सोमवार, मई 11, 2009

मुस्लिम वोटों के लिए तीन बिल्लियों की लड़ाई में फायदा उठाने की कोशिश में बंदर

आनंद प्रधान

नई दिल्ली, 10 मई. उत्तर प्रदेश में पांचवे और आखिरी चरण में रूहेलखंड और तराई इलाके की 14 सीटों के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच तीन बिल्लियों की तरह ज़बरदस्त घमासान मचा हुआ है। यह राजनीतिक घमासान सिर्फ 14 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए ही नहीं बल्कि सूबे की राजनीति में निर्णायक मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की लड़ाई का नतीजा है। इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 18 फीसदी से लेकर 49 फीसदी तक है। रूहेलखंड इलाके की रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल जैसी सीटों पर मुस्लिम समुदाय के रुझान से सूबे की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय होगी।



यही कारण है कि सपा और उसके नेता मुलायम सिंह के लिए रूहेलखंड की जंग राजनीतिक जीवन मरण की लड़ाई बन गई है। उनकी इस लड़ाई को इतना कठिन बनाने का श्रेय बसपा, कांग्रेस या भाजपा-रालोद जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियो को नहीं बल्कि उनके सबसे पुराने और नए दोस्तों को जाता है। अपने सबसे पुराने साथियों में से एक और पार्टी का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले आज़म ख़ान की अपेक्षाकृत नए मगर पिछले कुछ वर्षों में सबसे करीब हो गए अमर सिंह के साथ छिड़ी खुली जंग ने पार्टी को लहूलुहान कर दिया है। दूसरी ओर नए राजनीतिक साथी कल्याण सिंह के राजनीतिक अतीत के बोझ ने मुलायम सिंह को ना सिर्फ कमज़ोर और हल्का कर दिया है बल्कि उनका ध्यान भी भंग कर दिया है। घर के अंदर मची रार को सुलझाने में नाकाम मुलायम सिंह की स्थिति उस सेनापति की तरह हो गई है जिसकी ना सिर्फ सेना अंदर से बंट गयी है बल्कि जो खुद दुविधा में फंस गया है।


इस दुविधा और घर में छिड़ी जंग का असर मुलायम के चेहरे साफ झलकती लाचारी में दिख रहा है। इसका असर मुलायम के साथ साथ सपा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ा है। सपा के अंदर अमर सिंह बनाम आज़म ख़ान की खुली लड़ाई के कारण पार्टी कितनी कमज़ोर हुई है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस इलाके में सपा के चार प्रमुख मुस्लिम नेता--- सलीम शेरवानी, शाहिद सिद्दीकी, शफ़ीकुर्ररहमान बर्क और इस्लाम साबिर अंसारी पार्टी छोड़कर कांग्रेस और बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। ये सभी मुस्लिम नेता अपनी अपनी सीटों पर सपा की राह रोककर खड़े हो गए हैं। कांग्रेस के टिकट पर सलीम शेरवानी बदायूं में और बसपा के टिकट पर शाहिद सिद्दीकी बिजनौर, शफ़ीकुर्ररहमान बर्क संभल और इस्लाम साबिर अंसारी बरेली में सपा के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।


रूहेलखंड में मुलायम सिंह के लिए उनके नए राजनीतिक साथी कल्याण सिंह भी एक बड़ा बोझ साबित हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय में इस दोस्ती को लेकर कितनी बेचैनी और गुस्सा है, इसका अंदाज़ा अब मुलायम सिंह को भी हो रहा है। एटा में जिस तरह से हज़ारों मुस्लिम मतदाताओं ने कल्याण सिंह को वोट ना देकर मतदान का बहिष्कार किया, उससे साफ हो गया कि पूर्वांचल से लेकर मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बीच मुलायम कल्याण दोस्ती को लेकर पैदा हुई नाराज़गी और बेचैनी इस बार सपा को कितनी भारी पड़ने वाली है। हालांकि सपा ने 14 में से 5 सीटें मुस्लिम समुदाय को देकर स्थिति संभालने की कोशिश की है लेकिन पिछले कुछ दिनों में आज़म ख़ान के खुलकर बगावती तेवर अपना लेने और कल्याण सिंह को निशाने पर लेने के कारण सपा का खेल बिगड़ता दिख रहा है।


कांग्रेस और बसपा इसका फायदा उठाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय के 6 और बसपा ने 5 प्रत्याशियों को टिकट देकर सपा के किले में सेंध लगाने की कोशिश की है। कांग्रेस और बसपा का रास्ता इसलिए भी आसान हो गया है क्योंकि अजीत सिंह ने भाजपा के साथ हाथ मिला लिया है। 2004 में इन 14 सीटों में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट ( शाहजहांपुर) और बसपा को कोई सीट नहीं मिली थी, लेकिन इसबार सपा के कमज़ोर पड़ने के कारण कांग्रेस कम से कम 4 सीटों- रामपुर ( बेगम नूरबानो), मुरादाबाद ( मो. अज़हरुद्दीन) , बदायूं ( सलीम शेरवानी) और धारूहेड़ा ( जितिन प्रसाद) पर मुख्य लड़ाई में आ गई है। कई और सीटों पर भी कांग्रेस को पिछली बार से अधिक वोट मिलेंगे।



इसी तरह, बसपा भी बिजनौर ( शाहिद सिद्दकी), सहारनपुर ( जगदीश सिंह राणा), संभल (शफ़ीकुर्ररहमान बर्क), अमरोहा ( मौदूद मदनी), बदायूं ( डीपी यादव) , आंवला ( कुंवर सर्वराज सिंह) , बरेली (इस्लाम साबिर अंसारी) , खीरी ( इलियास आज़मी) शाहजहांपुर ( सुनीता सिंह) , धारूहेड़ा ( राजेश वर्मा) और नगीना ( रामकिशन) में कड़ा मुकाबला कर रही है। बसपा इसबार अपना खाता खोल सकती है।


लेकिन इस इलाके में सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में खींचने की इस बिल्ली लड़ाई में भाजपा-रालोद गठबंधन बंदर की तरह फायदा उठाने की कोसिश कर रहा है। पिछली बार भाजपा को दो और रालोद को एक सीट मिली थी। इसबार यह गठबंधन 14 में से 9 सीटों पर अपने लिए अच्छी संभावना देख रहा है। वोटों के बिखराव के कारण भाजपा रालोद गठबंधन को पिछलीबार की तुलना में इस बार कुछ सीटों का फायदा हो सकता है। उस स्थिति में जब एक-एक सीट के लिए घमासान मचा हुआ है, भाजपा-रालोद को यह एक बोनस की तरह दिख रहा है। यह बोनस राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए और यूपीए दोनों गठबंधन के बीच कांटे की लड़ाई में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

1 टिप्पणी:

हृदेश सिंह ने कहा…

सर आपने एकदम सही लिखा हैं.९० के दशक मैं पुरे देश मैं बिखरे समाजवादिओं को एकजुट करने वाले सपा मुखिया की १५ वी लोकसभा हालत ऐसी हों जायेगी.सोचा न था.राजनीती मैं दूरदर्शिता अहम् होती हैं.यहाँ पर इसी का आभाव नजर आरहा हैं. दरअसल दोस्ती के मामले मैं मुलायम सिंह की एक खासियत ये भी की वे दोस्ती दिमाग से नहीं दिल से करते हैं.येही वजह हे की वे इस दोस्ती के चलते आज़म खान से खान से भी खफा हों जाते हैं.आज़म खान समाजवादी पार्टी को बनाने वालों में एक थे.इसलिए उनको दर्द होना लाज़मी हैं.ये बात भी सही हैं आज़म खान युपी में आज भी मुस्लिमों के प्रिये नेता हैं. ....एक बात और विवादित ढांचे का गिरना... देश के मुसलमान आजभी अपने जेहन से निकल नहीं पाए हैं.ऐसे में कभी मोलाना मुलायम कहे जाने वाले सपा मुखिया को जरुरत हैं की हैं वे राजनीती को राजनीती की ही तरह लें...