शनिवार, नवंबर 17, 2012

सी ए जी की रिपोर्ट दोबारा पढ़िए सिब्बल साहब!

बकौल वित्त मंत्री 2 जी घोटाला एक 'मिथ' है उर्फ़ मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं
ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार न सिर्फ गंभीर स्मृति दोष की शिकार है बल्कि वह मानती है कि आम आदमी की याददाश्त भी बहुत कमजोर है. यही कारण है कि २ जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी के ‘फेल’ हो जाने के तुरंत बाद संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने तंज और तुर्शी के साथ पूछा कि ‘कहाँ हैं कम्पट्रोलर एंड आडिटर जनरल (सी.ए.जी)?’
बताने की जरूरत नहीं है कि उसके बाद से सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुछ इसी अंदाज़ में सी.ए.जी से सवाल पूछे हैं कि कहाँ गए २ जी के १,७६००० करोड़ रूपये?
वित्त मंत्री ने २ जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी में उम्मीद से कम कमाई का हवाला देते हुए २ जी घोटाले को एक मिथ घोषित कर दिया तो कपिल सिब्बल ने मीडिया से लेकर सिविल सोसायटी सब पर हल्ला बोलते हुए कहा कि सनसनी के चक्कर में टेलीकाम की सफलता की कहानी को चौपट कर दिया गया.

ऐसा लगा जैसे यू.पी.ए सरकार २ जी नीलामी की नाकामी का ही बेसब्री इंतज़ार कर रही थी. आश्चर्य नहीं कि सरकार में इसे लेकर चिंता कम और जश्न का माहौल ज्यादा दिख रहा है. कारण साफ़ है. कांग्रेस और यू.पी.ए को सी.ए.जी के खिलाफ हमला बोलने का एक और बहाना मिल गया है.

लेकिन सी.ए.जी पर यू.पी.ए सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस नेताओं के हमले का पहला शिकार तथ्य हो रहे हैं. वे २ जी घोटाले पर सी.ए.जी की रिपोर्ट से न सिर्फ आधे-अधूरे तथ्य पेश कर रहे हैं बल्कि उन्हें मनमाने तरीके से तोड़-मरोड़ कर भी पेश कर रहे हैं. इन तथ्यों पर गौर कीजिए:
·       पहली बात यह है कि सी.ए.जी ने २ जी स्पेक्ट्रम के मनमाने तरीके से आवंटन के कारण विभिन्न स्थितियों में सरकारी खजाने को नुकसान के चार अनुमान पेश किये थे. (विस्तार से यहाँ पढ़िए : http://cag.gov.in/html/reports/civil/2010-11_19PA/chap5.pdf ) सी.ए.जी की रिपोर्ट के मुताबिक, २ जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अलग-अलग आधारों पर आकलन के अनुसार क्रमश: ६७३६४ करोड़ रूपये या ६९६२६ करोड़ रूपये या  ५७६६६ करोड़ रूपये या १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान का अनुमान लगाया था. इसलिए सी.ए.जी पर केवल १,७६,६४५ करोड़ रूपये के अनुमान को लेकर सवाल पूछने के पीछे क्या मकसद है?

·       दूसरे, सी.ए.जी ने ये सभी चार अनुमान किसी कल्पना के आधार पर नहीं बल्कि ठोस और वास्तविक आधारों पर निकाले थे. उदाहरण के लिए, सी.ए.जी ने ६७३६४ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन टेलीकाम कंपनी- एस. टेल की ओर से तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा को अखिल भारतीय लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के लिए की गई पेशकश के आधार पर किया था.

·       इसी तरह ६९६२६ करोड़ और ५७६६६ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन २ जी स्पेक्ट्रम लेने में कामयाब रही कंपनी- यूनिटेक और स्वान टेलीकाम द्वारा अपने शेयर क्रमशः यूनिनार और एतिसलात को बेचने के लिए तय किये गए मूल्य के आधार किया गया था.

·       इसी तरह १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन ३ जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के आधार किया गया था. यही नहीं, सी.ए.जी ने ये चारों आकलन पेश करते हुए किसी खास एक अनुमान को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी थी. अलबत्ता, मीडिया में स्वाभाविक तौर पर १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान की चर्चा खूब हुई थी.

·       इसलिए संचार मंत्री का पहले का ‘जीरो नुकसान’ का दावा हो या अब १,७६,६४५ करोड़ रूपये के आकलन के भ्रामक होने का दावा- यह घोटाले की लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं है. आखिर वे ‘जीरो नुकसान’ की ‘थियरी’ को छोड़कर बताएँगे कि इस तरह के मामलों में नुकसान के आकलन का सही तरीका क्या है? सी.ए.जी ने कहाँ और कैसे गलत आकलन किया?

यही नहीं, वित्त मंत्री का यह दावा भी तथ्यों और सच्चाई के आगे कहीं नहीं ठहरता है कि २ जी घोटाला एक मिथ है. अच्छा होता कि खुद वित्त मंत्री एक बार फिर से सी ए जी की रिपोर्ट खासकर उसका निष्कर्ष पढ़ लेते तो उन्हें पता चल जाता कि यह क्यों मिथ नहीं बल्कि भारी घोटाला है. उनका सुविधा के लिए उस रिपोर्ट के निष्कर्ष के तीन पृष्ठ का लिंक यह रहा: http://cag.gov.in/html/reports/civil/2010-11_19PA/chap6.pdf    

वैसे तुलसीदास कह गए हैं, ‘मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं !’ वित्त मंत्री जी, अगर २ जी घोटाला नहीं तो क्या था कि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा जेल चले गए? वे ही क्यों, संसद कनिमोजी से लेकर कारपोरेट समूहों के मालिक, अफसर और सरकारी अफसर जेल क्यों गए? क्या सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गलत फैसला किया? क्या सी.बी.आई की चार्जशीट गलत है?

ऐसे एक नहीं दर्जनों सवाल और तथ्य हैं जो साबित करते हैं कि २ जी के आवंटन की न सिर्फ नीति गलत थी बल्कि उसमें खूब मनमानी और धांधली हुई. सच पूछिए तो इस मामले को यू.पी.ए सरकार जितना ही दबाने, तोड़ने-मरोड़ने और छुपाने की कोशिश कर रही है, वह उतनी ही बेपर्दा होती जा रही है.         

1 टिप्पणी:

अमित भारतीय ने कहा…

सरकार न सिर्फ नीलामी की नकामी की प्रतीक्षा कर रही थी बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि सरकार और कारपोरेट समूह अपना बदरंग चेहरा छिपाने के लिए मिलकर ऐसा खेल खेल रहे होँ