गुरुवार, नवंबर 03, 2011

चैनलों के पीछे के चेहरों को देखिये..पूछिए, वे कैसे चल रहे हैं?

चैनलों के लिए सरकार और उद्योग से स्वतंत्र रेगुलेटर चाहिए


दूसरी और अंतिम किस्त


तथ्य यह है कि इस समय देश में कुल ७४५ केबल और सैटेलाईट चैनलों को प्रसारण के लिए लाइसेंस मिला हुआ है जिसमें कोई ३६६ चैनलों को ‘समाचार और सम-सामयिक’ चैनलों के बतौर लाइसेंस मिला हुआ है जबकि बाकी ३७९ गैर समाचार चैनलों की श्रेणी में आते हैं. साफ है कि कुल केबल और सैटेलाईट चैनलों में लगभग आधे समाचार चैनल हैं.

यह एक हैरान करनेवाली संख्या है. दुनिया के किसी भी देश में इतने न्यूज चैनल नहीं हैं. अगर यह मान भी लिया जाए कि इसमें कई चैनलों ने लाइसेंस भले न्यूज चैनल के बतौर लिया हो लेकिन वे २४x७ न्यूज चैनल नहीं हैं, उनके यहाँ न्यूज के एकाध बुलेटिन भर हैं और वे वास्तव में इन्फोटेनमेंट चैनल हैं, इसके बावजूद यह संख्या कई कारणों से हैरान करनेवाली है.


सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनका बिजनेस माडल क्या है? उनमें किनका धन लगा है और वे चल कैसे रहे हैं? ये सवाल इसलिए जरूरी हैं कि इनमें से अधिकांश न्यूज चैनलों की आमदनी और राजस्व का कोई ज्ञात स्रोत नहीं दिखाई पड़ता है. जाहिर है कि आय का कोई स्रोत न होने के बावजूद इन चैनलों का चलना एक आश्चर्य है. इसका यह मतलब भी है कि इन्हें चलानेवाले किन्हीं और कारणों से इन्हें चला रहे हैं.

यह किसी से छुपा नहीं है कि न्यूज चैनल बिजनेस में कई चिट फंड, रीयल इस्टेट, शराब आदि के धंधे करनेवाली कंपनियों से लेकर प्रभावशाली नेताओं/अफसरों ने पैसा लगाया है और उनका मकसद पैसा कमाने से ज्यादा अपने वैध-अवैध धंधों को एक तरह का संरक्षण देना और सत्ता के केन्द्रों में अपनी पहुँच और हैसियत बढ़ाना है. इनमें से कई ब्लैकमेल और अन्य तरह के अपराधों में भी संलग्न पाए गए हैं.

जाहिर है कि इसका असर न्यूज चैनलों के कंटेंट से लेकर उनके कामकाज के तरीकों में भी दिखता है. इससे न्यूज चैनलों की दुनिया में एक अजीब तरह की अराजकता दिखाई पड़ती है. इससे दर्शकों में न्यूज चैनलों को लेकर खिन्नता, क्षोभ और नाराजगी बढ़ी है. यही नहीं, इस अराजकता, मनमानी और निहित स्वार्थी तत्वों के कारण न्यूज चैनलों खासकर न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोशियेशन (एन.बी.ए) की ओर से प्रस्तावित स्व-नियमन की व्यवस्था भी बहुत कारगर सिद्ध नहीं हो पाई है.

इसके कारण हाल के वर्षों में मीडिया समीक्षकों, बुद्धिजीवियों और सिविल सोसायटी के कुछ संगठनों की ओर से चैनलों के रेगुलेशन की मांग भी जोर पकड़ने लगी है. कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार चैनलों के इन्हीं अतिरेकों और विचलनों के खिलाफ आम दर्शकों के बीच बने नकारात्मक मूड का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.

निश्चय ही, न्यूज चैनलों के रेगुलेशन की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन रेगुलेशन का मतलब चैनलों की सम्पादकीय आज़ादी और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना नहीं है. रेगुलेशन का मतलब यह भी नहीं है कि सारी ताकत सरकार और नौकरशाहों के हाथ में हो और वे चैनलों का कंटेंट तय करने लगें.

रेगुलेशन का मतलब सरकार और मीडिया उद्योग दोनों से स्वतंत्र और स्वायत्त एक ऐसे जनतांत्रिक निकाय का गठन है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी और नागरिकों के जानने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी तरीके से चैनलों के कामकाज की निगरानी करे, उनके पत्रकारीय विचलनों-अतिरेकों पर अंकुश लगाये, जरूरत पड़ने पर दंडात्मक कार्रवाई भी करे और सबसे बढ़कर टी.वी उद्योग में बहुलता और विविधता की गारंटी के लिए कुछ बड़े मीडिया समूहों के बढ़ते वर्चस्व और एकाधिकार पर अंकुश लगाये.

लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार खुद न्यूज चैनलों के रेगुलेशन को लेकर बहुत ईमानदार और गंभीर नहीं है. अगर वह ईमानदार और गंभीर होती तो इन आधे-अधूरे और तदर्थ फैसलों, मनमाने नियमों और चैनलों के रेगुलेशन के अधिकार अपने हाथ में रखने के बजाय वास्तव में एक स्वतंत्र और स्वायत्त मीडिया रेगुलेशन प्राधिकरण के गठन की दिशा में आगे बढ़ती.

लेकिन ऐसी मंशा नहीं है. सच पूछिए तो उसे न्यूज चैनलों के पत्रकारीय अतिरेकों-विचलनों से कोई खास शिकायत नहीं है. न्यूज चैनल जब तक सिनेमा, क्रिकेट, सेलेब्रिटीज, कामेडी और क्राइम दिखाते रहे, राखी सावंत के लटकों-झटकों और नाग-नागिन के रहस्य में मस्त रहे और सनसनी के लिए टुटपुंजिया ‘खबरों’ के साथ खिलवाड़ करते रहे, सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई.

कहने का मतलब यह कि जब तक न्यूज चैनल दर्शकों को उलझाये और सुलाये रहे, सरकार को उनसे कोई समस्या या शिकायत नहीं थी. लेकिन जैसे ही चैनलों ने भ्रष्टाचार-घोटालों के मामलों का भंडाफोड और उन्हें उछालना शुरू किया और अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का हीरो बना दिया, सरकार का सिंहासन हिलने लगा और उसकी चिंता और नाराजगी बढ़ने लगी. उसे चैनलों की अराजकता, मनमानी और अतिरेक-विचलन दिखाई देने लगे और रेगुलेशन की जरूरत महसूस होने लगी.

इसके बाद भी सच्चाई यही है कि सरकार अभी भी चैनलों के स्वतंत्र और स्वायत्त रेगुलेशन व्यवस्था के लिए तैयार नहीं है. अगर ऐसा नहीं होता तो वह मनमाने तरीके से कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के उल्लंघन की निगरानी और दण्डित करने का अधिकार अपने हाथों में रखने की कोशिश नहीं करती.


साफ है कि उसकी असली मंशा चैनलों की मौजूदा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम पर अंकुश लगाने और उन्हें काबू में रखने की है. लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही बड़ा सच है कि नए प्रावधानों का विरोध कर रहे चैनल भी कोई अभिव्यक्ति की आज़ादी की हिफाजत के लिए नहीं लड़ रहे हैं और न ही उनकी प्रतिबद्धता दर्शकों के जानने के अधिकार की रक्षा करने में है.

तथ्य यह है कि उनके मालिकों के लिए यह एक धंधा भर है जिसके अलग-अलग मकसद हैं. उनमें से कई की पूंछ कई कारणों से सरकार के पांवों तले दबी है. आश्चर्य नहीं होगा, अगर उनमें से कई जल्दी सुधरे हुए दिखाई दें, कुछ अपने स्वर मद्धिम कर लें और कुछ सरकार का गुणगान करने लगें. सरकार ने सन्देश दे दिया है और देखना है कि इसमें कितने टिकते हैं?

समाप्त...

('कथादेश' के नवम्बर'११ अंक में इलेक्ट्रानिक स्तम्भ में प्रकाशित) 

बुधवार, नवंबर 02, 2011

चैनलों से नाराज क्यों है सरकार?


न्यूज चैनलों के रेगुलेशन की सरकार की मंशा में खोट है

 पहली किस्त

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और चौतरफा आलोचनाओं से घिरी यू.पी.ए सरकार ने न्यूज चैनलों की नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से कैबिनेट में पास एक ताजा प्रस्ताव में नए न्यूज चैनल शुरू करने के लिए मौजूदा नियमों को और कड़ा करने और मौजूदा चैनलों के लाइसेंस के पुनर्नवीनीकरण की प्रक्रिया सशर्त करने का फैसला किया गया है.

इस नए प्रस्ताव के मुताबिक, नए न्यूज चैनल शुरू करने के वास्ते अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग का लाइसेंस लेने के लिए संबंधित कंपनी की निवल संपत्ति तीन करोड़ रूपये से बढाकर २० करोड़ रूपये कर दी गई है. इसके बाद हर नए चैनल के लिए ५ करोड़ की अतिरिक्त रकम जरूरी होगी.

यही नहीं, न्यूज चैनलों के लिए यह भी शर्त लगा दी गई है कि लाइसेंस मिलने के एक साल के अंदर चैनल शुरू हो जाना चाहिए. इसके साथ ही, न्यूज चैनलों के लिए दो करोड़ रूपये की परफार्मेंस बैंक गारंटी की शर्त लगा दी गई है जो एक साल के अंदर चैनल न शुरू होने की स्थिति में जब्त कर ली जायेगी.

इसके अलावा मौजूदा चैनलों के लाइसेंसों का दस वर्षों में पुनर्नवीनीकरण करना होगा. इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह होगी कि संबंधित चैनल के खिलाफ केबल नेटवर्क कानून में उल्लिखित कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के उल्लंघन के पांच या उससे अधिक मामलों में कार्रवाई न हुई हो. अगर ऐसा हुआ है तो चैनल का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इन प्रस्तावों और संशोधनों पर चैनलों की ओर से बहुत तीखी प्रतिक्रिया आई है. चैनलों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए खतरा बताते हुए असंवैधानिक, मनमाना और एकतरफा करार दिया है.

उनकी यह भी शिकायत है कि सरकार ने इस फैसले के जरिये चैनलों द्वारा स्थापित स्व-नियमन की उस व्यवस्था पर सीधा आघात किया है जिसकी खुद सरकार ने प्रशंसा की है. चैनलों का आरोप है कि केबल कानून में उल्लिखित कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के उल्लंघन के मामलों का फैसला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अफसरों के हाथ में होगा जिसमें मनमानी की काफी गुंजाइश होगी.

चैनलों का यह भी आरोप है कि केन्द्र सरकार इस फैसले के जरिये उन्हें सबक सिखाने और उनपर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है. इसकी वजह यह है कि सरकार अपनी मौजूदा राजनीतिक मुश्किलों के लिए काफी हद तक न्यूज मीडिया खासकर चैनलों को जिम्मेदार मानती है.

सरकार के कई मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं ने न्यूज चैनलों से अपनी नाराजगी का कई मौकों पर खुलकर इजहार भी किया है. यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री ने भी अपनी सरकार के प्रति मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना करते हुए कहा था कि मीडिया एक साथ ‘आरोपकर्ता, जांचकर्ता और जज’ तीनों की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले कई महीनों से मीडिया खासकर कुछ प्रमुख न्यूज चैनलों के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के कारण यू.पी.ए सरकार की काफी राजनीतिक फजीहत हुई है. यही नहीं, सरकार को यह भी लगता है कि चैनल विपक्ष के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को न सिर्फ हवा दे रहे हैं बल्कि वे इस मुहिम में एक सक्रिय खिलाड़ी बन गए हैं.

कई मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं के मुताबिक, चैनलों ने अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे भ्रष्टाचार और कालाधन विरोधी आंदोलनों को खड़ा किया है. उन्हें यह लगता है कि अगर चैनलों ने एकतरफा तरीके से इन आन्दोलनों को उछाला और कांग्रेस और सरकार को खलनायक की तरह पेश नहीं किया होता तो सरकार की इतनी किरकिरी नहीं होती.

स्वाभाविक तौर पर इसे लेकर सरकार में बौखलाहट है. हालांकि मीडिया खासकर न्यूज चैनलों भारी विरोध के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी ने वायदा किया है कि सरकार लाइसेंस के पुनर्नवीनीकरण के लिए कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के उल्लंघन के मामलों की जांच और उनपर किसी फैसले पर पहुँचने की प्रक्रिया में चैनलों के स्व-नियमन व्यवस्था का ध्यान रखेगी.

इस बारे में कोई भी फैसला उनसे चर्चा के बाद ही होगा. इसके बावजूद यह तथ्य है कि सरकार ने इन प्रस्तावों और संशोधनों को वापस नहीं लिया है.

साफ है कि वह न्यूज चैनलों को अपने ‘तौर-तरीके ठीक करने’ (मतलब चुप रहने और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से दूर रहने) का सन्देश देने की कोशिश कर रही है. वह चैनलों पर दबाव बनाने और उन्हें ‘रास्ते पर लाने’ के लिए मन बना चुकी है. अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग गाइडलाइन्स और नए न्यूज चैनल शुरू करने के लिए प्रस्तावित नई शर्तों के बारे में केन्द्रीय कैबिनेट के ताजा फैसले को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए.

यही नहीं, वह ऐसे मौके और मुद्दे के इंतज़ार में है जब चैनलों को पकड़ा और सबक सिखाया जा सके. आश्चर्य नहीं होगा, अगर आनेवाले महीनों में कुछ चैनलों को कार्यक्रम और विज्ञापन कोड के उल्लंघन के लिए निशाना बनाया जाए.

इस मामले में सरकार की मंशा साफ़ है. इस बारे में किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए. उसका एकमात्र मकसद न्यूज चैनलों को अंकुश में रखना है. अलबत्ता इसके लिए वह बहाना चैनलों की मनमानी, सनसनीखेज, बेतुके और बे-सिरपैर के कंटेंट के अलावा पत्रकारीय नैतिकता और मूल्यों के खुले उल्लंघन को बना रही है.

यह सच है कि सरकार को यह मौका खुद चैनलों ने दिया है. सरकार चैनलों की इस कमजोर नस को जानती है. वह जानती है कि चैनल कोई दूध के धुले नहीं हैं. उसे पता है कि अधिकांश न्यूज चैनलों के बारे में आम लोगों और उनके दर्शकों की राय क्या है?

असल में, अधिकांश न्यूज चैनलों खासकर हिंदी न्यूज चैनलों ने आपसी गलाकाट होड़ में टी.आर.पी हासिल करने के लिए पत्रकारिता की मर्यादाओं और मूल्यों का जिस तरह से मजाक उड़ाया है, उसके कारण उनके न्यूज चैनल होने पर भी उँगलियाँ उठने लगी थीं. यही नहीं, दर्शकों में उनकी विश्वसनीयता और साख भी कमजोर हुई है. धीरे-धीरे वे मजाक के विषय बनने लगे हैं.

‘रण’ और ‘पीपली लाइव’ जैसी फ़िल्में इस बात का सबूत हैं कि पापुलर कल्चर में लोग चैनलों को किस तरह से देखने लगे हैं. इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में न्यूज चैनल चलाने के बिजनेस में जिस तरह के लोग और कम्पनियाँ आईं हैं, उनके चाल-चरित्र, उद्देश्यों और तौर-तरीकों के बारे में जितना कहा जाए, कम है.

जारी...दूसरी किस्त कल....

('कथादेश' के नवम्बर'११ के अंक में इलेक्ट्रानिक मीडिया स्तम्भ में प्रकाशित)

सोमवार, अक्टूबर 31, 2011

अफ्स्पा पर दाएं-बाएं करती यू.पी.ए सरकार

केन्द्र सरकार अफ्स्पा को हटाने के फैसले पर टालमटोल करके कश्मीर में राजनीतिक समाधान का एक और मौका गँवा रही है


यू.पी.ए सरकार का मौके गंवाने में कोई सानी नहीं है. कश्मीर समस्या इसकी एक और मिसाल है. यह सचमुच हैरानी की बात यह है कि कश्मीर में अनुकूल राजनीतिक हालात होने के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार साहसिक राजनीतिक पहलकदमी लेने से हिचकिचा रही है. 

चिंता की बात यह है कि खुद गृह मंत्रालय का दावा है कि कश्मीर में हालात पहले से बेहतर हुए हैं. आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है. लेकिन इसके बावजूद केन्द्र सरकार न सिर्फ मानसिक रूप से कोई साहसिक राजनीतिक पहलकदमी के लिए तैयार नहीं दिख रही है बल्कि लगातार परस्पर विरोधी संकेत दे रही है.

इससे स्थिति के फिर से बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है. ऐसा लगता है कि वह कश्मीर के मामले में एक कदम आगे और दो कदम पीछे की रणनीति पर चल रही है. इसका नतीजा यह हुआ है कि कश्मीर मामले में यू.पी.ए सरकार की स्थिति नौ दिन चले अढाई कोस की है.

उदाहरण के लिए, कश्मीर घाटी से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट यानी अफ्स्पा) को हटाने के मुद्दे को ही लीजिए. इस मुद्दे पर केन्द्र और राज्य सरकार के अंदर भ्रम और मतभेद की स्थिति यह है कि बाएं हाथ को पता नहीं है कि दायाँ हाथ क्या कर रहा है?

हैरत की बात नहीं है कि खुद केन्द्र सरकार और राज्य की उमर अब्दुल्ला सरकार के अंदर से इस मुद्दे पर जिस तरह से परस्पर विरोधी बयान आ रहे हैं और खुली राजनीति शुरू हो गई है, उससे लगता नहीं है कि इनमें से कोई भी वास्तव में अफ्स्पा को राज्य से हटाने के मुद्दे पर गंभीर है.

अफ्स्पा के मुद्दे पर कई मुंह से बोलती सरकार न सिर्फ अपना ही मजाक उड़ा रही है बल्कि घाटी में एक बड़ी राजनीतिक पहलकदमी लेने के लिए अनुकूल माहौल बनाने का मौका चूक रही है. इसका फायदा किसे होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है.

ऐसा नहीं है कि राज्य से अफ्स्पा हटा लेने से कश्मीर का मुद्दा रातों-रात सुलझ जाएगा या वहां पूरी तरह से अमन-चैन आ जाएगा या फिर वहां की सभी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक समस्याएं खत्म हो जाएँगी.

असल में, कश्मीर मुद्दे के स्थाई राजनीतिक समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों, संगठनों और समूहों से बातचीत का रास्ता साफ़ करने के लिए जरूरी है कि कश्मीर घाटी का पूरी तरह से वि-सैन्यीकरण किया जाए. इस वि-सैन्यीकरण की दिशा में पहला कदम अफ्स्पा को हटाना है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अफ्स्पा हटाने से कश्मीर घाटी में लोगों में भरोसा पैदा करने और अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी.

सच यह है कि अफ्स्पा का समय पूरा हो चुका है. इसकी वजह यह है कि न सिर्फ कश्मीर में बल्कि देश के अन्य हिस्सों खासकर मणिपुर में अफ्स्पा एक काले कानून के रूप में बदनाम हो चुका है.

दरअसल, यह आंतरिक अशांति और उग्रवाद से निपटने के नाम पर सेना को इतने व्यापक और असीमित अधिकार दे देता है कि वह बिना वारंट के किसी के भी घर में घुसकर तलाशी ले सकती है, शक के बिना पर गिरफ्तार कर सकती है, गोली चला और मार सकती है. इस कानून के तहत सैन्य अधिकारियों को इन फैसलों के लिए उन्मुक्ति मिली हुई है.

आश्चर्य नहीं कि इस कानून के बेजा इस्तेमाल और सेना पर मानवाधिकार हनन के अनेकों गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इस कारण पिछले एक-डेढ़ दशक से इस कानून को खत्म करने की मांग रह-रहकर उठती रही है.

खासकर मणिपुर से अफ्स्पा को हटाने की मांग को लेकर पिछले एक दशक से अधिक समय से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक प्रतिरोध ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. सच पूछिए तो किसी भी लोकतान्त्रिक मुल्क में अफ्स्पा जैसे कानून का होना न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि उस लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

हैरानी की बात यह है कि इस कानून की समीक्षा के लिए खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.पी. जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यी समिति का गठन किया था जिसने जून’२००५ में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. इस समिति ने अफ्स्पा को खत्म करने की सिफारिश की थी.

कहने की जरूरत नहीं है कि उसके बाद से ही देश में अफ्स्पा की प्रासंगिकता और उसे रद्द करने के मुद्दे पर सरकार के अंदर और बाहर बहस और चर्चा चल रही है. लेकिन देश में जनवाद और इंसाफपसंद लोगों के बीच इस कानून को खत्म करने को लेकर आमराय होने के बावजूद केन्द्र सरकार कोई ठोस फैसला करने में हिचकिचा रही है.

यही नहीं, कश्मीर मामले के राजनीतिक समाधान की संभावनाओं का पता लगाने के लिए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में अफ्स्पा को हटाने की सिफारिश की है. लेकिन ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह सरकार का एजेंडा भाजपा-आर.एस.एस और सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़े आक्रामक तत्व तय कर रहे हैं.

यही कारण है कि वह कश्मीर मुद्दे पर बड़ी राजनीतिक पहलकदमी तो दूर घाटी से अफ्स्पा हटाने तक का फैसला नहीं कर पा रही है. मजे की बात यह है कि उमर सरकार का प्रस्ताव तो अफ्स्पा को शुरुआत में घाटी के सिर्फ दो जिलों से हटाने भर का है.

अगर यू.पी.ए सरकार कश्मीर जैसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे के हल की दिशा में इतना मामूली सा राजनीतिक जोखिम उठाने का भी साहस नहीं दिखा सकती तो उसे समझ लेना चाहिए कि वह बड़े राजनीतिक संकट को दावत दे रही है. उसे याद रखना चाहिए कि ‘मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं’ और समस्याओं को लटकाने की नीति से चीजें बेहतर नहीं होती बल्कि बिगड़ती हैं.

कश्मीर मसला इसका सबसे त्रासद उदाहरण है जहाँ आज़ादी के बाद से एक के बाद दूसरी केन्द्र और राज्य सरकारों ने पहले सत्ता के लिए राजनीतिक छल, जोड़तोड़ और मनमानी से हालात खराब किये और बाद में आतंकवाद से निपटने के नाम पर राजनीति, जनतंत्र और मानवाधिकारों को ताक पर रखकर कमान सेना को सौंप दी.

लेकिन ऐसा करते हुए वे इतिहास का सबसे बड़ा सबक भूल गईं. इतिहास गवाह है कि राजनीतिक मसलों का समाधान बंदूक से नहीं राजनीति से ही निकलता है. लेकिन ऐसी राजनीति साहस, विवेक, दूरदृष्टि और प्रतिबद्धता मांगती है. अफसोस की आज की राजनीति में ये सबसे दुर्लभ चीजें हैं. यू.पी.ए सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है.



('नया इंडिया' के ३१ अक्तूबर के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)

रविवार, अक्टूबर 30, 2011

यह इतिहास का अंत नहीं, शुरुआत है

कंपनियों को बेल आउट और आम लोगों पर बढ़ता बोझ


दूसरी और आखिरी किस्त


यह वही दौर था जब कारपोरेट मीडिया में वाल स्ट्रीट की सट्टेबाजी और वित्तीय जोड़तोड़ को वित्तीय इंजीनियरिंग और नवोन्मेशीकरण बताकर उनकी बलैयां ली जा रही थीं. इस बीच, राजनीतिक और कारपोरेट जगत के बीच रिश्ता इतना गहरा हो चुका था कि दोनों के बीच का दिखावटी फर्क भी खत्म हो गया. बड़े बैंकों-वित्तीय संस्थाओं और कारपोरेट समूहों के बोर्डरूम से सीधे मंत्रिमंडल और मंत्रिमंडल से सीधे बोर्डरूम के बीच की आवाजाही सामान्य बात हो गई.

जाहिर है कि सरकारों और नौकरशाही का मुख्य काम कंपनियों के अधिक से अधिक मुनाफे की गारंटी के लिए उनके अनुकूल नियम-कानून बनवाना, रेगुलेशन को ढीला और अप्रभावी बनाना और कंपनियों को मनमानी की खुली छूट देना रह गया.


इस बीच, आवारा वित्तीय पूंजी की मुनाफे की हवस और उसके लिए सट्टेबाजी की लत ने मेक्सिको, दक्षिण पूर्वी एशिया, रूस से लेकर अर्जेंटीना तक दर्जनों देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को तबाह करने से लेकर गंभीर संकट में फंसा दिया लेकिन वाल स्ट्रीट की असीमित वित्तीय ताकत और राजनीतिक प्रभाव के कारण किसी ने चूँ तक नहीं किया.

यही नहीं, वाल स्ट्रीट के पिछलग्गू बन चुके विश्व बैंक-मुद्रा कोष ने इन देशों को वित्तीय संकट से निकालने के नाम पर और निजीकरण, उदारीकरण और सरकारी खर्चों में कटौती की कड़वी दवाई पीने के लिए मजबूर किया.

दूसरी ओर, अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में विदेशी निवेश आमंत्रित करने के नाम पर देशी-विदेशी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों की लूट की खुली छूट दे दी गई. निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की औने-पौने दामों पर खरीद और स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने को खुशी-खुशी मंजूरी दी गई.

यहाँ तक कि विश्व व्यापार संगठन में हुए समझौतों के जरिये अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राष्ट्रीय सरकारों और संसद से कानून और नीतियां बनाने का अधिकार भी छीन लिया गया. आश्चर्य नहीं कि इस दौर में जब वाल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट की कंपनियों के मुनाफे में रिकार्डतोड़ बढोत्तरी हो रही थी, देशों के अंदर और वैश्विक स्तर पर गैर बराबरी, गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ रही थी.

आखिरकार वाल स्ट्रीट की कंपनियों के अंतहीन लालच और मुनाफे की भूख ने २००७-०८ में खुद अमेरिका और यूरोपीय देशों को वित्तीय संकट और मंदी में फंसा दिया. इस संकट ने विकसित पश्चिमी देशों में भी आवारा पूंजी के असली चरित्र और उनकी कारगुजारियों को सामने ला दिया. इसके बावजूद वाल स्ट्रीट की ताकत और प्रभाव देखिए कि उसने अमेरिकी राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान को अपने नुकसानों की भरपाई के लिए मजबूर कर दिया.

वित्तीय व्यवस्था को ढहने से बचाने के नाम पर वाल स्ट्रीट की कंपनियों को सरकारी खजाने से अरबों डालर के बेल आउट दिए गए. एक अनुमान के मुताबिक, अकेले अमेरिका ने वाल स्ट्रीट की कंपनियों को डूबने से बचाने के लिए कोई १६ खरब डालर का बेल आउट दिया.

यह और कुछ नहीं बल्कि निजी कंपनियों के घाटे को सरकारी खाते में डालने की तरह था. मतलब यह कि आवारा पूंजी और उनकी कंपनियों की सट्टेबाजी और धांधली का बोझ आम लोगों पर डाल दिया गया क्योंकि सरकारी घाटे की भरपाई के लिए खर्चों में कटौती के नाम पर आमलोगों की बुनियादी जरूरतों के बजट में कटौती शुरू हो गई.

हैरानी की बात यह है कि जब अमेरिका से लेकर यूरोप तक में सरकारें आम नागरिकों से मितव्ययिता बरतने की अपील कर रही थीं, उस समय वाल स्ट्रीट की कम्पनियाँ अरबों डालर के बेल आउट पैकेज का इस्तेमाल अपने टाप मैनेजरों और मालिकों को भारी बोनस देने में कर रही थीं. यही नहीं, लोगों ने यह भी देखा कि ‘बदलाव’ का नारा देकर सत्ता में पहुंचे राष्ट्रपति बराक ओबामा भी वाल स्ट्रीट की मिजाजपुर्सी में किसी से पीछे नहीं हैं.

इसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी. लोगों को लगने लगा है कि इस व्यवस्था में बुनियादी तौर पर खोट है. इस मायने में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन ने न सिर्फ अमेरिका के अंदर बल्कि पूरी दुनिया में आवारा वित्तीय पूंजी के वर्चस्व पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

यही कारण है कि इस आंदोलन के प्रति पूरी दुनिया में एक सहानुभूति और समर्थन का भाव दिखाई पड़ रहा है. साफ है कि अभी ‘इतिहास का अंत’ नहीं हुआ है. एक फीसदी सुपर अमीरों के मुकाबले खड़े ९९ फीसदी लोग इस इतिहास को आगे बढ़ा रहे हैं. ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन इस बढ़ते इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. कोई शक?

('जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर 29 अक्तूबर को प्रकाशित लेख की आखिरी किस्त) 

शनिवार, अक्टूबर 29, 2011

एक फीसदी बनाम ९९ फीसदी


'ग्रीड इज गुड' पर खड़े आवारा वित्तीय पूंजीवाद को चुनौती है 'आक्युपाई वाल स्ट्रीट' आन्दोलन

पहली किस्त


कोई दो दशक पहले सोवियत संघ के ध्वंस को पूंजीवाद की अंतिम विजय बताते हुए फ्रांसिस फुकुयामा ने ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा कर दी थी. इस बीच, मिसिसिपी से लेकर टेम्स में बहुत पानी बह चुका है और इतिहास अमेरिका के पिछवाड़े में नहीं बल्कि खुद पूंजीवाद के दुर्ग अमेरिका और यूरोप में करवट लेता हुआ दिखाई दे रहा है.

अगर इतिहास सड़कों पर बनता है तो हजारों-लाखों लोग बड़ी कारपोरेट पूंजी के लगातार बढ़ते वर्चस्व को चुनौती देते हुए सिएटल से सिडनी तक और न्यूयार्क से लन्दन तक सड़कों पर इतिहास बना रहे हैं. स्वाभाविक तौर पर इससे पूंजीवाद के अग्रगामी किलों में उथल-पुथल और घबराहट का माहौल है.

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि ‘एक फीसदी बनाम ९९ फीसदी’ की इस जोर-आजमाइश में फिलहाल, इतिहास किस करवट बैठेगा लेकिन इतना साफ़ है कि शीघ्र मृत्यु की घोषणाओं के बावजूद ‘वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा’ आंदोलन न सिर्फ टिका हुआ है बल्कि लगातार फ़ैल रहा है.

निश्चय ही, यह अपने-आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है कि अमेरिका में बढ़ती गैर बराबरी, बेरोजगारी, आम लोगों के लगातार गिरते जीवन स्तर और इस सबके लिए कारपोरेट लालच और लूट को जिम्मेदार मानते हुए राजनीतिक सत्ता पर बड़ी कारपोरेट पूंजी के आक्टोपसी कब्जे के खिलाफ ‘वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा’ (आकुपाई वाल स्ट्रीट) आंदोलन को शुरू हुए डेढ़ महीने से अधिक हो गए.

इस बीच, यह आंदोलन न्यूयार्क में आवारा पूंजी के गढ़ वाल स्ट्रीट से निकलकर न सिर्फ पूरे अमेरिका में फ़ैल गया है बल्कि अक्टूबर के मध्य में दुनिया भर के ९०० से ज्यादा शहरों खासकर यूरोप में जबरदस्त प्रदर्शन हुए हैं.

यही नहीं, कई शहरों में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की तर्ज पर आवारा वित्तीय पूंजी के स्थानीय केन्द्रों पर कब्जे के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों में कितना गुस्सा भरा हुआ है.

आश्चर्य नहीं कि शुरू में जिस आंदोलन को यह कहकर अनदेखा करने की कोशिश की गई कि यह आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के खिलाफ तात्कालिक गुस्से-भड़ास का प्रदर्शन है और इस अराजक-दिशाहीन भीड़ के गुबार को बैठने में देर नहीं लगेगी, उसने कई कमजोरियों के बावजूद देखते-देखते आम जनमानस को इस तरह छू लिया है कि उसे अब और फैलने से रोकने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं.

यही कारण है कि न्यूयार्क में वाल स्ट्रीट के पास लिबर्टी पार्क में जो लोग डेरा-डंडा डाले बैठे हैं, उनकी संख्या भले कम हो लेकिन उनके उठाए सवालों और मुद्दों का अमेरिका में ही नहीं, पूरी दुनिया में असर साफ दिखाई पड़ने लगा है.

उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले कुछ दिनों में मीडिया समूहों द्वारा कराये गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में कोई ४३ फीसदी से ५५ फीसदी नागरिकों ने ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की ओर से उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया है. यही नहीं, सी.बी.एस न्यूज-न्यूयार्क टाइम्स सर्वेक्षण के मुताबिक, कोई ६६ फीसदी अमरीकी नागरिकों को लगता है कि देश में सम्पदा का बंटवारा असमान है.

साफ़ है कि इस आंदोलन ने जो सवाल और मुद्दे उठाए हैं, उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है. इसके कारण राजनीतिक नेतृत्व से लेकर कारपोरेट मीडिया तक को इसका नोटिस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

यह सही है कि इस आंदोलन में वैचारिक, राजनीतिक और सांगठनिक तौर पर कई अंतर्विरोध, कमजोरियां और समस्याएं हैं. इसकी एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसका कोई नेता नहीं है और न ही इसका कोई मांगपत्र है. यह भी कि इस आंदोलन के प्रति मौखिक समर्थन के बावजूद संगठित राजनीतिक-सामाजिक समूह जैसे ट्रेड यूनियनें अभी दूरी बनाए हुए हैं.

लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति सवाल उठाने के बावजूद उसे पूरी तरह से चुनौती देने खासकर उसका ठोस राजनीतिक विकल्प पेश करने से बच रहा है. इस कारण इस आंदोलन के मौजूदा व्यवस्था और खासकर अगले राष्ट्रपति चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा इस्तेमाल कर लिए जाने की आशंका भी बनी हुई है.

लेकिन इस आंदोलन में संभावनाएं भी बहुत हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आंदोलन ने एक फीसदी बनाम ९९ फीसदी की बहस शुरू कर दी है. सवाल उठ रहा है कि एक ओर एक फीसदी सुपर अमीरों की धन-सम्पदा में रिकार्डतोड़ बढोत्तरी हो रही है लेकिन दूसरी ओर, बाकी ९९ फीसदी लोगों की आर्थिक-सामाजिक हालत बद से बदतर होती जा रही है.

जाने-माने अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ के मुताबिक, ‘अमेरिका में सबसे अधिक अमीर एक फीसदी इलीट देश की कुल सम्पदा का ४० फीसदी नियंत्रित करते हैं.’ उनके अनुसार, इसके कारण अमेरिकी राजनीतिक-आर्थिक तंत्र ‘एक फीसदी की, एक फीसदी द्वारा और एक फीसदी के लिए’ की व्यवस्था बन गया है.

आश्चर्य नहीं कि अमेरिका में अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी और गहरी हुई है. इसका अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि देश की कुल आय में से एक चौथाई आय सुपर अमीर हड़प लेते हैं और सबसे सर्वाधिक अमीर दस फीसदी इलीट कुल राष्ट्रीय आय के ५० फीसदी पर कब्ज़ा कर लेते हैं.

नतीजा यह कि एक फीसदी सुपर अमीरों की कुल वित्तीय संपत्ति देश के ८० फीसदी आम अमेरिकियों की कुल वित्तीय संपत्ति के चार गुने से अधिक है. यही नहीं, फ़ोर्ब्स की सूची में शामिल सबसे अमीर ४०० अमेरिकियों की कुल संपत्ति देश के ५० फीसदी आम लोगों की कुल संपत्ति के बराबर है.

लेकिन मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि एक फीसदी अमीर और अमीर हो रहे हैं बल्कि लोगों के गुस्से का बड़ा कारण यह है कि यह उनकी कीमत पर हो रहा है. उदाहरण के लिए, जहाँ एक फीसदी सुपर अमीरों का देश की कुल ४० फीसदी सम्पदा पर कब्ज़ा है, वहीँ ९० फीसदी लोगों पर कुल कर्ज के ७३ फीसदी का बोझ है.

आश्चर्य नहीं कि २००७-०८ में हाऊसिंग बूम के बुलबुले के फूटने के बाद लाखों अमेरिकी नागरिकों को अपने गिरवी पर रखे घर गंवाने पड़े हैं. वित्तीय संकट और मंदी के कारण लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं, बेरोजगारी असहनीय हो गई है और भारी कर्ज लेकर उच्च शिक्षा हासिल करनेवाले लाखों नौजवानों के सामने अनिश्चित भविष्य है.

हालत यह है कि देश में पिछले दो-ढाई दशकों में जब अमीरों की संपत्ति दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही थी, उस दौरान आम लोगों की वास्तविक आय में कोई वृद्धि नहीं हुई है. तथ्य यह है कि अमेरिका में १९५० से १९७० के बीच आय के मामले में निचले ९० फीसदी लोगों की हर डालर की कमाई पर सबसे अमीर एक फीसदी लोगों के सौंवें हिस्से ने १६८ डालर की कमाई की लेकिन १९९० से २००२ के बीच यह निचले ९० प्रतिशत की प्रति डालर की कमाई पर बढ़कर १८००० डालर हो गया.

लेकिन यह किसी दैवीय संयोग से नहीं हुआ है. इसकी वजह वे नव उदारवादी आर्थिक नीतियां हैं जो ७० के दशक के आखिरी वर्षों में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की अगुवाई में बेरहमी से लागू की गईं.

यह दौर निजीकरण और वि-नियमन (डी-रेगुलेशन) का था जिसमें एक तरह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह से आवारा वित्तीय पूंजी और उसके वाल स्ट्रीट में बैठे नियंताओं के हाथों में सौंप दी गई. राज्य और राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका इस पूंजी की सेवा और चाकरी तक सीमित रह गई. लेकिन इस आवारा वित्तीय पूंजी को सिर्फ और सिर्फ मुनाफे, और अधिक मुनाफे, उससे अधिक मुनाफे की चिंता थी.

इस दौर में वाल स्ट्रीट का नारा और ध्येय वाक्य ‘लालच अच्छी चीज है’ (ग्रीड इज गुड) बन गया. नतीजा, वाल स्ट्रीट में मुनाफे की हवस ऐसी बढ़ती चली गई कि पैसा से पैसा बनाने की होड़ शुरू हो गई. वास्तविक उत्पादन और अर्थतंत्र पीछे चला गया और आवारा वित्तीय पूंजी की अगुवाई में सट्टेबाजी सबसे प्रमुख आर्थिक गतिविधि हो गई.

..कल भी जारी...

('जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर  29 अक्तूबर पर प्रकाशित आलेख की पहली किस्त)