बुधवार, सितंबर 28, 2011

सस्ते तेल का जमाना गया, उसके विकल्प के बारे में सोचिये


कच्चे तेल पर सट्टेबाजों की नजर और बड़ी तेल कंपनियों को भारी मुनाफे की लत लग चुकी है



यू.पी.ए सरकार ने जब से पेट्रोल की कीमतें सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दी हैं, देशी तेल कम्पनियाँ बिना नागा हर दूसरे-तीसरे महीने पेट्रोल की कीमतों में एकमुश्त बड़ी बढोत्तरी किये जा रही हैं. इसके लिए कभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों का बहाना बनाया जाता है और कभी डालर के मुकाबले रूपये की कीमत में गिरावट का रोना रोया जाता है.

सरकार हर बार हाथ झाड़कर खड़ी हो जाती है कि इस मामले में कुछ नहीं कर सकती है क्योंकि देश अपने कुल पेट्रोलियम खपत का ७० फीसदी आयात करता है. एक खालिस कारोबारी की तरह सरकार का तर्क है कि चूँकि कच्चे तेल का आयात अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर होता है, इसलिए घरेलू उपभोक्ताओं को भी पेट्रोलियम उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार की कीमतें अदा करने के लिए तैयार रहना चाहिए.

दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे पेट्रोलियम की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव का दौर जारी है. पिछले तीन वर्षों में कच्चे तेल की कीमतें १४५ डालर प्रति बैरल से लेकर ८० डालर प्रति बैरल के रेंज में चढ़-उतर रही हैं. फ़िलहाल, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जहाँ अमेरिकी डब्ल्यू.टी.आई कच्चे तेल की कीमत ८५ डालर प्रति बैरल के आसपास है, वहीँ ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत ११० डालर प्रति बैरल के आसपास है.

माना जा रहा है कि आनेवाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का यह दौर जारी रहेगा. हालांकि तात्कालिक तौर पर यूरोपीय देशों सहित अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सुस्ती के कारण तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ है लेकिन इसके बावजूद अधिकतर विश्लेषकों का मानना है कि आनेवाले महीनों और वर्षों में कच्चे तेल की कीमतें ऊपर की ओर ही जाएँगी.

साफ है कि सस्ते तेल का जमाना बीत गया. मतलब यह कि कच्चा तेल अब ४० से ५५ डालर प्रति बैरल नहीं मिलनेवाला है. यही नहीं, वह ६० से ८० डालर प्रति बैरल के रेंज से भी बाहर निकल चुका है. कच्चे पेट्रोलियम का नया नार्मल रेंज ९० से ११० डालर प्रति बैरल के बीच माना जा रहा है.

कहने का मतलब यह कि इस दर को लेकर अब कोई खास शिकायत या बहस नहीं रह गई है. कहीं कोई हंगामा नहीं है. दुनिया के बड़े या छोटे देशों की ओर से विरोध में आवाजें नहीं उठ रही हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि दुनिया और खासकर भारत जैसे देशों को अब कच्चे पेट्रोल की ऊँची कीमतें चुकाने के लिए तैयार रहना होगा.

असल में, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे पेट्रोलियम की लगातार बढ़ती कीमतों के पीछे कई कारण हैं. तात्कालिक तौर पर मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता, जन असंतोष और युद्ध के कारण आपूर्ति में बाधा के अलावा चीन और भारत जैसे विकासशील देशों तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में तेल की बढ़ती मांग को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

दीर्घकालिक कारणों में सबसे जोर-शोर से “पीक आयल” की थीसिस पर चर्चा हो रही है जिसके मुताबिक, दुनिया में तेल के भण्डार सीमित हैं और तेल की बढ़ती जरूरतों के कारण जिस तेजी से उसका दोहन हो रहा है, उससे तेल के भंडार निरंतर छीज रहे हैं. ऐसे में , वह दिन दूर नहीं जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने सर्वोच्च स्तर (पीक आयल) पर पहुंचकर ठहर जाएगा और फिर गिरना शुरू हो जाएगा.

हालांकि विश्लेषकों में इस मुद्दे पर मतभेद है कि “पीक आयल” की स्थिति कब आएगी लेकिन अधिकांश विश्लेषक वर्ष २०१२ से लेकर २०१८ के बीच इस स्थिति के आने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि अगले कुछ वर्षों में पीक आयल की स्थिति आनेवाली है जब कच्चे तेल के उत्पादन में ठहराव और फिर गिरावट आना शुरू हो जाएगा.

लेकिन निकट भविष्य में तेल की मांग में कमी आती नहीं दिखाई पड़ रही है. खासकर चीन और भारत जैसे देशों में तेल की खपत और तेजी से बढ़ेगी. जाहिर है कि मांग और आपूर्ति में बढ़ते फासले के कारण कीमतों पर दबाव और बढ़ेगा.

हालांकि तेल की खपत और मांग में वृद्धि के मौजूदा ट्रेंड को देखते हुए अगले चालीस-पचास वर्षों तक तेल के भण्डार खत्म होनेवाले नहीं हैं लेकिन तेल की आपूर्ति में थोड़े भी उतार-चढ़ाव से उसकी कीमतों में कहीं ज्यादा उतार-चढ़ाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. तेल की कीमतों की इस संवेदनशील स्थिति ने हाल के वर्षों में सट्टेबाजों को इसपर दांव लगाने के लिए ललचाया है.

इसके अलावा दुनिया भर में शेयर बाजार समेत अन्य वित्तीय बाजारों की खस्ताहाल स्थिति ने भी वित्तीय बाजार के बड़े सट्टेबाजों को जिंस बाजार की ओर आकर्षित किया है. आश्चर्य नहीं कि पिछले दो-ढाई वर्षों में जिंस बाजार में लगभग सभी जिंसों की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है.

कहने की जरूरत नहीं है कि सट्टेबाजों ने कच्चे तेल पर बड़े दांव लगाने शुरू कर दिए हैं. इसका सीधा असर उसकी कीमतों पर पड़ रहा है. तेल की कीमतों को जमकर ‘मैनीपुलेट’ किया जा रहा है. हैरानी की बात नहीं है कि पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं की सुस्ती के कारण कच्चे तेल की मांग में धीमी वृद्धि के बावजूद कीमतें नीचे आना तो दूर लगातार चढ़ रही हैं.

इसे बड़ी बहुराष्ट्रीय तेल कम्पनियाँ भी शह दे रही हैं क्योंकि इससे उनका मुनाफा भी खूब तेजी से बढ़ रहा है. हालत यह हो गई है कि तेल की मांग और कीमतों में गिरावट के बावजूद बड़ी तेल कंपनियों के मुनाफे में भारी बढोत्तरी दर्ज की गई है.

इससे साफ है कि अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार में न सिर्फ बड़े सट्टेबाजों और बड़ी तेल कंपनियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है बल्कि कीमतों का मैनिपुलेशन भी नए रिकार्ड बना रहा है. यह भारत जैसे देशों के लिए खतरे की घंटी है. इससे तुरंत सबक लेने की जरूरत है. भारत को जल्दी से जल्दी पेट्रोल पर अपनी निर्भरता कम करने और उर्जा के वैकल्पिक साधनों की खोज को राष्ट्रीय प्राथमिकता पर लाना होगा अन्यथा भारतीय अर्थव्यवस्था सहित आम लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

अफसोस की बात यह है कि नीति निर्माताओं में ऐसी कोई चिंता नहीं दिखाई पड़ रही है. सरकार और नीति निर्माताओं में एक तरह की निश्चिन्तता का माहौल है. गोया देश में तेल का कभी न खत्म होनेवाला कुआं खोज निकला गया है.

सच यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की पेट्रोलियम पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. इसके लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं जो अंधाधुंध निजी वाहनों और आटोमोबाइल उद्योग को बढ़ा रही है. भारतीय औद्योगिक-वाणिज्यिक संगठन एसोचैम के मुताबिक, भारत में तेल की बढ़ती मांग के कारण २०१२ तक देश को अपनी कुल जरूरतों का लगभग ८५ फीसदी कच्चा तेल आयात करना पड़ेगा.

इसका मतलब यह हुआ कि आनेवाले वर्षों में आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण भारत अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार के ‘मैनिपुलेशन’ की कीमत चुकाता रहेगा और सट्टेबाजों और बड़ी तेल कंपनियों की थैलियाँ भरता रहेगा. यह और बात है कि इसकी असली कीमत हमें-आपको चुकानी पड़ेगी.

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप परिशिष्ट में २४ सितम्बर को प्रकाशित )

कोई टिप्पणी नहीं: