सोमवार, नवंबर 12, 2012

किसकी दीपावली?

दीपावली बाजार का, बाजार के लिए और बाजार के द्वारा त्यौहार बनती जा रही है

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में बाजार की पकड़ से बच पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा हो गया है. पर्व-त्यौहार भी इसके अपवाद नहीं हैं. हालाँकि किसी भी समाज में पर्व-त्यौहार उसकी संस्कृति, उत्सवधर्मिता और सामाजिकता की पहचान होते हैं, वे लोगों की सामूहिकता, आपसी मेलजोल और खुशी बांटने के मौके होते हैं.
लेकिन ठीक इन्हीं कारणों से वे बाजार को भी लुभाते हैं. बाजार को इसमें खुशियों की मार्केटिंग और खरीदने-बेचने का मौका दिखाई देता है. खासकर एक ऐसे दौर में जब वास्तविक खुशी दुर्लभ होती जा रही है, बाजार उपभोक्ता वस्तुओं को उत्सव और खुशियों का पर्याय बनाके बेचने के मौके की तरह इस्तेमाल करता है.
इसके लिए बाजार पारंपरिक त्यौहारों के नए अर्थ गढ़ता है, उनकी नए सिरे से पैकेजिंग करता है और उन्हें बाजार और वस्तुओं से जोड़ देता है. दीपावली उन त्यौहारों में है जिसे बाजार की सबसे पहले नजर लगी. विडम्बना देखिये कि एक ऐसा त्यौहार जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का उत्सव है, वह आज जैसे सामुदायिक सामूहिकता, साझेदारी और संतोष पर व्यक्तिगत उपभोग, लालच और तड़क-भड़क की जीत का उत्सव बन गया है.

दीपावली आते ही बाजार जिस तरह से अति सक्रिय हो जाता है और त्यौहार को महंगे उपभोक्ता सामानों की खरीद और महंगे उपहारों के लेन-देन तक में सीमित कर देता है, उसमें त्यौहार की वास्तविक भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं और उसकी जगह गैर जरूरी उपभोग, फिजूलखर्ची और दिखावा हावी हो जाता है.

यह ठीक है कि दीपावली का एक पहलू लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा रहा है. लेकिन इसमें वह लक्ष्मी नहीं थीं जो आज के बाजार की असीमित उपभोग की आराध्य देवी हैं बल्कि यह लक्ष्मी दरिद्रता से मुक्ति और घर में इतने धन-धान्य की इच्छा से जुडी थीं जिसमें ‘साईँ इतना दीजिए जिसमें कुटुंब समय, खुद भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाए.’
मुझे याद है, छुटपन में हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक अति पिछड़े इलाके के एक गाँव में दीपावली की रात के बाद भोर में घर के हर कमरे में सूप पीटते हर गाते जाते थे-“अइसर-पईसर दरिदर निकसे, लछमी घर वास हो.” मतलब यह कि लक्ष्मी की प्रार्थना वहीं तक थी, जहाँ तक घर से दरिद्रता को निकालने की आस थी.
लेकिन आज दीपावली का मतलब सिर्फ और सिर्फ लक्ष्मी और बाजार की उपासना तक सीमित रह गया है. सच पूछिए तो बाजार ने दीपावली का पूरी तरह से टेक-ओवर कर लिया है और इसे कारोबार का उत्सव बना दिया है. यह बाजार की, बाजार के लिए और बाजार के द्वारा त्यौहार बनटी जा रही है.

आज दीपावली के बाजार पर हजारों करोड़ रूपये का कारोबार दांव पर लगा रहता है. बड़ी देशी-विदेशी कम्पनियाँ खासकर उपभोक्ता सामान/आटोमोबाइल आदि बनानेवाली और रीयल इस्टेट कम्पनियाँ छह महीने पहले से तैयारी करने लगती हैं.

इसकी वजह यह है कि दशहरे से दीपावली के बीच के महीने भर में जितनी खरीददारी होती है, वह साल के कई महीनों की कुल खरीददारी से अधिक होती है. हैरानी की बात नहीं है कि इस दौरान अखबारों/टी.वी चैनलों पर कार से लेकर टी.वी तक भांति-भांति के विज्ञापनों और पुल-आउट की भरमार लग जाती है.

यही नहीं, मीडिया और मार्केटिंग के जरिये कम्पनियाँ ऐसा माहौल बनाती हैं जिसमें दीपावली के मौके पर उपहार लेना-देना एक अनिवार्य शगुन सा बना दिया जाता है. इस लेन-देन को संबंधों की निकटता के पर्याय की तरह देखा जाने लगा है.
आपने दीपावली पर अपने घर के अंदर और घर से बाहर अपने सगे संबंधियों-करीबियों को कितना महंगा उपहार दिया, इससे संबंधों की व्याख्या की जाने लगती है. एक तरह से दीपावली के मौके पर दिए जानेवाले उपहारों की कीमत आपसी संबंधों और उनकी निकटता के पैमाने बना दिए गए हैं. इस तरह संबंधों में भावनाओं की जगह वस्तुओं ने ले ली है. त्यौहार की सात्विक खुशी से ज्यादा महत्वपूर्ण उपहार की खुशी हो गई है.
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. दीपावली पर उपहार देने के इस बाजारी कर्मकांड को कारोबारी समुदाय ताकतवर-प्रभावशाली खासकर सत्ता में बैठे नेताओं-अफसरों को खुश करने और बदले में उनकी कृपादृष्टि हासिल करने के मौके की तरह भी इस्तेमाल करता है. कई मामलों में यह उपहार की आड़ में घूस देने या पी.आर करने का भी मौका है.

आश्चर्य नहीं कि दीपावली के मौके पर दिए जानेवाले कारपोरेट गिफ्ट का बाजार भी बहुत तेजी से बढ़ा है. उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम के मुताबिक, वर्ष २०१० में देश के कारपोरेट समूहों ने लगभग ३२०० करोड़ रूपये के उपहार दिए. इस साल मंदी के कारण इसके घटकर २००० करोड़ रूपये रहने की उम्मीद है. इस मायने में दीपावली वास्तव में सबसे लोकप्रिय कारपोरेट त्यौहार बन चुकी है.

लेकिन दूसरी ओर, आसमान छूती महंगाई, घटती आय, दिन पर दिन बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा से आमलोगों में दीपावली मनाने को लेकर वह उत्साह नहीं रह गया है जो उसकी सामूहिकता की पहचान रही है. आज बाजार की ओर से पेश की जा रही आदर्श दीपावली गरीबों की तो छोडिये, बहुतेरे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए उनका दीवाला निकालने के लिए काफी है.
अलबत्ता, तीन-तेरह और तमाम तिकडमों से लेकर भ्रष्ट तौर-तरीकों से अथाह पैसा कमानेवाले नव दौलतिया वर्गों के लिए दीपावली अपनी धन-सम्पदा दिखाने का एक मौका बन गई है. अगर आप अपने आसपास गौर से देखें तो पायेंगे कि महंगे उपहारों से लेकर धूम-धड़ाके से भरी दीपावली मनानेवालों में ज्यादातर यही नव दौलतिया वर्ग है क्योंकि लक्ष्मी सबसे ज्यादा उसी पर मेहरबान हैं.
सच पूछिए तो लक्ष्मी आज उनकी कैद में हैं. यह विडम्बना है कि देश में एक ओर दरिद्रता बढ़ रही है, उस दरिद्रता के साथ अशिक्षा-बीमारी-भूखमरी और जल-जंगल-जमीन-खनिज की लूट का अँधेरा बढ़ रहा है और दूसरी ओर, एंटीला जैसे धन-दौलत के नए महल भी जगमगा रहे हैं.
अफसोस यह कि आज के भारत में दीपावली अँधेरे पर प्रकाश की जीत का नहीं बल्कि दरिद्रता के अँधेरे के विस्तार और बढ़ती गहनता के बीच शाइनिंग इंडिया की जीत का त्यौहार बनता जा रहा है.

आप खुद सोचिये कि इस दीपावली में कितने भारतीयों की खुशी शामिल है?

और इन भारतीयों को देने के लिए भारतीय राज्य के पास क्या है?


('शुक्रवार' के 15 नवम्बर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)                                 

शनिवार, नवंबर 10, 2012

न्यूज मीडिया का अंडरवर्ल्ड और उसके शार्प शूटर्स

खबरों की खरीद-फरोख्त का धंधा अब पूरी तरह से संस्थाबद्ध हो चुका है और ब्लैकमेल उसका  हथियार है

न्यूज मीडिया के अंदर लगातार मजबूत होते अंडरवर्ल्ड और इसके साथ बढ़ते नैतिक-आपराधिक विचलन और फिसलन के बीच जैसे यह होना ही था. कोयला आवंटन घोटाला मामले में आरोपों में घिरी जिंदल स्टील एंड पावर कंपनी के मालिक और कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल ने जी न्यूज समूह पर ब्लैकमेलिंग और डरा-धमकाकर पैसा वसूलने का आरोप लगाया है.
जिंदल ने सबूत के बतौर जी न्यूज समूह के दो संपादकों और बिजनेस हेड- सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया का स्टिंग पेश किया है जिसमें वे दोनों जिंदल समूह के खिलाफ चल रही खबरों को रोकने के लिए १०० करोड़ रूपये का बिजनेस मांगते हुए नजर आते हैं.
लेकिन इस खुलासे के बाद से न्यूज मीडिया खासकर चैनलों में ऐसी हैरानी और घबराहट दिखाई पड़ रही है, जैसे अचानक कोई दुर्घटना हो गई हो. आनन-फानन में बचाव की कोशिशें शुरू हो गईं.

ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोशियेशन (बी.ई.ए) ने न सिर्फ इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यी समिति गठित कर दी बल्कि जाँच-पड़ताल के बाद जी न्यूज के एडिटर/बिजनेस हेड और बी.ई.ए के कोषाध्यक्ष सुधीर चौधरी को संगठन से बाहर कर दिया. मजे की बात यह है कि चौधरी की बी.ई.ए की सदस्यता खत्म करने का फैसला सदस्यों के बीच गोपनीय वोट के जरिये किया गया.

खबर यह भी है कि न्यूज चैनलों के मालिकों/प्रबंधकों के संगठन- न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोशियेशन (एन.बी.ए) की स्व-नियमन व्यवस्था- न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैण्डर्ड आथरिटी भी इस मामले की जांच कर रही है. लेकिन सारा जोर जी-जिंदल मामले से भडकी आग पर तात्कालिक तौर पर काबू पाने और नुकसान कम करने पर है.
इसके साथ ही दूरगामी नुकसान से बचाव के लिए इस पूरे प्रकरण को एक अपवाद, नैतिक भटकाव और एक खास न्यूज चैनल और उसके दो संपादकों के विचलन के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है. गोया यह विचलन और भटकाव सिर्फ उस चैनल और उसके संपादकों तक सीमित मामला है.
लेकिन यह चैनलों के मालिक और संपादक भी जानते हैं कि यह पूरा सच नहीं है. अगर मामला सिर्फ एक चैनल और उसके दो संपादकों के नैतिक विचलन और आपराधिक व्यवहार का होता तो चैनलों में इतनी घबराहट और बेचैनी नहीं दिखाई देती. उससे निपटना बहुत आसान होता.

लेकिन मुश्किल यह है कि ख़बरों की खरीद-बिक्री के इस हम्माम में ज्यादातर चैनल और अखबार नंगे हैं. पेड न्यूज के पहले से जारी शोर-शराबे के बीच अब जी-जिंदल प्रकरण के खुलासे से न्यूज चैनलों को यह डर सताने लगा है कि कल उनका नंबर भी सकता है.

दूसरे, इस प्रकरण ने न्यूज मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों के उस ‘नैतिक प्रभामंडल’ पर और भी कालिख पोत दी है जो पहले से ही दाग-धब्बों से चमक खो रहा है और जिसके बिना उनका धंधा नहीं चल सकता है.  

असल में, लोकतंत्र के चौथे खम्भे को लगी बीमारी कहीं ज्यादा गहरी और व्यापक है. अगर शेक्सपीयर के ‘हैमलेट’ का हवाले से कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में भी कुछ सड़ सा गया है.’ इस अर्थ में जी न्यूज-जिंदल प्रकरण न सिर्फ इस सड़न और लाइलाज होती बीमारी के एक और लक्षण के रूप में सामने आया है बल्कि उसके और गंभीर होते जाने की पुष्टि करता है.
इससे पता चलता है कि न्यूज मीडिया में खबरों की खरीद-बिक्री का धंधा किस हद और स्तर तक पहुँच चुका है. जी न्यूज-जिंदल प्रकरण में नया यह है कि कारपोरेट मीडिया में खबरों की खरीद-बिक्री के धंधे में न सिर्फ दाँव बहुत ऊँचे होते जा रहे हैं बल्कि उसे एक सांस्थानिक रूप भी दिया जा रहा है और उसमें संपादक और विज्ञापन/सेल्स मैनेजर/बिजनेस हेड के बीच कोई फर्क नहीं रह गया है.
लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? साफ़ है कि न्यूज मीडिया में आ रही बड़ी कारपोरेट पूंजी को न सिर्फ अधिक से अधिक मुनाफा चाहिए बल्कि वह न्यूज मीडिया के प्रभाव का इस्तेमाल अपने दूसरे कारपोरेट/निजी हितों को आगे बढ़ाने के लिए भी करना चाहती है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों में हाल के वर्षों में कारपोरेट के अलावा और भी कई तरह की पूंजी आई है जिनमें नेताओं-अफसरों-व्यापारियों/कारोबारियों/ठेकेदारों/बिल्डरों के अलावा चिट फंड कम्पनियाँ की ओर से किया गया निवेश शामिल है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें ज्यादातर कालाधन है और जिसका मकसद चैनलों के आवरण में अपने दूसरे कानूनी-गैर कानूनी धंधों के लिए राजनीतिक और नौकरशाही का संरक्षण और प्रोत्साहन हासिल करना है.

सच पूछिए तो इन दोनों यानी कारपोरेट और आपराधिक पूंजी को मिलाकर न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों का अंडरवर्ल्ड बनता है जिसमें मालिक-संपादक खबरों के सौदागर बन गए हैं. यहाँ खबर समेत हर पत्रकारीय मूल्य और नैतिकता बिकाऊ है और जिसके पास भी पैसा है, वह उसे खरीद/दबा/बदल सकता है. चाहे वह भ्रष्टाचार के मामलों फंसी कोई कंपनी/नेता/अफसर हो या चुनाव लड़ रहा कोई माफिया डान.
हालत इतने बदतर हो चुके हैं कि ज्यादातर चैनलों और अखबारों में जहाँ से भी और जैसे भी पैसा आता हो और उसके लिए चाहे खबर बेचनी हो या पत्रकारीय मूल्यों-नैतिकता को ताक पर रखना हो या कोई नियम-कानून तोड़ना पड़े, इसकी कोई परवाह या शर्म नहीं रह गई है.
इस मायने में जी-जिंदल प्रकरण पेड न्यूज की परिघटना का ही स्वाभाविक विस्तार है और इसमें चौंकानेवाली कोई बात नहीं है और न ही यह कोई अचानक हुई दुर्घटना है.

जैसाकि वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ कहते रहे हैं कि बड़ी कारपोरेट पूंजी से संचालित न्यूज मीडिया ‘संरचनागत तौर पर झूठ बोलने के लिए बाध्य’ है. सच पूछिए तो न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड की मुनाफे की हवस और कारपोरेट और दूसरे निजी हितों को आगे बढ़ाने के दबाव ने संपादकों और पत्रकारों को भी हप्ता वसूलने वाले हिटमैन और शार्प शूटर्स में बदलना शुरू कर दिया है.

क्या नवीन जिंदल के ‘उल्टा स्टिंग’ आपरेशन में जी न्यूज के संपादक भी ऐसे ही हिटमैन और शार्प शूटर की तरह नजर नहीं आते हैं? याद रखिये, वे न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के हिटमैन और शार्प शूटर भर हैं, असली डान नहीं हैं.
लेकिन अंडरवर्ल्ड का खेल देखिये, डान के बारे में कोई बात नहीं हो रही है. क्या इसमें आपको ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ नहीं सुनाई दे रही है.
(''तहलका" के 15 नवम्बर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी : )            

सोमवार, नवंबर 05, 2012

इरोम शर्मिला संघर्ष का दूसरा नाम है, उन्हें सलाम कीजिये

लेकिन भारतीय लोकतंत्र बहरा क्यों बना हुआ है?

मणिपुर की राजधानी इम्फाल में इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल और पुलिस हिरासत के आज बारह साल पूरे हो गए. चालीस साल की इरोम पिछले १२ साल से पुलिस हिरासत में भूख हड़ताल पर हैं और उन्हें पुलिस हिरासत में ही जबरन नाक से खाना दिया जाता है. वे आज भी आमरण अनशन पर हैं.
वे अपनी इस मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं कि जनविरोधी काले कानून- सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून’ १९५८ (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट-अफ्स्पा) को मणिपुर से तुरंत हटाया जाए. वे आज देश में अनथक और समझौता-विहीन संघर्ष, बलिदान और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम बन गईं हैं.
लेकिन शर्मनाक अफसोस यह कि दुनिया के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी है. बारह साल लंबे इस शांतिपूर्ण लेकिन अत्यंत पीडाजनक आंदोलन के बावजूद इस ‘महान लोकतंत्र’ की कुम्भकर्णी निद्रा टूटने का काम नहीं ले रही है. इस मामले में इरोम का संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के लिए परीक्षा बन गया है और यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि वह मणिपुर से लेकर कश्मीर तक इस परीक्षा में पिछले कई सालों से लगातार फेल हो रहा है.

इस तथ्य के बावजूद कि मणिपुर में यह केवल इरोम का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है बल्कि उनके संघर्ष में मणिपुर की अधिकांश महिलाओं और पुरुषों की आवाज़ शामिल हैं. इरोम इस अनूठे संघर्ष की प्रतीक भर हैं.

आखिर हम कैसे भूल सकते हैं कि वर्ष २००४ में जब असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर युवा थांगजाम मनोरमा की बलात्कार के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी. उस शर्मनाक घटना ने पूरे मणिपुर की आत्मा को झकझोर दिया था. लोगों खासकर महिलाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था.
उस गुस्से, पीड़ा और बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दर्जनों महिलाओं ने असम राइफल्स के इम्फाल स्थित कंगला फोर्ट मुख्यालय पर बिलकुल नंगे होकर यह कहते हुए प्रदर्शन किया था कि “असम राइफल्स हमारा बलात्कार करो.” यह एक ऐतिहासिक प्रदर्शन था जिसकी तस्वीरों ने अगले दिन पूरे देश को हिला कर रख दिया था.

इरोम भी ऐसे ही हालत में वर्ष २००० में आमरण अनशन पर बैठीं. उस साल असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर घाटी के मलोम कसबे में बस स्टैंड पर इंतज़ार कर रहे दस निर्दोष लोगों को भून डाला था जिसमें एक ६२ साल की महिला के अलावा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार जीतनेवाला १८ वर्षीय युवा सिनम चंद्रमणि भी शामिल था.
मलोम नरसंहार जैसे मणिपुर की घायल आत्मा पर मरणान्तक प्रहार था जिसने पूरे मणिपुर के साथ-साथ २८ वर्षीया इरोम शर्मिला चानू को भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया. उसके बाद की कहानी एक इरोम के जीवट भरे, अडिग और धैर्यपूर्ण संघर्ष का ऐसा जीवित इतिहास है जो हम अपनी आँखों के सामने बनता हुआ देख रहे हैं.
इरोम की लड़ाई मणिपुर में शांति बहाली की लड़ाई है. यह शांति बिना अफ्स्पा को हटाए, मानवाधिकारों का हनन रोके, लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों को बहाल किये और राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू किये संभव नहीं है.

मणिपुर में निर्दोषों का बहुत खून बह चुका है. इन खून के दागों से रंगा भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बहुत बदसूरत और भयावह दिखता है. इसके बावजूद भारतीय राज्य अपनी भूलों को सुधारने और मणिपुर में शांति बहाली को एक मौका देने को तैयार नहीं है तो मानना पड़ेगा कि इस लोकतंत्र में न मानवीय आत्मा है, न आत्मविश्वास और न ही साहस.

लेकिन इसके उलट इरोम की १२ साल लंबी भूख हड़ताल में लोकतांत्रिक संघर्षों के प्रति दृढ आस्था, उत्कट आत्मविश्वास, बेमिसाल साहस और एक बेहद मानवीय आत्मा की पीड़ा को देखा-समझा जा सकता है. सच पूछिए तो आज इरोम पूरे देश में लोगों के बुनियादी अधिकारों और हक-हुकूक की लड़ाई के लिए प्रेरणा बन गई हैं.
यही कारण है कि इरोम का संघर्ष अब सिर्फ मणिपुर का संघर्ष नहीं रह गया है और उनकी आवाज़ केवल मणिपुर की आवाज़ नहीं है. इस संघर्ष में देश के कोने-कोने में लड़ रहे लाखों गरीब, मेहनतकश, किसान, आदिवासी, दलित, छात्र-युवा और आमजन खुद को देखते और महसूस करते हैं.
पता नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रात में नींद कैसे आती होगी, जब देश की एक बेटी पिछले १२ साल से भूखी है? प्रधानमंत्री जी, क्या लोकतंत्र में लोगों की राय का कोई मतलब नहीं है? क्या भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्र राज्य इतना भुरभुरा और कमजोर है कि मणिपुर में अफ्स्पा हटाते ही वह ढह जाएगा?   

इस मौके पर मुझे पाश याद रहे हैं :                   
अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये

आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द

अश्लील हो

और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है

गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम

हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफा

लेकिन गर देश

आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है

गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे

कीमतों की बेशर्म हंसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

रविवार, नवंबर 04, 2012

भारत-चीन व्यापार की चिंताएं और संभावनाएं

प्रतियोगी और पूरक का सम्बन्ध है भारत-चीन के बीच 

भारत और चीन के बीच १९६२ के युद्ध के बाद पिछले ५० वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है. गंगा और यांग्त्सी नदियों में बहुत पानी बह चुका है. आज भारत और चीन एशिया की दो ऐसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं जिन्होंने पिछले दो दशकों में अपने विशाल घरेलू बाजार और आर्थिक उछाल के कारण पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है.
हैरानी की बात नहीं है कि युद्ध की कड़वी यादों, परस्पर अविश्वास और सीमा विवाद के बावजूद पिछले दो-ढाई दशकों में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार तेजी से बढ़ा है. सच यह है कि दोनों देशों के बीच सामान्य होते द्विपक्षीय संबंधों को पारिभाषित करनेवाली सबसे महत्वपूर्ण परिघटना आपसी व्यापार में वृद्धि है.
तथ्य खुद इसकी गवाही देते हैं. आज चीन, भारत का पहले नंबर का व्यापारिक साझीदार बन चुका है जबकि भारत भी चीन के पहले दस बड़े व्यापारिक साझीदारों में से एक है. वर्ष २०१० में भारत ने अपने कुल जिंस/माल निर्यात का ७.९१ प्रतिशत अकेले चीन को निर्यात किया.

हालाँकि यह चीन के कुल माल/जिंस आयात का मात्र १.४ प्रतिशत था लेकिन इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों देशों खासकर भारत के लिए चीन के साथ आपसी व्यापार को बढ़ाने की कितनी अधिक गुंजाइश मौजूद है. दूसरी ओर, चीन ने अपने कुल जिंस/माल निर्यात का मात्र २.५४ प्रतिशत भारत को निर्यात किया लेकिन यह भारत के कुल माल/जिंस आयात का ११.७७ प्रतिशत बैठता है.

आश्चर्य की बात नहीं है कि ‘इकनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ (३ नवंबर’१२) के एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार में इन दोनों देशों के एशियान देशों और दुनिया के अन्य देशों से व्यापार की तुलना में दुगुनी तेज गति से वृद्धि हुई है.
एक अनुमान के अनुसार, दोनों देशों का आपसी व्यापार वर्ष २०१५ तक १०० अरब डालर तक पहुँच जाएगा. वर्ष २०११ में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार ७३.९ अरब डालर का था. उल्लेखनीय है कि दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग के लिए एक पांच सालों के समझौते पर दस्तखत किये हैं जिसका मकसद आपसी व्यापार को तेजी से बढ़ाना है.
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि दोनों देशों के बीच तेजी से बढ़ते व्यापार को लेकर सब कुछ अच्छा ही अच्छा है. सच यह है कि इसे लेकर कई सवाल, आशंकाएं और चिंताएं भी हैं. उदाहरण के लिए एक बड़ी आशंका और चिंता यही है कि चीन से आनेवाले सस्ते उपभोक्ता सामानों, औद्योगिक उत्पादों और मालों का कहीं भारतीय बाजारों पर कब्ज़ा न हो जाए.

हालाँकि मीडिया के एक हिस्से में चीनी सामानों/उत्पादों को लेकर दिखाया जानेवाला डर अतिरेक से भरा और अंध चीन विरोध से प्रेरित है लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होनेवाले सस्ते चीनी सामानों से भारतीय बाजार पटता जा रहा है और उनके आगे भारतीय उत्पादकों खासकर लघु और मंझोले उद्योगों के लिए प्रतियोगिता में टिकना मुश्किल होता जा रहा है.

कहने की जरूरत नहीं है कि चीन आज दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री बन चुका है. खासकर श्रम केंद्रित-निर्यातोन्मुख मैन्युफैक्चरिंग में उसका कोई जवाब नहीं है और उसने एक ऐसी ‘इकनामी आफ स्केल’ हासिल कर ली है जिसका मुकाबला करना मुश्किल है.
आश्चर्य नहीं कि चीन आज दुनिया भर में अपने सस्ते सामानों/उत्पादों खासकर दैनिक जरूरत के सामानों/उत्पादों आदि के लिए जाना जाता है और उससे मुकाबला करना सभी के लिए मुश्किल हो रहा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि दुनिया की अधिकांश बड़ी कंपनियों (भारतीय कंपनियों सहित) ने चीन में अपनी औद्योगिक ईकाइयां लगा ली हैं और खुद की ब्रांडिंग के साथ सामानों को निर्यात कर रही हैं और अपने घरेलू बाजारों में बेच रही हैं.
जाहिर है कि इसके कारण भारत समेत दुनिया के कई देशों में घरेलू उद्योगों के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. भारत में कई उद्योगों में खासकर लघु-मंझोली औद्योगिक ईकाइयों के बंद होने का खतरा बढ़ता जा रहा है. कई बंद हो चुकी हैं. इससे लाखों श्रमिकों के रोजगार पर संकट मंडरा रहा है और हजारों बेरोजगार हो चुके हैं. इसे नजरंदाज़ करना मुश्किल है.

लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का यह वि-औद्योगिकीकरण सिर्फ चीनी वस्तुओं/उत्पादों के कारण नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों से भी हो रहे सस्ते आयात के कारण है और व्यापक अर्थों में यह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का नतीजा है.

दूसरे, भारत-चीन व्यापार के बीच तेजी से बढ़ते व्यापार में एक पेंच भारत के सन्दर्भ में बढ़ता व्यापार घाटा है. वर्ष २०१० में चीन से व्यापार में भारत का व्यापार घाटा (आयात की तुलना में निर्यात का अंतर) बढ़कर २१.२५ अरब डालर तक पहुँच गया.
हालाँकि चीन को भारत का निर्यात १८.७७ अरब डालर रहा जो वर्ष २००९ की तुलना में ८१ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्शाता है लेकिन इस बढ़ोत्तरी के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार में व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है. यह दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव की वजह भी बन रहा है. इसके कारण चीन से हो रहे आयात पर अंकुश लगाने की मांग भी जोर पकड़ रही है.
लेकिन इन समस्याओं और असंतुलन के बावजूद दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार में संभावनाएं और उम्मीदें भी बहुत हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बढ़ते व्यापार के कारण दोनों देशों में राजनीतिक संबंध सामान्य हो रहे हैं. आपसी कटुता और अविश्वास कम हुआ है.

दूसरे, आपसी व्यापार में वृद्धि से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा हो रहा है. आज जब पूरी दुनिया में आपसी और क्षेत्रीय व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए व्यापारिक समझौते हो रहे हैं और गठबंधन हो रहे हैं, उस समय दो तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकती हैं. उससे दोनों को नुकसान होगा.

तीसरे, भारत-चीन के बीच बढ़ते व्यापार का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत और चीन जहाँ कई क्षेत्रों में कड़े प्रतियोगी हैं, वहीं कई क्षेत्रों में उनके वे एक दूसरे के पूरक भी हैं और कई और क्षेत्रों में उनकी ताकत अलग-अलग भी है. जैसे चीन अगर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में वैश्विक ताकत है तो भारत सेवा क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है.
इसी तरह चीन सूचना तकनीक-कंप्यूटर के क्षेत्र में हार्डवेयर के निर्यात में आगे है तो भारत साफ्टवेयर में आगे है. इन क्षेत्रों में एक-दूसरे के सहयोगी हो सकते हैं. ऐसे में, यह दोनों देशों के हक में है कि आपसी व्यापार में मौजूद असंतुलन और विसंगतियों को दूर करते हुए एक-दूसरे के सहयोग-समर्थन पर आधारित व्यापार को और प्रोत्साहित करें ताकि उसका फायदा दोनों देशों की जनता को मिल सके.
यह इसलिए भी जरूरी है कि इस मामले में पीछे लौटने का विकल्प दोनों देशों के पास नहीं है. गंगा और यांग्त्सी में बहते हुए पानी की तरह उन्हें आगे ही बहना होगा. 

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप परिशिष्ट में 3 नवम्बर को प्रकाशित टिप्पणी)                    

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

कारपोरेट पूंजी की चाकर बन गई राजनीति को जनसंघर्षों के जरिये मुक्त कराना जरूरी

गरीबों की जरूरतों और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अर्थनीति का राजनीति के मातहत होना जरूरी है
तीसरी और आखिरी क़िस्त  
इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है. आर्थिक सुधार के इन वर्षों में कृषि को उसके हाल पर छोड़ दिया गया. किसानों को न सिर्फ खाद, बिजली और बीज आदि की बढ़ी कीमतें चुकानी पड़ी, उन्हें उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिला बल्कि उन्हें डब्ल्यू.टी.ओ के बाद बाजार में सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों से मुकाबला करना पड़ा.
इसका सबसे बुरा प्रभाव नगदी फसलों के किसानों पर पड़ा है. यही नहीं, आर्थिक सुधारों के तहत सब्सिडी कटौती के कारण कृषि में सरकारी निवेश घटा और उसके कारण कृषि की उत्पादकता वृद्धि में भी गिरावट आ रही है. आश्चर्य नहीं कि जिन वर्षों में जी.डी.पी की वृद्धि दर औसतन ८ फीसदी के आसपास थी, उन वर्षों में भी कृषि की वृद्धि दर औसतन मात्र २ फीसदी के आसपास थी.
नतीजा यह कि जी.डी.पी में कृषि का योगदान घटते-घटते १४.८ फीसदी से भी कम रह गया है जबकि कृषि पर अब भी देश की ५४ फीसदी आबादी निर्भर है. इसका अर्थ यह हुआ कि देश में जी.डी.पी के रूप में पैदा होनेवाली कुल समृद्धि में सिर्फ १४.८ फीसदी हिस्सा ही कृषि क्षेत्र में आता है लेकिन उसपर देश की कुल ५४ फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका निर्भर है.

इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी बद से बदतर होती जा रही है. उसपर एक तो करेला, उसपर नीम चढ़े की तरह पिछले कुछ वर्षों में किसानों से विकास के नामपर उद्योग, सेज, हाईवे, बिजलीघर, रीयल इस्टेट आदि बनाने के लिए ८० लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन जबरदस्ती ली गई है. योजना आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि यह कोलंबस के बाद दुनिया में जमीन की सबसे बड़ी लूट है.

लेकिन यह लूट सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. सच यह है कि आर्थिक सुधारों के नामपर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की आड़ में खुले बाजार को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें ‘जल-जंगल-जमीन से लेकर प्राकृतिक संसाधनों’ की कारपोरेट लूट ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं.
असल में, देश में डालर अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या यूँ ही नहीं बढ़ रही है. यह कोई जादू नहीं है. यह वास्तव में आर्थिक सुधारों से ज्यादा आर्थिक सुधारों के नामपर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को दी जा रही रियायतें, छूट और सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम हस्तान्तरण के कारण संभव हुआ है. अकेले २-जी और कोयला आवंटन में कोई ३.६२ लाख करोड़ रूपयों से अधिक की सार्वजनिक संपत्ति बड़ी कंपनियों और नेताओं के रिश्तेदारों/करीबियों को बाँट दी गई.
हैरानी की बात नहीं है कि आर्थिक सुधारों के नामपर यह कहते हुए कि पैसे पेड पर नहीं उगते, सब्सिडी कटौती का सारा बोझ आम आदमी और गरीबों पर डाला जा रहा है, उस समय देश के कार्पोरेट्स, बड़े निवेशकों, अमीरों, उच्च मध्य और मध्य वर्ग को टैक्स छूटों, रियायतों और कटौतियों के जरिये सालाना कोई ५.१५ लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी दी जा रही है.

तर्क यह दिया जाता है कि यह देश के ‘तेज विकास’ के लिए जरूरी है. लेकिन इस ‘तेज विकास’ का हाल यह है कि यह ‘रोजगारविहीन विकास’ (जाब्लेस ग्रोथ) है. खुद सरकारी रिपोर्टें कह रही है हैं कि देश में तेज जी.डी.पी वृद्धि दर के बावजूद रोजगार वृद्धि की दर बहुत मामूली या नगण्य है. संगठित क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है.

नए रोजगार के अवसर असंगठित क्षेत्र में पैदा हुए हैं जहाँ वेतन-सेवाशर्तों आदि के मामले में श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही है. ठेका और अस्थाई श्रमिकों की तादाद बढ़ी है और उन्हें जिन बदतर स्थितियों में काम करना पड़ता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

च पूछिए तो आज नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत खुल चुकी है. खासकर देश के करोड़ों गरीबों, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों और अल्पसंख्यकों ने अपने कड़वे अनुभवों से जान लिया है कि आर्थिक सुधारों की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है लेकिन इसकी मलाई मुट्ठी भर अमीर-अभिजात्य लोग उड़ा रहे हैं.
यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के हर कोने में किसान, आदिवासी, दलित और गरीब ‘जल-जंगल-जमीन और खनिजों’ की लूट के खिलाफ डटकर खड़ा हो गया है. किसान और आदिवासी किसी भी नए प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने को तैयार नहीं हैं और वे लड़ने और मरने-मारने पर उतारू हैं. श्रमिकों की बेचैनी फूटने लगी है. मारुति में श्रमिकों का आंदोलन अपवाद नहीं है.
और तो और आर्थिक सुधारों का मुखर समर्थक रहा मध्य और निम्न मध्य वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अब इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करने लगा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन इस प्रवृत्ति की एक मिसाल है.

यही नहीं, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर जिस तरह से मध्यवर्गीय व्यापारियों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है, उससे साफ़ हो गया है कि देश में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थकों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है. इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने दावे करें लेकिन सच्चाई पर पर्दा डालना अब संभव नहीं रह गया है.                                 

इस अर्थ में नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी को चुनौती मिलने लगी है. लेकिन उसे मुकम्मल चुनौती देने के लिए जरूरी है कि अर्थनीति को राजनीति के मातहत लाने की वैकल्पिक राजनीति को आगे बढ़ाया जाए.
आखिर राजनीति क्या है? राजनीति और कुछ नहीं बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों की जरूरतों, आकांक्षाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है. लेकिन नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के जो समर्थक अर्थनीति को राजनीति से अलग रखने की मांग करते हैं, वे असल में, उसे आम लोगों की जरूरतों, आकांक्षाओं और इच्छाओं से अलग रखने की मांग करते हैं.
लेकिन आम लोगों खासकर इस देश के बहुसंख्यक गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की जरूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अर्थनीति का राजनीति के मातहत होना जरूरी है.
लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कारपोरेट और बड़ी आवारा पूंजी की चाकर बन गई राजनीति को जनसंघर्षों के जरिये उनके कब्जे से मुक्त कराया जाए और उसे फिर से गरीबों की आवाज़ बनाया जाए. साफ़ है कि वैकल्पिक और जनोन्मुखी अर्थनीति के लिए वैकल्पिक राजनीति जरूरी है. यह भी तय है कि वह वैकल्पिक राजनीति जनसंघर्षों से ही निकलेगी.

(लखनऊ से प्रकाशित 'समकालीन सरोकार' के नवम्बर अंक में प्रकाशित लेख की तीसरी और आखिरी क़िस्त)