रविवार, फ़रवरी 03, 2008

उदारीकरण के डेढ़ दशक...

इस आर्थिक समुद्र मंथन का अमृत अमीरों और विष गरीबों के हिस्से

भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को शुरू हुए डेढ़ दशक से अधिक हो गए. इन पंद्रह वर्षों में, गंगा से गोदावरी तक बहुत पानी बह गया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन डेढ़ दशकों में "इंडिया" की सूरत बहुत बदल गई है. इस समय दुनिया भर में "इंडिया" अपने अरबपतियों की लगातार बढ़ती संख्या के लिए सुर्खियों में है.
 
अर्थव्यवस्था की विकास दर 9 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है. हिंदू विकास दर अतीत की बात हो चुकी है. "इंडिया" चमक रहा है और माना जा रहा है कि देश अगले दशक के मध्य तक विकसित देशों की कतार में पहुंच जाएगा.
 
लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि देश में अरबपतियों और खरबपतियों की तेजी से बढ़ती संख्या के साथ गरीबों की तादाद में उस तेजी से कमी नहीं आ रही है जिसकी आर्थिक उदारीकरण से अपेक्षा की गई थी. इस मायने में यह एक उदास करनेवाली परिघटना है.
 
यह एक कड़वी सच्चाई है कि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के समुद्र मंथन से पिछले 15 सालों में निकले तीव्र आर्थिक विकास का अमृत अमीर पी रहे हैं जबकि गरीबों के हिस्से में एक बार फिर विष आया है.
 
विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रतिदिन एक डॉलर से कम की आय में गुजर-बसर करनेवाले लोगों की तादाद 1994 में कुल आबादी की 45 फीसदी थी जो पिछले दस सालों में घटने के बावजूद अब भी 34.3 फीसदी पर बनी हुई है.
 
स्वयं योजना आयोग ने स्वीकार किया है कि 1993 से 2004 के बीच गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भारतीयों की तादाद में प्रति वर्ष सिर्फ 0.74 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि इससे पहले 1983 से 1993-94 के बीच गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लागों की तादाद में प्रति वर्ष 0.85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी.
 
स्पष्ट है कि आर्थिक उदारीकरण के पिछले 15 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की दर में वृद्धि के बावजूद उसका फायदा गरीबों को नहीं मिला है. हालांकि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के समर्थकों का यह दावा रहा है कि तीव्र आर्थिक विकास दर के साथ आने वाली समृद्धि की बाढ़ में गरीबों की नौकाएं भी उपर आ जाती हैं.
 
लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है. सच यह है कि जिस तेजी से कॉरपोरेट क्षेत्र के मुनाफे में वृद्धि हो रही है, उसकी तुलना में लोगों के वेतन में वृद्धि  नहीं हो रही है बल्कि उसमें गिरावट दर्ज की जा रही है.
 
पिछले पांच वर्षों में जीडीपी के अनुपात में कॉरपोरेट क्षेत्र का मुनाफा वर्ष 2002 के 3.7 प्रतिशत से उछल कर 2007 में 9.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है जबकि वेतन जीडीपी की तुलना में 2002 के 31 फीसदी से घटकर 28.7 फीसदी रह गया है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि तीव्र आर्थिक विकास दर से देश में गरीबी घटने की बजाए आर्थिक विषमता और गैर-बराबरी बहुत तेजी से बढ़ी है. अमीर और गरीब, अर्धशहरी और ग्रामीण तथा समृद्ध और पिछड़े राज्यों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है.
 
विश्व बैंक ने भी स्वीकार किया है कि भारत में आय/ उपभोग पर आधारित असमानता तेजी से बढ़ रही है. इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में आई समृद्धि मुख्यत: तीन क्षेत्रों- शेयर बाजार, रियल इस्टेट और प्रॉपर्टी तथा सोने तक सीमित रही है.

दुनिया की जानी-मानी कंसल्टेंसी कंपनी मार्गन स्टेनली के भारतीय कार्यकारी निदेशक चेतन आहया के मुताबिक पिछले चार वर्षों में भारत की संपदा में लगभग एक खरब डॉलर से अधिक की वृद्धि हुई है. लेकिन इस संपदा वृद्धि का लाभ बहुत सीमित तबके को मिला है.
 
आहया के अनुसार भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण मार्च 2003 के 120 अरब डॉलर से बढ़कर मई 2007 में एक खरब डॉलर तक पहुंच गया है. अगर इसमें विदेशी और सरकारी कंपनियों के स्वामित्व वाले हिस्से को निकाल दिया जाए तो घरेलू शेयरधारकों की परिसंपत्तियों में लगभग 570 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई है.
 
लेकिन इसका लाभ कितने लोगों को मिला है?
 
सेबी के अनुसार देश में कुल आबादी के सिर्फ 4 से 7 फीसदी लोगों के पास शेयर हैं. इसमें भी कंपनियों के मालिकों का हिस्सा बहुत बड़ा है. आहया के मुताबिक 570 अरब डॉलर में 350 अरब डॉलर कंपनियों के मालिकों के हिस्से में गया है.
 
दरअसल, अनिल और मुकेश अंबानी के खरबपति होने का राज भी इसी में छिपा हुआ है. दोनों के खरबपति होने की वजह यह है कि उनकी कंपनियों के शेयरों की कीमतों में हाल के महीनों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है. इस कारण उनका बाजर पूंजीकरण खरबों में पहुंच गया है और उन कंपनियों में उनका हिस्सा 55 फीसदी से अधिक होने के कारण ही वे भी खरबपति हो गए हैं.
 
लेकिन अनिल और मुकेश अंबानी के खरबपति होने से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि एक आम भारतीय और इन खरबपति भाईयों के बीच आय का अनुपात जो कुछ वर्षों पहले तक 1,90,000 का था, वह बढ़कर 11,00,000 से ऊपर पहुंच गया है.
 
यानि सुपर अमीरों और आम आदमी के बीच की खाई और गहरी और चौड़ी होती जा रही है. साफ है कि उदारीकरण की लक्ष्मी गरीबों और आम आदमियों के घर का रुख करने की बजाय आबादी के एक छोटे हिस्से सुपर अमीरों के घर में कैद होकर रह गई है.
 
जाहिर है कि यह खुश होने का नहीं बल्कि उदास होने का वक्त है.
 
इसे देखकर ऐसा लगता है कि लक्ष्मी अमीरों के घर कैद हो गई है. इस लक्ष्मी का रंग काला है.
 
तथ्य यह है कि देश में काले धन में लगातार वृद्धि हो रही है. हालांकि आर्थिक उदारीकरण और कर सुधारों के समर्थकों का दावा था कि जैसे-जैसे आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, देश में काला धन कम होता जाएगा. लेकिन सच यह है कि 1983 में देश में कुल काले धन का अनुमान लगभग 36,786 करोड़ रुपए का था जो आज बढ़कर लगभग नौ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.
 
एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में हर साल जीडीपी के 40 फीसदी के आसपास काला धन पैदा होता है. यही वह काला धन है जो शॉपिंग मॉल्स में चमकता और बिखरता हुआ दिखाई पड़ता हैं.
 
यह यूंही नहीं है कि देश में अचानक दुनिया भर के सभी लग्जरी ब्रांडों के निर्माता भागे चले आ रहे हैं. लुई विंता से लेकर पोर्शे कार तक दुनिया का कोई भी ऐसा लग्जरी ब्रांड नहीं है जो आज भारत में उपलब्ध नहीं है.
 
करोड़ों रुपए की लग्जरी फ्लैट से लेकर कारों तक के खरीददारों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. एक अनुमान के अनुसार पिछले साल अमीर भारतीयों ने लगभग पचास हजार करोड़ का सोना और छह हजार करोड़ रुपए के हीरे खरीदे.
 
कहने की जरूरत नहीं है कि सोना, हीरा और दूसरे सभी लग्जरी ब्रांड्स काले धन को छुपाने और खर्चने के सबसे आसान रास्ते हैं.
 
सच पूछिए तो लक्ष्मी की वास्तविक कृपा इस देश के अरबपतियों और करोड़पतियों पर हुई है. गुलाबी अखबारों में आए दिन भारत के अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद पर खबरें छपती रहती हैं. अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती संख्या और उनकी वृद्धि दर के मामले में भारत एशिया के तमाम देशों को पीछे छोड़ चुका है. उनकी संख्या हर साल अर्थव्यवस्था की विकास दर से भी दोगुनी रफ्तार से बढ़ रही है.
 
लेकिन यूएनडीपी का कहना है कि अरबपतियों और करोड़पतियों के साथ देश में गरीबों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. देश की लगभग 80 फीसदी आबादी आज भी प्रतिदिन 2 डॉलर से कम की आय पर अपना जीवन निर्वाह कर रही है.
 
असल में, अरबपतियों और करोड़पतियों के घरों में लक्ष्मी बरस रही है. यह आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के कारण संभव हुआ है.
 
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1987-88 से 1999-2000 के बीच देश के सबसे अमीर 0.1 फीसदी हिस्से की आय में 285 फीसदी की वृद्धि हुई है और वह सालाना लगभग 1,60,000 डॉलर प्रतिव्यक्ति तक पहुंच गई है.
 
पिछले पांच वर्षों में यह प्रक्रिया और सघन हुई है. शेयर बाजार से लेकर कमोडिटी बाजार तक जो बूम दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ कुल आबादी के मुश्किल से चार से पांच फीसदी लोगों को मिला है. उनके लिए यह उदारीकरण दिवाली है लेकिन बाकी लोगों के लिए यह दिवाला है.

5 टिप्‍पणियां:

संजय तिवारी ने कहा…

आनंद प्रधान जी से अब मैं उम्मीद करता हूं कि मौलिक बात करना शुरू करेंगे. जिस तरह से आंकड़ों के भरोसे इसे लिखा गया है उससे यह लेख बहुत सतही हो गया है.

ऐसा लगता है कि आंकड़ों को कहने के लिए इसे लिख दिया गया है. होना यह चाहिए कि आपको अपनी बात कहने के लिए बहुत जरूरी होने पर आंकड़ों का सहारा लेना चाहिए.

Nilotpal ने कहा…

Ise kehte hain - chit bhi meri aur pat bhi meri. Bhai Anand Pradhan ji aankadon ka khel bada hi ajeeb hota hai. Yeh jitna batate hain utna hi chhipate bhi hain (maaf kijiyega badi hi purani kahawat hai). Main aapki is baat se purnatah sahmat hoon ki desh mein vikas jyada inclusive hona chahiye. Beshak vikas ka faayada abhi bhi jyadatar logon tak nahin pahunch paya hai. Udarikaran ke virodh mein apna galaa fadne ki bajay agar aap in karanon ki padtal karte to baat thodi samajh mein aati. Aapke post ko padh kar spasht prateet hota hai ki aap buri tarah se apne tathakathit samyavadi purvagrah se grasit hain. Behtar hota ki aap koi vikalp bhi batate. Lekin ab aapke liye takleef ki baat yeh hai ki China aur Russia jaise desh jahan se aap logon ne vichardhara udhar lee hai woh khud hi apni arthvyavastha ko Bharat se bhi jyada udar bana chuke hain. Ab aap vikalp layen bhi to kaun sa? Chaliye....jaane dijiye.

रीतेश ने कहा…

आनंद प्रधान जी,

आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ. नरसिंह राव देश पर जो बोझ डालकर चले गए और उसे बाद की सरकारों ने जिस तरह बढ़ाया, उसका आपने सही तरीके से सटीक और संक्षिप्त विश्लेषण किया है.

वैसे तो इस पर किताबें लिखी जा सकती हैं.

इसके असर के बारे में सत्ता में बैठे लोगों को बताने और लोगों को समझाने की जरूरत सिर्फ इस बात से खत्म नहीं हो जाती कि कोई इसे सुनने या समझने को तैयार नहीं हैं.

देख रहा हूँ कि आंकड़ों के उपयोग पर संजय तिवारी जी की बड़ी तीखी आपत्ति दर्ज है. लेकिन दुख यह देखकर हुआ कि उनके ब्लॉग पर आपसे ज्यादा आंकड़ों का खेल है.

बिना आंकड़ों के राजनीति की बातें नहीं हो पातीं तो अर्थव्यवस्था की बात कैसे की जाए. लेकिन जटिल आर्थिक मुद्दो पर आप जिस सरलता से तथ्यात्मक बातें करते हैं, वह तस्वीर साफ कर देती है.

किसी के लिए भी असहमत होने का दरवाजा तो हमेशा खुला रहता है लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि उदारीकरण से गदगद लोग आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों की बात करने की बजाय फटाफट चीन और रूस क्यों पहुँच जाते हैं.

शेयर बाजार से अमीर और गरीब बनाने वाले देश में जब गरीब आदमी शेयर खरीद ही नहीं पाएगा तो अमीर क्या खाक बनेगा. उदार सरकार को गरीबों के बीच इंदिरा आवास की तर्ज पर अब शेयर बाँटना चाहिए, और वह भी रिलायंस का, तभी इस देश से गरीबी मिट पाएगी.

आप क्या कहते हैं आनंद जी..?

हस्तक्षेप ने कहा…

लेख पढ़ा, और प्रतिक्रियाएँ भी, आंकड़े कब कितना सही कहते हैं और कब चतुरसुजान उन्हें झूठ के लिए सच का लबादा बना देते हैं, ये कहना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है क्योंकि मैं आंकड़ों विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन जहां तक उदार हुए देश के बहुमत के यथार्थ का सरोकार है, ये लेख उनका आईना है। यहां तो हर कदम के साथ पेट
आपके सिर से पहले आता है, फिर हम किस मुंह से नौ फीसदी की विकास दर का जश्न मनाएं... दिमाग में फूलती विकासदर और उछलते सूचकांक की अधकचरी की बातें डालने से पहले अगर पेट में रोटी डाली जाए तो जीवन का संतुलन बेहतर होगा। हांलाकि इस लेख से पैदा हुए कुछ असुविधाजनक सवालों से अगर आपका दिमाग भन्नाए तो सबसे आसान तरीका यही कि एक कमेंट लिख मारिए कि आपने तो बस सवालों की बात की है, एक समाधान तो आप बता नहीं सके। यद्यपि समाधान वृहत्तर स्तर पर हम सभी के लिए चुनौती हैं।
उदारीकरण के रास्ते पर हम इतना आगे निकल चुके हैं कि वापस लौटने की बात भी सोचना मुमकिन नहीं, लेकिन आज भी जरूरत हर स्तर पर गांधी के उसी वाक्य को याद रखने की है कि हम अपने हर काम से पहले ये सोचें की इसका देश के अंतिम व्यक्ति को कितना फायदा होगा। तभी सही मायनों में सबको साथ लेकर चलने वाला विकास संभव हो सकेगा।

Nilotpal ने कहा…

Maaf kijiyega thoda vilamb hua pratikriyaon ko padhne mein - isi wajah se thodi der se respond kar paa raha hoon.

@Ritesh
Desh mein kisanon ki aatmhatya dukh ka vishay hai. Apeksha ki jaati hai ki aap jaise patrakar is vishay ka thoda adhyayan kar vastuparak baaten karenge. Meri samajh mein yeh nahin aaya ki udarikaran kis tarah se kisanon ki aatmhatya ke liye doshi hai? Kshama kijiyega agar maine aapka aashay nahin samajha. Koi bhi bahas beshak aankadon aur unper aadharit tarkon per hi aage badhti hai. Lekin aawashyakata hoti hai ki aankadon ke peechhe ki haqiqat ko samajhane ki aur unke anusaar nishkarsh per pahunchne ki. Meri samajh se uprokt aankadon per aadharit nishkarsh ek khas vichardhara se jyada prabhavit hain. Aur rahi baat garibon ko share baantne ki - to chinta mat kijiye shiksha aur soochna samay aane per woh bhi kar degi. Bus humen apni soch sakaratmak rakhani padegi.

@ Hastakshep
Samadhan se jude prashna to poochhe hi jayenge aur jawab bhi dena hoga. Jis tarah ki gair jimmedari vampanthiyon ne udarikaran ki gati ko rokne mein dikhayi hai uska jawab samay aane per aap sabon ko dena padega. Aap WB aur Keral ke liye doosare maapdand nahin apna sakte.