रविवार, जनवरी 03, 2010

मीडियानामा

चाहिए और सतर्क और सक्रिय समाचार मीडिया

एक सतर्क, सजग और सक्रिय समाचार मीडिया क्या कुछ कर सकता है, इसका एक और चमकीला उदाहरण हम सबके सामने है। रुचिका गिरहोत्रा के मामले में सी।बी।आई कोर्ट के फैसले के बाद मीडिया ने जिस तरह से हरियाणा के पूर्व डी.जी.पी रहे एस.पी.एस राठौर और उसके राजनीतिक संरक्षकों को घेरा है और केंद्र और राज्य सरकार को पूरे मामले को फिर से खोलने के लिए बाध्य किया है, वह एक लोकतान्त्रिक समाज में समाचार मीडिया की शक्ति और प्रभाव का एक और प्रमाण है।
रुचिका के बहाने ऐसे कई और मामले खुले में सामने आ रहे हैं और प्रभावशाली अपराधियों को संरक्षण दे रही सरकारों को कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सहज ही कल्पना की जा सकती है कि अगर सतर्क और सक्रिय समाचार मीडिया नहीं होता तो क्या रुचिका को न्याय मिलने की कोई उम्मीद की जा सकती थी? और रुचिका ही क्यों, जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू, नितीश कटारा जैसे चर्चित मामलों में भी ताकतवर और कानून को अपने घर की चेरी माननेवालों के खिलाफ लड़ने और न्याय होने की आशा जगी है तो उसमे मीडिया की बहुत उल्लेखनीय भूमिका है।

निश्चय ही, ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जिनमें मीडिया की सक्रियता और खुलकर स्टैंड लेने के कारण सत्ता, विधायिका और न्यायपालिका को नींद से जगना पड़ा है और न चाहते हुए भी जनमत के डर से कड़े फैसले करने पड़े हैं।
इसके लिए कार्पोरेट मीडिया का मुझ जैसा कड़ा आलोचक भी खुले दिल से उसकी प्रशंसा करना चाहता है। हालांकि मीडिया की इस सक्रियता में भी उसकी मध्यमवर्गीय सीमाएं और शहरी पूर्वाग्रह साफ देखे जा सकते हैं लेकिन इसके बावजूद मीडिया की यह सक्रियता स्वागतयोग्य है। सच पूछिए तो लोकतंत्र के चौथे खम्भे मीडिया से देश और समाज की अपेक्षाएं इससे कहीं अधिक हैं। ये अपेक्षाएं रुचिका जैसे मामलों में मीडिया की सक्रियता से न्याय होने की बढ़ी उम्मीदों के कारण और भी ज्यादा बढ़ गई हैं।

दरअसल, यही समाचार मीडिया की असली भूमिका है। लोकतंत्र में वह आम आदमी यानि गरीबों, कमजोरों, हाशिये पर पड़े लोगों और जिनकी कोई आवाज़ नहीं है, उनकी आवाज़ है। वह उनके हितों का पहरेदार (वाचडाग) है और उससे हमेशा यह अपेक्षा रहती है कि वह सोनेवालों को जगाता रहे।
अफसोस कि बात यह है कि पिछले दो दशकों में समाचार मीडिया के चरित्र में ऐसा बदलाव आया है कि वह लोगों को जगाने की अपनी मूल भूमिका छोड़कर उन्हें सुलाने में ज्यादा जुटा रहता है। ऐसा लगता है कि अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के दबाव में वह हनुमान की तरह अपनी इस शक्ति को भूल गया है। इसकी कीमत अंततः लोगों को ही चुकानी पड़ती है।
जरा सोचिये, अगर समाचार मीडिया हर दिन इसी सक्रियता के साथ कई और गुमनाम रुचिकाओं, जेसिकाओं, नितीशों और उनसे आगे बढ़कर गरीबों, किसानो, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और विस्थापितों की आवाज़ उठाने लगे तो क्या सत्ता में बैठे लोगों को नींद आ पायेगी?
इसीलिए हमें और सक्रिय, सजग और सतर्क समाचार मीडिया की जरूरत है। क्या मीडिया अपनी इस ताकत को पहचानेगा?

3 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

अब तो शायद ही पहचान पाए....क्योकि अब होड़ टी आर पी बढ़ाने कि और ज्यादा पैसा कमाने की दोड़ शुरू हो चुकी है....ऐसे मे क्या उम्मीद की जा सकती है.....

abhishek parashar ने कहा…

it is not actually the achievement of media rather it was a step by which speadly loosing crediblity would be maintained.why always ruchika and in litle past jesica and all ,reason is clear because they belong to that class who is good looking, photogenic,and consumer class in regarding of media consumption.
among all there is a great similarities that all were crime story which has a huge magnitude of sensation ,and deviated human interests which leads to huge trp .its obvious interests of media which is shown by it again and again.even in such case also.....
all those issue which has been tackled by media ,mostly related to crime , murder ,rape etc and even by crossing their limitations .whatever is going in media thats only during crisis not before and after .this is not a plural character only harmonious and pleasure giving .that entertain u only on the name of some symbolic achievement which also belong to a class it may be of selective target ,news items etc .
we can have proud over media only for a second not more.

विजय प्रताप ने कहा…

लेकिन मीडिया की यह सजगता हाई प्रोफाइल मामलों तक ही सिमटा है, जिसमे लोगों को भी सेक्स, रोमांस, रोमांच और अपराध का मिलाजुला स्वाद चखने को मिलता है.