सोमवार, अक्टूबर 24, 2011

गद्दाफी के साथ लीबिया में एक युग का अंत

लेकिन पश्चिमी देशों की वहां लोकतंत्र की स्थापना में नहीं बल्कि तेल की बंदरबांट में दिलचस्पी है


एक पूर्व निश्चित पटकथा के मुताबिक, नाटो समर्थित विद्रोहियों के हाथों कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के मारे जाने के साथ ही लीबिया में न सिर्फ गद्दाफी की ४२ वर्षों पुरानी हुकूमत बल्कि उसके साथ ही एक युग का अंत हो गया. आप चाहें तो कह सकते हैं कि अरब वसंत के साथ उठी जनविद्रोह की आंधी ने एक और तानाशाह और जनविरोधी हुकूमत की बलि ले ली.

लेकिन पूरा सच यह है कि लीबिया में जो कुछ हुआ और हो रहा है, उससे यह तय हो गया है कि अरब वसंत का नेतृत्व एक बार फिर अरब जनता के हाथ से निकलकर पश्चिमी आकाओं के हाथ में पहुँच चुका है.

आश्चर्य नहीं कि पश्चिमी देशों में इस कामयाबी पर खुशी के साथ-साथ निश्चिन्तता का भाव है. इसकी वजह साफ है. असल में, लीबिया में गद्दाफी हुकूमत के खिलाफ भडके स्वाभाविक जन उभार की वास्तविक कमान राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के हाथों में नहीं बल्कि अमेरिका और नाटो देशों के हाथों में है.

सच पूछिए तो लगभग सभी व्यवहारिक अर्थों में नाटो ने इस विद्रोह को हड़प लिया है और लीबिया में इस तख्ता पलट की पटकथा वाशिंगटन-पेरिस और लन्दन में लिखी गई है. स्वाभाविक है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने गद्दाफी हुकूमत के अंत में ब्रिटेन की भूमिका पर खुशी और संतोष जाहिर किया है.

यह एक त्रासदी ही है कि जो अरब वसंत अरब जगत में पश्चिम के कठपुतली हुकूमतों और उनके लूट, अन्याय और दमन के खिलाफ शुरू हुआ था, वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका और उन्हीं पश्चिमी देशों की गोद में जा बैठा है जिनका अतीत बहुत आश्वस्त नहीं करता है. इसमें कोई शक नहीं है कि इसके लिए काफी हद तक खुद गद्दाफी भी जिम्मेदार थे.

अगर उन्होंने अरब वसंत के साथ उठी बदलाव की आंधी के बीच दीवार पर लिखे साफ़ सन्देश को पढ़ा होता और लीबियाई जनता की भावनाओं और इच्छाओं का आदर किया होता तो शायद पश्चिमी देशों को इस तरह से नाक घुसाने की जगह नहीं मिलती.

इस मायने में गद्दाफी को अपनी राजनीतिक गलतियों और अति-आत्मविश्वास का खामियाजा भुगतना पड़ा है. वे यह समझ नहीं पाए कि न सिर्फ अरब जगत बल्कि लीबिया में भी समय बदल चुका है. यह जानते हुए भी कि लोग बदलाव चाहते हैं, गद्दाफी ने बदलाव को स्वीकार करने के बजाय ताकत के बल पर रोकने की कोशिश की और इसका फायदा उठाने में पश्चिमी देशों ने देरी नहीं की.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि गद्दाफी को बदलाव को रोकने की कीमत चुकानी पड़ी है. यह एक भ्रम है कि वे लीबिया में पश्चिमी देशों के साम्राज्यवादी घुसपैठ के खिलाफ लड़ रहे थे. खुद गद्दाफी ने इस लड़ाई को इसी रूप में पेश करने की कोशिश की लेकिन साफ है कि लीबियाई जनता के एक बड़े हिस्से ने इसे स्वीकार नहीं किया.

सच यह है कि वे अपनी तानाशाही को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे. लोगों के सामने यह सच्चाई उजागर हो चुकी थी. तथ्य यह है कि पिछले डेढ़-दो दशकों खासकर २००३ के बाद खुद गद्दाफी बहुत बदल चुके थे. पिछले साथ-आठ सालों में उनके पश्चिम विरोधी दिखावटी बडबोले बयानों को छोड़ दिया जाए तो व्यवहार में गद्दाफी ने पश्चिमी देशों के नजदीक आने की बहुत कोशिश की. इसके लिए उन्होंने न सिर्फ पश्चिमी देशों की बड़ी कंपनियों को लीबिया में निवेश और कारोबार का मौका दिया बल्कि आर्थिक सुधारों के नाम पर सरकारी कंपनियों के निजीकरण का अभियान चलाया.

हैरानी की बात नहीं है कि इस दौर में गद्दाफी की टोनी ब्लेयर, कोंडोलिजा राइस, गार्डन ब्राउन से लेकर बराक ओबामा, सिल्वियो बर्लुस्कोनी और जी-८ देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें दिखाई दीं. साफ़ था कि वे अरब जगत में पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी घुसपैठ और राष्ट्रीय संसाधनों पर कब्जे के खिलाफ आवाज़ उठानेवाले नेता के बजाय उनके साथ जोड़तोड़ और लेनदेन करनेवाले एक तानाशाह भर रह गए थे. सच पूछिए तो इस दौर में पश्चिमी देशों को भी उनसे कोई खास शिकायत नहीं रह गई थी.

आश्चर्य नहीं कि सिर्फ जनता की खपत के लिए गद्दाफी पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगानेवाले पश्चिमी देशों को इस दौर में लीबिया को हथियार बेचने में कोई हिचक नहीं हुई. उदाहरण के लिए, पिछले साल ब्रिटेन ने लीबिया को ५.५ करोड़ डालर के हथियार बेचे थे. इसी तरह, बुश प्रशासन ने २००८ में लीबिया को ४.६ करोड़ डालर के हथियारों के निर्यात की इजाजत दी थी. बदले में, गद्दाफी ने भी बहुराष्ट्रीय पश्चिमी तेल कंपनियों- शेल और एक्सान को लीबिया में तेल निकलने के आकर्षक ठेके दिए. बुश प्रशासन को खुश करने के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने का एलान कर दिया.

असल में, १९६९ में सत्ता में आने के बाद गद्दाफी के पहले पन्द्रह वर्ष एक हद तक अरब राष्ट्रवाद से प्रेरित और कुछ हद तक प्रगतिशील कार्यक्रमों को आगे बढ़ानेवाले थे. इस दौर में गद्दाफी ने पेट्रोलियम उद्योग के राष्ट्रीयकरण से होनेवाली आय की मदद से देश में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ नागरिकों के सामाजिक सुरक्षा के इंतजाम किये. इससे लीबियाई जनता के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार आया. हैरानी की बात नहीं है कि मानवीय विकास के सूचकांक में आज लीबिया न सिर्फ समूचे अफ्रीका में पहले स्थान पर है बल्कि १७२ देशों की सूची में ५५वें स्थान पर है.

लेकिन १९८८ के बाद के गद्दाफी की सारी कोशिश किसी तरह सत्ता से चिपके रहने की हो गई. इसके लिए गद्दाफी ने एक ओर कट्टर इस्लाम समर्थक और पश्चिम विरोधी रेटार्रिक का सहारा लिया और दूसरी ओर, देश के अंदर विरोध की सभी आवाजों को निर्ममता से कुचल दिया. ऐसा नहीं है कि लीबियाई जनता ने गद्दाफी को मौके नहीं दिए. लेकिन गद्दाफी ने उन सभी मौकों को गवां दिया. असल में, गद्दाफी की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल और ग़लतफ़हमी यह थी कि उन्हें लगने लगा था कि पश्चिमी देशों ने उन्हें स्वीकार कर लिया है.

लेकिन वे भूल गए कि जब तानाशाहों के दिन पूरे हो जाते हैं तो हवा का रुख देखकर पश्चिम को उन्हें कूड़े में फेंकने और नए घोड़ों पर दाँव लगाने में देर नहीं लगती है. मुबारक से लेकर गद्दाफी तक पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र की नई मिसालें हैं. भ्रम में मत रहिए, नाटो लीबिया में लोकतंत्र की स्थापना के लिए नहीं बल्कि गद्दाफी के बाद के लीबिया में अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ रहा है.

फ्रेंच फाइटर जेट लीबिया में जनता की रक्षा के लिए नहीं बल्कि विद्रोही राष्ट्रीय अंतरिम परिषद के इस प्रस्ताव के बाद उड़ान भरने के लिए तैयार हुए थे कि गद्दाफी की विदाई के बाद देश के कुल तेल उत्पादन में से ३५ फीसदी फ़्रांस को मिलेगा. कहने की जरूरत नहीं है कि लीबिया के राष्ट्रीय संसाधनों खासकर तेल की बंदरबांट की यह शुरुआत भर है.

('नया इंडिया' में २४ अक्तूबर को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित) 

रविवार, अक्टूबर 23, 2011

इतिहास के पहिये को पीछे ले जाने की कोशिश

जरूरत आर.टी.आई कानून को और मजबूत बनाने की है




सूचना के अधिकार कानून से यू.पी.ए सरकार की नाराजगी किसी से छुपी नहीं है. उसकी नाराजगी की वजह भी किसी से छुपी नहीं है. उसे लगता है कि उसकी मौजूदा राजनीतिक मुश्किलों खासकर भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों की जड़ में यह कानून भी है जिसके कारण कई ऐसे खुलासे हुए हैं जिनसे सरकार की साख को धक्का लगा है.

नतीजा, खुद प्रधानमंत्री भी इस कानून के लागू होने के बाद से पिछले छह वर्षों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा की बात कर रहे हैं. उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इसके कारण सरकार का कामकाज खासकर अंदरूनी चर्चाएँ प्रभावित हो रही हैं, नौकरशाह और मंत्री ईमानदार और बेबाक राय देने से बच रहे हैं.

ऐसी शिकायत करनेवाले वे अकेले नहीं हैं. उनसे पहले यू.पी.ए सरकार के तीन वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री- वीरप्पा मोइली, सलमान खुर्शीद और अम्बिका सोनी भी इस कानून के कारण सरकार चलाने में आ रही परेशानियों का हवाला देकर उसमें संशोधन की वकालत कर चुके हैं.

इन सभी को लगता है कि सूचना का अधिकार सरकारी कामकाज को प्रभावित कर रहा है. इसके कारण न सिर्फ निहित स्वार्थी तत्व फर्जी आर.टी.आई के जरिये अधिकारियों को परेशान कर रहे हैं, उनका सारा समय आर.टी.आई के जवाब देने में निकल जा रहा है बल्कि वे उन सूचनाओं का दुरूपयोग भी कर रहे हैं.

मजे की बात यह है कि प्रधानमंत्री और सूचना के अधिकार कानून में संशोधन की जरूरत बताने वाले सभी कैबिनेट मंत्री एक ओर इस कानून को क्रांतिकारी भी बताते हैं और दूसरी ओर, इस क्रान्ति से डरे हुए भी हैं. यही नहीं, एक ओर वे इस कानून को बनाने का श्रेय भी लेना चाहते हैं और दूसरी ओर, उसे सरकारी कामकाज में बाधा डालने के लिए दोषी भी ठहरा रहे हैं.

असल में, सूचना के अधिकार के आन्दोलनों के दबाव में और अपनी प्रगतिशील छवि बनाने के लिए यू.पी.ए सरकार ने इस कानून को पास और लागू तो कर दिया लेकिन इस कानून के साथ उसकी असहजता और असुविधा शुरू में ही दिखने लगी थी.

आश्चर्य नहीं कि कोई ढाई-तीन साल पहले भी यू.पी.ए सरकार ने इस कानून में संशोधन करने खासकर कथित फर्जी आवेदनों को ख़ारिज करने, सवालों की संख्या सीमित करने से लेकर फ़ाइल नोटिंग को इस कानून के दायरे से बाहर करने की कोशिश की थी. लेकिन उस समय इसका जबरदस्त विरोध हुआ जिसके कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा.

यही नहीं, सरकार को मानना पड़ा कि फ़ाइल नोटिंग आर.टी.आई के दायरे में है. इसके बावजूद अंदर-अंदर नौकरशाहों और मंत्रियों का विरोध बना रहा. यही कारण है कि एक ओर वे इस कानून को कामकाज में बाधा की तरह पेश करते रहे और दूसरी ओर, देश भर में आर.टी.आई को लोकप्रिय बनानेवाले और उसके जरिये सरकार और उसके विभिन्न विभागों में चल रही गडबडियों का भंडाफोड करनेवाले कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया. दर्जनों आर.टी.आई एक्टिविस्टों की हत्या कर दी गई.

विडम्बना देखिए कि जो सरकार इस कानून को बनाने का श्रेय लेने में सबसे आगे रहती है, वह आर.टी.आई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा का इंतजाम करने के बजाय इस कानून की हत्या करने पर आमादा हो गई है. यह सही है कि इस कानून के कारण हाल के महीनों में सरकार की खूब किरकिरी हुई है.

खासकर २ जी मामले में मौजूदा वित्त मंत्री के नोट के सामने आने के बाद पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम भी कटघरे में खड़े हो गए हैं बल्कि प्रणब-चिदंबरम युद्ध में पूरी सरकार की खासी फजीहत हुई है. इसके अलावा भी कई मामलों खासकर २ जी, कामनवेल्थ आदि घोटालों में आर.टी.आई के कारण ऐसी कई जानकारियां सामने आईं हैं जिससे सरकार की मुश्किलें बढ़ी हैं.

लेकिन सवाल है कि क्या अपनी कमियों और गडबडियों के लिए उसे सामने लाने वाले कानून को दोषी ठहराया जा सकता है? क्या सरकार को अपने अपराधों को छुपाने के लिए आर.टी.आई कानून को खत्म करने की इजाजत दी जा सकती है? ये सवाल आज और भी मौजूं हो उठे हैं. एक ऐसे समय में जब पूरे देश में भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ लोगों का आक्रोश सड़कों पर आ चुका है और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने की मांग जोर पकड़ रही है, उस समय इतिहास के पहिये को पीछे लौटाने की यह कोशिश यू.पी.सरकार की रही-सही साख को भी खत्म कर देगी.

मनमोहन सिंह सरकार को जनता का मूड समझना चाहिए. सच पूछिए तो इस समय जरूरत इस कानून को और मजबूत बनाने और सरकारी कामकाज में और अधिक जवाबदेही लाने के लिए उसे पूरी तरह से पारदर्शी बनाने की है. सरकारी कामकाज में सम्पूर्ण पारदर्शिता एक नियम होनी चाहिए और गोपनीयता एक अपवाद.

असल में, आर.टी.आई कानून की असली भावना यही है कि अधिक से अधिक सूचनाओं को बिना मांगे सार्वजनिक किया जाना चाहिए. उलटे हो यह रहा है कि सरकार और उसके महकमे सूचनाएं दबाने और छुपाने में लगे रहते हैं. औपनिवेशिक विरासत के बतौर सरकारी कामकाज में गोपनीयता अभी भी नियम बना हुआ है.

इसे किसी तरह से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. जरूरत तो यह है कि सरकार केन्द्रीय और राज्य स्तरीय सूचना आयोगों को और मजबूत बनाए. इस सिलसिले में मौजूदा मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानन्द मिश्र की मांग पर जरूर विचार किया जाना चाहिए कि सूचना आयोगों को संवैधानिक दर्जा दिया जाए, उन्हें स्वायत्तता दी जाए और सरकार पर उनकी निर्भरता कम की जाए.

यही नहीं, सरकार को फ़ाइल नोटिंग को आर.टी.आई के दायरे से बाहर करने की कोशिशें छोड़ देनी चाहिए क्योंकि फ़ाइल नोटिंग मांगने का अधिकार इस कानून की आत्मा है. उसके बिना यह कानून निर्जीव और बेमानी हो जाएगा.

इसके अलावा सरकार को आर.टी.आई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने के लिए व्हिसलब्लोवर विधेयक तुरंत लाना चाहिए. इससे लोगों में इस कानून के प्रति विश्वास पैदा होगा और भ्रष्ट नौकरशाहों-राजनेताओं को सन्देश जाएगा कि वे गोपनीयता की आड़ में अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते हैं.

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में २२ अक्तूबर को प्रकाशित लेख)

बुधवार, अक्टूबर 19, 2011

चैनलों की चर्चाओं में आग कम और शोर ज्यादा है

चैनलों का ‘दरिद्र’ लोकतंत्र




न्यूज चैनलों की चर्चाओं और बहसों में दिलचस्पी जगजाहिर है. आश्चर्य नहीं कि अंग्रेजी और हिंदी के अधिकांश न्यूज चैनलों पर चर्चाओं और बहसों के नियमित दैनिक कार्यक्रम हैं. इन कार्यक्रमों के महत्व को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि अधिकांश चैनलों पर रात को प्राइम टाइम पर ये चर्चाएँ और बहसें होती हैं.

एक हिंदी न्यूज चैनल को को सिर्फ बहस से संतोष नहीं हुआ तो उसने हर दिन शाम को महाबहस की शुरुआत कर दी है. लेकिन कार्यक्रम के नाम पर मत जाइए, महाबहस में भी ‘बहस’ उतनी और वैसी ही होती है जितनी किसी भी और चैनल के बहस में होती है.

कहने को इन दैनिक चर्चाओं में उस दिन के सबसे महत्वपूर्ण खबर/घटनाक्रम पर चर्चा होती है. लेकिन आमतौर पर यह चैनल की पसंद होती है कि वह किस विषय पर प्राइम टाइम चर्चा करना चाहता है. हालांकि इन चर्चाओं/बहसों में ज्यादातर मौकों पर ‘तू-तू, मैं-मैं’ या शोर-शराबा ही होता है और भले ही अक्सर उनसे कुछ खास निकलता नहीं दिखता है.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोकतंत्र में ये चर्चाएँ कई कारणों से महत्वपूर्ण होती हैं. ये चर्चाएँ न सिर्फ दर्शकों को घटनाओं/मुद्दों के बारे में जागरूक करती हैं और जनमत तैयार करती हैं बल्कि लोकतंत्र में वाद-संवाद और विचार-विमर्श के लिए मंच मुहैया कराती हैं.

लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही बड़ा सच है कि लोकतांत्रिक समाजों में मीडिया खासकर न्यूज मीडिया इन चर्चाओं और बहसों के जरिये ही कुछ घटनाओं और मुद्दों को आगे बढ़ाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय/क्षेत्रीय एजेंडे पर स्थापित करने की कोशिश करते हैं.

मीडिया का एजेंडा सेटिंग सिद्धांत यह कहता है कि समाचार मीडिया कुछ घटनाओं/मुद्दों को अधिक और कुछ को कम कवरेज देकर लोकतान्त्रिक समाजों में राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक बहसों/चर्चाओं का एजेंडा तय करता है. इस तरह वह देश-समाज की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक प्राथमिकताओं का भी एजेंडा तय कर देता है.

निश्चय ही, न्यूज मीडिया के इस एजेंडा सेटिंग एजेंडे को अपने देश में न्यूज चैनल कुछ हद तक अपनी कवरेज और कुछ हद तक प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं. जाहिर है कि इस कारण इन चर्चाओं का राजनीतिक महत्व बहुत बढ़ जाता है.

इन चर्चाओं का महत्व इसलिए भी और बढ़ता जा रहा है क्योंकि न्यूज मीडिया खासकर चैनलों के विस्तार और बढ़ती पहुँच के साथ राजनीति ज्यादा से ज्यादा माध्यमीकृत (मेडीएटेड) होती जा रही है. कहने की जरूरत नहीं है कि न्यूज मीडिया खासकर चैनल प्रदर्शन के एक ऐसे मंच के रूप में उभर रहे हैं जहाँ सुबह-दोपहर और खासकर शाम और रात में प्रदर्शनात्मक राजनीति को खुलकर अपना जलवा दिखाने का मौका मिलता है.

इस सच्चाई को सरकार, बड़े राजनीतिक दल और कारपोरेट समूह अच्छी तरह समझते हैं. यही कारण है कि वे न सिर्फ इन चर्चाओं को गंभीरता से लेते हैं बल्कि इन चर्चाओं को अपने अनुकूल मोड़ने और प्रतिकूल परिस्थितियों की भी अपने मुताबिक व्याख्या करने के लिए तेजतर्रार प्रवक्ताओं को उतारते हैं जिनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे सरकार/पार्टी/कारपोरेट समूह के पक्ष में जनमत बनाने के लिए तथ्यों/तर्कों/विचारों की ‘स्पिन’ कराने में माहिर होते हैं.

पी.आर के विशेषज्ञ इन प्रवक्ताओं को उनकी इस खूबी के कारण स्पिन डाक्टर भी कहा जाता है. आजकल राजनीति, सरकार और कारपोरेट जगत में ऐसे स्पिन डाक्टर्स की खूब मांग है.

तथ्य यह है कि न्यूज चैनलों के कारण सरकार/ विभिन्न राजनीतिक दलों/कारपोरेट समूहों में ऐसे माहिर, घाघ, बातों के जादूगर स्पिन डाक्टर्स की एक ऐसी जमात पैदा हो गई है जिनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे चैनलों की चर्चाओं में चर्चा को घुमाने के उस्ताद हैं.

खासकर राजनीतिक दलों में ऐसे बहुतेरे नेता पैदा हो गए हैं जिनकी अपनी कोई राजनीतिक जमीन नहीं है या जिन्होंने जमीन पर कोई राजनीति नहीं की है लेकिन दैनिक प्रेस ब्रीफिंग और टी.वी चर्चाओं/बहसों में हिस्सा लेकर अपनी-अपनी पार्टियों में बड़े नेता बन गए हैं.

लेकिन ऐसा लगता है कि खुद चैनल अपनी बहसों/चर्चाओं के कार्यक्रमों को बहुत महत्व नहीं देते हैं, सिवाय इस बात के कि ये कार्यक्रम चैनल के सबसे कम खर्च में तैयार होनेवाले कार्यक्रम होते हैं और उसका अच्छा-ख़ासा एयर टाइम भर देते हैं. एक तो अधिकांश चैनलों में इन बहसों/चर्चाओं के एंकर तैयारी करके नहीं आते हैं.

सवालों और टिप्पणियों में समझ तो दूर की बात है कि सामान्य जानकारी का भी अभाव दिखाई देता है. अक्सर सवाल अटपटे और चलताऊ किस्म के होते हैं. लगता है कि जैसे किसी तरह से टाइम पास किया जा रहा है. यही नहीं, इन चर्चाओं/बहसों में अतिथि भी जाने-पहचाने और उनके उत्तर/टिप्पणियां भी पूर्व निश्चित होते हैं.

इन कारणों से ये चर्चाएँ धीरे-धीरे एक दैनिक रुटीन में बदल गई हैं. इनसे इनमें बोरियत भी बढ़ती जा रही है. हालांकि कई बार इन चर्चाओं की बोरियत को खत्म करने के लिए सुनियोजित तरीके से गर्मी पैदा करने की भी कोशिश होती है लेकिन वह गर्मी वैचारिक रूप से बिना किसी उत्तेजक अंतर्वस्तु के वास्तव में, एक पूर्वनिश्चित नाटक में बदल जाती है.

इसकी वजह यह है कि इन चर्चाओं/बहसों का वैचारिक दायरा इतना सीमित और संकीर्ण होता है कि उसमें देश में सक्रिय राजनीतिक-वैचारिक धाराओं की विविधता और बहुलता नहीं दिखाई पड़ती है. यही नहीं, बिना किसी अपवाद के इन चर्चाओं के पैनलों में दक्षिण, मध्य-दक्षिण और अनुदारवादियों का दबदबा होता है.

आश्चर्य नहीं कि महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चाओं में कांग्रेस और भाजपा और बहुत हुआ तो कभी-कभार सरकारी लेफ्ट को पैनल में बुला लिया जाता है. आतंकवाद और सुरक्षा मामलों पर होनेवाली चर्चाओं में आक्रामक सैन्य जनरलों की तूती बोलती है.

इसी तरह, आर्थिक मुद्दों पर चर्चा में नव उदारवादी विशेषज्ञों की भरमार होती है. इससे काफी हद तक चैनलों के राजनीतिक-वैचारिक झुकाव का पता चलता है. लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि चैनलों का लोकतंत्र कितना सीमित, संकीर्ण और दरिद्र है.

('तहलका' के ३१ अक्तूबर के अंक में प्रकाशित)

सोमवार, अक्टूबर 17, 2011

क्यों नाराज़ है सरकार सूचना के अधिकार से?


फ़ाइल नोटिंग के बिना सूचना का अधिकार बेमानी है  



कहते हैं कि क्रांतियां अपने संतानों को खा जाती हैं. ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. कम से कम सरकार खुद ऐसा ही सोचती है. आश्चर्य नहीं कि कल तक सूचना के अधिकार के कानून को क्रांति बतानेवाली मनमोहन सिंह सरकार खुद इस कानून से डरने लगी है.

उसे लगता है कि उसकी मौजूदा राजनीतिक मुश्किलों खासकर भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के खुलासे के लिए काफी हद तक यह कानून जिम्मेदार है. इस कानून के कारण भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में ऐसी कई सूचनाएं आईं हैं जिनके कारण सरकार डावांडोल होती दिखाई दे रही है.

उदाहरण के लिए, कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना के अधिकार कानून के जरिये हासिल किये गए वित्त मंत्रालय के नोट को लीजिए. इसके कारण न सिर्फ वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और गृह मंत्री पी. चिदंबरम के बीच जारी शीत युद्ध खुलकर सामने आ गया बल्कि २ जी घोटाले को रोकने में तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम की विफलता भी सवालों के घेरे में आ गई.

इससे पहले २ जी घोटाले में प्रधानमंत्री और तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा के पत्राचार से लेकर और कई महत्वपूर्ण जानकारियां सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके ही हासिल की गईं. इसके अलावा कामनवेल्थ घोटाले से लेकर आदर्श हाउसिंग घोटाले तक में सरकार की किरकिरी करानेवाली कई जानकारियां इस कानून के जरिये ही सामने आईं.

इस कारण यू.पी.ए सरकार और खासकर कांग्रेस को यह लगने लगा है कि सूचना के अधिकार कानून की ‘क्रांति’ अपनी ही संतान यानि मनमोहन सिंह सरकार को खाने पर उतारू हो गई है. इसलिए सरकार की इस कानून को लेकर नाराजगी और असहजता बढ़ती जा रही है.

यही वजह है कि पिछले कुछ सप्ताहों में केन्द्र सरकार के तीन महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्रियों – वीरप्पा मोइली, सलमान खुर्शीद और अम्बिका सोनी ने सूचना के अधिकार कानून के कारण सरकार चलाने में आ रही परेशानियों का जिक्र करते हुए इस कानून में संशोधन की जरूरत बताई है. अब खुद प्रधानमंत्री मैदान में उतर आए हैं. उन्होंने पिछले कुछ वर्षों के अनुभव के आलोक में इस कानून की आलोचनात्मक समीक्षा की वकालत की है.

आखिर प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट मंत्रियों को यह जरूरत क्यों महसूस हो रही है? उन्हें इस कानून से क्या शिकायतें हैं? सूचना के अधिकार पर केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा पिछले शुक्रवार को आयोजित सम्मेलन में मुख्य रूप से प्रधानमंत्री की दो शिकायतें सामने आईं.

पहली, इस कानून का फायदा उठाकर बहुतेरे फर्जी और सतही आवेदन डाले जा रहे हैं जिनका जवाब देने में सरकारी महकमों और अधिकारियों की बहुत सारी उर्जा और समय जाया हो रहा है. इससे सरकार का कामकाज प्रभावित हो रहा है. दूसरे, इस कानून के कारण सरकार के अंदर खुली और बेबाक चर्चा और विचार-विमर्श पर भी असर पड़ रहा है. अधिकारी और मंत्री अपनी स्पष्ट और ईमानदार राय देने से बच रहे हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री का इशारा फ़ाइल नोटिंग की ओर है जिसे सूचना के अधिकार के तहत माँगा जा सकता है. असल में, सरकार में सभी महत्वपूर्ण फैसले और नीतिगत निर्णय फाइलों पर लिए जाते हैं जिसमें विभिन्न विभागों के निचले अधिकारी से लेकर सर्वोच्च अधिकारियों और मंत्रियों की नोटिंग या टिप्पणियां होती हैं.

इन टिप्पणियों में उन आधारों/कारणों/नियमों/पूर्व निर्णयों का हवाला होता है जिसके आधार पर सक्षम अधिकारी अंतिम फैसला लेता है. इसी तरह, किसी फैसले पर पहुँचने से पहले बैठकों में हुई चर्चा भी मीटिंग के मिनट्स दर्ज की जाती है.

हालांकि नौकरशाही शुरू से इसकी विरोधी रही है और यू.पी.ए सरकार ने कोई ढाई साल पहले फ़ाइल नोटिंग को आर.टी.आई के दायरे से बाहर रखने के लिए कानून में संशोधन तक की कोशिश की. लेकिन भारी विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा और काफी हीला-हवाली और ना-नुकुर के बाद आखिरकार सरकार को मानना पड़ा कि सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदकों के मांगने पर सरकारी विभाग और मंत्रालय फ़ाइल नोटिंग्स/मिनट्स उपलब्ध कराएँगे.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आर.टी.आई में इस प्रावधान के कारण सरकार के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है. नौकरशाहों और मंत्रियों को नोटिंग करते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है.

निश्चय ही, इसके कारण फैसलों और नीतिगत निर्णयों में अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और तोड़-मरोड़ की गुंजाइश कम हुई है. याद रहे कि भ्रष्टाचार और अनियमितताएं हमेशा गोपनीयता के अंधेरों में फलती-फूलती हैं. यही नहीं, प्रधानमंत्री की चिंता के विपरीत इससे ईमानदार नौकरशाहों और मंत्रियों के लिए निर्भीक होकर काम करना और अपनी स्पष्ट और बेबाक राय देना ज्यादा आसान हुआ है.

इस प्रावधान के कारण उनपर मनमाने फैसले लेने का दबाव कम हुआ है. सच पूछिए तो ईमानदार अफसरों और मंत्रियों के लिए आर.टी.आई और खासकर उसका यह प्रावधान बहुत बड़ा संरक्षण और अनुचित दबावों के आगे खड़ा होने का आधार बना है.

इस कारण यह समझना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री समेत उनकी कैबिनेट के कई मंत्री इस प्रावधान को सरकार के कामकाज में बाधा क्यों मान रहे हैं? वे किस अनुभव के आधार पर ऐसा कह रहे हैं कि इस प्रावधान के कारण नौकरशाहों और मंत्रियों को निर्भीक, बेबाक और ईमानदार राय देने में संकोच हो रहा है?

क्या यह सच नहीं है कि हम वह राय देने में संकोच करते हैं जिसका बाद में सार्वजनिक तौर पर कानूनी और नैतिक रूप से बचाव करना मुश्किल हो? अगर हमें पता हो कि किसी बैठक में कही या फ़ाइल पर लिखी टिप्पणी कल को सार्वजनिक हो सकती है तो हम न सिर्फ जिम्मेदारी से और खूब सोच-समझकर टिप्पणी करेंगे बल्कि मनमानी और हडबडी से बचेंगे.

सच यह है कि यह प्रावधान आर.टी.आई कानून की आत्मा है क्योंकि सरकार के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं है कि सरकार का फैसला क्या है?

उससे कई गुना महत्वपूर्ण यह जानना है कि वह फैसला कैसे और किन आधारों पर हुआ और उनमें विभिन्न अधिकारियों/मंत्रियों की राय क्या थी? कहने की जरूरत नहीं है कि इस प्रावधान के बिना आर.टी.आई भी एक सजावटी कानून बनकर रह जाएगा.

लगता है कि आर.टी.आई के मामले में इतिहास को पलटने की कोशिश हो रही है. यहाँ क्रांति नहीं, संतान खुद क्रांति को खाने के लिए बेचैन दिख रही है. आर.टी.आई कानून में संशोधन की पेशकश इसी का सबूत है.

(दैनिक 'नया इंडिया' के सम्पादकीय पृष्ठ पर १७ अक्तूबर को प्रकाशित आलेख)

शुक्रवार, अक्टूबर 14, 2011

गरीबी ही नहीं, बढ़ती गैर बराबरी भी बड़ा मुद्दा है

अमीरों और गरीबों के बीच खाई तेजी से बढ़ रही है


योजना आयोग की शहरों में ३२ रूपये और गाँवों में २६ रूपये प्रतिदिन की गरीबी रेखा ने राष्ट्रीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया है. इसके खिलाफ पूरे देश में हैरानी, गुस्से और प्रतिवाद के तीखे सुर सामने आए हैं. यह स्वाभाविक भी है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसमें दोनों जून भरपेट भोजन भी संभव है?

खासकर हाल के वर्षों में जिस तरह से खाद्य वस्तुओं और जिंसों के अलावा बुनियादी जरूरत की सभी चीजों और सेवाओं की महंगाई आसमान छू रही है, उसके कारण आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है. यही कारण है है कि कई विश्लेषक इसे गरीबी नहीं, भूखमरी रेखा कह रहे हैं.

लेकिन इस हवाई गरीबी रेखा ने पूरे देश को इसलिए भी चौंकाया है क्योंकि गरीबी निरंतर असह्य होती जा रही है. इसकी वजह यह है कि देश के तेजी से बदलते आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में दिन पर दिन गरीबों का जीना मुहाल होता जा रहा है.

पिछले डेढ़-दो दशकों में देश में जिस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच की खाई तेजी से बढ़ी और चौड़ी हुई है, उसके कारण गरीबी का दंश और गहरा और तीखा हुआ है. यह किसी से छुपा नहीं है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में दिन दूनी, रात चौगुनी बढोत्तरी हो रही है, वहीँ दूसरी ओर, गरीबों की हालत बाद से बदतर होती जा रही है.

असल में, पिछले कुछ दशकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के डेढ़ दशक में देश में जिस तरह से आर्थिक गैर बराबरी और विषमता बढ़ी है, उसके कारण गरीबी अधिक चुभने लगी है. ७० और कुछ हद तक ८० के दशक शुरूआती वर्षों तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा और तीखा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है.

इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों में पारंपरिक अमीरों के अलावा नई आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर एक नया दौलतिया वर्ग पैदा हुआ है जिसकी अमीरी और उसके खुले प्रदर्शन ने गरीबों और निम्न मध्यम वर्गों में गहरी वंचना का अहसास भर दिया है.

इसकें कोई शक नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है. वह दो से तीन फीसदी के हिंदू वृद्धि दर के दौर से बाहर निकलकर सात से नौ फीसदी रफ़्तार वाले हाई-वे पर पहुँच गई है. इस तेज वृद्धि दर के साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है.

लेकिन इसके साथ ही, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यह समृद्धि कुछ ही हाथों में सिमटकर रह गई है. इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है. इसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहाँ अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीँ गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है.

सच तो यह है कि पिछले एक दशक में अमीरी अश्लीलता की हद तक और गरीबी अमानवीयता की हद तक पहुँच गई है. इसे देखने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है. आप देश के बड़े महानगरों और शहरों के शापिंग माल्स में चले जाइए. वहां देश-दुनिया के बड़े-बड़े ब्रांडों के उपभोक्ता सामानों की मौजूदगी और उनकी चमक-दमक आँखें चौंधियाने के लिए काफी हैं.

यही नहीं, आज देश में दुनिया के सबसे बड़े लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद मौजूद हैं और अच्छा कारोबार कर रहे हैं. उनके कारण आज लन्दन-पेरिस-न्यूयार्क और दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु-हैदराबाद में कोई खास फर्क नहीं रह गया है.

नतीजा, देश में अमीरों और उच्च मध्यवर्ग के उपभोग स्तर और दुनिया के अन्य मुल्कों के अमीरों के उपभोग स्तर में कोई खास फर्क नहीं रह गया है. आज देश में बड़े अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों की लाखों-करोड़ों की घड़ियाँ, कारें, ज्वेलरी, सूट, फोन सहित भांति-भांति के इलेक्ट्रानिक साजों-सामान और यहाँ तक कि खाने-पीने की चीजें भी उपलब्ध हैं.

जाहिर है कि इनके उपभोगकर्ताओं की संख्या और उनके उपभोग की भूख दोनों बढ़ी है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब अब दबे-छिपे नहीं बल्कि खुलकर और सबको दिखाकर हो रहा है. देश के एक बड़े उद्योगपति का ४५०० करोड़ रूपये का आलीशान बंगला हो या दूसरे उद्योगपति का प्राइवेट जेट या तीसरे की निजी लक्जरी नौका या चौथे की पांच करोड़ की कार.

कहने की जरूरत नहीं है कि यह सूची बहुत लंबी हो सकती है. लेकिन यहाँ इनके उल्लेख का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस देश में कोई ७८ फीसदी से अधिक लोग २० रूपये प्रतिदिन से कम पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त हों, वहां अमीरी की यह तड़क-भड़क और उसका खुला प्रदर्शन सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता नहीं तो और क्या है?

देश में बढ़ती आर्थिक गैर बराबरी और विषमता का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सबसे अमीर १० फीसदी लोग देश के कुल उपभोग व्यय का ३१ फीसदी गड़प कर जाते हैं, सबसे अमीर और उच्च मध्यवर्ग के २० फीसदी लोग कुल उपभोग व्यय के ४५ फीसदी चट कर जाते हैं जबकि सबसे गरीब १० फीसदी लोगों के हिस्से कुल उपभोग व्यय का मात्र ३.६ फीसदी हिस्सा आता है.

यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री को कुछ साल पहले उद्योगपतियों के सम्मेलन में कहना पड़ा कि इस तरह का ‘दिखावे का उपभोग’ समाज के लिए अच्छा नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए. यह और बात है कि खुद प्रधानमंत्री ने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया बल्कि उनकी सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण यह सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता सफलता का पैमाना बनती जा रही है.

यही नहीं, इस दौर में आज़ादी के आंदोलन के दौर में बने सादगी, संतोष और मितव्ययिता जैसे सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार बेमानी होते चले गए हैं. नए मूल्य यह हैं - ‘ग्रीड इज गुड’ यानी लालच अच्छी बला है, मोक्ष का रास्ता उपभोग, और अधिक उपभोग है और कर्ज लेकर घी पीएं.

आश्चर्य नहीं कि पिछले डेढ़-दो दशकों में समावेशी विकास के नारों के बीच देश में गैर बराबरी बेतहाशा बढ़ी है. तथ्य यह है कि अगर आज इस देश में नरेगा के तहत मिलनेवाली न्यूनतम मजदूरी १०० रूपये प्रतिदिन (मासिक ३००० रूपये) और कारपोरेट क्षेत्र के अधिकांश सी.इ.ओ की १० लाख से एक करोड़ रूपये मासिक की तनख्वाह को आधार मानें तो देश में आय के स्तर पर गैर बराबरी बढ़ते-बढ़ते ३००:१, ५००:१ के अनुपात और यहाँ तक कि १०००:१ के असह्य स्तर से भी ऊपर पहुँच गई है. यहाँ तक कि भारत सरकार के सबसे आला अधिकारियों यानी सचिवों की मासिक तनख्वाह और नरेगा की मासिक मजदूरी के बीच ५००:१ का अनुपात बढ़ती आर्थिक गैर बराबरी का एक और उदाहरण है.

याद रहे कि देश में योजना की शुरुआत में १०:१ के आर्थिक गैर बराबरी अनुपात को कुछ हद तक बर्दाश्त लायक माना गया था. इसी तरह, मैनजमेंट गुरु पीटर ड्रकर ने कारपोरेट क्षेत्र के लिए २०:१ का अनुपात सुझाया था लेकिन आय और उपभोग के स्तर पर मौजूदा गैर बराबरी को देखते लगता है कि यह किसी सतयुग की बात है.

यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि इस दौर में तेज आर्थिक विकास के बावजूद न सिर्फ रोजगार के अवसर नहीं बढ़े हैं बल्कि रोजगार की गुणवत्ता में भी गिरावट आई है. देश में अभी भी कुल श्रम शक्ति का ९२ फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करने और उससे गुजर चलने के लिए बाध्य है.

यही नहीं, सी.ई.ओ से लेकर सरकारी नौकरशाहों की तनख्वाहों में भारी इजाफा हुआ है लेकिन न्यूनतम मजदूरी गरीबी रेखा की तरह अतीत में अंटकी हुई है. निजी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है लेकिन उसमें रोजगार के संविदाकरण और अस्थाईकरण के अलावा श्रम कानूनों का उल्लंघन बढ़ा है.

दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र पर आबादी के साठ प्रतिशत की निर्भरता के बावजूद कुल जी.डी.पी में उसका हिस्सा घटता हुआ मात्र १४ फीसदी रह गया है. मतलब ६० फीसदी आबादी को देश की कुल आय में सिर्फ १४ फीसदी हिस्सा मिल रहा है. कहने की जरूरत नहीं है कि इस सबके कारण गैर बराबरी बढ़ती और बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है.

योजना आयोग की गरीबी (गल्प) रेखा इसलिए और चुभने और बेमानी लगने लगी है.

('राष्ट्रीय सहारा' के सम्पादकीय पृष्ठ पर १४ अक्तूबर को प्रकाशित लेख)