शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

राष्ट्रीय हितों का सौदा करके सरकार को याद आई राष्ट्रीय संपत्ति की

आनंद प्रधान

कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस को लेकर दोनों अंबानी भाइयों मुकेश अंबानी की रिलायंस इंड्रस्ट्रीज ( आरआईएल) और अनिल अंबानी की रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेस ( आरएनआरएल) के बीच छिडा़ कॉरपोरेट युद्ध दिन पर दिन गहराता और तीखा होता जा रहा है। इस विवाद का दायरा फैलता हुआ संसद से सड़क तक पहुंच चुका है। यहां तक कि इस विवाद के लपेटे में पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और अब मनमोहन सिंह सरकार भी आ गई है। इस विवाद का फैसला अब सुप्रीम कोर्ट को करना है, जहां 1 सितंबर को सुनवाई तय है। ध्यान रहे कि इससे पहले मुंबई हाई कोर्ट ने इस विवाद में छोटे भाई अनिल अंबानी के हक में फैसला सुनाया था, जिसे मुकेश अंबानी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

दूसरी ओर, लंबी नींद से जागने के बाद इस विवाद को दूर खडे़ देऱ रही मनमोहन सिंह सरकार भी अब मैदाने-जंग में कूद पड़ी है। इस पूरे विवाद में अनिल अंबानी की ओर से लगाए गए पक्षपात के आरोपों को झेल रहे पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने संसद में और उससे बाहर भी ऐलान किया है कि कृष्णा-गोदावरी ( केजी) बेसिन की गैस दोनों भाइयों की निजी संपत्ति नहीं बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति है। उन्होंने यह भी सफाई दी है कि इस विवाद में सरकार दोनों भाइयों में से किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं कर रही है। लेकिन सरकार अपने हितों की रक्षा के लिए कटिबद्ध है।

कहना पड़ेगा कि देर से ही सही, यूपीए सरकार को यह एहसास हुआ है कि केजी बेसिन की गैस राष्ट्रीय संपत्ति है। अन्यथा पिछले कुछ महीनों से सरकार हाथ पर हाथ धरे इंतजार करती रही कि दोनों भाइयों के बीच का विवाद आपसी सहमति से सुलझ जाए। लेकिन जब दोनों भाइयों के बीच विवाद बढ़ता हुआ इस स्थिति तक पहुंच गया कि उसकी गर्मी से सरकार भी नहीं बच। पाई तो मजबूरी में पेट्रोलियम मंत्री को यह कहने का कष्ट उठाना पड़ा कि केजी बेसिन की गैस राष्ट्रीय संपत्ति है।

सच यह है कि अब तक सरकार का रवैया इसके ठीक उलट था। पिछले चार बरसों से सरकार का रवैया यह था कि यह विवाद दो भाइयों के बीच का आपसी विवाद है, जिससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन जब मुंबई हाई कोर्ट ने अनिल अंबानी के पक्ष में फैसला दे दिया तो सरकार की नींद खुली। इसके पीछे भी वजह सरकार के हितों की रक्षा नहीं, बल्कि इस विवाद में एक पक्ष- मुकेश अंबानी के हितों की रक्षा करना था। इस मामले में अनिल अंबानी के आरोपों में काफी हद तक दम है कि गैस को लेकर छिडे़ विवाद में यूपीए सरकार, खासकर पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा मुकेश का पक्ष ले रहे हैं।

असल में, यह कॉरपोरेट युद्ध इतने स्तरों पर लडा़ जा रहा है कि उसकी तमाम परतों को समझे बिना यह तय कर पाना मुश्किल है कि इस विवाद में किसका पक्ष ज्यादा न्यायसंगत है? इसके लिए इस पूरे विवाद को समझना बहुत जरूरी है। प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2000 में नई एक्सप्लोरेशन पॉलिसी के तहत आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी बेसिन के डी-6 ब्लॉक में मिले गैस भंडारों से गैस निकालने का ठेका रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) को मिलने से हुई। लेकिन 2005 में दोनों अंबानी भाइयों के बीच बंटवारे के बाद एक आपसी समझौते के तहत यह तय हुआ था कि केजी बेसिन से जो गैस निकाली जाएगी, उसमें से प्रतिदिन 28 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर्स गैस ( एमएमएससीएमडी) अनिल अंबानी की रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेस लिमिटेड ( आरएनआरएल) को दी जाएगी। इसी तरह एनटीपीसी को प्रतिदिन 12 एमएमएससीएमडी गैस की आपूर्ति की जाएगी। इसके बाद बची गैस में से 60:40 के अनुपात में 60 फीसदी गैस मुकेश की आरआईएल और 40 फीसदी अनिल की आरएनआऱएल को दी जाएगी। इस गैस की कीमत 2।34 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमबीटीयू) तय की गई थी।

यह कीमत इस आधार पर तय की गई थी कि जून 2004 में आरआईएल ने एक अंतर्राष्ट्रीय निविदा के तहत एनटीपीसी के साथ इसी दर पर गैस मुहैया कराने का करार किया था। इस करार के तहत आरआईएल ने वायदा किया था कि वह इस दर पर एनटीपीसी को अगले 17 बरसों तक 12 एमएमएससीएमडी गैस उपलब्ध कराएगी। लेकिन बाद में आरआईएल ने गैस की कीमत बढ़ाने की मांग की। इसके लिए उसने तर्क दिया कि तेल की खोज और उसे निकालने के काम में आने वाली लागत बढ़ गई है। उसने गैस की कीमत बढ़ाने की मांग करते हुए एनटीपीसी के साथ गैस की खरीद-बिक्री समझौता करने को लेकर टालमटोल करना शुरू कर दिया। एनटीपीसी ने पहले कई स्तरों पर मामले को सुलझाने की कोशिश की, जिसे खुद यूपीए सरकार के ऊर्जा मंत्री ने स्वीकार किया है।

लेकिन जब आरआईएल ने समझौते पर दस्तखत नहीं किए तो मजबूर होकर एनटीपीसी को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। वह मामला अभी भी मुंबई हाईकोर्ट के विचाराधीन है। उस समय यूपीए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनटीपीसी का साथ देने और सार्वजनिक हितों के हक में काम करने के बजाय आरआईएल के दबाव में गैस की कीमतों को तय करने का पूरा मामला पहले केंद्र सरकार के सचिवों की एक उच्चस्तरीय समिति को और बाद में प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति को सौंप दिया। इस समिति ने 12 सितंबर 2007 को मनमाने तरीके से आरआईएल के हक में गैस की कीमतें 4।2 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू तय कर दी।

हैरत की बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ओएनजीसी एनटीपीसी को 1।8 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू की दर से गैस आपूर्ति कर रही है। इस तरह सरकार ने एक झटके में गैस की कीमतें लगभग साढ़े तीन गुना बढ़ा दीं। लेकिन दूसरी ओर, अनिल अंबानी की आरएनआरएल ने मुकेश पर यह दबाव बनाए रखा कि उनके दादरी बिजली संयंत्र के लिए 2005 में हुए पारिवारिक समझौते के तहत तय कीमतों पर ही गैस दी जाए। आरएनआरएल ने इस मुद्दे पर मुंबई हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने हाल ही में अनिल के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके बाद से विवाद समाप्त होने के बजाय और बढ़ गया है।

अब यूपीए सरकार कह रही है कि केजी बेसिन की गैस राष्ट्रीय संपत्ति है। लेकिन सवाल यह है कि यह बात उसे तब क्यों याद नहीं आई, जब आरआईएल एनटीपीसी के साथ समझौते के बावजूद निर्धारित दरों पर गैस देने से मुकर गई। निश्चय ही इससे एनटीपीसी के 2700 मेगावॉट के कवास और गंधार बिजली संयंत्रों की प्रगति पर असर पड़ा है। अनिल अंबानी के इन आरोपों में भी दम है कि गैस की बढ़ी कीमतों के कारण एनटीपीसी को 20-30 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ सकता है। मुकेश के साथ जारी झगड़े के कारण ही सही अनिल ने केजी बेसिन गैस की कीमतों को लेकर कई ऐसे सवाल उठाए हैं, जो अगर यह कॉरपोरेट युद्ध नहीं छिड़ता तो गोपनीय फाइलों में बंद रह जाते। उस स्थिति में शायद ही मुरली देवड़ा को याद आता कि केजी बेसिन की गैस राष्ट्रीय संपत्ति है।

लेकिन सवाल यह भी है कि अनिल अंबानी को ये बातें अभी ही क्यों याद आ रही हैं? जब उनके अपने व्यावसायिक हितों पर चोट पहुंची तो उन्हें सार्वजनिक हितों की भी चिंता सताने लगी। दूसरी ओर, मुकेश अंबानी सरकार की आड़ लेकर इस समय राष्ट्रीय हितों के सबसे बड़े रक्षक बन गए हैं। सच यह है कि इस पूरे मामले में चाहे अनिल हों या मुकेश या फिर यूपीए सरकार, किसी को भी राष्ट्रीय हितों की कोई परवाह नहीं है। इस पूरे प्रकरण से यह सचाई भी खुलकर सामने आ गई है कि गैस और उस जैसे अन्य कीमती खनिजों के प्रबंधन में सरकार किस कदर नाकाम साबित हुई है।

इसमें कोई दो-राय नहीं है कि संविधान की धारा 297 के तहत केजी बेसिन की गैस राष्ट्रीय संपत्ति है और राष्ट्रीय हित इसी में है कि इसे दो भाइयों की निजी संपत्ति न बनने दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि यह मोटी बात सरकार को इतनी देर से क्यों समझ में आई? यही नहीं, इस राष्ट्रीय संपत्ति को सार्वजनिक हितों को ताक पर रखते हुए जिस तरह से इस या उस औद्योगिक घराने को अरबों रुपयों का मुनाफा कमाने का माध्यम बना दिया गया है, वह इस कॉरपोरेट युद्ध के कारण खुलकर पूरे देश के सामने आ गया है। अगर सरकार को राष्ट्रीय संपत्ति की इतनी ही चिंता है तो वह केजी बेसिन को अधिग्रहीत क्यों नहीं कर लेती है?

2 टिप्‍पणियां:

Suresh Chiplunkar ने कहा…

बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं भाई, करोड़ों-अरबों का खेल है ये… देवड़ा हों या प्रमोद महाजन सभी अम्बानी बन्धुओं की जेब में रखे हुए हैं…। स्विस बैंक में पैसा सड़ रहा है हमारा और हम मूर्खों की तरह इधर की-बोर्ड ठोक रहे हैं…

Suman ने कहा…

good