शनिवार, अक्टूबर 13, 2012

महंगा पड़ सकता है खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का सौदा

वालमार्ट का विरोध तो खुद अमेरिका में भी बढ़ रहा है


खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के फैसले के पैरोकारों का दावा है कि दुनिया के अधिकांश देशों में खुदरा व्यापार में न सिर्फ बड़ी घरेलू संगठित कंपनियां काम कर रही हैं बल्कि विदेशी पूंजी यानी बड़ी विदेशी कंपनियों को भी इजाजत दी गई है. उनका यह भी दावा है कि इसका उन देशों के किसानों, उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था सभी को लाभ हुआ है.
यही नहीं, उनमें से अधिकांश देशों में बड़ी देशी-विदेशी खुदरा व्यापार कंपनियों के साथ न सिर्फ छोटे किराना व्यापारियों का कारोबार भी मजे में चल रहा है बल्कि उनका व्यापार फला-फूला है. तात्पर्य यह कि दुनिया के अधिकांश देशों के अनुभव के मद्देनजर खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी आने से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि इससे नुकसान नहीं के बराबर या बहुत कम है, उल्टे फायदा अधिक है.
लेकिन यह पूरा सच नहीं है. अगर खुदरा व्यापार में बड़ी संगठित कंपनियों की मौजूदगी से फायदा ही फायदा होता तो खुद अमेरिका के न्यूयार्क जैसे शहर में वालमार्ट को स्टोर खोलने से मना नहीं किया जाता. इससे पहले कैलिफोर्निया और शिकागो की नगर परिषदों ने भी बड़ी खुदरा कंपनियों को स्टोर्स खोलने के फैसले पर रोक लगाने का फैसला किया था.

यही नहीं, अमेरिका में वालमार्ट के तौर-तरीकों खासकर श्रमिक विरोधी और पर्यावरण विरोधी रवैये की आलोचना और विरोध नई बात नहीं है. इसके अलावा दुनिया के और भी देशों में खुदरा व्यापार में बड़ी कंपनियों खासकर विदेशी पूंजी को इजाजत देने का मुद्दा विवादों में रहा है क्योंकि उसके फायदों की तुलना में नकारात्मक प्रभावों की चिंता ज्यादा दिखाई देती रही है.

आश्चर्य नहीं कि कई देशों ने खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति नहीं दी है या कई प्रतिबंधों के साथ सीमित इजाजत दी है. दूसरी बात यह है कि हरेक देश के अर्थतंत्र की अपनी विशेषताएं हैं, अपनी घरेलू परिस्थितियां हैं जिसमें खुदरा व्यापार की खास जगह है.
भारत में खुदरा व्यापार इसलिए एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है क्योंकि कृषि के बाद सबसे अधिक लोगों को रोजगार इसी क्षेत्र में मिला हुआ है और कोई २० करोड़ लोगों की आजीविका इसपर निर्भर है. प्रति एक लाख की आबादी पर खुदरा दूकानों के घनत्व के मामले भारत दुनिया में पहले स्थान पर है. इस कारण उसकी दुनिया के अन्य देशों से तुलना करते हुए भी एक सावधानी जरूरी है.
तथ्य यह है कि दुनिया के विभिन्न देशों में संगठित खुदरा व्यापार कंपनियों खासकर विदेशी पूंजी और बड़ी विदेशी कंपनियों को प्रोत्साहित करने के नतीजे मिले-जुले हैं. कुछ देशों में संगठित खुदरा कंपनियों के विस्तार के बावजूद छोटे किराना दुकानदार भी बचे हुए हैं और कई देशों में बड़ी खुदरा कंपनियों की मौजूदगी के कारण छोटे किराना दुकानदारों को टिके रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और कई देशों में संगठित कंपनियों और उनके बड़े स्टोर्स से मुकाबले में छोटे किराना दुकानदार तेजी से उजड़े हैं. कई देशों में ये बड़ी कम्पनियाँ खुद नाकाम साबित हुई हैं.

अगर दुनिया के विकसित देशों के उदाहरण पर गौर करें जहाँ खुदरा व्यापार में बड़ी संगठित कम्पनियाँ और बड़े स्टोर्स बहुत पहले से हैं तो इस तथ्य को अनदेखा कर पाना मुश्किल है कि इन देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप आदि में ७० से ८५ फीसदी खुदरा व्यापार पर बड़ी संगठित कंपनियों का कब्ज़ा है.
दूसरी ओर, विकासशील देशों के खुदरा व्यापार में बड़ी कंपनियों का हिस्सा अभी भी ५० फीसदी से कम है. जैसे ब्राजील और थाईलैंड में ४० फीसदी, कोरिया में ३५ फीसदी, चीन और मलेशिया में २० फीसदी के आसपास है. इनकी तुलना में भारत के खुदरा व्यापार में संगठित कंपनियों का हिस्सा मात्र ४ से ५ फीसदी के बीच है.
लेकिन सी.आई.आई-बोस्टन कंसल्टिंग समूह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २०२० तक भारत में कुल खुदरा व्यापार लगभग १.२५ खरब डालर का हो जाएगा और उसमें बड़ी कंपनियों यानी संगठित क्षेत्र का हिस्सा लगभग २६० अरब डालर का होगा यानी वे २० फीसदी बाजार पर कब्ज़ा कर लेंगी.
सवाल यह है कि क्या बड़ी कंपनियों के इस विस्तार और बाजार के पांचवें हिस्से पर कब्जे के कारण छोटे किराना दुकानदारों का एक हिस्सा विस्थापित नहीं होगा? इस प्रश्न के उत्तर में खुद प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन ने माना है कि संगठित खुदरा कंपनियों के विस्तार से खुदरा व्यापारियों का एक हिस्सा विस्थापित होगा.

दुनिया के कई देशों के उदाहरणों से भी इसकी पुष्टि होती है. ब्रिटेन में १९८१ से ९९ के बीच छोटे किराना दुकानों की संख्या ५६८६२ से घटकर २५८०० रह गई. पश्चिमी यूरोप में ७० से ८० के दशक में कोई चार लाख छोटे दुकानदारों को अपना धंधा बंद करना पड़ा. इसी तरह अर्जेंटीना में १९८३ से ९३ के बीच कोई ३० फीसदी यानी लगभग ६४१९८ छोटी किराना दुकानें बंद हो गईं और खुदरा व्यापार में रोजगार में २६ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

उधर, इंडोनेशिया ने २००२-०३ में सिर्फ एक साल में ९ फीसदी छोटी किराना दुकानें बंद हो गईं जबकि चिली में १९९१ से ९५ के बीच खाने-पीने की छोटी दुकानों की संख्या में कोई २० फीसदी की कमी दर्ज की गई.
यहाँ चीन की चर्चा भी जरूरी है क्योंकि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के पैरोकार उसका उदाहरण भी बहुत देते हैं लेकिन वे भूल जाते हैं कि चीन और भारत में आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां बिलकुल अलग हैं. वहां १९५९ से लेकर ८० के दशक के आखिर तक निजी खुदरा व्यापार प्रतिबंधित था और ९० के दशक शुरुआत में वहां विदेशी पूंजी को कई शर्तों के साथ इजाजत दी गई तो उस समय उसके खुदरा बाजार के ४१ फीसदी हिस्से पर बड़ी सरकारी कंपनियों, २७ फीसदी पर सहकारी समितियों और कोई २० फीसदी पर निजी और छोटे खुदरा व्यापारियों का कब्ज़ा था.
इससे साफ़ है कि चीन और भारत के खुदरा व्यापार के स्वरुप में बुनियादी अंतर है और वहां इतने लोगों की रोजी-रोटी दांव पर नहीं लगी है. इसके बावजूद सच्चाई यह है कि हाल के वर्षों में वहां भी बड़ी विदेशी खुदरा कंपनियों के तौर-तरीकों के खिलाफ लोगों की नाराजगी बढ़ी है. इसके अलावा इन दावों में भी बहुत दम नहीं है कि विदेशी खुदरा कंपनियों के आने से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा.

दुनिया के अनेक देशों के उदाहरणों से स्पष्ट है कि इन दावों और वास्तविक तथ्यों के बीच खासा फासला है. अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक, थाईलैंड में यह पाया गया कि वहाँ रेहडी-पटरीवालों की तुलना में बड़े सुपर स्टोर्स में कीमतें १० फीसदी अधिक थीं. इसी तरह के उदाहरण अर्जेंटीना, वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों में भी दिखाई पड़े.

यही हाल किसानों को लाभ पहुंचाने के दावों का है. इससे बड़ा मजाक कुछ नहीं हो सकता है कि बड़ी विदेशी खुदरा कम्पनियाँ के आने से किसानों को ऊँची कीमत से लेकर कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएँ मिलेंगी. अगर ऐसा होता तो दुनिया के सबसे अमीर देशों में जहाँ ८० फीसदी से ज्यादा खुदरा व्यापार पर बड़ी कंपनियों का कब्ज़ा है, वहाँ की सरकारों को अपने किसानों को भारी सब्सिडी नहीं देनी पड़ती.
यह किससे छुपा है कि अमेरिका से लेकर यूरोप तक के किसानों को वहां की सरकारें अरबों डालर की सालाना सब्सिडी देती है. अलबत्ता इस सब्सिडी पर वहाँ की बड़ी खुदरा कंपनियों से लेकर खाद्य कारोबार में लगी कंपनियों का कारोबार चल रहा है.
यह ठीक है कि शुरू में ये कम्पनियाँ बाजार पर कब्ज़ा करने के लिए किसानों को अच्छी कीमत और उपभोक्ताओं को सस्ता सामान बेचें लेकिन असल चिंता यह है कि अगले १० सालों में जब वे छोटे किराना दुकानदारों को मुकाबले से बाहर कर देंगे, उसके बाद क्या होगा?

दुनिया के तमाम देशों यहाँ तक कि अमेरिका के उदाहरणों से साफ़ है कि उस समय ये कम्पनियाँ न किसानों और दूसरे आपूर्तिकर्ताओं को अच्छी कीमत देती हैं और न ही उपभोक्ताओं को सस्ता माल बेचती हैं. यही नहीं, खुदरा बाज़ार पर उनके वर्चस्व की कीमत उन लाखों छोटे दूकानदारों को अपनी आजीविका गँवा कर चुकानी पड़ती है.

सवाल यह है कि क्या देश इस महंगे सौदे के लिए तैयार है?

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप परिशिष्ट में 13 अक्तूबर को प्रकाशित टिप्पणी)                           

शनिवार, अक्टूबर 06, 2012

नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत : दूसरी किस्त

आर्थिक सुधारों ने भारत को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया है

इस मायने में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों ने भारत को सचमुच दो हिस्सों – इंडिया और भारत में बाँट दिया है. आर्थिक सुधारों का असली फायदा इंडिया और उसके मुट्ठी भर अमीरों, उच्च और मध्य वर्ग को मिला है जबकि इस ‘इंडिया’ के बेलगाम उपभोग की असली कीमत ८० फीसदी भारतीयों और देश के जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को चुकानी पड़ रही है.
यह किसी से छुपा नहीं है कि इन दो दशकों में जब देश “तेजी से तरक्की कर रहा था”, वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ के मुताबिक, सोलह वर्षों (१९९५-२०१०) में कोई २.५ लाख से ज्यादा किसान बढ़ते कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हुए. खासकर २००२ से २००६ के बीच औसतन हर साल १७५०० किसानों ने आत्महत्या की है.
इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है. आर्थिक सुधार के इन वर्षों में कृषि को उसके हाल पर छोड़ दिया गया. किसानों को न सिर्फ खाद, बिजली और बीज आदि की बढ़ी कीमतें चुकानी पड़ी, उन्हें उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिला बल्कि उन्हें डब्ल्यू.टी.ओ के बाद बाजार में सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों से मुकाबला करना पड़ा.

इसका सबसे बुरा प्रभाव नगदी फसलों के किसानों पर पड़ा है. यही नहीं, आर्थिक सुधारों के तहत सब्सिडी कटौती के कारण कृषि में सरकारी निवेश घटा और उसके कारण कृषि की उत्पादकता वृद्धि में भी गिरावट आ रही है. आश्चर्य नहीं कि जिन वर्षों में जी.डी.पी की वृद्धि दर औसतन ८ फीसदी के आसपास थी, उन वर्षों में भी कृषि की वृद्धि दर औसतन मात्र २ फीसदी के आसपास थी.

नतीजा यह कि जी.डी.पी में कृषि का योगदान घटते-घटते १४.८ फीसदी से भी कम रह गया है जबकि कृषि पर अब भी देश की ५४ फीसदी आबादी निर्भर है. इसका अर्थ यह हुआ कि देश में जी.डी.पी के रूप में पैदा होनेवाली कुल समृद्धि में सिर्फ १४.८ फीसदी हिस्सा ही कृषि क्षेत्र में आता है लेकिन उसपर देश की कुल ५४ फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका निर्भर है.
इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी बद से बदतर होती जा रही है. उसपर एक तो करेला, उसपर नीम चढ़े की तरह पिछले कुछ वर्षों में किसानों से विकास के नामपर उद्योग, सेज, हाईवे, बिजलीघर, रीयल इस्टेट आदि बनाने के लिए ८० लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन जबरदस्ती ली गई है. योजना आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि यह कोलंबस के बाद दुनिया में जमीन की सबसे बड़ी लूट है.
लेकिन यह लूट सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. सच यह है कि आर्थिक सुधारों के नामपर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की आड़ में खुले बाजार को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें ‘जल-जंगल-जमीन से लेकर प्राकृतिक संसाधनों’ की कारपोरेट लूट ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं.

असल में, देश में डालर अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या यूँ ही नहीं बढ़ रही है. यह कोई जादू नहीं है. यह वास्तव में आर्थिक सुधारों से ज्यादा आर्थिक सुधारों के नामपर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को दी जा रही रियायतें, छूट और सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम हस्तान्तरण के कारण संभव हुआ है. अकेले २-जी और कोयला आवंटन में कोई ३.६२ लाख करोड़ रूपयों से अधिक की सार्वजनिक संपत्ति बड़ी कंपनियों और नेताओं के रिश्तेदारों/करीबियों को बाँट दी गई.

हैरानी की बात नहीं है कि आर्थिक सुधारों के नामपर यह कहते हुए कि पैसे पेड पर नहीं उगते, सब्सिडी कटौती का सारा बोझ आम आदमी और गरीबों पर डाला जा रहा है, उस समय देश के कार्पोरेट्स, बड़े निवेशकों, अमीरों, उच्च मध्य और मध्य वर्ग को टैक्स छूटों, रियायतों और कटौतियों के जरिये सालाना कोई ५.१५ लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी दी जा रही है. तर्क यह दिया जाता है कि यह देश के ‘तेज विकास’ के लिए जरूरी है.
लेकिन इस ‘तेज विकास’ का हाल यह है कि यह ‘रोजगारविहीन विकास’ (जाब्लेस ग्रोथ) है. खुद सरकारी रिपोर्टें कह रही है हैं कि देश में तेज जी.डी.पी वृद्धि दर के बावजूद रोजगार वृद्धि की दर बहुत मामूली या नगण्य है. संगठित क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है. नए रोजगार के अवसर असंगठित क्षेत्र में पैदा हुए हैं जहाँ वेतन-सेवाशर्तों आदि के मामले में श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही है. ठेका और अस्थाई श्रमिकों की तादाद बढ़ी है और उन्हें जिन बदतर स्थितियों में काम करना पड़ता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
सच पूछिए तो आज नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत खुल चुकी है. खासकर देश के करोड़ों गरीबों, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों और अल्पसंख्यकों ने अपने कड़वे अनुभवों से जान लिया है कि आर्थिक सुधारों की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है लेकिन इसकी मलाई मुट्ठी भर अमीर-अभिजात्य लोग उड़ा रहे हैं.

यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के हर कोने में किसान, आदिवासी, दलित और गरीब ‘जल-जंगल-जमीन और खनिजों’ की लूट के खिलाफ डटकर खड़ा हो गया है. किसान और आदिवासी किसी भी नए प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने को तैयार नहीं हैं और वे लड़ने और मरने-मारने पर उतारू हैं. श्रमिकों की बेचैनी फूटने लगी है. मारुति में श्रमिकों का आंदोलन अपवाद नहीं है.

और तो और आर्थिक सुधारों का मुखर समर्थक रहा मध्य और निम्न मध्य वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अब इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करने लगा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन इस प्रवृत्ति की एक मिसाल है.
यही नहीं, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर जिस तरह से मध्यवर्गीय व्यापारियों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है, उससे साफ़ हो गया है कि देश में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थकों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है. इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने दावे करें लेकिन सच्चाई पर पर्दा डालना अब संभव नहीं रह गया है.

('शुक्रवार' के 5 अक्तूबर के अंक में प्रकाशित लेख)

शुक्रवार, अक्टूबर 05, 2012

नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत

लोहे का स्वाद, लोहार से नहीं, घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है


खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) और डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी का विरोध कर रही विपक्षी राजनीतिक पार्टियां खासकर भाजपा इस सच्चाई को छुपाने की कोशिश कर रही है कि यू.पी.ए सरकार के ये फैसले उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और आर्थिक सुधारों के अगले चरण के रूप में आए हैं जिन्हें भाजपा समेत विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां और उनकी केन्द्र या राज्य की सरकारें आँख मूंदकर लागू करती रही हैं.
आश्चर्य नहीं कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इन फैसलों के बचाव में १९९१ में शुरू हुए आर्थिक सुधारों का हवाला दे रहे हैं और चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि उस समय भी इन सुधारों का विरोध किया गया था, लोगों को डराने की कोशिश की गई थी लेकिन देश जानता है कि इन सुधारों के कारण देश की भारी तरक्की हुई, समृद्धि आई और आम आदमी का जीवन बेहतर हुआ है.
भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियां इस चुनौती का जवाब देने से बच रही हैं और वह पिछले दो दशकों से जारी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और उनके तहत उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों के नतीजों पर चर्चा से कन्नी काटने की कोशिश कर रही हैं. उनकी परेशानी समझी जा सकती है.

आखिर वे भी न सिर्फ इन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और सुधारों के खुले समर्थक हैं बल्कि उसके कारण देश में आई कथित “तरक्की, समृद्धि और आम आदमी के जीवन की बेहतरी” के दावों के भोंपू बने हुए हैं. इसलिए उनसे यह उम्मीद करना बेकार है कि वे इन दावों पर सवाल उठाएंगे.

लेकिन खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के सन्दर्भ में शुरू हुई बहस के कारण यह सवाल बहुत मौजूं हो गया है कि इन दावों में कितनी सच्चाई है कि १९९१ में शुरू हुए नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के कारण देश की भारी तरक्की हुई है, समृद्धि आई है और आम आदमी का जीवन बेहतर हुआ है?
इससे पहले कि इन दावों को एक सर्वमान्य सत्य मान लिया जाए, इनकी पड़ताल जरूरी हो गई है क्योंकि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और उनके तहत लिए गए ताजा फैसलों को देश की हर समस्या के रामबाण इलाज की तरह पेश किया जा रहा है और इसके लिए पिछले दो दशकों में इन नीतियों और सुधारों के कारण हुए “आर्थिक चमत्कार” को सबूत की तरह पेश किया जा रहा है.
यह सही है कि इन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के कारण पिछले दो दशकों में आर्थिक विकास यानी जी.डी.पी की वृद्धि दर में तेजी आई है और वह औसतन ७ से ८ फीसदी के बीच रही है. यह भी सही है कि इसके साथ भारी आर्थिक समृद्धि आई है. लेकिन इनसे ज्यादा बड़ा सच यह है कि इस आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों, बड़े निवेशकों, टाप मैनेजरों, अमीरों, शहरी मध्य और उच्च मध्यवर्ग और ग्रामीण कुलकों के अलावा नेताओं-अफसरों-दलालों-माफियाओं-ठेकेदारों की जेब में गया है.

हालाँकि इनकी संख्या देश की कुल आबादी के ३ से ५ फीसदी भी नहीं होगी लेकिन उनके घरों, रहन-सहन और जीवनशैली में जो समृद्धि और तड़क-भड़क आई है, वह अभूतपूर्व है. उनमें और दुनिया के सबसे विकसित देशों के अमीरों की जीवनशैली और उपभोग में कोई खास फर्क नहीं है.

लेकिन दूसरी ओर देश की बड़ी आबादी खासकर छोटे-मंझोले और भूमिहीन किसानों असंगठित श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों, अल्पसंख्यकों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है बल्कि उल्टे उनकी स्थिति बद से बदतर हुई है.
इसके कारण अमीर और गरीब के बीच की खाई और तेजी से बढ़ी है और आर्थिक-सामाजिक गैर बराबरी कई गुना बढ़ गई है. सरकारी संगठन- एन.एस.एस.ओ के ६६ वें दौर (२००९-१०) के सर्वेक्षण के मुताबिक, अकेले यू.पी.ए- एक के कार्यकाल (२००४-२००९) में शहरी और ग्रामीण परिवारों के उपभोग व्यय में अंतर ९१ फीसदी तक पहुँच गया है.
उल्लेखनीय है कि इन वर्षों में जी.डी.पी की औसत वृद्धि दर ८.६४ प्रतिशत रही जोकि एक रिकार्ड है. यही नहीं, यू.पी.ए सरकार ने मनरेगा जैसी योजनाएं भी शुरू कीं, इसके बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है. यही नहीं, एन.एस.एस.ओ के ताजा सर्वेक्षण (२०११-१२) के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में आय के मामले में उपरी १० फीसदी और निचली १० फीसदी आबादी के बीच की कमाई में वृद्धि का अनुपात बढ़कर ६.९ हो गया है जबकि शहरों में इस अंतर का अनुपात बढ़कर १० से अधिक हो गया है.

इस बढ़ती गैर बराबरी का अंदाज़ा यू.पी.ए सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट से भी होता है जिसके अनुसार, देश में ७८ फीसदी आबादी २० रूपये से कम के उपभोग पर गुजारे के लिए मजबूर है.

यही नहीं, पिछले साल अक्टूबर में जब योजना आयोग ने ग्रामीण इलाके में २६ रूपये और शहरी इलाके में ३२ रूपये प्रतिदिन से अधिक खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया था तो देश में भारी हंगामा मचा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस साल दाखिल संशोधित हलफनामे में योजना आयोग ने इसे और घटाकर ग्रामीण इलाके में २२.४२ रूपये और शहरी इलाके में २८.३५ रूपये प्रतिदिन से अधिक खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया है.
कहने की जरूरत नहीं है कि यह गरीबी रेखा नहीं बल्कि भूखमरी रेखा है. साफ़ है कि आंकड़ों में गरीबी घटाई जा रही है लेकिन सच्चाई यह है कि इन दो दशकों में आर्थिक सुधारों और तेज आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद देश में गरीबों की वास्तविक संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है.   
दूसरी ओर, देश में आबादी एक छोटे से हिस्से के पास आई समृद्धि ने भी सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. ‘फ़ोर्ब्स’ पत्रिका के मुताबिक, देश में डालर अरबपतियों की संख्या ५५ तक पहुँच चुकी है. डालर अरबपतियों की कुल संख्या के मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों में अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे स्थान पर है.

यही नहीं, केपजेमिनी और रायल बैंक आफ कनाडा की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डालर लखपतियों (दस लाख डालर या ५.६ करोड़ रूपये से अधिक संपत्ति) की संख्या पिछले साल १.२५ लाख थी. हालाँकि यह संख्या वास्तविकता से काफी कम है क्योंकि यह शेयर बाजार और आधिकारिक स्रोतों पर निर्भर है लेकिन इसके बावजूद डालर लखपतियों के मामले में भारत दुनिया के टाप देशों की सूची में है.

हैरानी की बात नहीं है कि देश के एक छोटे से हिस्से के उपभोग का स्तर दुनिया के टाप अमीरों से मुकाबला कर रहा है. यही कारण है कि दुनिया भर के सभी टाप लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद देश के बड़े शहरों के शापिंग माल्स में उपलब्ध हैं. उनके लिए अब लन्दन, पेरिस या न्यूयार्क जाने की जरूरत नहीं है.
बड़े शहरों की सड़कों पर दौड़ रही नई और मंहगी कारों और एस.यू.वी को देखकर यह कहना मुश्किल है कि भारत एक विकासशील देश है जहाँ एक तिहाई आबादी को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं है. लेकिन भारतीय अरबपतियों और अमीरों का उपभोग अश्लीलता की हदें भी पार करता जा रहा है. डालर अरबपतियों में से एक मुकेश अम्बानी ने मुंबई में एक अरब डालर यानी ५४०० करोड़ रूपये का २७ मंजिला घर बनवाया है.
यही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी को २५० करोड़ रूपये का निजी हवाई जहाज उपहार में दिया जबकि छोटे भाई अनिल अम्बानी ने अपनी पत्नी टीना अम्बानी को ४०० करोड़ रूपये की लक्जरी नौका उपहार में दी है.
विजय माल्या के किस्से सबको पता हैं. जाहिर हैं कि ये अपवाद नहीं हैं. ऐसे अमीरों की संख्या बढ़ती जा रही है. लेकिन दूसरी ओर ऐसे भारतीयों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जिनकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं. एक तिहाई से अधिक भारतीय भूखमरी के शिकार हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के ४१ फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जिसका मतलब है कि वे कभी भी स्वस्थ-कामकाजी जीवन नहीं जी पायेंगे. मातृ मृत्यु और शिशु मृत्यु दर के मामले में भारत का रिकार्ड कई पडोसी देशों से भी बदतर है.

आश्चर्य नहीं कि तेज विकास दर और समृद्धि की बरसात के बावजूद भारत वर्ष २०११ में मानव विकास के मामले में संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट में दुनिया के १८७ देशों में १३४ वें स्थान पर था जबकि उसके पहले २०१० में भारत १६९ देशों की सूची में ११९ वें स्थान पर था.

जारी ....बाकी कल दूसरी किस्त में ...

('शुक्रवार' के 5 अक्तूबर के अंक में प्रकाशित लम्बे आलेख की पहली किस्त) 

गुरुवार, अक्टूबर 04, 2012

खोजी पत्रकारिता की मौत

बड़े और कार्पोरेट न्यूज मीडिया समूह घोटाले का हिस्सा बनते जा रहे हैं 

भ्रष्टाचार और घोटालों के खुदरा खुलासों के इस मौसम में सबसे ताजा खुलासा महाराष्ट्र में ७० हजार करोड़ रूपये से अधिक के सिंचाई घोटाले का है. इस घोटाले के खुलासे के बाद काफी ना-नुकुर और दांवपेंच आजमाने के बाद आखिरकार राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार को इस्तीफा देना पड़ा है.
इसके साथ ही अखबारों और चैनलों के बीच इस घोटाले के खुलासे का श्रेय लेने की होड़ भी शुरू हो गई है. ‘दुनिया के सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले अंग्रेजी अखबार’ का दावा करनेवाले अखबार का दावा है कि इस घोटाले का भंडाफोड उसने ही किया है. 
लेकिन सच यह है कि इस घोटाले के पर्दाफाश का श्रेय मीडिया को नहीं बल्कि भ्रष्टाचार विरोधी आर.टी.आई कार्यकर्ताओं खासकर अंजलि दमानिया की मुहिम और सिंचाई विभाग के चीफ इंजीनियर विजय पंधारे के भंडाफोड को जाता है जिनकी पहल, मेहनत, साहस और प्रतिबद्धता के कारण इस घोटाले का खुलासा हो पाया.

यह इनकी कोशिशें थीं जिसके कारण ऐसा माहौल बना कि पिछले कुछ सप्ताहों में मीडिया खासकर स्थानीय अखबारों में सिंचाई घोटाले की खबरें सुर्खियाँ बनने लगीं. यह ठीक है कि घोटाले के तथ्यों के सुर्ख़ियों में आने के बाद ही महाराष्ट्र सरकार और खासकर एन.सी.पी नेतृत्व पर दबाव बढ़ा और उसे मुंह छुपाने के लिए इस्तीफे का नाटक करना पड़ा.

लेकिन यह तथ्य है कि हाल के कई और बड़े घोटालों की तरह इस घोटाले का भी पर्दाफाश मीडिया ने नहीं बल्कि आर.टी.आई और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं, कोर्ट के निर्देशों, सी.ए.जी की रिपोर्टों आदि ने किया है. दर्जनों आर.टी.आई कार्यकर्ताओं ने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई है. यह ठीक है कि हाल में सामने आए भ्रष्टाचार के इक्का-दुक्का मामलों को उजागर करने में सीधे मीडिया की भूमिका रही है लेकिन ज्यादातर मामलों में खुलासे में उसकी सक्रिय भूमिका नहीं थी.
सच पूछिए तो अगर आर.टी.आई और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं, कोर्ट और सी.ए.जी आदि ने साहस के साथ पहल नहीं की होती, सच को सामने लाने की अनथक कोशिश नहीं की होती तो इनमें से ज्यादातर मामले सामने नहीं आते.
इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है. आज जब कोयला आवंटन जैसे कई घोटालों में खुद मीडिया समूहों और उनके मालिकों के नाम सामने आ रहे हैं, उस समय उनसे इन घोटालों के खुलासे की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है? दूसरे, आज कई छोटे-बड़े मीडिया समूहों में उन बड़ी कंपनियों के शेयर हैं जो इन घोटालों की सबसे बड़ी लाभार्थी हैं.

जाहिर है कि उनसे भी यह उम्मीद करना बेकार है कि वे घोटालों के पर्दाफाश की पहल और सक्रिय कोशिश करेंगी. यही कारण है कि इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर भ्रष्टाचार और घोटालों के हालिया मामलों के पर्दाफाश में मीडिया और उसकी खोजी पत्रकारिता की सीधी भूमिका नहीं है.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. खोजी पत्रकारिता का मतलब केवल घोटालों का भंडाफोड ही नहीं है बल्कि सामाजिक-जातिगत-धार्मिक-एथनिक अन्याय, उत्पीडन और मानवाधिकार हनन के मामलों को उजागर करना भी है.
आश्चर्य नहीं कि खोजी पत्रकारिता की कुछ बेहतरीन मिसालों में घोटालों के भंडाफोड के अलावा भागलपुर आँखफोड़वा कांड से लेकर नेल्ली नरसंहार तक के पर्दाफाश के मामले शामिल रहे हैं. हालिया मामलों में गुजरात में हुए नरसंहार के मामलों में अपराधियों की पहचान करने और उनके खिलाफ सबूत जुटाने के मामले में ‘तहलका’ की खोजी पत्रकारिता ने अनुकरणीय मिसाल पेश की है.
लेकिन इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ऐसा लगता है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता के कारपोरेटीकरण के साथ दोनों तरह की खोजी पत्रकारिता की मौत हो चुकी है. खासकर उस खोजी पत्रकारिता की जो अपनी पहल पर सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल, स्रोतों को खंगालने, दूर-दराज के इलाकों की धूल फांकने और तथ्यों की छानबीन करके घोटालों के साथ-साथ सामाजिक अन्याय, भेदभाव और जुल्म-उत्पीडन के मामलों का पर्दाफाश करती थी.

कहने की जरूरत नहीं है कि खोजी पत्रकारिता की मौत ने आज की कारपोरेट पत्रकारिता के ‘लोकतांत्रिक घाटे’ को और बढ़ा दिया है और उसकी साख को और कमजोर कर दिया है. 

('तहलका' के 15 अक्तूबर के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)                     

बुधवार, अक्टूबर 03, 2012

गरीबों पर बोझ और अमीरों की मौज

राजकोषीय घाटे का हौव्वा दिखाकर आम आदमी की जेब ढीली की जा रही है

अगर आप डीजल की कीमतों में प्रति लीटर ५ रूपये और रसोई गैस के सिलेंडरों की संख्या छह तक सीमित करने और उसके बाद के सिलेंडर की कीमत में दुगुनी से भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी के फैसले से बिगड़े घरेलू बजट को संभालने में जुटे हैं तो आनेवाले महीनों में और कुर्बानियों के लिए तैयार हो जाइए.
केन्द्र सरकार की बिगड़ती राजकोषीय स्थिति में सुधार के उपाय सुझाने के लिए पूर्व वित्त सचिव विजय केलकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने यू.पी.ए सरकार को सुझाव दिया है कि वह डीजल की कीमतों में वृद्धि करे और इस वित्तीय वर्ष के आखिर तक उसपर दी जानेवाली सब्सिडी में ५० फीसदी और अगले वित्तीय वर्ष (२०१३-१४) में उसे पूरी तरह समाप्त कर दे.
यही नहीं, केलकर समिति ने यूरिया की कीमतों में तुरंत १० फीसदी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस) से वितरित होनेवाले खाद्यान्नों की कीमतों में भी बढ़ोत्तरी की सिफारिश की है. 
केलकर समिति के मुताबिक, इन सिफारिशों का मकसद सरकार के बढ़ते सब्सिडी बोझ को कम करना है क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों, उर्वरकों और खाद्यान्नों पर दी जानेवाली सब्सिडी के कारण केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ता हुआ खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है.

समिति का आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक गंभीर राजकोषीय संकट के कगार पर खड़ी है और बिगड़ती राजकोषीय स्थिति को संभालने के लिए तुरंत कड़े कदम नहीं उठाये गए तो अर्थव्यवस्था के १९९१ जैसे संकट में फंसने की आशंका है. इससे पहले प्रधानमंत्री चेतावनी दे चुके हैं कि बिगड़ती राजकोषीय स्थिति को संभालने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे क्योंकि पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं.

हालाँकि केलकर समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी करते हुए केन्द्रीय वित्त सचिव ने इसकी कुछ सिफारिशों को यू.पी.ए सरकार की समावेशी विकास की नीति के विपरीत बताते असहमति जाहिर की है. लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के हालिया फैसलों और घोषणाओं से यह साफ़ है कि वह वैचारिक तौर पर न सिर्फ इस रिपोर्ट की बुनियादी समझ और सिफारिशों से सहमत है बल्कि उसे लागू करने के लिए बेचैन भी है.
इसका सबूत यह है कि केलकर समिति ने ३ सितम्बर को सौंपी अपनी रिपोर्ट में डीजल में प्रति लीटर ४ रूपये और वह भी चरणों में बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी लेकिन सरकार ने उससे एक कदम आगे बढ़कर एक झटके में ५ रूपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी कर दी. यही नहीं, रसोई गैस के अतिरिक्त सिलेंडरों की कीमत भी मौजूदा कीमतों के दुगुने से भी ज्यादा ८८३ रूपये प्रति सिलेंडर कर दी है.
इस ताजा वृद्धि से सरकार ने २० हजार करोड़ रूपये और सार्वजनिक क्षेत्र की चार बड़ी कंपनियों में विनिवेश से १५ हजार करोड़ रूपये उगाहने का इंतजाम कर लिया  है. लेकिन यह तो सिर्फ झांकी है. केलकर समिति की सिफारिशों के मुताबिक यू.पी.ए सरकार आनेवाले महीनों में राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ५.१ फीसदी की सीमा में रखने के ऐसे और कई कड़े फैसले करने जा रही है.

इसके तहत वह केलकर समिति द्वारा सुझाये रोडमैप के मुताबिक एक ओर पेट्रोलियम उत्पादों, राशन के अनाज और उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोत्तरी के जरिये सब्सिडी बजट में कोई ४० हजार करोड़ रूपये बचाने और दूसरी ओर, सरकारी कंपनियों के शेयरों की बिक्री से ३० हजार करोड़ रूपये से अधिक जुटाने और विकास के मद में होनेवाले खर्चों यानी योजना बजट में कटौती से कोई २० हजार करोड़ रूपये बचाने की योजना पर पूरी सक्रियता से काम कर रही है.

लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि पहले से आसमान छूती महंगाई और पटरी से उतरती अर्थव्यवस्था, ढहते औद्योगिक उत्पादन और गिरते निर्यात के कारण छंटनी, तालाबंदी और वेतन-मजदूरी कटौती की मार से त्रस्त आमलोगों खासकर गरीबों, किसानों आदि पर यू.पी.ए सरकार सीधे या परोक्ष रूप से कोई ६० हजार करोड़ रूपये का बोझ डालने जा रही है.
मजे की बात यह है कि खुद केलकर समिति ने भी स्वीकार किया है कि इन फैसलों से तात्कालिक और मध्यावधि तौर पर आमलोगों की आय और उनके उपभोग पर नकारात्मक असर पड़ेगा. अल्पावधि में महंगाई बढ़ेगी. लेकिन समिति का तर्क है कि अगर आमलोग यह तात्कालिक कष्ट और परेशानी उठाने के लिए तैयार नहीं होंगे तो बिगड़ती राजकोषीय स्थिति बदतर स्थिति में पहुँच जाएगी और उस स्थिति में आमलोगों को और भी ज्यादा तकलीफ उठानी पड़ेगी.
कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार भी इस तर्क से सहमत है. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ने ‘राष्ट्र के नाम सन्देश’ में साफ़ कहा था कि बदतर राजकोषीय घाटे और बढ़ते कर्जों के कारण यूरोपीय देशों को वेतन और पेंशन तक में कटौती करनी पड़ रही है. प्रधानमंत्री के मुताबिक, भारत में यह स्थिति न आए, इसके लिए आसान रास्तों को छोड़कर कड़े कदम उठाने का वक्त आ गया है.

लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि क्या देश सचमुच १९९१ की तरह के राजकोषीय संकट में फंसने के कगार पर है या सिर्फ संकट का हौव्वा खड़ा करके आमलोगों पर और अधिक बोझ लादने की कोशिश की जा रही है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट खासकर यूरोपीय देशों के आर्थिक-वित्तीय संकट और उससे निपटने के नामपर मितव्ययिता उपायों (आस्ट्रीटी) के तहत आमलोगों पर अधिक से अधिक बोझ लादने के तरीकों को लेकर खुद उन देशों और पूरी दुनिया में जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है.

इन उपायों के आलोचक और नोबल पुरस्कार अर्थशास्त्री पाल क्रुगमैन ने हाल में इन मितव्ययिता उपायों की तीखी आलोचना करते हुए लिखा है कि ये पागलपन की हद तक पहुँच गए हैं और इनसे यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ रही है.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि राजकोषीय घाटे को कम करने के नामपर हो रही कटौतियों के कारण आमलोगों की तकलीफ और परेशानियां इस हद तक बढ़ गईं हैं कि ग्रीस से लेकर स्पेन तक लाखों लोग सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और आर्थिक संकट गंभीर राजनीतिक संकट में बदलता जा रहा है. इस कारण इन मितव्ययिता उपायों की निरर्थकता पर तीखे सवाल उठने लगे हैं.
अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं में बहस का मुद्दा यह है कि अर्थव्यवस्था के संकट में होने के कारण राजकोषीय घाटे की स्थिति बिगड़ रही है या राजकोषीय घाटे के कारण अर्थव्यवस्था संकट में फंस गई है? नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में आस्था रखनेवाले नीति निर्माताओं के मुताबिक, राजकोषीय घाटे और बढ़ते कर्ज के कारण अर्थव्यवस्था संकट में आ गई है और इससे निपटने के लिए घाटे को कम करना जरूरी हो गया है.

इसके लिए सरकारी खर्चों यानी सब्सिडी में कटौती जरूरी है, चाहे वह कितनी भी तकलीफदेह हो. अधिकांश यूरोपीय देशों की सरकारों से लेकर अपने प्रधानमंत्री तक और विश्व बैंक-मुद्रा कोष से लेकर बड़ी रेटिंग एजेंसियों तक सभी इसी राय के हैं.

लेकिन दूसरी ओर कई कीन्सवादी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए खर्चों में कटौती और आमलोगों पर बोझ डालने के बजाय सरकारों को खर्चों खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि पर बढ़ोत्तरी करनी चाहिए. इससे लोगों को रोजगार मिलेगा, उनकी आय बढ़ेगी, अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी जिससे सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा और घाटा कम हो पायेगा.
लेकिन बड़ी वित्तीय पूंजी को यह पसंद नहीं है क्योंकि इसमें अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बढ़ जाएगी. दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस आवारा पूंजी के मुनाफे की बेलगाम भूख के कारण ही यह संकट पैदा हुआ है लेकिन वह इस संकट की कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं है.
इसके उलट वह अपने मुनाफे की गारंटी की खातिर आमलोगों पर सारा बोझ डालने के लिए सरकारों और नीति निर्माताओं को मजबूर कर रही हैं. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. यहाँ भी आर्थिक संकट खासकर बढ़ते राजकोषीय घाटे का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है. लेकिन यह संकट वास्तव में कितना गंभीर है?

चालू वित्तीय वर्ष के बजट में राजकोषीय घाटा जी.डी.पी का ५.१ फीसदी रहने का अनुमान पेश किया गया था और केलकर समिति के मुताबिक, अगर कड़े कदम नहीं उठाये गए तो यह एक फीसदी बढ़कर जी.डी.पी का ६.१ फीसदी हो जाएगा. लेकिन अगर लोगों पर ६० हजार करोड़ रूपये का बोझ डाल दिया जाए तो यह घाटा जी.डी.पी का ५.२ फीसदी रहेगा.

इसका मतलब यह है कि इस आसमान छूती महंगाई के बीच आमलोगों की तकलीफ बढ़ाने के बावजूद घाटे में कोई खास कमी नहीं होने जा रही है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर इसका सारा बोझ आमलोगों खासकर गरीबों और किसानों पर क्यों डाला जा रहा है? क्या सरकार के पास इस कथित संकट से निपटने का कोई और विकल्प नहीं है?
असल में, सरकार के पास विकल्प राजकोषीय घाटे को कम करने के ज्यादा आसान विकल्प हैं लेकिन वह बड़ी पूंजी और अमीरों को नाराज नहीं करना चाहती है. केलकर समिति के मुताबिक, बढ़ते राजकोषीय घाटे की एक वजह भारत में टैक्स-जी.डी.पी का घटता अनुपात भी है. उल्लेखनीय है कि वर्ष २००७-०८ में केन्द्र सरकार के टैक्स-जी.डी.पी का अनुपात ११.९ फीसदी था जो घटते हुए वर्ष २०११-१२ में १०.१ फीसदी रह गया.
इसका अर्थ यह हुआ कि अगर सरकार सिर्फ टैक्स-जी.डी.पी के अनुपात को २००७-०८ के स्तर पर ले आए तो आमलोगों पर बोझ डाले बिना भी राजकोषीय घाटा जी.डी.पी के ४.५ फीसदी रह जाएगा. लेकिन इसके लिए आम आदमी की सरकार का दावा करनेवाली यू.पी.ए सरकार को विदेशी आवारा पूंजी, कार्पोरेट्स और अमीरों को हर साल टैक्स में दी जानेवाली छूटों/रियायतों में सिर्फ ५० फीसदी से भी कम की कटौती करनी पड़ेगी.

याद रहे कि सरकार ने वर्ष २०११-१२ में कार्पोरेट्स और अमीरों को टैक्स में कोई ५.११ लाख करोड़ रूपयों की छूट दी थी. क्या ‘बढ़ते राजकोषीय घाटे के कारण १९९१ के जैसे संकट के मुहाने’ पर खड़ी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कुछ कुर्बानी बड़ी पूंजी को भी नहीं करना चाहिए? क्या यू.पी.ए सरकार इस कड़े फैसले के लिए तैयार है? 

('दैनिक भास्कर' के नई दिल्ली संस्करण में 3 अक्तूबर को आप-एड पृष्ठ पर प्रकाशित लेख)