बुधवार, अप्रैल 17, 2013

आरामतलब या पार्टनरशिप पत्रकारिता?

मीडिया में आँख मूंदकर मोदी गान हो रहा है   

भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के घोषित-अघोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के अश्वमेध का घोड़ा देशव्यापी अभियान पर निकल चुका है. दूसरी ओर, कांग्रेस के युवराज भी शर्माते-सकुचाते मैदान में उतर गए हैं. दोनों के बीच जुबानी जंग शुरू हो चुकी है.
पहले दौर के वाकयुद्ध में छींटाकशी, सवाल-जवाब और आरोप-प्रत्यारोप के साथ अपनी कामयाबियों का बखान भी हो रहा है. इस दौर में दोनों नेता खासकर मोदी पार्टी फोरम से लेकर कारपोरेट मंचों पर देश की समस्याओं को हल करने के दावे और विजन पेश करते नजर आ रहे हैं.
लेकिन असली लड़ाई न्यूज चैनलों के पर्दों/स्टूडियो और सोशल मीडिया के स्क्रीन पर लड़ी जा रही है जहाँ दोनों ओर से स्पिन डाक्टर्स और सोशल मीडिया के पेड कारकून छवि बनाने और बिगाड़ने और धारणाओं (परसेप्शन) की लड़ाई में हर हथियार आजमा रहे हैं.

हालाँकि मैदान में प्रधानमंत्री पद के कई और दावेदार भी हैं लेकिन मीडिया में उन्हें कोई खास भाव नहीं मिल रहा है. मतलब लेवल-प्लेइंग फील्ड नहीं है. मीडिया ने असली मुकाबले से पहले इसे ‘राहुल बनाम मोदी’ की लड़ाई बना दिया है. चैनलों और सोशल मीडिया में यही दोनों छाए हैं.

लेकिन छवि निर्माण की इस लड़ाई में मोदी का कोई जवाब नहीं है. मोदी ने प्रोफेशनल पी.आर कंपनियों से लेकर सोशल मीडिया के पेड कार्यकर्ताओं की मदद से एक सुनियोजित अभियान छेड दिया है. इस अभियान के तहत एक ओर मोदी खुद गुजरात में अपनी उपलब्धियों का गुणगान कर रहे हैं और दूसरी ओर, सुशासन और विकास के ऐसे फार्मूले बता रहे हैं जिनसे देश की सभी समस्याओं का चुटकियाँ बजाते ही समाधान हो जाएगा.                                    

यहाँ तक तो ठीक है. लोकतंत्र में सत्ता के सभी दावेदारों को अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने से लेकर सोच-नीतियां-कार्यक्रम बताने का पूरा अधिकार है.
लेकिन लोकतंत्र में ऐसे मौके पर न्यूज मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उससे एक बहु-सूचित विमर्श की अपेक्षा होती है. खासकर जिस तरह से भारतीय राजनीति का मीडियाकरण (मीडिया-टाईजेशन)  हो रहा है, उसमें सूचनाओं के लिए मीडिया पर नागरिकों की निर्भरता बढ़ती जा रही है.

लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले कुछ सप्ताहों में गुजरात से लेकर बंगाल तक मोदी जहाँ भी जा रहे हैं, मीडिया खासकर चैनल उनके साथ-साथ हैं. वे जिन मंचों पर बोल रहे हैं, चैनल उन्हें लाइव दिखा रहे हैं.

यही नहीं, लाइव के अलावा सुबह से रात तक उनके भाषणों के चुनिंदा क्लिप अहर्निश चल रहे हैं और प्राइम टाइम चर्चाओं में भी वे छाए हुए हैं. मोदी के लिए मीडिया ‘जादुई गुणक’ (मैजिक मल्टीप्लायर) बन गया है जो उनके आधे सच्चे-आधे झूठे दावों-फार्मूलों को बिना किसी स्वतंत्र जांच पड़ताल और सवाल-जवाब के एक वैधता सा दे रहा है.
इस तरह मीडिया खासकर चैनल मोदी के इस प्रचार अभियान में जाने-अनजाने पार्टनर से बनते जा रहे हैं. यह एक गंभीर समस्या है. सवाल यह है कि मीडिया खासकर चैनलों का काम क्या सिर्फ पोस्ट-आफिस का है? या, उनके आडिएंस की अपेक्षा यह है कि वे नेताओं के दावों/बयानों की पत्रकारीय जांच-पड़ताल और छानबीन भी करें और उन्हें उनके पूरे सन्दर्भ के साथ पेश करें?
उदाहरण के लिए, मोदी ने फिक्की की महिला सभा में गुजरात की राज्यपाल पर आरोप लगाया कि वे महिला होकर भी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए ५० फीसदी सीटें आरक्षित करनेवाले विधेयक को मंजूरी नहीं दे रही हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी का यह आरोप तुरंत सुर्खी बन गया और घंटों चैनलों पर चलता रहा.

लेकिन किसी चैनल ने इस आरोप की और छानबीन करने की जरूरत नहीं समझी. भला हो, एन.डी.टी.वी-इंडिया का जिसपर उस रात ‘तहलका’ की राणा अयूब ने खुलासा किया कि यह विधेयक अनिवार्य वोटिंग के प्रावधान के कारण रोका गया है.       

यह अकेला मामला नहीं है. ऐसे अनेकों दावे हैं जिनकी छानबीन और पूरे संदर्भ के साथ पेश करना जरूरी है. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है.
कहना मुश्किल है कि यह आरामतलब पत्रकारिता का नतीजा है या पार्टनरशिप पत्रकारिता का? वजह चाहे जो हो लेकिन मोदी और उनकी प्रचार टीम इसका पूरा फायदा उठा रही है और नुकसान दर्शकों-पाठकों और व्यापक अर्थों में लोकतंत्र का हो रहा है.
('तहलका' के 30 अप्रैल के अंक में प्रकाशित। आप इसे तहलका हिंदी की वेबसाईट पर भी पढ़ सकते हैं।)       

1 टिप्पणी:

Anoop Kumar Mishra ने कहा…

अमेरिका में पत्रकार से ज़्यादा जनसम्पर्ककर्मी कार्य कर रहे हैं। प्रकाशित-प्रसारित होनेवाली सामग्री अक्सर पी.आर. कम्पनियाँ तैयार करती हैं। ऐसी सामग्रियों में पत्रकारिता की अपेक्षा प्रचारीय गुण ज़्यादा होते हैं। वही हालात आज भारत की भी हो रही है। मोदी के अफ़सानों और उनके द्वारा सब्ज़बाग़ दिखाने की कला को मीडिया द्वारा जस-का-तस पेश किया जाना बढ़ते व्यावसायीकरण को इंगित करता है। इस प्रक्रिया में विषय-वस्तु सत्ता का समर्थन करनेवाली, हल्की-फुल्की और नाटकीय-अतिनाटकीय हो जाती है। ऐसे विषयों से दूरी बना ली जाती है, जिनमें ज़्यादा ख़र्च व समय लगे और साथ ही ख़तरा भी हो। जाँच-पड़ताल और गहन पत्रकारिता का ज़माना लदता जा रहा है।

जुर्गेन हैबरमास की चिंता वाजिब है कि बाज़ार और व्यावसायीकरण ने लोकवृत्त का औपनिवेशीकरण कर लिया है। वह संचार-सामग्री, जिससे ज्वलंत मुद्दों पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, को ख़त्म करके ऐसी सामग्री को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे बाज़ारवृत्त का हित-संवर्द्धन हो।