800 पी.आर प्रोफेशनल्स और 45 हजार के आसपास पत्रकार हैं.

साफ है कि पी.आर और लाबीइंग की ताकत दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. मीडिया में सच की कीमत पर झूठ का सिक्का चल निकला है. दर्शकों-पाठकों को सच के नाम पर मैनेज्ड खबरें और विचार परोसे जा रहे हैं. वह दिन दूर नहीं है जब लाबीइंग को पूरी तरह से एक वैध प्रोफेशन बनाने की मांग उठने लगेगी.

('कथादेश' के दिसंबर'१० में प्रकाशित आलेख की आखिरी किस्त)

रविवार, दिसंबर 05, 2010

बढती जा रही है लाबीइंग और पी.आर कंपनियों की न्यूजरूम में घुसपैठ

 'कथादेश' में प्रकाशित स्तम्भ की दूसरी किस्त  

लेकिन अब बात यहीं तक सीमित नहीं रही. जैसाकि नीरा राडिया के टेप्स से जाहिर है कि वरिष्ठ पत्रकार अब सीधे सत्ता के गलियारों में बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स के हक में दलाली कर रहे हैं. वे पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के टाप मैनेजरों से सिर्फ खबरों के लिए बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उससे कहीं आगे बढ़कर उनके लिए काम कर रहे हैं. पी.आर और लाबीइंग कंपनियां उनके लेखन/खबरों का एजेंडा तय कर रही हैं. हालांकि बरखा दत्त का अपनी सफाई में कहना है कि जो लोग ऐसे आरोप लगा रहे हैं, उन्हें यह साबित करना चाहिए कि “मुझे दलाली के बदले में क्या मिला है? क्या मैंने खबरों से कोई समझौता किया है?”


लेकिन क्या बरखा दत्त यह बताएंगी कि 2 जी घोटाले में ए. राजा को क्या मिला है? राजा को अनियमितताओं के बदले में क्या मिला है, यह अभी किसी को पता नहीं है और न ही यह साबित हुआ है कि राजा ने पक्षपात के बदले में क्या लिया है? इसलिए सवाल यह नहीं है कि दलाली के बदले क्या मिला है बल्कि सवाल यह है कि नीरा राडिया जैसे लाबीइंग और पावर ब्रोकिंग की खुली खिलाड़ी से बात करते समय एक पत्रकार की लक्ष्मण रेखा क्या होनी चाहिए? दूसरे, वीर संघवी के सन्दर्भ में उससे बड़ा सवाल यह कि एक पत्रकार को अपनी टिप्पणियां लिखते या टी.वी पर बोलते हुए किस हद तक पी.आर और लाबीइंग मैनेजरों पर निर्भर रहना चाहिए?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि हाल के वर्षों में न सिर्फ पेड न्यूज के रूप में बल्कि बड़े देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों, पार्टियों, मंत्रियों-नेताओं और सरकार के लिए पी.आर और लाबीइंग करनेवाली कंपनियों की घुसपैठ समाचार कक्षों में बढ़ी है. यह चिंता की बात इसलिए है कि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के प्रभाव से न सिर्फ खबरों की स्वतंत्रता, तथ्यात्मकता और निष्पक्षता प्रभावित होती है बल्कि खबरों का पूरा एजेंडा बदल जाता है.

पी.आर और लाबीइंग कंपनियों को खबरों में अपने क्लाइंट के हितों के मुताबिक तोड़-मरोड़ करने, मनमाफिक खबरें प्लांट करने और नकारात्मक खबरों को रुकवाने के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि समाचार मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संपादकों की एक जिम्मेदारी पी.आर और लाबीइंग कंपनियों और उनके मैनेजरों को समाचार कक्ष से दूर रखने की भी रही है.

लेकिन जब संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ही पी.आर और लाबीइंग कंपनियों से प्रभावित और उनके लिए काम करने लगें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इन कंपनियों ने किस हद तक समाचार कक्षों का टेकओवर कर लिया है. नीरा राडिया प्रकरण इसी टेकओवर का सबूत है. असल में, भारत में लाबीइंग की घनघोर ताकत पर अभी बात नहीं हो रही है जबकि देश में अधिकांश बड़े आर्थिक और व्यावसायिक फैसले उसी के जरिये हो रहे हैं.

लाबीइंग के महत्व को स्पष्ट करते हुए जानी-मानी पी.आर और लाबीइंग कंपनी परफेक्ट रिलेशंस के मालिक दिलीप चेरियन कहते हैं कि, “ ..सभी चाहते हैं कि सरकार उनके पक्ष में रहे. इस बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में कई लोग कह सकते हैं कि उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है अगर सरकार उनके पक्ष में नहीं है बशर्ते वह उनके खिलाफ न हो. लेकिन यह सच नहीं है. सच यह है कि फ़िलहाल और आनेवाले वर्षों में भी सरकार को प्रभावित करना किसी भी कंपनी के सी.इ.ओ का सबसे महत्वपूर्ण काम होगा.”

चेरियन का कहना बिल्कुल सही है. हालत यह हो गई है कि सरकार को अपने पक्ष में और विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कार्पोरेट समूह अपने मनपसंद मंत्री और अफसर भी नियुक्त कराने लगे हैं. टेलीकाम मंत्री के रूप में ए. राजा की नियुक्ति के लिए लाबीइंग इसका एक उदाहरण है. इसी तरह, अन्य आर्थिक मंत्रालयों में हुई मंत्रियों और अफसरों की नियुक्ति में भी लाबीइंग की जबरदस्त भूमिका रही है.

जारी...कल पढ़िए भारत के पी.आर लोकतंत्र बनते जाने की कहानी...  

शनिवार, दिसंबर 04, 2010

मीडिया के अंडरवर्ल्ड से सबसे अधिक खतरा लोकतंत्र को है

सत्ता, पूंजी और लाबीइंग के खेल में मीडिया

“भारतीय गणतंत्र अब बिकाऊ है. इसके लिए लग रही बोली में ताकतवर लोग, कारपोरेट घराने, दलाल, नौकरशाह और पत्रकार सभी शामिल हैं.”
- साप्ताहिक ‘आउटलुक’ (कवर स्टोरी, 29 नवंबर’10)

समाचार मीडिया का एक अंडरवर्ल्ड है. यह किसी से छुपा नहीं है. हाल के वर्षों में उसका न सिर्फ तेजी से विस्तार हुआ है बल्कि वह बेरोक-टोक फल-फूल रहा है. यह एक ऐसा सच है जिसके बारे में सब जानते हैं, समाचार मीडिया को नजदीक से जाननेवालों और पत्रकारों की निजी बातचीत में उसके बारे में खूब चर्चा भी होती है लेकिन सार्वजनिक चर्चाओं में शायद ही उसका कभी जिक्र होता हो. हालांकि यह अनेक कारणों से लोक महत्व का बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने को लेकर एक खास तरह की ‘षड्यंत्र भरी चुप्पी’ (कांस्पिरेसी आफ साइलेंस) मीडिया और अन्य मंचों पर दिखाई पड़ती है.

मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड के बारे में चर्चा से परहेज की कई वजहें हो सकती हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि संख्या में कम होते हुए भी यह अंडरवर्ल्ड बहुत संगठित, ताकतवर, प्रभावशाली और इसका नेटवर्क बहुत व्यापक है. इसमें मीडिया समूहों के मालिक, टाप मैनेजर, वरिष्ठ संपादक और टाप रिपोर्टर शामिल हैं. इस अंडरवर्ल्ड का सीधा सम्बन्ध पावर लाबीज़ और पावर ब्रोकर - सत्ता के दलालों- से है या कहिये कि मीडिया का अंडरवर्ल्ड पावर लाबीज़ का अनिवार्य हिस्सा है. इस पावर लाबी में टाप उद्योगपतियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और उनके दलालों के साथ-साथ मीडिया समूहों के मालिक, संपादक और वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं.

आज बिना किसी जोखिम के कहा जा सकता है कि यही पावर लाबीज़ और सत्ता के दलाल केन्द्र और राज्यों की सरकारें चला रहे हैं. सरकारें चाहें जिस पार्टी या गठबंधन की हों लेकिन उनकी नीतियों और फैसलों पर इन पावर लाबीज़ और पावर ब्रोकर्स की छाप साफ देखी जा सकती है. इस पावर लाबी की ताकत और प्रभाव का अंदाज़ा 2 जी घोटाले में आ रहे नामों से लगाया जा सकता है जिसमें टेलीकाम मंत्री ए. राजा के अलावा उद्योगपतियों, कारपोरेट समूहों, अफसरों, राजनेताओं के साथ-साथ नीरा राडिया जैसे पी.आर और लाबीइंग मैनेजरों और एन.डी.टी.वी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त और हिंदुस्तान टाईम्स के संपादकीय निदेशक वीर संघवी भी शामिल हैं.

यहां यह उल्लेख करते चलना जरूरी है कि टाटा समूह और मुकेश अम्बानी के रिलायंस समूह जैसे बड़े कारपोरेट समूहों के लिए सत्ता के गलियारों में लाबीइंग करनेवाली नीरा राडिया (वैष्णवी कम्युनिकेशन और नोएशिस स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन आदि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों की मालिक) और बरखा दत्त, वीर संघवी, प्रभु चावला और एम.के वेणु जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की प्राइवेट फोन बातचीत के टेप हाल ही में जारी हुए हैं.

हालांकि इन सभी पत्रकारों का अपनी सफाई में यह कहना है कि ये बातचीत एक पत्रकार और उसके सूत्र (सोर्स) के बीच की बातचीत है जिसमें कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन इन टेपों में बातचीत के ऐसे कई प्रसंग हैं जो एक पत्रकार और उसके सूत्र के बीच वैध बातचीत की सीमाओं का उल्लंघन लगती हैं. उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि ये वरिष्ठ पत्रकार भी सत्ता की दलाली और लाबीइंग के खेल में कहीं न कहीं से शामिल हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि 2 जी घोटाले और उससे जुड़े इस टेप प्रसंग की चर्चाएं पिछले कई महीनों से हवाओं में थीं. यहां तक कि नीरा राडिया के टेप्स का उल्लेख संसद से लेकर बाहर तक भी हुआ लेकिन मीडिया के स्टार पत्रकारों की भूमिका पर फिर भी किसी ने बात करने की हिम्मत नहीं की. लेकिन अब उनके छपने और कई वेबसाइट्स पर आ जाने के बाद यह सवाल उठाने लगा है कि मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड पर खुद मीडिया में और उससे बाहर बात क्यों नहीं होती है?

असल में, आपसी गलाकाट प्रतियोगिता के बावजूद इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सभी मीडिया समूहों और संपादकों में एक तरह की अलिखित सहमति है कि एक-दूसरे के बारे में खासकर एक-दूसरे के अवैध और अनुचित कामों के बारे में तब तक न कुछ छापेंगे और न दिखाएंगे जब तक कि वह बिल्कुल सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बन जाए और जिसे छुपाना असंभव हो.

क्या इसकी वजह यह है कि इस खेल में अलग-अलग स्तरों पर सभी कहीं न कहीं से शामिल हैं? अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. दूसरे, जो इक्का-दुक्का मीडिया समूह और पत्रकारों का बड़ा हिस्सा इस खेल में शामिल नहीं है, वह भी उनके ताकत और प्रभाव के कारण कुछ बोलने-कहने में हिचकिचाता है. आखिर इन मीडिया समूहों को भी कारपोरेट समूहों से विज्ञापन और सरकार से सहूलियतें चाहिए और दूसरी ओर, अधिकांश पत्रकारों के सामने नौकरी और कैरियर की चिंता होती है. माना जाता है कि अगर आपने मीडिया के अंडरवर्ल्ड की कारगुजारियों पर सार्वजनिक चर्चा की तो एक प्रोफेशनल पत्रकार के रूप में मीडिया में आपका टिके रहना मुश्किल हो जायेगा.

कुछ ऐसे संजीदा और समझदार लोग भी हैं जो एक खास समझदारी के तहत मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड के बारे में चर्चा नहीं करना चाहते हैं. उनका मानना है कि देश में अब कुछ ही संस्थाएं ऐसी बची हैं जिनसे अभी भी लोगों को उम्मीद है और जो कुछ भटकावों के बावजूद अपनी भूमिकाएं और जिम्मेदारियां निभा रही हैं. न्यायपालिका, चुनाव आयोग और सी.ए.जी के साथ-साथ समाचार मीडिया भी इनमें से एक है. उनका मानना है कि अगर इनकी भी साख पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो देश में लोकतंत्र का चलना और उसका जीवित रहना मुश्किल हो जायेगा.

खुद चुनाव आयोग के मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी ने कुछ समय पहले एक गोष्ठी में यह चिंता जाहिर की थी. इसी तरह, नीरा राडिया टेप्स के सामने आने के बाद सुचेता दलाल जैसी पत्रकार भी इस तरह की आशंका जाहिर कर रही हैं.

इस चिंता की मूल भावना से सहमत होते हुए सवाल यह है कि जो समाचार मीडिया सबकी जिम्मेदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करता है, उसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या उसकी कोई जवाबदेही नहीं है? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मीडिया की साख बचाने के नाम पर उसके अंडरवर्ल्ड और उसकी कारगुजारियों पर चुप रहने से लोकतंत्र बच जायेगा?

असल में, मीडिया के अंडरवर्ल्ड से सबसे अधिक खतरा लोकतंत्र को ही है क्योंकि वह धीरे-धीरे पूरे समाचार मीडिया को हाइजैक करता जा रहा है. चिंता की बात यह है कि पावर लाबीज़ और ब्रोकर्स के साथ मिलकर मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड ने समाचार मीडिया को उसकी लोकतान्त्रिक भूमिका और जिम्मेदारियों से दूर करना और सत्ता, बड़ी पूंजी और ताकतवर लोगों की सेवा में लगाना शुरू कर दिया है.

यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि आज मीडिया का यह अंडरवर्ल्ड खुद लोकतंत्र के साथ क्या खिलवाड़ कर रहा है? पेड न्यूज का विवाद सबके सामने है. खबरों की खरीद-फरोख्त के इस संगठित खेल ने सबसे अधिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही नुकसान पहुँचाया है. इसने न सिर्फ पाठकों-दर्शकों के जानने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया है बल्कि उनके साथ दिखा भी किया है. इस प्रसंग को यहीं छोड़ते हैं क्योंकि इस बारे में पिछले कई महीनों से काफी चर्चा हो रही है. लेकिन पेड न्यूज का यह खेल सिर्फ चुनावों के समय खबरों की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रहा है. इसका दायरा बहुत बड़ा है और यह धीरे-धीरे सभी तरह की खबरों, फीचर और संपादकीय विचारों तक फ़ैल चुका है.
(बाकी कल...)
(मासिक 'कथादेश' के दिसंबर'१० में प्रकाशित लेख की प्रथम किस्त)

गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

लाबीइंग के खेल में हिंदी वाले दूध के धुले नहीं हैं

हिंदी मीडिया का अंडरवर्ल्ड : दलाली से ब्लैकमेल तक


नीरा राडिया टेप्स ने न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड से पर्दा उठा दिया है. अभी तक यह अंडरवर्ल्ड अख़बारों और चैनलों के समाचार कक्षों और प्रेस क्लबों में व्यक्तिगत बातचीत, कानाफूसियों और गासिप तक सीमित था. लेकिन यहां ‘आउटलुक’ को धन्यवाद देना जरूरी है जिसकी हिम्मत के कारण न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के एक हिस्से की कारगुजारियां सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बन गई हैं. इन टेप्स से समाचार माध्यमों और उनके उंचे पदों पर बैठे पत्रकारों के सत्ता और कारपोरेट समूहों के दलालों के साथ निरंतर घनिष्ठ होते संबंधों और उनके लेखन और रिपोर्टिंग पर पी.आर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों की निर्णायक रूप से पुष्टि होती है.

यह कई कारणों से चिंताजनक है. असल में, इन टेप्स में कई बड़े कारपोरेट समूहों के लिए सत्ता के गलियारों में लाबीइंग करनेवाली नीरा राडिया अंग्रेजी मीडिया के कई जाने-माने चेहरों और वरिष्ठ पत्रकारों से जिस अंतरंगता और अधिकार के साथ बातें करती हुई सुनाई देती हैं, उसके कंटेंट में ऐसा बहुत कुछ है जो एक पत्रकार और उसके समाचार स्रोत के बीच की बातचीत के दायरे से बाहर चला जाता है. निश्चय ही, एक पत्रकार को समाचार संग्रह और रिपोर्टिंग के लिए बहुत तरह के स्रोतों से बातचीत करनी पड़ती है और करनी चाहिए. उनमें पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के अधिकारी भी हो सकते हैं लेकिन ऐसी किसी भी बातचीत की कुछ सीमाएं भी हैं.

अफसोस की बात है कि नीरा राडिया के साथ बातचीत में कई पत्रकार, एक पत्रकार की स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका छोड़कर लाबीइंग कंपनी के एजेंट की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं. बातचीत से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इनमें से कुछ पत्रकार सत्ता की दलाली में शामिल हैं. साफ है कि ऐसा करते हुए वे अपनी भूमिकाओं से समझौता करते हुए दिखाई देते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी रिपोर्टिंग और लेखन भी इस सबसे परोक्ष –अपरोक्ष जरूर प्रभावित होती होगी.

असल में, हाल के वर्षों में न सिर्फ खबरों की खरीद-फरोख्त यानी पेड न्यूज के रूप में बल्कि बड़े देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों, पार्टियों, मंत्रियों-नेताओं और सरकार के लिए पी.आर और लाबीइंग करनेवाली कंपनियों की घुसपैठ समाचार कक्षों में बहुत ज्यादा बढ़ गई है. यह चिंता की बात इसलिए है कि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के प्रभाव से न सिर्फ खबरों की स्वतंत्रता, तथ्यात्मकता और निष्पक्षता प्रभावित होती है बल्कि खबरों का पूरा एजेंडा बदल जाता है. पी.आर और लाबीइंग कंपनियों को खबरों में अपने क्लाइंट के हितों के मुताबिक तोड़-मरोड़ करने, मनमाफिक खबरें प्लांट करने और नकारात्मक खबरों को रुकवाने के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि समाचार मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संपादकों की एक जिम्मेदारी पी.आर और लाबीइंग कंपनियों और उनके मैनेजरों को समाचार कक्ष से दूर रखने की भी रही है.

लेकिन जब संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ही पी.आर और लाबीइंग कंपनियों से प्रभावित और उनके लिए काम करने लगें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इन कंपनियों ने किस हद तक समाचार कक्षों का टेकओवर कर लिया है. नीरा राडिया प्रकरण इसी टेकओवर का सबूत है. लेकिन यह केवल अंग्रेजी मीडिया और कुछ जाने-पहचाने पत्रकारों तक सीमित नहीं हैं. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओँ का मीडिया भी दूध का धुला नहीं है. सच यह है कि हिंदी न्यूज मीडिया में भी सत्ता और बड़ी पूंजी की दलाली पर खड़े मीडिया के अंडरवर्ल्ड का पिछले तीन दशकों खासकर उदारीकरण के बाद काफी तेजी से विस्तार हुआ है. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड में चुनिन्दा संपादकों, वरिष्ठ पत्रकारों और रिपोर्टरों के अलावा उनके मालिकान भी शामिल हैं.

इस अंडरवर्ल्ड की बढ़ती ताकत और प्रभाव का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसकी सीधी पहुंच हिंदी क्षेत्रों के केन्द्रीय मंत्रियों, अन्य प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, बड़े अफसरों और नेताओं के अन्तःकक्षों तक है. हिंदी भाषी किसी भी राज्य में चले जाइये, मुख्यमंत्रियों के किचन कैबिनेट में आपको चुनिन्दा मंत्रियों, नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों, पावर ब्रोकर्स के अलावा कुछ संपादक और पत्रकार और भी मिल जाएंगे. हालांकि कुछ हद तक उत्तर प्रदेश में मायावती इसकी अपवाद हैं लेकिन उनकी जगह सत्ता के दूसरे सबसे ताकतवर केन्द्रों- सतीश मिश्र और कैबिनेट सचिव शशांक शेखर की किचन कबिनेट में चुनिन्दा संपादक-पत्रकार मौजूद हैं.

वास्तव में, यही किचन कैबिनेट राज्यों में राजकाज चला रही है. इसी किचन कैबिनेट में बड़े सौदों के लिए डील पक्की होती है. ठेके तय होते हैं. ट्रांसफर-पोस्टिंग का धंधा चलता है. लेकिन यहां तक पहुंच आसान नहीं है. कई मामलों में सौदे या डील पक्की करने के लिए इस किचन कैबिनेट तक पहुंचने के वास्ते उद्योगपति, कारोबारी, ठेकेदार और अफसर इस कैबिनेट के सदस्य संपादक-पत्रकारों को भी जरिया बनाते हैं. वे खुशी-खुशी जरिया बन भी रहे हैं. सौदे करा रहे हैं और उसकी मलाई भी काट रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि ऐसे संपादकों और पत्रकारों का सबसे पहले इस्तेमाल उनके मीडिया समूहों के मालिकान अपने दूसरे उद्योग धंधों और कारोबारों के लिए लाइसेंस, परमिट और कोटा लेने के अलावा अन्य तमाम वैध-अवैध कामों के लिए करते हैं.

हालात इतने खराब हैं कि कई अखबार और चैनल तो अपने संपादकों और रिपोर्टरों को मंत्रियों, अफसरों और व्यापारियों/ठेकेदारों के भयादोहन के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं. यही नहीं, हिंदी के कई बड़े अखबार समूहों और छोटे क्षेत्रीय चैनलों में संपादक या ब्यूरो चीफ या चीफ रिपोर्टर आदि बनने के लिए प्रोफेशनल काबिलियत से अधिक आपकी केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और बड़े अफसरों तक पहुंच और उनसे खबर निकालने की नहीं बल्कि काम करा पाने की आपकी क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी हो गई है. जैसे ही आप हिंदी के कई बड़े अख़बारों में स्थानीय संपादक/ब्यूरो चीफ/चीफ रिपोर्टर के पदों पर बैठे कई लोगों का अतीत और वर्तमान टटोलेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर उनकी दलाली की कहानियां सामने आने लगेंगी.

आश्चर्य नहीं कि अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बड़े-छोटे अखबार या क्षेत्रीय चैनल राज्य सरकारों के प्रति बहुत नरम रूख रखते हैं और मुख्यमंत्रियों के गुणगान में लगे रहते हैं. ऐसा लगता है कि जैसे इन राज्यों में रामराज्य आ गया हो. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड ने हिंदी न्यूज मीडिया के जनहित के मुद्दों पर तीखे तेवर, भ्रष्टाचार-अनियमितताओं के भंडाफोड और सरकार के प्रति आलोचनात्मक आवाज़ को कमजोर और खामोश कर दिया है.
('आउटलुक' हिंदी में दिसंबर'१० अंक में प्रकाशित आलेख)
नोट: जल्दी ही मीडिया पर पी.आर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों पर तीन किस्तों में विस्तृत आलेख पढ़िए जो 'कथादेश' के दिसंबर अंक में छपा है.