अरुंधती राय से शब्द उधार लेकर कहूं, तो सचमुच, तरस आता है इस देश के समाचार मीडिया खासकर समाचार चैनलों पर जो लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने मन की बात कहने के जुर्म में जेल भेजने की मुहिम चला रहे हैं. कई चैनलों खासकर ‘टाइम्स नाउ’ और अर्णब गोस्वामी की चली होती तो अरुंधती समेत अन्य कई बुद्धिजीवी देशद्रोह के आरोप में अब तक जेल में होते. उनपर तरस इसलिए आता है कि उन्हें पता नहीं कि उनकी इस मुहिम का क्या मतलब है? कहने की इच्छा होती है कि ‘हे दर्शकों-पाठकों-श्रोताओं, माफ़ करना, इन्हें पता नहीं कि ये क्या कर रहे हैं?’
आखिर अरुंधती ने ऐसा क्या कह दिया कि चैनलों पर हंगामा सा बरपा हो गया है? क्या कश्मीर के बारे में कथित ‘राष्ट्रीय सहमति’ की लाइन से अलग असहमति में बोलना जुर्म है? क्या अरुंधती के बयान से सचमुच, देश टूटने की नौबत आ गई है? सवाल यह भी है कि क्या सच पर सिर्फ चैनलों की ही इजारेदारी है? क्या अब किसी लेखक और बुद्धिजीवी को बोलने से पहले सच के ठेकेदारों से इजाजत लेनी पड़ेगी?
और सबसे बढ़कर अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे को कौन परिभाषित करेगा? राष्ट्रवाद का नकाब ओढ़े सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें या लोगों की आकांक्षाओं को बंदूक के बल पर कुचलने की राजनीति वकालत करनेवाली कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां या कारपोरेट घोटालेबाज और न्यूज स्पेस बेचनेवाला मीडिया?
ये सवाल उठाने इसलिए जरूरी हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में कभी राष्ट्रवाद की आड़ में, कभी आतंकवाद से लड़ाई के बहाने, कभी लोगों की धार्मिक आस्थाओं और कभी समाज में नैतिकता की रक्षा के नाम पर अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने और एक अघोषित सेंसरशिप थोपने की कोशिशें काफी तेज हो गई हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे को लगातार संकुचित और सीमित करने की मुहिम चल रही है. खासकर अगर आपके विचार शासक वर्गों द्वारा गढ़ी गई ‘आम सहमति’ (जहां राजनीतिक रूप से कांग्रेस-भाजपा-सी.पी.एम से लेकर सभी किस्म के उदारवादी-मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी एकमत हों) के दायरे को चुनौती देते हों तो फिर अरुंधती राय की तरह आपकी खैर नहीं है.
चिंता की बात यह है कि अब असहमत आवाजों को दबाने की ऐसी ज्यादातर कोशिशें सरकार या पुलिस के बजाय सांप्रदायिक फासीवादी अपराधी समूहों या भगवा देशभक्ति और कारपोरेट ‘विकास’ के ठेकेदारों द्वारा भीड़ को भडकाकर की जा रही है. पुलिस और सरकार आज्ञाकारी सेवक की तरह इस भीड़ के साथ खड़ी रहती है. लेकिन सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि अब इस भीड़ में समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनल भी शामिल हो गए हैं. उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ देशभक्ति, विकास और नैतिकता का झंडा एक साथ उठा लिया है और जो भी उनके सुर में सुर मिलाने के लिए तैयार नहीं है, वह उनके मुताबिक आतंकवाद का समर्थक, देशविरोधी, विकासविरोधी और अनैतिक है.
ऐसे में, अगर आपने कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व और आदिवासी इलाकों में मानवाधिकारों की बात कर दी या विकास योजनाओं के बहाने कारपोरेट लूट पर गंभीर सवाल उठा दिए तो आपको देशविरोधी साबित करने में जरा भी देर नहीं लगती. वैसे तो हमारे समाचार चैनल बोलने की आज़ादी और सच के साथ खड़े होने के दावे करते नहीं थकते हैं और कई बार यह भ्रम भी होता है कि गोया वे सच और अभिव्यक्ति की आज़ादी के सबसे बड़े चैम्पियन हों. आखिर मंत्रियों-अफसरों के भ्रष्टाचार के खुलासे हों या पुलिसिया ज्यादतियों को चुनौती देने का मामला हो या इस जैसे अन्य मामले, मीडिया और न्यूज चैनलों के ‘साहस’ की दाद देनी पड़ेगी!
लेकिन यही उनकी आज़ादी का दायरा है. इतनी आज़ादी पर आम सहमति है. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के भ्रम को बनाये रखने के लिए मीडिया की स्वतंत्रता का यह दायरा बनाया गया है. लेकिन जब भी कोई लेखक, कलाकार या बुद्धिजीवी इस दायरे से बाहर जाने की कोशिश करता है, मीडिया और न्यूज चैनलों में उसे देश और समाज बहिष्कृत करने की मुहिम शुरू हो जाती है. आश्चर्य नहीं कि इस कारण जब भी वास्तव में, सच और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने का मौका आता है, समाचार मीडिया ‘आम सहमति’ की तानाशाही के आगे रेंगते नजर आते हैं.
इस तरह, जिस समाचार मीडिया का अस्तित्व अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ा हुआ है और जिसकी विश्वसनीयता उसकी सच्चाई पर टिकी हुई है, वह खुद जाने-अनजाने बोलने की आज़ादी और सच का दुश्मन बनता जा रहा है. लेकिन सच पर किसी की बपौती नहीं है. मीडिया की भी नहीं. चैनलों को एक बात याद रखनी चाहिए कि जिस सच की वे कसमें खाते रहते हैं, उस तक पहुँचने की यह अनिवार्य शर्त है कि अभिव्यक्ति की अधिकतम संभव आज़ादी की गारंटी की जाए. अगर कश्मीर सचमुच भारत का ‘अभिन्न अंग’ है तो देश के हर नागरिक को उसकी सच्चाई जानने का अधिकार है.
लेकिन यह सच्चाई तब तक सामने नहीं आ सकती है जब तक सबकी बात न सुनी जाए- चाहे वह सैय्यद अली शाह गिलानी हों या अरुंधती राय या कोई और. यही लोकतंत्र का तकाजा है और अभिव्यक्ति की आज़ादी की परीक्षा भी.
लेकिन यहां सबको सुनना तो दूर सीधे जेल भेजने की मांग हो रही है. साफ है कि न्यूज चैनलों में सच का सामना करने की हिम्मत नहीं बची है. इनपर तरस ही खाया जा सकता है.
('तहलका' के १-१५ नवम्बर'१० के अंक में प्रकाशित)
शनिवार, नवंबर 13, 2010
शुक्रवार, नवंबर 12, 2010
सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का झुनझुना
क्यों चाहिए प्रभु वर्गों को सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता?
“लेन-देन का सिद्धांत ही कूटनीति का सिद्धांत है: मतलब देना एक और लेना दस”
- मार्क ट्वेन, अमेरिकी लेखक
इसे कहते हैं कि मजमा लूट लेना. ओबामा आये, उन्होंने हमारे अमीर और मध्यवर्ग के मनोनुकूल बातें कहीं और मंच और देश लूट ले गए. समूचा कारपोरेट मीडिया ओबामा और अमेरिका के गुणगान में जुटा है. देश के कर्ता-धर्ता अपनी पीठ ठोंकने में लगे हैं. सब ऐसी खुशी में नाच रहे हैं, जैसे पता नहीं क्या मिल गया है? गोया अमेरिका से ओबामा नहीं, सांताक्लाज आये हों.
ऐसे में, आप चाहें तो अपने माननीय संसद सदस्यों, कारपोरेट जगत, सुरक्षा-विदेश नीति विशेषज्ञों और कारपोरेट मीडिया की तर्ज पर राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस घोषणा पर अपना सीना फुला, तालियाँ और गाल बजा सकते हैं कि अमेरिका आनेवाले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र में प्रतीक्षित सुधारों के तहत सुरक्षा परिषद के संशोधित विस्तार में भारत को भी स्थाई सदस्य के रूप में देखना चाहता है.
ओबामा के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में भारतीय कूटनीति की बहुत बड़ी कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा है. यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत की बड़ी पूंजी और उसके अभिजात्य और अमीर प्रतिनिधियों के साथ-साथ मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा देश को एक वैश्विक ताकत- ग्लोबल पावर- के रूप में देखना चाहता है. इस समय उसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा दुनिया के ताकतवर देशों के क्लब- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई रूप से बैठने का इंतजाम करने की है.
असल में, जब बड़ी भारतीय पूंजी देश से बाहर निवेश और व्यापार के नए अवसर खोज और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और देशों में निवेश कर रही है तो उसके हितों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने और उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य और कूटनीतिक प्रभाव का विस्तार भी अनिवार्य शर्त है. यही कारण है कि दुनिया भर में पैर फैला रही भारतीय पूंजी अपने हितों की सुरक्षा के लिए खुद को और देश को न सिर्फ दुनिया के ताकतवर देशों खासकर अमेरिका के साथ नत्थी करने के अभियान में जुटी है बल्कि अपने लिए वैश्विक ताकत के मंचों पर जगह बनाने की मुहिम में भी लगी है.
आश्चर्य नहीं कि पिछले कुछ वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का अभियान भारतीय कूटनीति का यह सबसे बड़ा मिशन या कहें तो ऑब्सेशन सा बन गया है. यह ऑब्सेशन इस हद तक पहुंच गया है कि इसके लिए भारतीय प्रभु वर्ग कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है. यहां तक कि इसके लिए वह स्वतंत्र और व्यापक राष्ट्रीय हितों को प्रतिबिंबित करनेवाली विदेश नीति को छोड़ने से लेकर भारतीय बाज़ार को बड़ी विदेशी पूंजी खासकर अमेरिकी बड़ी पूंजी के हवाले करने को भी तैयार है.
असल में, किसी भी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू नीतियों का ही विस्तार होती है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि घरेलू नीतियों खासकर अर्थनीति पर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पूरी तरह से हावी हो जाने की प्रक्रिया में बड़ी भारतीय पूंजी ने खुद को बड़ी विदेशी पूंजी खासकर अमेरिकी पूंजी के साथ अभिन्न रूप से जोड़ लिया है. दोनों के हितों में काफी हद तक समानता है. इस मायने में बड़ी भारतीय पूंजी और अमेरिकी पूंजी की ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बन चुकी है. दोनों के बीच गठजोड़ कितना गहरा हो चुका है कि इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि संसद द्वारा पारित परमाणु उत्तरदायित्व कानून के प्रावधानों के खिलाफ अमेरिकी कंपनियों के साथ बड़ी भारतीय कंपनियां भी अभियान चलाने में जुटी हैं.
यही नहीं, अर्थव्यवस्था के कई अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों जैसे खुदरा व्यापार, वित्तीय क्षेत्र- बीमा और बैंकिंग, रक्षा आदि क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोलने की मुहिम की अगुवाई बड़ी भारतीय कंपनियां कर रही हैं. इस कारण जैसाकि मार्क्स का कहना था कि राजनीति, अर्थनीति का ही संकेंद्रित रूप है, भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलावों की छाप भारतीय राजनीति पर भी बढ़ते अमेरिकी प्रभाव के रूप में साफ देखी जा सकती है. इसी घरेलू राजनीति और अर्थनीति ने भारतीय विदेश नीति को पूरी तरह से अमेरिका के साथ बांध दिया है. इस मामले में भारतीय शासक वर्गों की दोनों प्रमुख पार्टियों और गठबंधनों- कांग्रेस और भाजपा में आम सहमति है.
इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि एन.डी.ए के कार्यकाल में स्वतंत्र विदेश नीति की कीमत पर अमेरिका के साथ जो अतिरिक्त नजदीकी बढ़नी शुरू हुई, वह यू.पी.ए के कार्यकाल में पूरी तरह से परवान चढ रही है. यू.पी.ए ने एक तरह से अर्थनीति के साथ-साथ भारतीय विदेश नीति को पूरी तरह से अमेरिका के साथ जोड़ दिया है. ओबामा के दौरे और इस दौरान दोनों पक्षों की ओर से व्यक्त विचारों, घोषणाओं और साझा बयान के बाद इस बारे में अब कोई शको-शुबहा नहीं रह जाना चाहिए. सच पूछिए तो लगभग सभी व्यावहारिक अर्थों में भारत अमेरिकी खेमे में शामिल हो चुका है.
दरअसल, ओबामा की ओर से भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा इसी का ईनाम है. इसके बावजूद अगर किसी को लगता है कि ओबामा ने किसी उदारतावश या भारत की महान सभ्यता या उसके लोकतंत्र से प्रभावित होकर या भारत की बढ़ती ताकत को स्वीकार करते हुए या उसके फैलते बाज़ार के लालच में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए भारतीय दावेदारी का समर्थन किया है तो वह या तो बहुत भोला है या फिर बहुत धूर्त. सच यह है कि कूटनीति में बिना लेनदेन के कुछ नहीं होता है. सवाल है कि भारत ने इसकी क्या कीमत चुकाई है?
क्या ओबामा ने सिर्फ ५० हजार नौकरियों (या अरबों डालर के सौदों) के बदले में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा कर दिया? बात कुछ जमती नहीं है. यह एक कीमत तो है लेकिन छोटी कीमत है. इसके बदले में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का अमेरिकी वायदा नहीं मिल सकता है. यहां तक कि भारतीय बाज़ारों में अमेरिकी कंपनियों को निवेश और व्यापार की उदार छूट भी वह कीमत नहीं है क्योंकि वह तो अमेरिकी कंपनियों को पहले से ही मिली हुई है और जो बची-खुची बाधाएं हैं, वह भी उदारीकरण की जारी प्रक्रिया के तहत खुद-ब-खुद हट जाएंगी. असल में, जब बड़ी भारतीय पूंजी खुद बड़ी विदेशी खासकर अमेरिकी पूंजी के लिए बेक़रार है तो ओबामा को इसके लिए बहुत धक्का लगाने या सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा करने की जरूरत नहीं थी.
जैसाकि मार्क ट्वेन ने कहा था कि कूटनीति ‘एक देकर, दस लेने की कला’ है. फिर अमेरिका को क्या दिया या देने का वायदा किया गया है? इस सवाल का जवाब खोजना बहुत जरूरी है. इसका कुछ संकेत खुद ओबामा के संसद में दिए गए भाषण में भी मिलता है. ओबामा ने कहा कि सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के साथ भारत को बड़ी जिम्मेदारियों को भी उठाने के लिए तैयार होना होगा. उन्होंने सभी जिम्मेदारियों का उल्लेख नहीं किया लेकिन ईरान और बर्मा के बारे में जरूर इशारा किया कि भारत को अपनी विदेश नीति को अमेरिकी लाइन के और करीब लाने की जरूरत है.
हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सवाल पर भारत अंतरर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आई.ए.ई.ए) में अमेरिका के साथ और उसके कहे मुताबिक दो बार ईरान के खिलाफ मतदान कर चुका है. यही नहीं, अमेरिका के दबाव में यू.पी.ए सरकार ने ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन के प्रस्ताव को ठन्डे बस्ते में डाल दिया है. अब उसकी भूले से भी चर्चा नहीं होती है. लेकिन जाहिर है कि अमेरिका को सिर्फ इतने से संतोष नहीं है. वह ईरान को घेरने के मामले में भारत की और सक्रिय भूमिका चाहता है.
इसी तरह, वह एशिया खासकर पूर्वी एशिया में भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहता है. अमेरिकी रणनीति यह है कि पूरी दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहे चीन को एशिया तक सीमित रखने के लिए यहां भारत को एक प्रति संतुलन की ताकत के रूप में चीन के मुकाबले खड़ा करना जरूरी है. एक तरह से वह भारत को एशिया में अपने हितों के चौकीदार और क्षेत्रीय सूबेदार की भूमिका में देखना चाहता है. इस रणनीति की सफलता के लिए जरूरी है कि भारत को न सिर्फ परमाणु और आधुनिक हथियारों से लैस सैन्य शक्ति के रूप में खड़ा होने में मदद की जाए बल्कि उसकी रणनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिए सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता दिलाने में मदद की जाए.
इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि अंतरर्राष्ट्रीय मंचों और बहुपक्षीय संगठनों, चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो या जी-२० या डब्ल्यू.टी.ओ या विश्व बैंक-मुद्रा कोष में भारत की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक लाइन अमेरिकी लाइन के अधिकतम संभव करीब रहनी चाहिए. साफ है कि ओबामा अमेरिकी दोस्ती और सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के बदले में भारत की स्वतंत्र, राष्ट्रीय मूल्यों और हितों से जुड़ी विदेश नीति की कीमत मांग रहे हैं. अफसोस की बात यह है कि भारतीय प्रभु वर्ग यह कीमत देने के लिए सहर्ष तैयार भी है क्योंकि उसकी समझ यह बन चुकी है कि भारतीय बड़ी पूंजी के हित अमेरिकी बड़ी पूंजी के संरक्षण में चलने में ही है.
ऐसे में, वह दिन दूर नहीं है जब वैश्विक ताकत के रूप में बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के नाम पर भारतीय सेना अमेरिकी फौजों के साथ किसी तीसरे देश में ‘आतंकवाद के खिलाफ’ या ‘लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बहाली’ के लिए खून बहाती नजर आये. यह किसी से छुपा नहीं है कि ऐसी हर लड़ाई के पीछे बड़ी पूंजी के हित छिपे होते हैं. संभव है कि भारतीय बड़ी पूंजी को ऐसी लड़ाइयों में फायदा दिख रहा हो.
लेकिन सवाल यह है कि अमेरिकी दोस्ती और सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की यह कीमत देश के करोड़ों गरीबों, बीमारों, बेरोजगारों और दबे-कुचले लोगों को भी मंजूर है? सुरक्षा परिषद की सदस्यता से उन्हें क्या मिलने जा रहा है? क्या इससे उनकी गरीबी दूर हो जायेगी या रोजगार के नए और अधिक अवसर पैदा होंगे?
ये सवाल इसलिए जरूरी हैं क्योंकि स्थाई सदस्यता की कीमत के तौर पर अमेरिका से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद की वास्तविक कीमत इस देश के गरीबों को चुकानी पड़ रही है. कारण, हर साल लगभग ४५ हजार करोड रूपये सिर्फ हथियारों की खरीद पर खर्च कर रही यू.पी.ए सरकार गरीबों की रोटी या स्वास्थ्य या शिक्षा या रोजगार के लिए धन देने के नाम पर हाथ खड़ी कर देती है. इसी तरह, जब देश अमेरिका से हथियार खरीदता है तो वहां के सैन्य-औद्योगिक काम्प्लेक्स का मुनाफा बढाता है और अपने बेरोजगारों की कीमत पर वहां रोजगार के नए अवसर पैदा करता है.
सवाल यह भी है कि क्या स्थाई सदस्यता से यह कडवा यथार्थ छुप जायेगा कि देश की ७८ प्रतिशत आबादी २० रूपये प्रतिदिन से भी कम की आमदनी में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर है? क्या अमेरिकी दोस्ती इस असलियत को बदल देगी कि वैश्विक मानव विकास की रैंकिंग में भारत अभी भी ११९ वें स्थान पर है? फिर मध्यवर्ग स्थाई सदस्यता के लिए इतना बावला क्यों हुआ जा रहा है? साफ है कि प्रभु वर्ग के साथ मध्यवर्ग भी इस देश के गरीबों को छोड़ चुका है. यह ‘सफल लोगों का अलगाववाद’ है. यही अलगाववाद उन्हें अमेरिका के करीब ले जा रहा है.
“लेन-देन का सिद्धांत ही कूटनीति का सिद्धांत है: मतलब देना एक और लेना दस”
- मार्क ट्वेन, अमेरिकी लेखक
इसे कहते हैं कि मजमा लूट लेना. ओबामा आये, उन्होंने हमारे अमीर और मध्यवर्ग के मनोनुकूल बातें कहीं और मंच और देश लूट ले गए. समूचा कारपोरेट मीडिया ओबामा और अमेरिका के गुणगान में जुटा है. देश के कर्ता-धर्ता अपनी पीठ ठोंकने में लगे हैं. सब ऐसी खुशी में नाच रहे हैं, जैसे पता नहीं क्या मिल गया है? गोया अमेरिका से ओबामा नहीं, सांताक्लाज आये हों.
ऐसे में, आप चाहें तो अपने माननीय संसद सदस्यों, कारपोरेट जगत, सुरक्षा-विदेश नीति विशेषज्ञों और कारपोरेट मीडिया की तर्ज पर राष्ट्रपति बराक ओबामा की इस घोषणा पर अपना सीना फुला, तालियाँ और गाल बजा सकते हैं कि अमेरिका आनेवाले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र में प्रतीक्षित सुधारों के तहत सुरक्षा परिषद के संशोधित विस्तार में भारत को भी स्थाई सदस्य के रूप में देखना चाहता है.
ओबामा के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में भारतीय कूटनीति की बहुत बड़ी कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा है. यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत की बड़ी पूंजी और उसके अभिजात्य और अमीर प्रतिनिधियों के साथ-साथ मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा देश को एक वैश्विक ताकत- ग्लोबल पावर- के रूप में देखना चाहता है. इस समय उसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा दुनिया के ताकतवर देशों के क्लब- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई रूप से बैठने का इंतजाम करने की है.
असल में, जब बड़ी भारतीय पूंजी देश से बाहर निवेश और व्यापार के नए अवसर खोज और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और देशों में निवेश कर रही है तो उसके हितों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने और उसकी सुरक्षा के लिए सैन्य और कूटनीतिक प्रभाव का विस्तार भी अनिवार्य शर्त है. यही कारण है कि दुनिया भर में पैर फैला रही भारतीय पूंजी अपने हितों की सुरक्षा के लिए खुद को और देश को न सिर्फ दुनिया के ताकतवर देशों खासकर अमेरिका के साथ नत्थी करने के अभियान में जुटी है बल्कि अपने लिए वैश्विक ताकत के मंचों पर जगह बनाने की मुहिम में भी लगी है.
आश्चर्य नहीं कि पिछले कुछ वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का अभियान भारतीय कूटनीति का यह सबसे बड़ा मिशन या कहें तो ऑब्सेशन सा बन गया है. यह ऑब्सेशन इस हद तक पहुंच गया है कि इसके लिए भारतीय प्रभु वर्ग कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है. यहां तक कि इसके लिए वह स्वतंत्र और व्यापक राष्ट्रीय हितों को प्रतिबिंबित करनेवाली विदेश नीति को छोड़ने से लेकर भारतीय बाज़ार को बड़ी विदेशी पूंजी खासकर अमेरिकी बड़ी पूंजी के हवाले करने को भी तैयार है.
असल में, किसी भी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू नीतियों का ही विस्तार होती है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि घरेलू नीतियों खासकर अर्थनीति पर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के पूरी तरह से हावी हो जाने की प्रक्रिया में बड़ी भारतीय पूंजी ने खुद को बड़ी विदेशी पूंजी खासकर अमेरिकी पूंजी के साथ अभिन्न रूप से जोड़ लिया है. दोनों के हितों में काफी हद तक समानता है. इस मायने में बड़ी भारतीय पूंजी और अमेरिकी पूंजी की ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बन चुकी है. दोनों के बीच गठजोड़ कितना गहरा हो चुका है कि इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि संसद द्वारा पारित परमाणु उत्तरदायित्व कानून के प्रावधानों के खिलाफ अमेरिकी कंपनियों के साथ बड़ी भारतीय कंपनियां भी अभियान चलाने में जुटी हैं.
यही नहीं, अर्थव्यवस्था के कई अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों जैसे खुदरा व्यापार, वित्तीय क्षेत्र- बीमा और बैंकिंग, रक्षा आदि क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोलने की मुहिम की अगुवाई बड़ी भारतीय कंपनियां कर रही हैं. इस कारण जैसाकि मार्क्स का कहना था कि राजनीति, अर्थनीति का ही संकेंद्रित रूप है, भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलावों की छाप भारतीय राजनीति पर भी बढ़ते अमेरिकी प्रभाव के रूप में साफ देखी जा सकती है. इसी घरेलू राजनीति और अर्थनीति ने भारतीय विदेश नीति को पूरी तरह से अमेरिका के साथ बांध दिया है. इस मामले में भारतीय शासक वर्गों की दोनों प्रमुख पार्टियों और गठबंधनों- कांग्रेस और भाजपा में आम सहमति है.
इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि एन.डी.ए के कार्यकाल में स्वतंत्र विदेश नीति की कीमत पर अमेरिका के साथ जो अतिरिक्त नजदीकी बढ़नी शुरू हुई, वह यू.पी.ए के कार्यकाल में पूरी तरह से परवान चढ रही है. यू.पी.ए ने एक तरह से अर्थनीति के साथ-साथ भारतीय विदेश नीति को पूरी तरह से अमेरिका के साथ जोड़ दिया है. ओबामा के दौरे और इस दौरान दोनों पक्षों की ओर से व्यक्त विचारों, घोषणाओं और साझा बयान के बाद इस बारे में अब कोई शको-शुबहा नहीं रह जाना चाहिए. सच पूछिए तो लगभग सभी व्यावहारिक अर्थों में भारत अमेरिकी खेमे में शामिल हो चुका है.
दरअसल, ओबामा की ओर से भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा इसी का ईनाम है. इसके बावजूद अगर किसी को लगता है कि ओबामा ने किसी उदारतावश या भारत की महान सभ्यता या उसके लोकतंत्र से प्रभावित होकर या भारत की बढ़ती ताकत को स्वीकार करते हुए या उसके फैलते बाज़ार के लालच में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए भारतीय दावेदारी का समर्थन किया है तो वह या तो बहुत भोला है या फिर बहुत धूर्त. सच यह है कि कूटनीति में बिना लेनदेन के कुछ नहीं होता है. सवाल है कि भारत ने इसकी क्या कीमत चुकाई है?
क्या ओबामा ने सिर्फ ५० हजार नौकरियों (या अरबों डालर के सौदों) के बदले में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा कर दिया? बात कुछ जमती नहीं है. यह एक कीमत तो है लेकिन छोटी कीमत है. इसके बदले में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का अमेरिकी वायदा नहीं मिल सकता है. यहां तक कि भारतीय बाज़ारों में अमेरिकी कंपनियों को निवेश और व्यापार की उदार छूट भी वह कीमत नहीं है क्योंकि वह तो अमेरिकी कंपनियों को पहले से ही मिली हुई है और जो बची-खुची बाधाएं हैं, वह भी उदारीकरण की जारी प्रक्रिया के तहत खुद-ब-खुद हट जाएंगी. असल में, जब बड़ी भारतीय पूंजी खुद बड़ी विदेशी खासकर अमेरिकी पूंजी के लिए बेक़रार है तो ओबामा को इसके लिए बहुत धक्का लगाने या सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का वायदा करने की जरूरत नहीं थी.
जैसाकि मार्क ट्वेन ने कहा था कि कूटनीति ‘एक देकर, दस लेने की कला’ है. फिर अमेरिका को क्या दिया या देने का वायदा किया गया है? इस सवाल का जवाब खोजना बहुत जरूरी है. इसका कुछ संकेत खुद ओबामा के संसद में दिए गए भाषण में भी मिलता है. ओबामा ने कहा कि सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के साथ भारत को बड़ी जिम्मेदारियों को भी उठाने के लिए तैयार होना होगा. उन्होंने सभी जिम्मेदारियों का उल्लेख नहीं किया लेकिन ईरान और बर्मा के बारे में जरूर इशारा किया कि भारत को अपनी विदेश नीति को अमेरिकी लाइन के और करीब लाने की जरूरत है. हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सवाल पर भारत अंतरर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आई.ए.ई.ए) में अमेरिका के साथ और उसके कहे मुताबिक दो बार ईरान के खिलाफ मतदान कर चुका है. यही नहीं, अमेरिका के दबाव में यू.पी.ए सरकार ने ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन के प्रस्ताव को ठन्डे बस्ते में डाल दिया है. अब उसकी भूले से भी चर्चा नहीं होती है. लेकिन जाहिर है कि अमेरिका को सिर्फ इतने से संतोष नहीं है. वह ईरान को घेरने के मामले में भारत की और सक्रिय भूमिका चाहता है.
इसी तरह, वह एशिया खासकर पूर्वी एशिया में भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहता है. अमेरिकी रणनीति यह है कि पूरी दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहे चीन को एशिया तक सीमित रखने के लिए यहां भारत को एक प्रति संतुलन की ताकत के रूप में चीन के मुकाबले खड़ा करना जरूरी है. एक तरह से वह भारत को एशिया में अपने हितों के चौकीदार और क्षेत्रीय सूबेदार की भूमिका में देखना चाहता है. इस रणनीति की सफलता के लिए जरूरी है कि भारत को न सिर्फ परमाणु और आधुनिक हथियारों से लैस सैन्य शक्ति के रूप में खड़ा होने में मदद की जाए बल्कि उसकी रणनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिए सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता दिलाने में मदद की जाए.
इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि अंतरर्राष्ट्रीय मंचों और बहुपक्षीय संगठनों, चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो या जी-२० या डब्ल्यू.टी.ओ या विश्व बैंक-मुद्रा कोष में भारत की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक लाइन अमेरिकी लाइन के अधिकतम संभव करीब रहनी चाहिए. साफ है कि ओबामा अमेरिकी दोस्ती और सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के बदले में भारत की स्वतंत्र, राष्ट्रीय मूल्यों और हितों से जुड़ी विदेश नीति की कीमत मांग रहे हैं. अफसोस की बात यह है कि भारतीय प्रभु वर्ग यह कीमत देने के लिए सहर्ष तैयार भी है क्योंकि उसकी समझ यह बन चुकी है कि भारतीय बड़ी पूंजी के हित अमेरिकी बड़ी पूंजी के संरक्षण में चलने में ही है.
ऐसे में, वह दिन दूर नहीं है जब वैश्विक ताकत के रूप में बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के नाम पर भारतीय सेना अमेरिकी फौजों के साथ किसी तीसरे देश में ‘आतंकवाद के खिलाफ’ या ‘लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बहाली’ के लिए खून बहाती नजर आये. यह किसी से छुपा नहीं है कि ऐसी हर लड़ाई के पीछे बड़ी पूंजी के हित छिपे होते हैं. संभव है कि भारतीय बड़ी पूंजी को ऐसी लड़ाइयों में फायदा दिख रहा हो.
लेकिन सवाल यह है कि अमेरिकी दोस्ती और सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की यह कीमत देश के करोड़ों गरीबों, बीमारों, बेरोजगारों और दबे-कुचले लोगों को भी मंजूर है? सुरक्षा परिषद की सदस्यता से उन्हें क्या मिलने जा रहा है? क्या इससे उनकी गरीबी दूर हो जायेगी या रोजगार के नए और अधिक अवसर पैदा होंगे?
ये सवाल इसलिए जरूरी हैं क्योंकि स्थाई सदस्यता की कीमत के तौर पर अमेरिका से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद की वास्तविक कीमत इस देश के गरीबों को चुकानी पड़ रही है. कारण, हर साल लगभग ४५ हजार करोड रूपये सिर्फ हथियारों की खरीद पर खर्च कर रही यू.पी.ए सरकार गरीबों की रोटी या स्वास्थ्य या शिक्षा या रोजगार के लिए धन देने के नाम पर हाथ खड़ी कर देती है. इसी तरह, जब देश अमेरिका से हथियार खरीदता है तो वहां के सैन्य-औद्योगिक काम्प्लेक्स का मुनाफा बढाता है और अपने बेरोजगारों की कीमत पर वहां रोजगार के नए अवसर पैदा करता है.
सवाल यह भी है कि क्या स्थाई सदस्यता से यह कडवा यथार्थ छुप जायेगा कि देश की ७८ प्रतिशत आबादी २० रूपये प्रतिदिन से भी कम की आमदनी में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर है? क्या अमेरिकी दोस्ती इस असलियत को बदल देगी कि वैश्विक मानव विकास की रैंकिंग में भारत अभी भी ११९ वें स्थान पर है? फिर मध्यवर्ग स्थाई सदस्यता के लिए इतना बावला क्यों हुआ जा रहा है? साफ है कि प्रभु वर्ग के साथ मध्यवर्ग भी इस देश के गरीबों को छोड़ चुका है. यह ‘सफल लोगों का अलगाववाद’ है. यही अलगाववाद उन्हें अमेरिका के करीब ले जा रहा है.
(जनसत्ता के १२ नवम्बर'१० के अंक में प्रकाशित)
गुरुवार, नवंबर 11, 2010
फ़्रांस : अंत नहीं, लड़ाई की शुरुआत है
राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के नव उदारवादी सुधारों खासकर पेंशन सुधारों के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व में शुरू हुए देशव्यापी मजदूर आंदोलन की नई लहर ने सिर्फ फ़्रांस ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप को हिला कर रख दिया है. लगभग एक महीने से भी अधिक समय से जारी हडतालों और विरोध प्रदर्शनों के कारण पूरा फ़्रांस ठहर सा गया और सडकों पर लाखों की संख्या में मजदूरों-छात्रों का सैलाब छाया रहा. इस जबरदस्त आंदोलन ने १९६८ के ऐतिहासिक युवा-श्रमिक आंदोलन की यादों को फिर से ताजा कर दिया है.
हालांकि सरकोजी ने पेंशन सुधारों को अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है और विरोधों के बावजूद फ़्रांस की सीनेट में यह कानून बहुत मामूली बहुमत १५३ मतों के मुकाबले १७७ मतों से पारित हो गया है. लेकिन मजदूर संगठनों के रूख से साफ है कि यह लड़ाई का अंत नहीं है. कानून के सीनेट और राष्ट्रीय असेम्बली में पारित होने के बावजूद विरोध प्रदर्शनों और हडतालों का सिलसिला जारी है.
यही नहीं, इस आंदोलन को मिलनेवाला जनसमर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है. कई जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक इस आंदोलन को ७० प्रतिशत से अधिक लोगों का समर्थन हासिल है. दूसरी ओर, सरकोजी निहायत ही अलोकप्रिय राष्ट्रपति हो गए हैं. हालत यह हो गई है कि सरकोजी की लोकप्रियता रेटिंग घटकर सिर्फ ३० प्रतिशत रह गई है.
सरकोजी की पार्टी- यू.एम.पी को लोगों के बढ़ते गुस्से का राजनीतिक खामियाजा भी उठाना पड़ा है. इस साल मार्च में हुए राज्य असेम्बलियों के चुनावों में यू.एम.पी को करार झटका लगा जब २६ में से २३ असेम्बलियों में ग्रीन-लेफ्ट गठबंधन ने कब्ज़ा जमा लिया. असल में, सरकोजी के नव उदारवादी सुधारों के खिलाफ पिछले डेढ़ साल से मजदूरों का संघर्ष जारी है. यह संघर्ष सरकोजी सरकार द्वारा पेंशन सुधारों के नाम पर रिटायरमेंट की उम्र ६० साल से बढ़ाकर ६२ साल करने और पूरे पेंशन लाभ के लिए उम्र सीमा ६५ से बढ़ाकर ६७ साल करने के फैसले के बाद और तेज हो गया है.
जाहिर है कि मजदूर संगठन और व्यापक जनमत इन सुधारों के खिलाफ है. उनका कहना है कि मौजूदा वित्तीय संकट और वैश्विक मंदी बैंकों और वित्तीय संस्थानों की बेलगाम मनमानी और सट्टेबाजी के कारण आई है और उनके नुकसान की भरपाई आमलोगों के हितों को कुर्बान करके की जा रही है. उनका तर्क है कि नए पेंशन सुधारों के बाद मजदूरों को पेंशन के लिए न सिर्फ अधिक उम्र तक कम करना पड़ेगा बल्कि पूर्ण पेंशन लाभों के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा. इसके उलट अमीरों और अभिजात्य वर्गों को पहले की तरह ही मलाई मिलती रहेगी. मजदूरों के साथ-साथ युवा, विद्यार्थी, रिटायर्ड लोग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
यह ठीक है कि फ़्रांस के इस जबरदस्त मजदूर आंदोलन को पिछले दो सालों से पूरे यूरोप में मैड्रिड से लेकर एथेंस तक जारी मजदूर आंदोलनों की कड़ी में ही देखा जाना चाहिए जो वैश्विक मंदी की आड़ में शासक वर्गों द्वारा नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों में कटौती को खुली चुनौती दे रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद फ़्रांस का यह मजदूर आंदोलन कई कारणों से खास और महत्वपूर्ण है.
पहली बात तो यह है कि इस आंदोलन सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं है. हालांकि मजदूरों के मामले में भी यह हाल के दशकों में सबसे व्यापक आंदोलन है लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे फ्रेंच समाज के मुट्ठी भर अभिजात्य और अमीर वर्गों को छोड़कर सभी वर्गों का व्यापक समर्थन मिल रहा है.
इस आंदोलन की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विरोध प्रदर्शनों में सिर्फ श्रमिक ही नहीं बल्कि विद्यार्थी, युवा और आमलोग भी खुलकर हिस्सा ले रहे हैं. इस आंदोलन में विद्यार्थियों और युवाओं की जबरदस्त भागेदारी ने सबको चौंका दिया है. यह भी एक बड़ा कारण है कि यह आंदोलन जल्दी खतम होता नहीं दिख रहा है. दूसरे, पहली बार ऐसा हो रहा है कि मजदूर आंदोलन सिर्फ पेरिस और कुछ दूसरे बड़े शहरों तक सीमित नहीं है बल्कि देश के कोने-कोने में फ़ैल गया है. हालत यह है कि बीस-बीस हजार की आबादी वाले छोटे-छोटे कस्बों और नगरों में भी सात-आठ हजार के विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
तीसरे, फ़्रांस के इस आंदोलन ने यूरोप के अन्य देशों में भी मजदूरों और ट्रेड यूनियनों में जोश भर दिया है. इस कारण इस बात के पूरे आसार हैं कि आनेवाले दिनों में यूरोप में मजदूर आन्दोलनों की नई और जोरदार लहर दिख सकती है क्योंकि वैश्विक मंदी से निपटने और बजट घाटे को कम करने की आड़ में पूरे यूरोप में सामाजिक सुरक्षा के बजट में भारी कटौती की जा रही है. नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को थोपा जा रहा है. इसके खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है.
इस लिहाज से अगले कुछ महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं. नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को उन देशों में ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई है जिन्हें उसकी सफलता के माडल के रूप में पेश किया जाता रहा है. सवाल है कि फ़्रांस के बाद अगली बारी किसकी है?
('समकालीन जनमत' के नवम्बर'१० अंक में दिल्ली डायरी स्तम्भ में प्रकाशित)
हालांकि सरकोजी ने पेंशन सुधारों को अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है और विरोधों के बावजूद फ़्रांस की सीनेट में यह कानून बहुत मामूली बहुमत १५३ मतों के मुकाबले १७७ मतों से पारित हो गया है. लेकिन मजदूर संगठनों के रूख से साफ है कि यह लड़ाई का अंत नहीं है. कानून के सीनेट और राष्ट्रीय असेम्बली में पारित होने के बावजूद विरोध प्रदर्शनों और हडतालों का सिलसिला जारी है.
यही नहीं, इस आंदोलन को मिलनेवाला जनसमर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है. कई जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक इस आंदोलन को ७० प्रतिशत से अधिक लोगों का समर्थन हासिल है. दूसरी ओर, सरकोजी निहायत ही अलोकप्रिय राष्ट्रपति हो गए हैं. हालत यह हो गई है कि सरकोजी की लोकप्रियता रेटिंग घटकर सिर्फ ३० प्रतिशत रह गई है.
सरकोजी की पार्टी- यू.एम.पी को लोगों के बढ़ते गुस्से का राजनीतिक खामियाजा भी उठाना पड़ा है. इस साल मार्च में हुए राज्य असेम्बलियों के चुनावों में यू.एम.पी को करार झटका लगा जब २६ में से २३ असेम्बलियों में ग्रीन-लेफ्ट गठबंधन ने कब्ज़ा जमा लिया. असल में, सरकोजी के नव उदारवादी सुधारों के खिलाफ पिछले डेढ़ साल से मजदूरों का संघर्ष जारी है. यह संघर्ष सरकोजी सरकार द्वारा पेंशन सुधारों के नाम पर रिटायरमेंट की उम्र ६० साल से बढ़ाकर ६२ साल करने और पूरे पेंशन लाभ के लिए उम्र सीमा ६५ से बढ़ाकर ६७ साल करने के फैसले के बाद और तेज हो गया है.
जाहिर है कि मजदूर संगठन और व्यापक जनमत इन सुधारों के खिलाफ है. उनका कहना है कि मौजूदा वित्तीय संकट और वैश्विक मंदी बैंकों और वित्तीय संस्थानों की बेलगाम मनमानी और सट्टेबाजी के कारण आई है और उनके नुकसान की भरपाई आमलोगों के हितों को कुर्बान करके की जा रही है. उनका तर्क है कि नए पेंशन सुधारों के बाद मजदूरों को पेंशन के लिए न सिर्फ अधिक उम्र तक कम करना पड़ेगा बल्कि पूर्ण पेंशन लाभों के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा. इसके उलट अमीरों और अभिजात्य वर्गों को पहले की तरह ही मलाई मिलती रहेगी. मजदूरों के साथ-साथ युवा, विद्यार्थी, रिटायर्ड लोग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
यह ठीक है कि फ़्रांस के इस जबरदस्त मजदूर आंदोलन को पिछले दो सालों से पूरे यूरोप में मैड्रिड से लेकर एथेंस तक जारी मजदूर आंदोलनों की कड़ी में ही देखा जाना चाहिए जो वैश्विक मंदी की आड़ में शासक वर्गों द्वारा नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों में कटौती को खुली चुनौती दे रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद फ़्रांस का यह मजदूर आंदोलन कई कारणों से खास और महत्वपूर्ण है.
पहली बात तो यह है कि इस आंदोलन सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं है. हालांकि मजदूरों के मामले में भी यह हाल के दशकों में सबसे व्यापक आंदोलन है लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे फ्रेंच समाज के मुट्ठी भर अभिजात्य और अमीर वर्गों को छोड़कर सभी वर्गों का व्यापक समर्थन मिल रहा है.
इस आंदोलन की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विरोध प्रदर्शनों में सिर्फ श्रमिक ही नहीं बल्कि विद्यार्थी, युवा और आमलोग भी खुलकर हिस्सा ले रहे हैं. इस आंदोलन में विद्यार्थियों और युवाओं की जबरदस्त भागेदारी ने सबको चौंका दिया है. यह भी एक बड़ा कारण है कि यह आंदोलन जल्दी खतम होता नहीं दिख रहा है. दूसरे, पहली बार ऐसा हो रहा है कि मजदूर आंदोलन सिर्फ पेरिस और कुछ दूसरे बड़े शहरों तक सीमित नहीं है बल्कि देश के कोने-कोने में फ़ैल गया है. हालत यह है कि बीस-बीस हजार की आबादी वाले छोटे-छोटे कस्बों और नगरों में भी सात-आठ हजार के विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
तीसरे, फ़्रांस के इस आंदोलन ने यूरोप के अन्य देशों में भी मजदूरों और ट्रेड यूनियनों में जोश भर दिया है. इस कारण इस बात के पूरे आसार हैं कि आनेवाले दिनों में यूरोप में मजदूर आन्दोलनों की नई और जोरदार लहर दिख सकती है क्योंकि वैश्विक मंदी से निपटने और बजट घाटे को कम करने की आड़ में पूरे यूरोप में सामाजिक सुरक्षा के बजट में भारी कटौती की जा रही है. नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को थोपा जा रहा है. इसके खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है.
इस लिहाज से अगले कुछ महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं. नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को उन देशों में ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई है जिन्हें उसकी सफलता के माडल के रूप में पेश किया जाता रहा है. सवाल है कि फ़्रांस के बाद अगली बारी किसकी है?
('समकालीन जनमत' के नवम्बर'१० अंक में दिल्ली डायरी स्तम्भ में प्रकाशित)
सोमवार, नवंबर 08, 2010
कश्मीर:एक कदम आगे दो कदम पीछे
कश्मीर में यू.पी.ए का राजनीतिक एजेंडा भाजपा तय कर रही है
कश्मीर के सन्दर्भ में मार्क्स का यह कथन बहुत मौजूं हो उठा है: ‘यहां चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही पहले की तरह रहती हैं.’ सितम्बर के आखिरी सप्ताह में सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के श्रीनगर दौरे के बाद बदलाव की जो उम्मीदें जगी थीं, वे धीरे-धीरे मुरझाने लगी हैं. आश्चर्य नहीं कि बदलाव के वायदों के बावजूद घाटी में स्थितियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं. पिछले पांच महीनों से जारी विरोध प्रदर्शनों में पुलिसिया फायरिंग और हिंसा में अब तक १११ से अधिक कश्मीरी नौजवान मारे जा चुके हैं. लोगों में गुस्सा और बेचैनी बढ़ती जा रही है.
इसकी वजह साफ है. सरकारी जुल्म और दमन के खिलाफ कश्मीर कई महीनों तक जलता रहा लेकिन यू.पी.ए सरकार ने पहले तो उसे और अधिक सैन्य ताकत के बल पर दबाने की कोशिश की, नाकाम होने पर बातचीत का राग अलापना शुरू किया और बातचीत के नाम पर वार्ताकारों- वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, अकादमिक राधा कुमार और नौकरशाह एम.एम अंसारी की एक समिति बना दी.
वार्ताकारों की यह टीम अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में घाटी और जम्मू का दौरा करके लौट भी आई लेकिन लगता नहीं कि दिल्ली और श्रीनगर के बीच जमी अविश्वास की बर्फ पिघल पाई और घाटी के माहौल में कोई खास बदलाव आया है.
सच यह है कि कश्मीर में केन्द्र और राज्य सरकार से लोगों का भरोसा इस कदर उठ चुका है कि इस वार्ता को लेकर मुख्यधारा से बाहर की राजनीतिक शक्तियों जैसे हुर्रियत के दोनों धडों या अन्य हथियारबंद समूहों और आम लोगों खासकर नौजवानों का रूख बहुत ठंडा है. उन्हें इस कवायद से कोई खास उम्मीद नहीं दिख रही है. हुर्रियत के एक धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने तो वार्ताकारों के बहिष्कार का भी ऐलान कर दिया है. यही कारण है कि वार्ताकारों की पहली कश्मीर यात्रा से सिवाय कुछ बयानबाजियों के अलावा कुछ खास नहीं निकला.
असल में, इस वार्ता को लेकर केंद्र सरकार खुद बहुत ईमानदार और प्रतिबद्ध नहीं दिख रही है. सरकार के रवैये से ऐसा लगता है कि वह सिर्फ समय गुजारना चाहती है. उसकी ‘गंभीरता’ का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि आधिकारिक तौर पर वार्ताकारों के टर्म्स आफ रेफेरेंस के बारे में कोई घोषणा नहीं की गई है. लेकिन चर्चाओं के मुताबिक उन्हें जम्मू-कश्मीर में सभी वर्गों से बातचीत की शुरुआत और उसे लगातार आगे बढ़ाने, जनभावनाओं से सरकार को अवगत कराने और सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश करने की जिम्मेदारी दी गई है.
हालांकि खुद गृह मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वार्ताकारों के लिए कोई लक्ष्मण रेखा (रेड लाइन) नहीं है. लेकिन जैसे ही भाजपा ने वार्ताकारों की टीम के मुखिया पडगांवकर इस बयान पर शोर मचाना शुरू किया कि कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए पाकिस्तान से बातचीत जरूरी है, केंद्र सरकार और कांग्रेस की जुबान लड़खड़ाने लगी.
इसके बाद भी, जब वार्ताकारों के कुछ अन्य बयानों को भाजपा ने मुद्दा बनाना शुरू किया, कांग्रेस और यू.पी.ए सरकार के पैर थरथराने लगे. इन बयानों में वार्ताकारों ने कथित तौर पर आज़ादी समर्थकों से विस्तृत रोडमैप बताने या भारतीय संविधान में संशोधन करके कश्मीर की आज़ादी के विकल्प को चर्चा के लिए शामिल करने की बात की थी.
हालांकि दिल्ली के दबाव में वार्ताकारों ने खुद भी इन बयानों का खंडन कर दिया लेकिन जिस तरह से कांग्रेस और केंद्र सरकार ने खुद को इन बयानों से अलग कर लिया और ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से ख़ारिज कर दिया, उसके बाद वार्ता से कुछ खास निकलने की उम्मीद करना बेकार है. आखिर कश्मीर की मौजूदा परिस्थितियों में ऐसे वार्ताकारों से कौन बातचीत करना चाहेगा जो एक निश्चित और संकीर्ण रेडलाइन और अपनी शर्तों से बाहर कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं?
असल में, वार्ताकारों को यह अच्छी तरह से पता था कि वे किस अविश्वास, गुस्से और निराशा के माहौल में वार्ता शुरू करने के लिए श्रीनगर पहुंचे हैं. उन्होंने कुछ सार्वजनिक बयान देकर अपनी साख बनाने की कोशिश की लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार ने उनपर तुरंत लाल झंडी दिखा दी, उसके बाद उनकी आगे की राह और मुश्किल हो गई है.
दरअसल, कश्मीर में किसी भी राजनीतिक बातचीत के एक कदम भी आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि वार्ता को अधिकतम संभव खुला यहां तक कि संविधान के बंधे-बंधाए खांचे से बाहर जाने के लिए भी तैयार रखा जाए और उस वार्ता के प्रति केंद्र सरकार की असंदिग्ध राजनीतिक ईमानदारी, साहस और प्रतिबद्धता होनी चाहिए. लेकिन एक बार फिर साबित हो गया कि कांग्रेस नेतृत्व और यू.पी.ए सरकार में वह राजनीतिक साहस नहीं है और न ही वह किसी तरह का राजनीतिक जोखिम लेने के लिए तैयार है.
असल में, कांग्रेस को हमेशा भाजपा का डर सताता रहता है. उसे लगता है कि कश्मीर के मुद्दे पर जरा भी नरम पड़ने पर भाजपा इसे मुद्दा बना सकती है और उसके खिलाफ ‘देशहित से समझौता’ करने का आरोप लगाते हुए हिंदू भावनाओं को भडका सकती है. उसके इस डर का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में कश्मीर मुद्दे पर हुए सेमिनार में कश्मीर के आज़ादी समर्थक नेता सैय्यद अली शाह गिलानी और अरुंधती राय के भाषणों को जब भाजपा नेता अरुण जेतली ने जोर-शोर से उछाला तो पूरी सरकार हिल गई.
खुद गृह मंत्रालय ने इस मामले में कार्रवाई की बातें करनी शुरू कर दी. इस मुद्दे पर जिस तरह से केंद्र सरकार ने कभी गरम, कभी नरम रूख अपनाया, उससे अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कश्मीर के मुद्दे पर यू.पी.ए सरकार किसके एजेंडे पर चल रही है.
कांग्रेस के इसी डर ने उसे कश्मीर के मामले में राजनीतिक रूप से पंगु बना दिया है. सच यह है कि कश्मीर के मुद्दे पर यू.पी.ए सरकार का राजनीतिक एजेंडा भाजपा-आर.एस.एस तय कर रहे हैं. जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कश्मीर में यू.पी.ए सरकार कोई बड़ी पहलकदमी लेने की स्थिति में नहीं है.
आश्चर्य नहीं कि तमाम बातचीत और चर्चाओं के बावजूद सरकार कश्मीर घाटी में सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून(अफ्सा) को हटाने को लेकर कोई फैसला नहीं कर पाई है जबकि यह कोई संविधान से बाहर का फैसला नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक फैसला कश्मीर में एक नई पहल की जमीन तैयार कर सकता था. इस जमीन पर वार्ताकारों का काम थोड़ा आसान हो जाता.
लेकिन यू.पी.ए ने यह मौका गवां दिया है. कश्मीर नीति को आर.एस.एस-भाजपा के हाथों में बंधक रख चुकी कांग्रेस से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?
('समकालीन जनमत' के नवम्बर'१० अंक में दिल्ली डायरी स्तम्भ में प्रकाशित)
कश्मीर के सन्दर्भ में मार्क्स का यह कथन बहुत मौजूं हो उठा है: ‘यहां चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही पहले की तरह रहती हैं.’ सितम्बर के आखिरी सप्ताह में सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के श्रीनगर दौरे के बाद बदलाव की जो उम्मीदें जगी थीं, वे धीरे-धीरे मुरझाने लगी हैं. आश्चर्य नहीं कि बदलाव के वायदों के बावजूद घाटी में स्थितियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं. पिछले पांच महीनों से जारी विरोध प्रदर्शनों में पुलिसिया फायरिंग और हिंसा में अब तक १११ से अधिक कश्मीरी नौजवान मारे जा चुके हैं. लोगों में गुस्सा और बेचैनी बढ़ती जा रही है.
इसकी वजह साफ है. सरकारी जुल्म और दमन के खिलाफ कश्मीर कई महीनों तक जलता रहा लेकिन यू.पी.ए सरकार ने पहले तो उसे और अधिक सैन्य ताकत के बल पर दबाने की कोशिश की, नाकाम होने पर बातचीत का राग अलापना शुरू किया और बातचीत के नाम पर वार्ताकारों- वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, अकादमिक राधा कुमार और नौकरशाह एम.एम अंसारी की एक समिति बना दी.
वार्ताकारों की यह टीम अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में घाटी और जम्मू का दौरा करके लौट भी आई लेकिन लगता नहीं कि दिल्ली और श्रीनगर के बीच जमी अविश्वास की बर्फ पिघल पाई और घाटी के माहौल में कोई खास बदलाव आया है.
सच यह है कि कश्मीर में केन्द्र और राज्य सरकार से लोगों का भरोसा इस कदर उठ चुका है कि इस वार्ता को लेकर मुख्यधारा से बाहर की राजनीतिक शक्तियों जैसे हुर्रियत के दोनों धडों या अन्य हथियारबंद समूहों और आम लोगों खासकर नौजवानों का रूख बहुत ठंडा है. उन्हें इस कवायद से कोई खास उम्मीद नहीं दिख रही है. हुर्रियत के एक धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने तो वार्ताकारों के बहिष्कार का भी ऐलान कर दिया है. यही कारण है कि वार्ताकारों की पहली कश्मीर यात्रा से सिवाय कुछ बयानबाजियों के अलावा कुछ खास नहीं निकला.
असल में, इस वार्ता को लेकर केंद्र सरकार खुद बहुत ईमानदार और प्रतिबद्ध नहीं दिख रही है. सरकार के रवैये से ऐसा लगता है कि वह सिर्फ समय गुजारना चाहती है. उसकी ‘गंभीरता’ का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि आधिकारिक तौर पर वार्ताकारों के टर्म्स आफ रेफेरेंस के बारे में कोई घोषणा नहीं की गई है. लेकिन चर्चाओं के मुताबिक उन्हें जम्मू-कश्मीर में सभी वर्गों से बातचीत की शुरुआत और उसे लगातार आगे बढ़ाने, जनभावनाओं से सरकार को अवगत कराने और सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश करने की जिम्मेदारी दी गई है.
हालांकि खुद गृह मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वार्ताकारों के लिए कोई लक्ष्मण रेखा (रेड लाइन) नहीं है. लेकिन जैसे ही भाजपा ने वार्ताकारों की टीम के मुखिया पडगांवकर इस बयान पर शोर मचाना शुरू किया कि कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए पाकिस्तान से बातचीत जरूरी है, केंद्र सरकार और कांग्रेस की जुबान लड़खड़ाने लगी.
इसके बाद भी, जब वार्ताकारों के कुछ अन्य बयानों को भाजपा ने मुद्दा बनाना शुरू किया, कांग्रेस और यू.पी.ए सरकार के पैर थरथराने लगे. इन बयानों में वार्ताकारों ने कथित तौर पर आज़ादी समर्थकों से विस्तृत रोडमैप बताने या भारतीय संविधान में संशोधन करके कश्मीर की आज़ादी के विकल्प को चर्चा के लिए शामिल करने की बात की थी.
हालांकि दिल्ली के दबाव में वार्ताकारों ने खुद भी इन बयानों का खंडन कर दिया लेकिन जिस तरह से कांग्रेस और केंद्र सरकार ने खुद को इन बयानों से अलग कर लिया और ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से ख़ारिज कर दिया, उसके बाद वार्ता से कुछ खास निकलने की उम्मीद करना बेकार है. आखिर कश्मीर की मौजूदा परिस्थितियों में ऐसे वार्ताकारों से कौन बातचीत करना चाहेगा जो एक निश्चित और संकीर्ण रेडलाइन और अपनी शर्तों से बाहर कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं?
असल में, वार्ताकारों को यह अच्छी तरह से पता था कि वे किस अविश्वास, गुस्से और निराशा के माहौल में वार्ता शुरू करने के लिए श्रीनगर पहुंचे हैं. उन्होंने कुछ सार्वजनिक बयान देकर अपनी साख बनाने की कोशिश की लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार ने उनपर तुरंत लाल झंडी दिखा दी, उसके बाद उनकी आगे की राह और मुश्किल हो गई है.
दरअसल, कश्मीर में किसी भी राजनीतिक बातचीत के एक कदम भी आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि वार्ता को अधिकतम संभव खुला यहां तक कि संविधान के बंधे-बंधाए खांचे से बाहर जाने के लिए भी तैयार रखा जाए और उस वार्ता के प्रति केंद्र सरकार की असंदिग्ध राजनीतिक ईमानदारी, साहस और प्रतिबद्धता होनी चाहिए. लेकिन एक बार फिर साबित हो गया कि कांग्रेस नेतृत्व और यू.पी.ए सरकार में वह राजनीतिक साहस नहीं है और न ही वह किसी तरह का राजनीतिक जोखिम लेने के लिए तैयार है.
असल में, कांग्रेस को हमेशा भाजपा का डर सताता रहता है. उसे लगता है कि कश्मीर के मुद्दे पर जरा भी नरम पड़ने पर भाजपा इसे मुद्दा बना सकती है और उसके खिलाफ ‘देशहित से समझौता’ करने का आरोप लगाते हुए हिंदू भावनाओं को भडका सकती है. उसके इस डर का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में कश्मीर मुद्दे पर हुए सेमिनार में कश्मीर के आज़ादी समर्थक नेता सैय्यद अली शाह गिलानी और अरुंधती राय के भाषणों को जब भाजपा नेता अरुण जेतली ने जोर-शोर से उछाला तो पूरी सरकार हिल गई.
खुद गृह मंत्रालय ने इस मामले में कार्रवाई की बातें करनी शुरू कर दी. इस मुद्दे पर जिस तरह से केंद्र सरकार ने कभी गरम, कभी नरम रूख अपनाया, उससे अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कश्मीर के मुद्दे पर यू.पी.ए सरकार किसके एजेंडे पर चल रही है.
कांग्रेस के इसी डर ने उसे कश्मीर के मामले में राजनीतिक रूप से पंगु बना दिया है. सच यह है कि कश्मीर के मुद्दे पर यू.पी.ए सरकार का राजनीतिक एजेंडा भाजपा-आर.एस.एस तय कर रहे हैं. जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कश्मीर में यू.पी.ए सरकार कोई बड़ी पहलकदमी लेने की स्थिति में नहीं है.
आश्चर्य नहीं कि तमाम बातचीत और चर्चाओं के बावजूद सरकार कश्मीर घाटी में सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून(अफ्सा) को हटाने को लेकर कोई फैसला नहीं कर पाई है जबकि यह कोई संविधान से बाहर का फैसला नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक फैसला कश्मीर में एक नई पहल की जमीन तैयार कर सकता था. इस जमीन पर वार्ताकारों का काम थोड़ा आसान हो जाता.
लेकिन यू.पी.ए ने यह मौका गवां दिया है. कश्मीर नीति को आर.एस.एस-भाजपा के हाथों में बंधक रख चुकी कांग्रेस से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?
('समकालीन जनमत' के नवम्बर'१० अंक में दिल्ली डायरी स्तम्भ में प्रकाशित)
शुक्रवार, नवंबर 05, 2010
कारोबारी ओबामा के मंसूबे
भारतीय हितों की कीमत पर अमरीकी अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने की जुगत में हैं ओबामा
वैसे तो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के एजेंडे पर राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक सभी मुद्दे शामिल हैं लेकिन माना जा रहा है कि इस यात्रा के केंद्र में आर्थिक और कारोबारी मुद्दे ही छाए रहेंगे. इसकी वजह स्पष्ट है.
असल में, किसी भी देश और उसकी सरकार की विदेश नीति उसकी घरेलू नीतियों का ही विस्तार होती हैं. राष्ट्रपति ओबामा की विदेश नीति भी इस नियम की अपवाद नहीं है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि जब से ओबामा राष्ट्रपति बने हैं, उनके लिए वित्तीय संकट और मंदी की चपेट में फंसी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
उल्लेखनीय है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था २००७-०८ में शुरू हुए सब-प्राइम संकट के बाद से इस तरह से लड़खडायी कि अब तक संभल नहीं पाई है. ओबामा प्रशासन द्वारा अरबों डालर के उत्प्रेरक पैकेजों (स्टिमुलस) और अति उदार मौद्रिक नीति के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति नाजुक बनी हुई है. बेरोजगारी दर १० प्रतिशत के आसपास बनी हुई है. आशंका जताई जा रही है कि अर्थव्यवस्था फिर से मंदी की चपेट में आ सकती है.
जाहिर है कि ओबामा के लिए यह सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गई है क्योंकि इस आर्थिक संकट के साथ उनका राजनीतिक कैरियर भी दांव पर लग गया है. उनकी लोकप्रियता लगातार ढलान पर है और हालिया संसद, सीनेट और राज्यों के गवर्नरों के चुनावों में डेमोक्रटिक पार्टी की हार ने उनके अगले कार्यकाल की उम्मीदों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है. अगले कुछ महीनों में अमेरिका में २०१२ के राष्ट्रपति चुनावों के लिए प्रक्रिया शुरू हो जायेगी और उसका सबसे बड़ा मुद्दा अर्थव्यवस्था ही होगी.
ऐसे में, ओबामा का पूरा ध्यान अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर है. वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट से बाहर निकालने, घरेलू निवेश और अमेरिकियों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने के वास्ते बाजार खोज रहे हैं जहां अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं को खपाया जा सके. कहने की जरूरत नहीं है कि भारत उन्हें एक बड़े बाजार के रूप में नजर आ रहा है जिसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में अमेरिकी कंपनियों को काफी संभावनाएं दिख रही हैं.
आश्चर्य नहीं कि ओबामा के साथ आ रहे अब तक के सबसे बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल में २०० से ज्यादा बड़ी और मंझोली अमेरिकी कंपनियों के सी.ई.ओ और चेयरमैन होंगे. यही नहीं, ओबामा का दौरे की शुरुआत में देश की वित्तीय और कारोबारी राजधानी मुंबई पहुंच रहे हैं और वहां उनका दो दिन गुजारना सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है. इसके गहरे निहितार्थ हैं. वैसे भी अमेरिकी प्रतीकात्मकता में बहुत विश्वास नहीं करते हैं. उन्हें साफ और सीधी बात करने के लिए जाना जाता है.
यही कारण है कि इस यात्रा से पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग के दौरान ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के वाशिंगटन संवाददाता चिदानंद राजघट्टा ने गिना कि अमेरिकी अधिकारियों ने आर्थिक एजेंडे के बारे में २६ बार, अमेरिकी निर्यात और अमेरिकियों के लिए रोजगार बढ़ाने का १७ बार और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी का सिर्फ तीन बार उल्लेख किया. अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि राष्ट्रपति ओबामा भारत क्यों और किस मकसद से आ रहे हैं?
असल में, ओबामा प्रशासन ने पांच वर्षों में यानी २०१४ तक अमेरिकी निर्यात को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया हुआ है. २००९ में अमरीका का कुल निर्यात लगभग १.०५ खरब डालर का था. ओबामा इसे दो खरब डालर तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि लाखों नए रोजगार पैदा किए जा सकें.
दूसरी ओर, वे अमेरिकी बाजार को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देने की कोशिश भी कर रहे हैं. इसके लिए पिछले दो साल में ओबामा प्रशासन ने कई संरक्षणवादी कदम भी उठाये हैं जिनमें आउटसोर्सिंग को हतोत्साहित करने के लिए कंपनियों से टैक्स छूट वापस लेने से लेकर विदेशी उत्पादों के आयात को रोकने के लिए उनपर एंटी डम्पिंग ड्यूटी आदि लगाने का फैसला शामिल है.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि ओबामा अपने इन्हीं कारोबारी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत आ रहे हैं. उन्हें और अमेरिकी कंपनियों को भारत एक ऐसे बाजार के रूप में दिखाई पड़ रहा है जो उनके इस अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में मददगार बन सकता है.
असल में, अमेरिकी कंपनियों की नजरें भारत में उच्च तकनीकी उत्पादों, परमाणु तकनीक और उपकरणों, रक्षा उपकरणों और हथियारों, बीमा और बैंकिंग उत्पादों, कृषि और डेयरी उत्पादों, शिक्षा और खुदरा बाजार पर हैं. भारत में अकेले परमाणु, रक्षा और उच्च तकनीकी उपकरणों का बाजार लगभग १०-२० अरब डालर (लगभग एक लाख करोड़ रूपये) का है.
ओबामा इस भारतीय बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खुलवाना चाहते हैं. इसलिए जब अमेरिका, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की बात करता है या परमाणु समझौते को लेकर इतनी उत्सुकता दिखाता है तो उसके पीछे रणनीतिक कारणों से अधिक अरबों डालर के कारोबार को कब्जाने की चिंता काम कर रही होती है. यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि खुद अमेरिका द्वारा परमाणु बिजली के नए उपक्रम न शुरू करने के फैसले के कारण आर्थिक रूप से खस्ताहाल घरेलू परमाणु रिएक्टर और उपकरण उद्योग के लिए भारतीय बाजार किसी संजीवनी से कम नहीं साबित होगा.
इसी तरह, भारत ने हाल के वर्षों में जिस तरह से रक्षा उपकरणों और हथियारों की खरीद का बजट बढ़ाया है, उसपर भी अमेरिकी रक्षा उद्योग की नजर ललचाई हुई है. एक अनुमान के मुताबिक भारत हर साल लगभग ४५-५० हजार करोड़ के हथियार और रक्षा उपकरण खरीद रहा है. ध्यान रहे कि राष्ट्रपति चाहे किसी भी पार्टी का हो, अमेरिकी प्रशासन की नीतियों को सबसे अधिक सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ (मिलिटरी-इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स) ही प्रभावित करता रहा है. इस गठजोड़ के दबाव में ही इस बात की पूरी संभावना है कि ओबामा इस दौरे में अमेरिका की ओर से भारत को उच्च तकनीक के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा कर सकते हैं.
लेकिन सबसे खास बात यह है कि इस दौरे में ओबामा भारत पर अपने बाजारों को अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं के लिए पूरी तरह से खोलने के लिए दबाव डाल सकते हैं. खासकर अमेरिकी कारपोरेट लाबी चाहती है कि भारत अपना खुदरा बाजार विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोले. इसके अलावा वह भारत के कृषि-डेयरी और मीट उत्पादों के बड़े बाजार में भी घुसपैठ के लिए भी दबाव बनाये हुए है. यह लाबी इन्फ्रास्ट्रक्चर में अमेरिकी कंपनियों के निवेश का अवसर भी खोलना चाहती है लेकिन इसके लिए वह चाहती है कि भारत बीमा और बैंकिंग कारोबार में विदेशी निवेश की मौजूदा सीमाओं को बढ़ाये.
लेकिन इस सबके बदले में अमेरिका, भारत को कुछ खास देने की स्थिति में नहीं है. ओबामा आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर भारतीय कंपनियों को कोई राहत नहीं देनेवाले हैं और न ही वे उन कदमों को वापस लेनेवाले हैं जिसके तहत कई भारतीय उत्पादों जैसे स्टील और टेक्सटाइल का निर्यात प्रभावित हुआ है. ध्यान रहे कि अमेरिका ने पिछले साल फ़रवरी में पास रिकवरी एंड रीन्वेस्टमेंट कानून के तहत यह अनिवार्य कर दिया है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अमेरिका में ही उत्पादित स्टील इस्तेमाल किया जायेगा.
इसी तरह, हवाई अड्डों पर सुरक्षा में लगे कर्मचारियों की वर्दी का कपड़ा देश में ही उत्पादित होना चाहिए. इससे भारतीय स्टील और टेक्सटाइल निर्यात पर बुरा असर पड़ा है. इसी तरह, अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में चीनी कंपनियों के बाद सबसे अधिक एंटी डम्पिंग ड्यूटी भारतीय कंपनियों पर ही ठोंकी है.
दूसरी ओर, ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका अपने सभी कारोबारी उद्देश्यों को हासिल करने के लिए भारत पर द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संधि करने के लिए भी जोर डाल रहा है. इस संधि के जरिये वह एक झटके में अमेरिकी कंपनियों के भारत में निवेश और अमेरिकी उत्पादों/सेवाओं के भारत में आयात पर लगी रुकावटों को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहता है. इस संधि के बाद अमेरिकी निवेश को घरेलू निवेश की ही तरह ट्रीट करना होगा. उसे वही सुविधाएँ और लाभ देने होंगे जो भारतीय निवेशकों को हासिल हैं. इस संधि के बाद यही बात द्विपक्षीय व्यापार पर भी लागू होगी.
ऊपर से देखने पर यह प्रस्ताव बहुत आकर्षक लगता है लेकिन वास्तव में, यह एक ट्रैप है. यह एक बहुत असमान और भारतीय हितों के विरुद्ध संधि का प्रस्ताव है. असल में, अमेरिका और भारत के बीच व्यापार और निवेश के मुद्दे पर कई गहरे मतभेद रहे हैं. अमेरिका पहले इस तरह की बहुपक्षीय संधि के लिए डब्ल्यू.टी.ओ में कोशिश कर चुका है लेकिन वहां भारत समेत तमाम विकासशील देशों के विरोध के कारण उसे पीछे हटना पड़ा. कृषि-डेयरी उत्पादों के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के मतभेद किसी से छुपे नहीं हैं. अमेरिका अपने किसानों और पशुपालकों को जितनी सब्सिडी देता है, उसके कारण उसके उत्पादों से भारतीय किसान मुकाबला नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में, भारतीय किसानों के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा.
यही कारण है कि डब्ल्यू.टी.ओ में कामयाब न हो पाने के बाद से अमेरिका अपने करीबी देशों पर दबाव डाल कर उनके साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संधि कर रहा है. इसके बावजूद इन संधियों के खिलाफ कई देशों में व्यापक विरोध के बाद उन देशों की सरकारों को न चाहते भी पीछे हटना पड़ा है. भारत में भी जनमत को इस मामले में सतर्क रहना होगा और अपने आर्थिक हितों की पहरेदारी करनी होगी. यह इसलिए भी जरूरी है कि यू.पी.ए सरकार और देशी कारपोरेट लाबी का गठजोड़ इस समय अमेरिका से दोस्ती के ऐसे नशे में है कि अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय हितों को भी दांव पर लगाने पर तुला हुआ है.
('राष्ट्रीय सहारा' के 5नवम्बर'10 अंक में 'हस्तक्षेप' परिशिष्ट में प्रकाशित)
वैसे तो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के एजेंडे पर राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक सभी मुद्दे शामिल हैं लेकिन माना जा रहा है कि इस यात्रा के केंद्र में आर्थिक और कारोबारी मुद्दे ही छाए रहेंगे. इसकी वजह स्पष्ट है.
असल में, किसी भी देश और उसकी सरकार की विदेश नीति उसकी घरेलू नीतियों का ही विस्तार होती हैं. राष्ट्रपति ओबामा की विदेश नीति भी इस नियम की अपवाद नहीं है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि जब से ओबामा राष्ट्रपति बने हैं, उनके लिए वित्तीय संकट और मंदी की चपेट में फंसी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
उल्लेखनीय है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था २००७-०८ में शुरू हुए सब-प्राइम संकट के बाद से इस तरह से लड़खडायी कि अब तक संभल नहीं पाई है. ओबामा प्रशासन द्वारा अरबों डालर के उत्प्रेरक पैकेजों (स्टिमुलस) और अति उदार मौद्रिक नीति के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति नाजुक बनी हुई है. बेरोजगारी दर १० प्रतिशत के आसपास बनी हुई है. आशंका जताई जा रही है कि अर्थव्यवस्था फिर से मंदी की चपेट में आ सकती है.
जाहिर है कि ओबामा के लिए यह सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गई है क्योंकि इस आर्थिक संकट के साथ उनका राजनीतिक कैरियर भी दांव पर लग गया है. उनकी लोकप्रियता लगातार ढलान पर है और हालिया संसद, सीनेट और राज्यों के गवर्नरों के चुनावों में डेमोक्रटिक पार्टी की हार ने उनके अगले कार्यकाल की उम्मीदों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है. अगले कुछ महीनों में अमेरिका में २०१२ के राष्ट्रपति चुनावों के लिए प्रक्रिया शुरू हो जायेगी और उसका सबसे बड़ा मुद्दा अर्थव्यवस्था ही होगी.
ऐसे में, ओबामा का पूरा ध्यान अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर है. वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट से बाहर निकालने, घरेलू निवेश और अमेरिकियों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने के वास्ते बाजार खोज रहे हैं जहां अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं को खपाया जा सके. कहने की जरूरत नहीं है कि भारत उन्हें एक बड़े बाजार के रूप में नजर आ रहा है जिसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में अमेरिकी कंपनियों को काफी संभावनाएं दिख रही हैं.
आश्चर्य नहीं कि ओबामा के साथ आ रहे अब तक के सबसे बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल में २०० से ज्यादा बड़ी और मंझोली अमेरिकी कंपनियों के सी.ई.ओ और चेयरमैन होंगे. यही नहीं, ओबामा का दौरे की शुरुआत में देश की वित्तीय और कारोबारी राजधानी मुंबई पहुंच रहे हैं और वहां उनका दो दिन गुजारना सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है. इसके गहरे निहितार्थ हैं. वैसे भी अमेरिकी प्रतीकात्मकता में बहुत विश्वास नहीं करते हैं. उन्हें साफ और सीधी बात करने के लिए जाना जाता है.
यही कारण है कि इस यात्रा से पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग के दौरान ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के वाशिंगटन संवाददाता चिदानंद राजघट्टा ने गिना कि अमेरिकी अधिकारियों ने आर्थिक एजेंडे के बारे में २६ बार, अमेरिकी निर्यात और अमेरिकियों के लिए रोजगार बढ़ाने का १७ बार और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी का सिर्फ तीन बार उल्लेख किया. अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि राष्ट्रपति ओबामा भारत क्यों और किस मकसद से आ रहे हैं?
असल में, ओबामा प्रशासन ने पांच वर्षों में यानी २०१४ तक अमेरिकी निर्यात को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया हुआ है. २००९ में अमरीका का कुल निर्यात लगभग १.०५ खरब डालर का था. ओबामा इसे दो खरब डालर तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि लाखों नए रोजगार पैदा किए जा सकें.
दूसरी ओर, वे अमेरिकी बाजार को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देने की कोशिश भी कर रहे हैं. इसके लिए पिछले दो साल में ओबामा प्रशासन ने कई संरक्षणवादी कदम भी उठाये हैं जिनमें आउटसोर्सिंग को हतोत्साहित करने के लिए कंपनियों से टैक्स छूट वापस लेने से लेकर विदेशी उत्पादों के आयात को रोकने के लिए उनपर एंटी डम्पिंग ड्यूटी आदि लगाने का फैसला शामिल है.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि ओबामा अपने इन्हीं कारोबारी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत आ रहे हैं. उन्हें और अमेरिकी कंपनियों को भारत एक ऐसे बाजार के रूप में दिखाई पड़ रहा है जो उनके इस अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में मददगार बन सकता है.
असल में, अमेरिकी कंपनियों की नजरें भारत में उच्च तकनीकी उत्पादों, परमाणु तकनीक और उपकरणों, रक्षा उपकरणों और हथियारों, बीमा और बैंकिंग उत्पादों, कृषि और डेयरी उत्पादों, शिक्षा और खुदरा बाजार पर हैं. भारत में अकेले परमाणु, रक्षा और उच्च तकनीकी उपकरणों का बाजार लगभग १०-२० अरब डालर (लगभग एक लाख करोड़ रूपये) का है.
ओबामा इस भारतीय बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खुलवाना चाहते हैं. इसलिए जब अमेरिका, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की बात करता है या परमाणु समझौते को लेकर इतनी उत्सुकता दिखाता है तो उसके पीछे रणनीतिक कारणों से अधिक अरबों डालर के कारोबार को कब्जाने की चिंता काम कर रही होती है. यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि खुद अमेरिका द्वारा परमाणु बिजली के नए उपक्रम न शुरू करने के फैसले के कारण आर्थिक रूप से खस्ताहाल घरेलू परमाणु रिएक्टर और उपकरण उद्योग के लिए भारतीय बाजार किसी संजीवनी से कम नहीं साबित होगा.
इसी तरह, भारत ने हाल के वर्षों में जिस तरह से रक्षा उपकरणों और हथियारों की खरीद का बजट बढ़ाया है, उसपर भी अमेरिकी रक्षा उद्योग की नजर ललचाई हुई है. एक अनुमान के मुताबिक भारत हर साल लगभग ४५-५० हजार करोड़ के हथियार और रक्षा उपकरण खरीद रहा है. ध्यान रहे कि राष्ट्रपति चाहे किसी भी पार्टी का हो, अमेरिकी प्रशासन की नीतियों को सबसे अधिक सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ (मिलिटरी-इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स) ही प्रभावित करता रहा है. इस गठजोड़ के दबाव में ही इस बात की पूरी संभावना है कि ओबामा इस दौरे में अमेरिका की ओर से भारत को उच्च तकनीक के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा कर सकते हैं.
लेकिन सबसे खास बात यह है कि इस दौरे में ओबामा भारत पर अपने बाजारों को अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं के लिए पूरी तरह से खोलने के लिए दबाव डाल सकते हैं. खासकर अमेरिकी कारपोरेट लाबी चाहती है कि भारत अपना खुदरा बाजार विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोले. इसके अलावा वह भारत के कृषि-डेयरी और मीट उत्पादों के बड़े बाजार में भी घुसपैठ के लिए भी दबाव बनाये हुए है. यह लाबी इन्फ्रास्ट्रक्चर में अमेरिकी कंपनियों के निवेश का अवसर भी खोलना चाहती है लेकिन इसके लिए वह चाहती है कि भारत बीमा और बैंकिंग कारोबार में विदेशी निवेश की मौजूदा सीमाओं को बढ़ाये.
लेकिन इस सबके बदले में अमेरिका, भारत को कुछ खास देने की स्थिति में नहीं है. ओबामा आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर भारतीय कंपनियों को कोई राहत नहीं देनेवाले हैं और न ही वे उन कदमों को वापस लेनेवाले हैं जिसके तहत कई भारतीय उत्पादों जैसे स्टील और टेक्सटाइल का निर्यात प्रभावित हुआ है. ध्यान रहे कि अमेरिका ने पिछले साल फ़रवरी में पास रिकवरी एंड रीन्वेस्टमेंट कानून के तहत यह अनिवार्य कर दिया है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में अमेरिका में ही उत्पादित स्टील इस्तेमाल किया जायेगा.
इसी तरह, हवाई अड्डों पर सुरक्षा में लगे कर्मचारियों की वर्दी का कपड़ा देश में ही उत्पादित होना चाहिए. इससे भारतीय स्टील और टेक्सटाइल निर्यात पर बुरा असर पड़ा है. इसी तरह, अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में चीनी कंपनियों के बाद सबसे अधिक एंटी डम्पिंग ड्यूटी भारतीय कंपनियों पर ही ठोंकी है.
दूसरी ओर, ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका अपने सभी कारोबारी उद्देश्यों को हासिल करने के लिए भारत पर द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संधि करने के लिए भी जोर डाल रहा है. इस संधि के जरिये वह एक झटके में अमेरिकी कंपनियों के भारत में निवेश और अमेरिकी उत्पादों/सेवाओं के भारत में आयात पर लगी रुकावटों को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहता है. इस संधि के बाद अमेरिकी निवेश को घरेलू निवेश की ही तरह ट्रीट करना होगा. उसे वही सुविधाएँ और लाभ देने होंगे जो भारतीय निवेशकों को हासिल हैं. इस संधि के बाद यही बात द्विपक्षीय व्यापार पर भी लागू होगी.
ऊपर से देखने पर यह प्रस्ताव बहुत आकर्षक लगता है लेकिन वास्तव में, यह एक ट्रैप है. यह एक बहुत असमान और भारतीय हितों के विरुद्ध संधि का प्रस्ताव है. असल में, अमेरिका और भारत के बीच व्यापार और निवेश के मुद्दे पर कई गहरे मतभेद रहे हैं. अमेरिका पहले इस तरह की बहुपक्षीय संधि के लिए डब्ल्यू.टी.ओ में कोशिश कर चुका है लेकिन वहां भारत समेत तमाम विकासशील देशों के विरोध के कारण उसे पीछे हटना पड़ा. कृषि-डेयरी उत्पादों के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के मतभेद किसी से छुपे नहीं हैं. अमेरिका अपने किसानों और पशुपालकों को जितनी सब्सिडी देता है, उसके कारण उसके उत्पादों से भारतीय किसान मुकाबला नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में, भारतीय किसानों के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा.
यही कारण है कि डब्ल्यू.टी.ओ में कामयाब न हो पाने के बाद से अमेरिका अपने करीबी देशों पर दबाव डाल कर उनके साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संधि कर रहा है. इसके बावजूद इन संधियों के खिलाफ कई देशों में व्यापक विरोध के बाद उन देशों की सरकारों को न चाहते भी पीछे हटना पड़ा है. भारत में भी जनमत को इस मामले में सतर्क रहना होगा और अपने आर्थिक हितों की पहरेदारी करनी होगी. यह इसलिए भी जरूरी है कि यू.पी.ए सरकार और देशी कारपोरेट लाबी का गठजोड़ इस समय अमेरिका से दोस्ती के ऐसे नशे में है कि अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय हितों को भी दांव पर लगाने पर तुला हुआ है.
('राष्ट्रीय सहारा' के 5नवम्बर'10 अंक में 'हस्तक्षेप' परिशिष्ट में प्रकाशित)
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